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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

सत्यजित राय के सपनों का अंत


            
 पश्चिम बंगाल में विलक्षण फिनोमिना देखने में आया है। यहां पर नेता एक-दूसरे की नकल में व्यस्त हैं। राजनीति में नकल सबसे बुरी छवि बनाती है। राजनेता का अनुकरणीयभाव कभी नए की सृष्टि नहीं करता। बुरी नीतियों का तबाही मचा सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस पार्टी (माकपा) से सबसे ज्यादा नफरत करती हैं व्यवहार में उसी पार्टी की गलत नीतियों का इन दिनों अनुसरण कर रही हैं। हाल ही में राज्य सरकार संचालित फिल्म लेबोरेटरी रूयायन को बंद किए जाने का ममता सरकार ने मन बना लिया है। रूपायन लेबोरेटरी का स्टूडियो  सॉल्टलेक सेक्टर -5 में है और इस स्टूडियो के पास अपना बहुत बड़ा फिल्मी जखीरा है। यह राज्य में फिल्म संपादन की एकमात्र लेबोरेटरी है। सॉल्टलेक में इसके पास 2.5 एकड़ जमीन है जिसमें एक एकड़ में लेबोरेटरी है और बाकी जमीन का अन्य कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस लेबोरेटरी में फिल्म संपादन की तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं और तकनीक उपलब्ध है लेकिन पेशेवर लोग नहीं हैं।
     इनदिनों इस लैब में बंगाली फिल्मकार अपनी फिल्मों का संपादन कम करते हैं,ज्यादातर फिल्मकार फिल्म संपादन के लिए चेन्नई जाते हैं.वाममोर्चा शासन के अकुशल प्रबंधन ने इस लेबोरेटरी को कबाड़ बनाया। वामशासन की मंशा थी कि इसे निजीक्षेत्र के हवाले किया जाय।
   ममता सरकार आने के बाद बंगाली फिल्मकार उम्मीद कर रहे थे कि इस लेबोरेटरी को नए सिरे से संगठित किया जाएगा। लेकिन ममता बनर्जी ने भी वही रास्ता पकड़ा जो वाम मोर्चा सरकार ने पकड़ा। 
राज्य सरकार के सूत्रों के अनुसार ममता बनर्जी के निर्देश पर इसे बंद करने का फैसला लिया जा चुका है और इसमें काम रहे सभी 49कर्मचारियों को वीआरएस देने का फैसला ले लिया गया है।
    उल्लेखनीय है कि रूपायन इस राज्य की बेहतरीन फिल्म संपादन लेबोरेटरी है .विगत बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार इस लैब को जीन्यूज को औने-पौने दामों पर बेचने का फैसला लेचुकी थी .लेकिन उस समय यहां के सभी संस्कृतिकर्मियों और फिल्मी हस्तियों के जमकर प्रतिवाद किया। फलतः वाम सरकार को फैसला बदलना पड़ा और इसे बीमार उद्योग घोषित करके पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए नए सिरे संगठित करने का फैसला लिया गया। संयोग की बात है कि जब यह फैसला लिया  गया उसके कुछ महिने बाद ममता बनर्जी की सरकार आ गई और रूयायन को नए सिरे से संगठित करने का फैसला ठंड़े बस्ते में चला गया। दो सप्ताह पहले ममता सरकार को ख्याल आया कि रूपायन लेबोरेटरी को बंद कर दिया जाय।
