मिस्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मिस्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

मिस्र का जनांदोलन और वाम की हताशा


     काहिरा में जनांदोलन चरम पर है राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक इस्तीफा देकर अज्ञातवास के लिए जा चुके हैं । लेकिन पश्चिम बंगाल में मिस्र की राजनीतिक गरमी पहुँच गयी है। 13 फरवरी को कोलकाता  में वाममोर्चे की विशाल चुनाव रैली के आरंभ में ही माकपा सचिव विमान बसु ने जिस उत्तेजना में मुबारक और बुद्धदेव भट्टाचार्य के शासन की तुलना की आलोचना की और एक बांग्ला दैनिक को गरियाया ,उससे साफ था कि मिस्र के जनांदोलन से माकपा घबड़ाई हुई है। विमान वसु जैसे माकपा के नेताओं की नींद गायब है। जबकि मुख्यमत्री ने मिस्र के जनांदोलन पर कुछ नहीं बोला। यह संकेत है कि माकपा बंटी हुई है मिस्र पर।   
काहिरा के जनांदोलन का संदेश है सर्वसत्तावादी राजनीतिज्ञों के दिन अब खत्म हुए। राज्य में माकपा और वाममोर्चे की कार्यप्रणाली सर्वसत्तावादी है और इसे बड़े सुंदर तर्कों के आधार पर वैध ठहराया जाता है।  सर्वसत्तावादी पद्धति का नमूना है पार्टी निर्देशों पर काम करना। राज्य प्रशासन को माकपा ने जिस तरह पंगु बनाया है ,उसने सभी लोकतांत्रिक लोगों की चिन्ताएं बढ़ा दी हैं। योग्यता,कार्यकुशलता,पेशेवर दक्षता और नियमों आदि को पार्टी आदेश के आधार पर लागू करने की शैली मूलतः सर्वसत्तावादी शैली है, मुबारक की भी यही शैली थी।
   आगामी दिनों में राज्य प्रशासन को इस शैली से चलाने वालों को जनता एकदम चुनने नहीं जा रही। सर्वसत्तावादी शासन पद्धति को भूमंडलीकरण और नव्य उदारनीतियों ने जगह-जगह कमजोर किया है। सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में वाममोर्चे की व्यापक पराजय का प्रधान कारण यही था। पश्चिम बंगाल की जनता अब सर्वसत्तावादी कार्यशैली को वोट देने नहीं जा रही। सतह पर पश्चिम बंगाल में मिस्र को लेकर कोई बड़ी हलचल नहीं है लेकिन मिस्र के जनांदोलन से पश्चिम बंगाल के लोग,खासकर मुसलमान गहरे प्रभावित हैं।  सर्वसत्तावाद लोकतंत्र के माध्यम से भी आ सकता है और बगैर लोकतंत्र के भी आ सकता है। इसलिए वामनेताओं का यह कहना सही नहीं है कि मिस्र और पश्चिम बंगाल में तुलना नहीं की जा सकती। मिस्र और अरब देशों के जनांदोलन का पश्चिम बंगाल की सामयिक राजनीति और अंतर्राष्ट्रीयतावादी चेतना के लिए महत्व है ।
      मिस्र में फौजी तानाशाही के युग का अंत होने वाला है। सरकारी खेमे में भगदड़ मची हुई है और इस भगदड़ में भविष्य में क्या निकलेगा यह कोई नहीं जानता,लेकिन यह तय है मिस्र का भविष्य में वह चेहरा नहीं रहेगा जो अब तक रहा है और यही बात पश्चिम बंगाल के बारे में कही जा सकती है। राज्य में भविष्य में विधानसभा चुनाव के बाद सरकार किसी भी दल की बने लेकिन राज्य का चेहरा बदल जाएगा, माकपा जैसा शक्तिशालीदल भी इस प्रक्रिया में बदलेगा।
  मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का लगातार विभिन्न जिलों में सार्वजनिक सभाओं में भाषण देना, बड़े पैमाने पर टेलीविजन विज्ञापन जारी करना और लगातार विभिन्न समुदाय के लोगों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करना इस बात का संकेत है कि लोकतंत्र का जो दबाब वाममोर्चा विगत 34 साल में महसूस नहीं कर रहा था वह दबाब उसे विगत  एक साल में महसूस हुआ है। जिस तरह की लोकलुभावन घोषणाएं मुख्यमंत्री कर रहे हैं उससे एक बात साफ है कि उनका दल हताश है और ताबड़तोड़ ढ़ंग से जनता का दिल जीतना चाहता है।
   मुख्यमंत्री ने लोकसभा चुनाव के बाद पार्टीलाइन की बजाय निजी विवेक से काम करने का फैसला किया है और इस क्रम में वे लगातार सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह के करीब चले गए हैं। मसलन सोनिया गांधी ने कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को मुंबई के आदर्श सोसायटी घोटाले के बाद कहा था कि मुख्यमंत्री कोटा जैसी केटेगरी को अपने राज्य में खत्म कर दें। लेकिन अभी तक किसी भी कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने यह कोटा खत्म नहीं किया लेकिन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने यह काम कर दिया।
    मुसलमानों की बदहाली पर केन्द्र सरकार द्वारा बनाए कमीशन की रिपोर्ट पर देश में किसी भी राज्य ने ध्यान नहीं दिया लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने मुसलमानों के लिए नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवाद को देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माना और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने तुरंत मान लिया। उल्लेखनीय है प्रधानमत्री मनमोहन सिंह के बोलने के पहले माकपा का कोई नेता माओवाद को देश का सबसे बड़ा खतरा नहीं मानता था। माकपा ने माओवाद के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष पर हमेशा जोर दिया था। लेकिन प्रधानमत्री मनमोहन सिंह ने सशस्त्रबलों की कार्रवाई पर जोर दिया और मुख्यमंत्री ने पार्टी की नीति और राय के खिलाफ जाकर केन्द्र के फैसले का समर्थन किया।  मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पार्टीलाइन के बाहर जाकर माओवादियों के खिलाफ संयुक्त सशस्त्रबलों की साझा कार्रवाई पर सक्रियता दिखाई है। मुख्यमंत्री के रवैय्ये में दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि प्रशासन चलाने के मामले में विमान बसु को हाशिए पर डाल दिया गया है।  इसके कारण अनेक क्षेत्रों और समुदायों लोगों के लिए कल्याणकारी घोषणाएं करने में मुख्यमंत्री सफल रहे हैं। यह इस बात का भी संकेत है कि प्रशासन के मामले में मुख्यमंत्री महत्वपूर्ण है,प्रशासन महत्वपूर्ण है, पार्टी गौण हो गयी है। ये सारे परिवर्तन सन् 2009 के लोकसभा चुनावों में भारी पराजय के बाद उठाए गए हैं। इससे एक संकेत यह मिलता है कि माकपा से राज्यप्रशासन को स्वायत्त बनाने की प्रक्रिया में मुख्यमंत्री को किसी हद तक सफलता मिली है। लेकिन अभी इस दिशा में बुनियादी परिवर्तन करने की जरूरत है। मसलन् 13 फरवरी की विशाल चुनावसभा में मुख्यमंत्री कोई सकारात्मक भावी कार्यक्रम की घोषणा नहीं कर पाए। वाममोर्चे की पहली विशाल चुनावसभा में आगामी चुनाव के लिए कोई नारा नहीं दिया गया । भावी नई वाम सरकार की कोई परिकल्पना और कार्यक्रम भी घोषित नहीं किया गया। मुख्यमंत्री का समूचा भाषण ममता बनर्जी पर केन्द्रित था। ममता बनर्जी पर हमला करने के चक्कर में मुख्यमंत्री यह भूल गए कि उन्हें आगामी चुनाव का प्रधान एजेण्डा बताना है। यह बड़ी चूक है। इसबार वाममोर्चे ने चुनावी नारे और कार्यक्रम के अभाव में चुनाव अभियान की शुरूआत की है। यह अशुभ संकेत है।






रविवार, 20 फ़रवरी 2011

मिस्र में आखिरकार अभी आंदोलन क्यों हुआ ?


