मंगलवार, 8 मार्च 2016

वे कम्युनिस्टों से क्यों डरते हैं


 ’ WHY  IS  THERE   SO   MUCH    FEAR   OF   THE   COMMUNISTS ’ यह शीर्षक है मराठी में ’क्रांति´ नामक पत्रिका  के 10 सितम्बर 1927 के अंक में प्रकाशित लेख का। जेएनयू के प्रो.मकरंद परांजपे ने जेएनयू में अपनी साम्यवाद विरोधी मनोभावनाओं का  तरह परिचय दिया है,उसके प्रसंग में इस लेख में जो चीजें बयां की गयी हैं उनका जिक्र करना समीचीन होगा।इससे यह भी पता चलेगा कि कम्युनिस्टों की क्या दशा थी इस लेख मे कॉमरेड सकलातवाला का विशेष रूप से जिक्र किया गया और पूरा लेख उन पर ही है।सकलातवाला कम्युनिस्ट थे और वे यह मानते थे ब्रिटेन का यूनियन जैक झंडा गुलामी का प्रतीक है।इस बयान के कारण उन पर संसद में ब्रिटिश सत्ताधारियों ने जमकर हमले किए थे।उनका दण्डस्वरूप पासपोर्ट जब्त कर लिया था। इसके कारण वे अमेरिका नहीं जा पाए।बाद में वे किसी तरह जुगाड़ करके ब्रिटिश सत्ता को चकमा देकर पासपोर्ट बनवाकर भारत चले आए। भारत में उनके आने पर ब्रिटिश शासक सोच रहे थे कि सकलातवाला महात्मा गांधी की आंधी देखकर भौचक रह जाएंगे और यहां साम्यवाद भूल जाएंगे। अथवा यदि वे ब्रिटिश शासकों के खिलाफ कुछ बोलेंगे तो उनको जेल में ठूंस दिया जाएगा। ब्रिटिश शासक यह भी सोच रहे थे कि सकलातवाला को किसी तरह भारत से विदेश नहीं जाने दिया जाएगा लेकिन सकलातवाला चकमा देकर भारत आए अपना काम किया और फिर चकमा देकर भारत से चले भी गए।
    सकलातवाला असल में मद्रास कॉग्रेस में शामिल होने  आए थे ,वे यह कहकर गए कि दोबारा भारत आना चाहते हैं। उनके आने से उस समय के कम्युनिस्टों को बड़ा बल मिला। सकलातवाला का मानना था  कम्युनिस्ट आंदोलन को परंपरागत आंदोलन के दायरे के बाहर निकाला जाए।ब्रिटिश सरकार सकलातवाला के भारत आने के खिलाफ थी,उसने उनको पासपोर्ट नहीं दिया,वे किसी तरह चालाकी  से पासपोर्ट बनाने  में सफल रहे।ब्रिटिश पुलिस उनको भारत में उस समय पकड़ नहीं पायी। उस समय ब्रिटिश सरकार कम्युनिस्टों से वैसे ही नफरत करती थी जिस तरह परांजपे नफरत करते हैं या संघी नफरत करते हैं। सकलातवाला जिस समय बॉम्बे आए थे उस  समय उस शहर में 25 कम्युनिस्ट भी नहीं थे लेकिन ब्रिटिश शासन डरा हुआ था,यदि कम्युनिस्टों की  उनसे मित्रता होती तो सकलातवाला का पासपोर्ट रद्द नहीं किया जाता,कम्युनिस्टों की दिन-रात निगरानी नहीं होती।

     ´क्रांति´पत्रिका ने लिखा है उस समय कम्युनिस्टों के ठिकानों पर तीन बार पुलिस के छापे पड़े। ब्रिटिश शासकों ने उस समय डाक विभाग को कड़े आदेश दिए थे  कम्युनिस्टों की कोई भी डाक खासकर किताब आदि की पार्सल की सप्लाई न दी जाए।उनकी सभी डाक जब्त कर ली जाए।परांजपेजी यह वाकया काल्पनिक नहीं है।यह मित्र सरकार का आदेश नहीं है,यह वह लेख है जो मेरठ षडयंत्र केस में कम्युनिस्टों के खिलाफ  देशद्रोह के सबूत के तौर पर पेश किया गया था।सब लोग जानते हैं कि उन दिनों कम्युनिस्ट छिपकर गुप्त संघर्ष नहीं करते थे बल्कि खुलेआम सारी गतिविधियां और आंदोलन करते थे।इसके बावजूद ब्रिटिश सरकार उनके खिलाफ इतनी सख्त क्यों थी परांजपेजी कारण आप बेहतर ढ़ंग से समझ सकते हैं कि ब्रिटिश शासकों ने कम्युनिस्टों का विरोध किया,उनकी डाक तक पर पाबंदी क्यों लगायी यह वह जमाना था जब भारत के अखबारों में कम्युनिस्टों की खबरें और लेख आदि छापने पर अघोषित पाबंदी लगी हुई थी।परांजपेजी यह क्या स्वाधीनता संग्राम में कम्युनिस्टों का ब्रिटिश शासकों से मित्रता का प्रतीक है परांजपेजी बेहतर है आप अपने साम्यवाद ज्ञान को दुरूस्त कर ले।

1 टिप्पणी:

  1. कम्युनिस्टों नें दुनिया के किन देशों में कौन से झंडे गाड़े हैं? कामरेडों के हाथ खून से रंगे हैं, प्रोफेसर साहब. एक उंगली अपनी ओर उठते ही यूं तिलमिला उठे?

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