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मंगलवार, 22 अगस्त 2017

शिक्षा किसके दवाब में है ? शिक्षा के शत्रु कौन हैं ?


      भारतीय समाज की आयरनी यह है कि सब शिक्षा लेना चाहते हैं लेकिन शिक्षा पर सोचना कोई नहीं चाहता।शिक्षा साझा समस्या है लेकिन इस पर न कोई जनांदोलन है और न किसी तरह की सामाजिक सचेतनता नजर आती है।यहां तक कि शिक्षकों और छात्रों में भी शिक्षा की समस्याओं को लेकर कोई सचेतनता और सक्रियता नहीं है।राजनीतिकदलों ने हमेशा शिक्षा को एक मृत विषय या अप्रासंगिक विषय के रुप में  व्यवहार किया है।शिक्षितों में शिक्षा संबंधी अचेतनता बताती है कि हमारा शिक्षित समाज, राजनीतिक संरचनाएँ, संसद-विधानसभा आदि  इस विषय को लेकर कितनी अचेत हैं।
     कल दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने यह फैसला लिया कि ४०० से ज्यादा प्राइवेट स्कूलों को सरकार अधिग्रहीत करेगी क्योंकि वे स्कूल सरकार की नहीं मान रहे थे और मनमानी फ़ीस वसूल कर रहे थे। कायदे से इस तरह के फैसले अन्य राज्य सरकारों को भी लेने चाहिए।दिल्ली सरकार ने पहले निजी स्कूलों को चेतावनी दी जब उन्होंने चेतावनी नहीं मानी तो सरकार ने अधिग्रहीत करने का आदेश दिया।दिलचस्प बात यह है इस खबर को मीडिया ने कहीं पर भी प्रमुखता से न छापा और न टीवी कवरेज ही मिला।शिक्षा को लेकर जो उदासीनता है यह उसका ताजा उदाहरण है। मैंने हाल ही में अपने तीस साल के टीवी अध्ययन में पहलीबार एकमात्र एनडीटीवी पर कई दिनों तक लगातार स्कूली शिक्षा की दशा पर महत्वपूर्ण सचेतनता पूर्ण टीवी टॉक शो देखा।किसी भी टीवी ने आज तक इतना व्यापक कवरेज शिक्षा पर प्राइम टाइम में नहीं दिया।
          असल में शिक्षा का विगत सत्तर सालों में बुनियादी अर्थ ही बदल गया है , जेएनयू पर जिस तरह केन्द्र सरकार,आरएसएस और कारपोरेट मीडिया ने हमला किया है उसने एक ही संदेश दिया है कि शिक्षा व्यवस्था को सरकारी दल का पिछलग्गू या भोंपू होना चाहिए।शिक्षा तकरीबन समूचे देश में आज सरकारी दल के पिछलग्गू के रुप में ही काम कर रही है।विभिन्न राज्य सरकारें अपने निहित स्वार्थी नजरिए के अनुकूल लोगों को नौकरी देती हैं और तदनुरूप पठन-पाठन भी होता है।
                 विगत सत्तर सालों में तीन तरह के उपयोगितावाद को शिक्षा में देखा गया है।पहला, राजनीतिक उपयोगितावाद,दूसरा,व्यापारी उपयोगितावाद और तीसरा ,नौकरीकेन्द्रित उपयोगितावाद।शिक्षा संबंधी नीति,परिप्रेक्ष्य और आधारभूत संरचनाओं के निर्माण संबंधी फैसले इन तीन तरह के उपयोगितावाद को केन्द्र में रखकर लिए जाते रहे हैं, इसने आम शिक्षितों के शिक्षा संबंधी अज्ञान में इजाफा किया है,शिक्षा सचेतनता को दोयम दर्जे की चेतना बनाकर रख दिया है।
            शिक्षा का बुनियादी काम उपयोगितावादी बुद्धि निर्मित करना नहीं है। शिक्षा का बुनियादी काम है सचेतन नागरिक बनाना।दिलचस्प बात यह है हम जब पढते-पढाते हैं तो उपभोगवादी दृष्टिकोण से काम लेते हैं। मांग-पूर्ति के नजरिए से कक्षा में प्रवेश करते हैं।पाठ्यक्रम पढाना है और पाठ्यक्रम पढना है।काम के सवाल और उनके उत्तर बताना -लिखाना मात्र मकसद रह गया है।छात्र ,शिक्षा और शिक्षक की इतनी सीमित भूमिका के कारण ही आज शिक्षा एकदम अप्रासंगिक होकर रह गयी है।इसने शिक्षक को दाता और छात्र को उपभोक्ता मात्र बनाकर रख दिया है।आज शिक्षक और छात्र शिक्षा के कल-पुर्ज़े मात्र होकर रह गए हैं।आज छात्र-शिक्षक सचेतन नागरिक नहीं रह गए, बल्कि उलटा हो रहा है , जेएनयू के छात्रों -शिक्षकों को सचेतन नागरिक होने के नाते,उनके समर्थक शिक्षकों और छात्रों को सारे देश में राष्ट्रविरोधी कहकर अपमानित किया जा रहा है।
            जेएनयू का इस व्यवस्था के साथ एक ही बात पर मेल नहीं बैठता , वे शिक्षा के उपयोगितावाद और दाता-उपभोक्ता वाले मॉडल को एकसिरे ठुकराते  हैं,यही वजह है कि जेएनयू आज केन्द्र सरकार,आरएसएस और कारपोरेट मीडिया के निशाने पर है। जेएनयू की खूबी है कि वहाँ शिक्षित नागरिक तैयार किए जाते हैं और यही वजह है कि सत्ताधारियों को यह बात पसंद नहीं है।जेएनयू के छात्र और शिक्षक नागरिकचेतना, नागरिक हकों और संवैधानिक सोच-समझ को लेकर शिक्षित  हैं, वे दैनन्दिन राजनीति की जटिलताओं को समझने और उनका समाधान खोजने, उसके लिए संघर्ष करने की समझ रखते हैं,वे मूढमति शिक्षितजन नहीं हैं,इस मायने में वे सारे देश से भिन्न एकदम विकसित चेतनायुक्त नजर आते हैं।जेएनयू माने सचेतन नागरिक की पहचान ,यही चीज है जो सत्ताधारियों को बेचैन किए रहती है।पहले कांग्रेसी परेशान थे अब आरएसएस परेशान है।
         शिक्षा जहाँ एक ओर नागरिकबोध पैदा करे वहीं साथ ही सामाजिक यथार्थ के अन्तर्विरोधों को गहराई से जानने की दृष्टि भी दे।इन अन्तर्विरोधों को जाने बग़ैर नागरिकचेतना नहीं बनती।जेएनयू में यह दृष्टिकोण पूरे कैम्पस के माहौल में रचा बसा है।आप किसी भी विषय के  शिक्षक और छात्र हों यह परिवेश आपको शिक्षित करेगा,अन्यत्र संस्थानों में यह चीज दुर्लभ है।अन्यत्र शिक्षा संस्थानों में "शिक्षित युवा", "कमाऊ युवा" मिलेगा ,नागरिकचेतना संपन्न नागरिक कम मिलेंगे।
             
     

रविवार, 30 जुलाई 2017

जेएनयू में भाजपा का आतंकराज


           जेएनयू में भाजपा-आरएसएस के आतंक और उत्पीड़न के नए युग की शुरूआत हो चुकी है। मोदी सरकार  आने के साथ यह तय कर लिया गया था कि जेएनयू और खासकर वहाँ के छात्रसंघ को हर हालत में ध्वस्त किया जाएगा,इसके लिए सबसे पहले वामपंथ के साथ जेएनयू को जोड़ा गया, जेएनयू को देशद्रोहियों और आतंकियों के साथ जोड़ा गया,इस लाइन पर सारे देश में आरएसएस ने मीडिया अभियान चलाया, दूसरे चरण के तौर पर फ़रवरी २०१६ की घटना को षड्यंत्र करके बडे इवेंट के रुप में सजाया गया और उसके सारे विस्तृत एक्शन प्लान को बनाकर केन्द्र सरकार,दिल्ली पुलिस ,संघ की साइबर वाहिनी और आरएसएस मुख्यालय के संयुक्त तत्वावधान में चलाया गया,इसके लिए लठैतों के रुप में वकीलों और पूर्व सैनिकों की मदद भी ली गयी।उस समय छात्रसंघ के अध्यक्ष सहित कई छात्रों पर राष्ट्रद्रोह के झूठे मुक़दमे भी लगाए गए।उसके समानान्तर  विश्वविद्यालय के अंदर छात्रों और शिक्षकों का एक समूह तैयार किया गया जिसका काम है जेएनयू के बारे में अफ़वाहें फैलाना, जेएनयू के अकादमिक चरित्र और कैंपस के परिवेश को प्रदूषित करना,छात्र-छात्राओं को बदनाम करना,जेएनयू की परंपराओं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को ध्वस्त करना और उपकुलपति जगदीश कुमार की तानाशाही का समर्थन करना।
         आरएसएस के जेएनयू मॉडल में निशाने पर पहले दिन से जेएनयू छात्रसंघ है।किसी न किसी बहाने से विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ पर रोज हमले कर रहा है, बडी संख्या में आंदोलनकारी छात्रों पर शांतिपूर्ण जुलूस निकालने,धरना देने आदि के लिए बडी मात्रा में जुर्माने लगाए जा रहे हैं , छात्रों के रजिस्ट्रेशन खारिज किए जा रहे हैं,छात्रों को शांतिपूर्ण प्रतिवाद करने से रोका जा रहा है। 

