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March, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"गलतबयानी" से सच नहीं बदलता किरन खेरजी !

किरन खेरजी आप सांसद एवं अभिनेत्री हैं।हम आपकी बहुत इज्जत करते हैं।लेकिन आज कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू ,अध्यक्ष के 1984 के बयान पर आपका बयान देखकर हमें बहुत तकलीफ हुई।

आपको हमने पहले कभी 1984 के कातिलों पर बोलते नहीं सुना,वरना,आप जानती ही हैं कि उसमें कांग्रेस के अलावा आपके दल के लोगों के नाम भी मीडिया में सामने आए थे ,हाल ही में एक आरटीआई से यह रहस्य सामने आया था कि 1984 के दंगों में संघ के कुछ लोगों ने हिस्सा लिया था लेकिन उनके खिलाफ पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।पता नहीं आपको यह खबर सामने आने के बाद आपको संघ पर गुस्सा क्यों नहीं आया ॽ आपको यदि 1984 के हत्यारों से सच में घृणा है तो आपको तो भाजपा को छोड़ देना चाहिए !

कन्हैया कुमार ने 1984 के दंगों का राजनीतिक विवेचन करते समय चूक की , उसे यह चूक नहीं करनी चाहिए,लेकिन किरनजी वह दंगा करने नहीं गया,उसका दल (भाकपा या एआईएसएफ) भी कभी साम्प्रदायिक दंगे करने नहीं गया,1984 के दंगों में भी शामिल नहीं था,लेकिन कांग्रेस-आररएसएस के लोग तो शामिल थे।यह हमने मीडिया में ही नहीं पढ़ा अपने छात्र जीवन में जेएनयू , दिल्ली , में पढ़ते हुए,सिख नरसंहार पीडि…

वे वाम का साथ छोड़कर क्यों चले गए ॽ

पश्चिम बंगाल के चुनाव में टीएमसी के खिलाफ दो साल पहले किए गए नारद वीडियो स्टिंग ऑपरेशन के जरिए किसी भयानक राजनीतिक उथल-पुथल की कुछ लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं।हमारा अनुमान है ऐसा कुछ भी नहीं होगा।पश्चिम बंगाल के लोग,खासकर मध्यवर्ग के अंदर इस वीडियो के आने के बाद कोई आक्रोश नजर नहीं आ रहा,यहां के लोग करप्शन से बेखबर हैं,करप्शन देखते हैं,झेलते हैं,सामंजस्य बिठाते हैं और जी रहे हैं,करप्शन को लेकर सारे देश में यही दशा है।जनचेतना की  भयावह स्थिति है कि सारधा चिटफंड कांड में टीएमसी के अधिकांश बड़े नेताओं के लिप्त होने के बावजूद वाममोर्चा कोई विशाल जनांदोलन खड़ा करने में असमर्थ रहा,हां,उसने निरंतर प्रतिवाद जरूर किया,लेकिन जिस स्केल पर लोग चिटफंड घोटाले से लोग प्रभावित हुए हैं उसकी तुलना में दशांश को भी जुलूसों में खींच नहीं पाया,यहां तक कि विधानसभा उपचुनावों में टीएमसी को हराने सफल नहीं हुआ।नगरपालिका चुनावों  में हरा नहीं पाया।ऐसी स्थिति में नारद वीडियो स्टिंग कोई जादू कर देगा हमें नहीं लगता।      सवाल यह है वाम के साथ जो सामाजिक शक्तियां थीं,जो सामाजिक संतुलन था,वह आज क्यों नहीं है ॽ चुना…

लोकतंत्र ,जुल्म और बंगाल

पश्चिम बंगाल विधानसभा के 2016 के चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं,इस चुनाव का भारतीय राजनीति पर दूरगामी असर हो सकता है।इसबार के चुनाव में कई नई चीजें नजर आ रही हैं जो पहले कभी नहीं देखी गयीं।पहलीबार वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच में चुनाव गठबंधन हुआ है,इस तरह का गठबंधन पहले कभी नजर नहीं आया।जमीनी स्तर पर इस मोर्चे ने मिल-जुलकर काम करने की कोशिश की है,इसे आम भाषा मे सिलीगुड़ी लाइन कहते हैं। सबसे पहले सिलीगुडी नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस-वाम ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उसके परिणाम बेहतर रहे।वाम को वहां विजय मिली।सिलीगुडी लाइन से प्रेरित होकर काफी पहले वाम-कांग्रेस गठबंधन का मन बना चुके थे।

