संदेश

January, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

असत्य- सत्य के भाषायी खेल में फंसी ममता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी असत्य-सत्य के खेल में फंस गयी हैं। वे मंच पर भाषा में खेलती हैं और बाद में फंसती हैं। भाषाखेल खतरनाक होता है , अमूमन इसमें फंसने का खतरा होता है। ममता जब मंच से बोलती हैं तो यह भूल जाती हैं वे मुख्यमंत्री हैं। ममता यह भी भूल गयी हैं कि वाममोर्चे के अत्याचारों से तंग आकर लोगों ने बड़ी आशाओं के साथ उनको जिताया था और यह सोचा था कि उनके नेतृत्व में राज्य सरकार लोकतांत्रिक मान-मर्यादाओं का पालन करते हुए काम करेगी। राज्य में कानून-व्यवस्था का शासन स्थापित होगा। मस्तानों-दादाओं के राज की विदाई होगी। लेकिन ममता बनर्जी की अराजक कार्यशैली ने इन सपनों को नष्ट किया है। आमलोगों में तेजी से असंतोष पैदा हुआ है। एकवर्ग अभी भी ममता से आस लगाए बैठा है कि वे अपनी कार्यशैली को सुधारें। लेकिन ममता का निरंकुश मन नियंत्रण में काम करने को तैयार नहीं लगता। 

आज से दो साल पहले ममता राज्य के लोगों का सुंदर सपना थीं और इनदिनों वे दुःस्वप्न की तरह लग रही हैं।पहले उनके भाषण को लोग टीवी पर मन लगाकर सुनते थे ,इनदिनों उनका भाषण ज्योंही टीवी पर आता है दर्शक चैनल बदल लेते हैं।

आशीषनंदी प्रकरण ,मीडिया और फेसबुक-

-1- 

भ्रष्टाचारियों का सामाजिक प्रोफाइल होता है। याद करें 2जी स्पेक्ट्रम में शामिल तमिलनाडु के नेताओं को,मायावतीशासन में हुए भ्रष्टाचार और उसमें शामिल आधे दर्जन निकाले गए भ्रष्टमंत्रियों,शशांक शेखर और अन्य बड़े आईएएस अधिकारियों के द्वारा किए भ्रष्टाचार को,उन पर चल रहे केसों को। झारखंण्ड के तमाम नाम-चीन भ्रष्टनेताओं के सामाजिक प्रोफाइल को भी गौर से देखें।

भाजपा के पूर्व नेता येदुरप्पा के सामाजिक प्रोफाइल पर भी नजर डाल लें और लालू-मुलायम पर चल रहे आय से ज्यादा संपत्ति के मामलों को भी देखें। आखिरकार इन नेताओं की जाति भी है। राजनीति में जाति सबसे बड़ी सच्चाई है। उनकी जीत में जाति समीकरण की भूमिका रहती है। ऐसे में भ्रष्टाचार के प्रसंग में यदि जाति को भ्रष्टाचारी की प्रोफाइल के साथ पेश किया जाता है तो इसमें असत्य क्या है ? भ्रष्टाचारी की दो जाति होती हैं एक सामाजिकजाति और दूसरी आर्थिकजाति। दोनों केटेगरी विश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण हैं। जाति आज भी महत्वपूर्ण केटेगरी है और इसपर जनगणना हो रही है। विकास के पैमाने के निर्धारण के लिए जाति खोजो और भ्रष्टाचार में जाति मत खोजो यह दुरंगापन नहीं चलेगा। …

मीडिया उन्माद ,कांग्रेस और फेसबुक

चित्र
-1- 

राजनीति में भावुकता कैंची है,वह इधर -उधर दोनों ओर काटती है। यह लाभ कम नुकसान ज्यादा करती है। भावुकता के आधार पर जुटाया समर्थन किस तरह रसातल में ले जा सकता है। इसे राजीवगांधी की इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुई जीत के बाद कांग्रेस के पराभव के साथ देख सकते हैं। यही हाल बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ भाजपा के ह्रास के रूप में भी देख सकते हैं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों भावुकता का दुरूपयोग करती रही हैं और इसबार राहुल गांधी ने भावुक भाषण देकर कांग्रेस में प्राणसंचार करने की असफल कोशिश की है।

भावुक भाषण कभी संगठन में प्राण नहीं फूंकते, उनसे टीवी में जान आती है।

-2-

राहुल गांधी ने अपने भाषण में 'उम्मीद' पर जोर दिया 'पावर' यानी सत्ता को निशाना बनाया। उनके भाषण का यह फॉरमेट ओबामा के राष्ट्रपति चुनाव की पहली पारी में दिए गए भाषण की बुनियादी समझ से परिचालित है।

-3-

राहुल गांधी को नेताओं की तलाश है,राजकुमार भूल गए कि यह दौर नेता के अंत का दौर है। परवर्ती पूंजीवाद में नेता नहीं बचता,दलाल रह जाते हैं या औसतदर्जे के नेता रह जाते हैं। आज नेताओं का अभाव सभी दलों में है। राहुल ने कहा-

