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मदनमोहन मालवीय और हिन्दू -मुस्लिम एकता की समस्या

देश में साम्प्रदायिक माहौल बिगडा हुआ है ,संघ और उनके नायक मोदी द्वारा वोट की राजनीति को बहुसंख्यकवाद की राजनीति और धर्माधारित राजनीति की ओर मोड़ा जा चुका है। यह देश के लिए सबसे ख़तरनाक चीज है। देश में चारों ओर मुस्लिम विद्वेष की बर्षा हो रही है। साथ में मदनमोहन मालवीय जी को भारतरत्न देकर सम्मानित भी किया जा रहा है, दुर्भाग्य की बात है कि मालवीयजी के विचारों के साथ संघ और मोदी सरकार का तीन- तेरह का संबंध है । संघ और उसके संगठनों की विचारधारा की धुरी है हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष , जबकि मालवीयजी के विचारों की धुरी है हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव। मोदी नारा विकास का दे रहे हैं लेकिन ज़मीनीस्तर पर बहुसंख्यकवाद की ओर जा रहे हैं। हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष को बढ़ावा दे रहे हैं,फ़ंडामेंटलिस्ट संगठनों की हिमायत कर रहे हैं।संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा  भारत को हिन्दुओं का देश कहकर दुष्प्रचार किया जा रहा है। जानें और पढें संघ वाले कि मालवीयजी ने क्या लिखा था।      मदन मोहन मालवीय ने लिखा " हिन्दुस्तान में अब केवल हिन्दू ही नहीं बसते हैं - हिन्दुस्तान अब केवल उन्हीं का देश नहीं है। हिन्दुस्तान जैसे हिन्दु…

साहित्यकार की बदबू' और "जनवादीसेंट"

रायपुर साहित्य मेला पर हिन्दी के रायपुरिया प्रतिवादी वामलेखकों की तथाकथित प्रतिवादी प्रतिक्रियाएं और जलेसं के रुख को देखकर जनवादी-प्रगतिशील साहित्यकार पदबंध से घृणा होने लगी है। यह साहित्यिक बदबू पहले भी थी,लेकिन इधर तो इसने विराट रुप धारण कर लिया है । इसे हम सुविधा के लिए 'साहित्यकार की बदबू' या 'साहित्य का कचड़ा' कहेंगे। आप जितना ही लेखक संगठनों के करीब जाएंगे उतना ही इस बदबू का अहसास करेंगे। हिन्दी में हमने साहित्यकार की घिनौनी हरकतों को छिपाने के लिए कुछ तथाकथित वैचारिकसेंट का इस्तेमाल किया है। जनवादीसेंट उसमें से एक है। हम कहना चाहते हैं इससे साहित्यिक बदबू खत्म नहीं होगी! साहित्यिक गंदगी साफ नहीं होगी। जनवादीसेंट तो लेखक का नकली आवरण है।

    उल्लेखनीय है साहित्यिक गंदगी को कभी हिन्दी के तीनों बड़े लेखक संगठनों (जलेसं,प्रलेसं,जसम) ने निशाना नहीं बनाया । रायपुरिया वामप्रतिवादी लेखकों ने भी कभी इसके खिलाफ कुछ नहीं लिखा! लेखक संगठनों के द्वारा प्रकाशित पत्रिकाएं देखें और खोजें कि 'साहित्यकार की बदबू' और ' साहित्य का कचड़ा' क्या इनके निशाने पर है…