     फ़रवरी २०१६ की घटना के समय कन्हैया कुमार और उनके साथियों को दण्डित करते समय यह कहा गया कि इन लोगों ने देशद्रोही नारे लगाए इसलिए इनके खिलाफ कार्रवाई की गयी, लेकिन आज तक देशद्रोही नारे लगाने से संबंधित प्रमाण जेएनयू प्रशासन ने पेश नहीं किए, दिल्ली पुलिस ने कन्हैया कुमार और दूसरे छात्रनेताओं पर देशद्रोह का झूठा मुक़दमा लगाया था उसके प्रमाण भी आजतक दिल्ली के अदालत में पेश नहीं किए,यहां तक कि आज तक चार्जशीट तक  दाखिल नहीं की ।इस तरह के आतंक के बाद भी पिछले जब छात्रसंघ के चुनाव हुए तो जेएनयू के छात्रों ने वाम संगठनों के नेतृत्व में आस्था व्यक्त की और आरएसएस के अखिल विद्यार्थी परिषद और उनके दुमछल्ले जाति छात्र संगठनों को बुरी तरह परास्त किया।इस पराजय को जेएनयू प्रशासन ने अपनी निजी पराजय समझा और तब से मौजूदा छात्रसंघ पर अकारण हमले तेज कर दिए गए, जेएनयू में एमफिल् पीएचडी के दाख़िले बंद कर दिए गए,यह काम किया गया यूजीसी के सर्कुलर के बहाने, जबकि जेएनयू में एमफिल् पीएचडी दाख़िले के स्वतंत्र नियम हैं जिनके आधार पर वहाँ दाख़िले होते हैं।जेएनयू के इतिहास में यह पहलीबार हुआ कि एमफिल् पीएचडी में अविवेकपूर्ण आधार पर प्रचलित दाख़िला नीति को बदल दिया गया।इससे जेएनयू के अकादमिक चरित्र को भारी नुकसान पहुँचा, सैंकडों प्रतिभाशाली छात्रों को जेएनयू में शोध करने से वंचित कर दिया गया।
             मौजूदा छात्रसंघ के नेताओं पर अकारण मोटा जुर्माना लगाया गया और जुर्माना अदा न करने की अवस्था में उनके नियमित रजिस्ट्रेशन को बाधित करके उनके नियमित छात्र के रुप में पढने के अधिकार को छीन लिया गया।ये वे नेता हैं जिन्होंने न तो वीसी को गाली दी, न कैंपस में हिंसा की और न देशद्रोहियों के पक्ष में नारे लगाए।इनका अपराध यह था कि इन्होंने कैंपस में वीसी ऑफ़िस पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। यानी जेएनयू में अब शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना भी अपराध है।यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसके कारण जेएनयू में फिर से अशांति पैदा कर दी गयी है ,छात्रनेताओं के खिलाफ इस तरह की दण्डात्मक कार्रवाई के निशाने पर आने वाले छात्रसंघ चुनाव हैं, प्रशासन चाहता है कि जेएनयू के छात्र वामपंथियों को वोट न दें, आरएसएस का बुनियादी तर्क यही है कि जेएनयू की अशांति की जड़ में वामसंगठन हैं अत:उनको वोट मत दो । यदि वामसंगठनों के नेताओं को जिताओगे तो जेएनयू प्रशासन उनको काम नहीं करने देगा , दाख़िले से वंचित करेगा।ऐसी अवस्था में जेएनयू के छात्रों को तमाम राजनीतिक मतभेद भुलाकर जेएनयू प्रशासन और आरएसएस के खिलाफ एकजुट संघर्ष चलाना चाहिए। इस तरह के दमन और उत्पीड़न का एकमात्र प्रत्युत्तर है शांतिपूर्ण एकजुट संघर्ष।जेएनयूएसयू मार्च ऑन!

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

आरएसएस को जेएनयू पर गुस्सा क्यों आता है -



जेएनयू पर एकबार फिर से बमबटुकों के हमले शुरू हो गए हैं। फ़रवरी 2016 के बाद यह हमलों का दूसरा चरण है।जेएनयू वीसी ने आरएसएस के नेतृत्व के आदेश के बाद ही टैंक लगाने का प्रस्ताव रखा है।वीसी के बयान के बाद संघ के साइबर टट्टू सोशलमीडिया में अहर्निश दौड़ रहे हैं और जेएनयू को गरियाने में लगे हैं। हम कहना चाहते हैं कि जेएनयू सच में महान है वरना बार -बार संघ हमले न करता। जेएनयू महान वाम की वजह से नहीं है, बल्कि विवेकवादी उदार अकादमिक परंपरा के कारण महान है।
      संघ अपनी नई टैंक मुहिम के बहाने जेएनयू के बारे में  यह धारणा फैलाने की कोशिश कर रहा है कि जेएनयू को मानवताविरोधी और राष्ट्रविरोधी संस्थान के रूप में कलंकित किया जाय।पहले हम यह जान लें कि जेएनयू को ये लोग नापसंद क्यों करते हैं? देश में और भी विश्वविद्यालय हैं उनको बदनाम करने की कोई मुहिम नहीं चल रही, क्योंकि वे सब संघ और टैंक कल्चर के क़ब्ज़े में हैं ! 
    आरएसएस की जेएनयू के प्रति घृणा का प्रधान कारण है जेएनयू के शिक्षक-छात्र संबंध।जेएनयू में देश के अन्य विश्वविद्यालयों के जैसे शिक्षक -छात्र संबंध नहीं हैं। यहां अधिकांश शिक्षक अपने छात्रों को मित्रवर मानकर बातें करते हैं।ज़्यादातर शिक्षकों के अकादमिक आचरण में पितृसत्तात्मकता नजरिया नहीं है।यहां वे शिक्षक होते हैं गुरू नहीं।यह वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से जेएनयू अन्य विश्वविद्यालयों  से अलग है। 
   दूसरी बडी चीज है सवाल खड़े करने की कला , यह कला यहां के समूचे माहौल में है।यहां छात्र सवाल करते हैं साथ ही "खोज" के नजरिए को जीवन का लक्ष्य बनाते हैं।कक्षा से लेकर राजनीतिक मंचों तक कैंपस में सवाल करने की कला का साम्राज्य है , यह  दूसरा बडा कारण है जिसके कारण जेएनयू को आरएसएस नापसंद करता है।आरएसएस को ऐसे कैंपस चाहिए जहाँ छात्रों में सवाल उठाने की आदत न हो , खोज करने की मानसिकता न हो।उल्लेखनीय है जिन कैंपस में सवाल उठ रहे हैं वहीं पर संघ के बमबटुकों के साथ लोकतांत्रिक छात्रों और शिक्षकों  का संघर्ष हो रहा है। 
       आरएसएस ऐसे छात्र -शिक्षक पसंद करता है जो हमेशा "जी जी "करें और सवाल न करें !आरएसएस वाले अच्छी तरह जानते हैं कि जेएनयू के छात्र वामपंथी नहीं हैं। वे यह भी जानते हैं जेएनयू के अंदर संघ की शिक्षकों में एक ताकतवर लॉबी है।इसके बावजूद वे जेएनयू के बुनियादी लोकतांत्रिक चरित्र को बदल नहीं पा रहे हैं।यही वजह है  वे बार -बार हमले कर रहे हैं।इन हमलों के लिए नियोजित ढंग से मीडिया का दुरूपयोग कर रहे हैं।राष्ट्रवाद और हिंदुत्व तो बहाना है।असल में जेएनयू के लोकतांत्रिक ढाँचे और लोकतांत्रिक माहौल को नष्ट करना है। संघ को लोकतांत्रिक माहौल से नफरत है उसे कैंपस में अनुशासित माहौल चाहिए जिससे कैंपस को भोंपुओं और भोंदुओं का केन्द्र बनाया जा सके।
     जेएनयूछात्रसंघ और छात्रसंघ का संविधान तीसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज है जिसे आरएसएस नष्ट करना चाहता है। जेएनयू अकेला विश्वविद्यालय है जहाँ छात्रसंघ पूरी तरह स्वायत्त है ,छात्रसंघ के चुनाव स्वयं छात्र संचालित करते हैं,छात्रसंघ के चुनाव में पैसे की ताकत की बजाय विचारों की ताकत का इस्तेमाल किया जाता है। छात्रों को अपने पदाधिकारियों को वापस बुलाने का अधिकार है।छात्रसंघ किसी नेता की मनमानी के आधार पर काम नहीं करता बल्कि सामूहिक फैसले लेकर काम करता है।छात्रसंघ की नियमित बैठकें होती हैं और उन बैठकों के फैसले पर्चे के माध्यम से छात्रों को सम्प्रेषित किए जाते हैं। छात्रसंघ के सभी फैसले सभी छात्र मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं। विवादास्पद मसलों पर छात्रों की आमसभा में बहुमत के आधार पर बहस के बाद फैसले लिए जाते हैं।ये सारी चीजें छात्रों ने बडे संघर्ष के बाद हासिल की हैं इनके निर्माण में वाम छात्र संगठनों की अग्रणी भूमिका रही है।जाहिरातौर पर आरएसएस और बमबटुकों को इस तरह के जागृत छात्रसंघ से परेशानी है और यही वजह है बार बार छात्रसंघ पर हमले हो रहे हैं। इसके विपरीत आरएसएस संचालित छात्रसंघों को देखें और उनकी गतिविधियों को देखें तो अंतर साफ समझ में आ जाएगा।
        जेएनयू में टैंक कल्चर के प्रतिवाद की परंपरा रही है। टैंक कल्चर वस्तुत: युद्ध की संस्कृति को अभिव्यंजित करती है। जेएनयू के छात्रों का युद्धके प्रतिवाद का शानदार इतिहास रहा है।इस्रायल के हमलावर रूख के खिलाफ प्रतिवाद से लेकर वियतनाम युद्ध के प्रतिवाद तक, अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ प्रतिवाद से लेकर तियेनमैन स्क्वेयर पर चीनी टैंक दमन के प्रतिवाद तक छात्रों के सामूहिक प्रतिवाद की जेएनयूछात्रसंघ की परंपरा रही है।जेएनयू के छात्रों को मानवतावादी नजरिए से सोचने-समझने और काम करने की प्रेरणा वहाँ के पाठ्यक्रम से मिलती रही है जिसे आरएसएस पसंद नहीं करता।

