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रविवार, 7 अगस्त 2016

दूसरी परम्परा , सत्ता और रवीन्द्रनाथ

       इन दिनों अचानक सत्ता के साथ लेखक के संबंध के सवाल को नामवरजी के जन्मदिन के बहाने हमारे अनेक लेखक मित्रों ने सत्ता को रसीले,लुभावने ढ़ंग से परिभाषित करना आरंभ कर दिया है,इसके लिए वे कुतर्क तक गढ़ रहे हैं।लेखक और सत्ता के संबंध का सवाल प्रमुख सवालों में से एक है,यह आश्चर्य की बात है कि ´दूसरी परम्परा की खोज´करते समय इस सवाल पर लोगों ने कभी विचार नहीं किया।जबकि दूसरी परम्परा ने सर्जक रवीन्द्रनाथ ने इस सवाल को अपने तरीके से हल करने की कोशिश की है और उससे बहुत कुछ सीख सकते हैं।

लॉर्ड कर्जन के आदेश से जब दिल्ली-दरबार का आयोजन किया गया तो रवीन्द्रनाथ ने उसका तीव्र विरोध किया था।इसके कारण उनको सरकार का क्रोध सहना पड़ा।उस समय उन्होंने जो बातें कही थीं उनको आज फिर से स्मरण करने की जरूरत है। रवीन्द्र नाथ ने लिखा ´दरबार एक प्राच्य वस्तु है।जब पाश्चात्य अधिकारी उसका उपयोग करते हैं तो उसका खोखलापन ही सामने आता है;उसकी पूर्णता नहीं।इस प्राच्य समारम्भ में ´प्राच्यता´ कहां है ॽ प्राच्यता इसमें है कि दो पक्षों के बीच आत्मिक सम्बन्ध स्वीकार किया गया है।तलवार के जोर से जो सम्बन्ध जुड़ता है वह तो विरोध का सम्बन्ध होता है। लेकिन सौजन्य द्वारा प्रस्थापित सम्बन्ध दोनों पक्षों को निकट लाता है।दरबार में सम्राट को अपना औदार्य व्यक्त करने का अवसर मिलता था।उस दिन सम्राट के महल का द्वार खुला रहता था और उसके दान की कोई सीमा न होती थी।पाश्चात्य नकली दरबार में कृपणता है,वहाँ जन-साधारण का स्थान बहुत ही संकीर्ण है।पहरेदारों के हथियार ´राजपुरूषों´ की संशय-वृत्ति जताते हैं और दरबार में जो व्यय होता है उसका भार अतिथियों को ही वहन करना पड़ता है। नतमस्तक होकर राजा का प्रताप स्वीकार करना-यही है इस दरबार का एक-मात्र तात्पर्य।इस उत्सव-समारोह में दोनों पक्षों के सम्बन्धों में जो अपमान-भावना निहित है वही व्यक्त होती है,और तड़क-भड़क से व्यक्त होती है।ऐसे कृत्रिम,हृदयहीन आडम्बर से प्राच्य हृदय को आक्रान्त किया जा सकता है इस विचार से ही धृष्टता टपकती है और शासकों की प्रजा के प्रति अपमानजनक भावना स्पष्ट होती है।भारत में अँग्रेजों का प्रभुत्व प्रत्येक स्थान पर व्याप्त है-विधान में,सभागृह में,शासनप्रणाली में।लेकिन इस प्रभुत्व को उत्सव का रूप देकर उसे और भी तीव्र बनाने का आखिर क्या प्रयोजन है ॽ ´

रवीन्द्र नाथ ने आगे लिखा ´इस तरह के कृत्रिम उत्सव से घोषित होता है कि भारतवर्ष में अँग्रेज़ मजबूती से जम गए हैं; लेकिन उनके साथ हमारा सम्बन्ध यान्त्रिक है,मानवीय नहीं।इस देश के साथ उनका नाता लाभ का है,व्यवहार का है,हृदय का नाता नहीं है।कर्तव्य के जाल से देश आवृत्त है।इस कर्तव्य की निपुणता और उपयोगिता स्वीकार की जा सकती है।फिर भी हमारी मानवीय प्रकृति तो स्वभावतःइस प्राणहीन शासन-तन्त्र से पीड़ित होती है।´

उन्होंने आगे जो कहा वह बहुत ही महत्वपूर्ण है, लिखा ´भारतवासी यदि आजीवन एक प्रबल शक्तिशाली यन्त्र का हाथ पकड़कर चलने के अभ्यस्त हो जायं तो इससे बढ़कर देश की दूसरी दुर्गति नहीं,चाहे उससे कितनी ही सुविधा क्यों न प्राप्त हो।´





सोमवार, 16 नवंबर 2015

तीन लेखकों की हत्या पर संसद मौन क्यों है ?

     श्याम बेनेगल साहब सवाल यह है कि एवार्ड लौटाना समाधान नहीं है तो लेखक-बुद्धिजीवी क्या करें ? यहां तक कि राज्यसभा में तो कई लेखक,सिनेकर्मी आदि सदस्य हैं उन्होंने भी पहल करके राज्यसभा में 3लेखकों की हत्या की निंदा करने वाला प्रस्ताव तक पेश नहीं किया , सरकार ने कोई पहल लेखकों से बात करके समाधान निकालने के लिए नहीं की । क्यों पीएम से लेकर गृहमंत्री तक हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं?

