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बुधवार, 30 नवंबर 2016

फिदेल की माँ , धर्म और गरीबी

        फिदेल कास्त्रो को स्पष्टवादिता का संस्कार क्रांति से मिला। क्रांतिकारी होने के नाते वे हर बात को स्पष्ट ढ़ंग से कहते थे।फिदेल का मानना था ´क्रांतिकारी राजनीतिज्ञ हर चीज के बारे में स्पष्ट और बेबाक बोलते हैं।´ यही स्पष्टवादिता क्रांतिकारियों को अभिव्यक्ति के मामले में अन्य विचारधारा के नेताओ से अलग करती है।मार्क्सवादियों में धर्मसंबंधी निजी सवालों के उत्तर देते समय अनेक किस्म के विभ्रम नजर आते हैं।लेकिन फिदेल के अंदर कोई विभ्रम नजर नहीं आते।

जब एफ.बिट्टो ने फिदेल से सवाल पूछा कि आपका जन्म धार्मिक परिवार में हुआ है ॽ तो फिदेल ने कहा इस सवाल का मैं किस तरह जवाब दूँ ॽ मैं इस सवाल का इस तरह उत्तर देना चाहूँगा,पहली बात यह कि मैं एक धार्मिक राष्ट्र से आता हूँ,दूसरी बात यह कि मैं एक धार्मिक परिवार में जन्मा,मेरी माँ लीना धार्मिक महिला थीं।मेरे पिता भी धार्मिक व्यक्ति थे।गांव में मेरा जन्म हुआ और मेरी माँ भी गांव की ही रहने वाली थीं।वह क्यूबा की रहने वाली थी।जबकि पिता गलीशिया,स्पेन के अत्यंत गरीब किसान थे।

फिदेल की माँ को किसी ईसाई मिशनरी ने धर्म की शिक्षा नहीं दी थी,वह एकदम अनपढ़ थीं। लेकिन उनकी गहरी धार्मिक आस्थाएं थीं।उन्होंने वयस्क होने के बाद अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा। फिदेल के पिता का नाम एंजेल था। फिदेल ने कहा ´मेरी माँ एकदम निरक्षर थीं,उसने अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा,मुझे याद नहीं है कि उसको लिखना-पढना सिखाने के लिए कोई शिक्षक मिला था,क्योंकि उसने किसी भी शिक्षक का कभी कोई जिक्र नहीं किया।उसने बहुत परिश्रम करके लिखना-पढ़ना सीखा,मैंने कभी नहीं सुना कि वह कभी पढ़ने के लिए स्कूल गयी ,वह स्व-शिक्षित थी,उसने कभी किसी स्कूल और चर्च में जाकर कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की।मेरा मानना है उसके धार्मिक विश्वासों का स्रोत उसके परिवार की धार्मिक परंपराएं थीं।खासकर उसकी माँ (फिदेल की नानी) और माँ की माँ बड़ी धार्मिक थीं।´

बिट्टो ने फिदेल से पूछा कि क्या आपकी माँ नियमित चर्च जाती थी तो फिदेल ने कहा ´ वे नियमित चर्च नहीं जाती थीं,क्योंकि मेरा जहाँ जन्म हुआ था वह इलाका शहर से बहुत दूर गांव में पड़ता था,वहां कोई चर्च नहीं था।´

फिदेल का जहां जन्म हुआ उस गांव का नाम था बीरान,इस गांव में कुछ बड़ी इमारतें थी,कुछ रिहायशी घर थे,इन सबका स्पेनिश स्थापत्य था.चूंकि फिदेल के पिता स्पेनिश थे,अतः घर का स्थापत्य स्पेनिश था।उनके पास गांव में एक टुकड़ा जमीन का प्लॉट था,जिसमें खेती होती थी और लकड़ी का घर भी था,साथ ही पशुपालन भी करते थे।जाड़ों में पशुओं को घर के अंदर रखना होता था।घर में सूअर और गाएं थीं जिनका परिवार पालन-पोषण करता था।

दिलचस्प बात है फिदेल कास्त्रो के यहां तकरीबन बीस-तीस गाएं भी थीं, वे जब छह साल की उम्र के थे तो जाडों में घर में गायों के साथ सोते थे। फिदेल का बचपन का यह दौर गाय के गोबर और दूध के बीच गुजरा।

फिदेल की माँ की मृत्यु 6अगस्त1963 को हुई,यानी क्यूबा की क्रांति के छह महिने बाद।जबकि पिता की मृत्यु पहले ही 21अक्टूबर1956 को हो चुकी थी।उस समय फिदेल 30साल और दो महिने के थे।फिदेल ने अपनी आत्मकथा ´माई लाइफः फिदेल कास्त्रो´ में लिखा है कि वे अपनी मां के धार्मिक विश्वासों और आस्थाओं का हमेशा सम्मान करते थे।उनको एक क्रांतिकारी की माँ होने के नाते बहुत कष्ट उठाने पड़े।वे अत्यंत गरीब और सहिष्णु थीं।







धर्म और फिदेल कास्त्रो

फिदेल कास्त्रो के बारे में यह सब जानते हैं कि वे क्रांतिकारी थे,मार्क्सवादी थे,लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि फिदेल बेहतरीन धार्मिक समझ वाले व्यक्ति भी थे।फिदेल ने धर्म को लेकर जिस नजरिए को व्यक्त किया उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।यह सच है धर्म का जो रूप हम आज देखते हैं वह बहुत कुछ मूल रूप से भिन्न है।एक बेहतरीन मार्क्सवादी वह है जो धर्म को उसके सही रूप में समझे और धर्म की सही सामाजिक भूमिका पर जोर दे।
          हमारे यहां राजसत्ता और उसके संचालक धर्म के प्रचलित रूपों के सामने समर्पण करके रहते हैं, धर्म की विकृतियों के खिलाफ कभी जनता को सचेत नहीं करते,धर्म की गलत मान्यताओं को कभी चुनौती नहीं देते हैं ,धर्म का अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए दुरूपयोग करते हैं और इसके लिए सर्वधर्म समभाव की संवैधानिक समझ की आड़ लेते हैं।संविधान की आड़ लेकर धर्म की ह्रासशील प्रवृत्तियों को संरक्षण देने के कारण ही आज हमारे समाज में धर्म,संत-महंत,पंडे,पुजारी,तांत्रिक ,ढोंगी आदि का समाज में तेजी से जनाधार बढ़ा है,इन लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है।इसके कारण समाज में अ-सामाजिकता बढ़ी है, लोकतंत्र विरोधी ताकतें मजबूत हुई हैं।

यह सच है हम पैदा होते हैं धर्मकी छाया में और सारी जिंदगी उसकी छाया में ही पड़े रहते हैं।धर्म की छाया में रहने की बजाय उसके बाहर निकलकर समाज की छाया में रहना ज्यादा सार्थक होता है। धर्म की छाया यानी झूठ की छाया । हम सारी जिंदगी झूठ के साथ शादी करके रहते हैं,झूठ में जीवन जीते हैं,झूठ से इस कदर घिरे रहते हैं कि सत्य की आवाज हमको बहुत मुश्किल से सुनाई देती है।झूठ के साथ रहते-रहते झूठ के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर झूठ को ही सच मानने लगते हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि सत्य से हम कोसों दूर चले जाते हैं।

धर्म पर बातें करते समय उसके मूल स्वरूप पर हमेशा बातें करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने का अर्थ है धर्म को धार्मिक प्रपंचों से बाहर ले जाकर गरीब के मुक्ति प्रयासों से जोड़ना। इन दिनों धर्म को संतों-पंडितों ने अपहृत कर लिया है।अब हम धर्म के मूल स्वरूप और मूल भूमिका के बारे में एकदम नहीं जानते लेकिन उन तमाम किस्म की भूमिकाओं को जरूर जानते हैं जिनको कालांतर में धर्म के धंधेबाजों ने पैदा किया है। सवाल यह है धर्म यदि गरीब का संबल है तो राजनीति में धर्म को गरीबों की राजनीति से रणनीतिक तौर पर जुड़ना चाहिए।लेकिन होता उलटा है गरीबों की राजनीति करने वालों की बजाय धर्म और धार्मिक संस्थानों का अमीरों की राजनीति करने वालों की राजनीति से गहरा संबंध नजर आता है।

धर्म गरीब के दुखों की अभिव्यक्ति है।मार्क्सवाद भी गरीबों के दुखों की अभिव्यक्ति है।इसलिए धर्म और मार्क्सवाद में गहरा संबंध बनता है।लेकिन धर्म और मार्क्सवाद के मानने वालों में इसे लेकर विभ्रम सहज ही देख सकते हैं। फिदेल कास्त्रो इस प्रसंग में खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। वे धर्म की व्याख्या करते हुए गरीब को मूलाधार बनाते हैं और कहते हैं कि ईसाईयत और मार्क्सवाद दोनों के मूल में है गरीब की हिमायत करना,गरीब की रक्षा करना,गरीब को गरीबी से मुक्त करना। इसलिए ईसाईयत और मार्क्सवाद में स्थायी रणनीतिक संबंध है।इसी आधार पर वे पुख्ता नैतिक,राजनैतिकऔर सामाजिक आधार का निर्माण करते हैं।

फिदेल के धर्म संबंधी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली शानदार किताब है ´फिदेल एंड रिलीजन´,यह किताब FREI BETTO ने लिखी है।इसमें फिदेल से उनकी 23घंटे तक चली बातचीत का विस्तृत लेखाजोखा है।यह किताब मूलतःक्यूबा और लैटिन अमेरिका में धर्म और मार्क्सवाद,धर्म और क्रांतिकारियों के अंतस्संबंधों पर विस्तार से रोशनी डालती है।इस बातचीत में फिदेल से 9 घंटे तक सिर्फ धर्म संबंधी सवालों को पूछा गया।धर्म और मार्क्सवाद के अन्तस्संबंध को समझने के लिए यह पुस्तक मददगार साबित हो सकती है।इस किताब को भारत में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने 1987 में अंग्रेजी में छापा था। इस किताब में लिए गए इंटरव्यू कई बैठकों में संपन्न हुए।ये इंटरव्यू 1985 में लिए गए थे।ये किसी समाजवादी राष्ट्र राष्ट्राध्यक्ष के द्वारा धर्म पर दिए गए पहले विस्तृत साक्षात्कार हैं। आमतौर पर मार्क्सवादी शासकों ने धर्म पर इस तरह के इंटरव्यू नहीं दिए हैं।













रविवार, 27 नवंबर 2016

फिदेल की औरतें और चंडूखाने के चंडूबाज


            हिन्दू फंडामेंटलिस्टों और समाजवाद विरोधियों का जनप्रिय धंधा है चरित्र-हनन अभियान चलाना। पहले ये लोग स्वायत्त ढ़ंग से यह काम करते थे, लोकल थे,लेकिन मोदी के उभार के बाद हिन्दू फंडामेंटलिस्टों ने भी तालिबानियों की तरह साइबर तरक्की की है, वे अब लोकल नहीं रहे,साइबर में आते ही ग्लोबल हो गए हैं। हिन्दू फंडामेंटलिस्टों का फेसबुक पर प्रिय धंधा है कम्युनिस्टों के खिलाफ मिथ्या प्रचार करना,समाजवाद के बारे में,समाजवादी नेताओं और विचारकों के बारे में कपोल-कल्पित कहानियां प्रचारित-प्रसारित करना।ये सल में चंडूबाज हैं।

फिदेल कास्त्रो की मौत के बाद सारी दुनिया में फिदेल के चरित्र-हनन की आंधी चल रही है।इस आंधी में अनेक रंगत के लोग शामिल हैं,इनमें जेएनयू के पुराने प्रतिक्रियावादी और मोदीभक्त भी शामिल हैं।ये लोग जब जेएनयू में पढ़ते थे,तब भी इनको समाजवाद और साम्यवाद से एलर्जी थी,आज भी है,कहने को ये शिक्षित हैं,लेकिन साम्यवाद को लेकर ये लोग किताब,विचार,विमर्श,तथ्य और सत्य किसी से संबंध नहीं रखते,सिर्फ चंडूबाजों की तरह फेसबुक पर लिख रहे हैं।इनके अलावा अनेक आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं जो आए दिन अपनी साम्यवाद विरोधी चंडू आवाजें सुनाते रहते हैं। हाल में इन लोगों ने फिदेल कास्त्रो के निजी जीवन को लेकर घटिया किस्म की चंडूखाने की खबरें प्रसारित की हैं।इनमें कोई सच्चाई नहीं है।