शनिवार, 17 सितंबर 2016

जेएनयू और हम


        मैं१९८०-८१ में जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव में कौंसलर पद पर एक वोट से जीता था। वी. भास्कर अध्यक्ष चुने गए।उस समय जेएनयू के बाइस चांसलर वाय. नायडुम्मा साहब थे, वे श्रीमती गांधी के भरोसे के व्यक्ति थे विश्वविख्यात चमड़ा विशेषज्ञ थे। स्वभाव से बहुत ही शानदार, उदार और वैज्ञानिक मिज़ाज के थे। बीएचयू से पढ़े थे।भास्कर के साथ पूरी यूनियन उनसे मिलने गयी, सबने उनको अपना परिचय अंग्रेज़ी में दिया मैंने हिन्दी में दिया , क्योंकि मैं अंग्रेज़ी में परिचय देना नहीं जानता था।
नायडुम्मा साहब अंग्रेज़ी में परिचय सुनते हुए एकाग्र हो चुके थे मैंने ज्योंही हिन्दी में परिचय दिया सारा माहौल बदल गया, वे तुरंत टूटी फूटी हिन्दी में शुरू हो गए और बोले आज मैं कई दशक बाद हिन्दी बोल रहा हूँ। तुमने मेरी बीएचयू की यादें ताज़ा कर दीं। इसके बाद मैं उनसे भास्कर के साथ विभिन्न समस्याओं को लेकर अनेकबार मिला वे भास्कर को बीच में टोकते और कहते जगदीश्वर को बोलने दो, मुझे हिन्दी सुनना अच्छा लगता है कहते इसके बहाने मैं काशी में लौट जाता हूं। वे जानते थे मैं सम्पूर्णानंद वि वि से सिद्धांतज्यौतिषाचार्य कर चुका हूं, मेरा बनारस से संबंध है। कहते जेएनयू में तुम मेरे हिन्दी और बनारस के सेतु हो।
मैं बहुत पान खाता था,नायडुम्मा को मेरा पान खाना बहुत पसंद था। जेएनयू में नामवरजी के बाद वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझसे पान खाने के लिए माँगा।नायडुम्मा साहब ने कहा जिस दिन अगलीबार आओ तो बिना समस्या के आना, पान लेकर आना बैठकर बातें करेंगे।
मैं एकदिन पान लेकर उनके पास गया और जमकर बातें कीं।अंत में बोले कोई काम हो तो बोलो,मैंने कहा जेएनयू में बडे पैमाने पर जाली इनकम सर्टिफ़िकेट दाख़िले के समय जमा हो रहे हैं आप दुस्साहस करके छात्रों के कमरों में छापे डलवा दें और रेण्डम तरीक़े से इंकम सर्टिफ़िकेट की जाँच करवा दे । वे बोले यूनियन के लोगों के यहाँ भी छापे पड़ेंगे।तुम वायदा करो बाहर कहोगे नहीं , आय सर्टिफ़िकेट भीजांच के लिए भेजे जाएँगे । परिणाम झेलोगे , मैंने कहा हम तैयार हैं। छात्रों के कमरों की तलाशी हुई बडे पैमाने पर कई छात्रों के कमरों से नक़ली मोहरें बरामद हुईं और बड़े पैमाने पर जेएनयू की लाइब्रेरी से चुरायी गयी किताबें बरामद हुईं। आय प्रमाणपत्रों की जाँच के बाद कई सौ छात्रों के सर्टिफ़िकेट जाली पाए गए उनको विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया।हमने वि वि का इस मामले में साथ दिया।

जेएनयू में मेरा पहला मुकाबला नामवरजी से हुआ और यह बेहद मजेदार,शिक्षित करने वाला था।जेएनयू में 1979 में संस्कृत पाठशाला की अकादमिक पृष्ठभूमि से आने वाला मैं पहला छात्र था।मेरे शास्त्री यानी स्नातक में मात्र50फीसदी अंक थे।संभवतःइतने कम अंक पर किसी का वहां दाखिला नहीं हुआ था,मैंने प्रवेश परीक्षा और इंटरव्यू बहुत अच्छा दिया और मुझे दाखिला मिल गया।

कक्षाएं शुरू होने के 10दिन बाद पहला टेस्ट घोषित हो गया,उसके लिए गुरूवर नामवरजी ने दो विषय दिए,पहला,जॉन क्रौरैंसम का न्यू क्रिटिसिज्म ,दूसरा संस्कृत काव्यशास्त्र में रूपवाद।संभवतःपहलीबार मेरे लिए नामवरजी ने संस्कृत काव्यशास्त्र पढाया।खैर ,मैंने परीक्षा दी और अपने लिए न्यू क्रिटिसिज्म को चुना।उत्तर सही दिया।लेकिन गुरूदेव का दिल नहीं जीत पाया।उन्होंने मुझे बी-प्लस ग्रेड दिया।मैं खैर खुश था ,चलो फेल तो नहीं हुआ।कक्षा में उत्तरपुस्तिका दी गयी,सभी छात्र अपनी पुस्तिका पर नामवरजी के कमेंटस पढ़ रहे थे।मेरी उत्तर पुस्तिका पर लालपैन से सही का निशान था और नामवरजी का कोई कमेंटस नहीं था,सिर्फ बी प्लस ग्रेड लिखा था।