यदि राष्ट्रपति को लगता है कि लेखकों को इनाम को सहेजकर रखना चाहिए तो वे कम से कम केन्द्र सरकार को सीधे कह सकते हैं कि लेखकों से बुलाकर बात करो और उनको सुरक्षा का भरोसा दो।

क्या लेखक -बुद्धिजीवी चुप रहें और पिटते रहें ? अफसोस यह है कि 3 लेखकों की हत्या पर न तो यूपीए सरकार जागी और न एनडीए सरकार की अब तक नींद खुली है,अफ सोस की बात यह है कि संसद ने 3लेखकों की सरेआम हत्या की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव तक पास नहीं किया है। देश के लेखक किस तरह विश्वास करें कि उन पर हमले नहीं होंगे,अभी तक हमलावर संगठनों पर पाबंदी नहीं लगी है।



मोदी सरकार एवार्ड वापसी पर किस तरह सोचती है इसका साक्षात प्रमाण है केन्द्रीयमंत्री वी के सिंह का बयान,यह बयान लेखकों का सरेआम अपमान है। खासकर उन लेखकों का जो प्रतिवाद में एवार्ड लौटा रहे हैं,क्या इस मंत्री को कोई सरकार से हटा सकता है ,क्या इस तरह के गैर-जिम्मेदार बयान पर आपत्ति करके पीएम-राष्ट्रपति कोई बोलेगा ,जी नहीं, इस मामले में सारे स्वर-सारे रंग मिले हुए हैं,वरना एक मंत्री की बेबुनियाद आरोप लगाने की हिम्मत कैसे हुई कि वह यह कहे कि लेखकों ने पैसा लेकर असहिष्णुता की बहस छेड़ी है,मंत्री या तो प्रमाण दें या फिर लेखकों से माफी मांगे। यह विभिन्न राजनीतिक दलों और मीडिया की भी जिम्मेदारी है कि वीके सिंह को प्रमाण देने के लिए कहे या फिर माफी मांगने के लिए कहे। केन्द्रीय मंत्री का यह बयान असहिष्णुता की कोटि में ही आता है।

लेखक और राष्ट्रवाद

भारत में अनेक लोग हैं जो लेखक को सत्ता,राष्ट्र आदि से बंधा हुआ देखना चाहते हैं,लेकिन लेखक तो इनमें से कोई बंधन पसंद नहीं करता। मसलन् ,भारत जब गुलाम था तो उस समय ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ अनेक अंग्रेज लेखकों ने अपनी सरकार के खिलाफ लिखा। इनमें बायरन का नाम भी आता है।वह भारत की ओर देख रहे थे।1757 में पलासी की लड़ाई के बाद अंग्रेज अपना शासन विस्तार करते चले गए,वे लगातार नए-नए राष्ट्रों को गुलाम बना रहे थे। अंग्रेज लेखक जानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत मेंगुलामी स्थापित कर रहा है।
वे एक सभ्य देश का विकास समाप्त कर रहे हैं।वे भारत को सदियों पीछे ठेल रहे हैं। इसी संदर्भ में प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि बायरन ने 1811 में ' द कर्स ऑफ मिनर्वा' नामक कविता लिखी और इस कविता में मिनरवा नाम की देवी इंगलैंडवासियों को शाप देती है। अंग्रेजों को स्वाधीनता प्राप्त हुई है लेकिन वे अपनी स्वाधीनता का दुरुपयोग कर रहे हैं,वे दूसरों को गुलाम बना रहे हैं, वे एक दिन अवश्य विद्रोह करेंगे ।इस कविता के साथ 1857 के संग्राम को याद करें तो ऐसा लगेगा कि बायरन महान भविष्यद्रष्टा हैं-1857 में जो कुछ घटित हुआ उसका पूर्वाभास 1811 की कविता में है-
Look to the East ,where Ganges' swarthy race
Shll shake your tyrant empire to its base;
Lo ! there Rebellion rears her ghastly
And glares the Nemesis of native dead;
Till Indus roll a deep purpureal flood
And claims his long arrear of northern blood,
So may ye perish ! Pallas, when she gave
Your free born rights, forbade ya to enslave
मिनरवा अंग्रेजों से कहती है - "पूरब की तरफ देखो। गंगा के किनारे ये जो काले आदमी हैं,वे तुम्हारे अत्याचारी साम्राज्य को उसकी जड़ सहित हिला देंगे।देखो, वह विद्रोह दहक रहा है। सिंधु नदी लाल रक्त की धारा जैसी बह रही है । उत्तर के निवासियों का रक्त वह मांगती रही है,वह बहुत पुरानी माँग अब पूरी हो रही है।इसी तरह तुम्हारा नाश हो।पैलास देवी ने जब तुम्हें स्वाधीन नागरिकों के अधिकार दिए थे,तब उसने निषेध किया था कि दूसरों को दास मत बनाना।" बायरन की इन पंक्तियों में अंग्रेज शासकों के प्रति तीव्र रोष व्यक्त हुआ है।

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

ममता,वाम और संस्कृतिकर्मी



ममता बनर्जी ने अपने दल की ओर से अनेक संस्कृतिकर्मियों को विधानसभा चुनाव में खड़ा किया है। कई कलाकार उसके पहले लोकसभा में भी चुनकर गए हैं। यह स्वागत योग्य फिनोमिना है। यह संस्कृतिकर्मियों की राजनीतिक भूमिका की लोकतांत्रिक स्वीकृति है। इसके विपरीत वामदलों का संस्कृतिकर्मियों के प्रति नकारात्मक रवैय्या रहा है। वे उन्हें विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा के लायक नहीं समझते। उनके लिए वे महज भोंपू हैं। हिन्दी में सक्रिय वामपंथी दलों द्वारा संचालित लेखक संगठनों जैसे जनवादी लेखक संघ,प्रगतिशील लेखक संघ आदि की सामयिक दशा को जाने बिना ममता बनर्जी के फैसले की महत्ता तब तक समझ में नहीं आएगी।