&…

नए दोस्त और नए रास्ते की तलाश में माकपा और कांग्रेस

जयपुर में कांग्रेस का तीन दिवसीय चिन्तन शिविर खत्म हो चुका है और  उसी समय कोलकाता में माकपा की केन्द्रीय कमेटी की मीटिंग भी खत्म हुई है। इन दोनों दलों की बैठक में एक समानता है दोनों ही पार्टियां अपने लिए नए रास्ते और नए मित्रों की तलाश में हैं। दोनों के निशाने पर युवावर्ग है। माकपा के सामने चुनौती है कि आगामी विधानसभा चुनाव में त्रिपुरा में वाममोर्चे की जीत और सत्ता को कैसे बरकरार रखा जाय और कांग्रेस के सामने चुनौती है कि सन् 2014 लोकसभा में कांग्रेस की जीत को कैसे बरकरार रखा जाय। दोनों को अन्य दलों के सहयोग की जरूरत है। दोनों दलों का साझा लक्ष्य है युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करना।    त्रिपुरा के अलावा जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे वे हैं मणिपुर और नागालैण्ड। इनमें त्रिपुरा में कांग्रेस पूरी शक्ति लगाकर वाममोर्चे को हराने की कोशिश करेगी और राज्य के पिछड़ेपन को मुद्दा बना सकती है वहीं पर वाममोर्चे के पास शांतिपूर्ण विकास का अपना दावा रहेगा।मणिपुर और नागालैण्ड में कांग्रेस मजबूत है लेकिन त्रिपुरा में वाम को हराने में अभी तक उसे सफलता नहीं मिली है।     माकपा अपनी राष्ट्रीय छवि सुधा…

इलाहाबादकुंभ धर्मनिरपेक्षता और फेसबुक

चित्र
-1- 

कुंभ में सबकुछ है। रेडियो है।टीवी है।कैमरे हैं।मोबाइलहै। अखाड़े हैं।संत हैं।जनता है।दुकानें हैं।पुलिस है।प्रशासन है। लेकिन इन सबकी पहचान कुंभ में समाहित हो गयी है।मुझे तो न धर्म नजर आ रहा है और न ढोंग नजर आ रहा है। मैं तो कुंभ में आनंद रस देख रहा हूँ। संभवतः शास्त्रों में आनंद को ही अमृत कहते हैं।

-2-

इलाहाबाद कुंभमेले को संतों-महंतों के परे जाकर जनोत्सव के रूप में देखें। बिना किसी विज्ञापन और मीडिया कवरेज के लाखों-करोडों लोगों का कुंभपर्व में शामिल होना सुखद बात है। इससे यह भी पता चलता है कि भारत में अभी भी मासकम्युनिकेशन से ज्यादा प्रभावशाली परंपरागत कम्युनिकेशन है।

-3-

इलाहाबाद कुंभमेले की खूबी है कि यह मेला टीवी कैमरे का पीछा नहीं कर रहा बल्कि टीवी कैमरे इसका पीछा कर रहे हैं। संतों को कवरेज नहीं चाहिए ,टीवी को संत बाइटस चाहिए।

-4-

इलाहाबाद में आयोजित होने वाले कुंभ मेले की ड्यूटी में लगे राज्य व निकाय कर्मियों को विशेष भत्ता मिलेगा।



नगर विकास विभाग के इस संबंध में जारी आदेश के मुताबिक मेले में कार्यरत सरकार के विभिन्न विभागों, मेला अधिष्ठान व मेला क्षेत्र में स्थित नागर निकायो…

इलाहाबाद कुंभ,आस्था,टीवी चैनल और फेसबुक

-1- 

कुंभमेले को टीवी चैनलों ने आस्था का मेला कहा। इसे आस्था का मेला कहना गलत है। आस्था से फासिज्म की बू आती है। कुंभ आस्था का मेला नहीं है। आस्था के रूप में इस मेले को चित्रित करने का अर्थ है मेले के समस्त उदार चरित्र को अस्वीकार करना। आस्था में उदारता के लिए कोई जगह नहीं होती। आस्था का टीवी एजेण्डा और प्रचार अभियान अंततः फासिस्ट ताकतों की सेवा में ले जाता है।

आस्था को प्रचारित करेंगे तो उससे घृणा निकलेगी। चैनलवाले भूल गए आस्था से आस्था पैदा नहीं होती। घृणा पैदा होती है।

-2-

अनेक धार्मिकलोग हमें पवित्रता का संदेश देते हैं लेकिन पवित्रता अब अतीत की वस्तु बन चुकी है। कोई वस्तु,विचार,मानवीय व्यवहार शुचिता या पवित्रता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

पवित्रता के लिए लड़ी गयी जंग वस्तुतः अतीत के लिए लड़ी जा रही जंग है। पवित्रता की जंग अतीत में ठेलती है। जब अतीत में जाते हैं वहां पर भी पाते हैं हम पवित्र नहीं थे। क्योकि अतीत कभी भी पवित्र नहीं रहा। पवित्रता के झगड़े पीछे ले जाते हैं।