यह सच है फिदेल कास्त्रो की निजी जिंदगी के बारे में दुनिया बहुत कम जानती है।स्वयं जिन परिस्थितियों में कास्त्रो जैसे क्रांतिकारी काम करते रहे हैं उसमें सब कुछ सार्वजनिक करके रखकर सत्ता चलाना बहुत ही मुश्किल काम है,खासकर जब सामने सीआईए और बहुराष्ट्रीय मीडिया घराने जहर उगलने के लिए खड़े हों। इस स्थिति से निबटने का सबसे बेहतर तरीका यही होता कि स्वयं कास्त्रो अपने परिवार,पत्नी,बच्चे,माँ-बाप,भाई आदि के बारे में स्वयं ही कुछ लिखते,इससे विभ्रम पैदा नहीं होता।

मेरा मानना है क्रांतिकारियों को अपने परिवार और परिवारीजनों के बारे में स्वयं लिखना चाहिए,इससे तथ्य और सत्य के बीच किसी तरह के विभ्रम की संभावनाएं नहीं रहतीं।इसके बावजूद यह सच है कि फिदेल कास्त्रो अनुशासित क्रांतिकारी थे।निजी और सार्वजनिक जीवन में औरतों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था और समानता का भाव था।इस नजरिए को क्यूबा के सामाजिक यथार्थ की रोशनी में देखना चाहिए,न कि सीआईए के प्रचार अभियान के नजरिए से।

सवाल यह है क्यूबा में क्रांति के पहले औरतों का जीवन स्तर क्या था और आज क्या है ॽ अथवा फिदेल कास्त्रो के जमाने में क्या था ॽ जो फिदेल की 25हजार रखैलों का फेसबुक पर बार-बार जिक्र कर रहे हैं वे यह नहीं बताते कि उनकी सूचना का स्रोत क्या है ॽ उलेखनीय है सीआईए के फिदेल के खिलाफ जब सारे मिथ्या प्रचार अभियान धराशायी हो गए तब अंतिम अस्त्र के रूप में 25हजार रखैलों की खबर को चंडूबाजों ने मीडिया में प्रसारित किया।

क्यूबा और फिदेल पर बातें करते समय यह ध्यान रखें कि अमेरिका में एक बहुत बड़ा तंत्र है जिसको फिदेल और क्यूबा के खिलाफ मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने के लिए ही अरबों रूपये दिए जाते हैं। इन मनगढ़ंत कहानियों को सबसे पहले सीआईए के चंडूबाज तैयार करते हैं और उसके बाद सारी दुनिया में मीडिया एक ही झटके में प्रचारित-प्रसारित कर देता है। फिदेल की 25 हजार रखैलों की कहानी इसी सीआईए के कारखाने की देन है।इस कहानी का जन्मस्थान है मियामी।

ध्यान रहे फिदेल की मौत के बाद फिदेल के किलाफ सबसे ज्यादा घृणाभरे जुलूस और नारे मियामी में लगे हैं।मियामी उन तमाम क्यूबाईयों का बसेरा है जो क्यूबा को छोड़कर चले आए या फिर जिनके क्यूबा के प्रशासन से मतैक्य नहीं था या फिर जिनको क्यूबा में मानवाधिकार हनन नजर आ रहा था,इस तरह के लोगों को अमेरिका ने क्रांति के बाद के समय से ही हर स्तर पर प्रलोभन देकर प्रोत्साहित किया और उनको फिदेल और क्यूबा की क्रांति के खिलाफ प्रचार के औजार की तरह इस्तेमाल किया। सीआईए किस मनगढ़ंत कहानियां बनाता रहा है इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे।





फिदेल और सीआईए के मेढ़क -

       कल फिदेल कास्त्रो की मौत हुई,क्रांति के हमदर्दों को इससे दुख पहुंचा,वे फेसबुक पर उन पर लिख रहे हैं, सारी दुनिया में फिदेल की मौत की खबर प्रमुख खबर बनी,लेकिन हमारे देश में क्रांति विरोधी,समाजवाद विरोधी और मोदीपंथी लोग फिदेल के खिलाफ जहर उगलते हुए सक्रिय हो गए।

अरे भाई,जब फिदेल से कोई लेना-देना नहीं है तो फिर उनकी मौत पर यह मेढ़कों की तरह टर्र-टर्र क्यों ? मरे फिदेल हैं लेकिन आप लोगों के दिमाग का कैंसर क्यों फट पड़ा?

हिन्दू सभ्यता की परंपरा मान्यता है जब भी कोई व्यक्ति मरता है तो उसके गुण बताए जाते हैं,लेकिन इन दिनों मोदीपंथी जंगलियों की एक नई पौध पैदा हुई है जो उनकी मौत पर घृणा अभियान चला रहे हैं।लगता है इन लोगों के अंदर हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की सभ्यता का कोई असर ही नहीं है !

कल से जिन लोगों ने फिदेल के बारे गंदा,जहरीला प्रचार किया है ,वे वस्तुतःन तो क्यूबा को जानते हैं और फिदेल को जानते हैं।उनको यदि जानकारी है तो सीआईए द्वारा पेश की गयी सूचनाओं की,वे सीआईए गुलामों की तरह फेसबुक से लेकर मीडिया तक फिदेल के बारे में सफेद झूठ की वर्षा कर रहे हैं। इस तरह के लोग क्यूबा के बारे में भारत की सर्वमान्य नीति की मुखालफत कर रहे हैं और सीआईए के एजेंट का काम कर रहे हैं।मोदीपंथियों की यह देशभक्ति नहीं बल्कि देशद्रोही हरकत है।

फिदेल कास्त्रो क्या थे और क्या बन गए ,क्यूबा क्या था और आज किस रूप में सारी दुनिया के सामने खड़ा है,वह अकल्पनीय मिसाल है सामाजिक परिवर्तन की।

क्यूबा की अमेरिका द्वारा पांच दशक तक की गयी लंबी आर्थिक नाकेबंदी ,सीआईएके षडयंत्र ,भाड़े के सैनिकों और बुद्धिजीवियों की विश्वव्यापी फौज और बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के संगठित अभियान के बाद भी फिदेल और क्यूबा का सामाजिक परिवर्तन के रास्ते पर आगे बढ़ते जाना और दुनिया में क्यूबा का एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़े रहना अपने आपमें प्रशासनिक -कूटनीतिक कौशल की शानदार मिसाल है।

फिदेल का भारत के साथ खास संबंध था,जेएनयू के साथ खास संबंध था, जेएनयू के छात्र आंदोलन के प्रेरकों में फिदेल अग्रणी थे,देश में क्यूबा को लेकर जितने अभियान चले हैं उनमें भारत के नौजवानों की केन्द्रीय भूमिका रही है।

क्यूबा के कष्ट के दिनों में भारत की जनता और सरकार फिदेल कास्त्रो और क्यूबा की जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही है।लाखों नौजवानों ने चंदा देकर,किसानों ने गेंहूँ देकर,मजदूरों ने अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से चंदा देकर क्यूबा की क्रांतिकारी सरकार की कठिन समय में रक्षा की है।समाजवाद और क्रांति के पक्ष में इस तरह की पक्षधरता विरल है।

खासकर सोवियत संघ के विघटन के बाद क्यूबा की क्रांतिकारी सत्ता को बचाने में भारत की सरकार और जनता की शानदार भूमिका रही है।



भारत - क्यूबा मित्रता का मूलाधार है फिदेल कास्त्रो और उनका नजरिया।फिदेल के नजरिए और भारत के नजरिए में अनेक स्तरों पर नीतिगत साम्य रहा है,भारत के कम्युनिस्टों और उदारवादियों के साथ क्यूबा की गहरी मित्रता रही है,यह ऐसी मित्रता है जो कठिन चुनौतीपूर्ण समय में खरी उतरी है।इस मित्रता को अमेरिकी दवाब तक तोड़ नहीं पाया।