रायपुर से आगे देखे जलेसं

रायपुर साहित्य मेला पर 'जलेसं' के महासचिव -उपमहासचिव का बयान देखने को मिला, आज के संदर्भ में यह बयान एकदम अप्रासंगिक है। पर जलेसं का मानना है यह "महत्वपूर्ण " बयान है ।यह बयान यदि रायपुर मेले से आगे जाकर छत्तीसगढ़ को देख पाता तो बेहतर होता ! मसलन् छत्तीसगढ़ की अकादमियों के बारे में जलेसं बताता या म.प्र. में अकादमियों का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है ,उन पर कुछ कहता, लेकिन जलेसं का कोई प्रभावी हस्तक्षेप नजर नहीं आया !
फ़िलहाल रायपुर साहित्य मेला पर केन्द्रित करें और देखें तो पाएँगे कि जलेसं का बयान इवेंट केन्द्रित और सरकार केन्द्रित नज़रिए तक सीमित है। इस बयान की अपनी सीमाएँ हैं । क़ायदे से हमें रायपुर से आगे देखना चाहिए, हम इवेंट केन्द्रित रहे तो लेखकों की फ़ज़ीहत और अपमान का सिलसिला थमेगा नहीं ,ख़ासकर जनवादी- प्रगतिशील लेखकों के अपमान करने की आदत बंद नहीं होगी ।

जिस तरह जनवादी लेखक संघ के सम्मानित सदस्य असद ज़ैदी ने गंदी भाषा का मेरे प्रसंग में इस्तेमाल किया वह निंदनीय ही नहीं है बल्कि इस बात का संकेत भी है कि लेखकों में एक समूह किस तरह असभ्य और अशालीन हो गया है । ख़ास…

जनवादी भोलापन

रायपुरसाहित्य मेला पर जनवादी लेखक संघ का बयान अनेक विलक्षण और संकीर्ण बातों की ओरध्यान खींचता है। मसलन्, बयान में लिखा गया है,छत्तीसगढ़ सरकार का यह आयोजन '' लेखकों तथा जनवादी रुझान के बुद्धिजीवियों केबीच विभेद और बिखराव के अपने एजेंडे को पूरा करना चाहता है.'' सवाल यह है यदि आपलोग जानते हीहैं कि वे क्या चाहते हैं तो फिर आपस में लड़ क्यों रहे हैं ? लेखकों में जानबूझकरफूट कौन पैदा कर रहा है ? स्वयं लेखक या भाजपा सरकार ? वस्तुगत स्थिति यह है किवहां जाने वाले किसी लेखक ने न जाने वाले लेखकों के खिलाफ कुछ नहीं लिखा और न बोला! साहित्यिक मान-मर्यादाओं और लोकतांत्रिक आचार-व्यवहार की अवहेलना उन लेखकों ने कीजो अपने को ''वामरक्षक'' कहते हैं। फूट के स्रोत ये ''वामरक्षक'' हैं ! फूट डालनेका काम वहीं से आरंभ हुआ।सार्वजनिक निंदा अभियान उन्होंने चलाया। असद जैदी-मंगलेशडबराल आदि ने तो अपमानजनक भाषा तक का इस्तेमाल किया। आश्चर्य की बात है इन ''वामरक्षक''लेखकों के हमलावर और फूट डालने बयानों की जलेसं ने निंदा तक नहीं की ! असभ्य आचरणकरने वाले लेखक…

'अभद्र वामलेखकों'' का कुवाम-खेल

मैं रायपुर साहित्यमेला में शामिल क्या हुआ,हिन्दी के ''अभद्र वामलेखक'' बागी हो गए! जो लेखक रायपुर गए उनके बारे में फेसबुक पर ये ''अभद्र वामलेखक'' अतार्किक और असभ्य बातें लिखने लगे,  असद जैदी-मंगलेश डबराल आदि ने तो लेखकीय गरिमा को नरक के हवाले कर दिया !सारी शिष्टता-भद्रता की सीमाएं तोड़ दीं। फेसबुक पर गालियां दीं,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। हम बलिहारी हैं उन महान सभ्य जनवादी लेखकों के जिन्होंने इस तरह की असभ्यता को अपनी फेसबुक वॉल पर प्रश्रय दिया,प्रच्छन्न और प्रत्यक्ष समर्थन दिया !!
     गालियां देना,अश्लील,अशालीन भाषा में लिखना ''अभद्र वामलेखकों '' की विशेषता है। इस '' अभद्र वामलेखकों '' के सहयोगी हैं ''भद्रवाम लेखक'', जो ''अभद्रलेखकों'' की अभद्रता को मौन समर्थन दे रहे हैं। फेसबुक पर अभद्रता का 'वाम-खेल' असल में वाम के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है । इससे हिन्दी लेखकसमाज कलंकित हुआ है।   ''अभद्र वामलेखक'' ,अपनी 'कु-कलम' से रायपुर साहि…