बातचीत में नामवरजी प्रत्येक छात्र को एक-एक करके बता रहे थे कि उसके लेखन में क्या कमी है,ऐसे नहीं वैसे लिखो,दिलचस्प बात यह थी कि जिस छात्र को ए प्लस दिया था उसकी उत्तर पुस्तिका में काफी कांट-छांट किया था नामवरजी ने।मेरा नम्बर आया तो मैंने व्यंग्य में कहा,सर,आपने इतने ज्यादा अंक दिए हैं ! इतने नम्बर तो कभी नहीं मिले ! वे तुरंत बोले मैं आपसे नाराज हूँ,मैंने पूछा क्यों,बोले आपने संस्कृत काव्यशास्त्र में रूपवाद वाले सवाल पर क्यों नहीं लिखा, ,मैंने संस्कृत काव्यशास्त्र आपके लिए खासतौर पर तैयार करके पढ़ाया था,मैंने कहा सर,मैं संस्कृत पढ़ते हुए बोर गया था इसलिए न्यू क्रिटिसिज्म पर लिखा ,बोले ,मैं परेशान हूँ कि आप अंग्रेजी नहीं जानते न्यू क्रिटिसिज्म पर कैसे लिख सकते हैं ! मैंने झूठ कहा कि सर आपके क्लास नोटस से तैयार करके परीक्षा दी है,वे बोले नहीं,मैंने तोड़ती पत्थर कविता का उदाहरण कक्षा में नहीं बताया,लेकिन आपने लिखा है।मैंने पूछा ,सर,यह बताइए जो लिखा है वह सही है या गलत लिखा है,वे बोले सही लिखा है,मैंने फिर पूछा जो उदाहरण दिया है वह सही है या गलत,बोले सही है,मैंने पूछा कि फिर समस्या कहां पर है ,वे बोले न्यू क्रिटिसिज्म किताब पढ़ कैसे सकते हो,मैंने बताया ,उस किताब को पढ़कर सुनाया मित्र असद जैदी और कुलदीपकुमार ने,वह किताब कुलदीप के पास थी,इन दोनों ने टेस्ट के पहली वाली रात को सारी रात जगकर न्यू क्रिटिसिज्म को मुझे सुनाया और मैंने सुबह जाकर परीक्षा दे दी।इसके बाद गुरूदेव चुप थे।मैंने कहा सर,मैंने कहा था अंग्रेजी समस्या नहीं है,समझ में नहीं आएगा तो मित्रों से समझ लेंगे।इस तरह मेरे लिए अंग्रेजी मित्रभाषा आज भी बनी हुई है।

मैंने अपने छात्र जीवन में अंग्रेजी न जानते हुए इराकी, ईरानी, फ्रेंच, फिलिस्तीनी, अफ्रीकी,मणिपुरी,नागा आदि जातियों के छात्रों के साथ गहरी मित्रता की और उनका दिल जीता।

मेरा जेएनयू में पहला रूममेट एक दक्षिण अफ्रीकी छात्र था,मैं और वो एक ही साथ सोशल साइंस बिल्डिंग ( आज की पुराने सोशल साइंस इमारत) में जो कि 1979 में बनकर तैयार हुई थी,उसमें एक साथ रहे।उसके बाद दूसरे सेमिस्टर में सतलज होस्टल में मेरा रूममेट एक नागा लड़का था। यानी एमए का पहला वर्ष इन दोनों के साथ गुजरा। दोनों हिन्दी नहीं जानते थे,अंग्रेजी भी बहुत कम जानते थे।अफ्रीकी छात्र कालांतर में नेल्सन मंडेला के मंत्रीमंडल में मंत्री बना,नागा लडका बड़ा नागानेता बना।इनके अलावा जो फिलिस्तीनी लड़का सबसे अच्छा मित्र था वह लंबे समय तक फिलीस्तीनी नेता यासिर अराफात का निजी सचिव था। इन सबके साथ रहते हुए भाषा कभी समस्या के रूप में महसूस नहीं हुई।

मैं जब जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के लिए 1984 में चुनाव लड़ रहा था,तो उस समय कुछ तेलुगूभाषी छात्रों ने कहा कि वे मुझे वोट नहीं देंगे।हमारे पूर्वांचल में रहने वाले मित्रों ने संदेश दिया कि 20-25 तेलुगूभाषी छात्र हैं जो मेरे हिन्दी में बोलने के कारण नाराज हैं और वोट नहीं देंगे।मैंने कहा कि मेरी उनसे मीटिंग तय करो,मैं बैठकर सुनता हूँ,फिर देखते हैं,उनका मन बदलता है या नहीं।मेरी उन सभी तेलुगूभाषी छात्रो के साथ मीटिंग तय हुई,एक कमरे में हम बैठे,मेरी मदद के लिए तेलुगूभाषी कॉमरे़ड थे जिससे भाषा संकट न हो लेकिन तेलुगूभाषी छात्रों ने कहा कि वे मुझसे अलग से और बिना किसी भाषायी मददगार के बात करेंगे,उन्होंने सभी तेलुगू भाषी कॉमरेडों को कमरे के बाहर ही रोक दिया।अंदर कमरे में तेलुगूभाषी थे और मैं अकेला।मेरी मुश्किल यह थी कि मैं हिन्दी के अलावा कोई भाषा नहीं जानता था,वे लोग हिन्दी एकदम नहीं जानते थे।बातचीत शुरू हुई मैंने टूटू फूटी अंग्रेजी में शुरूआत की,गलत-सलत भाषा बोल रहा था,वे लगातार सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे और मैं धारावाहिक ढ़ंग से हर सवाल का अंग्रेजी में जवाब दे रहा था,मेरी अंग्रेजी बेइंतिहा खराब,एकदम अशुद्ध लेकिन संवाद अंग्रेजी में जारी था।तकरीबन एक घंटा मैंने उनसे अंग्रेजी में अपनी बात कही और उनसे अनुरोध किया कि आप लोग एसएफआई को पैनल वोट दें,मुझे वोट जरूर दें।कमरे के बाहर तमाम कॉमरेड खडे थे और परेशान थे कि मैं अंग्रेजी नहीं जानता फलतःराजनीतिक क्षति करके ही लौटूँगा।मैं बातचीत खत्म करके बाहर हँसते हुए आया तेलुगूभाषी छात्र भी हँसते हुए बाहर निकले,बाहर खड़े तेलुगूभाषी कॉमरेडों ने उन छात्रोंसे पूछा अब बताओ किसेे वोट दोगे, वे बोले रात को मेरा भाषण सुनने के बाद बताएंगे,उनलोगों से दूसरे दिन सुबह पूछा गया कि अब बताओ जगदीश्वर को वोट दोगे या नहीं,सभी तेलुगूभाषी लड़कों ने कहा हम उसे जरूर वोट देंगे।तेलुगूभाषी कॉमरेड ने कहा आश्चर्य है मैंने समझाया तो वोट देने को राजी नहीं हुए और जगदीश्वर से बात करने के बाद उसे वोट देने को राजी कैसे हो गए ,इस पर एक छात्र ने कहा कि उसकी सम्प्रेषण शैली और दिल जीतने की कला ने हम सबको प्रभावित किया ।उससे बात करने के बाद पता चला कि भाषा भेद की नहीं जोड़ने की कला है।

JNU में कईबार वाम हारा है,लेकिन उसने हार को सम्मान और सभ्यता के साथ स्वीकार किया है,हार के कारणों की खोज करके अपने को दुरूस्त किया है।इसबार जो लोग हारे हैं वे वाम से सीखें कि कैसे हार को स्वीकार करके छात्रों के लिए एकताबद्ध होकर काम किया जाय।

हमने पहले भी कहा है जेएनयू में सब वाम नहीं है। अधिकांश छात्र वाम को नहीं मानते। इसबार का चुनाव और उसके परिणाम देख लें,आज भी बहुसंख्यक छात्र ऐसे हैं जो वाम की विचारधारा को नहीं मानते।इसके बावजूद लोकतंत्र में चुनाव के जरिए वाम चुनाव जीतकर आता है तो यही कहेंगे वाम में कुछ तो है जो बार बार उसको जेएनयू के छात्र अपने छात्रसंघ का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी देते हैं।

वाम यहां नोट,सरकार ,जाति और लट्ठ के बल पर चुनाव नहीं लड़ता,बल्कि विचारधारा और संघर्ष के इतिहास के आधार पर चुनाव लड़ता रहा है।

जेएनयू कैंपस में लोकतांत्रिक राजनीतिक परिवेश बनाए रखने में वाम की केन्द्रीय भूमिका रही है।विश्व में कहीं पर भी यह परिवेश उपलब्ध नहीं है।यह परिवेश एक दिन में नहीं बना बल्कि इसे बनाने में सभी छात्रों की अग्रणी भूमिका रही है।सभी छात्रों को इस परिवेश के लिए संगठित करने का काम वाम ने किया है,यही वजह है कि अधिकांश समय वाम के पास ही नेतृत्व रहा है।जेएनयू के परिवेश का वाम से बेहतर संरक्षक कोई और नहीं हो सकता,यही इसबार के चुनाव का संदेश है।

जेएनयू में वाम एकता मंच की 2016 में जिस तरह जीत हुई है उसे अनेक लोग हजम नहीं कर पा रहे हैं।हम फिर दोहरा रहे हैं कि जेएनयू के छात्रों की दैनंदिन राजनीति में ,दैनंदिन समस्याओं पर हुए संघर्ष में जो संगठन खरे उतरते हैं आमतौर पर जेएनयू के छात्र उनको ही चुनते हैं।

