ग्लोबल संस्कृति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ग्लोबल संस्कृति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 8 मार्च 2015

गालियाँ और कु-संस्कृति

       पुनरुत्थानवाद की खूबी है कि वह पुराने असभ्य सामाजिक रुपों ,भाषिक प्रयोगों ,आदतों या संस्कारों को बनाए रखता है।गालियां उनमें से एक हैं। पुनरुत्थानवाद के असर के कारण हिन्दीभाषी राज्यों में गालियां आज भी असभ्यता के बर्बर रुप के तौर पर बची हुई हैं और आम सम्प्रेषण का अंग हैं। हिन्दी में रैनेसां का शोर मचाने वाले नहीं जानते कि हिन्दी में रैनेसां असफल क्यों हुआ ? रैनेसां सफल रहता तो हिन्दी समाज गालियों का धडल्ले से प्रयोग नहीं करता। बांग्ला ,मराठी ,तमिल,गुजराती में रैनेसां हुआ था और वहां जीवन और साहित्य से गालियां गायब हो गयीं। लेकिन हिन्दी में गालियां फलफूल रही हैं। गालियां असभ्यता की सूचक हैं। जिस साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति का औजार गाली हो वह समाज पिछडा माना जाएगा। गालियां इस बात का संकेत हैं कि हमारे समाज में सभ्यता का विकास धीमी गति से हो रहा है। यथार्थ की भाषिक चमक यदि गाली के रास्ते होकर आती है तो यह सांस्कृतिक पतन की सूचना है। 
हिन्दी में अनेक लेखक हैं जो साहित्य में गालियों का प्रयोग करते हैं। अकविता से लेकर काशीनाथ सिंह तक के साहित्य में गालियां सम्मान पा रही हैं। गाली अभिव्यक्ति नहीं है। यथार्थ कभी गालियों के जरिए व्यक्त नहीं होता। अधिकांश बड़े साहित्यकारों ने यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए कभी गालियों का प्रयोग नहीं किया। गालियों का किसी भी तर्क के आधार पर महिमामंडन करना गलत है। हिन्दी में कई लेखक हैं जो अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए गालियों का प्रयोग करना जरूरी समझते हैं। युवाओं में गालियों का सहज प्रयोग मिलता है। इन दिनों इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी गालियों का प्रयोग बढ़ गया है।सवाल उठता है हिन्दी समाज इतना गाली क्यों देता है ? क्या हम गालियों से मुक्त समाज नहीं बना सकते ? वे कौन सी सांस्कृतिक बाधाएं हैं जो हमें गालियों से मुक्त नहीं होने देतीं ? प्रेमचंद ने लिखा है '‘हर जाति का बोलचाल का ढ़ंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजवानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गन्दे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की ज़बान से निकलते हों।'’
आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोगों से लेकर अनपढ़ लोगों तक गालियों का खूब चलन है। कुछ के लिए आदत है। कुछ के लिए धाक जमाने,रौब गांठने का औजार हैं गालियां। पुलिस वाले तो सरेआम गालियों में ही संप्रेषित करते हैं। गालियों के इस असभ्य संसार को हम तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं। कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ -साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है। इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे।गालियों के प्रयोग के खिलाफ हमें खुली निर्मम बहस चलानी चाहिए। बगैर बहस के गालियां पीछा छोड़ने वाली नहीं हैं। बहस से ही दिमागी परतों की धुलाई होती है।गालियां मिथ्या साहस की अभिव्यक्ति हैं। गालियां एक सस्ती,घृणित और नीच अश्लीलता है। गालियां महज यांत्रिक आघात नहीं करतीं। इनसे न तो सेक्सी बिम्ब उभरते हैं और न कामुक अनुभूतियां ही पैदा होती हैं। सेक्सी गालियां हमारी अरूचिकर और अस्वास्थ्यकर संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति हैं। अश्लील गालियां और अश्लील मजाक के जरिए परपीड़न होता है। गंदे किस्से, चुटकुले,चालू अश्लील शब्द मानवीय सौंदर्य की गरिमा को कम करते हैं। मानव इतिहास आदिम शरीरक्रियात्मक मानकों को कूड़े के ढ़ेर पर फेंक चुका है। लेकिन अभी भी हमारे अनेक मित्र गालियों की हिमायत कर रहे हैं। इस प्रसंग में प्रसिद्ध रूसी शिक्षाशास्त्री अन्तोन माकारेंको याद आ रहे हैं उन्होंने लिखा है- '‘पुराने जमाने में शायद गाली-गलौज की गंदी भाषा कमजोर शब्दावली तथा मूक-निरक्षरता के लिए सहायक की तरह अपने ही ढ़ंग से काम आती थी। स्टैंडर्ड गाली की सहायता से आदिम- भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था, जैसे क्रोध,प्रसन्नता, आश्चर्य, निंदा और ईर्ष्या । लेकिन अधिकांशतः यह किसी भी भावना को व्यक्त नहीं करती थी, बल्कि असम्बद्ध ,मुहावरों और विचारों को जोड़ने के साधन का काम देती थी।'’
हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि हिन्दी में गालियां कहां से आ रही हैं? गालियों के मामले में हम लोकल और ग्लोबल एक ही साथ होते जा रहे हैं। जाने-अनजाने असभ्यता का विनिमय कर रहे हैं। कुछ लोग भाषा को उग्र या आक्रामक बनाने के लिए गालियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि हमारी जनता उग्र और आक्रामक भाषा पसंद नहीं करती। वह इसे असभ्यता मानती है। गालियों से अभिव्यक्ति में पैनापन नहीं आता बल्कि असभ्यता का संचार होता है। तीक्ष्णता और अभद्रता में हमें अंतर करना चाहिए। हमें बहस-मुबाहिसों में असभ्यता से बचना चाहिए। बहस मुबाहिसे में यदि असभ्यता आ जाती है तो फिर गालियां स्वतः ही चली आती हैं। हिन्दी में स्थिति इतनी बदतर है कि एक नामी साहित्यिक पत्रिका के संपादक आए दिन अपने संपादकीय तेवरों को आक्रामक बनाने के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करते थे। वे भाषा में तीक्ष्णता पैदा करने के लिए ऐसा करते थेलेकिन यह मूलतः असभ्यता है। हमें अभिव्यक्ति के लिए तीक्ष्णता का इस्तेमाल करना चाहिए ,असभ्य भाषिक प्रयोगों का नहीं। इन जनाब के संपादकीय अनेक मामलों में अधकचरी विद्वता और अक्षम तर्कपूर्ण शैली से भरे होतेथे।
हमें विचारों की तीक्ष्णता और साहित्यिक अभिव्यंजना की अभद्रता के बीच अंतर करना चाहिए। लेखन में गाली का प्रयोग एक ही साथ गलत और सही दिखता है। एक जमाने में महान रूसी लेखक पुश्किन ने तीक्ष्णता और अभद्रता के अंतर का विवेचन करते हुए लिखा था, ‘ 'गाली कभी-कभी ,निश्चय ही,बिल्कुल अनुचित है। जैसे कि आपको नहीं लिखना चाहिएः ‘‘यह हांफता हुआ बूढ़ा,चश्मा लगाए हुए एक बकरा है,एक कमीना झूठा है,बदकार है,बदजात है।’’- ये व्यक्ति को दी गयी गालियां हैं। किन्तु अगर आप चाहें ,तो लिख और छाप सकते हैं कि ‘‘यह साहित्यिक पुराना उपासक(अपने लेखों में) एक निरर्थक बकवासी है,हमेशा दुर्बल,हमेशा उकताने वाला,कष्टकर और बिल्कुल अहमक़ तक है।’,'’क्योंकि यहां पर कोई व्यक्ति नहीं एक लेखक है।’'
इसी प्रसंग में अन्तोन माकारेंको ने लिखा है, ‘'हमारे देश में गाली-गलौज के शब्दों का ‘‘तकनीकी’’ महत्व खत्म हो गया है, लेकिन भाषा में वे अभी भी मौजूद हैं। अब वे मिथ्या साहस को, ‘‘लौह चरित्र’’ को,निर्णायकत्व,सरलता ,सुरूचि के प्रति तिरस्कार को अभिव्यक्त करते हैं। अब वे एक किस्म के ऐसे नखरे हैं,जिनका मकसद सुनने को खुश करना ,उनको जीवन के प्रति सुनानेवाले के साहसिक रवैय्ये और पूर्वाग्रहहीनता को दर्शाना है।'’
साहित्य में गाली के पक्षधरों का मानना है पात्र यदि गाली देते हैं तो हमारे लिए उससे बचना संभव नहीं है। इस प्रसंग में यही कहना है कि गालियां साहित्य नहीं हैं। गालियां जीवन का यथार्थ भी नहीं हैं। गालियां महिलाओं का अपमान हैं और बच्चों के लिए हानिकारक हैं। गालियों के प्रति हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए। गालियों को साहित्य में रखकर हम उन्हें दीर्घजीवी बना रहे हैं। उन्हें मूल्यबोध प्रदान कर रहे हैं। विरासत के रूप में गालियां हमारे समाज और संस्कृति की गंभीर क्षति कर रही हैं। प्रेमचंद ने लिखा है '‘ गाली हमारा जातीय स्वभाव हो गयी है।’','‘गालियों का असर हमारे आचरण पर बहुत खराब पड़ता है। गालियाँ हमारी बुरी भावनाओं को उभारती है और स्वाभिमान व लाज-संकोच की चेतना को दिलों से कम करती हैं जो दूसरी क़ौमों की निगाहों में ऊँचा उठाने के लिए जरूरी है।’'
जब कोई व्यक्ति गालियों का इस्तेमाल करता है तो पढ़ने या सुनने वाला किसी सापेक्ष शब्द को नहीं सुनता बल्कि वह गाली के जरिए उसमें अन्तर्निहित सेक्स के अर्थ तक पहुँचता है। इस दुर्भाग्य का मूल सार यह नहीं है कि सेक्स का राज पाठक या श्रोता के सामने खुल जाता है, बल्कि यह कि वह राज अपने सबसे ज्यादा कुरूप,मानवद्वेषी तथा अनैतिक रूप में उदघाटित होता है। ऐसे शब्दों का बारम्बार होने वाला उच्चारण या लिखित प्रयोग पाठक या श्रोता को सेक्सी मामलों पर अत्यधिक ध्यान देने की,विरूपित दिवास्वप्न देखने की आदत पैदा करता है। इससे लोगों में अस्वास्थ्यकर रूचियों का विकास होता है।
अधिकांश गालियां स्त्रीकेन्द्रित हैं और उनके गुप्तांगों को लेकर हैं या उसके विद्रूपों को लेकर हैं। इससे सामाजिक हिंसा में बढ़ोतरी होती है। साथ ही यह भावना पैदा होती है कि औरत इस्तेमाल की चीज है। अपमानित है। मादा है। आश्चर्यजनक बात है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर बड़ी कक्षाओं तक गालियों के खिलाफ कोई पाठ नहीं है। सारे देश के बुद्धिजीवी आराम से आए दिन सिलेबस बनाते हैं और पढ़ाते हैं। लेकिन गालियों के बारे में कभी क्लास नहीं लेते। कभी बोलते नहीं हैं। उलटे यह देखा गया है कि जिस बच्चे को डांटना होता है उस पर गालियों की बौछार कर देते हैं।
गालियों का प्रयोग सत्य को स्थगित कर देता है। हम जब गाली देते हैं या गाली लिखते हैं तो उस समय हमारी नजर गाली पर होती है सत्य पर नहीं,हम गाली में उलझे होते हैं। गालियों के प्रयोग से वर्तमान साफ नजर नहीं आता। गालियों का प्रयोग विचारों और यथार्थ को एक नई भंगिमा में तब्दील कर देता है। एक विलक्षण किस्म के पाठ की सृष्टि करता है। वह अवधारणाओं के अर्थ और यथार्थ के अर्थ को संकुचित करता है। अर्थ संकुचन गालियों की पूर्वशर्त है। यह य़थार्थ को उसके स्रोत से काट देता है । जबकि लेखक यही दावा करता है कि वह वास्तविकता दरशाने के लिए गालियों का प्रयोग कर रहा है। गालियों के साहित्यिक प्रयोग को स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में ही पेश किया जाता है। जबकि सच इसके एकदम विपरीत है।गालियों का प्रयोग अर्थविस्तार नहीं करता उलटे अर्थसंकोच करता है। जब कोई लेखक यथार्थ को गालियों में खींच लाता है तो वह यथार्थ के साथ जुड़े बुनियादी तर्कों से उसे अलग कर देता है। यथार्थ के सत्य और असत्य विकल्पों की संभावनाएं खत्म कर देता है। गालियों का प्रयोग यथार्थ की बहस को वर्तमान काल में ले आता है। अब उसके लिए वर्तमान का जीवंत यथार्थ बेमानी होता है। गालियों का प्रयोग वर्तमान यथार्थ को शरणार्थी बना देता है।
वैसे अधिकांश रचनाओं में एकाधिक अर्थ की संभावनाएं होती हैं लेकिन गाली के प्रयोग वाले अंशों में एक ही अर्थ होता है। एकाधिक अर्थ या भिन्न अर्थ की संभावनाओं को गालियां नष्ट कर देती हैं। गालियों का प्रयोग सामाजिक गैर -बराबरी को बनाए रखता है। सामाजिक हायरार्की को आप इसके प्रयोगों के जरिए अपदस्थ नहीं कर सकते। गालियों में परिवर्द्धन और सम्बर्द्धन संभव नहीं है वे जैसी बनी थीं वैसी ही चली आ रही हैं। यह सिलसिला सैंकड़ों सालों से चला आ रहा है। गालियों के जरिए युगीन विचारों को नहीं पकड़ सकते। हिन्दी में जिसे दिल्लगी कहते हैं वह भी गालियाँ है। प्रेमचंद ने दिल्लगी को गालियों से कुछ कम घृणित माना है। गालियों को उन्होंने ‘जातीय कमीनेपन’ और ‘नामर्दी’ का सबूत कहा है। साथ ही इसे ‘जातीय पतन की देन’ माना है। उनके ही शब्दों में गालियां‘' जातीय पतन दिलों की इज़्ज़त और स्वाभिमान की चेतना को मिटाकर लोगों को बेग़ैरत और बेशर्म बना देती है।’'गालियां अनुभूति की शक्ति मिटा देती हैं।