कॉमरेड ! कबीलावाद को जनवाद नहीं कहते !

PublicFriendsOnly MeCustomClose FriendsCalcutta, India AreaSee all lists...Mathura, Uttar Pradesh AreaHaridwar AreaGo Back हिन्दी लेखकों के एक बड़े हिस्से में फेसबुक से लेकर सांगठनिक स्तर तक कबीलावादी मानसिकता बनी हुई है। वे गुट बनाकर काम करते हैं, अपने गुट के सदस्य की प्रशंसा करते हैं, गुट का सदस्य घटिया काम करे,तब भी प्रशंसा करते हैं,उसकी स्तरहीन रचना को भी महान बनाकर पेश करते हैं, हर हालत में उसके पक्ष में खड़े होते हैं, जो उनसे अससहमत हो,उनकी आलोचना लिखे, उसपर निजी हमले करते हैं। फेसबुक पर सक्रिय अधिकांश जनवादी-प्रगतिशील लेखकों की फेसबुक वॉल देखें तो पाएंगे कि ये लोग फेसबुक पर कोई गंभीर विचार-विमर्श नहीं करते, केन्द्र-राज्य सरकारों की जनविरोधी हरकतों या फैसलों की कभी तीखी आलोचना नहीं करते। साहित्य-कला के सवालों पर नहीं लिखते। इनकी दुनिया आत्म-प्रशंसकों से घिरी है। ये अपनी प्रशंसा करते हैं, जो उनकी प्रशंसा करता है, उसकी प्रशंसा करते हैं। इनकी फेसबुक वॉल पर किसी भी साहित्यिक मसले पर कोई बहस नहीं मिलेगी। ये फेसबुक में हैं लेकिन फेसबुक से जुड़े किसी भी ज्ञान-विज्ञान को पढ़ने में इनकी …

मंगलेश डबराल-असद जैदी असभ्य भाषा के प्रयोग के कारण ब्लॉक किए गए,

असद जैदी-मंगलेश डबराल ब्लॉक किए गए ,क्योंकि वे फेसबुक पर असभ्य भाषा लिख रहे थे। शिक्षितों और खासकर लेखक का असभ्य भाषा बोलना अपराध है।कल जबरीमल पारख ने एक पोस्ट लिखी,जिस पर चर्चा चल रही थी,उसमें कहीं से असद जैदी दाखिल हुए और गालियां बकने लगे,मंगलेश डबराल ने भी असभ्य भाषा लिखी, उन्होंने असद की भाषा की प्रच्छ्न्न हिमायत की। फेसबुक पर हिन्दी के लेखक जब भी बहस करते हैं तो तर्कहीन होने पर तुरंत असभ्यभाषा लिखने लगते हैं।बहस करने का धैर्य नहीं है तो फेसबुक पर मत जाओ।गालियां दोगे, पर्सनल अटैक करोगे,ब्लॉक कर दिए जाओगे। हिन्दी लेखकों में एक वर्ग की आदत है बहस में अ-लोकतांत्रिक हो जाना,गुटबाजी करके लेखक के खिलाफ घटिया अ-साहित्यिक प्रचार अभियान चलाना। फेसबुक पर भी ये बीमारियां ये ही लेखक ला रहे हैं। पढ़ें पूरी पोस्ट-