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

भूमंडलीकरण और विकास - 3- फिदेल कास्त्रो

     लैटिन अमरीका के देशों ने हाल के वर्षों में आर्थिक रक्तस्राव के जो सबसे खराब रूप देखे हैं, उनमें पूंजी पलायन भी एक है। यह विदेशी निवेशकों द्वारा अर्जित लाभ के अंतरण के रूप में नहीं है और न ही यह पलायन उन विदेशी ऋणों के भुगतान के रूप में है जो तानाशाह और भ्रष्ट शासकों के लिए थे जिन्होंने देश की निधियों को उड़ाया और उनका गबन किया, निजी बैंकों से लिए गए निजी ऋण या उसका उपयोग को अदा करने के लिए किया। यह पूंजी पलायन असमान विनिमय के सुविख्यात तत्व के कारण हुए नुकसान का परिणाम भी नहीं है। यह देश के भीतर निर्मित निधियों, कम वेतन पाने वाले मजदूरों की कीमत पर अर्जित बेशी मूल्य या बुध्दिजीवी कार्यकर्ताओं और व्यावसायियों की ईमानादार बचतों या छोटे उद्योगों, कारोबारों और सेवाओं के लाभों के पलायन का मामला है।
लैटिन अमरीकी देशों से घातक पूंजी पलायन का कारण बगैर किसी रोक-टोक और जरूरत के राष्ट्रीय मुद्रा से दुर्लभ मुद्रा की खरीद है। पवित्र नव उदार सिध्दांत के रूप में यह फार्मूला अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों द्वारा लादा गया है। ऐसा अनुमान है कि वेनेजुएला जैसे देशों से पिछले 40 वर्षों की अवधि के दौरान लगभग 250 अरब डालर का पूंजी पलायन हुआ। अर्जेंटीना, ब्राजील, मैक्सिको तथा अन्य लैटिन अमरीकी देशों से निकली राष्ट्रीय निधियों को भी इसमें जोड़ें।
बहादुर वेनेजुएलाई अवाम और उनके साहसी नेता को शाबासी जिन्होंने विनिमय दर पर नियंत्रण कायम कर लिया है। इससे इस देश से उक्त त्रासदी का अंत हो गया है।
मुझे याद है कि 1959 में क्यूबाई क्रांति की जीत के समय लैटिन अमरीका का कुल ऋण केवल पांच अरब डालर था। उस समय इसकी आबादी 21 करोड़ 44 लाख थी जो अब बढ़कर 54 करोड़ 34 लाख हो गई है। इसमें से 22 करोड़ 40 लाख लोग गरीब हैं और 5 करोड़ से अधिक निरक्षर हैं। 2003 में उसका कुल ऋण कम से कम 800 अरब डालर हो गया था।
विश्व युध्द के बाद गोलार्ध के इस क्षेत्र ने उतना विकास क्यों नहीं किया है जितना कि कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने किया है। कभी ये भी यूरोप के उपनिवेश थे। ये तो हमारे मुकाबले भी कम समृध्द और विकसित थे। क्या यह अमरीका के पिछवाड़े रहने के संदिग्ध सौभाग्य का परिणाम है? या क्या यह इस वजह से है कि हम श्वेतों, अश्वेतों, इंडियनों और वर्ण संकरों के घृणित समूह हैं और मानव जीन का यह अध्ययन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान गलत है कि मानव जाति में विभिन्न प्रजातियों की बौध्दिक क्षमता में कोई अंतर नहीं है? दोष कहां पर है?
मैंने यह कहकर अपनी बात शुरू की थी कि जो कुछ मौजूद था या आज कुछ मौजूद है वह सब मानवता पर लादा गया है। मैं कार्ल मार्क्स के इस कथन से पूरी तरह सहमत हूं कि जब उत्पादन और वितरण की पूंजीवादी प्रणाली अस्तित्व में नहीं रहेगी और इसके साथ मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण खत्म हो जाएगा तो यह मानव जाति के प्राक्-इतिहास के अंत का सूचक होगा। उनका यह तर्क हमारी जाति के इतिहास के द्वंद्वात्मक विकास पर आधारित है।
बहुत से लोगों को यह विचार अति सरलीकरण और पुराना लग सकता है। मार्क्स ने पूंजीवाद के प्रथम चरण का अध्ययन किया था। यह वह युग था जिसमें एक नए वर्ग का जन्म हुआ, जिसे समाज का कायाकल्प करना था और जो बाद में अनिवार्यत: शोषक और बेरहम बन गया। इससे नई तथा अधिक न्यायपूर्ण दुनिया का मार्ग खुला। जब उन्होंने अपने विचार रखे उस समय बिजली, टेलीफोन, आंतरिक दहन इंजिन, आधुनिक जहाज जो बहुत तेज गति से चलते हैं और भारी सामान ले जाते हैं, आधुनिक रसायन विज्ञान, सिंथेटिक उत्पाद, विमान जो सैकड़ों यात्रियों को लेकर कुछ ही घंटों में अटलांटिक को पार कर जाते हैं, रेडियो, टेलीविजन और कंप्यूटर नहीं थे। उन्होंने यह भयंकर नजारा नहीं देखा था कि मनुष्य द्वारा गैर जिम्मेदाराना रूप में किस तरह से आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल वनों के विनाश, मिट्टी के कटाव, लाखों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि के मरुस्थल में बदलने, समुद्रों के अतिशोषण और प्रदूषण, पौधों और पशुओं की पूरी जाति को नष्ट करने तथा पेयजल, हवा में जहर फैलाने के लिए किया जा रहा है।
मार्क्स ने अपने सिध्दांत का विकास उस समय के सर्वाधिक विकसित देश इंगलैंड में किया। उन्होंने मजदूर-किसान साहचर्य की जरूरत नहीं बताई। न ही उन्होंने उस समय की उपनिवेशी दुनिया से पैदा होने वाली विकट समस्या के बारे में सोचा। यह कार्य उनके मेधावी शिष्य लेनिन ने रूस की विशेष परिस्थितियों में उनके विचार का अनुसरण करके बाद में किया।
मार्क्स ने इंगलैंड की औद्योगिक क्रांति का त्वरित विकास तथा जर्मनी और फ्रांस के शुरुआती विकास को देखा। उस समय कोई भी यह नहीं कह सकता था कि उनकी मृत्यु के मुश्किल से 60 वर्ष बाद अमरीका इस तरह की भूमिका अदा करेगा।
माल्थस ने निराशा के बीज बोए, मार्क्स ने आशा जगाई। उन दिनों धरती के भूगोल और जीवमंडलभूमि, वन, समुद्र और हवा को शासित करने वाले नियमों के बारे में बहुत कम जानकारी थी। बाह्य अंतरिक्ष के बारे में भी बहुत कम ज्ञान था। सापेक्षता का सिध्दांत नहीं आया था तथा बिग बैंग के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा गया था।
मानव इतिहास में पहली बार हमारी जाति के सामने संपूर्ण विनाश का खतरा पैदा हो गया है। केवल प्राकृतिक वास को ही खतरा नहीं है बल्कि गहरी राजनीतिक धमकियों और परिष्कृत हथियारों से भी खतरा है। मार्क्स ने यह सोचा भी नहीं होगा कि सैलफोनों के जरिए लोग धरती के एक कोने से दूसरे कोने तक प्रकाश की गति के साथ बात कर सकेंगे और शेयरों, मुद्राओं तथा हैज प्रचालनों तथा अपनी जगह से तिल भर नहीं हिलाई गई वस्तुओं तथा दूसरी प्रतिभूतियों का खरबों डालर का लेनदेन होगा तथा सट्टेबाजी से होने वाला लाभ बेशी मूल्य से अधिक हो जाएगा।
मार्क्स का उत्पादक ताकतों के विकास तथा विज्ञान और मानव प्रतिभा की अनंत संभावनाओं में विश्वास था। उनका मानना था कि समाज की मौलिक तथा मानसिक जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी वस्तुओं के उत्पादन में सक्षम सामाजिक व्यवस्था दुनिया के पूरी तरह से विकास द्वारा ही कायम की जा सकती है। उन्होंने एक देश में क्रांति की बात नहीं सोची। उन्होंने भविष्य में इतना जरूर झांका कि वह भूमंडलीकृत दुनिया का विचार दे सके, एक ऐसी दुनिया जो शांति के साथ एक होकर रह सके और सब उसमें उपलब्ध धन का पूरा आनंद ले सकें। उन्होंने अमीर और गरीब के बीच बंटी दुनिया के बारे में सोचा भी नहीं होगा। 'दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ!' उन्होंने घोषणा की। आज की वास्तविक दुनिया में इसे आम विनाश और प्राणघातक तथा विनाशकारी ताकत से जुड़े अतिवादी सिध्दांतों के खिलाफ शारीरिक और बौध्दिक मजदूरों, किसानों और गरीबों के एक होने के आह्वान के रूप में लिया जा सकता है।
दुनिया के लिए ये आशा और शांति के दिन नहीं हैं। युध्द होने ही वाला है। यह समान ताकतों के बीच मुकाबला नहीं होगा। एक ओर आधिपत्यवादी महाशक्ति होगी जिसके पास बेइंतहा सैनिक ताकत और तकनीक है तथा जिसे अपने मुख्य साथी का समर्थन प्राप्त है जिसके पास परमाणु क्षमता है और जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य है। दूसरी ओर एक ऐसा देश है जिसके लोग अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा मान्यताप्राप्त स्वतंत्र देश कुवैत पर कब्जे से उत्तेजित गैर बराबर युध्द के बाद दस वर्षों से रोजाना बमबारी से जूझ रहे हैं और जहां लाखों लोग विशेषकर बच्चे भूख और बीमारी से मर रहे हैं।
व्यापक विश्व जनमत नए युध्द के खिलाफ है। वे अंतर्राष्ट्रीय नियमों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की शक्ति और प्राधिकार की परवाह न करने वाली अमरीकी सरकार के एकतरफा निर्णय के खिलाफ है। यह अनावश्यक युध्द है जिसके लिए बनाया गया बहाना न तो विश्वसनीय है और न सही सिध्द हुआ है।
1991 में अमरीका के खिलाफ युध्द के बाद इराक पूरी तरह से कमजोर हो गया था।
उल्लेखनीय है कि ईरान के खिलाफ उसके युध्द के दौरान पश्चिम ने उसका समर्थन किया था तथा भारी मात्रा में हथियार दिए थे। अब उसमें बिलकुल भी क्षमता नहीं बची है जिससे वह अमरीका के आक्रमणात्मक और सुरक्षात्मक हथियारों का मुकाबला कर सके। इसके विपरीत यदि इराक के पास वास्तव में परमाणु, रासायनिक या जैव हथियार हैं तो उनके खतरों को खत्म करने के लिए अमरीका के पास पूरी क्षमता है। इराक के पास ऐसे हथियार होने की कतई संभावना नहीं है और यदि उसके पास हैं भी तो उनके प्रयोग का प्रयास राजनीतिक दृष्टि से असंगत तथा सैनिक दृष्टि से आत्मघाती होगा।
असली खतरा यह है कि इस तरह का सशस्त्र हमला इराकी लोगों के लिए देशभक्ति पूर्ण युध्द बन जाएगा। उनके प्रत्युत्तर और विरोध का अग्रिम तौर पर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता है। इसका कोई अनुमान नहीं कि युध्द कब तक चलेगा, इससे कितनी मौतें और कितना विनाश होगा तथा प्रत्येक प्रतिद्वंद्वी के लिए इसके कितने मानवीय, आर्थिक और राजनीतिक परिणाम होंगे।
दुनिया के सामने पहले से ही मौजूद आर्थिक संकट के मद्देनजर इस युध्द के निश्चित रूप से जबर्दस्त आर्थिक जोखिम होंगे। ऐसे हालात में तेल की कीमतों का क्या होगा कोई नहीं जानता।


मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

9अक्टूबर को चे का स्मृति दिवस- महान क्रांतिकारी चेग्वारा की विरासत -5- फिदेल कास्त्रो

     अमरीका में कोई क्यूबाई प्रवासी नहीं है हालांकि हर साल ऐसे 1 ला व्यक्ति अपने रिश्तेदारों से मिलने क्यूबा आते हैं। लेकिन वे आप्रवासी नहीं हैं, निर्वासित व्यक्ति हैं। झूठ बोलने और भ्रम पैदा करने की अपनी कपटपूर्ण विधियों के द्वारा उन्होंने यह शब्द गढ़ा है।
मैं आपको यकीन दिलाना चाहता हूं कि हम पर जो कानून 37 साल से लागू है यदि उसे लैटिन अमरीका और कैरेबियन देशों और उन देशों पर लागू कर दिया जाए जिन पर वे एफ टी ए ए लादना चाहते हैं । यदि यह प्राधिकार सभी को मिल जाए, हालांकि हम इसकी पैरवी नहीं करते क्योंकि यह कातिल कानून है, तो लैटिन अमरीका और कैरेबियन देशों की आबादी आज 53 करोड़ 40 लानहीं होती और अमरीका की आधी आबादी लैटिन अमरीका या कैरेबियन मूल के लोगों की होती । इसके बारे में कुछ कहने के बजाए बेहतर होगा कि लोग खुद निष्कर्ष निकालें, अपना दिमाग लगाकर देखें कि उस देश के नेता किस तरह के हैं। मैं वहां के लोगों की बात नहीं करता। उनके साथ तो अकसर छल किया जाता है।
     हमारे पास इस बात के सबूत हैं कि कई बार उन्होंने गलत ध्येयों का समर्थन किया है। लेकिन गलत ध्येयों का समर्थन कराने के लिए उनके साथ छल करना जरूरी है और इस काम में वहां के नेता माहिर हैं। पूरे इतिहास में यही हुआ है । लेकिन जब उन्हें सच्चाई का पता चलता है तो वे कार्रवाई करते हैं। वियतनाम युद्ध को समाप्त कराने में अमरीकी अवाम ने निर्णायक भूमिका अदा की। अंतर्राष्ट्रीय जनमत, आपके विचारों, सभी अमरीकी देशों के विचारों का वहां के नेताओं की नजरों में कोई मोल नहीं है। उनके लिए केवल अमरीकी मतदाताओं के विचारों का ही महत्व है। उनके साथ छोटी या बहुत बड़ी धोखाधड़ी की जा सकती है। ऐसी ही धोखाधड़ी हमें अमरीका के पिछले 'सुपर डेमोक्रेटिक' चुनावों में देने को मिली जब हारने वाले उम्मीदवार को 'जीतने' वाले उम्मीदवार से 5 ला वोट अधिक मिले।
    प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि वहां क्या हुआ। अमरीका में किसी को भी संदेह नहीं है। क्यूबाई-अमरीकी आतंकवादी मॉब की मदद से धुर दक्षिणपंथी धड़े ने अपने विरोधी से विजय छीन ली। मैं इस विवाद में नहीं पड़ना चाहता कि दोनों में से कौन अधिक लोकतांत्रिक है और कौन कम क्योंकि मैं इनमें से किसी भी पार्टी का सदस्य नहीं हूं। आखिरकार वहां एक पार्टी प्रणाली ही तो है ।
     कुछ लोग कह सकते हैं : 'लेकिन क्या क्यूबा में केवल एक पार्टी नहीं है?' मैं कहता हूं कि हां है। लेकिन हमारी पार्टी न तो नामांकित करती है और न चुनती है। प्रत्येक जिले में असेंबलियों में लोग जिला प्रतिनिधि चुनते हैं और वे ही हमारी प्रणाली का आधार हैं। इनकी संख्या दो से कम या आठ से अधिक नहीं हो सकती। इन जिला प्रतिनिधियों, जिनसे देश की प्रत्येक नगरपालिका के लिए नगरपालिका परिषद गठित की जाती है, में से लगभग 50 प्रतिशत प्रतिनिधि लोगों द्वारा नामित किए जाते हैं और चुने जाते हैं। चुनावों में उन्हें 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिलने चाहिए। 600 से अधिक प्रतिनिधियों वाली नेशनल असेंबली ऑफ क्यूबा के लगभग 50 प्रतिशत सदस्यों में जिला प्रतिनिधि ही होते हैं जिनसे न केवल नगरपालिका परिषदों का गठन होता है, बल्कि वे ही प्रोविंसियल असेंबलियों और नेशनल असेंबली के लिए उम्मीदवार नामित करते हैं।
मैं इसके विस्तार में नहीं जाऊंगा लेकिन यह जरूर चाहूंगा कि आप क्यूबा की चुनाव प्रणाली के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करें। क्योंकि जब उत्तर के लोग पूछते हैं कि क्यूबा में कब चुनाव होंगे तो बहुत आश्चर्य होता है। हम, क्यूबावासी उनसे यह सवाल पूछ सकते हैं : अमरीका का राष्ट्रपति बनने के लिए करोड़पति होना क्यों जरूरी है ?'  लेकिन उम्मीदवार का अनिवार्य रूप से करोड़पति होना जरूरी नहीं है, इसलिए हम पूछ सकते हैं कि : राष्ट्रपति चुने जाने के लिए उम्मीदवार को कितने अरब डालर चाहिए और मामूली म्यूनिसिपल पद सहित विभिन्न पदों के लिए आपको कितना भुगतान करना पड़ता है?
हमारे देश में यह सब नहीं होता। दीवारों पर पोस्टर नहीं चिपकाए जाते, टेलीविजनों पर उदात्त संदेशों की बाढ़ नहीं आती। उन्हें शायद यही कहते हैं। मुझे याद नहीं शायद आपको याद हो। क्योंकि आप वकील हैं। मैं तो भूल चुका हूं कि मैं कभी वकील
था ।उस देश में तथा दुनिया के अन्य हिस्सों में जन संचार माध्यमों ने दुर्भाग्य से क्या भूमिका अदा की है? मैं उनकी आलोचना नहीं कर रहा हूं।
मैं एक मामले का उल्ले करना चाहता हूं जिससे पता चलता है कि जब अमरीका के लोगों को सचाई मालूम होती है तो वे अच्छे ध्येय का समर्थन करते हैं। यह मामला छोटे इलियान गोंजालेज का है जिसका साढ़े तीन साल पहले अपहरण कर लिया गया था। वहां जब लोगों को सचाई का पता चला तो इस छोटे लड़के को घर भेज दिया गया। अमरीका के 80 प्रतिशत लोग उसे वापस क्यूबा भेजने के पक्ष में थे ।
वियतनाम युद्ध के समय लोगों को सच्चाई का पता चला। युद्ध में मरे युवा अमरीकियों की लाश को घर वापस लाने ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। लेकिन इलियन के मामले में ऐसा कुछ नहीं था। हम अमरीकी लोगों को अपने कारण बता पाए। यह कार्य टेलीविजन नेटवर्कों के जरिए किया गया। हवाना में 6 ला मांओं द्वारा मार्च आश्चर्यजनक घटना है। लाखों बच्चों द्वारा मार्च या हवाना में इंटेरेस्ट्स सेक्शन के सामने दस ला लोगों द्वारा मार्च और इसके साथ-साथ विभिन्न स्थानों पर लाखों लोगों द्वारा प्रदर्शन ऐसी घटनाएं हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। इन सबको पूरी दुनिया में बड़े टेलीजिवन नेटवर्कों पर दिखाया गया। कुछ रैलियां भी हुईं जो कि बीच हवा में क्यूबन एयरलाइनर को उड़ा देने की आतंकवादी कार्रवाई की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित रैली की तरह विशाल थीं। उस रैली को 40 अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्कों पर प्रसारित किया गया था।
आज संदेश प्राप्त करने के बहुत तरीके हैं। उपग्रह नीचे सिगनल भेजते हैं। जैसा कि आप छात्र बेहतर जानते हैं, एक माध्यम इंटरनेट भी है जिससे दुनिया के किसी भी कोने में संदेश भेजे जा सकते हैं भले ही वह अंधेरा कोना न हो। वह अंधेरा कोना हो भी नहीं सकता क्योंकि जिनके पास इंटरनेट है उनके पास बिजली भी है। संचार के और भी तरीके हैं। हमें बुद्धिजीवी वर्ग को भी कम नहीं आंकना चाहिए। इस वर्ग में पूरी दुनिया के लाखों लोग हैं जो अनिवार्य रूप से शोषक और धनी वर्ग से नहीं हैं।
उदाहरण के लिए सीएटल में जो हुआ उसे याद करें। इस समय दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हो रहे विरोध को देखें। शिक्षित तथा ज्ञान संपन्न लोगों ने उन्हें इंटरनेट के जरिए संगठित किया है। युद्ध के साथ-साथ आज अन्य कई चीजों से धरती के लिए
तरा पैदा हो गया है जैसे कि जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत का विनाश, भूमंडल का उष्मीकरण, हवा, नदियों तथा समुद्रों का विषाक्त होना। इनसे पूरी धरती पर जीवन के लिए तरा है। इसीलिए लैटिन अमरीका, उत्तरी अमरीका और यूरोप में अवाम का एक जैसा ध्येय हो गया है।
एक के बाद एक महाविपत्ति आ रही है। आज ऐसी बीमारियां आ गई हैं जो 25 या 30 साल पहले नहीं थी। 25 साल पहले एड्स नहीं थी और और जिनके पास अच्छी प्रयोगशालाएं हैं वे उसके इलाज पर जोर दे रहे हैं निवारण या टीके पर नहीं क्योंकि एक व्यक्ति के इलाज पर एक साल में 10,000 डालर र्च होता है। यह र्च हर साल करना पड़ता है। इसलिए यह ज्यादा लाभदायक है। सीधी सी बात है कि इलाज की दवाई निवारक दवाई के मुकाबले ज्यादा मुनाफा देती है ।
अब सार्स और वेस्ट नाइल बुखार अचानक पैदा हो गए हैं। ये अमरीका के उत्तरी-पूर्वी हिस्से से आए हैं। जाहिर है कि वहां ये दुनिया के किसी हिस्से से आए होंगे। डेंगू आ गया है। इसके चार अलग-अलग रूप हैं। इनमें से दो या अधिक के मेल से डेंगू हेमोरहैजिक बुखार जैसी जटिल बीमारियां हो जाती हैं।
मैं अपने देश की ओर से आपको बताना चाहता हूं कि हमने अपनी खेती, यहां तक कि अपनी आबादी पर हमले के लिए बैक्टीरिया और वायरस के प्रयोग को सहा है। इसमें जरा सी भी अतिशयोक्ति नहीं है। हम कुछ बातों के बारे में जानते हैं और लगभग उन सभी के प्रमाण हमारे पास हैं। इनके बारे में जान लेने के बाद ही हम बोलते हैं ।
तो मैं कह रहा था कि आज दुनिया में संचार के बहुत तरीके हैं। इसलिए हमें जन संचार माध्यमों का शिकार नहीं बनना पड़ता है या उस पर आश्रित नहीं रहना पड़ता है। इंटरनेट नेटवर्क पूरी दुनिया में फैला है। जिन लोगों के कुछ सपने हैं, आकांक्षाएं हैं, ध्येय हैं जो उन्हें कचोटते हैं या जो केवल अपने बारे में नहीं बल्कि अपने बच्चों के बारे में सोचते हैं वे इसके जरिए एक ध्येय में शामिल हो सकते हैं भले ही वे अविकसित देशों में रहते हों या धनी देशों में। समस्याएं भी तो नई-नई आ रही हैं।



