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नरेन्द्र मोदी के चुनावी विभ्रम

भाजपा और नरेन्द्र मोदी का आनेवाले चुनाव में संभावित वैचारिक नारा "ताकतवर-भारत" का होगा। मोदी के प्रचार अभियान के प्रधान मुद्दे होंगे पड़ोसियों से दबकर मत रहो ।उनसे अकड़ से पेश आओ। अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों का समानता के नाम पर दबाब बनाए रखो। उन्हें मैनस्ट्रीम से बाहर रखो। मोदी और भाजपानेताओं के भाषणों का मूल मुद्दा मनमोहन सरकार की करप्टशासन प्रणाली और अनेकों घोटाला गाथाएं रहेंगी। मोदी के प्रचार का लक्ष्य है धर्मनिरपेक्ष सामाजिक बहुलतावाद को "भारत पहले "पदबंध के जरिए बहस से गायब करो। युवाओं की बात करने के बहाने,मध्यवर्गीय युवाओं को अपील करो। खेतीहरयुवाओं-अल्पसंख्यकयुवाओं पर ध्यान न दो। मजदूरों-किसानों के मूल सवालों से आम चुनाव में जनता का ध्यान हटाओ। नव्य-उदार नीतियों के जनविरोधी चरित्र पर से ध्यान हटाने के लिए "आदर्श गुजरात विकास " पर जोर दो। गुजरात विकास के कारपोरेट चरित्र का महिमामंडन करो और देश को उसका अनुगमन करने का संदेश दो। ---- नरेन्द्र मोदी जिस संघ परिवार से आते हैं उसकी खूबी है कि गुरू गोलवल्कर जो लिख गए हैं उन विचारों में अब तक कोई बुनियादी बदलाव…

जनसत्ता के निराला पर प्रतिक्रियावादी हमले

हाल ही में जनसत्ता अखबार में शंकरशरण का लेख छपा है जिसमें सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को हिन्दुत्ववादी सिद्ध करने का आधारहीन प्रयास किया गया है। इस लेख में निराला को समग्रता में देखने की कोशिश ही नहीं की गयी है। साथ ही इस लेख में निरर्थक प्रगतिवाद पर हमला बोला गया है। अप्रासंगिकता को आलोचना में दीमक कहते हैं। -- जनसत्ता जैसे अखबार की प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम जारी है और उसमें कविताओं के साथ आलोचना कम कु-समीक्षा ज्यादा लिखी जा रही है।हाल ही में शंकर शरण जैसे लेखक ने अपने लेख में निराला की प्रसिद्ध कविता तुलसीदास का गलत मूल्यांकन किया है। असल में उसी कविता में निराला ने कविता लिखने का मकसद भी लिखा है। निराला ने लिखा है- "करना होगा यह तिमिर पार। देखना सत्य का मिहिर द्वार।" यह कविता हिन्दुत्ववादी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली कविता नहीं है। बल्कि इसका लक्ष्य भिन्न है। इस कविता का मूल लक्ष्य है सांस्कृतिक अंधकार को पार करके सत्य को पाना। साम्प्रदायिक नजरिए का सत्य के सत्य बैर है। शंकरशरण जैसे लेखक इस मूल बात को पकड़ने में असमर्थ रहे हैं। कविता किसके लिए लिखी गयी है यह बात क…

भारतीय मध्यवर्ग के वहशी रूप

भारत में मध्यवर्ग का तेजगति से पतन हो रहा है ।इतनी तेजगति से अन्य किसी वर्ग का पतन नहीं हुआ है। मध्यवर्ग के आदर्शनायक आईएएस -आईपीएस अफसरों में बहुत बड़ा समुदाय तैयार हुआ है जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। ये वे लोग हैं जिनके पास सब कुछ है।सबकुछ होते हुए भी ये क्यों भ्रष्ट हो रहे हैं ? -- भारत के मध्यवर्ग ने सामाजिक-आर्थिक शक्ति अर्जित करते ही सामाजिक-राजनीतिक दायित्वों और लोकतांत्रिक लक्ष्यों से अपने को सचेत रूप से अलग किया है। अधिकतर मध्यवर्गीय शिक्षितलोग राजनीति को बुरा मानते हैं या भ्रष्ट राजनीति की हिमायत करते हैं या अधिनायकवादी या फासिस्ट राजनीति की हिमायत करते हैं।मध्यवर्ग का इस तरह का चरित्र बताता है कि भारत में संपन्नता जिन वर्गों में पहुंची है उनमें लोकतांत्रिक मूल्य अभी तक नहीं पहुंचे हैं। ---- भारत में मध्यवर्ग में सांस्कृतिक परवर्जन तेजी से बढ़ा है। दुनिया के अनेक देशों में आधुनिककाल में वैज्ञानिकचेतना और स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों का मध्यवर्ग में विकास हुआ है ,लेकिन भारत में उलटी गंगा बह रही है।
भारत के मध्यवर्ग में इन दिनों प्रतिगामिता की आंधी चल रही है। सेक्स से लेकर धर्…