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माकपा के पार्टी प्लेनम के सामने प्रमुख चुनौतियां

आज से कोलकाता में माकपा पार्टी प्लेनम आरंभ होरहा है। यह प्लेनम इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसके ज़रिए माकपा अपने विकास का मार्ग तलाश करने का प्रयास करेगी। खासकर पश्चिम बंगाल में पुन: सत्ता में वापसी हो यह चिंता भी है। माकपा को यदि पश्चिम बंगाल की जनता का विश्वास जीतना है तो उसे निम्न सवालों के दवाब खोजने होंगे- १. पश्चिम बंगाल की समूची शिक्षा व्यवस्था को किन नीतियों और फ़ैसलों ने पतन के स्तर पर पहुँचाया? समूची शिक्षा का ढाँचा कैसे बर्बाद हुआ? कौन लोग उसके लिए ज़िम्मेदार हैं? शिक्षा का अपराधीकरण कैसे हुआ ? २. पार्टी संगठन और जनसंगठनों के अपराधीकरण के लिए किस तरह की नीतियाँ और कौन से नेता ज़िम्मेदार हैं? ३.समूचे पश्चिम बंगाल में वामशासन के अंतिम १० साल आम जनता के लिए बेहद तकलीफ़देह रहे हैं,सामाजिकतौर पर माकपा के नेता और कार्यकर्ताओं ने आम जनता के जीवन में जिस तरह हस्तक्षेप किया उसके कारण राजनीति और समाज का अपराधीकरण हुआ। आम जनता को अकल्पनीय मानसिक- सामाजिक यातनाएँ सहन करनी पड़ी हैं, इस समूची प्रक्रिया के लिए जो लोग ज़िम्मेदार रहे हैं वे आजतक पार्टी में हैं जबकि उनको दल से निकालना चा…

शब्दों के कातिल

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इन दिनों मीडिया वाले और भाजपावाले बहुत नाराज हैं कि केजरीवाल ने पीएम मोदी को "कॉवर्ड" और "साइकोपैथ" क्यों कहा,इसके लिए वह माफी मांगे,केजरीवाल माफी मांगे या न मांगे यह उनका निजी फैसला होगा,वे जो चाहें करें,लेकिन हमें इससे बड़े सवाल पर विचार करना चाहिए कि शब्दों के दुरूपयोग या भ्रष्टीकरण पर ये टीवीवाले या भाजपावाले पहले कभी इस कदर आक्रामक नजर क्यों नहीं आए ? क्या किसी शब्द का पहलीबार गलत इस्तेमाल हुआ है या पहलीबार किसी ने किसी को गाली दी है ? जरा अपने सामने टीवी स्क्रीन को गौर से देखें तो पता चलेगा कि टीवीवाले और राजनेता शब्दों के सबसे बड़े कातिल हैं।ये बड़ी ही बेशर्मी के साथ रोज शब्दों को भ्रष्ट कर कर रहे हैं लेकिन हमें कभी गुस्सा नहीं आता,हम क्यों इतने अचेत हैं या नियंत्रित सचेत हैं कि अचानक कॉवर्ड और साइकोपैथ पर बिफरे घूम रहे हैं ? हमें क्या यहां लिस्ट बताने की जरुरत है कि राजनेताओं और मीडिया,खासकर विज्ञापनों ने किस तरह शब्दों की हत्या की है,किन -किन शब्दों की हत्या की है,उनका अर्थ नष्ट किया है,विकृत किया है । जब शब्द मर रहे हों या उनका भ्रष्टीकरण हो रहा हो…