कडुवा सच यह है वाम संचालित सभी लेखक संगठन आज हाशिए के बाहर हैं। हाशिए पर जाना घटना है और हाशिए के बाहर चले जाना त्रासदी है। दुर्घटना है। लेखक और संस्कृति मंचों की जरूरत तब ही महसूस की जाती है तब आप शोषित महसूस करें। लेखक जब शोषित महसूस करना बंद कर देता है तो संगठन की प्रासंगिकता खत्म हो जाती है। संगठन प्रतीकात्मक रह जाते हैं। लेखक संगठनों को सत्ता से कभी शक्ति नहीं मिलती। मलाई जरूर मिलती है।

इसी तरह लेखक संगठनों को राजनीति का अंग भी नहीं समझना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो लेखक संगठन हाशिए के बाहर जाने के लिए अभिशप्त हैं। विलक्षण आयरनी है कि लेखक संगठनों का काम करते हुए ह्रास हुआ है। सबसे ज्यादा सक्रिय लेखक संगठन आज सबसे ज्यादा निष्क्रिय हैं। कभी-कभार प्रतीकात्मक कार्यक्रम कर देते हैं,शोकसभा कर देते हैं,सम्मेलन कर लेते हैं, कभी कभार सेमीनार कर लेते हैं। लेकिन लेखकीय अधिकारों के लिए कभी संघर्ष नहीं करते। लेखक संगठन की सक्रियता प्रायोजक जैसी हो गयी है। सवाल यह है कि लेखक संगठन प्रायोजक कैसे हो गया ? प्रायोजक भाव में रहने के कारण ही उनकी प्रेरणा सीमित दायरे में सक्रिय है। जब किसी कार्यक्रम का आयोजन करता है तो प्रेरक और सक्रिय के भ्रम में रहता है। कार्यक्रम खत्म और प्रेरक का भ्रम भी खत्म। यही दशा लेखक संगठनों की है वे बगैर निवेश के लाभ लेना चाहते हैं। नाम कमाना चाहते हैं। मंच देना निवेश नहीं है। बल्कि मंच तो लाभ का स्रोत है। लेखक संगठन का निवेश आलोचनात्मक वातावरण के निर्माण पर निर्भर करता है। मंच मात्र देने से आलोचनात्मक वातावरण नहीं बनता। आलोचनात्मक वातावरण अनालोचनात्मक वातावरण को नष्ट करके बनता है। इसके लिए विचारधारात्मक और सर्जनात्मक योगदान की जरूरत होती है।मानवाधिकारों की हिमायत करने की जरूरत होती है। विचारधारात्मक-सर्जनात्मक वातावरण सीमाओं का अतिक्रमण करके ही बनता है। सीमाओं में बांधकर मंच और बहसों का आयोजन अनालोचनात्मक वातावरण को बनाए रखता है।

कल तक लेखक संगठन जिसे प्रेरणा,अपरिहार्य,अनिवार्य और स्वाभाविक मानते थे आज प्रेरणा लेने की बजाय उससे यांत्रिकतौर पर बंधे हैं। लेखक संगठन जितने बड़े उत्साह के साथ बनते हैं उतनी ही तेजी से उनका उत्साह ठंड़ा पड़ जाता है । कल तक जो लेखक संगठन की महत्ता पर निबंध लिखता था आज वही लेखक संगठन को अप्रासंगिक मानता है। कोई बात जरूर है जो लेखक संगठन को तमाम सक्रियता के बावजूद अप्रासंगिक बनाती है।

सवाल यह है कि लेखक संगठन की वर्तमान दशा और दिशा की क्या 'विखंडनवादी' रीडिंग संभव है ? लेखक संगठन के द्वारा विलोम निर्माण की प्रक्रिया को कभी गैर विखंडनवादी पध्दति और नजरिए के जरिए नहीं समझा जा सकता। 'सही' और 'गलत' राजनीतिक लाइन के आधार पर नहीं समझा जा सकता। 'प्रासंगिकता' और 'अप्रासंगिकता' के आधार पर नहीं समझा जा सकता। 'श्रेष्ठ' और 'निकृष्ट' के आधार पर वर्गीकृत करके नहीं समझा जा सकता।

मसलन् यह वर्गीकरण वैध नहीं है कि ''लेखक संगठन में काम करना 'श्रेष्ठ' है और जो लेखक, संगठन का काम नहीं करते वे निकृष्ट हैं।'' उसी तरह '' जो लेखक संगठन का काम करते हैं वे निकृष्ट हैं और जो बाहर हैं वे श्रेष्ठ हैं।'' इसी तरह '' लेखक संगठन का सोच सही है, व्यक्ति के रूप में लेखक का सोच गलत है।'' अथवा 'संगठन वैध है बाकी सब अवैध है।'' ''लेखक संगठन का सत्य प्रामाणिक है ,व्यक्ति लेखक का सत्य अप्रामाणिक है'', '' साहित्यिक विधा में लिखना लेखन है और गैर साहित्यिक विधाओं जैसे मीडिया में लिखना साहित्य नहीं है।'', ''लेखक संगठन में काम करना पुण्य है और गैर सांगठनिक लेखकीय कर्म पाप है।'', ''लेखक संगठन टिकाऊ है बाकी सब नश्वर है।'' इत्यादि वर्गीकरण बोगस हैं।