              मध्यपूर्व के अरब देशों में प्रतिवाद की आंधी चल रही है। सारे ज्ञानी और विशेषज्ञ परेशान हैं कि आखिरकार यह आंधी कहां से आई ? मिस्र में लोकतंत्र का जो आंदोलन चल रहा है वह इसी समय क्यों सामने आया ?  मिस्र और दूसरे अरब देशों में जनता आज कुर्बानी के लिए आमादा क्यों है ? कुर्बानी और लोकतंत्र का यह जज्बा पहले क्यों नहीं दिखाई दिया ? लोकतंत्र का महानतम लाइव टीवी कवरेज क्यों आया ? इत्यादि सवालों पर हमें गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए।
अरब में लोकतंत्र और सर्वसत्तावादी शासकों के खिलाफ जो आंधी चल रही है उसका बुनियादी कारण है इराक में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सैन्य-राजनीतिक पराजय और उनका वहां से पलायन। आज अमेरिका इस स्थिति में नहीं है कि वह इराक में जीत जाए। इतने व्यापक खून-खराबे और जन-धन की व्यापक हानि के बाबजूद अमेरिकी सेनाएं 2011 के अंत तक इराक से वापस आ जाएंगी ऐसा ओबामा ने कहा है।
     ओबामा के द्वारा इराक से सेना वापसी का कार्यक्रम घोषित करने के बाद से अरब जनता में अमेरिकी वर्चस्व का मिथ टूटा है। यह मिथ भी टूटा है कि मध्यपूर्व को सेना के नियंत्रण में रखा जा सकता है। साम्राज्यवाद और उसके गुर्गे तब तक ही शासन करते हैं जब तक सेना संभालने में सक्षम हो। सैन्य नियंत्रण के बिना साम्राज्यवाद अपना शासन स्थापित नहीं कर पाता। अमेरिकी सेना की वापसी इस बात का संकेत है कि अमेरिकी सेनाएं मध्यपूर्व को संभालने में सक्षम नहीं हैं। यह सैन्य आतंक के अंत की सूचना है और मध्यपूर्व और खासकर मिस्र की जनता ने इस इबारत को सही पढ़ा है।
    सामयिक अरब प्रतिवाद का पहला संदेश है भूमंडलीकरण के आने के साथ जिस अमेरिकी वर्चस्व की स्थापना हुई थी वह वर्चस्व खत्म हो गया है। जिस तरह पोलैण्ड की जनता के प्रतिवाद ने समाजवाद की सत्ता से विदाई कर दी ,समाजवाद में निहित सर्वसत्तावाद को नष्ट कर दिया था और उससे समूचा समाजवादी जगत प्रभावित हुआ था। ठीक वैसे ही भूमंडलीकरण के अमेरिकी वर्चस्व की कब्रगाह अरब मुल्क बने हैं। उल्लेखनीय है सोवियत सेनाओं की अफगानिस्तान से वापसी के बाद समाजवाद बिखरा था। इराक से सेना वापसी से अमेरिका प्रभावित होगा। उसका विश्वव्यापी सैन्यतंत्र प्रभावित होगा। यानी मुस्लिम देशों ने सोवियत संघ और अमेरिका दोनों को प्रभावित और पराजित किया है। सोवियत संघ की अफगानिस्तान से वापसी के साथ समाजवाद गया और इराक से अमेरिकी सेनाओं की वापसी की घोषणा के साथ भूमंडलीकरण -शीतयुद्ध का अंत हुआ है।
   उल्लेखनीय है शीतयुद्ध का प्रधान संघर्ष केन्द्र मध्यपूर्व है। अमेरिकी विश्व राजनीति की यह प्रमुख धुरी है। अरब जनता और अरब देशों की एकता को सबसे पहले मिस्र को साथ मिलाकर अमेरिका-इस्राइल ने तोड़ा था। आज उसी मिस्र के पिट्ठू शासक हुसैनी मुबारक और उनकी चारणमंडली को मिस्र की जनता ने ठुकरा दिया है।
    मिस्र का एक और संदेश है कि अमेरिकी वर्चस्व,सर्वसत्तावाद और सैन्यशासन को लोकतांत्रिक फौलादी एकता के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है।लोकतांत्रिक एकता सर्वसत्तावादी विचारधाराओं और शासकों के लिए मौत की सूचना है।   
    मिस्र में हुसैनी मुबारक ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद अज्ञातवास का निर्णय लिया है। अमेरिका को मालूम है कि मुबारक कहां रह रहे हैं। मिस्र की सेना के बड़े अफसर भी जानते हैं। कायदे से मुबारक के खिलाफ मानवाधिकार हनन के लिए मिस्र की अदालत में मुकदमे चलाए जाने चाहिए। उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए। सद्दाम और मिलोशेविच के लिए जो मानक अमेरिका ने लागू किए थे ,न्याय-अन्याय के वे मानक मुबारक पर भी लागू होते हैं।  मुबारक के खिलाफ असंख्य अपराधों की शिकायत वहां की जनता ने की है और अमेरिकी प्रशासन ने उन्हें इस तरह अज्ञातस्थान पर क्यों जाने दिया ? ओबामा प्रशासन ने अभी तक मुबारक के मानवाधिकारहनन के कारनामों पर मुँह क्यों नहीं खोला ?
    विगत तीन दशकों से मिस्र की जनता ने जिस तरह का दमन,उत्पीडन और आतंक झेला है उसका कायदे से मूल्यांकन होना चाहिए और उत्पीडितों को न्याय मिलना चाहिए । साथ ही मुबारक शासन के जो लोग मिस्र की जनता पर बेइंतिहा जुल्म ढाने के लिए जिम्मेदार हैं उनकी निशानदेही होनी चाहिए। इसके अलावा मुबारक और उनकी कॉकस मंडली के लोगों के बैंक खाते सील किए जाने चाहिए।
    आश्चर्य की बात है कि मुबारक के द्वारा किए गए मानवाधिकारों के हनन पर अमेरिकी प्रशासन और बहुराष्ट्रीय अमेरिकी मीडिया एकदम चुप्पी लगाए बैठा है।जबकि यही मीडिया इराक के सद्दाम हुसैन और यूगोस्लाविया के मिलोशेविच के मामले में अतिरंजित और झूठी मानवाधिकार हनन की खबरें तक हैडलाइन बनाता रहा है। आज किसी भी अमेरिकी मीडिया में मुबारक के अत्याचारों का आख्यान नहीं मिलेगा।