   रूपायन को समूचे उत्तर-पूर्वी राज्यों में श्रेष्ठतम फिल्म लेबोरेटरी माना जाता है। इसमें बंगाली ,असमिया,संथाली,उड़िया, मणिपुरी,  भोजपुरी,नागपुरी, छत्तीसगढ़ी फिल्मों के संपादन के अलावा बड़े पैमाने पर डबिंग का काम भी होता रहा है। इसके अलावा बंगलादेश की फिल्मों के संपादन के काम में इस लेबोरेटरी की बड़ी भूमिका है।
   आधिकारिक तौर पर रूपायन लेबोरेटरी पश्चिम बंगाल फिल्म विकास निगम के तहत संचालित संगठन है। पश्चिम बंगाल फिल्म विकास निगम की आय में वामशासन काल में ही गिरावट आनी शुरू हो गई थी और इस संगठन पर कर्ज का आर्थिक बोझ बढ़ गया था। नई सरकार ने इस समस्या पर विचार ही नहीं किया और सीधे  लेबोरेटरी बंद करने का फैसला ले लिया है।
  उल्लेखनीय है ममता सरकार आने के बाद संस्कृति के क्षय की जो प्रक्रिया में तेजी आई है। सत्ता ने संस्कृति के संरक्षण के काम को त्याग दिया है।  अब संस्कृति संरक्षण के नाम पर सत्ता के संसाधनों का अपव्यय हो रहा है। जो राज्य संस्कृति संरक्षण के लिए विख्यात खा आज सांस्कृतिक अपव्यय में सर्वोपरि है।  राज्य सरकार की संस्कृति के विकास और नवनिर्माण में कोई दिलचस्पी नहीं है। ममता बनर्जी संस्कृति का जितना गायन कर रही हैं उससे कई गुना ज्यादा बुनियादी क्षति कर रही हैं। वे नई नई योजनाएं घोषित कर रही हैं, शिलान्यास कर रही हैं,मेले-समारोह-उत्सव-जलसे कर रही हैं। इससे यह आभास मिलता है कि ममता की संस्कृति में गहरी दिलचस्पी है लेकिन इसके ठीक विपरीत वे सत्ता में बैठकर इस तरह के फैसले ले रही हैं जिससे पश्चिम बंगाल का सांस्कृतिक और बौद्धिकवैभव क्षतिग्रस्त हो रहा है। रूपायन के बंद करने का फैसला सत्यजित राय के सपनों का अंत है। यह लेबोरेटरी उनके सपने की उपज है।यह वही लेबोरेटरी है जिसमें सत्यजित राय की महान फिल्म पाथेर पांचाली तैयार की गयी।इस लेबोरेटरी के साथ बंगाल के अग्रणी फिल्मकारों की स्मृतियां जुड़ी हैं। यह बिडम्बना है कि एक तरफ मता सरकार राज्य में फिल्म उद्योग को चंगा करने के लिए 20करोड़ रूपये खर्च करके नई फिल्म सिटी बनाने र शाहरूख खान को ब्रॉण्ड एम्बेसडर बनाकर यश कमाना चाहती है वहीं दूसरी एर रूपायन को बंद करने जा रही है। रूपायन के साथ टॉलीबुड की यादें जुड़ी हैं। रूपायन के बंद होने का अर्थ है टॉलीवुड के एक बड़े अध्याय का अवसान।
   उल्लेखनीय है कोलकाता में प्रतिवर्ष 35-40 बंगला फिल्में रिलीज होती हैं और तकरीबन 50 करोड़ रूपये का कारोबार करती हैं। राज्य में 522 सिनेमा पर्दे हैं इनमें मात्र 52 डिजिटल पर्दे हैं।राज्य में फिल्म संस्कृति के विकास के लिए राज्य सरकार को तेजी से सिनेमाघरों के नवीनीकरण के लिए कार्ययोजना बनानी चाहिए। इसके अलावा रूपायन को बंद करने का फैसला वापस लेना चाहिए।    