'लेखक संगठन ही सर्वस्व है' का नारा देने वाले यह भूल गए कि रचना का मूल स्रोत तो जीवन है। रचना का मूल स्रोत संगठन नहीं होता। अत: नारा होना चाहिए '' जीवन ही सर्वस्व है।'' इस नारे को भूलकर हमारे लेखक संगठनों ने मूल्य, कृति,राजनीति,विचारधारा इत्यादि चीजों को सर्वस्व बना दिया।

यही वह बिंदु है जहां से लेखक संगठन अपने को हाशिए पर ले जाते हैं और अंत में सिर्फ प्रतीकात्मक उपस्थिति मात्र बनकर रह जाते हैं। लेखक संगठनों का जीवन के प्रति वाचिक लगाव है, वे जीवन की महत्ता और मर्म से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं। जीवन की जटिलाओं को उन्होंने विश्वदृष्टि से देखा नहीं है। उन्होंने कभी परवर्ती पूंजीवाद ,इलैक्ट्रोनिक मीडिया,सैटलाइट के संदर्भ में लेखन को खोलकर नहीं देखा। साहित्य के दार्शनिक आयाम की कभी चर्चा तक नहीं की।

जीवन के साथ लगाव के नाम पर जीवन के इस या उस पक्ष की ही प्रतिष्ठा की गई। इस या उस पक्ष की हिमायत की गई। हिन्दी रचनाकार के लिए जीवनमूल्य महान और जीवन नश्वर रहा है। वह मानता है कि वह शाश्वत सत्य रच रहा है। अपने रचे को सत्य मानना, प्रामाणिक मानना,वैध मानना और उसी के आधार पर फतवे जारी करना मूलत: कर्मफल के सिध्दान्त का साधारणीकरण है। कर्मफल के सिध्दान्त का ही परिणाम है जो सही है वह सही है जो गलत है वह गलत है।

कर्मफल का सिद्धान्त स्त्री और दलित की अनुभूति और सामाजिक अस्मिता को स्वीकार नहीं करता। यही वजह है कि लंबे समय से लेखक संगठनों की कार्यप्रणाली में पितृसत्तात्मक विचारधारा हावी है। जो बड़ा है वह बड़ा है,जो छोटा है वह छोटा है। सांगठनिक हायरार्की का सब समय ख्याल रखा जाता है। ऊपर की शाखा की बातें निचली शाखा को मानना अनिवार्य है। सांगठनिक हायरार्की में चूंकि जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ में कम्युनिस्ट दलों की (क्रमश: माकपा और भाकपा) केन्द्रीय भूमिका है अत: पार्टी का आदेश अंतिम आदेश होता है और लेखक संगठनों के मुख्य पदाधिकारियों को तदनुरूप ही काम करना पड़ता है। आप कितने भी अच्छे संगठनकर्त्ता हों, कितने ही बड़े लेखक हों, यदि कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति अनुकरणात्मक भावना आपके अंदर नहीं है तो आपको संगठन में जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती। कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से लेखक संगठन को देखने वाला नेता अमूमन चुगद किस्म का व्यक्ति होता है जिसे किसी भी भाषा के साहित्य की समझ नहीं होती ऐसी स्थिति में वह सिर्फ अपने अनुयायी और विश्वस्त के हाथों ही संगठन का नेतृत्व सौंपना पसंद करता है। चाहे वह व्यक्ति कितना ही निकम्मा क्यों न हो।

सन् 1984-85 के बाद से समाजवाद के पराभव की जो प्रक्रिया शुरू हुई उसने महानगरीय सांस्कृतिकबोध और महानगरीय नजरिए पर ज्यादा जोर दिया है। भूमंडलीकरण के सवाल केन्द्र में आ गए हैं। समाजवाद फीका पड़ा है। वफादारी का भाव प्रबल हुआ है। संकट में आलोचकों की नहीं वफादारों की जरूरत महसूस होती है। लेखक संगठन जब वफादारों से घिरे हों तो समझना चाहिए संकट की गिरफ्त में हैं।

लेखक संगठन आधुनिक बनें इसके लिए जरूरी है कि वे सत्ता को अपना एजेण्डा न बनाएं, राजनीति को अपना प्रधान एजेण्डा न बनाएं। यदि वह ऐसा करते हैं तो सत्ता विमर्श का अंग बन जाएंगे। साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता, आतंकवाद आदि सत्ता विमर्श हैं। जनता के विमर्श नहीं हैं। लेखक संगठनों को विकल्प के विमर्शों को सामने लाना चाहिए।

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो हिन्दी और बांग्ला के वाम लेखक संगठनों की गतिविधियों की बड़ी फीकी तस्वीर उभरकर सामने आती है। उनके यहां वैकल्पिक विमर्श एकसिरे से गायब हैं। वे जिन विषयों पर बहस कर रहे हैं ,सेमीनार कर रहे हैं उनमें से अधिकांश सत्ता विमर्श का हिस्सा हैं। मसलन साम्प्रदायिकता,भूमंडलीकरण आदि सत्ता विमर्श के विषय हैं।