यही वजह है कि आधुनिककाल में धर्मगुरूओं ने पवित्रता के सवाल को बस्तों में बंद कर दिया है और उसकी जगह स्वच्छता और स…

ग्यारह खंडों में मीडिया समग्र

चित्र

विकास के नए सपने की तलाश में ममता

चित्र
पन्द्रह जनवरी2013 को ममता सरकार हल्दिया में अपने माथे पर निरूद्योगीकरण के कलंक के टीके को मिटाना चाहती है और नई उद्योगनीति की घोषणा करने वाली है। इस नीति को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इनदिनों बेहद परेशान हैं। उनकी मुश्किल यह है कि उनको एक साथ अपने सांस्कृतिक और माओपंथी मित्रों को खुश करना है तो दूसरी ओर पूंजीपतियों काभी दिल जीतना है।     हल्दिया में आने वाली नई उद्योगनीति के बारे में ममता के करीबी सूत्रों का कहना है सन् 1994 की वामशासन में बनी नीति की बुनियादी धारणाओं में कोई बदलाव ममता सरकार नहीं करने जा रही है। हो सकता है कपड़ा ,चाय और जूट उद्योग के लिए कुछ नए नीतिगत प्रस्ताव घोषित कर दिए जाएं। ममता बनर्जी की सबसे बड़ी बाधा यह है सत्तारूढ़ होने के बाद उनकी मीडिया में रेटिंग तेजी से गिरी है। इन दिनों मीडिया में उनकी साख सबसे नीचे है। मीडिया में साख उठे इसके लिए जरूरी है कि पूंजीपतियों का दिल जीता जाय और राज्य में पूंजी निवेश का माहौल बनाया जाय। बेकार नौजवानों में तेजी से असंतोष बढ़ रहा है। इस असंतोष के कारण राज्य में अपराधों में तेजी आई है। ममता के दल की गुटबाजी और आपसी झगड़े हर जिल…

मीडिया की पेज थ्री संस्कृति में कैद माकपा

चित्र
मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीतिक तौर पर सबको लाभ हुआ है। भाजपा से लेकर नीतीश कुमार तक सभी जाने-अनजाने लाभान्वित हुए हैं। लेकिन माकपा को मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मानो ग्रहण ही लग गया है। खासकर यूपीए-2 के शासन में आने के बाद से वामदलों की राजनीतिक पहलकदमी में तेजी से गिरावट आई है। आज संसदीय क्षितिज से लेकर सड़कों तक माकपा की आवाज कहीं पर भी सुनाई नहीं देती। माकपा और वामदलों की इस तरह राजनीतिक अनुपस्थिति भय पैदा कर रही है। यह विचार करने लायक बात है कि एक जमाने में वामदलों का सभी राष्ट्रीय सवालों पर विपक्ष में महत्वपूर्ण योगदान था और सारा देश देखता था कि आखिरकार फलां मसले पर वामदल क्या कहते हैं ? लेकिन इनदिनों वामदलों को जैसे लगवा मार गया है। 

यूपीए-2 के शासन में आने के साथ वामदलों की निष्क्रियता क्यों बढ़ी है ? और वामदलों में इस निष्क्रियता को तोड़ने में कोई सरगर्मी नजर क्यों नहीं आती इसके बारे में कहीं पर कोई हलचल नजर नहीं आती। इसके कारणों की गंभीरता से तलाश की जानी चाहिए।

माकपा में आई राजनीतिक पस्ती का प्रधान कारण है माकपा का पेज 3 मार्का मार्क्सवादी नेतृत्व …

प्रौपेगैण्डा के धनी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

चित्र
हाल ही में कलकत्ता में विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब बोल रहे थे तो वे वैज्ञानिकों को सम्बोधित कम और कांग्रेसियों को सम्बोधित करते ज्यादा दिख रहे थे। वे कांग्रेस के प्रचारक के रूप में बोल रहे थे। प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में दिया गया भाषण राजनीतिक प्रचार से ज्यादा महत्व नहीं रखता। वे जो कहते हैं वह कपूर की तरह कुछ क्षण दिखता है फिर गायब हो जाता है। संभवतः वे अकेले प्रधानमंत्री हैं जिनके किसी भी भाषण की कोई भी बात आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक किसी को भी याद नहीं है। प्रधानमंत्री का प्रचारक होना सामान्य बात है लेकिन मनमोहन सिंह इस मामले में विरल हैं क्योंकि वे नव्य उदारनीतियों के नीति निर्माता-प्रचारक के रूप में काम करते रहे हैं। वे मूलतः वर्चुअल हैं। आप उनको पकड सकते हैं लेकिन घेर नहीं सकते। गलती पकड सकते हैं लेकिन दोषी नहीं ठहरा सकते। 

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विपक्ष जब भी घेरने की कोशिश करता है वे हाथ से निकल जाते हैं। हाल ही में दामिनी दिल्ली बलात्कार कांड के प्रसंग में मीडिया उन्माद के जरिए मनमोहन सरकार को घेरने की असफल कोशिश की…