औरत पर संदेह नहीं विश्वास करो

यूपी में कमाल हो गया,औरतों ने पंचायत चुनावों में झंड़े गाड़ दिए.ग्राम प्रधान की 44प्रतिशत सीटों पर औरतों ने जीत हासिल की है, जबकि उनके लिए आरक्षित सीटें थीं 33फीसदी ।11प्रतिशत सीटें अनारक्षित स्थानों से औरतों ने जीतकर सच में कमाल कर दिया। जब भी पंचायत के चुनाव परिणाम आए हैं, तो औरतों के परिणाम बेहतर ही आए हैं,लेकिन परिणाम आने के साथ ही संदेह वर्षा आरंभ हो जाती है। सवाल यह है पुरुष क्या स्वायत्त ढ़ंग से काम करता है ?हमलोग पुरुष की सैंकड़ों-हजारों सालों की असफलता के बावजूद उस पर संदेह नहीं करते,उसकी क्षमता पर संदेह नहीं करते, लेकिन औरत की क्षमता पर तुरंत संदेह करने लगते हैं।लोकतंत्र हो या जीवन हो,सामाजिक प्रक्रिया विश्वास के आधार पर चलती है,जिनको हम चुनते हैं उन पर विश्वास करें ,यदि वे खरे न उतरें तो उनको बदल दें ,उनकी जगह किसी और का चुनाव करें।लेकिन संदेह न करें।

यूपी में औरतें जीती हैं,देश में हजारों औरतें जनप्रितिनिधि के रुप में काम कर रही हैं,इससे लोकतंत्र में औरतों की शिरकत बढ़ी है।औरत की पहचान बदली है। औरतों पर जिन बातों को लेकर संदेह किया जा रहा है वे बातें पुरुषों पर भी लाग…

हिन्दुत्व और मुसलिम विद्वेष

भारत के बौद्धिकों में कमाल की क्षमता है दंगों को लेकर जब भी बातें होती हैं तो झट से भागलपुर का नाम पहले लेते हैं दिल्ली का नहीं।ऐसा क्यों? सवाल यह है कि दंगाग्रस्त क्षेत्र किसे कहें ? क्या दंगे में मारे जाने वाले लोगों की संख्या के आधार दंगाग्रस्त क्षेत्र का फैसला होगा? यदि ऐसा है तो यह सही नहीं होगा।

यह संभव है कि किसी क्षेत्र में दंगा न हो लेकिन आम जनता में बड़े पैमाने पर हिन्दुत्ववादी सामाजिक ध्रुवीकरण हो।यह भी संभव है दंगा हो,लेकिन लोग मारे न जाएं,आगजनी हो,लूटपाट हो,हिंसा हो,लोग घायल हों,लेकिन मारे न जाएं,इस नजरिए से देखें तो भागलपुर से ज्यादा खतरनाक है दिल्ली।यह तथ्य समाजविज्ञानी आशुतोष वार्ष्ष्णेय ने रेखांकित किया है।उनका मानना है दंगों के बार-बार होने और सघन भाव से साम्प्रदायिक माहौल बनने को मिलाकर देखना चाहिए।

भगवा ब्रिगेड सब समय दंगा नहीं करता लेकिन सब समय अविवेक का माहौल बनाए रखने का काम जरुर करता है,वे बार-बार ऐसे मसले उठाते हैं जिनसे अविवेकवाद के विकास में मदद मिले।अविवेकवाद की आंधी वे निरंतर चलाते रहते हैं। यही वह परिवेश है जिसके कारण आम जनता की चेतना को कभी साम्प्रदाय…