यह पहलीबार हुआ कि राजनीतिक सिद्धांतों को इस मोर्चे के निर्माण में सिलीगुड़ी में आड़े नहीं आने दिया गया,बाद में यही चीज समूचे राज्य में नजर आ रही है।लोकतंत्र के लिए राजनीतिक सफलता जितनी जरूरी है उतना ही जरूरी है सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य ।लेकिन इसबार पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सफलता हासिल करना इतना जरूरी हो गया है कि माकपा जैसा सिद्धांतनिष्ठ दल खुलकर इस गठजोड़ के प्रति सैद्धांतिक ढ़ांचा प्रस्तावित …

जेएनयू और छिपाने की कला

जेएनयू का 9फरवरी2016 का मुद्दा राजनीतिक-डिजिटल है।राजनीतिक आयाम समझ में आ रहेहैं उन पर बहस भी हो रही है।लेकिन डिजिटल दुरूपयोग के आयाम खुलने बाकी हैं। जिस समय 9फरवरी की घटना घटी उसी दिन मौके पर पुलिस मौजूद थी,कोई वीडियोग्राफर भी था,लेकिन तत्काल किसी ने पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं की।पुलिस ने मौके पर रहते हुए किसी की गिरफ्तारी नहीं की,यहां तक कि बाद में भी पुलिस ने किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं करायी।चूंकि घटना कैम्पस में हुई थी अतःइस घटना पर विश्वविद्यालय की एफआईआर दर्ज कराने की जिम्मेदारी बनती है लेकिन वि.वि. ने भी इस घटना पर पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करायी,यही वह बिंदु है जहां से जेएनयू की 9फरवरी की घटना एक नियोजित सत्ता षडयंत्र प्रतीत होती है।जो भी शिकायतें या एफआईआर पुलिस में हुई हैं वे भाजपा के सांसद और एबीबीपी के जेएनयू नेताओं ने करायी हैं।जबकि तकनीकी तौर पर वे इसके लिए अधिकारी नहीं हैं। असल में ,डिजिटल मेनीपुलेशन के जरिए जेएनयू के छात्रों,वि.वि.समुदाय और शिक्षकों के साथ समूचे वि.वि. को बदनाम करने की कोशिश की गयी।जेएनयू के 5 छात्रनेताओं ,जिनमें छात्रसंघ अध्यक्ष कन्है…

ममता पर संकट के बादल छाए

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को इस बात का श्रेय जाता है उन्होंने पश्चिम बंगाल से हमेशा के लिए समाजवाद और उससे जुड़े राजनीतिक स्टीरियोटाइप को बड़े कौशल के साथ विदा कर दिया है।आगामी विधानसभा चुनाव में    वामफ्रंट की यह सबसे बड़ी चुनौती है कि आम जनता को किस तरह राजनीतिक विमर्श में शामिल किया जाए। सबसे सचेत राज्य के रूप में चिर-परिचित इस राज्य की आज सबसे बड़ी त्रासदी है आम जनता का राजनीतिकतौर पर तटस्थ या अन्यमनस्क हो जाना ।एक जमाना था जब हर विषय पर पश्चिम बंगाल के नागरिक में तेज प्रतिक्रिया व्यक्त होती थी,लेकिन विगत पांच साल में सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि आम जनता के अंदर राजनीतिक सचेतनता का माहौल पूरी तरह नष्ट हो गया है। पहले विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले से ही राजनीतिक गहमागहमी शुरू हो जाती थी,लेकिन इन दिनों राजनीतिक सन्नाटा पसरा हुआ है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पांच साल पहले ´अंध-वाम विरोध´ के आधार पर बड़े पैमाने पर वोट मिला था,इसका विगत पांच सालों में ममता ने सुनियोजित ढ़ंग से लाभ उठाया है।उसने बड़े ही कौशल के साथ वामदलों के सांगठनिक ढ़ांचे को तोड़ा,स्थानीय वाम इकाईयों…