वे सवर्ण-असवर्ण देखकर वोट नहीं देते।यदि किसी संगठन की विचारधारा दलितों-मुसलमानों के पक्ष में है तो इस आधार पर जेएनयू के छात्र वोट नहीं देते,वे वोट छात्रों के लिए घोषित कार्यक्रम और उसके दैनंदिन जीवन में अमल के आधार पर तय करते हैं।

सतह पर देखेंगे तो कागज में सभी संगठन एक जैसी विचारधारात्मक बातें कहते हैं।मसलन्,आम्बेडकर-फुले को लेकर भाजपा -आरएसएस आज जितना कागज पर सक्रिय है ,मीडिया में सक्रिय है उससे उसकी दलित पक्षधरता तय नहीं होती।दलित पक्षधरता तय होगी तब जब वास्तव में दलितों का मुद्दा सामने आए और वह जमकर संघर्ष करे।

वाम ने हमेशा दलितों के हितों की रक्षा के सवाल को जेएनयू में उठाया है,उसके लिए लड़ाई लड़ी है।दलितों के हितों की हर स्तर पर रक्षा की है।यदि उनसे कभी चूक हुई है तो छात्रों ने सबक भी सिखाया है।

जेएनयू के प्रसंग में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि जेएनयू में भी जातिवाद की समस्या है,जेएनयू के शिक्षकों से लेकर छात्रों तक एक वर्ग में जातिवाद का असर है,यह असर पहले भी था,मैं जब पढ़ता था उस समय भी था,आज भी है।

जब दलितों के हितों के खिलाफ प्रशासन ने कभी कोई कदम उठाया ,छात्रसंघ ने हमेशा उसका पुरजोर विरोध किया।यदि लीडरशिप से कभी चूक हुई तो छात्रों की सेंटर से लेकर स्कूल और फिर विश्वविद्यालय स्तर की आम सभा ने प्रस्ताव पास करके संघर्ष की रूपरेखा तैयार करके दी और छात्रसंघ ने लड़ाई लड़ी।

यह सच है जेएनयू में पहले भी अनेक शिक्षक ऐसे रहे हैं जो भूमिहार या ब्राह्मण जाति के छात्रों को प्राथमिकता से दाखिले से लेकर नम्बर तक देते थे,फैलोशिप भी देते थे।लेकिन छात्रसंघ ने हमेशा इस तरह के फैसलों के खिलाफ एकजुट संघर्ष करके इस तरह के शिक्षकों और उनके फैसलों को बेनकाब किया।इसलिए यह कहना कि वाम सवर्णवादी है,एकसिरे से गलत है।छात्र सिर्फ छात्र रहें,वे छात्रचेतना से लैस हों,प्रगतिशील विचारधाराओं के करीब रहें,यही वामदलों का प्रयास रहा है।

जेएनयू को जो संगठन हिन्दुत्व और इसी तरह की बेगानी विचारधाराओं में डुबोना चाहते थे उनको निराशा हाथ लगी है। जेएनयू का स्वाभाविक भावबोध वामपंथी है। वाम के अलावा यहाँ बाक़ी विचारधाराएँ फ़ैशन की तरह हैं ।

वाम की जेएनयू में जन्म से लेकर आज तक निरंतरता रही है। बाक़ी विचारधाराएँ फ़ैशन की तरह आती जाती रहती हैं।यहाँ जातिवाद टूटा है,धर्म भी टूटा है। धर्मनिरपेक्षता के अनेक रंगों का यहाँ प्रचार होता रहा है।

जेएनयू में जाति महत्वपूर्ण नहीं है, वर्ग भी महत्वपूर्ण नहीं है। छात्र अस्मिता महत्वपूर्ण है। एलीट और एलीट विरोधी, आईएएस और क्रांतिकारी आदि सबने यहाँ लोकतंत्र का पाठ पढ़ा है।लोकतंत्र का पाठ जातिचेतना या वर्गचेतना से निर्मित नहीं होता। छात्रों के प्रति प्रेम से पैदा होता है।

छात्रप्रेम के लिए आम्बेडकर- ज्योतिबा फुले -मार्क्स की नहीं छात्रों को समझने , उनकी समस्याएँ समझने और उनके लिए एकजुट संघर्ष की भावना से पैदा होती हैं।

जेएनयू में छात्रसंघ महत्वपूर्ण है। यह सभी छात्रों के हितों का यह साझा मंच है। छात्रसंघ में चुने जाने का मतलब है सबका छात्र प्रतिनिधि।पार्टीजान ढंग से छात्रसंघ काम नहीं करता। यही वह चीज़ है जिसने कैम्पस में छात्रजीवन, छात्र और साझा मंच की धारणा को जन्म दिया है। समूची प्रक्रिया इतना व्यापक रसायन बनाती है कि मार्क्स-माओ-आम्बेडकर आदि की विचारधाराएँ इस प्रक्रिया के संगम में विलीन हो जाती हैं। यही वजह है कि जेएनयू में लोकतांत्रिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। विचारधारा, जाति, वर्ग,धर्म आदि गौण बन जाते हैं।

जेएनयू में नए संगठन आते रहे हैं, चुनाव में भी भाग लेते हैं। इनमें विभिन्न रंगत के संगठन रहे हैं , जेएनयू में ऐसे उम्मीदवार भी रहे हैं जिनका कोई संगठन नहीं था लेकिन बडी संख्या में छात्र सुनने जाते थे। इस तरह के संगठन आज भी हैं जिनमें गंभीर विचारधारात्मक अंतर हैं, यही चीज़ जेएनयू को जेएनयू बनाती है। यह जेएनयू और वाम के मिश्रित सम्मिश्रण से बनी ज़मीन है जिस पर जेएनयू में हज़ार विचारधाराओं को खिलने दो के आधार पर विशाल जेएनयू खड़ा है। जेएनयू में विचारधारा नहीं छात्र एकता महत्वपूर्ण है। वही विचारधारा वहाँ बची रही है जो छात्रों में जेएनयू स्प्रिट बनाए रखने में मदद करे।

कैम्पसबोध - लोकतांत्रिकबोध इसकी धुरी है। जो लोग नायकों के झुनझुना लिए घूम रहे हैं वे जान लें कि छात्रएकता के सामने सभी नायक नतमस्तक हैं।



जेएनयू में नायक नहीं, विचारधारा नहीं ,छात्रों की व्यापक एकता महत्वपूर्णहै। इस एकता के सामने मार्क्स-एंगेल्स-माओ -ट्रास्टस्की--आम्बेडकर -जयप्रकाश नारायण -लोहिया आदि की विचारधाराओं को नतमस्तक होते देखा है, हर बार नई विचारधारा के संगठनों को यह कैम्पस देख चुका है।इसीलिए तो यह जेएनयू है।

बुधवार, 7 सितंबर 2016

जेएनयू में आइसा-एसएफआई जिताओ

       मैं नहीं जानता कि इस समय जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव में किन मुद्दों पर बहस हो रही है।लेकिन एक बात तय है कि जेएनयू के छात्र आंदोलन के सामने गंभीर संकट है।यह संकट ´वैचारिक´ज्यादा है। फरवरी जेएनयू आंदोलन के बाद जो व्यापक छात्र एकता लोकतांत्रिक सवालों और लोकतांत्रिक हकों पर निर्मित हुई है,वह इसबार के चुनाव में अपनी पहली बड़ी परीक्षा से गुजरेगी।सुखद बात यह है कि ´देशद्रोह´के मसले पर हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने जो फैसला दिया है उससे जेएनयू छात्र आंदोलन को बहुत बड़ी मदद मिलेगी।हमने फेसबुक पर पहले देशद्रोह के प्रसंग में जो कुछ लिखा था सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उसको अपने नए आदेश से पुष्ट किया है।किसी भी किस्म की नारेबाजी,सरकार के खिलाफ आलोचना आदि देशद्रोह नहीं है।देशद्रोह तब बनता है जब हिंसा की जाय या फिर हिंसा के लिए उकसाया जाय।महज भाषण या लेखन को हिंसा नहीं कहते,देशद्रोह नहीं कहते।

जेएनयू छात्र आंदोलन की दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि है जेएनयू प्रशासन के द्वारा जिन छात्रनेताओं और छात्रों के खिलाफ फरवरी आंदोलन के संदर्भ में अनुशासनात्मक कार्रवाई की थी उसको लागू करने पर अदालत ने रोक लगा दी है।जबकि इस अनुशासनात्मक कार्रवाई के जरिए वि वि प्रशासन अपने एक्शन को वैध ठहराने की कोशिश कर रहा था।ये दो बड़ी कानूनी जीत हासिल करके जेएनयू का छात्र आंदोलन फिर से नई परीक्षा के लिए तैयार खड़ा है।