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

सांस्कृतिक अध्ययन की राजनीति-फ्रैंसिस म्यूलहर्न

इन अनुमानतः उत्तर आधुनिक समयों की एक आश्चर्यजनक बौद्धिक परिघटना महानगरीय विद्वतपरिषद में सांस्कृतिक अध्ययनों के एक नए ‘ज्ञान क्षेत्र’ का आरंभ होना है। मैं यहां ‘नए’ शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि सांस्कृतिक अध्ययन सही मायनों में कभी भी महत संस्कृति का एक सुव्यवस्थित अध्ययन नहीं था। यह आरमब से ही विचारधारात्मक एवंआनुभविक गवेषणा की एकदिष्ट और आत्मज्ञात विरोधात्मक कार्ययोजना था। एक विचार,जिसने सर्वप्रथम बर्मिँघम विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में एक उपविभाग के रूप में संस्थागत आकार ग्रहण किया,आज विकसित होकर शैक्षिक गतिविधि की समस्त सूची में शामिल हो गया है। इसमें विशिष्ट डिग्री,स्नातक कार्यक्रम,पेशे से संबंधित संस्थाएं, बड़े-बड़े सम्मेलन और अंतर्महाद्वीपीय नेटवर्क ये सभी चीजें उपलब्ध हैं। निगमित प्रकाशकों ने तो सांस्कृतिक अध्ययनों से संबंधित लेखन के लिए पूरी पुस्तक सूची ही समर्पित कर दी है। जिसमें इस विषय से जुड़े न केवल शोध शामिल हैं बल्कि इसका इतिहास भी। इसमें अध्येताओं के लिए भारी भरकम पाठ्यपुस्तक हैं न कि झांसापट्टी केकुछ गाइड। अपनी प्रभावशाली संरचना का निर्माण करने के साथ-साथ सांस्कृतिक अध्ययनों ने अधिकारिक सफलता के साथ शिक्षा के अन्य क्षेत्रों विशेष रूप से साहित्य,इतिहास,समाजशास्त्र और महिलाओं से संबंधित अध्ययन के क्षेत्रों में शोध तथा शिक्षण को नए रूप में प्रस्तुत करने का सुझाव दिया है। तीस साल पूर्व आरंभ हुआ एक छोटा सा रैडिकल हस्तक्षेप अब समस्त मानवविज्ञानों के लिए व्यापक रूप से एक नए सामान्य सूत्र के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह घटना एक समझदार प्रेक्षक में अनिवार्य रूप से एक विसंगति या सहज अवास्तविकता का अहसास उत्पन्न करती है। यह अहसास इस कल्पना से और भी गहरा हो जाता है कि यह घटना उन ऐतिहासिक स्थितियों में हुई जिनमें इसे विफल करने की प्रवृत्ति होनी चाहिए थी। सांस्कृतिक अध्ययन रैडिकल नवपरिवर्तन तथा पुनर्संरचना की एक स्व-परिभाषित योजना है। जिन बरसों में इसका पल्लवन हुआ, वह उन शैक्षिक संस्थानों, जहां इस विषय का अध्ययन होता है, (विशेष रूप से, लेकिन केवल ब्रिटेन में ही नहीं) उसके लिए कठोर वित्तीय संयम तथा उन रैडिकल आंदोलनों के पराभव और दिशाभ्रम कासमय था, जो इसके प्रेरणा स्रोत रहे हैं। सांस्कृतिक अध्ययन की धूम एक प्रभावशाली वास्तविकता है लेकिन किसी को भी इसे विकासगाथा मानकर जश्न मनाना नहीं चाहिए। सांस्कृतिक अध्ययन के कारण जो व्यक्तिगत तथा सामूहिक उपलब्धियां संभव हुई हैं, इन्हें स्वीकार करना उचित है। लेकिन साथ ही हमें सांस्कृतिक विश्लेषण की रीति के रूप में इस योजना के आम तर्क पर और सांस्कृतिक राजनीति पर कुछ आवश्यक आलोचनात्मक विवेचना भी करनी चाहिए।

मैंने यहां यह विवेचना पांच संक्षिप्त टिप्पणियों के रूप में करने का प्रयास किया है। सबसे पहले मैंने सांस्कृतिक अध्ययन को सांस्कृतिक विश्लेषण की एक अलग स्पष्ट प्रवृत्ति के रूप में परिभाषित करने की कोशिश की है। इसके बाद इस विषय में जीवन के कुछ अंतर्विराधों तथा विचारों की चर्चा करते हुए अंत में इसमें जो संबंध दांव पर है, जैसे, संस्कृति और राजनीति के बीच के संबंध के बारे में कुछ सामान्य आलोचनात्मक अभ्युक्तियां दी हैं।

1

सांस्कृतिक अध्ययन की पुराशास्त्रीय परिभाषा रेमंड विलियम्स द्वारा प्रतिपादित की गई थी। उनके अनुसार यह ऐतिहासिक भौतिक मानवीय संघटन समझे जाने वाले समाजों में बोध-निर्माण की पूरी दुनिया (व्याख्याओं, विश्लेषणों, अधिनिरूपणों, सभी प्रकार के मूल्यांकनों) में तथा 'संपूर्ण जीवन शैली' के नियामक भाग के रूप में बोध-निर्माण का अन्वेषण करेगा। यानी सांस्कृतिक अध्ययन सबसे पहले विश्लेषण के क्षेत्र में व्यापक विस्तार की मांग करता है; साहित्यिक आलोचना की सीमाओं से भी परे जिससे यह उत्पन्न हुआ है। अर्थात सभी सामाजिक अर्थों की जांच की जा सकती है। बहरहाल, सांस्कृतिक अध्ययन की परिभाषा के लिए इतना कहना काफी नहीं। सांस्कृतिक आलोचना (या कल्चुरीक्रितिक, जो कि इसका मानक जर्मन शब्द है जिसका मैं इसके बाद रोमन टाइप में उपयोग करना पसंद करूंगा क्योंकि मिलते-जुलते अंग्रेजी के शब्द इतने आम हैं कि वे मेरे तर्क के लिए आवश्यक परिभाषा को सही-सही संप्रेषित नहीं कर पाते) की पुरानी परंपरा दैनिक जीवन के अर्थ के अध्ययन को विशेष महत्व देती थी। इस परंपरा के लेखकों में इंगलैंड के साहित्यिक समालोचक एफ.आर. लेविस तथा क्यू.डी. लेविस, स्पेन के दार्शनिक जोस ओटर्ेगा वाई गैसेट, या जर्मन के युवा थॉमस मान थे। उन्होंने लोकतंत्र की नई 'जनसमूह संस्कृति' का तथा वाणिज्यीकृत साक्षरता का पूरे मनोवेग के साथ प्रत्युत्तर दिया लेकिन हमेशा उच्च विचार की भावना और परंपरावादी जुगुप्सा से। इनके विपरीत सांस्कृतिक अध्ययन अपने आंकड़ों के 'प्रतिक्रियात्मक समतुल्यीकरण' का प्रस्ताव करता है। दूसरे शब्दों में, हालांकि कविता और पॉपकॉर्न के विज्ञापन किसी भी सत्याभासी नैतिक अर्थ में समान महत्व के नहीं हो सकते लेकिन सामाजिक अर्थों के वाहक के रूप में दोनों काफीरोचक हैं और उस अर्थ में दोनों के प्रति समान विश्लेषणात्मक गंभीरता होनी चाहिए। बहरहाल यह विभेद भी, पहली परिभाषा के समान, सांस्कृतिक अध्ययन की विवेचना के लिए अपर्याप्त है। सांस्कृतिक अध्ययन महज मानवशास्त्र की एक शैली नहीं जो सांकेतिक प्रतिक्रियाओं के एक समूह के रूप में समाज का अध्ययन करता है। एक तीसरा विशिष्ट विवरण भी है जो बहुत महत्वपूर्ण है।

सांस्कृतिक अध्ययनों ने सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) की सामाजिक संवेदनशीलता और इसके रेंज का महज विस्तार नहीं किया बल्कि उन मूल्यों के संपूर्ण तंत्र को चुनौती दी जो पुरानी परंपरा और सांस्कृतिक सत्ता के पूरे तंत्र का समर्थन करता था तथा एक वैकल्पिक सत्ता के रूपों को यदि स्थापित नहीं किया, तो कम से कम उन्हें ढूंढ़ने का कार्य आरंभ किया। इसी अर्थ में सांस्कृतिक अध्ययन को 'निसर्गत: राजनीतिक' माना जाता है।

2

सांस्कृतिक अध्ययन के एक विस्तारित, समतल क्षेत्र का यह प्रत्यय व्यावहारिक कम और सैध्दांतिक अधिक है। कोई पेशेवर समूह, कोई भी व्यक्ति 'सभी कुछ' के अध्ययन का दिखावा नहीं कर सकता। अध्ययन सामग्रियों के एक उदासीन चयन की धारणा भी परस्पर विरोधी है। चयन के लिए कुछ मौलिक विकल्प हैं; और ऐसा प्रतीत होता है अपनी सभी संभव अनुभूतियों की भिन्नता तथा संस्थागत परिस्थिति की विविधता के बावजूद सांस्कृतिक अध्ययन अपनी प्राथमिकताओं के अर्थ में अपेक्षाकृत स्थायी रहा है। इसके विश्लेषण का मुख्य क्षेत्र सामाजिक परिघटनाओं का वही रेंज रहा है जिसने पारंपरिक सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) को अत्यधिक चौकन्ना और प्रतिकर्षित कर दिया यानी उन्नत पूंजीवाद के प्रत्ययों तथा 'जनसमूह' सांस्कृतिक रूपों : सिनेमा, टेलीविजन, जनपत्रकारिता, विज्ञापन, शॉपिंग को। इसका प्रमुख विवादात्मक थीम, जो सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) के रूढ़ि विश्वास का सीधे-सीधे खंडन करता है, यह रहा है कि इस प्रकार की संस्कृति महज मूर्छाकारी औषधि नहीं, जिसे समाजातीय जनसमूह में उदासीनता उत्पन्न करने के लिए सफलतापूर्वक तैयार किया गया हो बल्कि इसके विपरीत इसमें सक्रिय, स्वैच्छिक, चुनिंदा और विध्वंसात्मक जनभागीदारी है।

संस्कृति के किसी भी समाजवादी सिध्दांत के लिए क्षेत्र तथा परिप्रेक्ष्य के ये परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) की मतांध प्रस्थापनाएं वास्तव में वैध हैं, और कुछ मार्क्सवादी खासकर हर्बर्ट मारकस उस विचार से सहमत हैं, तो मेहनतकश वर्ग की आत्म मुक्ति के रूप में समाजवाद को पुराशास्त्रीय अर्थग्रहण एक सांप्रदायिक धर्मपरायणता से ज्यादा कुछ भी नहीं। जब अंतोनियो ग्राम्शी ने कहा कि सभी मनुष्य बुध्दिजीवी है, यद्यपि उनमें से केवल कुछ को ही 'प्रबुध्द' का दर्जा तथासामाजिक कार्य का दायित्व दिया जाता है तो उन्होंने यह बात इसी पुराशास्त्रीय भावना से कही थी।