21वीं सदी में माकपा की चुनौतियाँ

CPIM का प्लेनम 27-31दिसम्बर2015 को कोलकाता में होने जा रहा है। माकपा अपनी सांगठनिक समस्याओं पर इसमें विस्तार से चर्चा करेगी।माकपा की सबसे बड़ी चुनौती है संगठन संचालन की पद्धति और रुढबद्ध कार्यक्रम से मुक्त होने की।इसमें सर्जनात्मकता और नए के लिए कोई जगह नहीं है। इसमें सब कुछ तयशुदा तरीकों से काम करने पर बल है, काम करने की यह पद्धति पुरानी हो चुकी है। माकपा को यदि 21वीं सदी की पार्टी के रुप में काम करना है तो उसे नए सांगठनिक ढाँचे और नए कार्यक्रम के बारे में सोचना होगा,उसे यह सोचना होगा कि समाजवाद के अंत के बाद उभरे पूंजीवाद में कैसे काम करे और किस तरह के काम करे।पार्टी कॉमरेडों का नजरिया क्या हो ,नए संचारजगत में सदस्यों को स्वतंत्र रुप से रायजाहिर करने देने की आजादी रहेगी या नहीं ,या फिर यह कहें कि माकपा क्या अपने पार्टी कार्यक्रम को भारत के संविधान में उल्लिखित व्यक्ति के अधिकारों की संगति में अपने सदस्यों को अभिव्यक्ति के अधिकार देने के पक्ष में है या नहीं,फिलहाल माकपा में सदस्यों को उतने भी अधिकार प्राप्त नहीं हैं जितने भारत का संविधान देता है। कहने का आशय यह है कि नागरिक अधिकारो…

संसद में गुमशुदा साहित्यविवेक

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संसद में “असहिष्णुता” पर बहस चल रही है। यह वह “असहिष्णुता” नहीं है जिसे कॉमनसेंस में हम लोग कहते –सुनते हैं। यह वह भी “असहिष्णुता” नहीं है जिसे राजनीतिक दल आंकड़े दे-देकर व्याख्यायित कर रहे हैं। “असहिष्णुता” के सवाल को राजनीतिकदलों या दल विशेष ने नहीं उठाया,बल्कि लेखकों-बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों ने उठाया है।ये सब वे लोग हैं जो दलीय राजनीति और कॉमननसेंस के आधार पर “असहिष्णुता” को नहीं देख रहे हैं ,बल्कि अपने सर्जनात्मक कर्म के खिलाफ सामने खड़ी ठोस राजनीतिक-सामाजिक चुनौती के रुप में देख रहे हैं। अफसोस की बात है कि अधिकतर सांसदों ने एक-दूसरे के खिलाफ हिंसा-अपराध के आंकड़े और आख्यान पेश करके यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि “हम ठीक ,तुम गलत।”
    सभी राजनीतिक दलों का यह मानना “हम तो ठीक हैं तुम गलत हो”,यही समूची बहस का मूलाधार है। जबकि लेखकों ने “असहिष्णुता” के सवाल को “हम” और “तुम” की कोटि में रखकर नहीं उठाया,बल्कि वे तो भारतीय समाज में निरंतर बढ़ रही “असहिष्णुता” को एक प्रक्रिया के रुप में देख रहे हैं,उन्होंने उसके हाल के महिनों में तेज होने और ज्यादा आक्रामक हो जाने की ओर ध्यान खी…

आम्बेडकर ने दूसरी शादी क्यों की ?

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भारत के संविधान की कच्ची रुपरेखा तैयार करने के बाद बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर की तबियत अचानक खराब हो गयी,वे लंबे समय से विश्राम की जरुरत महसूस कर रहे थे लेकिन उनको विश्राम नहीं मिल रहा था।उस समय इलाज के लिए वे बम्बई आए।बुढ़ापे में अपनी देखभाल करने के लिए उनको साथी चाहिए था।जिस अस्पताल में वे इलाज के लिए गए वहां पर कुमारी शारदा कबीर नाम की  महिला काम कर रही थी। उनका व्यवहार और बातचीत आम्बेडकर को पसंद आए और उन्होंने आपसी सहमति से शादी का फैसला ले लिया।

आम्बेडकर को अगस्त1947 से उनको नींद आनी बंद हो गयी थी।एक पत्र में उन्होने लिखा कि उनको 15दिनों से नींद नहीं आ रही।उन पर किसी औषधि का असर नहीं हो रहा। उसी पीड़ा के दौरान उन्होंने सहयोगी के रुप में शारदा कबीर से दूसरी शादी का निर्णय लिय़ा था। अपने मित्र कमलाकांत और भाऊराव गायकवाड को पत्र लिखकर अपने फैसले से अवगत कराया।भाऊराव गायकवाड़ को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा “पहली पत्नी के निधन के उपरान्त पुनःविवाह न करने का मैंने निर्णय किया था। किन्तु अब दूसरा विवाह करने का मैंने निर्णय किया है।जो सुगृहिणी होकर वैद्यकशास्त्र में प्रवीण है,ऐसी पत्नी क…