इस समय जमीनी हकीकत क्या है मैं नहीं जानता लेकिन इतना कहना चाहूंगा कि एसएफआई-आईइसा के संयुक्त मोर्चे के प्रत्याशियों को हर हालत में जिताना चाहिए।यह वह मोर्चा है जिसने सभी छात्रों को एकजुट रखकर जेएनयू प्रशासन और मोदी सरकार की छात्र विरोधी,लोकतंत्र विरोधी नीतियों का जमकर विरोध किया और उपरोक्त दो बहुत बड़ी कानूनी जीत चुनाव के पहले हासिल करके छात्र आंदोलन के इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

केन्द्र सरकार के दमन के खिलाफ जेएनयूछात्रसंघ की उपरोक्त दो कानूनी विजय असाधारण हैं,इस जीत की हर हालत में रक्षा की जानी चाहिए।जेएनयू प्रशासन पूरी शक्ति लगाकर छात्रों को बांटने की कोशिश करेगा।तरह-तरह के नए प्रपंच खड़े किए जाएंगे।इन सबसे बचने की जरूरत है। एक मजबूत वामपंथी छात्र राजनीति ही जेएनयू में छात्रों के व्यापक हितों की रक्षा कर सकती है।मौजूदा आइसा-एसएफआई मोर्चे ने विगत फरवरी आंदोलन के दौरान जिस परिपक्वता,कौशल और राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देकर मोदी सरकार और उसके गुर्गों को राजनीतिक तौर पर परास्त किया है वह हम सबके लिए गौरव की बात है।जेएनयू के छात्रों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे आइसा-एसएफआई मोर्चे बड़ी संख्या में वोट देकर दिताएं।क्योंकि ये लोग आपके संघर्ष के साथी है,संघर्ष के नायक हैं।



जेएनयूएसयू के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व की जीत को किसी भी तरह के द्ग्भ्रमित नारों और राजनीतिक मंचों के कारण कम नहीं किया जाना चाहिए।जेएनयू को वाम चाहिए।वाम छात्र राजनीति फौलादी एकता से बनी है और विभिन्न संघर्षों में उसकी परीक्षा हुई है और हर परीक्षा में वह खरी उतरी है। हमें उम्मीद है कि इसबार के छात्रसंघ के चुनाव में आईएसा-एसएफआई मोर्चे को भारी बहुमत से छात्र समुदाय जीत दिलाएगा।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

नामवर का कुँआ

       हम जानते हैं नामवरजी ने क्या लिखा है,हम यह भी जानते हैं उन्होंने जेएनयू में कितने ´महान´ कार्य किए थे। कोर्स बनाना ,पढ़ाना महान् कार्य नहीं है,यह रूटिन काम है, यह नौकरी के काम हैं। मौजूदा समय उनके अतीत को खंगालने का नहीं है।मेरी चिन्ता यह है कि नामवरजी के आरएसएस के साथ जाने को कैसे देखा जाय ॽउनके व्यक्तित्व को कैसे देखा जाय ॽ नामवरजी की खूबी है वे अपने को कभी आंतरिक गुणों की रोशनी में पेश नहीं करते।वे आंतरिक गुणों का प्रदर्शन नहीं करते।दिलचस्प बात यह भी यदि वे आंतरिक गुणों पर जोर देते तो उसकी पुष्टि करना असंभव है।

नामवरजी हमेशा ´लोकप्रियता के भावबोध´में रहते हैं।हर चीज ´लोकप्रियता´ को दिमाग में रखकर तय करते हैं।सरकारों के साथ जुड़े रहने का यही बड़ा कारण है,फलतः मीडिया से लेकर सरकारी संस्थानों तक उनके लिए सहज ही ´महान हो महान हो´की लोकप्रिय ध्वनियां गूंजने लगती हैं। इसका दूसरा आयाम यह है कि नामवरजी के कर्म पर कम उनकी लोकप्रियता पर ज्यादा बातें हैं।उनके कर्म में ´सारवान´तत्व नहीं होते,वे मात्र ´लोकप्रियता´ के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। उनके कर्म में सारवान तत्व के अभाव ने उनको ´कर्म के लिए कर्म´करने वाला, ´भाषण के लिए भाषण´देने वाला बना दिया है।

यदि कोई व्यक्ति बेहतरीन इंसान है तो उसके कर्म,जीवन और विचार में संगति होनी चाहिए।यह कैसे संभव है कि विचार कुछ हैं और एक्शन कुछ और हैं।सोच कहीं रहे हैं और जा कहीं और रहे हैं।यह नामवरजी की विशिष्ट शैली है। यही वजह है नामवरजी अपने नाम के साथ कोई बेहतर जीवन मूल्य विकसित नहीं कर पाए।नामवरजी को हम सब लोकप्रिय हिन्दी विद्वान-शिक्षक के रूप में जानते हैं।लेकिन उसके विचार और कर्म में कभी कोई साम्य नहीं रहा,इसलिए लोग उनको ´अवसरवादी´ तक कहते हैं।



जो लोग नामवरजी को ´महान´बनाने में लगे हैं,वे जरा गंभीरता से सोचें ´महान´क्या पल-पल में विचार बदलता है,मूल्यहीन होता है ॽक्या कभी नामवरजी ने श्रोताओं से भिन्न स्टैंड लिया ॽ वे हमेशा श्रोताओं की प्रकृति देखकर बोलते हैं।जबकि विशिष्ट या महान व्यक्ति कभी भी श्रोताओं की प्रकृति में ढलकर नहीं बोलता।बोलने की यह कला,पुरानी रीतिकालीन कला है।क्या नामवरजी ´श्रोता´और ´जनता´ में अंतर करके बोलते हैं ॽ उनके लिए श्रोता प्रमुख है,जनता गौण है।उनके लिए सत्ता प्रमुख है,जीवन मूल्य गौण हैं।उनके लिए लोकप्रियता प्रमुख है,प्रगतिशील विचारधारा गौण है।

रविवार, 24 जुलाई 2016

नामवरजी के आने-जाने की विचारधारा और भोले भक्त

        नामवरजी का आना-जाना कोई सीधा -सरल मामला नहीं है।वह कोई विचारधाराहीन काम नहीं है।वे असाधारण लेखक हैं।वे कहीं जब बुलाए जाते हैं तो इसलिए नहीं बुलाए जाते कि बहुत सरल सीधे, विचारधाराहीन इंसान हैं ! भक्तों का तर्क है वे सबके हैं और सब उनके हैं ! यदि मामला इतना सा ही होता तो नामवरजी को न तो कोई बुलाता और न कोई उनका 90वां जन्मदिन ही मनाता।वे बड़े कद के लेखक-शिक्षक-बुद्धिजीवी हैं। उनकी समाज में व्यापक भूमिका है। वे साधारण लेखक रहे होते तब भी संभवतः हमें कोई आपत्ति न होती। जाने-अनजाने नामवरजी के बारे में जितने तर्क उनकी हिमायत में दिए जा रहे हैं वे अंततःनामवरजी को विचारधाराहीन,दृष्टिहीन मनुष्य के रूप में पेश कर रहे हैं।लेकिन नामवरजी विचारधाराहीन मनुष्य नहीं हैं।वे बेहतरीन इंसान हैं।मैं निजी तौर पर उनका प्रशंसक -आलोचक हूँ,उनके गलती करने पर हर समय टोका है,लेकिन संवाद नहीं छोड़ा।बहिष्कार नहीं किया।

नामवरजी का मोदीप्रेम हाल की घटना नहीं है यह मोदीजी के लोकसभा चुनाव के समय ही सामने आ गया था,उस समय भी हमने फेसबुक पर उनके टीवी पर दिए गए बयान की आलोचना की थी। सवाल यह है क्या मौजूदा मोदीशासन सामान्य रूटिन लोकतांत्रिक सरकार का शासन है ॽक्या मोदी निजी तौर पर सामान्य बुर्जुआनेता हैं ॽ क्या अटल-आडवाणी की तरह के संघी नेता हैं ॽ यदि हमारे मित्र ऐसा सोच रहे हैं तो बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं।

देश में पहलीबार ऐसा हुआ है कि एक ऐसा व्यक्ति शासन पर आ बैठा है जिसने अपने राजनीतिक कर्म से लोकतंत्र को बहुत गहरे जाकर क्षत-विक्षत किया है।गुजरात के दंगे साधारण घटना नहीं है। संविधान पर नियमित सोची समझी साजिश के तहत पहले उन्होंने गुजरात में निरंतर हमले किए,यहां तक कि न्यायपालिका को पंगु बना दिया,यही वजह थी कि सुप्रीमकोर्ट को उन दंगों के मुकदमों की सुनवाई की व्यवस्था गुजरात के बाहर करनी पड़ी।यह भारत के इतिहास की असाधारण घटना है।125से ज्यादा लोग दंगों के लिए सजा पा चुके हैं,यहां तक कि मोदीमंत्रीमंडल की एक सदस्या भी सजा भोग रही है।यह सब देखने जानने के बावजूद यदि नामवरजी जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति मोदी की गोदी में जा रहा है तो सवाल तो खड़े होंगे !