हालांकि ग्राम्शी के सूत्र का निर्णायक पहलू इसका दोहरा चरित्र है : यह न केवल मुक्ति और भौतिक संभावना पर बल देता है बल्कि वर्चस्व के स्थापित तथ्य की भी पुष्टि करता है। सांस्कृतिक अध्ययन की प्रमुख प्रवृत्ति का जोर दूसरी ओर है। चूंकि सांस्कृतिक अध्ययन अपने विश्लेषण क्षेत्र में 'उच्च' सांस्कृतिक रूपों तथा आचरणों को शामिल नहीं करता है अत: यह अपनी ही विचारधारात्मक महत्वाकांक्षा से समझौता करता है जो कि 'संपूर्ण जीवन शैली' या और अधिक स्पष्ट शब्दों में कहें तो संस्कृति के समग्र विद्यमान सामाजिक संबंधों की विवेचना करना है। और चूंकि यह प्रचलित सांस्कृतिक व्यवहारों के सक्रिय तथा महत्वपूर्ण तत्व पर एकतरफा जोर देता है अत: इसमें असमानता और दमन की व्याकुल कर देने वाली ऐतिहासिक वास्तविकताओं की अनदेखी करने की प्रवृत्ति भी है। ये ऐतिहासिक वास्तविकताएं उनका निर्धारण करती हैं। ये प्रवृत्तियां संयुक्त रूप से उचित आलोचना सिध्दांत के विकास तथा विश्लेषण के विरुध्द कार्य करती है; जो सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) को प्रतिस्थापित करने का दावा करती हैं लेकिन वास्तव में इसकी प्रतिपूरक प्रतिक्रिया से ज्यादा कुछ भी प्रस्तुत नहीं करती है।

सांस्कृतिक अध्ययन में कुछ मत इन प्रवृत्तियों के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं लेकिन बिना किसी खास सफलता के। बहुसंख्यक प्रवृत्ति के विरुध्द 'जनवाद' का आरोप लगाया गया है और यह सही भी है। लेकिन अपने सभी रूपों में जनवाद अपने आपको विरोधपरक पाता है; यहां इसके विरुध्द इससे भी अधिक गंभीर आरोप लगाए जा सकते हैं। चूंकि आज अधिकांश महानगरीय लोक संस्कृति ने पण्यीकृत मनोरंजन या सौंदयीकृत जीविकोपार्जन कार्य का रूप ले लिया है; 'जीवनशैली' में सब कुछ बाजार के साथ संघटित है, अत: सांस्कृतिक अध्ययन का स्वत:स्फूर्त झुकाव वास्तव में विन्यासवादी है; और सबसे बुरे ढंग से सोचने पर यही 'सैटेलाइट टेलीविजन तथा शापिंग माल्स' की विचारधारात्मक आत्मचेतना है।

3

माना कि यह विवरण स्थिति की सबसे खराब विवेचना है। इसके प्रति उल्लेखनीय ऊर्जा और प्रतिभा तथा कार्य का असाधारण रिकार्ड प्रस्तुत किया जाना चाहिए। लेकिन यह इस स्वीकृत दृढ़ विश्वास के अर्थ पर और विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि सांस्कृतिक अध्ययन अनिवार्य रूप से वामपंथ की ओर है या जैसा कि एक जोरदार तथा खोखले पदबंध में हमसे बार-बार कहा जाता है कि यह 'निर्सगत: राजनीतिक' है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि सांस्कृतिक अध्ययनों ने समाजवादी, स्त्रीवादी, नस्लवादविरोधी, साम्राज्यवादविरोधी जैसे मुक्तिदायी सामाजिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।इन विशिष्ट और ठोस अर्थों में इनका हस्तक्षेप राजनीतिक है। लेकिन सांस्कृतिक अध्ययन को महज 'हस्तक्षेप' समझते रहना रूमानी होगा। अब यह संस्थागत शैक्षिक गतिविधि है। और शैक्षिक गतिविधि, इसके आंतरिक गुण चाहे जो भी हो, निश्चित तौर पर राजनीतिक परियोजना नहीं हो सकती। जब कोई विरोधात्मक प्रवृत्ति एक ऐसा विषय बन जाती है जिसके लिए अलग बजट प्रावधान हो, जो प्रत्यय-पत्र, आजीविका और शोध के लिए धन मुहैया कराता हो तो क्या होता है? कमोबेश वही जो कोई यथार्थवादी उम्मीद करेगा। कोई भी शैक्षिक विषय सम्मान रूप में या यथार्थ रूप में अपने छात्रों या शिक्षकों पर राजनीतिक परीक्षण लागू नहीं कर सकता। वाकई वह दिन दूर नहीं और शायद वह आ चुका है जब इस विषय के वास्तविक प्राध्यापक, जिन्होंने इसमें प्रशिक्षण प्राप्त किया है तथा इसे विद्वतापूर्ण आजीविका के रूप में अपनाया है 'विध्वंस' या इसी प्रकार की शीर्षक वाले नेमी पाठयक्रमों पर कक्षाओं में परिचयात्मक व्याख्यान देने के लिए अपना स्थान ग्रहण करेंगे। यह केवल कटु परिकल्पना नहीं। यदि हम कोई पहले का उदाहरण देखना चाहें तो केवल एफ.आर. लेविस और उसके सहकर्मियों का स्मरण करने की आवश्यकता है जिनकी साहित्यिक आलोचना की युयुत्सु, उग्र और विद्वता-विरोधी शैली का व्यापक अनुकरण किया गया और जो अंतत: काफी पारंपरिक हो गई लेकिन इसका विरोधात्मक वैचित्र्य इसमें अभी भी था। उपदेश देना बेकार है लेकिन सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े वामपंथी विचारकों को उनका नया 'राजनीतिक' विषय उन्हें जितना प्रोत्साहित करने के लिए तत्पर प्रतीत होता है उससे कहीं अधिक उन्हें व्यंग्यात्मक आत्मचेतना की आवश्यकता है।

4

लेविस का यह उदाहरण सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) और सांस्कृतिक अध्ययन के बीच के संबंध के बारे में और भी विचार करने के लिए प्रेरित करता है। और वो भी एक ऐसे आयाम में जहां वे एक दूसरे के गहरे विरोधी प्रतीत होते हैं, यानी राजनीतिक आयाम में।

इसके भिन्न राष्ट्रीय तथा अनुशासनिक रंग-प्रबंधों (डिसिपलिनरी कलरेशंस) के बावजूद सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) एक स्थायी बौध्दिक परिघटना थी। इसके प्रवर्तक सामान्यतया मूल्यों के एक सत्तात्मक केंद्र से बोलने का दावा करते थे जिन्हें 'मानवीय' या 'सार्वभौम' या 'पारंपरिक' जैसे पदों के रूप में अभिलक्षित किया जा सकता है और जिसके लिए सर्वाधिक स्वीकार्य संक्षिप्त शब्द 'संस्कृति' है। इस अर्थ में उनका स्व-परिभाषित कार्य आधुनिकता के बढ़ते खतरों के विरुध्द संस्कृति के हितों की रक्षा करना था, जिसका निरूपण बौध्दिक विशिष्टीकरण या औद्योगिक प्रौद्योगिकी या वाणिज्यवाद या 'साधारण समाज' के रूप में किया जा सकता है और जिसके लिए पुराशास्त्रीय संक्षिप्त शब्द 'सभ्यता' थी। सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) प्राय: संभ्रांतवर्गीय थी; यहएक अकाटय सत्य था कि संस्कृति हमेशा कुछ लोगों का ही सरोकार होना चाहिए जिसे सामान्य उदासीनता और अबोध्यता की स्थिति में जारी रखा जाना चाहिए। इसकी वकालत करने वालों के लिए खास राजनीतिक विकल्प दक्षिणपंथ से वामपंथ तक परिवर्तनीय थे। लेकिन सभी मामलों में ये विकल्प गौण थे क्योंकि सांस्कृतिक आलोचना का अंतर्निष्ठ उद्देश्य दृढ़तापूर्वक एक प्रकार की सामाजिक सत्ता प्रस्तुत करना था जो 'केवल' राजनीतिक नहीं इससे आगे हो। अत: संस्कृति, जो कि आवश्यक मूल्यों का क्षेत्र है तथा सभ्यता, जो कि सामाजिक 'मशीनरी' का क्षेत्र, के बीच मुख्य अंतर ने ही इस कल्पना को असंभव बना दिया कि राजनीति एक सार्थक सामाजिक गतिविधि है।

सांस्कृतिक अध्ययन ने सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) को विस्थापित करने का प्रयास किया है। इसने 'संस्कृति' और 'साधारण समाज' (मासेस) की एक वैकल्पिक व्याख्या प्रस्तुत की है। इसकी गतिविधि, विकल्प, और महत्व की खोज की है। वहीं सांस्कृतिक आलोचना केवल जड़ता और यंत्रवाद को ही देख सकती थी और इसने ऐसा रैडिकल सामाजिक लक्ष्यों के नाम पर किया है। फिर भी यहां कुछ कौतूहलपूर्ण है। स्वाभाविक है कि सांस्कृतिक अध्ययन ने उदारवादी और रूढ़िवादी विचारों को निरंतर चुनौती ही है लेकिन यदि यह किसी चीज से पूर्वग्रहग्रसित रहा है तो वह वामपंथ की कमियां हैं। अब यह सच है कि समझने के लिए कई चीजें हैं लेकिन सांस्कृतिक अध्ययन ने सबसे अधिक केवल एक बात पर फोकस किया है। इसका लगातार सुझाव, जो कि प्रभावी रूप में इस विषय का संकेत-धुन भी है, यह है कि लोक संस्कृति न केवल राजनीतिक समझ को बढ़ाती है, प्रत्युत कुछ अर्थों में वामपंथ को विरासत में मिली राजनीतिक परंपराओं को अवैध करार देती है तथा अतिक्रमण करती है। दूसरे शब्दों में सांस्कृतिक अध्ययन केवल राजनीति ('वर्ग', 'राज्य', 'संघर्ष', 'क्रांति' और इसी प्रकार की पुरानी अवधारणा) को लोक संस्कृति की उच्चतर सत्ता के अधीन लाना चाहता है। और ऐसा करने में यह विश्वसनीयता के साथ सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) के मूल पैटर्न को दोहराता है। यह सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) को नकारता है लेकिन ठीक वैसे ही जैसे दर्पण का बिंब आकृति को अक्षुण्ण रखते हुए इसके मूल को उलटा करता है। यहीं उन विरोधाभासों का स्रोत है जो इस हस्तक्षेपवादी विषय जिसे सांस्कृतिक अध्ययन कहते हैं के जीवन का निर्माण करता है।

5

तो फिर हम सांस्कृतिक सिध्दांत तथा राजनीति के बीच संबंध के बारे में कैसे सोच सकते हैं? मैंने यह दावा किया है कि सांस्कृतिक अध्ययन इस संबंध की विशिष्ट तथा गहरी समझ को दोहराता है। ऐसा कहने का मेरा अभिप्राय यह है कि यह समझ गलत है और यह सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े वामपंथियों के संजीदा राजनीतिक उद्देश्यों के साथ समझौताकर सकता है। निष्कर्ष के रूप में, मैं समाजवादी सांस्कृतिक सिध्दांत की 'राजनीतिक' स्थिति के बारे में वैकल्पिक तरीके से विचार करने का साहस करूंगा।

संस्कृति और राजनीति के बीच का संबंध वामपंथ में दो प्रकार के न्यूनीकरणवाद के अध्यधीन रहा है। बिना किसी खेद के हम एक बड़े विकल्प का त्याग कर सकते हैं : यानी प्रचलित राजनीतिक न्यूनीकरणवाद, जिसकी वजह से साम्यवादी आंदोलन कुख्यात हो गया, जो सभी सांस्कृतिक पहल के एक पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के रूप में वर्गीकृत करता है और जिसके मानवीय संभावनाओं संबंधी बोध का आरंभ और अंत राजनीतिक उद्देश्य के साथ होता है। लेकिन अब हमारे पास एक वैकल्पिक न्यूनीकरणवाद है। इस बार यह संस्कृतिवादी किस्म का है जिसे अकादमी सांस्कृतिक अध्ययन के अधीन तथा बाहर की दुनिया में उत्तरआधुनिक बुध्दिमत्ता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह न्यूनीकरणवाद सांस्कृतिक विभेद की सभी अभिव्यक्तियों को राजनीतिक मानकर सम्मानित करता है और इसलिए विशेषाधिकारवाद को प्रोत्साहित करता है तथा अनिवार्य रूप से कठोर अर्थ में राजनीति का आत्मासक्ति विषयक विघटन करता है। यदि न्यूनीकरणवाद ने संस्कृति को एक राजनीतिक उपकरण के रूप में स्वीकार किया है तो विशेषाधिकारवाद ने प्रभावी रूप से राजनीति की संभावना को ही समाप्त कर दिया और कहूंगा कि सचमुच राजनीतिक संघर्ष के क्षेत्र के रूप में संस्कृति की संभावना को ही समाप्त कर दिया है।

