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दलितसाहित्य का नया पैराडाइम और नये सवाल

( साहित्य का इतिहासदर्शन विषय पर कोलकाता स्थित प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में "दलित साहित्य का इतिहास दर्शन" विषय पर दिए गए व्याख्यान का एक अंश।यह अंश वागर्थ पत्रिका ने  जनवरी 2012 के अंक में प्रकाशित किया है)          दलित साहित्य पर विचार करते समय हमें दलित विमर्श के रूढ़िबद्ध दायरों को तोड़ने की जरूरत है। जाति के दायरे में चलने वाला विमर्श अनेक किस्म की समस्याओं को पैदा करता है। जातिप्रथा के दायरे के बाहर रखकर यदि दलित लेखक सोचता है तो मुक्तलेखन और नई खोजों की ओर जा सकता है। जातिप्रथा से जोड़कर देखता है तो घूम-फिरकर पुराने जातिदंश और उसकी सर्जना में ऊर्जा खपाएगा और इससे दलित साहित्य में रूढ़िबद्धता का खतरा पैदा हो सकता है।    सवाल उठता है दलित लेखक किस चीज को आधार बनाकर लिखता है। वे जातिप्रथा से जब जोड़कर लिखते हैं तो जाति की विचारधारा के दायरे में अपनी चेतना को बांध लेते हैं लेकिन ज्योंही जीवन के आख्यान को आगे बढ़ाते हैं तो जाति के बाहर चले जाते हैं। मसलन् एक अनपढ़ दलित का शिक्षित बनना स्वयं में रूपान्तरण है। गांव से शहर आना,नौकरी मिलते ही मध्यवर्ग में दाखिल होना,सरकारी प…