आम्बेडकर की पत्नी निष्ठा -

आम्बेडकर की पहली शादी के बारे में धनंजय कीर ने लिखा है “शादी के समय भीमराव की आयु सत्रह वर्ष की थी।लड़की की आयु नौ वर्ष की थी।लड़की का ससुराल का नाम रमाबाई रखा गया।लड़की उम्र में छोटी लेकिन स्वभाव से शांत और सुस्वभावी थी।वह गरीब लेकिन सदाचारी घराने की थी।वह अपने पिता की कनिष्ठ लड़की थी। उसके पिता का नाम भिकू धत्रे था।दाभोल के समीप स्थित वनंद गाँव का वह निवासी था। वह दाभोल बंदरगाह में कुली का काम करता था। लड़की के बचपन में ही माँ-बाप चल बसे थे। उसका और उसके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी चाची और मामा ने किया था।” रमाबाई स्वभाव से सहृदय और कर्तव्यदक्ष थी।वे लंबे समय तक बीमार रहीं और लंबी बीमारी के बाद उनका 27मई1935 को निधन हो गया।      धनंजय कीर ने लिखा है कि पत्नी के स्वास्थ्य में सुधार हो इसलिए बाबासाहब ने काफी प्रयास किए,लेकिन उनको कोई दवा नहीं लगी। “ वैवाहिक जीवन के प्रारंभिक समय में उन पर भुखमरी,शारीरिक कष्ट,दुःख और दरिद्रता की जो घटनाएं गुजरी थीं,उनका मुकाबला उन्होंने अपने जन्मजात मनोबल से किया”, “जीवन का अधिकतर समय उस साध्वी ने असह्य दरिद्रता ,पति की सुरक्षा के बारे में लगने वाली…

धर्मनिरपेक्षता,धर्म की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र

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संसद में इन दिनों भीमराव आम्बेडकर के 125वें जन्मदिन के मौके पर दो दिवसीय बहस हो रही है, इस बहस ने संविधान के सवालों को नए सिरे उठा दिया है।खासकर “धर्मनिरपेक्षता” के सवाल को प्रमुख सवाल बनाकर खड़ा कर दिया है। सत्ताधारी भाजपा को “धर्मनिरपेक्षता” को लेकर पहले से आपत्तियां थीं,लेकिन पहले वे कभी-कभार बोलते थे, लेकिन मोदी सरकार बनने के बाद वे बार-बार “सेकुलर” शब्द पर आपत्ति कर रहे हैं,उसके खिलाफ घृणा अभियान चलाए हुए हैं, लोकसभा चुनाव में प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने सबसे घटिया ढ़ंग से “धर्मनिरपेक्षता” पर हमला किया।

हाल ही में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भीमराव आम्बेडकर के 125वें जन्मदिन के मौके पर संसद में चल रही बहस में भी “धर्मनिरपेक्षता” को निशाना बनाया, प्रधानमंत्री तो” सेकुलर “ शब्द का इस्तेमाल ही नहीं करते। यही वह संदर्भ है जिसमें संविधान निर्माण के समय “धर्मनिरपेक्षता” पर चली बहस के कुछ पहलुओं का नए सिरे से मूल्यांकन करना बेहद जरुरी है।संविधान के प्रति प्रतिबद्धता जताने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है “देश में 'सेक्युलर' शब्द का सबसे ज़्यादा दुरु…