कायदे से सत्ता की राजनीति से भिन्न जनता और सत्ता के विकल्पों के विषयों पर काम करना लेखक संगठनों का लक्ष्य होना चाहिए। मजेदार बात यह है कि हमारे लेखक संगठनों ने कभी विकल्पों की खोज नहीं की। लेखक संगठनों में जितनी भी विचारधारात्मक बहसें चली हैं ये वे बहस हैं जो सत्ता और राजनीतिक दलों ने थोपी हैं। इनमें लेखक संगठन प्रतिक्रिया के रूप में दाखिल हुए हैं। लेखक संगठनों का एकमात्र काम प्रतिक्रिया व्यक्त करना, प्रेस विज्ञप्ति जारी करना, सत्ताधारी वर्गों के द्वारा थोपे गए मसलों पर राय देना रहा है। उन्होंने सालों-साल इसी काम में अपनी अजस्र ऊर्जा खर्च की है। यह वैसे ही है जैसे कोई ऊर्जावान व्यक्ति अपनी ऊर्जा सही कार्यों में खर्च न कर पाए और सुबह जॉगिंग में जाकर खर्च करे। जॉगिंग में खर्च की गयी ऊर्जा बेकार में व्यय की गयी ऊर्जा है। यह ऐसे व्यक्ति की ऊर्जा है जो संतुष्ट है और अपने शरीर से दुखी है। अपने ही शरीर के बोझ को संभालने में असमर्थ है। यही वजह है कि दसियों वर्ष लेखक संगठन का काम करने वाले लेखकबंधु अंत में हताश, आलस्य के मारे अथवा लेखक संगठन की क्रमश: निष्क्रियता के आख्यानों को सुना-सुनाकर अपने मन को संतोष देते रहते हैं वे एक तरह से यह भी बता रहे होते हैं कि उन्होंने कितनी बड़ी ऊर्जा निरर्थक कार्यों में खर्च की और देखो अब कोई लेखक हमारी नहीं सुन रहा।

लेखक संगठनों की वफादारी की त्रासदी यह है कि वे जिस राजनीति के लिए अपनी सारी ऊर्जा होम कर देते हैं उस राजनीतिक दल के अंदर भी उनके लिए कोई महत्वपूर्ण जगह नहीं होती। मसलन् मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अथवा अन्य राजनीतिक दलों में उनके लेखक संगठनों की पार्टीगत तौर पर क्या हैसियत है ?बुद्धिजीवियों की क्या हैसियत है इसे बड़ी आसानी से पोलिटब्यूरो और केन्द्रीय समिति के सदस्यों को देखकर समझा जा सकता है। कभी भी इन दलों की प्रधान कमेटियों में बुद्धिजीवी होने के नाते अथवा लेखक संघ के पदाधिकारियों को चुना नहीं जाता। आप बहुत बड़े कम्युनिस्ट लेखक हो सकते हैं किंतु कम्युनिस्ट पार्टी की फैसलेकुन कमेटियों में उनका कोई स्थान नहीं होगा। जबकि सोवियत संघ,चीन आदि में ऐसा नहीं है।भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का बुद्धिजीवियों को प्रचारक के रूप में इस्तेमाल करना वस्तुत मध्यकालीन दरबारीपन का अपभ्रंश रूप है। जाने-अनजाने बुध्दिजीवी वर्ग के प्रति इससे बेगानेपन का भाव ही संप्रेषित होता है। यह भी संप्रेषित होता है कि लेखक की सत्ता को कम्युनिस्ट पार्टियां किसी भी रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों में लेखकों के कामकाज की देखभाल और दिशानिर्देश का जिम्मा लेखक के पास नहीं बल्कि किसी राजनीतिज्ञ के पास होता है जिसे साहित्य-कला की कोई समझ नहीं होती। जब कम्युनिस्ट पार्टियां अपने यहां लेखक और बुद्धिजीवी को प्रधान दर्जा नहीं देती हैं तो बुर्जुआ दलों से यह कैसे उम्मीद की जाए कि वे लेखक को बड़ा दर्जा देंगी।

एक तथ्य गौर करने लायक है कि लेखक के नाते कांग्रेस ने कम से कम श्रीकांत वर्मा को अपने दल का महासचिव बनाया, कवि बाल कवि बैरागी को सांसद बनाया। राज्यसभा के लिए नामजद लोगों की सूची निकाली जाए तो कई लेखकों को सांसद के तौर पर नामांकित कराया। जबकि कम्युनिस्ट पार्टियों ने लंबे समय से किसी भी हिन्दी,बांग्ला,मलयालम आदि भाषा के लेखक को राज्यसभा में नामजद तक नहीं किया। किंतु किसी हिन्दी लेखक अथवा बुद्धिजीवी को कम्युनिस्ट पार्टियों ने टिकट नहीं दिया। कम से कम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले दल ने लेखक-बुद्धिजीवियों-कलाकारों से भरे पश्चिम बंगाल में इन लोगों को संसद-विधानसभा में खड़ा करके उनकी लोकतांत्रिक संसदीय हिस्सेदारी का रास्ता प्रशस्त किया है और यह स्वागतयोग्य बात है।