9अक्टूबर को चे का स्मृति दिवस- महान क्रांतिकारी चेग्वारा की विरासत -4- फिदेल कास्त्रो

    हम शिक्षा के बारे में यूनेस्को के अध्ययन से संबंधित आंकड़ों को दे रहे थे। हमने पाया कि हमारे देश में ग्रामर स्कूलों की चौथी और पांचवीं कक्षा के छात्रों का भाषा और गणित ज्ञान लैटिन अमरीका के शेष देशों के इस उम्र के बच्चों के ज्ञान से दुगुना है। लैटिन अमरीका ही नहीं बल्कि अमरीका से भी अधिक है ।
मैं ऐसे देश में बोल रहा हूं जहां शिक्षा और संस्कृति का स्तर बहुत ऊंचा है। मैं अर्जेंटीना के लोगों और उनके ज्ञान के विषय में जानता हूं। आज हमारे देश का स्तर बहुत ऊँचा है लकिन अर्जेंटीना उन चार या पांच देशों में से है जो कि हमारे स्तर के नजदीक हैं। लेकिन हमें इस बात से बहुत खुशी हुई कि भाषा और गणित पर हमारे ग्रामर स्कूलों के छात्रों का अधिकार दुनिया के सर्वाधिक विकसित देशों के मुकाबले कहीं अधिक अच्छा है।
इस प्रकार हमारे देश की यह स्थिति है।
    हमारे देश में जीवन के पहले वर्ष शिशु मृत्यु दर प्रति हजार प्रसव 7 से कम है। पिछले साल यह 6.5 थी और उससे पहले साल 6.2 थी। हम इसे और नीचे लाने की कोशिश कर रहे हैं। हम यह भी नहीं जानते कि उष्णकटिबंधी देश में इसे कम किया जा सकता है क्योंकि कई तत्व काम करते हैं। जलवायु का प्रभाव होता है। आनुवंशिक तत्व होते हैं। और भी कई तत्व हैं जैसे कि स्वास्थ्य सुविधा, पोषण आदि। हमें इसे 10 से कम लाने की उम्मीद नहीं थी। इसके इतने नीचे आने से हम बहुत प्रोत्साहित हुए हैं।
सबसे अच्छी दरें केवल राजधानी में नहीं है। पूरे प्रांतों में शिशु मृत्यु दरें पांच से कम है। पूरे देश में न्यूनाधिक ये ही दरें हैं। यहां हमारे उत्तरी पड़ोसी जैसी स्थिति नहीं है। वहां तो जिन इलाकों में लोगों के पास अधिक संसाधन, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और बेहतर पोषक तत्व आदि हैं वहां यह दर चार या पांच है, लेकिन अमरीका की राजधानी सहित जिन इलाकों में बहुत गरीब लोग और अमरीकी अफ्रीकी जैसे प्रजाति समूह रहते हैं, जिन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां यह दर आवश्यक सेवाओं से संपन्न इलाकों के मुकाबले तीन गुना, चार गुना, यहां तक कि पांच गुना अधिक है।
हम हिस्पानिक अमरीकियों, अफ्रीकी अमरीकियों तथा यहां आए दुनिया के दूसरे हिस्सों के लोगों की स्थिति से वाकिफ हैं, उनकी शिशु मृत्यु दरें, उनकी जीवन प्रत्याशा दरें, उनके स्वास्थ्य संकेतक। हम यह भी जानते हैं कि अमरीका में चार करोड़ लोगों का चिकित्सा बीमा नहीं है।
अमरीकी अवाम के प्रति मेरे मन में कोई घृणा नहीं है क्योंकि हमारी क्रांति ने हमें घृणा नहीं सिखाई है। हमारी क्रांति विचारों पर आधारित है कट्टरपन या उग्र राष्ट्रीयता पर नहीं । हमें यह शिक्षा मिली है कि हम सब भाई बहन हैं। हमारे लोगों को दोस्ती और भाईचारे की भावनाओं की शिक्षा मिली है। हमारे विचार से यही अंतर्राष्ट्रीय भावनाएं होनी चाहिए ।
हमारे लाखों क्यूबाई साथी इसी विचारधारा से गुजरे हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि क्रांति को समाप्त करना इतना आसान नहीं है। हमारे लोगों की इच्छाशक्ति को कुचलना इतना आसान नहीं है क्योंकि उसके पीछे विचारों, अवधारणाओं और भावनाओं की ताकत है। विचारों और भावनाओं को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। हमारे हर कर्म के पीछे यही सच्चाई होती है। जिस अवाम ने ज्ञान के कुछ निश्चित स्तर प्राप्त कर लिए हैं, मुद्दों को समझने की एक निश्चित क्षमता अर्जित कर ली है और जिसमें एकता और अनुशासन की क्षमता है उसे धरती से मिटाना इतना आसान नहीं है । यही कारण है कि इन नाजीवादी-फासीवादी सिध्दांतों के बावजूद हमारा यह पक्का विश्वास है कि हमारे देश पर हमले के लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। हमारे लोग कभी आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। वे कभी भी युद्ध के पीछे नहीं हटेंगे । लड़ने में सक्षम एक भी स्त्री या पुरुष जब तक जीवित है वह लड़ता रहेगा।
हम अपने शत्रु के बारे में दशकों से जानते हैं। इसलिए हमारे देश ने अपनी रक्षा करना सी लिया है। हमारा देश दूसरे देशों पर बम नहीं गिराता और न ही शहरों पर बमबारी के लिए हजारों जहाज भेजता है। हमारे पास परमाणु, रासायनिक या जैव हथियार नहीं हैं । हमारे देश के हजारों वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को जीवन बचाने का दर्शन सिखाया गया है । हमारे किसी डॉक्टर या वैज्ञानिक को मानवों की हत्या करने में सक्षम कोई बैक्टीरिया या जीवाणु पैदा करने के लिए कहना उसके संस्कारों के विपरीत होगा।
क्यूबा पर जैव हथियारों के लिए अनुसंधान करने के आरोप लगाए गए। हमारे देश में आनुवंशिक इंजीनियरिंग तकनीकों से उत्पन्न टीकों के जरिए मेनिंजोकोकल मेनिनजाइटिस और हेपाटाइटिस जैसी भयंकर बीमारियों का इलाज करने के लिए अनुसंधान किया जाता है या मोलिक्यूलर प्रतिरक्षा अथवा इलाज के लिए खोज की जाती है। इस तरह की तकनीकी भाषा के प्रयोग के लिए आप मुझे क्षमा करें। इन विधियों से घातक कोशिकाओं पर सीधे-सीधे आघात किया जाता है। कुछ बीमारियों को रोकते हैं और कुछ उनका इलाज करते हैं। हम इस दिशा में प्रगति कर रहे हैं। हमारे डॉक्टरों और अनुसंधान केंद्रों के लिए यह गर्व की बात है।
क्यूबा के हजारों डॉक्टरों ने धरती पर दूरदराज के तथा असत्कारशील स्थानों में अंतर्राष्ट्रीय मिशनों के लिए अपनी सेवाएं दी हैं। मैंने एक बार कहा था कि हमारा देश दुनिया के किसी अंधेरे कोने पर पूर्व हमले नहीं करेगा। इसके विपरीत हमने दुनिया के सबसे अधेरे कोने में सबसे अधिक जरूरी डॉक्टर भेजे हैं । बम नहीं बल्कि डॉक्टर, समझदार हथियार या कहिए अचूक हथियार क्योंकि जो हथियार कपट करके मारता है वह समझदार नहीं हो सकता, बल्कि डॉक्टर ।
जैसा कि आप, यहां मौजूद छात्र दे रहे हैं, मैंने उन मुद्दों पर बात की है जो हमारी क्रांति के लिए गर्व के बड़े स्रोत हैं। कुछ लोग हैं जो यह कहते हैं कि क्यूबा ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अच्छा कार्य किया है,शुक्र है कि कुछ तो माना। वे यह भी मानते हैं कि खेलों का भी अच्छा विकास हुआ है। और मैं जानता हूं कि आप बहुत बड़े खेल प्रेमी हैं और यह 'ओले-ओले' एक खाखेल से जुड़ा है ।जिसके आप ब्राजील के साथ चैंपियन हैं । लेकिन उन्हें शीघ्र ही यह भी कहना होगा कि क्यूबा संस्कृति और कला के क्षेत्र में भी बहुत आगे बढ़ रहा है । और हम कलावादी संस्कृति के पीछे नहीं हैं बल्कि व्यापक सामान्य संस्कृति और ज्ञान को अपना रहे हैं।
अपने देश के बारे में कुछ और छोटी-छोटी बातें मैं आपको बताना चाहता हूं। पिछले तीन सालों में विश्वविद्यालयों की संख्या काफी बढ़ी है।...पहले केवल एक मेडिकल स्कूल हुआ करता था अब 22 मेडिकल स्कूल हैं। इनमें से एक का नाम लैटिन अमरीकन मेडिकल स्कूल है जिसमें लैटिन अमरीका के सब देशों से लगभग 7000 छात्र हैं। बाद में इनकी संख्या बढ़ाकर 10000 कर दी जाएगी (करतल ध्वनि)। हम जानते हैं कि अमरीका में विश्वविद्यालय शिक्षा विशेषकर मेडिकल स्कूल में शिक्षा के लिए एक व्यक्ति को 2 ला डालर अदा करने पड़ते हैं ।
कई साल पहले बने इस स्कूल से जब 10000 छात्र अपनी शिक्षा पूरी कर लेंगे तो केवल इसी क्षेत्र में तीसरी दुनिया के देशों को हमारा योगदान दो अरब डालर के बराबर हो जाएगा। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि कोई देश अच्छे विचारों के मार्ग पर चलता है तो भले ही वह गरीब हो, बहुत चीजों को कर सकता है ।
इस देश की 44 साल से नाकाबंदी चल रही है। समाजवादी खेमा, जो रीद और वाणिज्य के जरिए हमारा प्राथमिक व्यापार साझीदार और आपूर्तिकर्ता था, के पतन हो जाने के बाद साम्राज्यवाद ने अपने आर्थिक उपाय शुरू कर दिए जिन्हें टोरिसेली और हेम्सबर्टन एक्टों द्वारा और कड़ा कर दिया गया ।
इसके अलावा एक और आपराधिक कानून है जिसे हम कातिल क्यूबन एडजस्टमेंट एक्ट कहते हैं। यह दुनिया के केवल एक देश पर लागू होता है और वह है क्यूबा। यदि कोई अपने आपराधिक रिकार्ड या अन्य किसी कारण से वीजा पाने का हकदार नहीं है तो वह यदि किसी नाव को चुराकर या जहाज का अपहरण करके या अन्य किसी माध्यम से अमरीका पहुंच जाता है तो उसे स्वत: ही अमरीका में निवास मिल जाता है और उसे अगले दिन से ही काम करने का प्राधिकार मिल जाता है।यह बात ध्यान से सुनें। मैक्सिको और अमरीका की सीमा पर हर साल 500 आदमी मरते हैं और उनकी मौत बड़ी भयानक होती है। मैक्सिको के साथ एक संधि की गई है या उस पर लादी गई जिसका नाम है नार्थ अमरीकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट या नाफ्टा। इस करार में पूंजी और वस्तुओं की मुक्त आवाजाही की तो अनुमति है लेकिन मानवों की नहीं । इस बीच उन्होंने हमारे देश पर यह एडजस्टमेंट एक्ट लागू कर दिया है। यह कातिल कानून है और हम नहीं चाहते कि यह दूसरों पर लागू हो। लेकिन हम इस बात पर कायम हैं कि जो हरेक किसी पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हैं और क्यूबा पर तो यह आरोप घृणित बदनामी और शर्मनाक तथा हास्यास्पद झूठों के जरिए लगाया जाता है, वे सभी मानवों को यह अधिकार दें। इस सीमा पर सैकड़ों मैक्सिकोवासी और लैटिन अमरीकी मारे जाते हैं। यहां हर साल इतने व्यक्ति मरते हैं जितने बर्लिन की दीवार के 29 साल के अस्तित्व में भी नहीं मरे ।
उन्होंने लाखों बार बर्लिन की दीवार की बात की है लेकिन इस सीमा को पार करने की चेष्टा करने वाले मैक्सिकोवासियों की मौत के बारे में कोई भी समाचार नहीं दिया जाता और दिया भी जाता है तो छिटपुट।
यदि आप लैटिन अमरीकी हैं या एशियन हैं या किसी और देश से हैं और आप गैरकानूनी तरीके से अमरीका पहुंच जाते हैं और आपको वहां ठहरने दिया जाता है तो आपको शरणार्थी या आप्रवासी कहा जाएगा और यदि आप क्यूबाई हैं तो आपको निर्वासित पुकारा जाएगा।