गुरुवार, 11 अगस्त 2011

माओवाद-ममता -महाश्वेता की दोगली राजनीति


    माओवाद और कारपोरेट मीडिया का रोमैंटिक संबंध है। भारतीय बुर्जुआजी और माओवाद में सतह पर वर्गयुद्ध दिखाई देता है लेकिन व्यवहार में माओवादी संगठन और उनकी विचारधारा बुर्जुआजी की सेवा करते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि माओवादी क्रांतिकारी हैं और क्रांति के बिना नहीं रह सकते , वेमुगालते में हैं। माओवादियों का क्रांति, समाजसुधार और सामाजिक परिवर्तन जैसे कामों से कोई संबंध नहीं है।
    इन दिनों कारपोरेट मीडिया के लिए माओवादी खबर नहीं हैं। माओवादी कहां चले गए ? वे इन दिनों क्या कर रहे हैं ? उनकी गतिविधियों के बारे में विगत विधानसभा चुनावों के पहले खासकर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले इतना फोकस क्यों था ? ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अचानक माओवाद प्रभावित लालगढ़ की खबरें आनी बंद क्यों हो गयीं? क्या पश्चिम बंगाल के माओवाद प्रभावित इलाकों में अमन-चैन लौट आया है ? ये कुछ सवाल हैं जिन पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।
        ममता सरकार आने के बाद माओवादियों ने लालगढ़ इलाके में अपना वर्चस्व पुनःस्थापित कर लिया है।  लालगढ़ इलाके में माओवादियों के खिलाफ सशस्त्रबलों का ऑपरेशन मूलतः ठंडा कर दिया गया है। ममता सरकार ने 100 के करीब राजनीतिक बंदियों को रिहा किया है उसमें कई माओवादी नेता भी हैं। 13 जुलाई को लालगढ़ इलाके में ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद सभा की है और अनेक लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की है। लेकिन इन योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जमीनी स्तर पर कोई काम राज्य सरकार ने आरंभ नहीं किया है।
  दूसरी ओर नए सिरे माओवादियों के संरक्षण में चलने वाली 'पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी' ने लालगढ़ और आसपास के इलाकों में अपना दखल कायम कर लिया है। सभी दलों के काम करने पर अघोषित पाबंदी है। यहां तक तृणमूल काग्रेस का विधायक अपने इलाके में घुस नहीं सकता। माकपा के सैंकड़ों लोग इलाका छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं। लालगढ़ के 12 पुलिसथानों के तहत आने वाले इलाकों और पड़ोसी राज्यों से लगने वाले कोरीडोर पर माओवादियों ने फिर से कब्जा जमा लिया है।
मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने 13जुलाई 2011 को लालगढ़ में जो रैली की थी उसमें उसने एक गलत मिसाल कायम की। 3नवम्बर 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के जिंदल के कारखाने के उद्घाटन के बाद लौटते समय माओवादियों ने जो लैण्डमाइन धमाका किया था उसके बाद पुलिस ने अपराधियों की धरपकड़ के लिए जो छापे मारे थे उनमें पुलिस से कुछ ज्यादतियां भी हुई थीं  । ममता बनर्जी ने अपनी रैली में उस पुलिस छापे में परेशान किए गए लोगों के लिए आर्थिक सहायता राशि की घोषणा की। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री के कार काफिले पर लैण्डमाइन से हमला करने वालों की पुलिस छानबीन करेगी या नहीं ? छानबीन के दौरान जिन लोगों से कसकर पूछताछ की गई है या पुलिस ने परेशान किया है तो क्या उसके लिए राज्य सरकार कम्पसेशन देगी ? क्या मुख्यमंत्री के काफिले पर किया गया हमला माओवादी साजिश नहीं थी ? क्या माओवादियों ने लैण्डमाइन विस्फोट के लिए माफी मांगी ? मुख्यमंत्री के काफिले पर लैण्डमाइन बिछाकर किया गया हमला एक निंदनीय अपराध है और उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
   मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस मीटिंग में एक और महत्वपूर्ण बात कही कि लालगढ़ के लोगों को पुलिस से डरने की जरूरत नहीं है। पुलिस तो उनकी मदद के लिए है। ममता का कम्पशेसन पैकेज और यह घोषणा अपने आपमें माओवादियों के खिलाफ पुलिस और अन्य प्रशासनिक ईकाइयों को संदेश है कि माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन ठंडा करो।
  उल्लेखनीय है जिंदल ग्रुप ने लालगढ़ के सालबनी इलाके में इस्पात का कारखाना लगाने के लिए राज्य वाम मोर्चा सरकार से पांच हजार एकड़ जमीन ली थी। इसमें ज्यादातर बंजर जमीन है। माओवादियों ने इसका विरोध किया था और एक जमाने में ममता बनर्जी ने उनके आंदोलन का समर्थन भी किया था। जिंदल ग्रुप को आदिवासियों की  जमीन दिए जाने पर पश्चिम बंगाल के तमाम रेडीकल कहलाने वाले बुद्धिजीवियों महाश्वेता देवी आदि को भी गंभीर आपत्ति थी। लालगढ़ की समूची समस्या इस प्रकल्प को जमीन दिए जाने के बाद आरंभ हुई और ममता ने विपक्ष में रहते हुए इसे बढ़ावा दिया जिसके कारण अंततः केन्द्र सरकार की मदद से लालगढ़ में राज्य सरकार को 25 हजार से ज्यादा सशस्त्रबल लगाने पड़े।
    मजेदार बात यह है कि ममता बनर्जी सरकार बनने के साथ ही जिंदल के कारखाने के खिलाफ माओवादियों और रेडीकल लेखकों का आंदोलन गायब हो गया है । उलटे ममता सरकार में उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी ने जिंदल ग्रुप के लोगों को बुलाकर बात की है और यह इच्छा व्यक्त की है कि जल्दी ही इस कारखाने के अधूरे कामों को पूरा किया जाए। सवाल यह है  सालबनी इस्पात कारखाने को लेकर ममता सरकार का आज जो नरम रूख है वह विपक्ष में रहते हुए क्यों नहीं था ?
    आज माओवादी चुप हैं ,उनकी चुप्पी संकेत है कि वे चाहते हैं कि कारखाना लगे। इसका अर्थ यह भी है कि वाममोर्चा सरकार का जिंदल के इस्पात कारखाने को लेकर लिया गया फैसला सही था। उस कारखाने को लेकर ममता बनर्जी ,माओवादियों और महाश्वेता देवी लेखकों की आपत्तियां पूर्वाग्रह से प्रेरित थीं। पहले जो अशांति और आतंक के वातावरण की सृष्टि की गई थी वो भी गलत था ।
   सालबनी के जिंदल इस्पात कारखाने को लेकर महश्वेता देवी और अन्य रेडीकल लेखकों का दोगला चरित्र भी सामने आ गया है। वे पहले लालगढ़ में आम लोगों को जिंदल ग्रुप के बारे में भड़का रहे थे,जो बुनियादी रूप से गलत था। अब ये ही लेखक-बुद्धिजीवी ममता सरकार के प्रत्येक कदम का समर्थन कर रहे हैं। चूंकि ममता सरकार जिंदल कारखाने के पक्ष में है तो महाश्वेता देवी और माओवादी भी इसके पक्ष में हैं। सवाल यह है ये ही लोग बुद्धदेव सरकार और वाममोर्चे का लालगढ़-सालबनी में फिर किस बात के लिए विरोध कर रहे थे ?

