    उल्लेखनीय है सेना जनांदोलन में फूट पड़ने का इंतजार कर रही थी, बहुराष्ट्रीय मीडिया ने मुस्लिम ब्रदरहुड का फंडामेंटलिस्ट पत्ता चला था जो असफल रहा। जनता के अन्य ग्रुपों में भी दरार पैदा करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन आम जनता में लोकतंत्र की मांग पर कुर्बानी का जज्बा देखकर सभी राजनीतिक संगठनों के दिमाग सन्न हैं। मिस्र के आंदोलन में पुलिस के हाथों 300 से ज्यादा लोग मारे गए हैं । सैंकड़ों आंदोलनकारी अभी भी जेलों में बंद हैं। 24 से ज्यादा पत्रकार बंद हैं।विगत 25 सालों में लोकतंत्र के लिए दी गई यह विश्व की सबसे बड़ी कुर्बानी है।
       मिस्र के जनांदोलन ने अरब औरतों के बारे में कारपोरेट मीडिया निर्मित मिथ तोड़ा है । अरब औरतों ने जिस बहादुरी और समझबूझ के साथ इस आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका अदा की है उसने बुर्केवाली,बेबकूफ,जाहिल मुस्लिम औरत की ग्लोबल मीडिया निर्मित इमेज को पूरी तरह तोड़ दिया है। बगैर किसी फेमिनिज्म के इतने बड़े पैमाने पर औरतों का संघर्ष में सामने आना, व्यापक शिरकत करना और नेतृत्व करना अपने आप में इस दौर की महानतम उपलब्धि है। औरतों का प्रतिवाद बगैर फेमिनिज्म के भी हो सकता है यह संदेश अमेरिकी विचारधाराओं के गर्भ से पैदा हुए फेमिनिज्म को संभवतः समझ में नहीं आएगा। 
    मिस्र के जनांदोलन में युवाओं का जो सैलाब दिखा है,मजदूर संगठनों का जो जुझारू और संगठित रूप दिखा है उसने संदेश दिया है कि लोकतंत्र की अग्रणी चौकी की रक्षा की कल्पना मजदूरों के संगठनों के बिना नहीं की जा सकती।
    उल्लेखनीय है पोलैंड में मजदूरवर्ग ने ही समाजवाद को चुनौती दीथी और समाजवादी व्यवस्था के सर्वसत्तावाद को नष्ट किया था। मिस्र में भी मजदूर अग्रणी कतारों में हैं। देश के सभी मजदूर संगठनों ने व्यापक रूप में कामकाज ठप्प कर दिया । समूचे प्रशासन को ठप्प कर दिया। तहरीर एस्क्वेयर पर वे अग्रणी कतारों में थे।
     तहरीर चौक पर स्त्रियों, मजदूरों और युवाओं की धुरी के कारण मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे फंडामेंटलिस्ट संगठन को अपने फंडामेंटलिस्ट एजेण्डे को वैसे ही स्थगित करना पड़ा जैसे एनडीए में भाजपा को अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को त्यागना पड़ा। इसी तरह अमेरिकी फंडिंग से चलने वाले किफाया संगठन को भी अपने एजेण्डे को स्थगित रखने पर मजबूर किया।
     औरतों,मजदूरों और युवाओं की व्यापक लोकतांत्रिक फौलादी एकता ने मिस्र और अरब देशों में लोकतंत्र की अकल्पनीय विकल्पों की संभावनाओं के द्वार खोले हैं। किफाया और मुस्लिम ब्रदरहुड अपने एजेण्डे में सफल नहीं हो पाए हैं इसका बड़ा श्रेय औरतों, मजदूरों और युवाओं के संगठनों के बीच पैदा हुई लोकतांत्रिक एकता को जाता है।
     सारी दुनिया में भूमंडलीकरण और नव्य उदार आर्थिक नीतियों के शिकार मजदूर,औरतें और युवा रहे हैं अतः मिस्र में ये वर्ग और समुदाय संघर्ष और कुर्बानी की अग्रणी कतारों में हैं।
    मिस्र के जनांदोलन के कारण मध्यपूर्व में नए सिरे से युवाओं की लोकतांत्रिक जुझारू राजनीति में दिलचस्पी बढ़ेगी। अरब युवाओं के बागी तेवर नए सिरे से देखने को मिलेंगे। मिस्र के जनांदोलन ने युवाओं को नए सिरे से पहचान दी है और आज उनके पास टेलीविजन और इंटरनेट जैसा सशक्त माध्यम भी है।
    मिस्र के जनांदोलन ने कारपोरेट मीडिया के जन-उपेक्षा और नियंत्रण का मिथ तोड़ा है। यह संदेश दिया है जनता का यदि कोई तबका आंदोलन करेगा तो टीवी वाले वहां सहयोगी होंगे। टीवी का सिर्फ कारपोरेट -मनोरंजन एजेण्डा नहीं होता बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति के प्रचार-प्रसार का भी एजेण्डा हो सकता है।
    अलजजीरा-अलअरबिया-बीबीसी लंदन आदि के कवरेज में कोई भी नजरिया व्यक्त हुआ हो,लेकिन आंदोलन के फ्लो का अहर्निश कवरेज हैडलाइन बना रहा है। कई दिनों तक लाइव कवरेज चलता रहा है। अभी तक मध्यपूर्व से सैन्य ऑपरेशन का लाइव कवरेज आया था जो 1992-93 में सीएनएन ने दिखाया था ।वह अमेरिकी वर्चस्व के चरमोत्कर्ष का कवरेज था। इस कवरेज को मिस्र की जनता के आंदोलन के कवरेज ने धो दिया है। मिस्र में मुबारक के खिलाफ जो गुस्सा था उस गुस्से में अमेरिकी नीतियों,नव्य उदार भूमंडलीकरण, सैन्यशासन और सर्वसत्तावाद के खिलाफ जन प्रतिवाद शामिल है। टीवी के लोकतांत्रिक लाइव कवरेज के मामले में मिस्र ने बाजी मार ली है। कहने का अर्थ यह है कि मीडिया के नए एजेण्डे की प्रयोगस्थली मध्यपूर्व है। विकसित पूंजीवादी देश नहीं। 





शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

लोकतंत्र चाहती है मिस्र की जनता


     कल सारी रात बीबीसी वर्ल्ड पर टीवी पर मिस्र का लाइव प्रसारण देख रहा था। उसमें दो भाषण भी सुने। पहला भाषण था राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक का और दूसरा था उपराष्ट्रपति सुलेमान का। दोनों ही भाषण सत्ता और दमन के मद में भरे हुए थे। इन दोनों के प्रसारण के बाद जनता का आक्रोश सातवें आसमान पर है आज मिस्र की जनता शुक्रवार की नवाज के बाद राष्ट्रपति प्रासाद की ओर जा सकती है ?टीवी में जनता एकदम निहत्थी और दोनों शासक सत्ता के नशे में चूर थे।
     मैं मुबारक का भाषण सुनते हुए एक बात सोच रहा था कि तानाशाह के कान नहीं होते। लाखों जनता का हुजूम पिछले 18 दिनों से आंदोलन कर रहा है। विश्व में चारों ओर थू-थू हो रही है इसके बाबजूद मुबारक साहब की हेकड़ी कम नहीं हुई है। वे लोग भी इस जनांदोलन से परेशान हैं जो आंदोलन को सीमित दायरे में रखकर चलाना चाहते थे।अमेरिकी गुर्गे चंद संवैधानिक संशोधनों के जरिए सत्ता हथियाना चाहते हैं। जनता उनकी भी सुनने को तैयार नहीं है। 
   जैसाकि हमने लिखा भी है कि इस आंदोलन में मजदूरवर्ग की बड़ी भूमिका है। इसकी प्रतिध्वनियां कल के लाइव प्रसारण में सुनाई दे रहीं थीं मिस्र की आम जनता के मुख से नारा निकल रहा था हमें धर्मनिरपेक्ष मिस्र चाहिए। लोकतांत्रिक मिस्र चाहिए। ये वे नारे हैं जिन्हें मिस्र में मजदूर लगाते हैं । मजदूरों का मुस्लिम ब्रदरहुड पर भी असर पड़ा है उन्होंने अपनी अनेक फंडामेंटलिस्ट बातों को फिलहाल त्याग दिया है,इससे एक पुख्ता और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष मिस्र की संभावनाएं प्रबल हो उठी हैं।
     आम जनता संविधान संशोधन नहीं चाहती बल्कि नये लोकतांत्रिक शासक और नया लोकतांत्रिक संविधान चाहती है और ये ही बातें अल -अहराम की संवाददाता ने भी लाइव प्रसारण के दौरान कही। मुबारक के भाषण के तत्काल बाद अलबरदाई ने कहा कि मुबारक के भाषण के बाद जनता और भड़केगी।
    अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा  सामान्य अधिकारों के हस्तांतरण से जनता शांत होने वाली नहीं है। लोकतंत्र की कैसे स्थापना होगी इसके बारे में साफ तौर पर कार्यक्रम की घोषणा की जानी चाहिए। मिस्र के राष्ट्रपति ने सत्ता हस्तांतरण की बात कही है लेकिन क्या यह तत्काल होगा ? क्या सत्ता हस्तांतरण अर्थपूर्ण और पर्याप्त होगा ?
    दूसरी ओर उपराष्ट्रपति सुलेमान को कुछ अधिकार सौंपे जाने की बात कही है राष्ट्रपति ने ।जिसे जनता ने ठुकरा दिया है। उल्लेखनीय है सुलेमान साहब उपराष्ट्रपति बनने के पहले मिस्र की जासूसी संस्था के प्रधान रहे हैं और सीआईए के लिए सीधे काम करते रहे हैं। विकीलीक के 2007 के केबल में साफ कहा गया है कि मिस्र में मुबारक का उत्तराधिकारी कौन हो सकता है।यह केबल अमेरिका के किसी राजनयिक ने भेजा है और यह डिप्लोमेटिक केबल है। केबल 14 मई 2007 को भेजा गया था।शीर्षक था- 'Presidential Succession in Egypt', देखें विकीलीक क्या कहता है- ''Egyptian intelligence chief and Mubarak consigliere, in past years Soliman was often cited as likely to be named to the long-vacant vice-presidential post. In the past two years, Soliman has stepped out of the shadows, and allowed himself to be photographed, and his meetings with foreign leaders reported. Many of our contacts believe that Soliman, because of his military background, would at least have to figure in any succession scenario."   
    उपराष्ट्रपति सुलेमान सन् 1993 से मिस्र की जासूसी संस्था के प्रधान रहे हैं। और हाल में जनांदोलन के बाद हुए सत्ता परिवर्तन में उन्हें राष्ट्रपति पद दिया गया है और उनके ही हाथों में राष्ट्रपति के कुछ अधिकार स्थानांतरित करने की बात हो रही है। मीडिया का एक हिस्सा उन्हें ही भावी राष्ट्रपति के रूप में देख रहा है। ये जनाब सीआईए के लिए काम करते रहे हैं। यह बात अलजजीरा ने एक्सपोज की है।
   क्लिंटन के जमाने में ये साहब अमेरिका के लिए बदनाम रेंडीसन कार्यक्रम में काम करते थे। इस कार्यक्रम का लक्ष्य था संदेहास्पद आतंकियों का अपहरण और फिर उन्हें सीआईए को सौंपना।अपहरण के बाद किसी तीसरे देश में आतंकियों पर मुकदमा चलता था। डार्क साइड और जानी मयेर ने इस कार्यक्रम के बारे में लिखा है 
"Each rendition was authorised at the very top levels of both governments [the US and Egypt] ... The long-serving chief of the Egyptian central intelligence agency, Omar Suleiman, negotiated directly with top [CIA] officials. [Former US Ambassador to Egypt Edward] Walker described the Egyptian counterpart, Suleiman, as 'very bright, very realistic', adding that he was cognisant that there was a downside to 'some of the negative things that the Egyptians engaged in, of torture and so on. But he was not squeamish, by the way'. 
 "Technically, US law required the CIA to seek 'assurances' from Egypt that rendered suspects wouldn't face torture. But under Suleiman's reign at the EGIS, such assurances were considered close to worthless. As Michael Scheuer, a former CIA officer [head of the al-Qaeda desk], who helped set up the practise of rendition, later testified, even if such 'assurances' were written in indelible ink, 'they weren't worth a bucket of warm spit'."। उल्लेखनीय है यह कार्यक्रम बुश प्रशासन के दौरान आतंक के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मुहिम के नाम से आरंभ किया गया था। मिस्र की जनता बदनाम मुबारक प्रशासन के किसी भी व्यक्ति को उत्तराधिकारी के रूप में देखना नहीं चाहती,वह मौजूदा संविधान बदलना और लोकतंत्र चाहती है और ये तेवर लगातार प्रखर हो रहे हैं।


मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

मिस्र का राजनीतिक संकट और अमरीकी खेल


      मीडिया प्रस्तुतियों में मिस्र का मौजूदा आंदोलन स्वतःस्फूर्त्त लगता है लेकिन यह संगठित और पूर्व नियोजित प्रतिवाद है। इसे सीआईए,पेंटागन और विदेश विभाग के योजनाकारों ने तैयार किया था और इसकी तैयारियां काफी पहले से चल रही थीं। ग्लोबल रिसर्च डॉट कॉम के अनुसार इसकी योजना तीन साल पहले बना ली गयी थी। इस योजना में सीआईए ने नागरिक संगठनों,ब्रदरहुड और विपक्ष के अन्य संगठनों को शामिल कर लिया था और ठीक योजना के अनुसार ही चीजें घटित हुई हैं। साथ ही इस योजना के बारे में अमेरिका के सत्तापक्ष और विपक्ष की भी सहमति ले ली गयी थी। इस समूची योजना का बुनियादी लक्ष्य था मध्यपूर्व में अमेरिकी हितों की रक्षा और विस्तार करना।
   आम जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए मीडिया में अमेरिका के छुटभैय्या नेताओं ने हल्ला मचाया कि मिस्र में इतना बड़ा जनप्रतिवाद होने वाला था और अमेरिकी गुप्तचर संस्थाएं पहले से इसके बारे में बता नहीं पायीं। सच इसके एकदम विपरीत है। समूचा आंदोलन और उसके विभिन्न चरणों की योजना सीआईए-पेंटागन-विदेश विभाग ने बनायी थी। वे जानते थे मिस्र में आम जनता मुबारक के खिलाफ है और उन्हें हटाना चाहती है और इस गुस्से को चैनलाइज करने के लिए प्रिएम्टिव एक्शन के तौर पर जन प्रतिवाद आयोजित किया गया। सतह पर लगता है कि मिस्र की जनता के प्रतिवाद के बारे में अमेरिकी प्रशासन एकदम अंधेरे में था लेकिन सच यह नहीं है,मीडिया ने इसे अमेरिका की जासूसी संस्थाओं की असफलता कहा है और इस प्रचार को बहाने के रूप में इस्तेमाल करते हुए अमेरिकी प्रशासन मिस्र और दूसरे मध्यपूर्व के देशों में अपने जासूसी नेटवर्क को और भी पुख्ता बनाने में जुट गया है।
    मिस्र के जनांदोलन की विशेषता है कि इसे आरंभ किसी भी मंशा से किया गया हो और इसका नेतृत्व किसी भी गुट या राजनीतिक विचारधारा के हाथ में हो लेकिन इस इसके दूरगामी असर होंगे। आम मिस्रवासियों में लोकतंत्र की भावना मजबूत होगी,लोकतंत्र का रास्ता खुलेगा और सामान्य जीवन में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा।
     मिस्र के अभी के हालत में कोई सरकार संयुक्त मोर्चे के बिना नहीं बनेगी और सेना की उसमें प्रमुख भूमिका रहेगी ।यही बात अमेरिकी प्रशासन ,मिस्र की सेना और राष्ट्रपति मुबारक का दल चाहता है। इस आंदोलन में ऐसी भी ताकतें हैं जो चाहती हैं कि मिस्र में अमेरिकी वर्चस्व को खत्म किया जाए। दूसरी ओर इस्राइल और यहूदी लॉबी चाहती है कि मिस्र में सेना का प्रशासन में वर्चस्व बना रहे। अमेरिका भी अपने हितों के विस्तार के लिए मिस्र की सेना पर ही निर्भर है। यह बिडम्बना है कि अमेरिका मिस्र में सेना को सत्ता मे बने रहने देना चाहता है जबकि कायदे से मिस्र में नागरिक प्रशासन होना चाहिए और अमेरिका भी यदि लोकतत्र का पक्षधर है तो उसे नागरिक प्रशासन पर जोर देना चाहिए। लेकिन अमेरिका चाहता है किसी भी तरह सेना और फंडामेंटलिस्टों का समझौता हो जाए और लोकतांत्रिक शक्तियों को अलग-थलग कर दिया जाए। इस क्रम में ही फंडामेंटलिस्ट संगठन ब्रदरहुड को बातचीत के लिए बुलाया गया है।
    सवाल उठता है मिस्र के राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक के साथ ओबामा प्रशासन के संबंध क्यों खराब हुए ? इसका प्रधान कारण है अमेरिका की ईरान नीति। ईरान का ओबामा ने जिस तरह विरोध किया और परमाणु कार्यक्रम के आधार पर ईरान विरोधी जो रूख अपनाया है ,मिस्र के राष्ट्रपति मुबारक ने उस नीति का समर्थन करने से मना किया और विरोध किया है। इसके कारण अमेरिकी प्रशासन ने मुबारक की पीठ पर से अपना हाथ हटा लिया और मुबारक के खिलाफ जनांदोलन को हवा दी और साफ कहा कि आंदोलन का दमन नहीं किया जाना चाहिए।
      मिस्र में इन दिनों इंटरनेट की खपत बढ़ी है। फेसबुक और ट्विटर के सदस्यों की संख्या 2009 में आठ लाख थी ,विगत दो सालों में इसमें इजाफा हुआ है। इस बार के आंदोलन में दो बड़े धड़े हैं जो सक्रिय रहे हैं पहला है किफाया ग्रुप और दूसरा है मुस्लिम ब्रदरहुड,इसके अलावा बड़े पैमाने पर मजदूर संगठनों की इसमें शिरकत रही है। मजदूर संगठनों की कोई राजनीतिक पहचानवाला नेता सामने नहीं आया है जबकि अन्य गुटों के नेता सामने आ चुके हैं।
   आरंभ में किफाया संगठन ने ही समूचा आंदोलन योजनाबद्ध ढ़ंग से तैयार किया था। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष अल बरदाई का 2011 में होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव में उम्मीदवार के रूप में समर्थन की घोषणा कर चुका है और यह बेहद संगठित दल है और अत्याधुनिक संचार तकनीक और उसकी विभिन्न विधाओं में दक्ष कैडरवाहिनी इसके पास है। यह संगठन मिस्र में परिवर्तनों की मांग करता रहा है और पेंटागन और रैंड कारपोरेशन के साथ इसके गहरे संबंध हैं। किफाया का अर्थ है 'बहुत हुआ।' इसके कैडरों को अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के कुशल लोगों ने प्रशिक्षित किया है।  
  उल्लेखनीय है कि National Endowment for Democracy  नामक संगठन बड़े पैमाने पर सन् 2001 से अप्रीका और मध्यपूर्व में विभिन्न सत्ताओं को अपदस्थ करने का काम करता रहा है। इस संगठन की वेबसाइट पर तिब्बत से यूक्रेन ,वेनेजुएला से लेकर अफगानिस्तान,इराक,ईरान तक के उन देशों के नाम दिए हैं जहां पर यह सक्रिय है,इसके अलावा मिस्र,ट्यूनीशिया,जोर्डन,कुवैत,लीबिया ,सीरिया,यमन,सूडान आदि में यह संगठन विभिन्न स्वयसेवी संस्थाओं के जरिए सक्रिय है। इस संगठन की वेबसाइट पर जानकारी दी गयी है कि किफाया नामक संगठन को National Endowment for Democracy से आर्थिक मदद मिलती रही है।
     उल्लेखनीय है National Endowment for Democracy को अमरीकी कांग्रेस से सीधे फंड मिलता है। संक्षेप में इसे 'नेड' कहते हैं, इस संगठन के निर्माता और प्रथम अध्यक्ष एलीन विंस्टीन ने 'वाशिंगटन पोस्ट' को 1991 में कहा था कि  “a lot of what we do today was done covertly 25 years ago by the CIA”।
    'नेड' के निदेशकों में अमेरिका के भू.पू. रक्षासचिव,सीआईए के उपाध्यक्ष,कारयेले ग्रुप के फ्रेंक कारलूसी,नाटो के पूर्व जनरल वीसली क्लार्क,नव्य संकीर्णवादी युद्धपंथी जलमे खिलाजाद,ये जनाव बुश के जमाने में अफगानिस्तान पर हमले के योजनाकार और बाद में अफगानिस्तान में अमेरिकी राजदूत रहे हैं। मिस्र के मौजूदा आंदोलन में यह संगठन मूलाधार में बैठा हुआ है। 





शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

मिस्र के जनांदोलन की बदलती तस्वीर



मिस्र के जनांदोलन की तस्वीर और भी ज्यादा जटिल रूप ग्रहण करती जा रही है और राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक की राजनीतिक चालें पिटती चली जा रही हैं। सेना और प्रतिवादियों में मुठभेड़ को टालने के लिए लिहाज से मुबारक ने अपने समर्थकों को मैदान में उतारा ,जगह-जगह उनके समर्थकों ने रैलियां की और मुबारक विरोधियों से मुठभेडें कीं, जिनमें आठ लोग मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए हैं।
    जब बृहत्तर जनसमूह मुबारक के खिलाफ मैदान में था और सेना ने सीधे कार्रवाई से मना कर दिया तो ऐसे में मुबारक समर्थकों का रैलियां आत्मघाती कदम ही कहलाएगा। इस एक्शन के गलत परिणाम निकले है और कल मिस्र के प्रधानमंत्री ने इन मुठभेड़ों के लिए माफी मांगी है।

