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'उत्तरआधुनिक' एजेंडा क्या है? - 3- इलेन मिकसिन्स वुड

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वर्तमान उत्तरआधुनिकतावाद के बारे में एक और विशेष रूप से रोचक बात है, एक खास रूप से नोट करने लायक अंतर्विरोध। एक ओर यह इतिहास के प्रतिवाद पर आधारित है, जो एक प्रकार के राजनीतिक निराशावाद से जुड़ा है। चूंकि कोई भी ऐसा तंत्र और कोई भी इतिहास नहीं है जिसके प्रयोजनमूलक विश्लेषण की गुंजाइश है, अत: हम बहुत सारी शक्तियों के मूल तक नहीं पहुंच सकते, जो हमारा दमन करती है; और हम किसी प्रकार के संयुक्त विरोध, किसी प्रकार की सामान्य मानव मुक्ति अथवा पूंजीवाद के विरुध्द वैसे आम संघर्ष की भी आकांक्षा नहीं कर सकते जिसमें समाजवादी विश्वास करते थे। अधिक से अधिक हम कई विशिष्ट और पृथक प्रतिरोधों की उम्मीद कर सकते हैं। दूसरी ओर ऐसा प्रतीत होता है कि इस राजनीतिक निराशावाद का उद्गम पूंजीवादी संपन्नता और संभावना के प्रति अपेक्षाकृत अधिक आशावादी दृष्टिकोण में है। आज के उत्तरआधुनिकतावाद (जैसा कि हमने देखा है यह प्रतीकात्मक रूप से साठ के दशक की पीढ़ी के उत्तरजीवियों तथा उनके छात्रों द्वारा अपनाया गया है), जिसकी विश्व के प्रति दृष्टि अभी भी पूंजीवाद के 'स्वर्णिम युग' में बध्दमूल है, के अनुसार पूंजीवादी …

तालिबान को अमेरिका का रंगदारी टैक्स

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अमेरिका का अफगानिस्तान में तालिबान के साथ किस तरह का संबंध है और कैसे अमेरिकी प्रशासन तालिबान कमांडरों की मदद कर रहा है इसका रहस्योदघाटन आज हुआ है। आज ही अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार ‘दि नेशन’ में कांग्रेसनल कमेटी की रिपोर्ट छपी है जिसमें कहा गया है अमेरिकी सेना के लिए अफगानिस्तान में रसद की सप्लाई बनाए रखने के लिए अमेरिकी प्रशासन बड़ी मात्रा में प्रोटेक्शन मनी या रंगदारी टैक्स दे रहा है। यह बात अमेरिका की कांग्रेसनल रिपोर्ट में स्वीकार की गई है। इस रिपोर्ट के प्रेस में लीक होने से अमेरिकी प्रशासन परेशान है। अमेरिका के अखबार ‘दि नेशन’ ने इस रिपोर्ट का रहस्योदघाटन किया है। रिपोर्ट का नाम है “Warlord, Inc,” इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सेना पर होने वाले खर्चे का एक हिस्सा कैसे तालिबान के हाथों पहुँच रहा है। यह पैसा रंगदारी टैक्स के रूप में तालिबान के सैनिकों को दिया जा रहा है। जिससे अमेरिकी सेना के लिए रसद की अबाधित सप्लाई बरकरार रखी जाए। ‘होस्ट नेशन ट्रुकिंग’ नामक कंपनी को 2.16 बिलियन डॉलर का कॉट्रेक्ट दिया गया है इस फर्म का काम है सेना की सुरक्षा रसद सप्लाई बनाए रखना। यह कंपनी अपनी सप्ल…

फेसबुक का मूल्य 23 बिलियन डॉलर हुआ

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रायटर के अनुसार फेसबुक की कीमत 23 बिलियन डॉलर हो गई है। एक साल में उसकी कीमत में तिगुनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उल्लेखनीय है सन् 2004 में गूगल के शेयर जब बाजार के लिए खोले गए थे तो उससे तुलना करें तो पाएंगे कि फेसबुक की कीमत दुगुनी है। फेसबुक का तकरीबन 500 मिलियन लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। फेसबुक ने सन् 2009 में विज्ञापनों से 800 मिलियन डॉलर कमाए हैं। यह सन् 2008 की आमदनी से ढ़ाई गुना ज्यादा है। फेसबुक पर इन दिनों वयस्क लोग तकरीबन 12 घंटे प्रति सप्ताह खर्च करते हैं। इंटरनेट की सकल विज्ञापन आय का 13 प्रतिशत हिस्सा फेसबुक के पास है।

