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सांस्कृतिक मालों के अपहरण का मायावीतंत्र है यू-ट्यूब

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सिनेमा ने दृश्यमाध्यम के रूप में नई आधुनिकता सामाजिकता को बुलंदियों तक पहुँचाया। नए मीडियम के रूप में कैमरे ने सभी शास्त्रों के शस्त्रों को अपदस्थ कर दिया। यही कैमरा जब डिजिटल और सैटेलाइट के सहमेल से नई भूमिका में बदला तो उसने एकदम नयी कम्युनिकेशन  संस्कृति को जन्म दिया।जिसका नाम है यू-ट्यूब । इसकी दुनिया विकसित पूंजीवादी संस्कारों के चरमोत्कर्ष की पारदर्शी और नियंत्रित दुनिया है। 

यू-ट्यूब का समूचा फॉरमेट देखने में स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मंच जैसा है। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं है। यह फॉरमेट बुनियादी तौर पर सांस्कृतिक इजारेदारी के डिजिटल फॉरमेट की आदर्श अभिव्यक्ति है। मसलन्, इस फॉरमेट के आधार पर समूचा संगीत और सिनेमा उद्योग अरबों रूपये के व्यावसायिक लाभ से वंचित कर दिया गया है।अन्य देशों और व्यक्तियों की सांस्कृतिक संपदा और बौद्धिक-संपदा को अपहृत करके इजारेदार कंपनी के मुनाफे की मशीन बना दिया गया है। यू-ट्यूब ने अनेक विश्व कन्वेंशनों को कागजी बना दिया है। लेखकों,कलाकारों, संगीतकारों, फिल्ममेकरों के कॉपीराइट का खुला उल्लंघन करते हुए उनके सांस्कृतिक मालों को यू-ट्यूब के मालिकों की सां…

राष्ट्रीयविज़न के बिना ममता बनर्जी की बौनी राजनीति

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पश्चिम बंगाल में संकीर्ण राजनीतिक पांसे तेजी से फेंके जा रहे हैं। इससे सामाजिक जीवन में अनुदार भावबोध पुख्ता होगा। इसे चालू भाषा में बौनी राजनीति कहते हैं। बौनी राजनीति वे करते हैं जिनके पास राष्ट्रीय विज़न नहीं होता। ममता बनर्जी के सत्ता में आने के साथ यह उम्मीद जगी थी कि राज्य सरकार नीतिगत बौनेपन से बाहर निकलेगी।लेकिन विगत एक साल में पश्चिम बंगाल में नीतिगत संकीर्णतावाद से निकलने की बजाय और भी ज्यादा अनुदार भावों-विचारों के हमले तेज हुए हैं।

ममता सरकार की विशेषता है राष्ट्रीयविज़न का अभाव और अंध-वाम विरोध।यह वस्तुतःजनघाती नजरिया है। राजनीति विशेषज्ञ आशाए लगाए बैठे थे कि अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन से मिलने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आंतरिक कट्टरता खत्म होगी। लेकिन हुआ एकदम उलटा। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने ममता बनर्जी को जब राज्य में अमेरिकी पूंजी निवेश का आश्वासन दिया था तो उनके दिमाग में यह था कि राज्य में सेजनीति है और अमेरिकी धनाढ़्यों को पश्चिम बंगाल में धन लगाने के लिए प्रेरित करने में कोई खास दिक्कत नहीं होगी। लेकिन अभी ममता-हिलेरी मुलाकात की खबरों क…

मनमोहन प्रेम का अंत

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मनमोहन सरकार का आम जनता के साथ अन्तर्विरोध प्रखर हो गया है। जिन लोगों ने यह सपना देखा था कि नव्य आर्थिक नीतियां मध्यवर्ग के लिए फायदेमंद हैं और यह वर्ग कम से कम चैन की बंशी बजाएगा।आज वे लोग निराश हैं। मनमोहन सरकार ने मध्यवर्ग के चैन को बेचैनी में बदल दिया है। मुश्किल यह है कि 1990-91 के बाद से मध्यवर्ग में आरामतलबी के संस्कार गहरे हुए हैं। जनांदोलनों से मध्यवर्ग की दूरी बढ़ी है। बल्कि यों कहें मध्यवर्ग का एक बड़ा अंश जनांदोलनों के प्रति संशय में ठेल दिया गया है। मीडिया और उपभोक्तावाद की आक्रामक रणनीतियों ने इस वर्ग को पराश्रित बना दिया है और गहरे अवसाद में डुबो दिया है। ऐसे में मध्यवर्ग में से प्रतिवाद की जगह सिर्फ मीडियापीड़ा के स्वर सुनाई दे रहे हैं।मध्यवर्ग की मीडियापीड़ा को आम जनता के संघर्ष में रूपान्तरित करने की जरूरत है।

मध्यवर्ग के नपुंसक बनाए जाने की स्थिति का मजदूर संगठनों और कम्युनिस्ट पार्टियों पर भी असर हुआ है वे भी ठलुआदल बनकर रह गए हैं। यही वह नपुंसक परिवेश है जिसको चुनौती देने की जरूरत है। नपुंसक परिवेश नव्य आर्थिक उदारनीतियों की देन है और महंगाई का उससे गहरा संब…