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

9अक्टूबर को चे का स्मृति दिवस- महान क्रांतिकारी चेग्वारा की विरासत -3- फिदेल कास्त्रो

      मैंने पहले कहा कि विचार हथियारों से ज्यादा शक्तिशाली हैं। इसी के साथ मैं यह कहता हूं कि शिक्षा ही वह उपकरण है जिसके जरिए मानव कहे जाने वाले इन जीवों का विकास हुआ है, जो सहज बुध्दि या प्राकृतिक नियमों से नियंत्रित होते हैं। डार्विन ने यही दिखाया है और आज इससे कोई इनकार नहीं करता...मैं विकास के सिद्धांत की बात कर रहा हूं। मुझे वह क्षण याद है जब पोप जॉन पॉल द्वितीय ने कहा था कि विकास का सिद्धांत सृजन के सिद्धांत का विरोधी नहीं है। मैं इस तरह के कथनों की बहुत प्रशंसा करता हूं क्योंकि ये वैज्ञानिक सिद्धांत और धार्मिक विश्वास में परस्पर विरोध पर विराम लगाते हैं। इन मानवों को यदि जंगल में छोड़ दिया जाए तो वे जानवरों की तरह ही रहेंगे। वे बुद्धि संपन्न जीव हैं और हम जानते हैं कि मानव खोपड़ी में क्या है। हम यह भी जानते हैं कि केवल मानव ही ऐसे जीव हैं जिनका मस्तिष्क जन्म के ढाई वर्ष बाद तक विकसित होता रहता है। आप विश्वविद्यालय के छात्र हैं और आपने इस बारे में कहीं पढ़ा होगा। प्रतिभा के विकास में इसका बहुत प्रभाव पड़ता है।
     यदि बच्चों को ढाई साल की उम्र तक सभी पोषक तत्व नहीं दिए गए तो वे जब छह वर्ष की आयु में स्कूल जाएंगे तो वे पर्याप्त पोषक तत्व पाने वाले बच्चों की तुलना में कम बुद्धि के साथ स्कूल जाएंगे । मैं यह कहना चाहता हूं कि यदि हम बराबरी के अधिकार की पैरवी करना चाहते हैं तो हम छह वर्ष की आयु में बच्चे को जन्मजात मानसिक क्षमता के साथ स्कूल भेजने के अधिकार की बात करें। हम जानते हैं कि जिन बच्चों को इस प्रारंभिक उम्र में पोषक तत्व नहीं मिलते और दुनिया में इस तरह के करोड़ों बच्चे हैं जब वे स्कूल जाते हैं, बशर्ते कि स्कूल हों और उन्हें पढ़ाने के लिए सक्षम अध्यापक हों, तो उनके पढ़ने की बहुत कम संभावनाएं होती हैं। हालांकि ऐसे भी मामले हैं जहां इस अवस्था में पर्याप्त पोषक तत्व तो मिलते हैं लेकिन बाद में उनके लिए कोई स्कूल या अध्यापक नहीं होते ।
     लेकिन मूल रूप से तीसरी दुनिया के देशों में बसे दुनिया के अस्सी प्रतिशत मानवों का क्या हश्र होता है। इन्हीं क्षेत्रों में गरीब लोग बसे हैं जो विकसित क्षमता तो दूर जन्मजात क्षमता को भी बचा कर नहीं रख सकते। यहां पर स्कूल भी नहीं है।
     दुनिया में 86 करोड़ बालिग निरक्षर हैं। बालिगों की बात करने के साथ-साथ वे यह भी बताते हैं कि इन 86 करोड़ निरक्षर बालिगों में से 90 प्रतिशत तीसरी दुनिया में रहते हैं। लेकिन अत्यधिक विकसित देशों में भी निरक्षरता है। उत्तर में हमारे महान पड़ोसी देश में लाखों निरक्षर हैं (सीटियां और कोलाहल), पूरी तरह से निरक्षर। साथ ही लाखों व्यावहारिक निरक्षर भी हैं और इसे कोई... (डॉक्टर डॉक्टर की आवाजें) वह क्या है, डॉक्टर, डॉक्टर के बारे में क्या बात है? (उन्हें कुछ बताया जाता है)।
मैंने लाखों की बात की, लेकिन वास्तव में इनकी संख्या करोड़ों में है, विकसित देशों में नहीं, तीसरी दुनिया के देशों में। उन्हें बताया जाता है कि वे श्रोताओं में से किसी के लिए डॉक्टर लाने के वास्ते कह रहे हैं।) यहां डॉक्टर है। किसको चाहिए? उसे जल्दी से बाहर ले जाओ। डॉक्टर उसे अभी देख लेगा। मेरी बात आशा से लंबी हो रही है। तो मैं आपसे आपस में जुड़े दो महत्वपूर्ण मुद्दों की बात कर रहा था। ये हैं शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा। हम एक अर्जेंटीनियाई डॉक्टर के विषय में बात कर रहे हैं जो डॉक्टर बने रहने के साथ-साथ एक सिपाही भी बन गया। उन्हीं से प्रेरित होकर हमने इस ओर ध्यान देना शुरू किया। मैं कह रहा था कि शिक्षा ही छोटे से पशु को मानव बनाती है। यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए। शिक्षा से ही नैसर्गिक वृत्तियों पर काबू पाया जाता है।
       इसके अलावा शिक्षा के द्वारा ही जेलों को खाली किया जा सकता है। इनमें ऐसे ही लोग हैं जिन्हें शिक्षा नहीं मिली और जिनका ठीक से पोषण नहीं हुआ। हमारे अपने देश में हमें काफी समय बाद यह बात समझ में आई कि चाहे कितने भी कानून बना दिए जाएं, कितने ही स्कूल खोल दिए जाएं, कितने ही अध्यापक प्रशिक्षित कर दिए जाएं, मानवों की शिक्षा के मामले में फिर भी बहुत कुछ करना शेष रह जाएगा। हमारे समाज में लाखों विश्वविद्यालय प्रशिक्षित पेशेवर और बुद्धिजीवी हैं।
     परिवार नामक इकाई का प्रभाव निर्णायक होता है।यदि आप जेलों में जाएं और बंदी बनाए गए 20 से 30 वर्ष की आयु के युवाओं से बात करें तो आपको पता चलेगा कि वे आबादी के बहुत गरीब तबके से हैं । वे उन तबकों से होते हैं जिन्हें हम सीमांत तबके कहते हैं। इसके विपरीत यदि आप अत्यधिक प्रतिस्पर्धी स्कूलों, जिनमें कार्य-निष्पादन और ग्रेडों के आधार पर दाखिले होते हैं, के सामाजिक ताने-बाने को देखें तो आपको पता चलेगा कि वहां अधिकांश बच्चे बुद्धिजीवियों या कलाकर्मियों के हैं।
     इस बात पर ध्यान दिया जाए कि मैं आर्थिक दृष्टि से वर्ग विभेद की बात नहीं कर रहा हूं। नए समाज का निर्माण जितना हम सोचते हैं उससे कहीं अधिक मुश्किल होता है क्योंकि इस दिशा में काम करते हुए आपको बहुत सी नई बातें मालूम होती है। यदि आप 30 प्रतिशत निरक्षरता या पूर्ण तथा व्यावहारिक निरक्षरता दोनों को मिलाकर 90 प्रतिशत निरक्षरता दर के खिलाफ संघर्ष शुरू करें तो आपका ध्यान इसी पर रहता है। इसके बाद कुछ वर्ष बीत जाने के बाद जब आप समाज का गहराई से अध्ययन शुरू करते हैं तब आपको शिक्षा के प्रभाव का पता चलता है।
      मैं आपको बताना चाहता हूं कि निर्धन और सीमांत तबकों में परिवार की इकाई जल्दी टूटती है। इसका शिक्षा पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आप देख सकते हैं कि इनमें से 70 प्रतिशत टूटे हुए परिवारों से हैं और 19 प्रतिशत न तो मां और न पिता, बल्कि उन्हें पालने के लिए जिम्मेदार किसी रिश्तेदार के पास रहते हैं। लेकिन जब बुद्धिजीवियों के परिवार में ऐसा होता है तो परिवार के टूटने का बच्चों पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता है। सामान्यत: वे पिता या मां के पास रहते हैं। परंपरा से वे मां के साथ रहते हैं और क्यूबा के कुल प्रशिक्षित कार्मिक बल में 65 प्रतिशत स्त्रियां हैं। वे 65 प्रतिशत से कुछ ज्यादा ही हैं। यह सब शिक्षा का असर नहीं तो और क्या है? दूसरे शब्दों में क्रांति के बाद भी मां और पिता का शैक्षिक स्तर बच्चों के भविष्य को बहुत प्रभावित करता है।
     कुछ परिस्थितियों, जिनमें साधारण तबकों के बच्चे न्यूनतम ज्ञान के साथ रहते हैं, मैं यहां घर की आर्थिक स्थिति की नहीं बल्कि शैक्षिक स्थिति की बात कर रहा हूं जो पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसी ही बनी रहती है, ऐसी परिस्थितियों में वही कहा जा सकता है जो कि हम कभी-कभी कहते हैं : 'अमुक काम करने वाले या अमुक सेवाएं देने वालों के बच्चे किसी कंपनी के प्रेसीडेंट, या प्रबंधक नहीं बनेंगे या वरिष्ठ स्थानों पर नहीं जाएंगे, वे ज्यादातर कैदखानों में ही जाएंगे।'
     हमने इसका तथा कुछ अन्य बातों का अध्ययन किया है लेकिन उस सब में जाने का यह समय नहीं है। मैं यह सब बताने के लिए कह रहा हूं कि शैक्षिक क्रांति, वास्तव में ही गंभीर शैक्षिक क्रांति के बगैर अन्याय और असमानता बनी रहेगी भले ही देश के सभी नागरिकों की भौतिक जरूरतें पूरी हो जाएं ।