शुक्रवार, 24 जून 2011

सिंगूर की लूटलीला, टीवी और अराजक राजनीति



भारत के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री ने जमीन की खरीद-फरोख्त के मामले में ऐसा भद्दा मजाक नहीं किया जैसा पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने सिंगूर के मामले में किया है। टाटा को राज्य सरकार की लीज पर दी गयी जमीन,जिसके 85 प्रतिशत मुआवजे का भुगतान हो गया,टाटा और अन्य का उस पर 3000 हजार करोड़ खर्च हो गया,और उसे एक ही झटके में कानून के बहाने राज्य सरकार ने अवैध ढ़ंग से हस्तगत कर लिया। कलकत्ता उच्चन्यायालय में टाटा की ओर से याचिका दायर की गई है। जिस पर सुनवाई चल रही है। दूसरी ओर राज्य सरकार जिद पर अड़ी है वो अपनी राजनीतिक प्रतिज्ञाओं को अमलीजामा पहनाकर ही दम लेगी। सिंगूर में पहले कारखाना खोले जाने के पहले पंगा,मध्य में पंगा,स्थापना के बाद पंगा,अब बंद कारखाने पर पंगा।
    सिंगूर में चल रहे जमीन और उद्योग के इस अंतहीन पंगे से कई सवाल उठे हैं क्या पश्चिम बंगाल में फिर से औद्योगिक विकास होगा ? क्या अराजक राजनीति का अंत होगा ? परिस्थितियां बता रही हैं कि राज्य में आने वाले समय में जमीन के सवाल पर बड़ी लड़ाईयां होंगी।काफी खून खराबा होगा।
     सिंगूर के नए प्रसंग में पहला सवाल यह है कि राज्य सरकार ने टाटा को लीज पर दी गयी जमीन वापस लेने के पहले टाटा से बात करने की कोशिश क्यों नहीं की ? किसी विकल्प की खोज क्यों नहीं की ? टाटा को राज्य सरकार ने पहले बुलाया था तो सभ्यता का तकाजा है कि ममता सरकार टाटा को बुलाकर कहती कि हम जमीन वापस चाहते हैं ? टाटा ने किसानों की जमीन नहीं ली थी ,यह जमीन राज्य सरकार ने ली थी।  
ममता बनर्जी को 400 एकड़ जमीन वापस लेनी थी ,यह उन किसानों की जमीन है जिन्होंने मुआवजे के चैक नहीं लिए। 400एकड़ की बजाय सारी जमीन को टाटा से क्यों वापस लिया गया ? नैनो कारखाने के लिए 600 एकड़ जमीन काफी थी जैसा ममता कह रही थीं, वे 600 एकड़ छोड़ क्यों नहीं पायीं ? टाटा से पूरी जमीन लेकर ममता सरकार किसकी सेवा करना चाहती हैं ? वे चाहती तो अनिच्छुक किसानों को मुँह मांगा दिला सकती थीं।
ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक सनक में नैनो के बने बनाए कारखाने को चलने नहीं दिया,सरकार बनाने के बाद उसे चालू करने का प्रयास नहीं किया,उलटे टाटा को राज्य सरकार द्वारा दी गई जमीन वापस लेली,टाटा को बगैर कोई मुआवजा दिए।टाटा और उसकी सहयोगी कंपनियों का 3हजार करोड़ रूपया खर्च हो गया।यह राजनीतिक मिलिटेंसी है,जो किसी कानून को नहीं मानती।
सिंगूर में नैनो के कारखाने में 22जून 2011 को जमकर लंपटों ने लूटपाट की है।ममतापंथी स्टार आनंद ,कोलकाता टीवी,न्यूज टाइम आदि बांग्ला चैनलों ने नैनो कारखाने में की गई लूटमार की खबर नहीं दिखाई। जबकि पृष्ठभूमि में लूटमार के फुटेज चल रहे थे। एकमात्र 24घंटा और आकाश चैनल ने यह खबर दी। नेशनल चैनलों पर भी ब्लैकआउट था इस खबर पर। 24 घंटा बाद ममतापंथी चैनल दिखा रहे हैं कि कारखाने में किस तरह की सुरक्षा है। सिंगूर के नैनो कारखाने में जब लूट हो रही थी टीवी चैनल एकदम ब्लैकआउट किए थे। असल में पश्चिम बंगाल में किसी बंद कारखाने को वामशासन में मजदूरों ने नहीं लूटा था। यह बेमिसाल घटना है। कलकता उच्चन्यायालय ने भी सुनवाई के दौरान लूटपाट की घटना को लज्जित करने वाली घटना कहा है।
  



















                      