कुछ लोग कह रहे हैं इंदिरा गांधी कला संग्रहालय राष्ट्रीय संस्थान है,वह संघ का नहीं है,अतः वहां जाने में कोई हर्ज नहीं। इस तरह के तर्क नामवरजी जैसे व्यक्ति को टुईंया लेखक बना देते हैं, उनके जाने-आने को अर्थहीन सामान्य घटनामात्र बना देते हैं।हम जानते हैं नामवरजी बहुत उदार हैं,भले हैं,जो बुलाता है उसके यहां चले जाते हैं।लेकिन क्या मोदी सरकार आने के बाद बुद्धिजीवियों के लिए स्थितियां सामान्य रह गयी हैं ॽ



आज बुद्धिजीवियों के बीच में अघोषित मोदीआतंक फैला हुआ है।केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में स्थिति सबसे बदतर है।स्वयं जेएनयू में भी हालात असामान्य हैं।जेएनयू के आरएसएस से जुड़े शिक्षकों ने जांच रिपोर्ट के नाम पर छात्रसंघ के ऊपर सीधे हमला बोला है,अनेक छात्रनेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई है,नामवरजी चुप रहे।पहलीबार ऐसा हुआ है कि आरएसएस के शिक्षकों ने जेएनयू की छात्राओं को कलं कित, अपमानित करने वाली रिपोर्ट जारी करके सभी छात्राओं के चरित्र पर सवाल खड़े किए हैं,उनको अपमानित किया है।जेएनयू में संघी वीसी ने सभी फैसलेकुन कमेटियों को पंगु कर दिया है।इस तरह की घटनाएं तो आपातकाल में भी नहीं हुई थीं।जेएनयू की एकेडमिक कौंसिल का एजेण्डा वीसी नहीं मानव संसाधनमंत्री तय कर रहा है। यही हाल दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य केन्द्रीय विश्वविद्यालयों का है वहां पर मानव संसाधन मंत्री से स्वीकृति लिए बिना एकेडमिक कौंसिल का एजेण्डा वीसी तय नहीं कर सकता।कम से कम आपातकाल में भी यह स्थिति नहीं थी कि एकेडमिक कौंसिल का एजेंडा मंत्री तय करे! नामवरजी भोले नहीं हैं और अज्ञानी नहीं हैं जो यह न जानते हों! विगत सभी सरकारों के साथ मोदी सरकार के अंतर को सिर्फ इसी एकमात्र उदाहरण से समझा जा सकता है।

मोदी की गोदी में नामवर !

       नामवरजी के व्यक्तित्व से प्रभावित छात्र,शिक्षक और लेखकों का बड़ा समूह है। दिलचस्प बात है कि नामवरजी के गैर-साहित्यिक व्यक्तित्व और कारनामों को लेकर बहुत कम लोग जानते हैं।खासकर उनके जेएनयू में काम करने के दौरान किए गए अकादमिक फैसलों की जिनको पहचान है वे बेहतर ढ़ंग से जानते हैं कि जेएनयू में प्रोफेसर के रूप में काम करते हुए नामवरजी ने कभी भी छात्रों के हितों से जुड़े सवालों पर (मेरे सात साल के जेएनयू छात्रजीवन के दौरान) कभी कोई स्टैंड नहीं लिया, उलटे वे हमेशा जेएनयू प्रशासन के साथ और छात्रों के खिलाफ खड़े नजर आए।
       नामवरजी की रीतिकालीन मनोदशा का आदर्श नमूना है जेएनयू ।मैं उन दिनों छात्र राजनीति में सक्रिय था।मैं वहां पढ़ता था। नामवरजी खुलकर कभी छात्रों के पक्ष में न तो एकेडमिक कौंसिल में बोले और न बोर्ड़ ऑफ स्टैडीज में बोले, उलटे छात्रों को विक्टिमाइज करने में अपने विभाग में अग्रणी भूमिका निभाते रहे ।ये बातें इसलिए जानना जरूरी है क्योंकि नए सिरे से नामवरजी पर रीतिकाव्य लिखा जा रहा है।मुश्किल यह है कि जो लोग देश में खुलकर वाम के नाम से जाने जाते हैं और जेएनयू में प्रोफेसर हुआ करते थे उनमें से अधिकांश की जेएनयू प्रशासन के साथ और छात्रों के विरोध में सक्रिय भूमिका हुआ करती थी।कुछ ही शिक्षक थे जो आमतौर पर छात्रों के पक्ष में जेएनयू प्रशासन के खिलाफ बोलते थे,जो छात्रों के पक्ष में बोलते थे उनमें प्रोफेसर प्रभात पटनायक, उत्सापटनायक,हरवंश मुखिया, जी.पी.देशपांडे, प्रो.विमलकुमार,परिमल कुमार,जीएस भल्ला के नाम प्रमुख हैं।इन चंद शिक्षकों के अलावा कुछ नामी शिक्षक ऐसे भी थे जो छात्रहित के सवालों पर खुलकर स्टैंड लेते थे,अकादमिक जगत में उनका कद बहुत ऊँचा हुआ करता था।बाकी सभी प्रोफेसरों का हाल यह था कि वे खुलकर जेएनयू प्रशासन के अ-लोकतांत्रिक,छात्र विरोधी फैसलों के साथ आँख बंद करके खड़े रहते थे।

नामवरजी के जेएनयू संबंधी कार्य-व्यापार की हर हालत में मीमांसा करने की जरूरत है,क्योंकि उनकी भक्तमंडली बड़ी व्यापक है और नामवरजी अपने जेएनयू कारनामों के लिए झूठ बोलते रहे हैं।यह चीजें नए सिरे से उठाने की इच्छा इसलिए हुई है कि नामवरजी सारे एथिक्स तोड़कर आरएसएस के साथ इन दिनों खुलकर गलबहियां डाले घूम रहे हैं।नामवरजी रीतिकालीन अवगुणों के अलावा अनेक गुण भी हैं।लेकिन उनके गुणों की क्षमता अब चुक गयी है जिसके कारण वे इन दिनों खुलकर देश के सबसे बदनाम शासक नरेन्द्र मोदी के साथ खुलकर खड़े हैं।नामवरसिंह के नरेन्द्र मोदी के साथ चल रहे इस रीतिकालीन भावबोध की खुलकर आलोचना होनी चाहिए,साथ ही इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि एक प्रोफेसर-लेखक-बुद्धिजीवी के कर्म और लेखन में साम्य और वैषम्य के समाज पर किस तरह के प्रभाव पड़ने की संभावनाएं होती हैं।


बुधवार, 13 जुलाई 2016

मथुरा के मायने-

     आपकी दशा मैं नहीं जानता,लेकिन अपनी तकलीफ का एहसास मुझे है और यह एहसास ही मुझे बार-बार मथुरा की ओर खींचता है।आमतौर पर शिक्षा के बाद आदत है कि जहां पैदा हुए,पले-बड़े हुए वहां पर नौकरी करना नहीं चाहते,बाहर जाना चाहते हैं।लेकिन मेरा मन हमेशा इस बात से परेशान रहा कि मुझे मथुरा में उपयुक्त काम ही नहीं मिला वरना मैं जेएनयू से पढ़कर मथुरा लौट आता। मुझसे पूछें तो यही कहूँगा कि नौकरी दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है।नौकरी की तलाश में जब शहर छूटता है तो आपसे बहुत कुछ छूट जाता है।अपने लोग, परिवेश, भाषा,चिर-परिचित संस्कृति आदि आपके हाथ से एक ही झटके में निकल जाते हैं।अधिकतर नौकरीपेशा लोग अपने काम-धंधे में इस कदर मशगूल हो जाते हैं कि इस सांस्कृतिक जमा पूँजी के हाथ से निकल जाने से होने वाली सांस्कृतिक क्षति से अनभिज्ञ रहते हैं।लेकिन आजीविका की तलाश में इस सांस्कृतिक क्षति को हम सबको उठाना पड़ता है।हमारे पास कोई शॉर्टकट नहीं है कि इस क्षति से बच सकें।जन्मस्थान से पलायन एक स्थायी नियति है जिससे आधुनिककाल में पूरा समाज गुजरता है।