रविवार, 16 जनवरी 2011

राजधर्म से बड़ा है बौद्धिकधर्म

    बुद्धिजीवी सत्य भक्त होता है। राष्ट्र,राष्ट्रीयता, दल,विचारधारा आदि का भक्त नहीं होता। सत्य के प्रति आग्रह उसे ज्यादा से ज्यादा मानवीय और संवेदनशील बनाता है। सत्य और मानवता की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया में तपकर ही बुद्धिजीवी अपने सामाजिक अनुभवों को सृजित करता है। कालजयी रचनाएं दे पाता है। जनता के बृहत्तर तबकों की सेवा कर पाता है,सारे समाज का सिरमौर बनता है।
    बुद्धिजीवी गतिशील और सर्जक होता है। वह मानवीय चेतना का रचयिता है।   
बुद्धिजीवी स्वभावत: लोकतांत्रिक होता है, लोकतंत्र ही उसकी आत्मा है। लोकतंत्र की आत्मा के बिना बुद्धिजीवी होना संभव नहीं है। लोकतंत्र के उसूलों के साथ समझौता करना उसकी प्रकृति के विरूद्ध है। लोकतांत्रिक,मूल्य, लोकतांत्रिक संविधान,लोकतांत्रिक संरचनाओं में उसकी आस्था और विश्वास ही उसकी सम्पदा है यदि वह इनमें से किसी के भी साथ दगाबाजी करता है अथवा लोकतंत्र के रास्ते से जरा भी विचलित होता है तो उसे गंभीर कष्ट उठाने पड़ते हैं। साथ ही समाज को भी कष्ट उठाने पड़ते हैं। बुद्धिजी वीकाअस त्य के साथ किया गया समझौता सामाजिक दगाबाजी है।
      यह दुर्भाग्य है हम दगाबाज बुध्दिजीवी और ईमानदार बुध्दिजीवी में अंतर भूल गए हैं। ईमानदार बुध्दिजीवी वह है जो अपने अंदर के सत्य और न्यायबोध को बेधड़क,निस्संकोच भाव से व्यक्त करता है। यह ऐसा बुध्दिजीवी है जो अपने सत्य को अर्जित करने के लिए किसी भी किस्म के भौतिक लाभ के जंजाल में नहीं फंसता। किसी भी किस्म का प्रलोभन उसे सत्य की अभिव्यक्ति से रोकता नहीं है, वह निडर भाव से न्याय के पक्ष में खड़ा रहता है। अपने जीवन के व्यवहारिक कार्यों की पूर्त्ति के लिए सत्य का दुरूपयोग नहीं करता।  सत्य के लिए जोखिम उठाता है,सत्य पर दांव लगाता है,यहां तक कि सत्य के लिए बलि चढ़ जाता है। तरह-तरह के उत्पीड़न और उपेक्षाओं को सहता है। वह हमेशा राज्य के विपक्ष में रहता है और यथास्थितिवाद का विरोध करता है।
         यह सच है कि किसी भी किस्म का बड़ा परिवर्तन अथवा क्रांति बगैर बुध्दिजीवियों के हस्तक्षेप के नहीं हुई है। यह भी सच है  किसी भी किस्म की प्रतिक्रांति भी बुध्दिजीवियों केबिना नहीं हुई है। बुध्दिजीवीवर्ग ही किसी आंदोलन का माता-पिता , बेटी -बेटा ,पड़ोसी और मित्र होता है। बुध्दिजीवी की समाज में विशिष्ट भूमिका होती है उसे शक्लविहीन पेशेवराना रूपों में संकुचित करने जरूरत नहीं है। वह अपने वर्ग का सक्षम सदस्य होता है,अपने कार्य-व्यापार में समर्थ होता है। व्यक्ति के तौर पर बुध्दिजीवी संदेश को अभिव्यक्त करता है,संदेश को बनाने या धारण करने की उसके पास फैकल्टी होती है जिसे वह अभिव्यक्ति देता है। यह अभिव्यक्ति उसके एटीट्यूटस,दार्शनिक नजरिए में व्यक्त होती है।
      रूढ़ियों और कठमुल्लेपन से लड़े  बिना बुध्दिजीवी अपनी भूमिका नहीं निभा सकता। ये रूढ़ियां और कठमुल्लापन किसी भी तरह का हो, बुध्दिजीवी कभी भी इन्हें चुनौती दिए बगैर अपनी सामाजिक भूमिका अदा नहीं कर सकता।लालगढ़और  नंदीग्राम के संदर्भ में बुध्दिजीवियों का प्रतिवाद इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि पहलीबार वामपंथी बुध्दिजीवियों ने व्यापक स्तर पर वामपंथी कठमुल्लेपन और रूढिबध्दता को चुनौती दी है। पहलीबार वामपंथी चिन्तन के सर्वसत्तावादी रूझानों को निशाना बनाकर सवाल किए गए हैं, इससे बुध्दिजीवीवर्ग में वामपंथी कठमुल्लापन कमजोर होगा। इससे स्वतंत्रता और न्याय के लक्ष्य को अर्जित करने, उसके लिए संघर्ष की भावना नए सिरे से जन्म लेगी। पुरानी वामपंथी प्रतिबध्दता के मानक टूटेंगे और प्रतिबध्दता के मानक के तौर पर मानवाधिकारों की स्वीकृति पैदा होगी। स्वतंत्रता और न्याय को प्रतिष्ठा मिलेगी। पुराने किस्म की वामपंथी प्रतिबध्दता विचारधारा और वर्ग विशेष के हितों से बंधी थी, यह बंधन और प्रतिबध्दता संकुचित और एकायामी थी। इसमें मानवता और मानवाधिकारों का बोध शामिल नहीं था। वह पार्टी बोध से संचालित प्रतिबध्दता थी। जबकि नए किस्म की प्रतिबध्दता का आधार स्वतंत्रता और न्याय है। यह बहुआयामी प्रतिबध्दता है। स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर जब लिखेंगे अथवा संघर्ष करेंगे तो पुराने सभी विमर्श उलट- पलट जाएंगे। पुरानी वामपंथी प्रतिबध्दता जिन्दगी की अधूरी सच्चाई को सामने लाती है। जबकि स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर निर्मित यथार्थ ज्यादा व्यापक,वैविध्यपूर्ण, जटिल और मानवीय होता है।