शनिवार, 15 अगस्त 2009

ममता के स्‍वर में बोल रहे हैं अब्‍दुल रज्‍जाक मुल्‍ला

पश्‍चि‍म बंगाल के भूमि‍ और भूमि‍ सुधार मंत्री इन दि‍नों ममताबनर्जी की भाषा में बोल रहे हैं। ये जनाब अपनी साफगोई के लि‍ए वि‍ख्‍यात हैं जो अच्‍छा लगता है,सही लगता है, वही बोलते हैं, इस चक्‍कर में कई मर्तबा पार्टी लाइन का भी अति‍क्रमण कर चुके हैं। कल मुल्‍ला साहब ने बड़ी ही मजेदार और सही बात कही है । मुल्‍ला साहब ने कहा है पश्‍चि‍म बंगाल की जनता सरकार के प्रकल्‍पों के लि‍ए जमीन के अधि‍ग्रहण के खि‍लाफ नहीं है,वह नि‍जी उद्योगपति‍यों के लि‍ए जमीन अधि‍ग्रहण के खि‍लाफ है। उनका कहना है जनता ने सिंगूर के कारखाने के लि‍ए जमीन अधि‍ग्रहण का वि‍रोध इसलि‍ए कि‍या क्‍योंकि‍ नि‍जी क्षेत्र के लि‍ए वह जमीन ली गयी थी,प्रस्‍तावि‍त बारासात-रायचक मार्ग के नि‍र्माण का जनता इसलि‍ए वि‍रोध कर रही है क्‍योंकि‍ यह रास्‍ता सलीम ग्रुप को तैयार करना है। दोनों ही मामलों में जो वि‍रोध दि‍खाई दे रहा है वह इसलि‍ए कि‍ जनता नहीं चाहती कि‍ उसकी जमीन नि‍जी पूंजीपति‍यों को बेच दी जाए। जनता की जमीन का यदि‍ सरकार अधि‍ग्रहण करती है तो जनता उसका वि‍रोध नहीं कर रही है। इस प्रसंग में मुल्‍ला ने बताया है वि‍गत तीन महीनों में रेल मंत्रालय के लि‍ए रेल नि‍र्माण के लि‍ए 320 एकड़ जमीन अधि‍ग्रहीत की गई है ,यह अधि‍ग्रहण ममता बनर्जी के रेलमंत्री बनने के बाद हुआ है, कहीं पर भी कोई प्रति‍वाद नहीं हुआ। मुल्‍ला का कहना है सिंगूर या बारासात-रायचक प्रकल्‍प यदि‍ सरकार का होता तो जनता कभी वि‍रोध नहीं करती,जनता ने वि‍रोध इसलि‍ए कि‍या क्‍योंकि‍ इन दोनों ही जगहों पर नि‍जी क्षेत्र के प्रकल्‍प लगने थे। बारासात-रायचक के बीच में 100 कि‍लोमीटर का रास्‍ता सलीम ग्रुप को तैयार करना है उसका जनता वि‍रोध कर रही है।
उल्‍लेखनीय है अब्‍दुल रज्‍जाक मुल्‍ला बेहद ईमानदार और साफगोई के साथ बोलने वाले सरल स्‍वभाव के माकपा नेता हैं जो माकपा की असली पहचान रही है,ये जनाब अनेक बार ऐसी बातें भी कह चुके हैं जो पार्टी के राज्‍य और केन्‍द्रीय नेतृत्‍व को रास नहीं आतीं अथवा वे पार्टी लाइन के बाहर होती हैं। अब्‍दुल रज्‍जाक मुल्‍ला जैसे माकपा नेताओं के कारण ही आज यह संभव भी हो पाया है कि‍ पश्‍चि‍म बंगाल सरकार को जमीन अधि‍ग्रहण की अपनी नीति‍ को बुनि‍यादी तौर पर बदलना पड़ा है।
मुल्‍ला साहब शुरू से ही उपजाऊ कृषि‍योग्‍य जमीन के नि‍जी क्षेत्र के कारखाने हेतु अधि‍ग्रहण के खि‍लाफ रहे हैं और यह रवैयया उन्‍होंने तब भी नहीं बदला जब पार्टी के सभी नेता कृषि‍योग्‍य जमीन की कारखाने हेतु खरीददारी को सिंगूर में जायज ठहरा रहे थे। हाल ही में मुल्‍ला साहब ने पश्‍चि‍म बंगाल सरकार की जमीन अधि‍ग्रहण नीति‍ घोषि‍त की है जि‍सके अनुसार अब कम से कम राज्‍य सरकार कि‍सी भी कृषि‍योग्‍य जमीन का अधि‍ग्रहण नहीं कर पाएगी सि‍र्फ अपवाद स्‍वरूप एक फसली जमीन का राज्‍य के प्रकल्‍प के लि‍ए जरूरत पड़ने पर अधि‍ग्रहण हो सकता है,नि‍जी कारखानों अथवा सेज बगैरह के लि‍ए अब उपजाऊ जमीन राज्‍य में नहीं खरीदने दी जाएगी। दूसरी बड़ी घोषणा यह की है कि‍ राज्‍य में नि‍जी क्षेत्र सीधे जमीन खरीद सकेगा। अब राज्‍य सरकार बि‍चौलि‍ए की भूमि‍का नहीं अदा करेगी। गंभीरता के साथ यदि‍ सोचा जाए तो यही सब बातें वि‍गत दो सालों से ममता बनर्जी और तमाम स्‍वयंसेवी संगठन उठाते रहे हैं। अब्‍दुल रज्‍जाक का उपरोक्‍त नीति‍गत बयान और हाल ही में दि‍या गया वक्‍तव्‍य इस बात की पुष्‍टि‍ भी करता है कि‍ माकपा ने अपनी नीति‍यों में जन दबाव में बदलाव लाने शुरू कर दि‍ए हैं। इससे राजनीति‍क लाभ कम मि‍लेगा जनता को लाभ ज्‍यादा मि‍लेगा और यही सबसे महत्‍वपूर्ण चीज है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...