जेएनयू की आँखें और विश्वचेतना

जेएनयू पर बहस कर रहे हैं तो हमें यह सवाल उठाना चाहिए कि हमारे विश्वविद्यालयों की आंखें कैसी हैं ॽ विश्वविद्यालयों की आंखें कैसी हैं यह इस बात तय होगा कि विश्वविद्यालय ,सरकार को कैसे देखता हैं ॽ सरकार की उसके पास किस तरह की अवधारणा है ॽसरकार की अवधारणा चांस से पैदा नहीं होती ,वह क्लासरूम में पैदा होती है। विश्वविद्यालय सरकार को कैसे देखते हैं यह इस बात से तय होगा शिक्षक कक्षा में पढ़ाते कैसे हैं ॽ विश्वविद्यालय को संगठित कैसे करते हैं ॽ संचालित कैसे करते हैं ॽ किस तरह के शिक्षकों की नियुक्ति करते हैं ॽ

इसी तरह शिक्षक और छात्र पढ़ते हुए तटस्थ नहीं हो सकते।उनको यह कहने का हक नहीं है कि सरकार के बारे में हम कुछ नहीं बोलेंगे।आमतौर पर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में सरकार के प्रति यही रूख है या फिर सरकार का अनुकरण करने की प्रवृत्ति है। विश्वविद्यालय के अंदर का समाज हमारे समाज का प्रतिबिम्बन है। उसमें छात्र जहाँ समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं दूसरी ओर शिक्षक समाज के दूसरे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।ये असल कारीगर हैं,ट्रस्टीहै, जो अपने शिक्षण से छात्रों को तराशने का काम …

जेएनयू प्रसंग में विश्वविद्यालय का अर्थ ॽ

जेएनयू के 9फरवरी के प्रसंग ने विश्वविद्यालय की अवधारणा को देश की केन्द्रीय समस्या बना दिया है,दिलचस्प बात है हम सब लोग न तो जेएनयू के आंतरिक चरित्र पर बातें कर रहे हैं और न विश्वविद्यालय की अवधारणा पर बहस कर रहे हैं ! यह कुल मिलाकर वैसे ही हुआ कि बीमारी है कैंसर की और इलाज मलेरिया का हो रहा है ! विश्वविद्यालय ´हम´ के प्रतीक हैं, ´हम´और ´तुम´ के वर्गीकरण में वि.वि. को बांटा नहीं जा सकता।यदि देश के बारे में बातें कर रहे हैं तो ´हम´की अवधारणा में सोचना होगा । वि.वि. कैसे होंगे यह इससे तय होगा कि ´हम´की धारणा क्या है ॽ यानी स्वयं से सवाल करे कि ´हम´क्या हैं ॽ ´हम´वि.वि. में किसका प्रतिनिधित्व करते हैं ॽवि.वि. को किसकी आंखों से देखते हैं ॽ´हम´किसके प्रति जवाबदेह हैं ॽ ये कुछ प्राथमिक सवाल हैं जिनसे हमें बहस को प्रारंभ करना चाहिए। ये सवाल हमें स्वयं से और अन्य से भी पूछने चाहिए। इन सवालों से बचना नहीं चाहिए।

भारत में किनाराकशी की आदत है खासकर राजनेताओं में उपेक्षा करने,अपने विचार थोपने की आदत है।लेकिन जेएनयू ने हमें यह मौका दिया है हम सवाल ये उठाएं और उनके उत्तर खोजने की कोश…

मकरंद परांजपे सच देखने से क्यों डरते हो ॽ

प्रोफेसर मकरंद परांजपे ने जेएनयू में बोलते हुए जेएनयू के वामपंथियों से सारी दुनिया के साम्यवाद की गलतियों का हिसाब मांगा।कमाल की शैली और दृष्टि है परांजपे साहब की ! गलतियां करें स्टालिन लेकिन दण्ड मिलेगा भारत के कम्युनिस्टों को ! यानी नया बुर्जुआशास्त्र है करे कोई और भरे कोई ! , असल में परांजपे सच जानना ही नहीं चाहते।सच जानोगे नहीं तो मानोगे कैसे ! शीतयुद्धीय बौद्धिक तरीका है झूठ बोलो, लांछित करो ! खासकर कम्युनिस्टों के बारे में कभी सच मत बोलो।