एक समाजवादी सांस्कृतिक सिध्दांत के लिए सांस्कृतिक आचरणों की संभावनाओं तथा सीमाओं को स्वीकार करना आवश्यक है। इसके लिए यह स्वीकार करना भी जरूरी है कि इस प्रकार के आचरण राजनीति से कम भी हैं, अधिक भी। हालांकि संस्कृति एक विवादित धरातल है, राजनीतिक संघर्ष का एक क्षेत्र, लेकिन यह केवल राजनीतिक नाटयशाला नहीं हो सकती, न ही पूर्णरूपेण राजनीति को ही समाहित कर सकती है। संस्कृति के समाजवादी सिध्दांत का पहला नियम कहता है कि राजनीति और संस्कृति के बीच संबंध की प्रतीकात्मक अवस्था 'विसंगति' होगी। यह कोई बहुत आकर्षक प्रतिपादन नहीं प्रतीत हो सकता लेकिन सामाजिक अर्थों की समग्रता या 'संपूर्ण जीवन शैली' को समाहित करने के लिए 'संस्कृति' के दायरे का एक बार विस्तार कर लेने के बाद इस पर बल देना आवश्यक है। क्योंकि यह विस्तारित अर्थग्रहण समाजवादी सांस्कृतिक सिध्दांत के लिए महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ यह अपनी भी अवधारणात्मक समस्याएं खड़ी करती है।

यदि संस्कृति सामाजिक अर्थों की संपूर्णता है और यदि राजनीतिक गतिविधि का उद्देश्य एक दिए हुए स्थान के भीतर सामाजिक संबंधों की संपूर्णता है (जैसा कि एक सच्ची मुक्तिकारी राजनीति की होनी चाहिए) तो प्रथम द्रष्टया यह प्रतीत हो सकता है कि मानो संस्कृति और राजनीति दोनों एक ही चीज हैं, जैसा कि अब सांस्कृतिक अध्ययन मानने को तैयार है। सैध्दांतिक रूप में हम यह नहीं कह सकते कि एक प्रकार की सामाजिक विषय-वस्तु राजनीतिक और दूसरी प्रकार की नहीं। यदि पूरा समाज संस्कृति के अंत:क्षेत्र में है तोऐसा लगता है कि कोई भी सांस्कृतिक प्रवृत्ति वैध रूप से अपने आपको 'राजनीतिक' कह सकती है।

लेकिन यहां एक मौलिक भ्रांति है। ऐसा समझा जा सकता है कि संस्कृति और राजनीति दोनों ही सामाजिक संबंधों की समग्रता को अपने में समेटे हुए हैं, लेकिन वे ऐसा अलग-अलग रूप में करते हैं। राजनीति सामाजिक संबंधों के चरित्र के निर्धारण में अपनी भूमिका के कारण अन्य सामाजिक आचरणों से अलग है। जब यह शब्द और बिंब के रूप में पूरी तरह अर्थ के क्षेत्र में भी कार्य करती है तो राजनीतिक आचरण अपने विशिष्टीकृत प्रकार्य द्वारा विनियमित होता है। यह एक विचारात्मक आचरण (डेलिबरेटिव प्रैक्टिस) है जो सामान्यतया निर्णयोन्मुख होता है; नियंत्रण संबंधी प्रश्न हमेशा रहता है कि, 'क्या किया जाना है?' शांतिपूर्ण जनतांत्रिक स्थितियों में यह एक आदेशात्मक आचरण (इंजंक्टिव प्रैक्टिस) कार्य है, प्रभावी सहमति के लिए एक संघर्ष। और अंतत: यह उन संसाधनों की ओर मुड़ता है जिन्हें संस्कृति में परिणत नहीं किया जा सकता है यानी भौतिक अवपीड़न के साधन।

सांस्कृतिक आचरण इस प्रकार के नहीं होते जिन्हें हम अपेक्षाकृत कम अमूर्त रूप में वह समझें जिनका प्रमुख प्रकार्य अर्थ उत्पन्न करना होता है। उनके अर्थ की दुनिया भी वही है। उनमें राजनीतिक संकेत बहुत अधिक हैं लेकिन उन विशिष्टीकृत लक्षणों की कमी है, और इनकी आवश्यकता भी नहीं। विचार-विमर्श, आदेश और बलप्रयोग द्वारा सामाजिक संबंधों की प्रकृति का निर्धारण करना संस्कृति का कार्य नहीं है। इस अंतर का निहितार्थ ग्राम्शी द्वारा अनुभव किया गया। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक निर्णय और राजनीतिक निर्णय की प्रकृति अलग होती है और उनमें एक स्थान पर मिलने की प्रवृत्ति भी नहीं होती।

सांस्कृतिक आचरण किसी भी और सभी विभेदों को निरपेक्ष मान सकता है (जैसा कि एक बार जार्ज लुकास ने कहा था कि कला और प्रत्ययों के क्षेत्र में कोई भी संयुक्त मोर्चा नहीं होता)। जबकि राजनीति किसी खास वस्तु स्थिति को लाने या रोकने के लिए, जीवन के इस या उस सामान्य स्थिति को प्राप्त करने के लिए विभेदों के साथ समान रूप में व्यवहार नहीं कर सकती। इसमें उन विभेदों को पाटने की क्षमता होनी चाहिए जिन्हें सांस्कृतिक आचरण निरपेक्ष मानता है ताकि विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एकजुटता बनाई जा सके। साथ ही उन्हीं कारणों से राजनीतिक हित सांस्कृतिक एकजुटता वाले क्षेत्र में विभाजन को प्रोत्साहित करना अनिवार्य बना सकता है। उदाहरण के लिए, एक राजनीतिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए (उदाहरणस्वरूप राज्य द्वारा वित्तपोषित नर्सरी की व्यवस्था) किसी धार्मिक संप्रदाय के भीतर वर्ग तथा लिंगभेद संबंधी वैमनस्य को उजागर करना आवश्यक हो सकता है। किसी दिए हुए सांस्कृतिक हित के परिप्रेक्ष्य में देखने पर राजनीतिक मांग हमेशा ही या तो बहुत अधिक या बहुत कम होती है और संस्कृति के विरुध्द राजनीतिक शिकायत भी हमेशा इसी प्रकार की होती है। प्रत्येक एक-दूसरे के सापेक्ष, सांप्रदायिक और एकतावर्धक दोनों हैं।

सांस्कृतिक अध्ययन इसी मौलिक विभेद का लोप करता है। यहां इसके ऐतिहासिक कारणों की पड़ताल करने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है, लेकिन इसके परिणामों के बारे में कुछ कहा जा सकता है। आरंभ से ही सांस्कृतिक अध्ययन की प्रवृत्ति राजनीति को संस्कृति में विलीन करने की रही है। रेमंड विलियम्स ने भी अनुदर्शन में स्वीकार किया कि उन्होंने सांस्कृतिक राजनीति की संभावनाओं को बढ़ा दिया था। वह सांस्कृतिक क्षेत्र से बाहर राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे और अपने सैध्दांतिक कार्य में भी इस प्रवृत्ति से कभी भी बाहर नहीं निकल पाए। फिर भी उन्होंने तथा उनके पूर्व के समाजवादी सांस्कृतिक अध्ययन करने वालों ने कम से कम दो महत्वपूर्ण कार्य किए : पहला, स्तालिनवादी रूप में संस्कृति को राजनीतिक साधन बनाने की अस्वीकृति करते हुए उन्होंने विशेष रूप से उपभोक्ता पूंजीवाद तथा 'जन' संचार के युग में संघर्ष की जमीन के रूप में इसके महत्व को स्वीकार किया। दूसरा, 'लोक' संस्कृति को संवेदनमंदक रहस्यवाद मानकर खारिज करने की संभ्रांतवर्गीय प्रवृत्ति के विरुध्द उन्होंने इसकी वैधता पर बल दिया। पूंजीवादी समाज में लोक संस्कृति वर्चस्व या वस्तुवाद (कमोडिफिकेशन) की अनिवार्यताओं के संबंधों से बाहर कभी भी नहीं रही। फिर भी उन संबंधों तथा अनिवार्यताओं के भीतर 'साधारण समाज' कभी भी केवल निष्क्रिय और दमित नहीं था। लोक संस्कृति में दमन और प्रतिरोध दोनों ही परिलक्षित होते थे।

आज सांस्कृतिक अध्ययन न केवल राजनीति का संस्कृति में विलय को आगे बढ़ा रहा है बल्कि इस प्रक्रिया में यह इसके प्रथ प्रदर्शकों की विरासत को भी बरबाद कर रहा है। यह सांस्कृतिक आचरण से परे राजनीति के लिए या सांस्कृतिक विभेद के विशेषाधिकार से परे किसी राजनीतिक एकजुटता के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता। वास्तव में सांस्कृतिक प्रतिवाद की राजनीति के लिए भी कोई स्थान नहीं है। और यदि 'उच्च' संस्कृति तथा असमानता और वर्चस्व सभी जनसमूह संस्कृति की ऐतिहासिक वास्तविकताओं से अमूर्त रूप में पहले ही सक्रिय तथा अत्यंत महत्वपूर्ण है, यदि टेलीविजन और शॉपिंग पहले ही विध्वंस के थिएटर हैं तो संघर्ष के लिए कोई जगह नहीं और दरअसल इसकी आवश्यकता भी नहीं। लेकिन यदि इन सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से परे कुछ भी नहीं, तो 'साधारण समाज' का दमन तथा उपभोक्ता पूंजीवाद के आगे उनका आत्मसमर्पण उतना ही संपूर्ण है जितना सांस्कृतिक आलोचना (कल्चुरीक्रितिक) के प्रवर्तक मानते थे। यहां पर सांस्कृतिक अध्ययन का सबसे गहरा अंतर्विराध यह है कि इसका अंत इस जनतंत्रविरोधी निर्णय की पुष्टि तथा जश्न के साथ होता है।































बुधवार, 13 अप्रैल 2011

ममता,वाम और संस्कृतिकर्मी



ममता बनर्जी ने अपने दल की ओर से अनेक संस्कृतिकर्मियों को विधानसभा चुनाव में खड़ा किया है। कई कलाकार उसके पहले लोकसभा में भी चुनकर गए हैं। यह स्वागत योग्य फिनोमिना है। यह संस्कृतिकर्मियों की राजनीतिक भूमिका की लोकतांत्रिक स्वीकृति है। इसके विपरीत वामदलों का संस्कृतिकर्मियों के प्रति नकारात्मक रवैय्या रहा है। वे उन्हें विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा के लायक नहीं समझते। उनके लिए वे महज भोंपू हैं। हिन्दी में सक्रिय वामपंथी दलों द्वारा संचालित लेखक संगठनों जैसे जनवादी लेखक संघ,प्रगतिशील लेखक संघ आदि की सामयिक दशा को जाने बिना ममता बनर्जी के फैसले की महत्ता तब तक समझ में नहीं आएगी।

कडुवा सच यह है वाम संचालित सभी लेखक संगठन आज हाशिए के बाहर हैं। हाशिए पर जाना घटना है और हाशिए के बाहर चले जाना त्रासदी है। दुर्घटना है। लेखक और संस्कृति मंचों की जरूरत तब ही महसूस की जाती है तब आप शोषित महसूस करें। लेखक जब शोषित महसूस करना बंद कर देता है तो संगठन की प्रासंगिकता खत्म हो जाती है। संगठन प्रतीकात्मक रह जाते हैं। लेखक संगठनों को सत्ता से कभी शक्ति नहीं मिलती। मलाई जरूर मिलती है।

इसी तरह लेखक संगठनों को राजनीति का अंग भी नहीं समझना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो लेखक संगठन हाशिए के बाहर जाने के लिए अभिशप्त हैं। विलक्षण आयरनी है कि लेखक संगठनों का काम करते हुए ह्रास हुआ है। सबसे ज्यादा सक्रिय लेखक संगठन आज सबसे ज्यादा निष्क्रिय हैं। कभी-कभार प्रतीकात्मक कार्यक्रम कर देते हैं,शोकसभा कर देते हैं,सम्मेलन कर लेते हैं, कभी कभार सेमीनार कर लेते हैं। लेकिन लेखकीय अधिकारों के लिए कभी संघर्ष नहीं करते। लेखक संगठन की सक्रियता प्रायोजक जैसी हो गयी है। सवाल यह है कि लेखक संगठन प्रायोजक कैसे हो गया ? प्रायोजक भाव में रहने के कारण ही उनकी प्रेरणा सीमित दायरे में सक्रिय है। जब किसी कार्यक्रम का आयोजन करता है तो प्रेरक और सक्रिय के भ्रम में रहता है। कार्यक्रम खत्म और प्रेरक का भ्रम भी खत्म। यही दशा लेखक संगठनों की है वे बगैर निवेश के लाभ लेना चाहते हैं। नाम कमाना चाहते हैं। मंच देना निवेश नहीं है। बल्कि मंच तो लाभ का स्रोत है। लेखक संगठन का निवेश आलोचनात्मक वातावरण के निर्माण पर निर्भर करता है। मंच मात्र देने से आलोचनात्मक वातावरण नहीं बनता। आलोचनात्मक वातावरण अनालोचनात्मक वातावरण को नष्ट करके बनता है। इसके लिए विचारधारात्मक और सर्जनात्मक योगदान की जरूरत होती है।मानवाधिकारों की हिमायत करने की जरूरत होती है। विचारधारात्मक-सर्जनात्मक वातावरण सीमाओं का अतिक्रमण करके ही बनता है। सीमाओं में बांधकर मंच और बहसों का आयोजन अनालोचनात्मक वातावरण को बनाए रखता है।