    नवनियुक्त प्रधानमंत्री अहमद शफ़ीक़ ने देश में हुई घटनाओं के लिए माफ़ी मांगी है.उल्लेखनीय है राष्ट्रपति समर्थक और विरोधी गुटों की बीच झड़पों में आठ लोग मारे गए हैं और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं. उन्होंने हिंसा की जाँच का वादा किया है.
      प्रधानमंत्री ने कहा, "मैं इस घटना के लिए सबके सामने खुलकर माफ़ी माँगता हूँ इसलिए नहीं कि यह मेरी ग़लती थी या किसी और की. मैं तो इस बात से दुखी हूँ कि मिस्र के ही लोग इस तरह आपस में लड़ रहे हैं. फूट तो परिवारों में भी होते हैं लेकिन कल जो हुआ वह किसी योजना का हिस्सा नहीं था, मैं उम्मीद करता हूँ कि इंशा अल्लाह सब ठीक हो जाएगा।"
     जनांदोलन का ही दबाब है कि मिस्र के शासनाध्यक्ष संविधान में जरूरी परिवर्तन की बात कह रहे हैं।  उपराष्ट्रपति ने टेलीविजन से प्रसारित अपने संदेश में कहा, "हम संवैधानिक और विधायिका संबंधी सुधार लागू करेंगे और हर मुद्दे के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन करेंगे. इसके बाद हम इसकी भी जाँच करेंगे कि ऐसी घटनाएँ क्यों हुई.।"
    मुश्किल यह है कि जनता लोकतंत्र की मांग कर रही है और लोकतंत्र का संविधान में प्रावधान ही नहीं है। लोकतंत्र से कम पर वह कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। मुबारक को हटाने की मांग उनकी पहली मांग है लेकिन असल मांग है मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना की जाए। मुबारक और उनके समर्थक यदि संविधान संशोधन करके लोकतंत्र की स्थापना का संकल्प व्यक्त करते हैं तो उसका कुछ असर भी होगा।
           मुबारक और अमेरिका की रणनीति है कि किसी तरह आंदोलनकारी जनता को शांत किया जाए और उन्हें तहरीर स्क्वेयर से वापस घर भेजा जाए। लेकिन आंदोलनकारी वापस जाने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। आंदोलनकारियों को शांत करने के लिहाज से अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अल बरदाई,उपराष्ट्रपति सामी अनान,सेना के मुखियाओं की मदद लेने का फैसला किया है साथ ही कैमिस्ट्री में नोबेल पुरस्कार प्राप्त अहमद जुएल की भी मदद ली जा रही है लेकिन अभी तक कोई अनुकूल परिणाम नहीं मिले हैं। इसका प्रधान कारण है अलबरदाई और अहमद जुएल का मिस्र में आंदोलनकारियों में कोई जनाधार नही है।
    तहरीर चौक पर सेना और टैंकों की घेराबंदी बनी हुई है। चौक पर आंदोलनकारी जमे हुए हैं। आंदोलन के दबाब में मुबारक ने पुराने मंत्रीमंडल को भंग करके जो नया मंत्रीमंडल बनाया है उसमें बड़े पैमाने पर सेना के बड़े अफसरों को रखा गया है इससे एक बात तो यह निकलती है कि अमेरिका मिस्र में आने वाले समय में जनता का शासन नहीं चाहता बल्कि नग्न सैन्यशासन चाहता है क्योंकि ये सारे परिवर्तन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के इशारे पर हो रहे हैं।
     मुबारक और उनके साथी यह हौव्वा खड़ा कर रहे हैं कि मिस्र में ब्रदरहुड नामक फंडामेंटलिस्ट संगठन के सत्ता में आ जाने का खतरा है अतः सेना की मदद बेहद जरूरी है। असल में मिस्र के मौजूदा प्रतिवाद को संगठित किया है लोकतांत्रिक शक्तियों ने,इसमें बड़े पैमाने पर मजदूरों संगठनों की भी भूमिका है। यह सच है  मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन मिस्र का सबसे बड़ा मुबारक विरोधी संगठन है और वह इस प्रतिवाद में शामिल है लेकिन जनता के और भी तबके शामिल हैं प्रतिवाद में।
   मुबारक विरोधियों की मांग है कि सबसे पहले राष्ट्रपति इस्तीफा दें और उसके बाद एक सभी गुटों को मिलाकर एक राष्ट्रीय सरकार का गठन किया जाए और आंदोलनकारियों की मांगों पर विचार किया जाए।
     मिस्र के प्रतिवादी आंदोलन में आम जनता पर व्यापक हमले हुए हैं साथ ही मीडिया पर भी हमले हुए हैं। यहां तक कि विदेशी पत्रकारों को गिरफ्तार और उत्पीडित किया गया है।अब तक24 पत्रकार गिरफ्तार किए गए हैं और 21 पत्रकारों पर हमले हुए हैं। पांच मामलों में पत्रकारों के उपकरण सेना ने जब्त कर लिए हैं। मुबारक प्रशासन का सबसे ज्यादा गुस्सा अल जजीरा टीवी चैनल पर है। सेना ने उसके 3 पत्रकारों को बंद कर दिया है,चार पर हमला हुआ है और एक पत्रकार लापता है। अलजजीरा के अनुसार सेना ने दर्जनों पत्रकारों के कैमरा और दूसरे संचार उपकरण छीनकर नष्ट कर दिए गए हैं।






गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

मिस्र में अमेरिका विरोधी नारे क्यों नहीं लगे ?

      मिस्र में लाखों लोग राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक के पदत्याग की मांग करते हुए सड़कों पर निकल आए हैं और देश के विभिन्न शहरों में रैलियां कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर मुबारक के समर्थक भी सड़कों पर उतर पड़े हैं। इस सारी प्रक्रिया में एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि इस आंदोलन में अमेरिका के खिलाफ प्रतिवाद क्यों नहीं दिखाई दे रहा ? अमेरिका विरोधी नारे क्यों नहीं दिख रहे ? जबकि अमेरिका ने विगत 30 सालों में मिस्र को मदद के बहाने पामाली के कगार पर पहुँचा दिया है और मुबारक को अंध समर्थन देकर मिस्र की जनता को अपार तकलीफें दी हैं। इसके बावजूद मिस्र के मौजूदा आंदोलन में कोई भी समूह अमेरिका के खिलाफ मुँह खोलने के लिए तैयार नहीं है।
    इस आंदोलन में शामिल विभिन्न समूह बहुत ही सीमित लक्ष्य को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं अधिकांश लोग इस आंदोलन को मौजूदा संविधान का सम्मान करते हुए और उसमें छोटे -मोटे संशोधन करके चलाना चाहते हैं। इस आंदोलन का सीमित लक्ष्य है राष्ट्रपति बदलो। मिस्र का मौजूदा आंदोलन देश की आर्थिक संप्रभुता और विदेशी हस्तक्षेप के सवालों को नहीं उठाना चाहता। इस आंदोलन में शामिल सभी समूह राष्ट्रपति परिवर्तन की मांग तक सीमित रखना चाहते हैं। ऐसी अवस्था में यह आंदोलन बहुत ज्यादा दूर तक नहीं जा सकता।
    उल्लेखनीय है 1991 में मध्यपूर्व युद्ध के बीच में मिस्र में विश्वबैंक -आईएमएफ का नव्य उदार आर्थिक कार्यक्रम लागू किया गया था। इस कार्यक्रम ने मिस्र की जनता की समूची अर्थव्यवस्था को ही गड़बड़ा दिया है। उसके बाद से शासन की असली कमान अमेरिकी संस्थानों के हाथ में चली गयी है। अमेरिका द्वारा संचालित नेशनल इनडोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी और प्रीडम हाउस के द्वारा बड़े पैमाने पर मिस्र,ट्यूनीशिया और अल्जीरिया में विभिन्न स्वैच्छिक संगठनों और नागरिक समाज संगठनों को धन दिया है। और वे ही संगठन इस आंदोलन के पीछे सक्रिय हैं। इन दोनों संगठनों की कमान सीआईए के हाथों में है। इस प्रसंग में फ्रीडम हाउस ने जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है उसका अंश पढ़ना महत्वपूर्ण होगा। लिखा है- "Egyptian civil society is both vibrant and constrained. There are hundreds of non-governmental organizations devoted to expanding civil and political rights in the country, operating in a highly regulated environment." आगे लिखा है- Freedom House’s effort to empower a new generation of advocates has yielded tangible results and the New Generation program in Egypt has gained prominence both locally and internationally. Egyptian visiting fellows from all civil society groups received [May 2008] unprecedented attention and recognition, including meetings in Washington with US Secretary of State, the National Security Advisor, and prominent members of Congress. In the words of Condoleezza Rice, the fellows represent the "hope for the future of Egypt."
इस समूचे प्रसंग में उल्लेखनीय बात यह है कि अमेरिकी शासक एक ओर मुबारक और सैन्यशासन बनाए रखना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर सीआईए नियंत्रित संगठन मिस्र की जनता को आंदोलित कर रहे हैं। सवाल उठता है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं ? इसके पीछे प्रधान लक्ष्य है मिस्र में किसी अमेरिकी गुलाम को सत्ता पर बिठाना और मुबारक साहब को विदा करना । यही वजह है कि मिस्र के आंदोलन में अमेरिकी विरोध की कहीं पर गंध तक नहीं आ रही। साथ ही इसमें लोकतंत्र का भविष्य देखना भी बेबकूफी होगी। लोकतंत्र का मार्ग विदेशी हस्तक्षेप को खत्म करके ही अर्जित किया जा सकता है। मिस्र में अमेरिका का विदेशी हस्तक्षेप बना रहेगा तो लोकतंत्र नहीं आ सकता। राष्ट्रीय संप्रभुता का एजेण्डा जब तक आंदोलनकारी परिभाषित नहीं करते तब तक इस आंदोलन का कोई भविष्य नहीं हो सकता।
       