'उत्तर आधुनिक' एजेंडा क्या है ? -2- इलेन मिकसिन्स वुड

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इतिहास के बिना ऐतिहासिक परिवर्तन पुनश्च, आज के उत्तरआधुनिकवाद तथा युगों के अंत की पूर्व विवेचना में कुछ महत्वपूर्ण विभेद हैं। अब तक 'आधुनिकता' के अंत (अथवा 'पाश्चात्य सभ्यता के पतन') को हमेशा एक ऐतिहासिक स्थिति के रूप में समझा गया है, जो ऐतिहासिक ज्ञान के लिए उपलब्ध है। इसमें स्वयं ही ऐतिहासिक परिवर्तन और राजनीतिक कार्रवाई की भी संभावना है। आज डेविड हार्वे और फ्रेडरिक जेमसन जैसे मार्क्सवादी बुध्दिजीवी भी हैं जो 'उत्तरआधुनिकता' की चर्चा एक ऐतिहासिक स्थिति; समकालीन पूंजीवाद के एक दौर, एक सामाजिक और सांस्कृतिक रूप, जिसकी ऐतिहासिक उत्पत्ति तथा भौतिक आधार हो और जो परिवर्तन और राजनीतिक एजेंसी के अध्यधीन हो, के रूप में करते हैं।4 हम उनकेऐतिहासिक निर्णयों से असहमत हो सकते हैं। लेकिन हम उनसे इतिहास के बारे बहस भी कर सकते हैं। बहरहाल, 'उत्तरआधुनिकवाद' कुछ और ही है और वही इस पुस्तक की विषयवस्तु है।     सर्वप्रथम, यहां 'उत्तरआधुनिकतावादी' वाम के सर्वाधिक महत्वपूर्ण थीम का खाका प्रस्तुत है (मैं इस पद का उपयोग व्यापक रूप से उन विविध बौध्दिक और राजनीतिक प्रवृत्त…

'उत्तरआधुनिक' एजेंडा क्या है?- इलेन मिकसिन्स वुड -1-

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प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान लिखी गयी अपनी प्रसिद्ध और अरूचिकर पुस्तक दि डिक्लाइन ऑफ दि वेस्ट में ओसवाल्ड स्पेंगलर ने घोषणा की कि पश्चिमी संस्कृति और इसके प्रबल मूल्यों सा अंत होने जा रहा है।समाज को एक सूत्र में बांधने वाली परंपराएं और बंधन टूट रहे हैं ; विचार और सभ्यता की एकता सहित जीवन की एकात्मकताएं बिखर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अपने स्वाभाविक चक्र से गुजरने वाली हर अन्य संस्कृति के समान ही पश्चिम भी अपने ‘प्रबोधन’ अथवा ‘ज्ञानोदय’ के शरदकाल ( जो कि पहसे ही विध्वंसात्मक है ) से अनिवार्यतः निकलकर व्यक्तिवाद और नास्तिवाद में आ गया है।

              लगभग चार दशकों के बाद सी.राइट मिल ने घोषणा की कि 'हम आधुनिक युग के अंत के कगार पर हैं।' इस युग का स्थान उत्तरआधुनिक काल ले रहा है। इसमें वे ऐतिहासिक अपेक्षाएं जो 'पश्चिमी सभ्यता' को परिभाषित करती रही हैं, अब प्रासंगिक नहीं रह गई हैं। तर्कना और स्वतंत्रता की संयुक्त प्रणाली में प्रबोधन सिध्दांत और इस सिध्दांत में निहित दो अन्य प्रमुख सिध्दांतउदारवाद और समाजवाद 'विश्व की और हमारी पर्याप्त व्याख्या कर पाने …

पोस्टमॉडर्न में 'पोस्ट ' और 'मॉडर्न' के खेल

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उत्तर - आधुनिकता को समझने के लिए वृद्ध पूंजीवाद की सही समझ होना बेहद जरुरी है। हिन्दी के अधिकांश बुध्दिजीवी इसका अमूमन उपहास उड़ाते रहते हैं।ये ऐसे बुध्दिजीवी हैं जो अभी तक सामंती खोल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। इनका जीवन और साहित्य को लेकर सामंती रवैय्या है। ज्ञान के स्तर पर पूंजीवाद की आधी - अधूरी समझ को मुकम्मल समझ कहते हैं। पिछड़ेपन का आलम यह है कि ये अपने ज्ञान को सही और अन्य के ज्ञान को गलत मानते हैं। हर विषय पर वगैर जाने लिखना और उसे लेकर अहंकार में डूबे रहना , अपने ही हाथों अपनी पीठ ठोकना,ज्ञान के पुस्तकीय एवं शोधपरक कार्यों की उपेक्षा करना, मौलिक लेखन और मौलिक ज्ञान के नाम पर ' कॉमनसेंस ' की बातों की पुनरावृत्ति करना, संदर्भों को छिपाना आदि।
        उत्तर - आधुनिकतावाद पदबंध की यह सीमा है कि इसकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं है। इस पर की गयी बहस किसी न किसी रुप में आधुनिकतावाद से जुड़ती है। ' 'उत्तर' का वास्तव में क्या अर्थ है इसकी संतोषजनक व्याख्या नहीं मिलती । मसलन्, 'मॉडर्न' का संबंध वर्तमान से है तो 'पोस्ट मॉडर्न' का संबंध भविष्य स…