कल तक लेखक संगठन जिसे प्रेरणा,अपरिहार्य,अनिवार्य और स्वाभाविक मानते थे आज प्रेरणा लेने की बजाय उससे यांत्रिकतौर पर बंधे हैं। लेखक संगठन जितने बड़े उत्साह के साथ बनते हैं उतनी ही तेजी से उनका उत्साह ठंड़ा पड़ जाता है । कल तक जो लेखक संगठन की महत्ता पर निबंध लिखता था आज वही लेखक संगठन को अप्रासंगिक मानता है। कोई बात जरूर है जो लेखक संगठन को तमाम सक्रियता के बावजूद अप्रासंगिक बनाती है।

सवाल यह है कि लेखक संगठन की वर्तमान दशा और दिशा की क्या 'विखंडनवादी' रीडिंग संभव है ? लेखक संगठन के द्वारा विलोम निर्माण की प्रक्रिया को कभी गैर विखंडनवादी पध्दति और नजरिए के जरिए नहीं समझा जा सकता। 'सही' और 'गलत' राजनीतिक लाइन के आधार पर नहीं समझा जा सकता। 'प्रासंगिकता' और 'अप्रासंगिकता' के आधार पर नहीं समझा जा सकता। 'श्रेष्ठ' और 'निकृष्ट' के आधार पर वर्गीकृत करके नहीं समझा जा सकता।

मसलन् यह वर्गीकरण वैध नहीं है कि ''लेखक संगठन में काम करना 'श्रेष्ठ' है और जो लेखक, संगठन का काम नहीं करते वे निकृष्ट हैं।'' उसी तरह '' जो लेखक संगठन का काम करते हैं वे निकृष्ट हैं और जो बाहर हैं वे श्रेष्ठ हैं।'' इसी तरह '' लेखक संगठन का सोच सही है, व्यक्ति के रूप में लेखक का सोच गलत है।'' अथवा 'संगठन वैध है बाकी सब अवैध है।'' ''लेखक संगठन का सत्य प्रामाणिक है ,व्यक्ति लेखक का सत्य अप्रामाणिक है'', '' साहित्यिक विधा में लिखना लेखन है और गैर साहित्यिक विधाओं जैसे मीडिया में लिखना साहित्य नहीं है।'', ''लेखक संगठन में काम करना पुण्य है और गैर सांगठनिक लेखकीय कर्म पाप है।'', ''लेखक संगठन टिकाऊ है बाकी सब नश्वर है।'' इत्यादि वर्गीकरण बोगस हैं।

'लेखक संगठन ही सर्वस्व है' का नारा देने वाले यह भूल गए कि रचना का मूल स्रोत तो जीवन है। रचना का मूल स्रोत संगठन नहीं होता। अत: नारा होना चाहिए '' जीवन ही सर्वस्व है।'' इस नारे को भूलकर हमारे लेखक संगठनों ने मूल्य, कृति,राजनीति,विचारधारा इत्यादि चीजों को सर्वस्व बना दिया।

यही वह बिंदु है जहां से लेखक संगठन अपने को हाशिए पर ले जाते हैं और अंत में सिर्फ प्रतीकात्मक उपस्थिति मात्र बनकर रह जाते हैं। लेखक संगठनों का जीवन के प्रति वाचिक लगाव है, वे जीवन की महत्ता और मर्म से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं। जीवन की जटिलाओं को उन्होंने विश्वदृष्टि से देखा नहीं है। उन्होंने कभी परवर्ती पूंजीवाद ,इलैक्ट्रोनिक मीडिया,सैटलाइट के संदर्भ में लेखन को खोलकर नहीं देखा। साहित्य के दार्शनिक आयाम की कभी चर्चा तक नहीं की।

जीवन के साथ लगाव के नाम पर जीवन के इस या उस पक्ष की ही प्रतिष्ठा की गई। इस या उस पक्ष की हिमायत की गई। हिन्दी रचनाकार के लिए जीवनमूल्य महान और जीवन नश्वर रहा है। वह मानता है कि वह शाश्वत सत्य रच रहा है। अपने रचे को सत्य मानना, प्रामाणिक मानना,वैध मानना और उसी के आधार पर फतवे जारी करना मूलत: कर्मफल के सिध्दान्त का साधारणीकरण है। कर्मफल के सिध्दान्त का ही परिणाम है जो सही है वह सही है जो गलत है वह गलत है।

कर्मफल का सिद्धान्त स्त्री और दलित की अनुभूति और सामाजिक अस्मिता को स्वीकार नहीं करता। यही वजह है कि लंबे समय से लेखक संगठनों की कार्यप्रणाली में पितृसत्तात्मक विचारधारा हावी है। जो बड़ा है वह बड़ा है,जो छोटा है वह छोटा है। सांगठनिक हायरार्की का सब समय ख्याल रखा जाता है। ऊपर की शाखा की बातें निचली शाखा को मानना अनिवार्य है। सांगठनिक हायरार्की में चूंकि जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ में कम्युनिस्ट दलों की (क्रमश: माकपा और भाकपा) केन्द्रीय भूमिका है अत: पार्टी का आदेश अंतिम आदेश होता है और लेखक संगठनों के मुख्य पदाधिकारियों को तदनुरूप ही काम करना पड़ता है। आप कितने भी अच्छे संगठनकर्त्ता हों, कितने ही बड़े लेखक हों, यदि कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति अनुकरणात्मक भावना आपके अंदर नहीं है तो आपको संगठन में जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती। कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से लेखक संगठन को देखने वाला नेता अमूमन चुगद किस्म का व्यक्ति होता है जिसे किसी भी भाषा के साहित्य की समझ नहीं होती ऐसी स्थिति में वह सिर्फ अपने अनुयायी और विश्वस्त के हाथों ही संगठन का नेतृत्व सौंपना पसंद करता है। चाहे वह व्यक्ति कितना ही निकम्मा क्यों न हो।

सन् 1984-85 के बाद से समाजवाद के पराभव की जो प्रक्रिया शुरू हुई उसने महानगरीय सांस्कृतिकबोध और महानगरीय नजरिए पर ज्यादा जोर दिया है। भूमंडलीकरण के सवाल केन्द्र में आ गए हैं। समाजवाद फीका पड़ा है। वफादारी का भाव प्रबल हुआ है। संकट में आलोचकों की नहीं वफादारों की जरूरत महसूस होती है। लेखक संगठन जब वफादारों से घिरे हों तो समझना चाहिए संकट की गिरफ्त में हैं।

लेखक संगठन आधुनिक बनें इसके लिए जरूरी है कि वे सत्ता को अपना एजेण्डा न बनाएं, राजनीति को अपना प्रधान एजेण्डा न बनाएं। यदि वह ऐसा करते हैं तो सत्ता विमर्श का अंग बन जाएंगे। साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता, आतंकवाद आदि सत्ता विमर्श हैं। जनता के विमर्श नहीं हैं। लेखक संगठनों को विकल्प के विमर्शों को सामने लाना चाहिए।

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो हिन्दी और बांग्ला के वाम लेखक संगठनों की गतिविधियों की बड़ी फीकी तस्वीर उभरकर सामने आती है। उनके यहां वैकल्पिक विमर्श एकसिरे से गायब हैं। वे जिन विषयों पर बहस कर रहे हैं ,सेमीनार कर रहे हैं उनमें से अधिकांश सत्ता विमर्श का हिस्सा हैं। मसलन साम्प्रदायिकता,भूमंडलीकरण आदि सत्ता विमर्श के विषय हैं।

कायदे से सत्ता की राजनीति से भिन्न जनता और सत्ता के विकल्पों के विषयों पर काम करना लेखक संगठनों का लक्ष्य होना चाहिए। मजेदार बात यह है कि हमारे लेखक संगठनों ने कभी विकल्पों की खोज नहीं की। लेखक संगठनों में जितनी भी विचारधारात्मक बहसें चली हैं ये वे बहस हैं जो सत्ता और राजनीतिक दलों ने थोपी हैं। इनमें लेखक संगठन प्रतिक्रिया के रूप में दाखिल हुए हैं। लेखक संगठनों का एकमात्र काम प्रतिक्रिया व्यक्त करना, प्रेस विज्ञप्ति जारी करना, सत्ताधारी वर्गों के द्वारा थोपे गए मसलों पर राय देना रहा है। उन्होंने सालों-साल इसी काम में अपनी अजस्र ऊर्जा खर्च की है। यह वैसे ही है जैसे कोई ऊर्जावान व्यक्ति अपनी ऊर्जा सही कार्यों में खर्च न कर पाए और सुबह जॉगिंग में जाकर खर्च करे। जॉगिंग में खर्च की गयी ऊर्जा बेकार में व्यय की गयी ऊर्जा है। यह ऐसे व्यक्ति की ऊर्जा है जो संतुष्ट है और अपने शरीर से दुखी है। अपने ही शरीर के बोझ को संभालने में असमर्थ है। यही वजह है कि दसियों वर्ष लेखक संगठन का काम करने वाले लेखकबंधु अंत में हताश, आलस्य के मारे अथवा लेखक संगठन की क्रमश: निष्क्रियता के आख्यानों को सुना-सुनाकर अपने मन को संतोष देते रहते हैं वे एक तरह से यह भी बता रहे होते हैं कि उन्होंने कितनी बड़ी ऊर्जा निरर्थक कार्यों में खर्च की और देखो अब कोई लेखक हमारी नहीं सुन रहा।

लेखक संगठनों की वफादारी की त्रासदी यह है कि वे जिस राजनीति के लिए अपनी सारी ऊर्जा होम कर देते हैं उस राजनीतिक दल के अंदर भी उनके लिए कोई महत्वपूर्ण जगह नहीं होती। मसलन् मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अथवा अन्य राजनीतिक दलों में उनके लेखक संगठनों की पार्टीगत तौर पर क्या हैसियत है ?बुद्धिजीवियों की क्या हैसियत है इसे बड़ी आसानी से पोलिटब्यूरो और केन्द्रीय समिति के सदस्यों को देखकर समझा जा सकता है। कभी भी इन दलों की प्रधान कमेटियों में बुद्धिजीवी होने के नाते अथवा लेखक संघ के पदाधिकारियों को चुना नहीं जाता। आप बहुत बड़े कम्युनिस्ट लेखक हो सकते हैं किंतु कम्युनिस्ट पार्टी की फैसलेकुन कमेटियों में उनका कोई स्थान नहीं होगा। जबकि सोवियत संघ,चीन आदि में ऐसा नहीं है।भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का बुद्धिजीवियों को प्रचारक के रूप में इस्तेमाल करना वस्तुत मध्यकालीन दरबारीपन का अपभ्रंश रूप है। जाने-अनजाने बुध्दिजीवी वर्ग के प्रति इससे बेगानेपन का भाव ही संप्रेषित होता है। यह भी संप्रेषित होता है कि लेखक की सत्ता को कम्युनिस्ट पार्टियां किसी भी रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों में लेखकों के कामकाज की देखभाल और दिशानिर्देश का जिम्मा लेखक के पास नहीं बल्कि किसी राजनीतिज्ञ के पास होता है जिसे साहित्य-कला की कोई समझ नहीं होती। जब कम्युनिस्ट पार्टियां अपने यहां लेखक और बुद्धिजीवी को प्रधान दर्जा नहीं देती हैं तो बुर्जुआ दलों से यह कैसे उम्मीद की जाए कि वे लेखक को बड़ा दर्जा देंगी।

एक तथ्य गौर करने लायक है कि लेखक के नाते कांग्रेस ने कम से कम श्रीकांत वर्मा को अपने दल का महासचिव बनाया, कवि बाल कवि बैरागी को सांसद बनाया। राज्यसभा के लिए नामजद लोगों की सूची निकाली जाए तो कई लेखकों को सांसद के तौर पर नामांकित कराया। जबकि कम्युनिस्ट पार्टियों ने लंबे समय से किसी भी हिन्दी,बांग्ला,मलयालम आदि भाषा के लेखक को राज्यसभा में नामजद तक नहीं किया। किंतु किसी हिन्दी लेखक अथवा बुद्धिजीवी को कम्युनिस्ट पार्टियों ने टिकट नहीं दिया। कम से कम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले दल ने लेखक-बुद्धिजीवियों-कलाकारों से भरे पश्चिम बंगाल में इन लोगों को संसद-विधानसभा में खड़ा करके उनकी लोकतांत्रिक संसदीय हिस्सेदारी का रास्ता प्रशस्त किया है और यह स्वागतयोग्य बात है।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

पोर्न के दीवाने और निकम्मी मनमोहन सरकार

भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में पोर्नयात्रियों की संख्या सबसे ज्यादा पायी गयी है और इस बात को ही ध्यान में ऱखकर केन्द्र ने दफ्तरों में पोर्न वेबसाइट देखने पर पाबंदी लगा दी है। यह आदेश इसी साल फिर से नवम्बर में जारी किया गया। क्या इससे बाबूओं और अफसरों को पोर्न की सैर से रोका जा सकता है ?
      पोर्न विरोधी केन्द्र सरकार के सर्कुलर में बुनियादी तौर पर पोर्न देखने पर आपत्ति नहीं है। आपत्ति इस बात पर है कि हैकर लोग पोर्न साइट के जरिए ही सरकारी फाइलों में सेंध मारते हैं अतः फाइल वाले कम्प्यूटर इंटरनेट से कनेक्ट न रखे जाएं यह हिदायत है। पोर्न देखें, लेकिन सरकारी फाइल को हैकरों से बचाकर। क्या पोर्न ज्यादा हानिकर है या हैकर या दोनों ?
दूसरी ओर इस साल पोर्न विरोधी मुहिम में चीन ने अच्छा काम किया है। तकरीबन 1669 पोर्न से संबंधित केसों की जांच की गई है। पोर्न पब्लिकेशन की लाखों प्रतियां जब्त की गई हैं। पोर्न दिखाने वाली 60 हजार वेबसाइट बंद की गई हैं।नेट पर पोर्न प्रसार करने पर 2157 केस दर्ज किए गए हैं। 37 मिलियन चोरी के पोर्न कैसेट,डीवीडी आदि पकड़े गए हैं और 10हजार लोगों पर इसके कारण केस लगाए गए हैं। और हमारे यहां कुछ भी नहीं हुआ, आप क्या सोचते हैं ?          