वर्चुअल नायक की औसत वाणी

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आज मैं यू-ट्यूब के कारण पीएम नरेन्द्र मोदी का संसद में कल दिया गया भाषण सुन पाया। उदयप्रकाश जैसे प्रखर लेखक की राय उनके भाषण की प्रशंसा में पढ़ चुका था इसलिए और भी उत्सुकता थी कि आखिर मोदी ने ऐसा क्या कहा जिसने उदयप्रकाश जैसे लेखक को प्रभावित कर लिया,मुग्ध कर लिया। पहली बात यह कि पीएम मोदी को अपने भाषण में कांग्रेस और उसके नेताओं की भूमिका का नाम लेकर जिक्र करने से परेशानी हो रही थी,उन्होंने अपनी संघी परंपरा का निर्वाह करते हुए संविधान निर्माण में एक भी बार पंडित नेहरु या कांग्रेस पार्टी का नामोल्लेख तक नहीं किया।

पीएम मोदी के लिए संविधान का असल में क्या अर्थ है यह तो वे ही जानें लेकिन यदि उनके कल के भाषण में जो कहा गया है वह यदि संविधान का अर्थ है तो हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि पीएम ने हमें निराश किया है।वे संविधान के मर्म को समझ नहीं पाए हैं,दूसरी बात यह कि जिस व्यक्ति ने भी पीएम का भाषण लिखा था उसे कम से कम अच्छा भाषण लिखना नहीं आता।

पीएम मोदी ने अपने भाषण में “सरलीकरण” और “सामूहिकीकरण” के भाषिक पदबंधों का असल मंतव्य पर पर्दा डालने के लिए कौशलपूर्ण ढ़ंग से इस्ते…

आओ मोदी हम ढोएंगे पालकी

पीएम नरेन्द्र मोदी के कल संसद में दिए भाषण पर लेखक उदयप्रकाश की फेसबुक टिप्पणी पढ़कर बेहद शर्मिंदगी का एहसास हुआ। यह कैसा समय है जिसमें लेखक टुकड़ों में देखता है,भाषिक अंशों में देखता है,राजनीति और विचारधारा के बिना देखता है। निश्चित रुप से यह लेखकों के लिए बहुत संकट की घड़ी है। कल का मोदीजी का भाषण न तो ऐतिहासिक था और बेजोड़ था। उदयप्रकाश के राजनीतिक नजरिए पर फेसबुक पर बहुत बहस होती रही है लेकिन उनकी ताजा फेसबुक टिप्पणी ने एक बात जरुर संप्रेषित कर दी है कि हमारे लेखकों के पास फासिज्म के खिलाफ जंग करने की कोई न तो दीर्घकालिक समझ है और न सही विवेक ही है।

उदयप्रकाश ने क्या कहा पहले वह ध्यान से पढ़ें-

“आज हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का संसद में संविधान पर दिया गया भाषण किसी ऐतिहासिक अभिलेख की, किसी महत्वपूर्ण राजकीय दस्तावेज़ की तरह महत्वपूर्ण है। इतना लोकतांत्रिक, समावेशी, उदार और विनम्र संभाषण कम से कम इस प्रभावी शैली में मैंने अपने जीवन में नहीं सुना।
बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने पूर्ववर्ती राजनेताओं के योगदान को जिस पारदर्शिता के साथ उन्होंने स्वीकार किया, देश क…