उत्तर आधुनिकतावाद क्या है ?

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उत्तर-आधुनिकतावाद को वृध्द पूंजीवाद की सन्तान माना जाता है।पूंजीवाद के इजारेदाराना दौर में तकनीकी प्रोन्नति को इसका प्रमुख कारक माना जाता है। विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी दखलंदाजी के बढने के बाद से आर्थिकतौर पर अमरीकी प्रशासन की दुनिया में दादागिरी बढी है।


इसके अलावा जनमाध्यमों ; संस्कृति; सूचना प्रौद्योगिकी , और विज्ञापन की दुनिया में आए बदलावों के कारण दुनिया में अधिरचना में निर्णायक परिवर्तन हुए हैं।इन परिवर्तनों के कारण आम नागरिकों की जीवन शैली में बुनियादी बदलाव आया है। आम लोगों के दृष्टिकोण में नए लक्षण दिखाई दे रहे हैं। इस तरह के चौतरफा परिवर्तन पहले कभी देखे नहीं गए। भारत में इन परिवर्तनों के कारण जिस तरह के बदलाव आए हैं उनकी सही ढंग से मीमांसा करने की जरूरत है।

उत्तर-आधुनिक विमर्श की शुरूआत संस्कृति के क्षेत्र से हुई।यही वजह है कि इसकी शैतानियों का जन्म भी यहीं हुआ। आज भी विवाद का क्षेत्र यही है। प्रश्न उठता है कि संस्कृति के क्षेत्र में ही यह उत्पात शुरू क्यों हुआ ?असल में संस्कृति का क्षेत्र आम जीवन की हलचलों का क्षेत्र है और साम्राज्यवादी विस्तार की अनन्त संभावनाओं से भरा…

उत्तर आधुनिक तर्कशून्यता और अप्रासंगिकता

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कार्ल मार्क्स का मानना था कि जो विचार जीवन में खरा उतरे उसे मानना चाहिए। विचार की कसौटी जीवन है विचार नहीं। यह बात मार्क्सवाद पर भी लागू होती है मार्क्सवाद के अनेक विचार जीवन पर खरे साबित नहीं हुए हैं। व्यवहार में जिस विचार को सही सिद्ध नहीं किया जा सके तो उसे त्यागने में कोई असुविधा नहीं है। उत्तर आधुनिकों के जितने भी भारतीय संस्करण प्रचलन में हैं उनमें से ज्यादातर विचार जीवन की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं। स्वतंत्र भारत में उत्तर आधुनिक विचारधारात्मक प्रयोगों का बड़ा जखीरा फैला हुआ है। इस जखीरे का मूल्यांकन करने की जरूरत है। मार्क्सवाद को सर्वसत्तावादी और जनविरोधी विचारधारा के रूप में चित्रित करने में उत्तर आधुनिकों ने विगत 40 सालों में एड़ी-चोटी का पसीना एक किया है। वे किसी भी किस्म का सार्थक विकल्प किसी भी क्षेत्र में पेश नहीं कर पाए हैं। मसलन उत्तर आधुनिकों के द्वारा भाषावार राज्यों के निर्माण के विरोध के सवाल को ही लें और उनके द्वारा छोटे राज्यों के गठन के तर्क और अनुभव पर गौर करें तो छोटे राज्यों की निरर्थकता समझ में आ जाएगी। भाषावार राज्यों के गठन के कारण सामाजिक स्थायित्व,बहुलत…