हमने अपने देश में सात साल की उम्र तक प्रत्येक बच्चे के लिए प्रतिदिन एक लीटर दूध की गारंटी दी हुई है। इससे बड़े बच्चों को, सीमित संसाधनों के कारण, हम अन्य डेयरी उत्पादों की सप्लाई की गारंटी देते हैं। सौभाग्य से हम ऐसा कर पाते हैं।
     प्रत्येक बच्चे को इतना दूध अमरीकी डॉलर के एक सेंट की कीमत पर दिया जाता है । उत्तर में बैठा कोई व्यक्ति क्यूबा में अपने किसी मित्र को एक डालर भेजकर 104 दिन के लिए दूध मंगा सकता है ।
     हमारे देश की नाकाबंदी ने हमें राशन प्रणाली अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है। इस नाकाबंदी को चलते हुए 44 साल हो गए हैं । लेकिन हमारे देश में एक भी बच्चा बगैर स्कूल के नहीं मिलेगा, एक भी बच्चा ।
     हमारे देश में किसी प्रकार की मानसिक अपंगता के साथ जो बच्चे पैदा होते हैं उनके बारे में हम गहराई से अध्ययन कर रहे हैं। मामूली, कम, ज्यादा या गंभीर रूप से मंदबुद्धि होने, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, के कारणों का हम पता लगा रहे हैं। सौभाग्य से मामूली या कम मंदबुद्धि होने के मामले ही अधिक हैं। हर मामले को दर्ज किया जाता है। केवल बच्चे ही नहीं बल्कि 140,000 से थोड़े अधिक मंद बुद्धि लोग हैं। ऐसे सभी बच्चों का पंजीकरण किया जाता है जो किसी भी रूप में भौतिक या मानसिक रूप से अपंग हैं या नेत्रहीन या गूंगे और बहरे हैं या एक साथ नेत्रहीन, गूंगे और बहरे हैं। और भी कई तरह की मानव त्रासदियां हैं जिनका अध्ययन और जिन पर अनुसंधान किया जाना चाहिए। शुरू में हमें इनके बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं था। वर्षों तक शिक्षा के लिए संघर्ष और व्यवहार के बाद हमें धीरे-धीरे उनके बारे में पता चला। इनके लिए विशेष स्कूल हैं। इन विशेष शिक्षा स्कूलों में 55000 बच्चे दाखिल हैं। हमने बता दिया है कि इन विशेष स्कूलों में बच्चे का छठी से नौवीं कक्षा तक दाखिला रहना ही काफी नहीं है। जो बच्चे सीनियर हाई स्कूल में 12 कक्षा तक या व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए तकनीकी स्कूलों में नहीं जा सकते उन्हें नौवीं कक्षा पूरी कराई जानी चाहिए भले ही उनको एक या दो साल अधिक लग जाएं। वे जो काम कर सकते हैं उसके लिए उन्हें तैयार किया जाना चाहिए तथा उन्हें कोई काम दिया जाना चाहिए । हमें इस तरह की समस्याओं से ग्रस्त बच्चों को कम करके नहीं आंकना चाहिए। उनमें बहुत से काम करने की योग्यता होती है। हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते। इस तरह की अपंगता वाले बच्चों को जो पढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन केवल पढ़ाकर हम अपना काम खत्म नहीं समझ सकते। चाहे जैसी अपंगता हो, उनका ध्यान रखा जाता है। हमें इस बात पर संतोष है कि 44 सालों की नाकाबंदी के बावजूद क्यूबा में एक भी बच्चा ऐसा नहीं है जिसे विशेष स्कूल की जरूरत हो और जिसे इस तरह का स्कूल उपलब्ध नहीं हो ।
     मैं एक बात कहना चाहता हूं कि इसे हमारा घमंड नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि जब भी मैं शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा की बात करता हूं तो मुझे नई संभावनाओं के विषय में जानकर शर्म आती है कि हमें इनके बारे में पहले पता क्यों नहीं चला। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि क्यूबा अपनी सफलताओं की डींग मारता है। कुछ ऐसी बातें हैं जिनकी हमें भी जानकारी नहीं थी।