       वामपंथी बुध्दिजीवियों की प्रतिबध्दता की मुश्किल यह है कि वे अंदर कुछ बोलते हैं और बाहर कुछ बोलते हैं। प्राइवेट जीवन में,पार्टी के अंदर बुध्दिजीवी कुछ बोलता है और बाहर कुछ बोलता है। उसके प्राइवेट और सार्वजनिक में भेद रहता है। यह उसके जीवन और विचार का दुरंगापन है। बुध्दिजीवी के विचारों और नजरिए में दुरंगापन नहीं पारदर्शिता होनी चाहिए। बुध्दिजीवी को पारदर्शी होना चाहिए। जब आप सार्वजनिक जीवन में सार्वजनिक सवालों से दो चार होते हैं तो उस समय प्राइवेट जैसी कोई चीज नहीं होती। उस समय बुध्दिजीवी पब्लिक या जनता का बुध्दिजीवी होता है, जनता के बुध्दिजीवी की भूमिका अदा करता है। लालगढ़-नंदीग्राम के प्रतिवाद में खड़े बुध्दिजीवी इसी अर्थ में जनता के बुध्दिजीवी हैं। बुध्दिजीवी का काम यह नहीं है कि अपनी ऑडिएंस को संतुष्ट करने वाली,आनंद देने,मजा देने वाली बातें कहे। इसके विपरीत बुध्दिजीवी का काम है अप्रिय सत्य का उद्धाटन करना, ऐसी बात को कहना जिसे ऑडिएंस नापसंद करती है। इसी अर्थ में बुध्दिजीवी किसी किसी नजरिए का समाज में प्रतिनिधित्व करता है। सभी किस्म की बाधाओं के बावजूद अपनी जनता का प्रतिनिधित्व करता है। बुध्दिजीवी जब सामाजिक प्रतिनिधित्व करता है तो उसे प्रतिबध्दता ,जोखिम ,साहस से काम लेना होता है और असुरक्षा का सामना करना होता है।
      बुध्दिजीवी कभी भी घरेलूपन के साथ सामंजस्य नहीं बिठाता। भाईचारे और मित्रता के नाते स्वतंत्रता और न्याय के प्रति अपनी प्रतिबध्दता को त्यागता नहीं है। बुध्दिजीवी का सामान्य स्वभाव यही होता है कि वह साफतौर पर कहता है वह क्या कर सकता है और क्या नहीं कर सकता। बुध्दिजीवी अपने कर्म के जरिए स्वतंत्रता पैदा करता है। वह मैलोड्रामा के जरिए स्वतंत्रता पैदा नहीं कर सकता। बुध्दिजीवी वह है जिसके चिन्तन,विश्वास और यथार्थ जीवनानुभवों की अभिव्यक्ति में फांक नहीं है। बौध्दिक गतिविधि का चरम लक्ष्य है मानवीय स्वतंत्रता और ज्ञान में इजाफा करना। जो लोग सोच रहे थे कि महाख्यान का अंत हो गया और बुध्दिजीवी छोटे-छोटे  भाषायी खेलों में फंस गया है। उन लोगों से सवाल किया जाना चाहिए क्या लालगढ़ या नंदीग्राम की हिंसा के सवाल पर बुध्दिजीवियों का प्रतिवाद रैनेसांकालीन स्वतंत्रता और न्यायप्रियता की अभिव्यक्ति है या नहीं ?
         यह सच है कि पश्चिम बंगाल में वामपंथी बुध्दिजीवी अपने आलस्य, अक्षमता और उपेक्षाभाव के कारण स्वतंत्रता और न्यायप्रियता के मार्ग से भटक गए थे,किंतु नंदीग्राम की घटना ने उनके आलसी अक्षम भाव को तोड़ा है। 'इनडिफरेंस' को खत्म किया है। अपने आलसी अक्षम और इंडिफरेंस के कारण ही वे लंबे समय से चुप थे ,गलत को देखकर भी नहीं बोलते थे, सह रहे थे। किंतु नंदीग्राम के घटनाक्रम ने उनके आलस्य और इंडिफरेंस को खत्म कर दिया है। वे कभी वाम सरकार के अन्यायों के खिलाफ नहीं बोलते थे। वे कभी-कभार बुर्जुआ सरकारों के अन्याय का प्रतिवाद कर देते थे किंतु वाम सरकार का प्रतिवाद नहीं करते थे। किंतु नंदीग्राम ने उनको अंदर से झकझोरा है बदलने को मजबूर किया है। आज नंदीग्राम के वामपंथी प्रतिवादी अपना तयशुदा नजरिया बदलने को मजबूर हैं। अपने ही विचारों और धारणाओं से दगा कर रहे हैं। क्योंकि उनकी जिंदगी के ठोस अनुभव उन्हें चुनौती दे रहे हैं,उद्वेलित कर रहे हैं। जिंदगी के ठोस अनुभव जब आधुनिक जीवन को चुनौती देते हैं तो बौध्दिकों में भी परिवर्तन की लहर चलती है।