आईएसआईएस और उसके सहयोगी राष्ट्र

सामान्य तौर पर मीडिया देखकर यही लगता है आईएस के आतंकियों का स्वायत्त नेटवर्क है और वे सच में पश्चिम के शत्रु हैं,लेकिन पिछले दिन रुस के राष्ट्रपति पुतिन ने आईएस के 40 मददगार देशों की सूची जारी करके साफ कर दिया कि आईएस के पीछे किन ताकतों का हाथ है। इराक में सद्दाम हुसैन के जुल्मों से इराकी जनता को निजात दिलाने और इराक जनसंहारक अस्त्रों के जखीरे को नष्ट करने के बहाने अमेरिका और नाटो संगठन ने इराक पर हमला किया उससे इराक में शांति तो नहीं लौटी,विनाशलीला और आईएस जैसे दानव का जन्म जरुर हुआ। आईएस को निर्मित करने में सऊदीअरब,अमेरिका,कतार,तुर्की,इस्रायल, ब्रिटेन और फ्रांस आदि देशों के नाम पुतिन ने अपनी सूची में प्रमाण सहित पेश किए हैं। आईएस के आतंकियों को तुर्की ,जोर्डन,कतार,इराक और सऊदी अरब से सीधे सैन्य मदद मिल रही है।हथियारों की अबाध सप्लाई का काम अमेरिकी प्रशासन कर रहा है। सीरिया युद्ध में जिस तरह आईएस उलझा हुआ है और नाटो सैन्य संगठन उनकी मदद कर रहा है उस समूची योजना को रुस के सैन्य अभियान ने पूरी तरह पंक्चर कर दिया है, आईएस के जरिए सीरिया के तेल कुओं पर नाटो देशों खासकर तुर्की ने कब्जा जम…

शब्दों के कातिल

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देश बहुत बुरे दौर में दाखिल हो चुका है,हमारे शासक और उनके भक्तगण असहिष्णु हो चुके हैं। उन्हें शब्द अच्छे नहीं लगते,वे खुलेआम कह रहे हैं “सेकुलरिज्म” का दुरुपयोग बंद करो।कल तक वे “सेकुलर” की आत्मा और शरीर पर हमले कर रहे थे,अब वे “धर्मनिरपेक्ष” शब्द के इस्तेमाल को बंद करने की मांग कर रहे हैं।मजेदार बात यह है कि राजनाथ सिंह के बोलते ही उनके फेसबुकगण “पंथ-निरपेक्षता” का नाम लेकर भाषाज्ञान कराने उतर पड़े हैं। इससे एक बात का पता तो चलता है कि “सेकुलरिज्म” को लेकर इनके अंदर किस कदर घृणा भरी हुई है।       समाज में शब्दों की हत्या जब होने लगती है तो समझो सत्ता और समाज असहिष्णु हो गया है।मनुष्य के नाते शब्द हमारे हैं और हम शब्दों के हैं।हमने कभी नहीं कहा कि फलां शब्द का इस्तेमाल न करो। सत्ता के शिखर से पहले किसी ने नहीं कहा कि देश में “सेकुलरिज्म” या “धर्मनिरपेक्ष” पदबंध का इस्तेमाल न करो । सत्ता के कर्ताओं की शब्दविशेष को लेकर घृणा पहलीबार नजर में आई है। यह पहलीबार हुआ है कि सत्ता ने शब्द को ललकारा है,एक ऐसे शब्द को ललकारा है जिसमें 125करोड़ लोगों की आत्मा निवास करती है।पहले यह कभी नहीं हु…

गुरु नानकदेव और उनकी विश्वदृष्टि

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संत गुरु नाननदेव मेरे सबसे प्रिय संत-कवि हैं। उनकी रचनाएं और जीवनशैली देखने के बाद नए किस्म के व्यक्ति और नए किस्म के मूल्यबोध की सृष्टि होती है। नानक उन संतों में हैं जिसने गाना गाकर सब कुछ पा लिया। गाना इतनी तल्लीनता के साथ गाया कि गान ही जीवन का सर्वस्व बन गया। पूरे मन-प्राण से गाने से उनको जो मिला वह अपने आपमें बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसलिए जो भी काम करें प्राण लगाकर करें तो सफलता जरुर मिलती है।प्राण लगाकर एक गीत गा दो सफलता मिलेगी।नाच लो सफलता मिलेगी,कक्षा पढाओ सफलता मिलेगी,भाषण दो तो लोग प्रशंसा करेंगे।

नानक की विश्वदृष्टि का मूलाधार है “जपुजी”,

आदि सचु जुगादि सचु

मंत्र:

इक ओंकार सतिनाम

करता पुरखु निरभउ निरवैर।

अकाल मूरित अजूनी सैभं गुरु प्रसाद।।

जपु:

आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

पउड़ी: 1

सोचे सोचि न होवई जे सोची लख बार।

चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिवतार।

भु.खया भुख न उतरी जे बंना पुरीआं भार।

सहस सियाणपा लख होहि, त इक न चले नालि।

किव सचियारा होइए, किव कूड़ै तुटै पालि।

हुकिम रजाई चलणा 'नानक' लिखिआ नालि।

अर्थात् -आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

'वह आदि …

संघ की राजनीति और फंड -

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आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन और उनसे जुड़े साइबर बटुक एक बात में अमेरिकी एजेण्डे पर चल रहे हैं,अमेरिकी एजेण्डा है धर्मनिरपेक्षता को नष्ट करो,धार्मिक फंडामेंटलिज्म को मजबूत करो। इस एजेण्डे को संघियों ने कई दशकों से सचेत रुप से अपनाया हुआ है,वे दिन-रात धर्मनिरपेक्षता को गरियाते रहते हैं,धर्मनिरपेक्ष लेखकों-बुद्धिजीवियों -नेताओं और दलों पर कीचड़ उछालते रहते हैं। इन लोगों ने धर्मनिरपेक्षता को मीडिया उन्माद के जरिए छद्म धर्मनिरपेक्षता करार दे दिया है। वे संविधान वर्णित धर्मनिरपेक्षता को भी नहीं मानते,उसे भी वे हटाने की मुहिम चला रहे हैं। इस काम के लिए वे कारपोरेट फंडिंग के जरिए काम कर रहे हैं।
आरएसएस अकेला ऐसा संगठन है जिसके फंडिंग के स्रोत का पता नहीं है।यह ऐसा संगठन है जो केन्द्र सरकार से लेकर अनेक राज्य सरकारों को नियंत्रित किए है लेकिन फंडिंग का स्रोत नहीं बताता। यही दशा अनेक फंडामेंटलिस्ट संगठनों की भी है वे भी अपनी फंडिंग को उजागर नहीं करते।आरएसएस यदि देशभक्त संगठन है तो अपने फंडिंग के सभी स्रोत उसे उजागर करने चाहिए, उसे बताना चाहिए कि उसके यहां कहां से और किन स्रोतों से पैसा आता है औ…

हाय आमिर! हाय आमिर !!

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कल रात से साइबर बटुक आमिरखान को साइबर जगत से गायब कर देने के जुगत में लगे हैं,कोई कह रहा है उसकी फिल्म मत देखो,कोई कह रहा है उसके गाने मत सुनो,कोई कह रहा है उसका विज्ञापन मत सुनो,कोई कह रहा है उसे यू -ट्यूब से निकालो,कोई कह रहा है उस अखबार का बहिष्कार करो जिसमें उसके बयान छप रहे हैं,कोई कह रहा है वह टीवी चैनल मत देखो जिसमें आमिर का बयान दिखाया जा रहा है,कोई कह रहा है, याहू को कहो कि आमिर खान की ईमेल सुविधाएं काट दी जाएं,कोई कह रहा है महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पर दवाब डालो की आमिर की सुरक्षा सुविधा हटा ली जाय।     यह स्नैपडील वाला छोकरा उसकी हिम्मत तो देखो बटुकों की सुन ही नहीं रहा है तो बटुकमस्तान दवाब डाल रहे हैं कि स्नैपडील वाले के यहां कोई नौकरी न करे,कोई मोदीभक्त सामान न खरीदे,जगह-जगह आमिर के पुतले जलाओ,आमिर को औकात का ज्ञान कराओ,असभ्यसंघ ने बटुकों से कहा है कि बटुकगण अपनी साइबर क्षमता,शैक्षणिक योग्यता और सभ्यता का आमिर विरोधी गंदी-गंदी पोस्ट लिखकर परिचय दें।      असभ्यसंघ ने नए रामपत्र में आदेश दिया है कि जो साइबर बटुक कम से कम 1000पोस्ट आमिर के खिलाफ न लिखे उसे साइबर गैंग से निकाल…