गुरुवार, 15 जुलाई 2010

वर्चुअल मीडिया की अठखेलियों के आर-पार

   यह मीडिया नहीं वर्चुअल मीडिया का युग है। वर्चुअल मीडिया प्रस्तुतियों में बेचैनी, प्रेरणा और परिवर्तन की क्षमता नहीं होती। ये महज प्रस्तुतियां हैं। जितना जल्दी संप्रेषित होती हैं उतनी ही जल्दी गायब हो जाती हैं। प्रस्तुतियां आनंद देती हैं,मनोरंजन करती हैं और खाली समय भरती हैं। इनके जरिए राजनीतिक यथार्थ देखना समझ में नहीं आता। राजनीतिक यथार्थ तो टीवी प्रस्तुतियों के बाहर होता है।
      एक जमाना था सोचते थे कि वोट के क्या परिणाम होंगे। इन दिनों ऐसा नहीं सोचते। इनदिनों वोट देते समय तात्कालिकता का दबाव सबसे ज्यादा रहता है। 'वोट के सामाजिक परिणाम' की जगह अब 'हार-जीत' और 'राजनीतिक उन्माद' ने लेली है। मीडिया प्रस्तुतियों में परिणाम के पीछे निहित 'जोखिम' को छिपाया जाता है। 'जीत' को जोखिमरहित बनाकर पेश करने के कारण ही विगत चुनाव में बुश को व्यापक सफलता मिली। वर्चुअल वातावरण का नारा है 'जीत में जोखिम नहीं होता।'
        एक ही वाक्य में कहें तो 'जीत' में यथार्थ दांव पर लगा होता है। हम यथार्थ की बजाय मीडिया प्रस्तुतियों में मगन रहते हैं। यह विज्ञापनकला का प्रभाव है। मीडिया प्रस्तुतियों में अतिरंजना, छिपाना, सेंसरशिप, बड़बोलापन प्रमुखता अर्जित कर लेता है। इस प्रक्रिया में चुनाव प्रचार में जो वायदा किया जा रहा है उसकी पड़ताल नहीं करते। प्रौपेगैण्डा और सत्य में अंतर नहीं करते। 'न्यूज' और 'प्रचार' में अंतर नहीं करते। बल्कि होता यह है कि 'न्यूज' के नाम पर 'प्रचार' का आनंद लेते हैं। मीडिया में चुनाव की खबरों में यही होता है। अब 'खबर' कम और 'प्रौपेगैण्डा' ज्यादा संप्रेषित हो रहा है। प्रचार ने 'प्रामाणिक' और ' नकली' का भेद खत्म कर दिया है। उसकी जगह 'प्रामाणिक नकली' (ऑथेंटिक फेक) ने ले ली।
      उम्ब्रेतो इको के शब्दों में हम अब 'प्रामाणिक नकली' को देखते है। 'सामान्यबोध' और 'पापुलिज्म' के वैचारिक तानेबाने में बुनकर बातें रखी जाती हैं। 'सामान्यबोध' और 'पापुलिज्म' के फ्रेम में रखकर जब भी प्रचार किया जाता है तो वह अतीत को भुला देता है। इसका लक्ष्य होता है 'अतीत को भूलो ,आगे की ओर देखो।' सारे संकट के समाधान और जटिलताओं को भविष्य के हवाले कर देता है। 'सामान्यबोध' और 'पापुलिज्म' को नीति की तुलना में नया,युवा और बड़बोलापन अपील करता है। महायथार्थ का अलभ्य भविष्य से संबंध है। इसे कभी प्राप्त नहीं कर सकते। प्रभाव खत्म होते ही जहां के तहां नजर आते है।
     फैंटेसी में परिवर्तन की क्षमता नहीं होती। फैंटेसी आनंद और मनोरंजन देती है किंतु 'परिवर्तन' नहीं करती। महायथार्थ की धुरी है विवरण,ब्यौरे और सुनियोजित फैंटेसीमय प्रस्तुति । इस तरह की प्रस्तुतियां संवाद नहीं करती बल्कि इकतरफा प्रचार चलता है। दर्शक के पास ग्रहण करने के अलावा कोई चारा नहीं होता। वह इसमें हस्तक्षेप नहीं कर पाता। महायथार्थ की आंतरिक संरचना में नागरिक की आकांक्षाओं को समाहित कर लिया जाता है। आकांक्षाओं को समाहित कर लेने के कारण नागरिक को बोलने,हस्तक्षेप, प्रतिवाद और सवाल पूछने की भी जरूरत नहीं होती।नागरिक को निष्क्रिय बनाकर महायथार्थ के फ्रेम में प्रचार चलता है । चर्चा का नकली वातावरण बनता है । सामाजिक जीवन में बहस एकसिरे से गायब हो जाती है। महायथार्थ नागरिक स्वायत्तता का अस्वीकार है। इसके सामने नागरिक कठपुतली है।

इस दौर में एक तथ्य साफ उभरा है कि तकनीक का जीवन पर नियंत्रण है। तकनीक जैसा चाहती है वैसा ही नागरिक सोचते हैं।
      मीडिया आमतौर पर सरकारी तंत्र भाषा ,व्याकरण में बोलता है। मीडिया कभी भी सरकारी शब्दावली और अवधारणाओं के बाहर जाकर कोई चीज पेश नहीं करता। हम जिस भाषा के अभ्यस्त हैं वह जनता की भाषा नहीं है बल्कि सरकार की भाषा है। जब सारे विमर्श सरकारी शब्दावली में चलेंगे तो यह संभव नहीं है कि इससे भिन्न भाषा में आप सोचें। जब सरकारी भाषा में सोचेंगे तो सरकारी परिप्रेक्ष्य के दायरे के बाहर जाना संभव नहीं होगा। मीडिया के द्वारा जो भी राजनीतिक विमर्श चलता है वह जनता की भाषा में नहीं होता। जनता की अवधारणाओं में नहीं होता।
      सूचना आज चंचल और छूमंतर है। स्वचालित संचार तकनीक की उपज है। सूचना पर व्यक्ति का नहीं सूचनातंत्र का नियंत्रण है। सूचना का व्यक्ति के नियंत्रण के परे चले जाना सूचना को एक ही साथ उपलब्ध और दुर्लभ कर देता है। आज किसी भी संदेश को फार्वर्ड कर सकते हैं, एक-दूसरे को ही नहीं सारे संसार को भेज सकते हैं, सूचना सर्वर का मालिक चाहे तो रोक भी सकता है। सूचना की स्वत:स्फूर्तता ने उसकी असंख्य प्रतियों में संभावना पैदा की है। इससे सूचना की प्राणशक्ति कम हुई है। प्रभावक्षमता और प्रसार बढ़ा।
      हमारे पास अधिकांश मीडिया सूचनाएं निर्मित और फेक होती हैं। ये ही छद्म यथार्थ का वातावरण बनाती है। मीडिया इमेजों के जरिए उसके वायदे के पक्ष में हवा बनायी जाती है और हवा में जो कुछ भी अनुकूलन के लिए जरूरी होता है उन तर्कों, तथ्यों, भावनाओं और संवेदनाओं का मीडिया प्रस्तुतियों के समग्र 'फ्लो' के परिप्रेक्ष्य में विकास किया जाता है। यही राजनीति के छद्म यथार्थ का स्रोत है।
        

शनिवार, 26 जून 2010

मानवाधिकार हनन है पोर्नोग्राफी

      सामान्य तौर पर पोर्नोग्राफी के बारे में हमारी समझ मीडिया प्रचार से बनती रही है। मीडिया प्रचार ने पोर्नोग्राफी को मनोरंजन की सामग्री के रूप में चित्रित किया है। भारतीय दण्ड संहिता के तहत अन्य अपराधों की तरह यह सामान्य अपराध है। लेकिन मामला इतना सरल नहीं है। पोर्नोग्राफी गंभीर अपराध है ,यह स्त्री के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। इसे सामान्य अपराध के रूप में नहीं देखना चाहिए।
      पोर्नोग्राफी इस बात का भी प्रमाण है कि असीमित मुनाफों को हासिल करने के लिए पूंजीपतिवर्ग किसी भी हद तक जाकर मानवाधिकारों का हनन कर सकता है। पोर्नोग्राफी का धंधा कारपोरेट पूंजी का धंधा है। यह छोटी पूंजी का खेल नहीं है। पोर्नोग्राफी का दायरा पोर्न वीडियो से लेकर मुद्रित पोर्न किताबों,पत्रिकाओं और वीडियो गेम तक फैला हुआ है। संस्कृति उद्योग की आय का आज पोर्नोग्राफी प्रमुख क्षेत्र है। अमेरिका पोर्नोग्राफी का प्रमुख केन्द्र है।
     अमेरिका से बहने वाली पोर्न की अबाधित धाराओं ने आज अपनी पकड़ में सारी दुनिया को ले लिया है। पोर्न के मानवविरोधी,स्त्री विरोधी और उससे भी बढ़कर मानवाधिकार विरोधी स्वरूप का अमेरिका की प्रसिद्ध फेमिनिस्ट नेत्री आंद्रिया द्रोकिन ने गंभीरता से उद्घाटन किया था। यह बयान उन्होंने अमेरिका में पोर्न के बारे में बनाए गए एटोर्नी जनरल कमीशन के सामने दिया था।  
     इस कमीशन में गवाही के रूप में द्रोकिन ने जो बयान दिया उसे पोर्नोग्राफी के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। यहां हम उस बयान को हिन्दी में अविकल दे रहे हैं जिससे हम पोर्न के खिलाफ सही नजरिए के तहत एकजुट हो सकें। इस बयान का हिन्दी अनुवाद कलकत्ता विश्वविद्यालय की शोध छात्रा विजया सिंह ने किया है।
पोर्न के खिलाफ आंद्रिया द्रोकिन ने कहा -