     वामपंथी बुध्दिजीवियों में ज्यादातर ऐसे लोग हैं जो किसी किसी रूप में सरकारी संस्थानों से जुड़े रहे हैं। राज्य और केन्द्र सरकार के सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े रहे हैं। उनकी इस अवस्था के कारण उनमें खास किस्म की अधिकारहीनता की स्थिति भी पैदा हुई है। वे जनता के बीच में हाशिए पर चले गए हैं। ये ऐसे बुध्दिजीवी हैं जिनको सरकार, कारपोरेट घरानों,मीडिया उद्योग आदि ने किसी किसी रूप में बांधा हुआ है। ये सत्ता के प्रतिष्ठानों के सबसे करीबी समुदाय का हिस्सा हैं। इसी अर्थ में ये जनता के साथ प्रभावशाली ढ़ंग से संवाद और संप्रेषण करने में समर्थ भी हैं। यहीं से वामपंथी बुध्दिजीवियों की मुश्किलें शुरू होती हैं। सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ अपने नाभिनालबध्द संबंध के कारण कलात्मक और बौध्दिक स्वतंत्रता को वे बरकरार नहीं रख पाए हैं। संभवत: चंद ही बुध्दिजीवी ऐसे हैं जो सत्ता के दबावों का प्रतिवाद  करते हों,स्टीरियोटाईप लेखन से बचते हों, वास्तव अर्थों में चीजों में रमण करते हों, वास्तविकता के साथ जिनका जेनुइन संबंध हो। बुध्दिजीवी में ईमानदारी का भाव पैदा करने के लिए उसका स्टीरियोटाईप से बचना, उसका उद्धाटन या नंगा करना जरूरी है। बुध्दिजीवी वह है जो स्टीरियोटाईप विजन के मुखौटे उतार दे और जिसके पास आधुनिक संप्रेषण के तरीके हों। राजनीतिक संघर्ष को सत्य के साथ जोड़ना आधुनिक बुध्दिजीवी का काम है, राजनीतिक संघर्ष का लक्ष्य सत्य को ढंकना नहीं है बल्कि सत्य और राजनीति के रिश्ते को मजबूत बनाना है।
     जो बुध्दिजीवी ऐसा नहीं कर पाते वे अपने जीवन के अनुभवों के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाते। यह सच यह है आज राजनीति से किनाकशी संभव नहीं है ,चारों ओर राजनीति है। शुध्द साहित्य और शुध्द कला संभव नहीं है। यह भी संभव नहीं है कि बुध्दिजीवी मीडिया और सत्ता के प्रतिष्ठानी दबावों से बच जाए। सत्ता और मीडिया के आख्यान बुध्दिजीवी पर दबाव बनाए रखते हैं। मीडिया ,सत्ता और विचारों का समूचा संसार बुध्दिजीवी पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए दबाव पैदा करता है। उसे बार-बार यही एहसास कराया जाता है कि जो स्वीकृत है, वैध है उसे ही स्वीकार करे, माने और उसी को व्यक्त करे। यही वह बिंदु है जिसके मुखौटे उतारने की जरूरत है।
     स्वीकृत और वैध के मुखौटे उतारने के क्रम में ही वैकल्पिक आख्यान सामने आता है, प्रत्येक बुध्दिजीवी अपनी क्षमता के अनुसार यह काम कर सकता है और सत्य को बता सकता है। यह बेहद मुश्किल कार्यभार है। इसी संदर्भ में एडवर्ड सईद ने लिखा है बुध्दिजीवी अकेला खड़ा होता है। सईद ने लिखा है कि मध्यपूर्व युध्द के दौरान मेरे लिए अकेले खड़े रहना कितना मुश्किलभरा काम था। बुध्दिजीवी का हमेशा समूह और व्यक्ति के बीच का अन्तर्विरोध रहेगा। यही वजह है कि बुध्दिजीवी हमेशा कमजोर और गैर- प्रस्तुत का हिमायती होता है।
      कमजोर और अप्रस्तुत की हिमायत में खड़े होना लालगढ़- नंदीग्राम के बौध्दिक प्रतिवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि है। सईद के शब्दों में बुध्दिजीवी तो शांत करने वाला होता है और जागरूकता पैदा करने वाला होता है बल्कि उसके दांव तो आलोचनात्मक बोध पर लगे हैं। यह ऐसा बोध है जो किसी भी किस्म के सहज फार्मूले को स्वीकार नहीं करता, अथवा रेडीमेड क्लीचे स्वीकार नहीं करता। अथवा वह ताकतवर लोग क्या कहते हैं  यह नहीं सोचता।अथवा परंपरागत के साथ सहज संबंध नहीं बनाता । उनके अंतर्विरोधों के साथ सामंजस्य नहीं बिठाता।निष्क्रियभाव से सब कुछ स्वीकार नहीं करता ।बल्कि सक्रिय रूप से जनता को सम्बोधित करता है। बुध्दिजीवी का कार्य है निरंतर सजगता बनाए रखना,यह कोशिश करना कि कहीं अर्ध्द-सत्य अथवा अर्ध्दविचारों की अभिव्यक्ति तो नहीं हो रही। यही वजह है कि वह यथार्थवाद के साथ टिकाऊ रिश्ता बनाता है। अपनी खिलंदड़ी रेशनल ऊर्जा का जनसंघर्षों के पक्ष में इस्तेमाल करता है। निहितस्वार्थों से ऊपर उठकर आम जनता के बीच में अभिव्यक्त करता है।
      बुध्दिजीवी की असल परीक्षा आपात्काल या संकट की घड़ी में होती है। ऐसी अवस्था में जो बुध्दिजीवी अपना रेशनल, लोकतांत्रिक विवेक नहीं खोता और सत्य के साथ खड़ा होता है ,जोखिम उठाता है वही सही अर्थों में अपने बौध्दिकधर्म को निभाता है। बौध्दिकधर्म राजधर्म से बड़ा है।संकट अथवा आपातकाल में सच को छिपाना,चुप रहना सबसे बड़ा अपराध है  इससे बुध्दिजीवी को बचना चाहिए। बुध्दिजीवी का धर्म राजधर्म से भी बड़ा होता है।  
    
      
       
           

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