डिजिटल अंधकार में मिस्र में मजदूरों का जनज्वार

                   मिस्र में कल शाम को सेना के हमले और मुबारक समर्थकों और विरोधियों की झड़पों में 3 लोग मारे गए हैं और 600 घायल हुए हैं। यह आंकड़ा मिस्र के स्वास्थ्य मंत्रालय ने जारी किया है। मारे गए और घायलों की संख्या इससे कहीं ज्यादा होने का अनुमान है। अमेरिका-ब्रिटेन आदि दोमुँही बातें कह रहे हैं। इसके अलावा चिन्ता की बात यह है कि मिस्र में जनता के प्रतिवादी आंदोलन पर सेना के हमले तेज हो गए हैं । इस प्रतिवाद ने कई चीजों की ओर ध्यान खींचा है।
          मिस्र के जन आंदोलन के प्रतिवाद की धुरी है मध्यवर्ग और मजदूरवर्ग। बड़ी तादाद में मजदूरवर्ग का सड़कों पर संगठित प्रतिवाद के रूप में उतरना इस बात का संकेत है कि मध्यपूर्व में लोकतांत्रिक संघर्ष की धुरी मजदूरवर्ग ही है। मिस्र के प्रतिवादी आंदोलन में मजदूरों के नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का यह भी मतलब है कि मध्यपूर्व में धार्मिक फंडामेंटलिज्म के अलावा भी जनता के पास धर्मनिरपेक्ष ताकतों का बड़ा मोर्चा है।
      सारा कारपोरेट मीडिया विभ्रम पैदा करता रहा है कि मध्यपूर्व में कोई भी आंदोलन फंडामेंटलिस्टों के बिना नहीं चल सकता। मिस्र के आंदोलन की विशेषता है मध्यवर्ग और मजदूरवर्ग की अगुवाई में लोकतांत्रिक शक्तियों का संगठित उदय और यह चीज अमेरिकी शासकों के लिए असहनीय है। ओबामा के बयान और एक्शन में जमीन-आसमान का अंतर है। दूसरी ओर मध्यपूर्व के सामंती शासकों की मिस्र के प्रतिवाद ने नींद उडा दी है।
    निष्कर्ष के रूप में कहें तो मिस्र की जनता का प्रतिवाद मजदूरवर्ग की फौलादी शक्ति का शानदार प्रदर्शन है और यह मुबारक के सैन्यशासन और अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ मिस्र की जनता की शानदार एकजुट अभिव्यक्ति है।यह इस बात का भी संकेत है कि मिस्र में इस्लाम के होते हुए भी आम जनता में धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक मूल्यों की गहरी जड़ें हैं।समाज लोकतांत्रिक है।    
     मिस्र के मौजूदा जनांदोलन को कुचलने के लिए संचार के आधुनिक नेटवर्क को राष्ट्रपति हुसनी मुबारक ने बाधित किया और सबसे पहले मीडिया पर हमले तेज किए अलजजीरा के काहिरा ऑफिस बंद कर दिया,पत्रकारों पर हमले हुए और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गयीं।
   आम जनता संकट की अवस्था में होती है तो उसे सूचनाओं की ज्यादा जरूरत होती है और वह एसएमएस ,ईमेल ,ट्विट आदि के जरिए जानना चाहती है कि क्या हो रहा है,नाते-रिश्तेदार सकुशल हैं या नहीं । लेकिन जिस समय जनता ने अपना प्रतिवाद तेज किया और प्रशासन के साथ जनता का पंगा तेज हुआ ठीक उसी समय इंटरनेट सेवाएं ठप्प कर दी गयीं। अधिकांश संचार कंपनियों ने मुबारक के सामने समर्पण कर दिया और संचारसेवाओं को ठप्प कर दिया। इससे एक सबक तो यह निकलता है कि कारपोरेट हितों के सामने जनता के हितों का कोई मोल नहीं है।
    जिस समय मिस्र की जनता प्रतिवाद कर रही थी उस समय वहां डिजिटल कनेक्शन कटे हुए थे। डिजिटल अंधकार में जनता का प्रतिवाद नई बुलंदियों पर पहुँचा था। उल्लेखनीय है मिस्र में ब्रिटेन की कंपनी वोडाफोन का बड़ा कारोबार है और इस कंपनी के 45 फीसदी अंश की मालिक अमेरिकी संचार कंपनी वेरीजॉन है, वोडोफोन ने जनता का प्रतिवाद आरंभ होते ही इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं ठप्प कर दीं।
     इसके अलावा बोईंग की सहयोगी कंपनी नारूस ने मिस्र में एक संचार उपकरण की बड़े पैमाने पर बिक्री की है जिसके आधार पर मिस्र की संचार कंपनियां यह पता लगा सकती हैं कि मोबाइल फोन से जो टेक्स्ट मैसेज भेजा जा रहा है वह प्रतिवादी मैसेज है या नहीं। वे यह भी पता लगा सकते हैं कि मोबाइल फोन करने वाला कितनी दूरी से संदेश भेज रहा है और उसके बाद तुरंत उसको पुलिस पकड़ सकती है।
     मिस्र में जिस समय डिजिटल अंधकार चल रहा था चल रहा था हठात गूगल ने एक नया प्रयोग किया और मिस्र की जनता को गूगल ने एक उपहार दिया कि बिना इंटरनेट कनेक्शन के जनता ट्विट कर सकती है। यह काम सिर्फ वॉयस कनेक्शन के जरिए हो सकता है। गूगल ने अपने ब्लॉग पोस्ट में उज्ज्वल सिंह ने लिखा Like many people we’ve been glued to the news unfolding in Egypt and thinking of what we could do to help people on the ground. Over the weekend we came up with the idea of a speak-to-tweet service—the ability for anyone to tweet using just a voice connection.
We worked with a small team of engineers from Twitter, Google and SayNow, a company we acquired last week, to make this idea a reality. It’s already live and anyone can tweet by simply leaving a voicemail on one of these international phone numbers (+16504194196 or +390662207294 or +97316199855) and the service will instantly tweet the message using the hashtag #egypt. No Internet connection is required. People can listen to the messages by dialing the same phone numbers or going to

We hope that this will go some way to helping people in Egypt stay connected at this very difficult time. Our thoughts are with everyone there.