परांजपे साहब ने जेएनयू में भाषण देते हुए फरमाया है कि कम्युनिस्टों ने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया,जनसत्ता (9मार्च 2016) में छपी रिपोर्ट के अनुसार परांजपे ने कहा ´‘भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने अंग्रेजों को लिखा कि वे प्रदर्शन नहीं करेंगे। जब आप लोग लडेंगे तो हम आपका साथ देंगे। जब हम यह कहते हैं कि हमने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी तो मैं सबूत देखना चाहता हूं।’ इसके अलावा भी उन्होंने बहुत कुछ कहा है।लेकिन हम यहां सिर्फ कम्युनिस्टों की स्वाधीनता आंदोलन में भूमिका तक ही सीमित रखना चाहते हैं और कम्युनिस्टों ने क्या कहा उसको प्रमाण …

वे कम्युनिस्टों से क्यों डरते हैं

’ WHY  IS  THERE   SO   MUCH    FEAR   OF   THE   COMMUNISTS ’ यह शीर्षक है मराठी में ’क्रांति´ नामक पत्रिका  के 10 सितम्बर 1927 के अंक में प्रकाशित लेख का। जेएनयू के प्रो.मकरंद परांजपे ने जेएनयू में अपनी साम्यवाद विरोधी मनोभावनाओं का तरह परिचय दिया है,उसके प्रसंग में इस लेख में जो चीजें बयां की गयी हैं उनका जिक्र करना समीचीन होगा।इससे यह भी पता चलेगा कि कम्युनिस्टों की क्या दशा थी ॽ इस लेख मे कॉमरेड सकलातवाला का विशेष रूप से जिक्र किया गया और पूरा लेख उन पर ही है।सकलातवाला कम्युनिस्ट थे और वे यह मानते थे ब्रिटेन का यूनियन जैक झंडा गुलामी का प्रतीक है।इस बयान के कारण उन पर संसद में ब्रिटिश सत्ताधारियों ने जमकर हमले किए थे।उनका दण्डस्वरूप पासपोर्ट जब्त कर लिया था। इसके कारण वे अमेरिका नहीं जा पाए।बाद में वे किसी तरह जुगाड़ करके ब्रिटिश सत्ता को चकमा देकर पासपोर्ट बनवाकर भारत चले आए। भारत में उनके आने पर ब्रिटिश शासक सोच रहे थे कि सकलातवाला महात्मा गांधी की आंधी देखकर भौचक रह जाएंगे और यहां साम्यवाद भूल जाएंगे। अथवा यदि वे ब्रिटिश शासकों के खिलाफ कुछ बोलेंगे तो उनको जेल में ठूंस दिया ज…

हमारे समय में जयशंकर प्रसाद

समय –

फ्रांसिस फुकुयामा ने ´इतिहास का अंत´की जब बात कही थी तो उन्होंने ´एंड ऑफ दि स्पेस´की बात कही थी,लेकिन हिंदी आलोचकों ने उसे गलत अर्थ में व्याख्यायित किया।सवाल यह है भूमंडलीकरण के कारण सारी दुनिया में ´स्पेस´का अंत हुआ या नहीं ॽ यही वह परिदृश्य है जिसमें आप भूमंडलीकरण को समझ सकते हैं। ´एंड ऑफ दि स्पेस´ का अर्थ यह भी है मुक्त बाजार ने सर्वसत्तावादी सामूहिकता को हटा दिया,इस प्रक्रिया में ´इंटरवल´या ´अंतराल´का भी अंत हो गया,अब निरंतर फीडबैक है,औद्योगिक या पोस्ट औद्योगिक गतिविधियों के टेलीस्कोपिंग मैसेज हैं।पहले हर चीज के साथ भू-राजनय और भौगोलिक अंतराल हुआ करते थे लेकिन अब यह सब नहीं हो रहा।आज हम पृथ्वी को जानते हैं लेकिन उसके अंतरालों को नहीं जानते।देशज भौगोलिक अंतरों को नहीं जानते।अब हम इतिहास के अंतरालों में प्रवेश ही नहीं करते सीधे यथार्थ में प्रवेश करते हैं। आज हम ´लोकल समय´में नहीं ´रीयल टाइम´में रह रहे हैं,इसने यलिटी´से हमारी दूरी खत्म कर दी है।अंतर खत्म कर दिया है।

पहले दूरी थी,इतिहास-भूगोल का अंतर था,लेकिन अब तो सिर्फ ´दूरी´ही रह गयी है,लेकिन इसको भी अतिक्रमित करके हम ´टेलीप्रि…