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

समाजवादी क्यूबा के प्रेरणाप्रद अनुभव- 2-




     भू.पू.सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में समाजवाद के पराभव के बाद सारी दुनिया में कम्युनिस्टों के प्रति संशय और अविश्वास में इजाफा हुआ है। कम्युनिस्टों की भावनाओं को गहरा धक्का लगा है। इस धक्के और संशय को तोड़ने का काम लैटिन अमेरिका के क्रांतिकारियों ने किया है। हम सबके ऊपर शीतयुद्धकालीन समाजवाद का इतना गहरा असर रहा है कि हमने कभी सोवियत संघ से अलग हटकर समाजवाद के बारे में सोचा ही नहीं।
     लैटिन अमेरिका के मार्क्सवादियों ने क्रांति के देशी मॉडल बनाए हैं और समाजवाद के पराभव के युग में भी मार्क्सवाद के देशी प्रयोग किए हैं। क्रांति का वरनाकुलर मॉडल बनाया है। क्यूबा के अनुभव उसका ही हिस्सा हैं। देशी मार्क्सवाद के निर्माण में लैटिन अमेरिका ने लैटिन अमेरिका को रास्ता दिखाया है। नव्य-उदारतावाद की आंधी में जब समाजवाद का पराभव हो रहा था ऐसे में लैटिन अमेरिका में समाजवाद के विचारों की सार्थकता को सिद्ध किया है। इस संदर्भ में देखें तो क्यूबा की शिक्षा के अनुभव हमारे काम के हैं। 
    ये अनुभव क्यूबा का वर्तमान भी हैं। फिदेल कास्त्रो ने कहा ''अब तक जो कुछ कहा गया है, उसका मतलब यह है कि क्यूबा, जहां आप आठवीं बार मिल रहेहैं, में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति आ रही है। यह 44 वर्ष से चल रही घेराबंदी, राजनीतिक और आर्थिक युध्द विशेषकर समाजवादी जगत तथा सोवियत संघ के टूट जाने के बाद 10 वर्षों के दौरान स्थिति से निपटने की आवश्यकता का परिणाम है।''
''पिछले तीन वर्षों में जीवन हमें विचारों की महान लड़ाई के बीच ले आया है। हम अपने कार्यों तथा अपने ऐतिहासिक ध्येयों की आत्मतुष्टि के साथ नहीं बल्कि आलोचनात्मक समीक्षा करते हैं।नई ऊंची चुनौतियां हैं तथा एक महत्वपूर्ण सबक भी। इस समय हम ऐसे कार्यक्रम चला रहे हैं जिनके बारे में में युवा क्रांतिकारियों के रूप में हमने उस समय सपने में भी नहीं सोचा था जब हमने मोनकाडा गैरिसन पर हमला किया था, ग्रानमा केबिन क्रूजर उतरे थे तथा 25 महीने के युध्द के बाद 1959 में विजय हासिल की थी। ''
''हममें से जो बच गए उनका कई वर्षों तक जीवित रहना तथा वह अनुभव संचित करना कोई योग्यता नहीं है। यह तो सौभाग्य है जिसमें संयोग ने बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। अभी जो समय बीता है उसमें दुनिया, उसकी जटिलता और समस्याएं काफी बदल गई हैं। वे अधिक गंभीर हो गई हैं। नए और अकल्पनीय शिल्प विज्ञान विकसित हो गए हैं। यह सही है कि एक वर्ष के भीतर निरक्षरता का पूरी तरह से उन्मूलन बहुत बड़ा काम था। निरक्षरता बने रहने पर यह सब काम करने में काफी देर लगती। लेकिन अब हमारे पास मानवीय और नैतिक पूंजी है, एक महान अंतर्राष्ट्रीयवादी भावना तथा उदात्त राजनीतिक संस्कृति है। इसलिए अब इतिहास, अर्थशास्त्र, मानविकी और विज्ञान के बुनियादी ज्ञान सहित शिक्षा और संस्कृति संबंधी कोई भी ध्येय, कलात्मक तथा राजनीतिक दोनों, हमारी पहुंच के बाहर नहीं हैं।"
"मैंने जिस शैक्षिक क्रांति का जिक्र किया है उसे ये ठोस शब्द संश्लिष्ट रूप में पेश कर देते हैं।
ज्ञान और संस्कृति के संचार के आश्चर्यजनक साधनों को देखते हुए मैंने अपने बच्चों, अपने किशोरों, अपने युवा छात्रों को प्रदत्त ज्ञान में स्थिति के अनुसार तीन गुनी, चार गुनी यहां तक पांच गुनी वृध्दि की बात कही है।
हमारी शिक्षा में भावी परिवर्तनों के उल्लेखनीय राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय अर्थ होंगे। मेरे विचार से यह बहुत बड़ा पहलू है जिसके बारे में मैं इस कांग्रेस में आपको बता सकता हूं।
आज हमारी जाति द्वारा अपने अस्तित्व की लड़ाई में विचार अनिवार्य उपकरण हैं। विचार शिक्षा से पैदा होते हैं। नैतिक मूल्यों सहित बुनियादी मूल्य इसी तरह से बोए जाते हैं। शिक्षा क्लासरूम से शुरू नहीं होती बल्कि बच्चे के जन्म के क्षण से ही शुरू हो जाती है। सबसे पहले सच्ची शिक्षा की माता-पिताओं को जरूरत है, विशेष रूप से मांओं को जो बच्चों को इस दुनिया में लाती हैं।माताओं-पिताओं तथा वयस्कों के लिए यह समझना अनिवार्य है कि बच्चों के साथ क्या किया जाए और क्या नहीं। इसके अंतर्गत आवाज के लहजे से लेकर अन्य तमाम बातों को ध्यान में रखा जाए क्योंकि इससे बच्चे के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत असर पड़ता है। उनके खिलाने-पिलाने पर पूरा ध्यान दिया जाए क्योंकि यह उनके जीवन के पहले दो या तीन वर्षों में उनकी बौध्दिक क्षमता के विकास की दृष्टि से बहुत महत्वूपर्ण है। अन्यथा वे जन्म के समय संभावित मानसिक क्षमता से कम क्षमता के साथ शिशु कक्षा में जाएंगे। यह सब गैर औपचारिक शिक्षा से ताल्लुक रखता है। यह निर्णायक व्यवस्था माता के सहजबोध जैसे असाधारण प्राकृतिक तत्व पर निर्भर होगी।साफ शब्दों में कहें तो शिक्षा ऐसा उपकरण है जो जीव सुलभ स्वाभाविक वृत्तियों के साथ जन्मे बच्चे को मानव में बदलता है। मानव समाज में समानता, न्याय, स्वतंत्रता तथा अन्य विचार अपेक्षाकृत नए हैं। हजारों वर्षों तक दासता, शोषण, क्रूरतम विषमताओं तथा तरह-तरह की बुराइयों और अपराधों का आधिपत्य रहा। दुनिया के अधिकांश देशों में ये अभी भी किसी न किसी रूप में मौजूद हैं।"
"लाखों शिक्षाविदों और सामाजिक नेताओं ने घोषणा की है कि 'बेहतर दुनिया संभव है।' यह बेहतर दुनिया कई तत्वों पर आधारित है। लेकिन शिक्षा के बगैर उसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। मानव समाज की क्रूरतम तकलीफ नस्ली भेदभाव है। मैंने जानबूझकर इसका उल्लेख किया है। इसके कारण बाद में स्पष्ट होंगे। अफ्रीका से उखड़े स्त्री-पुरुषों पर क्यूबा सहित इस गोलार्ध के कई देशों में शताब्दियों तक खून खराबे और बंदूक के जोर पर दासता लादी जाती रही। लाखों मूल इंडियनों को भी यह सब सहना पड़ा।"
विज्ञान ने निर्विवाद रूप से दरशा दिया है कि मानवों में समानता है, लेकिन भेदभाव चल रहा है। क्यूबा जैसे समाजों, जो बुनियादी सामाजिक क्रांतियों से उभर कर सामने आए हैं, जहां लोगों को पूरी कानूनी बराबरी मिल गई है और शिक्षा का एक क्रांतिकारी स्तर प्राप्त कर लिया गया है जिससे भेदभाव का आत्मगत तत्व दूर हो जाता है, इन समाजों में भी यह भेदभाव किसी न किसी रूप में चल रहा है। मैं इसे वस्तुपरक भेदभाव कहूंगा। यह तत्व गरीबी तथा ज्ञान पर ऐतिहासिक एकाधिकार से जुड़ा है।
अपनी विशेषताओं के कारण वस्तुपरक भेदभाव अश्वेतों, मिश्रित प्रजाति के लोगों और श्वेतों को प्रभावित करता है; अर्थात उन लागों को जो ऐतिहासिक तौर पर सबसे अधिक गरीब और आबादी के सीमांत हिस्से रहे हैं। हालांकि हमारे देश से दास प्रथा का 117 साल पहले औपचारिक रूप से उन्मूलन कर दिया गया था लेकिन इस प्रथा के शिकार लोग पर उसके बाद भी 75 वर्षों तक (क्रांति की जीत तक) गांवों और शहरों में झोंपड़ियों में जाहिर तौर पर मुक्त मजदूरों के रूप में जीते रहे। यहां बड़े परिवार बगैर किसी स्कूल या अध्यापक तथा बहुत कम आय वाले काम करके एक कमरे में सिमटे रहते थे। गांवों से शहरों में आए बहुत से श्वेत गरीब परिवारों की भी यही दशा थी।
सबसे दु:खद बात यह है कि किस प्रकार ज्ञान के अभाव से उत्पन्न गरीबी खुद गरीबी पैदा करती है। कुछ बेहतर जीवन और कार्य स्थितियों में रहने वाले तथा साधारण पृष्ठभूमि वाले लोगों ने क्रांति द्वारा उत्पन्न अध्ययन संभावनाओं का लाभ उठाया। इनमें से ढेर सारे विश्वविद्यालय स्नातक हैं। वे शिक्षा के कारण सुधरी सामाजिक स्थितियों से बेहतर स्थितियां पैदा कर रहे हैं।
हमने अपने समाज में इस हद तक बुनियादी परिवर्तन कर दिए हैं कि स्त्रियां, अब समाज का निर्णायक और सम्मानजनक हिस्सा बन गई हैं, जिनका पहले भयंकर शोषण होता था और जिनके लिए केवल अपमानजक कार्य बचे थे। वे देश के तकनीकी और वैज्ञानिक बल के 65 फीसदी के बराबर हैं । यह किसी नस्ली मूल के सभी नागरिकों द्वारा अर्जित अधिकारों से कहीं अधिक है। लेकिन मैं बड़े साफ शब्दों में कहना चाहता हूं कि क्रांति देश की अश्वेत जनसंख्या के सामाजिक और आर्थिक स्तर में विषमता को दूर नहीं कर पाई है हालांकि शिक्षा और स्वास्थ्य सहित कई अत्यधिक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उनकी अहम भूमिका है।"
"संपूर्ण न्याय और बहुत अधिक मानवीय समाज की तलाश के दौरान हमने एक ऐसी बात देखी है जो सामाजिक नियम लगती है। वह यह कि ज्ञान और संस्कृति तथा अपराध में उलटा समानुपातिक संबंध है।इस बात में और गहराई तक जाए बगैर यह देखा जा सकता है कि आबादी के जो तबके हमारे शहरी समुदाय के सीमांत पड़ोस में रहते हैं और जिनके पास कम ज्ञान और संस्कृति है उनके युवक ही अधिकांश कैदी हैं। उनका प्रजाति मूल चाहे जो हो। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दुनिया के सबसे अधिक न्यायपूर्ण और समतावादी समाज में भी कुछ वर्ग सर्वोत्तम शिक्षा संस्थानों में सर्वाधिक अच्छे स्थान पाते हैं। ये स्थान व्यक्तिगत विवरण और परीक्षाओं के जरिए पाए जाते हैं जहां परिवार द्वारा अर्जित ज्ञान का प्रभाव देखा जा सकता है। इन्हें ही बाद में महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व मिलते हैं। लेकिन कम ज्ञान वाले अन्य दूसरे तबकों के बच्चे ऊपर बताए गए कारणों से कम मांग वाले और कम आकर्षक स्कूलों में चले जाते हैं। इनमें से अधिकांश इंटरमीडिएट स्तर पर पढ़ाई छोड़ देते हैं, विश्वविद्यालयों में कम स्थान ग्रहण कर पाते हैं तथा सामान्य अपराध करने वाले कैदी युवकों की जमात में शामिल हो जाते हैं।"
"इसके अतिरिक्त इस समूह के बच्चे टूटे हुए परिवारों से आते हैं और अपनी मां या पिता के साथ रहते हैं या अकेले रहते हैं। टूटा हुआ परिवार यदि विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त या उच्च शिक्षा प्राप्त माताओं और पिताओं का है तो बच्चों की दुर्दशा इस हद तक नही होती। शिक्षा बराबरी, कल्याण और सामाजिक न्याय लाने का उत्कृष्ट उपकरण है। यही कारण है कि गंभीर क्रांति जैसे ऊंचे उद्देश्यों की तलाश में लगी मौजूदा क्यूबाई शिक्षा के बारे में मैंने यह सब कहा है। इस गंभीर क्रांति का मतलब समाज का पूरी तरह से रूपांतरण है जिसका एक सुफल सभी नागरिकों को उपलब्ध एकीकृत संस्कृति के रूप में होगा। इन ध्येयों से जुड़े 100 से अधिक कार्यक्रम हैं जो विचारों की लड़ाई के साथ चलाए जाएंगे। इनमें से कुछ तो पूरी आशा के साथ साकार होने शुरू हो गए हैं।"
"हमारे लोगों का भविष्य ज्ञान और संस्कृति पर आधारित होगा। इस समय दुनिया में आए जबर्दस्त आर्थिक संकट के बीच हमारा देश शिक्षा से जुड़े विभिन्न लक्ष्यों की ओर आगे बढ़ रहा है। तीन प्रतिशत से कम बेकारी के लक्ष्य तक हम लगभग पहुंच चुके हैं। तकनीकी तौर पर हम पूर्ण रोजगार वाला देश बन गए हैं। 17 से 30 वर्ष की आयु वाले 1 लाख युवा जो कि न तो पढ़ते थे और न काम करते थे, अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए पूरे उत्साह के साथ पाठयक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं जिसके लिए उन्हें पारितोषिक मिलता है। संभवत: हाल ही में लिया गया सबसे अधिक निर्भीक निर्णय अध्ययन को रोजगार में बदलने का है। इस सिध्दांत के आधार पर कम सक्षम 70 चीनी मिलों को बंद कर दिया गया है क्योंकि उन पर दुर्लभ मुद्रा लागत उनसे होने वाली आय से अधिक थी।"
"कंप्यूटर शिक्षा शिशु कक्षा से शुरू हो जाती है। दृश्य-श्रव्य सहायक सामग्री का व्यापक रूप से प्रयोग होता है। इस सहायक सामग्री को इस्तेमाल करने के लिए बहुत कम कीमत पर सौर ऊर्जा की व्यवस्था की गई है जो बगैर बिजली वाले गांवों के सभी स्कूलों को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
नए शिक्षा टी वी चैनल विकसित किए जा रहे हैं। इनके जरिए यूनिवर्सिटी फॉर ऑल कार्यक्रम स्कूलों के लिए अध्ययन सामग्री के साथ-साथ भाषा तथा अन्य विषयों की शिक्षा दे रहा है।
वार्षिक पुस्तक मेले अब द्वीप के बड़े शहरों में 30 स्थानों पर लगाए जाते हैं। कलाओं में जबर्दस्त काम हो रहा है। 12000 के आसपास युवा कठोर चयन प्रक्रिया के बाद 15 कला शिक्षक प्रशिक्षण केंद्रों में अध्ययन कर रहे हैं। हजारों सामाजिक कार्यकर्ता हर साल स्नातक बन रहे हैं। मैंने कुछेक कार्यक्रमों के ही उदाहरण दिए हैं। लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि उच्च शिक्षा केवल विश्वविद्यालयों पर आधारित नहीं रह गई है। पूरे देश में नगर स्तर पर युवाओं और कर्मचारियों के लिए कॉलेज स्थापित किए जा रहे हैं ताकि उन्हें शिक्षा के लिए बड़े शहरों में न जाना पड़े। उच्च शिक्षा की पुरानी अवधारणाएं अपने आप खत्म हो गई हैं। काफी प्रभावशाली ढंग से नए विचार लाए जा रहे हैं और नई पहल की जा रही है। मुझे नहीं मालूम कि इस कांग्रेस के दौरान आपको क्या बताया गया है क्योंकि मैं काम के बहुत ज्यादा दबाव तथा अन्य क्षेत्रों में टाली न जा सकने वाली व्यस्तता के कारण इसमें भाग नहीं ले सका। फिर भी मैंने आयोजकों द्वारा आपकी ओर से आमंत्रित किए जाने पर दिमाग में एक सूची बनाई तथा जल्दी से ये पंक्तियां लिख डालीं। इसकी वजह से आप घंटों लंबा भाषण सुनने से बच गए । शिक्षा के प्रति उत्साह और प्यार के कारण मैं लंबा भाषण तैयार करता।"
"पहले मैंने कहा था कि मानवता को बचाने के लिए विचार सर्वाधिक महत्वपूर्ण संसाधन हैं। ऐसा मैं आदर्शवादी विश्वास के कारण नहीं कह रहा था कि विचार अपने आप कोई चमत्कार कर देते हैं। वे संकट कालों में एक आवश्यकता के रूप में बढ़ते और फैलते हैं और बसंत या शीतकाल के आगमन की सूचना देने वाले पक्षियों की तरह संकट कालों से पहले आते हैं। दुनिया बहुत बड़े तथा अभूतपूर्व संकट में धीरे-धीरे डूब रही है। मानवता के लिए सबसे पवित्र कार्य अर्थात शिक्षा के लिए संसाधन उपलब्ध न कराने पर आप जो रोष व्यक्त करते हैं तथा और स्पष्टता के साथ कर रहे हैं, उसके लिए भी पुरस्कार, प्रकाश और आशा के क्षण आएंगे। इसलिए आप दिल छोटा न करें और मैंने पहले जो कहा उसे न भूलें : 'एक बेहतर दुनिया संभव हैं।' मैं सपने देखकर जिया हूं और मैंने बहुत बार अकल्पनीय सपनों को वास्तविकता में तब्दील होते हुए देखा है। इसलिए यह सब होकर रहेगा।"


                   





