Update Feb 1, 12:47 PM: When possible, we're now detecting the approximate (country-level) geographic origin of each call dialing one of our speak2tweet numbers and attaching a hashtag for that country to each tweet. For example, if a call comes from Switzerland, you'll see #switzerland in the tweet, and if one comes from Egypt you'll see #egypt. For calls when we can't detect the location, we default to an #egypt hashtag.
गूगल के इस तकनीकी सहयोग ने मिस्र की जनता की बड़ी मदद की। इसका अर्थ यह है कि आज के युग में संचार सेवाओं का इस्तेमाल करके आंदोलन करना बेहद खर्चीला और कौशल का काम है। चीन,ईरान और अब मिस्र की जनता के प्रतिवादी तेवरों ने संचार तकनीक के नए आंदोलनकारी उपयोग की अनंत संभावनाओं के द्वार खोले हैं। जरूरत इस बात की है कि आंदोलनकारियों की नई संचार तकनीक पर मास्टरी हो और तुरंत ही आंदोलनकारी जनता को इसके उपयोग को सिखाने की क्षमता हो।
        










बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

मिस्र में जनता के प्रतिवाद का भविष्य


    मिस्र में लोकतंत्र के लिए आंदोलन चल रहा है बड़े पैमाने पर जनता राष्ट्रपति हुसनी मुबारक के खिलाफ सड़कों पर निकल आयी है। 150 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। सैंकड़ों लोगों को जेलों में डाल दिया गया है। मुबारक के बारे में यह सब जानते हैं कि वह अमेरिका के पिट्ठू शासक हैं और सेना के बल पर शासन चला रहे हैं।
     मध्यपूर्व में इस्राइल के बाद मिस्र दूसरा देश है जिसे अमेरिका के द्वारा सबसे ज्यादा आर्थिक मदद दी जाती है। मुबारक के शासन को सालों से सालाना 2बिलियन डॉलर की मदद मिलती रही है। यह पैसा मिस्र में विकासकार्यों पर खर्च नहीं होता। यह पैसा कहा जाता रहा है ? इस पैसे से मिस्र केशासक सैन्य सामग्री, खरीदते रहे हैं। न्यू अमेरिका फाउण्डेशन के अनुसार  “It’s a form of corporate welfare for companies like Lockheed Martin and General Dynamics, because it goes to Egypt, then it comes back for F-16 aircraft, for M-1 tanks, for aircraft engines, for all kinds of missiles, for guns, for tear-gas canisters [from] a company called Combined Systems International, which actually has its name on the side of the canisters that have been found on the streets there.”
हाल ही में प्रकाशित एक किताब, “Prophets of War: Lockheed Martin and the Making of the Military-Industrial Complex.” में हर्तुंग ने लिखा है- “Lockheed Martin has been the leader in deals worth $3.8 billion over that period of the last 10 years; General Dynamics, $2.5 billion for tanks; Boeing, $1.7 billion for missiles, for helicopters; Raytheon for all manner of missiles for the armed forces. So, basically, this is a key element in propping up the regime, but a lot of the money is basically recycled. Taxpayers could just as easily be giving it directly to Lockheed Martin or General Dynamics.” मिस्र की जनता सैनिक तानाशाही से तंग आ चुकी है और इस मौके का भी अमेरिका मध्यपूर्व में अपने हितों के विस्तार के लिए लाभ उठाना चाहता है।
     अनेक लोग यह भी कह रहे हैं कि मिस्र में संचार क्रांति के उपकरणों इंटरनेट, मोबाइल आदि के साथ अलजजीरा की बड़ी भूमिका है। यह सच है कि संदेशों के आदान-प्रदान में संचार तकनीक से मदद मिली है लेकिन संचार तकनीक के जरिए प्रतिवाद पैदा नहीं हुआ है प्रतिवाद की जननी है मिस्र की जनता।
    मिस्र की जनता को मुबारक ने भरोसा दिया है वह आगामी 30 सितम्बर को राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ेगे। लेकिन जनता तुरंत राष्ट्रपति पद छोड़ने की मांग कर रही है। कुछ लोग यह तर्क भी दे रहे हैं मिस्र में जनता सड़कों पर इसलिए उतर आयी है क्योंकि मिस्र में आर्थिक असमानता बहुत है। आर्थिक असमानता के पैमाने से देखें तो सारी दुनिया में असमानता की सूची में मिस्र का 90वां स्थान है और अमेरिका का 42वां। आज अमेरिका के हालत काफी बदतर हैं। अमेरिका में कई स्थान ऐसे हैं जिनकी तुलना हित्ती और जिम्बाबे से की जा सकती है। जिन देशों में लोकतंत्र है वहां पर गरीब और अमीर के बीच में भयानक अंतर है। आखिर क्या करें ?
     मिस्र और ट्यूनीशिया में जो व्यापक जन प्रतिवाद हो रहा है उसमें प्रसिद्ध मार्क्सवादी स्लावोज जीजेक के अनुसार गरीबी और भ्रष्टाचार प्रधान कारण हैं। जीजेक का भी मानना  हैं कि वहां फंडामेंटलिस्ट ताकतें इस संघर्ष में नहीं हैं। इससे यह भी मिथ टूटता है कि मिस्र आदि मध्यपूर्व के देशों में फंडामेंटलिस्ट और राष्ट्रवादी ताकतें ही जनता को गोलबंद कर सकती हैं।
    प्रसिद्ध मार्क्सवादी जीजेक का मानना है मिस्र और ट्यूनीशिया में ''old regime survives but with some liberal cosmetic surgery, this will generate an insurmountable fundamentalist backlash. In order for the key liberal legacy to survive, liberals need the fraternal help of the radical left. Back to Egypt, the most shameful and dangerously opportunistic reaction was that of Tony Blair as reported on CNN: change is necessary, but it should be a stable change. Stable change in Egypt today can mean only a compromise with the Mubarak forces by way of slightly enlarging the ruling circle. This is why to talk about peaceful transition now is an obscenity: by squashing the opposition, Mubarak himself made this impossible. After Mubarak sent the army against the protesters, the choice became clear: either a cosmetic change in which something changes so that everything stays the same, or a true break.''
जो लोग मिस्र में क्रांति देख रहे हैं वे द्विवा-स्वप्न देख रहे हैं। यह सच है जनता सड़कों पर है लेकिन मुश्किल यह है कि मुबारक के विरोध में जो लोग आ रहे हैं उनके अमेरिका के साथ और भी गहरे संबंध हैं। मसलन उपराष्ट्रपति और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष अल बरदाई को अमेरिकी गुलामी करते हुए इस संगठन में अनेक मर्तबा देख चुके हैं। अमेरिका कोशिश में है कि सत्ता मुबारक के हाथ में रहे या विपक्ष के हाथ में रहे लेकिन उसे अमेरिकापंथी होना चाहिए।  

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...