मुर्दों के मसीहा और उत्तर आधुनिकता का अंत

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यह आयरनी है कि जिस आंदोलन के लिए लोग पागलपन की हद तक दीवाने थे, गलियों-मुहल्लों में वैचारिक मुठभेड़ें हो रही थीं और चारों ओर लग रहा था कि यह आंदोलन मूलगामी परिवर्तनों का वाहक बनेगा। एक अवधि के बाद पाते हैं कि वही आंदोलन और उससे जुड़ा विचार गायब है.मेरा संकेत रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद आदि विषयों को लेकर उठे उत्तर आधुनिक आंदोलनों की ओर है। आरएसएस जैसा अनुशासित संगठन जिस आंदोलन का आधार हो और संगठित कार्यकर्ताओं की जिसके पास फौज हो,ऐसी फौज जो कभी भी कुछ भी कर सकती हो,ऐसे नेता जो सोई हुई जनता को जगा सकते हों। जिनके पास हिन्दुत्व का प्रखर विचार हो। अकाट्य तर्कप्रणाली हो। हिन्दुत्व पर जान देने वालों की पागलों जैसी संगठित शक्ति हो। ऐसे आंदोलन जब गायब हो जाते हैं तो सोचने के लिए बाध्य होना होता है कि उत्तर प्रदेश और देश में यह आंदोलन कहां गुम हो गया ? सारे देश में हिन्दुत्व और राममंदिर का बिगुल बजाने वाले संत-महंत-तोगडिया-आडवाणी-अटलजी जैसे नेता कहां गायब हो गए ? मूल सवाल यह है कि राममंदिर या उसके जैसे उत्तर आधुनिक आंदोलनों का अंत कैसे हो जाता है ? कल तक जो जनांदोलन लग रहा था वह अचानक कहां…

सीएनएन- आईबीएन 7 और टोरंटो के सत्य का विकृतिकरण

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‘सीएनएन -आईबीएन 7’ चैनल के समाचारों का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इस चैनल की खबरों में असत्य के प्रयोग बढ़ गए हैं। जनता के हितों के लिए संघर्ष करने वालों को तरह-तरह से कलंकित किया जा रहा है। इस कड़ी में नया मामला टोरंटो से जी-20 देशों की बैठक के मौके पर हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन की खबर से जुड़ा है। चैनल ने जी-20 देशों की बैठक के मौके पर हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन को ‘उत्पात’ की संज्ञा दी। लगता है किसी कमअक्ल के संवाददाता ने यह खबर लिखी है। उसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन और उत्पात में भाषिक अंतर और अर्थ का ज्ञान नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शकारियों को ‘हिंसा पर उतारू’ कहा। आरंभ में लिखा ‘दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी-20 की शिखर बैठक की मेजबानी कर रहे कनाडा के सबसे बड़े शहर एवं देश की वित्तीय राजधानी टोरंटो में हजारों प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतारू हो गए।’प्रदर्शनकारियों कोचैनल ने ‘उपद्रवी’ कहा। (विस्तार से इस चैनल की बेवसाइट पर जाकर देखें)  (शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को पीटते पुलिस वाले)          इस खबर के प्रसंग में पहली बात यह कि यह प्रदर्शन शांतिपूर्णथा। दूसरी बात यह कि प्रदर्…

प्रणव राय-विनोद दुआ की कार-सेवा

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एनडीटीवी की प्रणवराय-विनोद दुआ टीम अब नंगे रूप में मनमोहन सरकार और कांग्रेस की भक्ति में सक्रिय हो गई है। ये लोग खबरों में कारसेवा कर रहे हैं। इस चैनल की खबरों में खासकर हिन्दी चैनल एनडीटीवी इंडिया में कांग्रेस की भक्ति और विपक्ष पर कटाक्ष का धारदार तरीके से इस्तेमाल हो रहा है। कांग्रेस और मनमोहन सरकार की भक्ति का ताजा उदाहरण है 26 जून को आपातकाल की बरसी पर किसी कार्यक्रम का टीवी पर न होना। वैसे सीएनएन-आईबीएन ने भी 26 जून पर कोई कार्यक्रम नहीं दिया।    सन् 1975 को इसी दिन भारत में आपातकाल लगाया था। आपातकाल पर किसी भी कार्यक्रम का न आना टीवी चैनलों में बढ़ रहे नव्य-उदार नजरिए को सामने लाता है। आपातकाल कोई साधारण घटना नहीं थी,बल्कि स्वतंत्र भारत की असाधारण राजनीतिक घटना थी। इन दोनों ही चैनलों की बेवसाइट पर आपातकाल से संबंधित किसी भी कार्यक्रम की कोई जानकारी नहीं है।     दूसरा प्रसंग हाल ही में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों के बढ़ाए जाने और सरकारी नियंत्रण हटाने का है। एनडीटीवी इंडिया ने इस पर जिस तरह से खबरें दी हैं वह इस बात का प्रमाण है कि यह चैनल बड़े ही घटिया तरीके से विपक्ष औ…