मेरा नाम आंद्रिया द्रोकिन है। मैं अमेरिका (युनाइटेड स्टेट्स) की नागरिक हूँ। इस देश में, जहाँ मैं रहती हूँ, हर वर्ष लाखों फिल्में हम स्त्रियों के पैरों के बीच के कामुक, यौन दृश्यों पर बनाई जाती हैं। हमें बीवर (उद्बिलाव), योनि कहा जाता है। हमारे जननांगों को बाँध कर चिपका दिया जाता है, जननांगों को सजाकर इस प्रकार पेश किया जाता है कि वे पुरुष दर्शकों के सामने अधिक उभर कर आएँ। लाखों-लाख तस्वीरों में हमें अत्यंत विनीत मुद्रा में समर्पण करते हुए मैथुन क्रिया में लिप्त दिखाया जाता है, जहाँ हमारे जननांग भेदन के लिए खुले होते हैं, हमारे मलद्वारों को भी भेद्य बना दिया जाता है, हमारे गले का उपयोग इस तरह किया जाता है मानो वे हमारे जननांग हों। इस देश में, जहाँ कि मैं नागरिक हूँ, वास्तविक बलात्कार फिल्मों में होते हैं जो बाज़ार में बेचे जाते हैं। इस पोर्नोग्राफी का मुख्य उद्देश्य बलात्कार की शिकार, अवमानित, अपमानित स्त्री द्वारा मनोरंजन प्रदान करना है। यह तब तक चलता रहता है जब तक हम यह न समझ लें कि हमें यह पसंद हैं और हमें इसकी ज्यादा जरूरत है।
     इस देश में, जहाँ मेरी रहनवारी है, औरतों के जननांगों में पशुओं के जननांग व वस्तुओं को घुसेड़ कर जन-मनोरंजन का उपक्रम किया जाता है, स्त्रियों पर मूत्र-त्याग किया जाता है, उन्हें विकारग्रस्त बनाया जाता है। इस क्रम में हेर-फेर के लिए महिलाओं एवं युवा लड़कियों दोनों का उपयोग किया जाता हैं ताकि जवान होती लड़कियों को पाँच-छ: वर्ष के बच्चे की तरह दिखाया जा सके जो खिलौनों से घिरी होती हैं। मुख्यधारा के पोर्नोग्राफी से जुड़े प्रकाशनों में मलद्वार-भेदन को प्रमुख रूप से प्रस्तुत किया जाता है। कई पत्रिकाएँ ऐसी भी है जिनमें युवा औरतों के जननांगों को रोमरहित दिखाया जाता है जिससे कि वे बिल्कुल बच्चों के जननांगों के समान दिखें।
      जिस देश की मैं नागरिक हूँ, वहाँ पोर्नोग्राफी एक व्यापार है जो शारीरिक तथा मानसिक रूप से अपाहिज औरतों के शोषण पर आधारित है। जो स्त्रियाँ पंगु हैं उन्हें भी कामुक उत्तेजना के इस कारोबार में शामिल किया गया है। पुरुषों की असामान्य लैंगिक इच्छाओं को तृप्त करने के लिए विकलांग स्त्रियों का इस्तेमाल इस विशाल धंधे (नेटवर्क) में किया जाता है। इस देश में जातिवाद भी एक व्यापार है जिसका उपयोग यौन आनंद के लिए किया जाता है। काली स्त्रियों के प्रति दास भाव व औपनिवेशिक मानसिकता का मुख्य आधार वस्तुत: लैंगिक परितुष्टि से जुड़ा हुआ है। मात्र काला होना ही उनके दुरुपयोग, बलात्कार और अन्यान्य तकलीफों का कारण बनता है। यहाँ काली त्वचा ही स्त्री का जननांग-रूप है। अत: सामान्यतया जिस हिंसा, दुर्व्यवहार एवं दमन का केन्द्र स्त्री का जननांग होता है वही उस काली चमड़ी की औरत को पोर्नोग्राफी में झेलना पड़ता है।
       एशिया की औरतें इस देश में पेड़ों से बाँध दी जाती हैं, छतों से टाँग दी जाती हैं, द्वार पर लटका दी जाती है और यह भी सार्वजनिक मनोरंजन का एक रूप है। यहाँ के इतिहास में, यातनाशिविर के रुप में पोर्नोग्राफी है। जहाँ खेमो में एकाग्रता के नाम पर जारी क्रूरता को पीड़ित स्त्री के सेक्सुअल आनंद, तीव्र उत्तेजना और कामुक संतुष्टि का नाम दे दिया गया है।
        यहाँ पोर्नोग्राफी की प्रत्येक विधि का इस्तेमाल स्त्री का शोषण व अपमान करने के लिए किया जाता है। दूसरी ओर इसे दर्शक तथा भोक्ता के कामुक आनंद के रूप में प्रस्तुत भी किया जाता है। औरतों को, उनके चेहरे को गंदगी, कीचड़, रंग, खून, वीर्य से ढ़ँक दिया जाता है ताकि दर्शक एवं पीड़क दोनों को सेक्सुअल आनंद मिल सके, यही नहीं स्त्री की हत्या से मिलनेवाले काम सुख के लिए उनकी हत्या भी कर दी जाती है। और यह सब कुछ होता रहता है क्योंकि इसमें मस्ती है, मज़ा है, मनोरंजन है, आनंद है, और कईयों के अनुसार स्वतंत्रता भी है।
        सचमुच यह उन लोगों के लिए स्वाधीनता है जो इसे करते है, मनोरंजन का साधन बनाते हैं। लेकिन हमारे विश्वास में यह लाने की कोशिश भी की जा रही है कि पोर्नोग्राफी में पीड़ित भी स्वतंत्र है।
        इस मनोरंजन के साधन को किसी अन्य स्त्री पर आजमाया जाता है, जो पोर्नोग्राफी के धंधे में लिप्त नहीं है। पोर्नोग्राफी के क्रियाकलापों की नकल उतारने के लिए उसे वेश्यावृत्ति में जबरन लाया जाता है। जो स्त्रियाँ पोर्नोग्राफी से जुड़ी है उनमें 65-70 प्रतिशत पारिवारिक कामुक हिंसाचार या बचपन में यौन दुर्व्यवहार की शिकार होती है। वे मूलत: गरीब महिलाएँ है जिनके लिए विकास का कोई अवसर नहीं होता। वे अक्सर त्रासद परिस्थितियों में घर से बाहर निकलती हैं और दलालों का षिकार बनती हैं। लगातार बलात्कार कर इन पर फिल्में बनाई जाती हैं तथा ब्लैकमेल करके इन्हें वेश्यावृत्ति में फँसाकर रखा जाता है। कामुक उत्तेजना का वेश्याओं पर इस्तेमाल उन व्यक्तियों (जॉन नामक टिपिकल अंग्रेज पुरुष चरित्र) द्वारा किया जाता है जो इन क्रियाकलापों का प्रतिरूप पोर्नोग्राफी के माध्यम से प्रस्तुत करते है। फिर चाहे यह कितना भी हानिकारक क्यों न हो।
         पोर्नोग्राफी में बलात्कार पूरी योजना के तहत होता है। इसमें प्रत्येक चरण, भाव-भंगिमा, आसन यानि कि क्रियान्वयन के सभी रूप तय होते हैं जो क्रमवार ढ़ंग से पूर्ण उत्तेजना उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। स्त्री के सामूहिक बलात्कार में पोर्नोग्राफी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 'डीप थ्रोट' कार्यक्रम आने के बाद थ्रोट रेप जैसी घटनाएँ और भी बढ़ी हैं। ऐसे उपक्रमों द्वारा पुरुष के इस विश्वास की पुष्टि होती है कि वह स्त्री को गहरे भेद सकता है, उसके बिल्कुल अंदर प्रवेश कर सकता है। पोर्नोग्राफी से उपजे असामान्य व्यवहारों ने औरतों के खिलाफ हिंसक अपराधों को जन्म दिया है। ऐसे कुकृत्य स्त्री के प्रति गुलाम मानसिकता व उन्हें प्रताड़ित करने की प्रवृत्ति से प्रेरित होते हैं।
       हमने विगत आठ वर्षों में देखा है कि बलात्कार के दौरान कैमरे के इस्तेमाल में वृद्धि हुई है। कैमरे द्वारा उतारे गए बलात्कार के दृश्य त्वरित वेग से बाज़ार में उपलब्ध होते हैं। यह ही असली रेप है जो छुपे, नितांत एकायामी आनंद के रूप में सामने आता है। औरतों का उत्पीड़न हर जगह हो रहा है, गैर पारंपरिक रोजगार के क्षेत्र में, शिक्षा में, घर में। घर के भयप्रद, असुरक्षित, आज्ञाकारी परिवेश में महिलाएँ सबसे ज्यादा हिंसा की शिकार होती हैं। पोर्नोग्राफी का इस्तेमाल बच्चों पर भी किया जाता है ताकि उनका तीव्र अनुकूलन किया जा सके। ऐसा उन स्थानों पर अधिक होता है जहाँ दूसरी जगहों से आकर बस गए लोग अपनी इच्छा पूर्ति के लिए पास-पड़ोस के बच्चों व स्त्रियों पर वाचिक, शारीरिक हमले करते हैं।
       पोर्नोग्राफी ने बलात्कार में लाभ का नया आयाम भी जोड़ दिया है। कैमरे में कैद रेप के दृश्य 'प्रोटेक्टेड स्पीच' के रुप में होते है, पीड़िता हमेशा मूक होती है। वहां केवल आनंद प्रधान होता है। यही कारण है पोर्नोग्राफी से संलग्न क्रमिक हत्याओं व पोर्नोग्राफी के प्रति बढ़ती बाल अभिरुचि का।
       गौरतलब है कि बलात्कारी की औसत आयु घट रही है। अब प्राथमिक स्कूलों में भी छात्रों द्वारा नकल उतारने के क्रम में सामूहिक बलात्कार की घटनाएँ घट रही हैं। मृत्यु के बाद शव से बलात्कार करने की बीमारी में इजाफा हुआ है। इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति हत्या करने के उपरांत मृत स्त्री से सेक्स करता है।
       आज पोर्नोग्राफी एक बड़ा व्यापार है, महिला उत्पीड़न, वस्तुकरण मन बहलाव के साधन भर हैं- इस अर्थ में हम कहीं ज्यादा अमानवीय हो गए हैं। स्त्रियों को मनुष्य ही नहीं मानना उनके विरूद्ध हिंसा के औचित्य को समर्थन देना है।
       मैं उस देश की नागरिक हूँ जहाँ आप यदि किसी प्रताड़ित स्त्री पर फिल्म बनाते हैं तो उसका दुगुना मूल्य पाते हैं।पहला, मनोरंजन दूसरा, प्रोटेक्टेड स्पीच (पुंस सत्ता के समर्थन में)। इन्हीं बातों से मुझे पता चलता है कि इस देश में स्त्री नागरिक होने का क्या अर्थ है, दोयम दर्जे के मनुष्य होने का क्या मतलब है?
       जब आपका बलात्कार किसी का मन बहलाव भर हो, आप असीमित मूल्यहीनता के शिकार हो जाते हैं। आप सामाजिक मूल्यहीनता के निम्नतम पायदान पर खड़े होते हैं। स्त्री के नागरिक जीवन पर पोर्नोग्राफी का असर अचम्भे में डालने वाला है। यह हमें गूँगा, आज्ञाकारी बनाता है, अपने आसपास के प्रति भयभीत रखता है, व्यापक अवसाद, निराशा और असंतुष्टि का सृजन करता है। स्त्री का पूरा जीवन सेक्सुअल आतंक के दु:स्वप्न में बीतता है। यही उसका यथार्थ और उसकी शक्ति है। आप यह जानकर कितने खुश होंगे कि आपके दु:स्वप्न किसी के लिए स्वतंत्र तानाशाही का माध्यम हैं तो किसी के लिए महज़ वक्ती मस्ती के लिए समय बीताने का जरिया।
       सबसे पहले मैं चाहती हूँ कि आप उन औरतों को सुनें जो अपनी आपबीती कहना चाहती हैं। कृपया उन्हें सुने। वे जानती हैं, वे जानती हैं कि यह कैसे कार्य करता है...उनके साथ यह सब घटित हुआ है।
      मैं माँग करती हूँ कि आप इस अंतर्राष्ट्रीय सचाई को स्वीकार करें-यह मानवाधिकार का मुद्दा है-इसका नितांत व्यक्तिगत कारण भी है, जिसके लिए मेरे दादा-दादी, नाना-नानी यहाँ आए हुए हैं, यहूदी रूस और हंगरी से भाग खड़े हुए हैं। जो इस देश में नहीं पहुँच पाए उन्हें या तो जनसंहार में मार गिराया गया या नाज़ियों ने उन्हें मार दिया। वे यहाँ मेरे लिए आए थे। मैं यहाँ रहती हूँ, इस देश में जहाँ मनोरंजन व लाभ के लिए महिलाएँ लगातार उत्पीड़न झेल रहीं हैं। इसमें राज्य की स्वायत्त व्यवस्था भी अधिकारिक रूप में शामिल है। अब यह असहनीय है।
       मैं चाहती हूँ कि आप शोषितों की मदद करें न कि शोषकों की। आपके पास विपुल अवसर हैं। कामना करती हूँ कि आप साहसी बनें, अपनी इच्छा और प्रयास से स्त्री को बंधन मुक्त करें। उसे जबरिया ठूसी गई वर्जनाओं से आजाद करें। जो हो सके करें ताकि वह सचमुच स्वाधीन हो सके।