बुधवार, 8 सितंबर 2010

समाजवादी क्यूबा के प्रेरणाप्रद अनुभव -1-

    अभी दो दिन पहले शिक्षक दिवस था और उसके मौके पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने क्या कहा शायद ही किसी को याद होगा। वे ऐसे शिक्षक हैं जिसने भारत के गरीबों के भाग्य बदलने के लिए कुछ भी नहीं किया। शिक्षक दिवस पर हमारे प्रधानमंत्री के पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था क्योंकि उनके शासनकाल में शिक्षा की स्थिति में और भी गिरावट आई है। गुण और मात्रा दोनों ही दृष्टियों से भारत का स्थान विश्व में काफी नीचे है।
       इन दिनों जो लोग समाजवाद को गाली देते हैं। मार्क्सवाद को निरर्थक साबित करने में लगे हैं और अमेरिका के पदचिह्नों का अनुकरण करते हुए भारत में शिक्षा को विदेशी विश्वविद्यालयों के हाथों सौंप देना चाहते हैं । उन्हें नव्य उदार शिक्षा नीति से बेहतर कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा ऐसे लोगों के लिए समाजवादी क्यूबा से सीखना चाहिए। जो लोग मार्क्सवाद की असफलता का अहर्निश राग अलापते रहते हैं और मार्क्सवाद के ऊपर कीचड़ उछालने के लिए मिथ्या प्रचार करते रहते हैं उन्हें क्यूबा की शिक्षा क्षेत्र की उपलब्धियों पर गौर करना चाहिए। क्यूबा की सच्चाई को हम फिदेल कास्त्रो के नजरिए से देखें तो कुछ नई चीजों पर भी रोशनी पड़ेगी।
      फिदेल कास्त्रो ने लिखा है कि ‘‘मेरा हमेशा से विश्वास रहा है कि शिक्षा श्रेष्ठ और मानवीय कार्य है जिसमें लोगों को अपना जीवन लगाना चाहिए। इसके बगैर न विज्ञान होगा, न कला और न साहित्य; न उत्पादन होगा और न अर्थव्यवस्था, न स्वास्थ्य होगा और न कल्याण, न अच्छा जीवन होगा और न मनोरंजन तथा आत्म-सम्मान। सामाजिक जागरूकता भी नहीं होगी।’’
‘‘ज्ञान और संस्कृति सुलभ हो जाने मात्र से नैतिक सिध्दांत प्राप्त नहीं हो जाते। लेकिन ज्ञान और संस्कृति के बगैर कोई नीतिशास्त्र तक नहीं पहुंच सकता। इनके बिना किसी तरह की समानता या स्वतंत्रता संभव नहीं है। शिक्षा और संस्कृति के बगैर किसी भी तरह का लोकतंत्र संभव नहीं है। 100 से अधिक साल पहले जोसे मार्ती ने बड़े साफ तौर पर कहा था, 'शिक्षा ही मुक्ति का द्वार है।' ’’
‘‘हमारे मंत्री ने कहा कि क्रांति के समय हमारे देश में 23.6 प्रतिशत साक्षरता थी। मेरा जन्म गांव में हुआ और मैंने बचपन पूरी तरह से ग्रामीण इलाके में बिताया। मुझे उस समय की बहुत सी बातें याद हैं। मैं यहां कह सकता हूं कि वहां 20 प्रतिशत से कम लोग मुश्किल से पढ़-लिख सकते थे। बहुत मुश्किल से बहुत कम बच्चे छठी कक्षा तक पहुंच पाते थे। शहरों में अधिक स्कूल थे। इसलिए वहां निरक्षरों का प्रतिशत कम था।
इस तरह के आंकड़ों का अपेक्षाकृत अधिक मूल्य होता है। क्रांति की जीत के समय कितने बच्चे छठी कक्षा पास थे इस बारे में जांच करने से पता चला कि लगभग सत्तर लाख बाशिंदों में इनकी संख्या चार लाख थी। और वह छठी कक्षा कैसी थी! संक्षिप्त आंकड़े वास्तविकता को प्रकट नहीं करते। यदि सभी निरक्षरों को लिया जाए तो उस समय 90 प्रतिशत से अधिक क्यूबाई छठी कक्षा से आगे नहीं गए थे।’’
‘‘1959 के विश्वविद्यालय स्नातकों के सही आंकड़े मेरे पास नहीं हैं लेकिन इनकी संख्या तीस हजार से अधिक नहीं रही होगी। अपने लोगों को शिक्षा तथा पुनर्प्रशिक्षण और इसकी उच्च गुणवत्ता बनाए रखने की चार दशकों की जद्दोजहद के बाद आज हमारी 1 करोड़ 10 लाख से अधिक की आबादी में ऐसे बहुत कम नागरिक हैं जिन्होंने कम से कम नौवीं कक्षा तक शिक्षा नहीं पाई है। विश्वविद्यालय स्नातक और उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की संख्या 8 लाख है। शिक्षा से जुड़े विभिन्न मानदंडों जैसे कि प्रति व्यक्ति अध्यापक संख्या, प्रति क्लासरूम बच्चों की संख्या तथा प्राथमिक स्कूली बच्चों के गणित और भाषा ज्ञान की दृष्टि से पूरी दुनिया जिसमें अत्यधिक विकसित देश शामिल हैं में क्यूबा का पहला स्थान है। स्कूल में उपस्थिति, पढ़ाई में बने रहने और छठी तथा नौवीं कक्षा पूरी करने वाले बच्चों जैसे मानदंडों की दृष्टि से कोई देश हमसे आगे नहीं है। वास्तव में बहुत कम देश बच्चों, किशोरों और युवकों की शिक्षा तथा सांस्कृतिक प्रशिक्षण पर इतना ध्यान देते हैं।’’
‘‘लेकिन अपनी वर्तमान उपलब्धियों से संतुष्ट होने का मतलब अपने दंभ, उग्र राष्ट्रीयता, आत्म संतोष और धृष्टता का प्रदर्शन होगा। हमारी शिक्षा प्रणाली में अभी भी बहुत कमियां हैं। यह सही है कि आज हमारा एक भी बच्चा सुदूर पहाड़ी क्षेत्र में अकेला बच्चा भी बगैर स्कूल या अध्यापक के नहीं है। भौतिक या मानसिक अक्षमताओं वाला शिक्षा के योग्य एक भी बच्चा या नवयुवक बगैर विशेष स्कूल के नहीं है। यह सही है कि हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों में 20 गुना वृध्दि हुई है, जरूरतमंदों के लिए लाखों बोर्डिंग स्कूल हैं, शिक्षा के लिए निधियां हमेशा उपलब्ध रहती हैं, शिक्षा पर प्राथमिक ध्यान दिया जा रहा है, शिक्षा के क्षेत्र में हमारे पास लाखों प्रोफेसर, अध्यापक और कार्यकर्ता हैं जिनमें से बहुत उत्कृष्ट कोटि के हैं, नि:स्वार्थ, समर्पित तथा मूल्यवान नागरिक हैं फिर भी हम आदर्श शिक्षा प्रणाली कायम नहीं कर पाए हैं।’’
‘‘हमारे प्राथमिक स्कूली छात्र, जिनका पूरा दुनिया में उत्कृष्ट स्थान है, आज के मुकाबले तीन गुना ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं और करेंगे।’’
सब जानते हैं कि माध्यमिक शिक्षा जिसमें सातवीं, आठवीं और नौवीं कक्षाएं आती हैं पूरी दुनिया में घोर संकट का क्षेत्र है। किशोरों की इस नाजुक उम्र में जब उन्हें उत्कृष्ट शिक्षा और अधिकतम ध्यान की जरूरत होती है तो उन्हें कुलीन समाज के जमाने में प्रचलित विचार पढ़ाए जाते हैं। ये विचार उस समय के हैं जब जन शिक्षा के बारे में कोई सोचता भी नहीं था।’’
    ‘‘मैं सत्य का एक मात्र ज्ञाता होने का दावा नहीं करता लेकिन मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि इस समय प्रचलित प्रणाली मूर्खतापूर्ण है। इन कक्षाओं में तथा इस उम्र में अति विशेषज्ञता लाद दी जाती है। 25-30 या उससे अधिक छात्रों के बड़े समूह को अध्यापक देखते हैं। वे विभिन्न समूहों में 200 या उससे अधिक छात्रों को पढ़ाते हैं। वे छात्रों के नाम तक याद नहीं कर सकते, वे उनके परिवार तथा सामाजिक माहौल से वाकिफ नहीं हो सकते, उनके माता-पिताओं से संपर्क नहीं रख सकते, प्रत्येक छात्र की विशेषताओं का ज्ञान नहीं रख सकते तथा उनमें अंतर के अनुसार उनके साथ अलग-अलग तरीके से ध्यान नहीं दे सकते। नकल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और छात्रों का ज्ञान पाठय पुस्तकों में समाविष्ट ज्ञान के 30 फीसदी से आगे नहीं जाता। यहां हम यह मानकर चल रहे हैं कि ये पाठय पुस्तकें पूरी गंभीरता से साथ तैयार की गई हैं। यहां मैं यह कहना चाहता हूं कि परंपरा या आत्मतुष्टि के कारण हम युवाओं के लिए कथित रूप से अद्वितीय अध्यापन व्यवसाय को बढ़ा-चढ़ाकर सम्मान देते हैं। यदि आप 12वीं कक्षा पास विद्यार्थियों से यह पूछें कि भविष्य में अध्यापकों के रूप में वे क्या पढ़ना चाहते हैं तो उनकी इच्छाएं कार्यक्रम की आवश्यकताओं तथा विषयों की साप्ताहिक आवृत्ति से कभी मेल नहीं खाएंगी। इसके फलस्वरूप अध्यापक कभी अपनी इच्छाएं पूरी नहीं कर सके।
प्राथमिक शिक्षा स्तर तक ऐसी स्थिति नहीं है। यहां अध्यापक चौथी कक्षा तक एक ही समूह के साथ रहते हैं तथा पांचवीं और छठी कक्षा में किसी अन्य अध्यापक के साथ विषय बांटते हैं।’’
‘‘सातवीं से नौवीं कक्षा के दरम्यान अचानक तथा पूरा परिवर्तन हो जाता है। प्राथमिक स्कूलों में कोई न कोई हर बच्चे को देख रहा होता है। माध्यमिक शिक्षा में हर कोई हर किसी को देखता है, कोई किसी को विशेष रूप से नहीं देखता।
इस विषय पर खुद अध्यापकों के साथ चर्चा करना आसान नहीं है। विकल्प में रूप में हमने सातवीं, आठवीं और नौवीं के लिए कई विषय पढ़ाने वाले अध्यापक रखने के बारे में सोचा है जो भाषा और शारीरिक शिक्षा के साथ-साथ अन्य विषय पढ़ा सकें तथा प्रति 15 विद्यार्थी एक अध्यापक के अनुपात में उन तीनों साल छात्रों के साथ आगे बढ़ सकें। ’’
‘‘इस विचार की कड़ी जांच की जा रही है। तत्काल बदलाव की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हम हजारों नए अध्यापकों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। ये अध्यापक 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों में से चुने गए हैं। इस समय वे जबर्दस्त उत्साह के साथ इस सघन अभ्यास में जुटे हुए हैं। हमें अभी तक प्राप्त शिक्षा परिणामों से तसल्ली हुई है। उत्साहजनक बात यह भी है कि परंपरागत प्रणाली के अंतर्गत कार्य करने वाले बहुत से अध्यापक दो, तीन या इससे अधिक विषय पढ़ाने और यहां तक कि बहु-विषय अध्यापक के रूप में कार्य करने के लिए भी तैयार हो रहे हैं। इससे इस दिशा में काफी प्रगति हुई है। अधिक पढ़े जाने वाले विषयों में अध्यापकों की कमी दूर हुई है तथा अध्यापन व्यवसाय के प्रति आकर्षण बढ़ा है।’’
‘‘माध्यमिक शिक्षा में दोपहर के भोजन की उचित व्यवस्था के साथ दोहरे सत्र मुस्तैदी के साथ शुरू किए जाएंगे। यह कार्य राजधानी से शुरू किया जाएगा जहां हर चीज अधिक उलझी होती है। 10वीं, 11वीं और 12वीं कक्षा वाले सीनियर हाई स्कूल स्तर पर बुनियादी और तकनीकी दोनों तरह की शिक्षा के लिए कार्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। छात्रों की ओर विशेष ध्यान दिए जाने की योजना के अंतर्गत विशेषज्ञ अध्यापक रखे जाएंगे। किसी को इस बात का डर नहीं है कि इन योजनाओं के कारण अध्यापकों की संख्या कम हो जाएगी तथा माध्यमिक शिक्षा में इस समय कार्य कर रहे अध्यापक फालतू हो जाएंगे। इसके विपरीत हर स्तर पर अध्यापकों की संख्या बढ़ेगी और यदि आवश्यक हुआ तो एक रिजर्व तैयार किया जाएगा ताकि अध्यापन निकाय में लगातार प्रशिक्षण चलता रहे। मैंने इस मुद्दे पर बहुत समय दिया है क्योंकि उच्चतम जोखिम के इस युग में यह बहुत महत्वपूर्ण है। एक देश, जिसमें 100 प्रतिशत छात्र इस शैक्षिक स्तर से गुजरते हैं, में सब बच्चों को इस जोखिम से गुजरना होगा। इस तरह से हम अध्ययन को पांच गुना बढ़ाने की आशा करते हैं।’’


 ( नवउदारवाद का फासीवादी चेहरा,फिदेल कास्त्रो,अनुवाद,रामकिशन गुप्ता,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली-110092,फोन-22025140,65179059 से साभार)






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