पूरी बहस पढ़ें-

Jawari Mal Parakh की मूल पोस्ट-

हमारे एक प्रिय मित्र जो छतीसगढ़ सरकार द्वारा आयोजित और प्रायोजित साहित्योत्सव में भाग लिया है, उनका मानना है की यह आयोजन बीजेपी में कट्टरपंथियों और उदारतावादियों के बीच के संघर्ष का नतीजा है. मैं नहीं जानता कि बीजेपी में उदारत…

रायपुर साहित्य मेला के बहाने लिबरल बनने की चाह

रायपुर साहित्य मेला में आना कई मायनों में सार्थक रहा, यह मेला असल में भाजपा के अंदर चल रही लिबरल राजनीतिक प्रक्रिया के अंग के रुप में देखा जाना चाहिए। भाजपा की आंतरिक संरचनाओं में लिबरल बनाम हिन्दुत्व के अंतर्विरोधों को सहज ही देखा जा सकता है। यह एक सच्चाई है कि छत्तीसगढ़ सरकार का हाल की कई अमानवीय - जनविरोधी घटनाओं के कारण आम जनता से अलगाव बढा है। जिस दिन (१२-१४ दिसम्बर २०१४) साहित्यमेला आरंभ हुआ उस दिन (१२ दिसम्बर) विभिन्न विरोधी राजनीतिक दलों ने रमन सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करते हुए जुलूस निकाले, कांग्रेस ने साहित्यकारों से साहित्य मेला में न जाने की अपील की। लेकिन इसके बावजूद यह मेला हुआ। स्थानीय साहित्यकारों को भी इस सम्मेलन में सक्रिय रुप से भाग लेते देखा गया। एक बुज़ुर्ग साहित्यकार ने केदारनाथ सिंह के रवैय्ये की तीखी आलोचना भी की, उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार का दिल्ली स्थित जनसंपर्क अधिकारी केदारजी के घर मुख्यमंत्री का निमंत्रण पत्र लेकर गया था उन्होंने आने के बारे में अपनी स्वीकृति भी दी,इसके बाद ही निमंत्रण पत्र से लेकर अन्य सभी प्रचार सामग्री  में उनका नाम…

रायपुर साहित्यमेला में दिया गया भाषण- वर्चुअल रियलिटी की चुनौतियाँ

आभासी संसार यानी वर्चुअल जगत,यह असल में वर्चुअल रियलिटी है। यह तकनीकी है,अवधारणा नहीं है,यह वातावरण है,एनवायरमेंट है। 7जून1989 को कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर तंपनी ऑटोडेक्स और कम्प्यूटर कंपनी बीपीएल ने इसकी घोषणा की। इसका जन्म 1984 में एक विज्ञानकथा के गर्भ के जरिए हुआ।विलियम गिब्सन के उपन्यास 'न्यूरोमेंसर' से इसका सिलसिला शुरु होता है। इसका राजनीतिक आयाम भी है,यह 'स्टारवार'कार्यक्रम के गर्भ से निकली तकनीक है।यह समाजवाद के पराभव के साथ आई तकनीक है। जो लोग पूंजीवाद के प्रति आलोचनात्मक रवैय्या रखते थे,समाज को बदलना चाहते थे,जिनमें युद्ध के खिलाफ और शांति के पक्ष में भावनाएं थी उन्हीं को वर्चुअल रियलिटी ने निशाना बनाया।नई जीवनशैली दी।वर्चुअल रियलिटी के सिद्धांतकार जेरोन लेनियर ने वर्चुअल रियलिटी को पेश करते हुए नारा दिया '' जनता को कल्पनाशीलता से मुक्त करो,लोगों को संप्रेषित करने में मदद करो।'' आरंभ में वर्चुअल रियलिटी में सामाजिक आलोचना का भाव था बाद में सिर्फ तकनीकी रह गई।जो आलोचक थे वे व्यवसायी हो गए।      जेरोन लेनियर ने लिखा है ' वर्चुअल रियलिटी हमारे बाह…