पितृसत्ता को भूलो और बोलो "सत्यमेव जयते"

सत्यमेव जयते सीरियल की इन दिनों खूब चर्चा है। सामाजिक समस्याओं पर समाज का ध्यान खींचने वाले इस सीरियल को लोग विभिन्न चैनलों पर देख रहे हैं। यह पहला ऐसा सीरियल है जो अनेक चैनलों पर एक साथ दिखाया जा रहा है। जिन चैनलों पर दिखाया जा रहा है उनकी रेटिंग में इससे इजाफा हुआ है।

उल्लेखनीय है टीवी मीडियम इन दिनों गंभीर संकट में है, उसके पास विज्ञापन और धांसू कार्यक्रमों का अभाव है, इसके अलावा दर्शकों का भी मोहभंग हो रहा है।अन्ना हजारे –रामदेव के आंदोलनों ने रेटिंग में सुधार करने में मदद नहीं की है। ऊपर से आर्थिकमंदी के कारण निजी कंपनियों के विज्ञापनों का स्रोत भी सिकुड़ गया है। फलतःचैनलों में बड़ी मात्रा में सरकारी टीवी विज्ञापनों की संख्या हठात बढ़ गयी है।इससे टीवी उद्योग को थोड़ी राहत मिली है। उसे राहत पैकेज के अंग के रूप में आमीर खान का सत्यमेव जयते आया है। लेकिन आमिरखान के सत्यमेव जयते के जरिए टीवी मीडियम में जान फूंकने की यह असफल कोशिश है। टीवी का यह संकट टलने वाला नहीं है।

फिल्मी अभिनेता एक अवधि के बाद टीवी पर दर्शकों को खींच नहीं पाते। अमिताभ बच्चन का शो कौन बनेगा करोड़पति एक अवस्थ…

ममता बनर्जी के पापुलिज्म का टूटता तिलिस्म

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राजनीति में पापुलिज्म कैंसर है। पापुलिज्म के आधार पर सरकार गिराई जा सकती है लेकिन सरकार चलायी नहीं जा सकती। पापुलिज्म के आधार पर इमेज बना सकते हैं लेकिन इस इमेज को टिकाऊ नहीं रख सकते। आज यही पापुलिज्म मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा है। पश्चिम बंगाल की सत्ता की कमांड संभाले उन्हें एक साल हो गया है। इस एक साल में उनकी कार्यशैली के मिथ टूटे हैं। इसके बाबजूद ममता बनर्जी की एक व्यक्ति के रूप में आम लोगों में अपील बरकरार है। उनकी सादगी और बेबाक अभिव्यक्ति में आम आदमी आज भी आनंद लेता है। 

प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने 12 मई को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात करने के बाद प्रेस से कहा कि मीडिया को ममता के सकारात्मक गुणों जैसे उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली और ईमानदार व्यक्तित्व के प्रचार पर जोर देना चाहिए। काटजू के इस बयान में एक अच्छे गुण के प्रति जो सम्मानभाव व्यक्त हुआ है वह महत्वपूर्ण है। वैसे कायदे से देखा जाए तो प्रेस परिषद के अध्यक्ष का यह काम नहीं है कि वह मीडिया को यह बताए कि ममता बनर्जी के बारे में मीडिया क्या करे । दुर्भाग्य से काटजू ज…

फेसबुक का लक्ष्य है सामाजिक खुलापन ,अंतहीन साझेदारी और संपर्क

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फेसबुक के सर्जक मार्क जुकेरबर्ग ने सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन के सामने एस- 1 के तहत सन् 2012 के आरंभ में जो बयान दिया है उसमें उसने कहा है कि फेसबुक का लक्ष्य है विश्व में ज्यादा खुलापन और संपर्क पैदा करना । यानी ज्यादा खुला और कनेक्टेड संसार निर्मित करना फेसबुक का लक्ष्य है। फेसबुक ने अपने इस लक्ष्य के लिए लगातार अपनी तकनीकी और फेसबुक सुविधाओं में निरंतर सुधार करके अपडेटिंग और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज किया है। फेसबुक का दूसरा बड़ा लक्ष्य है अंतहीन साझेदारी। विचार से लेकर वीडियो तक सभी चीजों की सीमाहीन साझेदारी का ऐसा सुंदर मंच मानव सभ्यता में पहले कभी नहीं दिखा । इस क्रम में अनेक मामलों में कॉपीराइट के अनेक नियम भी टूटे हैं।

फेसबुक ने मात्र 8सालों में 75करोड़ लोगों को अपने से जोड़ लिया है। किसी अकेले मीडियम का इतनी बड़ी संख्या में जुड़ना स्वयं में बहुत बड़ी बात है।इतने कम समय में टीवी ने भी यह सफलता नहीं पाई थी। आज फेसबुक पर प्रतिमाह व्यक्ति 7 घंटे खर्च करता है।सन् 2009 में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 4घंटे खर्च करता था। मनुष्यों को एक साथ जोड़ने वाला कोई और प्लेटफॉर्म नह…