शनिवार, 20 मार्च 2010

धर्म से ज्यादा सुरक्षित है फैशन में समाज



     लोकवादी संस्कृति फैशन की जननी है। फैशन की भाषा सामाजिक हैसियत की भाषा है। फैशन ने व्यक्ति को बेझिझक, औपचारिक और संशयहीन बनाया, जीवन में खुलेपन को बढ़ाया। फैशन सजावट या पहनावा या शैली मात्र न होकर 'एटीटयूड' है, दृष्टिकोण है, विचार है। मनुष्य के भावों को संयमित, नियमित और अभिव्यक्त करने का माध्यम है। आत्माभिव्यक्ति के बहाने सामाजिक हैसियत, वर्गीय अवस्था और जीवन की प्रतिस्पर्धा को व्यक्त करने का चैनल है। जीवन के विविध मायावी रूपों की जननी होने के साथ धार्मिक रूढ़ियों और बंधनों के खिलाफ हस्तक्षेप है। यह प्रभुत्वशाली वर्ग की माया है। आस्कर वाइल्ड के शब्दों में कहें तो 'फैशन ने व्यक्ति को जो सुरक्षा दी है वह धर्म कभी नहीं दे सकता।' यानी फैशन सामाजिक सुरक्षा का कवच है। यह सामाजिक संवृत्ति है।
फैशन के पर्याय के रूप में पहनावे को देखने की परंपरा बड़ी पुरानी है। यह फैशन के विकास का सबसे पुराना तत्व है। पहनावा हमें पर्यावरण से सुरक्षा दिलाने का उपकरण भी है। नंगे और वस्त्रहीन समाज में फैशन की संवृत्ति की जबर्दस्त भूमिका हो सकती है।
आरंभ में फैशन का संबंध पहनावे से था, कालांतर में कामुकता से संबंध बना। यह एकदम नया क्षेत्र था। जे.सी. फ्लीगल ने 'वस्त्र का मनोविज्ञान' (1930) शीर्षक निबंध में लिखा कि ‘पहनावे के प्रति हमारा दृष्टिकोण शुरू से ही अस्थिर रहा है। हम ड्रेस की पूजा करते रहे हैं, उसे सम्मान का दर्जा देते रहे हैं। ड्रेस की पूजा और सम्मान के भाव-
बोध के बीच अंतर्विरोध रहे हैं। ड्रेस इन दोनों के बीच संतुलन का काम करता है। यह सदा से उदारता का समर्थक रहा है। 'पूजा' और 'सम्मान' के भावबोध का आधार है कामुक इच्छाएं।’’
    कामुक इच्छाओं को ड्रेस का एकमात्र आधार नहीं मानना चाहिए, इससे फैशन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण बनाने में मदद नहीं मिलती। फैशन वस्तुत: सामाजिक संस्थान है जो मनुष्य की इमेज बनाता है और बिगाड़ता है। यह सार्वभौम संवृत्ति है। समग्रता में मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करना इसका मूलमंत्र है। फैशन के विकास में कला एवं संस्कृति आंदोलनों की गहरी भूमिका रही है। भारत में राजनीतिक स्वाधीनता संघर्ष की फैशन के रूपों के निर्माण में बड़ी भूमिका रही है। आंदोलनों के प्रभावस्वरूप नए-नए फैशन रूपों का जन्म हुआ। दीर्घकालिक प्रक्रिया में ये फैशन क रूप स्थिर होते चले गए। सार्वभौम रूप में बदल गए। उनके साथ जातीय पहचान के तत्व जुड़ गए।
फैशन की यह विशेषता होती है कि जब कोई एक शैली चल पड़ती है तो वह सार्वभौम रूप ग्रहण कर लेती है। कालांतर में यही सांस्कृतिक पहचान बन जाती है। आंदोलनों के गर्भ से उपजी शैलियों की यह विशेषता होती है कि वे सुनिश्चित संरचना में ही विकास करती हैं। फैशन का यह लक्षण है कि वह उदार होता है और समाहित कर लेता है, परिणामत: फैशन में अनेक संस्कृतियों के अनेक रूपों का समाहार मिलेगा। फैशन के कुछ रूप सदाबहार और सार्वभौम बन जाते हैं तो कुछ अल्पजीवी रह जाते हैं।
मसलन, भारतीय साड़ी, धोती और कुर्त्ता को ही लें। ये तीनों वस्त्र कभी भी कामुकता या कामुक इच्छाओं का प्रतीक नहीं रहे। बल्कि भद्रता, सौम्यता और सादगी के प्रतीक रहे हैं। हाल के 25-30 वर्षों से साड़ी को थोथी विलासिता, कामुकता एवं पुरुषत्ववादी दृष्टि से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
    अब साड़ी को सादगी एवं भद्रता का प्रतीक नहीं, विलासिता, समृद्धि और अभिजन के वस्त्र के रूप में उभारा जा रहा है। आज वह भोग-विलास का पर्याय है। साड़ी के साथ जुड़ी सहिष्णुता, उदारता एवं अनौपचारिक दृष्टिकोण की जगह नए मूल्यों का लाया जा रहा है। भारतीय साड़ी को पहनने की जो शैली आम जीवन और विज्ञापनों में दिखाई देती है उसमें गंभीर अंतर है। साड़ी पहनने की क्षेत्रीय शैलियां रही हैं। क्षेत्रीय स्तर पर साड़ी का आकार, स्वरूप, छापा आदि तय होता रहा है, इससे राष्ट्रीय बाजार निर्मित करने में बाधा आई। राष्ट्रीय बाजार एवं राष्ट्रीय पहचान के लिए पहनावे का एक ही रूप जरूरी था, इस ऐतिहासिक मांग की पूर्ति राष्ट्रीय आंदोलन ने की।

आधुनिक साड़ी पहनने की शैली पूरी तरह नई है। इसका श्रेय ज्ञानदानंदिनी देवी को है। वे सत्येंद्रनाथ टैगोर (प्रथम आई.सी.एस.) की पत्नी और रवींद्रनाथ टैगोर की भाभी थीं। वे आधुनिक चेतना से संपन्न थीं। संकीर्णता से मुक्त थीं। उन्होंने पारसी और कोंकणी शैली की साड़ी पहनने की शैलियों को मिलाकर आधुनिक भारतीय साड़ी पहनने की शैली बनाई जिसका आंचल बाएं कंधे से होता हुआ चला जाता है। आरंभ में यह टैगोर परिवार की साड़ी की शैली थी, बाद में इसे मध्यवर्ग में स्वीकृति मिली। इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि फैशन का आरंभ हमेशा आभिजात्य के यहां होता है। किंतु आभिजात्य इसे जिंदा नहीं रख पाता। फैशन तब ही फैशन होता है जब यह जनता में लोकप्रिय हो जाए।
    

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

माध्यम साम्राज्यवाद की नरकलीला -2-

  हिंसा की जरुरत उसी समाज को पडती है जहां इसका इस्तेमाल निजी संपत्ति की रक्षा के लिए किया जाता है जो मानव द्वारा मानव के उत्पीड़न का स्रोत है।पूंजीवादी जगत का लगभग सारा अनुसंधान और विकास कार्य औद्योगिक राष्ट्रों में संकेन्द्रित है।इस पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का एकाधिकार है। तकनीकी डिजायनों का 80फीसदी अंश उन्हीं के नियंत्रण में है। ये कम्पनियां संपत्ति का संचय उपभोग बढाने के लिए नहीं करतीं। अपितु संपदा का ज्यादा से ज्यादा संचय ही इनकी मूल प्रकृति है। संचय को विनिवेश में लगाने की कोशिश की जाती है और उससे हुई प्राप्तियों को बचत खातों में डाल दिया जाता है।

 साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के कारण विषमता,असमानता एवं अलोकतान्त्रिक मानसिकता का तेजी से विकास हुआ है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में घुसपैठ बढ़ी है।विश्वकी200 सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का1960 में विश्व के सकल घरेलू उत्पादन के17प्रतिशत हिस्से पर कब्जा था जो 1982 में बढकर 24 फीसदी हो गया और 1995में32प्रतिशत हो गया।                                                                                                                         

अ. ग्राचोव और नि.येर्मोश्किन ने''नयी सूचना व्यवस्था अथवा मनोवैज्ञानिक युध्द?''कृति में सैन्य, सूचना, और संचार के अंतस्संबंधों को विश्लेषित करते हुए लिखा कि ''राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में निरंतर चढ़ाव आने और पूॅजीवादी व्यवस्था में गंभीर संकटों के आने के साथ-साथ संघर्ष विचारधारा के क्षेत्र में भी अंतरित होता जा रहा है। 

आधुनिक साम्राज्यवाद अपनी विचारधारात्मक सेवाओं के संकेन्द्रण की तरफ विशेष ध्यान दे रहा है। ताकि एक ऐसे सशक्त हरावल का निर्माण किया जा सके;जो स्थानीय और विश्व के पैमाने पर सामाजिक परिवर्तनों का प्रतिरोध करने की क्षमता रखता हो। आर्थिक,सैनिक और विचारधारात्मक प्रसार एकाकार हो गया है।''                                                                  

पचास और साठ के  दशक में उपजे पूंजीवादी संकट के कारण शस्त्र उद्योग में पूंजी निवेश ज्यादा  हुआ।सन्1947 से 1970 के दौरान 1,100विलियन डॉलर का सैन्य उदृदेश्यों पर निवेश किया गया। अमरीकी सैन्य उद्योग पर किए गए शोध कार्यों से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि जब-जब युध्द की शुरुआत हुई है तब-तब अमरीकी उद्योगों में हल्की सी विकास दर दर्ज की गयी है। आम तौर पर विकसित राष्ट्रों में सूचना तकनीकी के विकास की बढ़-चढ़कर प्रशंसा की जाती है। किन्तु हकीकत यह है कि उन समाजों में असमानता बढ़ी है।

''मानव विकास रिपोर्ट 1996''के अनुसार 'ओईसीडी' देशों में 100मिलियन से ज्यादा लोग गरीबी की रेखा के नीचे जिन्दगी बिता रहे थे।पांच मिलियन लोग गृहहीन थे।आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में 20 फीसदी समृध्दों ने इन देशों के 20फीसदी सबसे गरीब लोगों की तुलना में दस गुना ज्यादा कमाई की।इसी तरह अमरीका की कुल आबादी के एक फीसदी समृध्दों की संपत्ति में 20से 36प्रतिशत तक की वृध्दि हुई। 

दूसरी ओर बेकारों की संख्या में बेशुमार वृध्दि हुई।विश्वस्तर पर भूमंडलीकरण के नियमों एवं मांगों को लागू करने का यह दुष्परिणाम निकला है कि बडे पैमाने पर दरिद्रता,बेकारी,एवं असमानता का विकास हुआ है।आज दुनिया में1.3 विलियन लोगों के पास साफ पीने का पानी नहीं है।प्राइमरी स्कूल जाने योग्य सात बच्चों में से एक बच्चा स्कूल के बाहर ही रह जाता है। 840 मिलियन लोग कुपोषण के शिकार हैं।तकरीबन 1.3 विलियन लोग ऐसे हैं जिनकी प्रतिदिन एक डॉलर से भी कम आय है। इन आंकड़ों में हो रही वृध्दि की ओर कायदे से भूमंडलीकरण समर्थकों को ध्यान देना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्यों हो रहा है।                                                                                        
असल में, भूमंडलीकरण में अन्तर्विरोध निहित हैं।इसका संबंध पूंजीवाद के अन्तर्विरोधों से है। पूंजीवाद ने विश्व व्यवस्था के रुप में जब अपना विकास शुरु किया तो उसने सीमित रुप में सामन्तशाही के खिलाफ संघर्ष किया। पूंजीवादी सत्ता और औपनिवेशिक शासन व्यवस्था की स्थापना की। पुराने संबंधों को बरकरार रखा। इसके खिलाफ दुनिया के गुलाम मुल्कों में आजादी के लिए संघर्षों का सिलसिला चल निकला।

 आजादी के लिए संघर्ष पूंजीवादी भूमंडलीकरण के खिलाफ पहली सबसे बड़ी जंग हैं। तात्पर्य यह है कि भूमंडलीकरण मूलत: आजादी और आत्मनिर्भरता को छीनता है।यह परनिर्भरता और सैन्य-निर्भरता पैदा करता है। लोकतन्त्र को कमजोर बनाता है या उसे खत्म करता है।यह कार्य वह भूमंडलीय माध्यमों, भूमंडलीय संचारप्रणाली, भूमंडलीय नियमों,और निर्बाध प्रवेश के जरिये करता है। साम्राज्यवादी भूमंडली करण की विशेषता है पर-निर्भरता, सैन्य सहयोग और उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रचार- प्रसार।  इच्छा और आकांक्षाएं सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की बजाय वस्तु प्राप्ति से जुडने लगती हैं। फलत: इच्छाओं का वस्तुकरण होने लगता है। जीवनशैली, खान-पान, प्रतीकों एवं चिह्नों के जरिये साम्राज्यवादी संस्कृति को जनप्रिय बनाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं।इस क्रम में जहां एक ओर बहुराष्ट्रीयनिगमों का विस्तार होता है। वहीं दूसरी ओर आम लोगों में भ्रम की सृष्टि  होती है। यही वजह है कि किससे लडना है और कैसे लडना है ,इन सवालों पर नये किस्म के चिन्तन की जरुरत महसूस की जा रही है।नयी समझ के अभाव में संघर्ष के पुराने अस्त्र बेकार हो गए हैं।


विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...