जनसत्ता और विक्रम राव का जलेबीलेखन

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जनसत्ता अपनी प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम में एक कदम आगे बढ़ गया है. उसने के.विक्रम राव का जनसत्ता के 13मई 2012 के अंक में "न प्रगति न जनवाद, निपट अवसरवाद" शीर्षक से लेख छापा है। यह लेख प्रगतिशील लेखकों और समाजवाद के प्रति पूर्वाग्रहों से भरा है।

यह सच है राव साहब की लोकतंत्र में आस्थाएं हैं लेकिन उनके लोकतंत्र में प्रगतिशील लेखकों के लिए कोई जगह नहीं है। प्रगतिशील लेखकों की भूमिका पर राव का मानना है "आज के कथित प्रगतिवादी इसी दोयम दर्जे में आते हैं।" यही उनके लेख की आधारभूत धारणा है । यही उनके साहित्य-विवेक का पैमाना भी है।

राव साहब के लिखे को देखकर यही लगता है कि इनको प्रगतिशील साहित्य का कोई ज्ञान नहीं है अथवा ये जान-बूझकर झूठ बोल रहे हैं। विक्रमराव साहब कम से कम यह तो बताएं कि आधुनिक साहित्य के खासकर नए युग के लोकतांत्रिक प्रतिवादी लेखन के कविता, कहानी,उपन्यास आदि में जो मानक प्रगतिशील-जनवादी लेखकों ने बनाए क्या वे अन्य किसी ने बनाए हैं ?

राव साहब के इस लेख की एक बड़ी दिक्कत है कि यहां तथ्य की बजाय असत्य के आधार पर विचारों की जलेवी बनायी गयी है। प…

परवर्ती पूंजीवाद और साहित्येतिहास- भाग 2 और अंतिम अंश-

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उत्तर आधुनिकतावादी विकास का प्रधान लक्षण है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार,नेताओं में संपदा संचय की प्रवृत्ति, अबाधित पूंजीवादी विकास,उपभोक्तावाद की लंबी छलांग और संचार क्रांति। इन लक्षणों के कारण सोवियत अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी। सोवियत संघ और उसके अनुयायी समाजवादी गुट का पराभव एक ही साथ हुआ। सामान्य तौर इस पराभव को मीडिया में साम्यवाद की असफलता कहा गया। वास्तव में यह साम्यवाद की असफलता नहीं है। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह ‘आधुनिकीकरण की छलयोजना’ है। 
उत्तर आधुनिकतावाद दौर में क्रांति पर सबसे तेज हमले हुए हैं। इन हमलों के आंतरिक और बाह्य दोनों ही किस्म के रूप रहे हैं। इस प्रसंग में पहली बात यह कि क्रांति का वास्तव अर्थ इन दिनों विकृत हुआ है। उसका अवमूल्यन हुआ है। क्रांति का अर्थ परिवर्तन मान लिया गया है और प्रत्येक परिवर्तन को क्रांति कहने का रिवाज चल निकला है। क्रांति के अर्थ का यह विकृतिकरण है। क्रांति का अर्थ है बुनियादी या आमूल-चूल परिवर्तन।

क्रांति पर बहस करते हुए आमतौर पर कुछ इमेजों,कुछ आख्यानों, कुछ देशों ,कुछ खास क्षण विशेष आदि का जिक्र किया जाता है और यह क्रांति का भ्रष…

पश्चिम बंगाल में ममता सरकार का एक साल-विशेष लेख- मिस्चीफ मिनिस्टर

(पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पर केंद्रित ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका के ताजा 21 अप्रैल 2012 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी। कहने की जरूरत नहीं कि ‘इकोनोमिस्ट’ लंदन से प्रकाशित आज की दुनिया में वैश्वीकरण की विचारधारा की एक सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका है।अनुवाद- जगदीश्वर चतुर्वेदी)

कोलकाता के कूड़े से भरे बाजारों में घूमते किसी भी खरीदार को आम तौर पर यह पछतावा होता है कि एक महान ढहता हुआ लेकिन मजेदार शहर, जिसे कभी कलकत्ता के नाम से जाना जाता था और जो आज भी पश्चिम बंगाल राज्य की राजधानी है। जैसे प्लास्टिक की सस्ती चीजों और बंगाल के सांस्कृतिक नायक रवीन्द्रनाथ की प्लास्टर आफ पैरिस की आवक्ष-मूर्ति को खरीद कर किसी को अपनी जल्दबाजी के लिये अफसोस हो सकता है, वैसे ही पिछले साल के राज्य के चुनाव में वोट देने वाले अनेकों को हो रहा है। 34 सालों के अधम कम्युनिस्ट शासन से खिन्न लोगों ने ममता बनर्जी और उनकी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस को सत्ता सौंप दी। आज अपने इस चयन पर उनका अफसोस बिल्कुल साफ दिखाई देता है।

उनकी (ममता बनर्जी की . अनुवादक) भूलें साधारण किस्म की भूलें नहीं है। वे ईमानदार दिखती हैं…