मैं मथुरा से जेएनयू पढ़ने के लिए 1979 में निकला तो जानता ही नहीं था कि कभी वापस नहीं लौट पाऊंगा।पढ़ते हुए मन में यही आशा थी कि कहीं मथुरा के आसपास ही नौकरी लग जाएगी और मथुरा से संपर्क-संबंध बना रहेगा।लेकिन बिडम्बना यह कि जैसा चाहा वैसा नहीं घटा।नौकरी की तलाश में ढाई साल तक इधर-उधर दसियों विश्वविद्यालयों में इंटरव्यू दिए।जेएनयू से पढाई खत्म करके निकलने के बाद दि.वि.वि. के दो कॉलेजों में इंटरव्यू देने के बाद तय किया कि कॉलेज में इंटरव्यू नहीं दूँगा और न नौकरी करूँगा।यही वजह थी कि विश्वविद्यालय में ही नौकरी के आवेदन करता रहा,परिचितों से खारिज होता रहा और अंत में कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में नौकरी मिल गयी।

कोलकाता अप्रैल1989 में आया और तबसे यहीं पर हूँ।यहां आने के पहले दिल्ली में था तो मथुरा जल्दी-जल्दी जाता था लेकिन कोलकाता आने के बाद मथुरा आने-जाने का सिलसिला टूट गया।अब साल-छह महिने में आना जाना होता है।इसके कारण मथुरा में नए दोस्त नहीं बने।पुराने दोस्त लगातार उम्रदराज होते गए और उनमें से अनेक थक भी गए हैं।मथुरा से दूर हुआ तो सबसे बड़ा अभाव मुझे का. सव्यसाची का महसूस हुआ।सव्यसाची सही मायने में मथुरा में रचे-बसे थे,वहां के लोगों से घुले-मिले थे,उनसे मिलकर हमेशा मजा आता था,उनकी अनौपचारिक बोलने की शैली और तीखी भाषा हमेशा अपील करती थी,वे मुझे कभी कॉमरेड नहीं कहते ”पंडितजी´´ कहकर बुलाते थे।पता नहीं क्यों उन्होंने मेरे लिए पंडितजी सम्बोधन चुन लिया,मैं नहीं जानता,जबकि मुझे कोई और पंडितजी नहीं कहता था।सव्यसाची के पंडितजी कहने का असर अन्य लोगों पर भी हुआ,इसके कारण और भी कई मित्र पंडितजी कहने लगे। लेकिन इन चंद मित्रों को अलावा सब नाम से ही बुलाते रहे हैं।मेरे मित्रों का सीधे नाम से पुकारना और सव्यसाची जी का पंडितजी कहकर पुकारना अपने आपमें मेरे व्यक्तित्व के उन पहलुओं को अभिव्यंजित करता है जो मुझे सामाजिक विकास के क्रम में मिले हैं,मेरे व्यक्तित्व में दो किस्म के व्यक्ति हैं।एक वह व्यक्ति है जो पिता और संस्कृत पाठशाला ने बनाया,दूसरा वह व्यक्ति जिसे मथुरा –जेएनयू के मित्रों और जेएनयू की शिक्षा ने बनाया।मजेदार बात है कि मैं इन दोनों को आज भी जीता हूँ।मुझे अपने बचपन के संस्कृत के सहपाठी और अग्रज जितने अच्छे लगते हैं उतने ही जेएनयू के मित्र और कॉमरेड भी अच्छे लगते हैं।



मुझे मथुरा का अतीत बार-बार अपनी ओर खींचता है,लेकिन जेएनयू नहीं खींच पाता।जेएनयू से पढ़कर निकलने के बाद 1989 से लेकर आज तक में मात्र 4बार ही जेएनयू गया हूँ।लेकिन इस बीच मथुरा बार-बार गया,उन पुराने स्थानों पर बार- बार जाता हूँ जो मेरी बचपन की स्मृति का अंग हैं,या मेरी फैंटेसी का अंग हैं।अपने जीवन के तजुर्बे से यही सीखा है कि जन्मस्थान का मतलब कुछ और ही होता है,जन्मस्थान आपके रगों में,इच्छाओं और आस्थाओं में रचा-बसा होता है,वह आपके व्यक्तित्व के निर्माण में बुनियादी रूप से भूमिका निभाता है।वह कभी पीछा नहीं छोड़ता।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

आज कवि केदारनाथ सिंह का जन्मदिन है- जनप्रिय केदारनाथ सिंह

         केदारनाथ सिंह पर लिखना बहुत मुश्किल काम है।नामवरजी पर जल्दी लिख सकते हैं,मैनेजर पांडेय पर उससे भी जल्दी लिख सकते हैं,लेकिन केदारजी पर लिखना आसान नहीं है,उन पर लिखना नामवरजीसे भी मुश्किल काम है। दो दिन पहले से मन में तय कर लिया था कि केदारजी के जन्मदिन पर फेसबुक पर जरूर लिखूँगा।नामवरजी पर इतना लिख चुका हूँ कि सभी मित्र चिढ़ने लगे हैं,कहते हैं नामवरग्रंथि के शिकार हो ! लेकिन मैंने विगत दो दिन में महसूस किया कि केदारजी पर लिखना सबसे मुश्किल है।उनकी कविता पर सोचता हूँ तो लगता है जन्मदिन पर काव्यमीमांसा गले नहीं उतरेगी,इन दिनों फेसबुक मित्रों का आस्वाद बदल गया है,वे हल्का लिक्विड चाहते हैं जिसके जरिए केदारजी सीधे गले में उतर जाएं।

दिक्कत यह है कि केदारजी इतने सरल,सहज हैं कि वे पहले से ही तरल पदार्थ की तरह युवाओं से लेकर रचनाकारों के गले में उतरे हुए हैं,फेसबुक पर अनेक फोटोग्राफ नजर आए जिनमें वे युवाओं के बीच में हैं।समस्या यह है लेखक के बारे में यदि उसके जन्मदिन को याद करें तो किस तरह याद करें।जन्मदिन मनाने का ´केक काटो खुशियां मनाओ´,आइसक्रीम लेखक के गालों पर मल दो,यह चलेगा नहीं।आखिर जन्मदिन पर कौनसी चीज है जिसे याद करें ॽ मुझे लगता है हर लेखक से पूछा जाना चाहिए कि वह आदमी कैसा है ॽ

केदारजी को मैं बहुत ज्यादा नहीं जानता।बहुत कम जानता हूँ।लेकिन जितना भी जानता हूँ वह उन पर लिखने के लिए पर्याप्त नहीं है।केदारजी से मुझे पढ़ने,उनके निर्देशन में एमफिल्,पीएचडी करने का सौभाग्य मिला,मैं उनको एक बेहतरीन शिक्षक के रूप में बहुत प्यार करता रहा हूँ।केदारजी ऐसा नहीं है कि मेरे प्रिय शिक्षक थे वे उन तमाम छात्रों के प्रिय शिक्षक थे जो जेएनयू पढ़ने आते थे।मैंने अपने जीवन में इस तरह का इंसान नहीं देखा जो पढ़ाते समय डूबकर पढाए,रिश्ते और संबंध निभाते समय मानवता और संवेदनशीलता की डोर से बंधा रहे,छात्रों को तिकड़म का पाठ न पढ़ाए।



केदारजी बेहद सरल हैं लेकिन राजनीति में बेहद कठोर,उनके अंदर लोकतांत्रिक भावों और हकों को लेकर गहरी निष्ठा और लगाव है जो हम सब छात्रों को जेएनयू में प्रेरित करता रहा है।मैं जेएनयू में छात्रों के बीच में सबसे सक्रिय छात्रों की टोली में था,बहुत कम समय मिलता था उनसे मिलने का,लेकिन पढ़ने का समय मिल जाता था।केदारजीकी सबसे बेहतरीन बात यह कि वे जब कहो मिलने को राजी हो जाते।मुझे एक बार का वाकया याद आ रहा है मैं1981-82 में एसएफआई की ओर से उपाध्यक्ष का उम्मीदवार था और पूर्वांचल होस्टल में चुनावी जनसभा थी रात को,मैं एमफिल में था।वे मेरे गाइड थे। मैं चुनाव प्रचार में बुरी तरह मशगूल था,लेकिन केदारजी से मिलना बेहद जरूरी था।वे उन दिनों पूर्वांचल में रहते थे। मैंने उनसे कहा आपसे मिलना है बोले जब मन हो आ जाओ,मैंने कहा मैं आज रात पूर्वांचल होस्टल चुनावसभा करने जाऊँगा,देर रात को साढ़े बारह के बाद सभा खत्म होगी, मैं उसके बाद आपसे मिलने आ जाऊँगा।बोले बेहिचक चले आओ। मैं तकरीबन एक बजे रात को उनके पास पहुँचा,एक घंटा जमकर बातें कीं और दो बजे करीब मैंने कहा चलता हूँ,इतनी देर गए कोई सवारी वहां से मिलने की संभावना नहीं थी,पैदल ही तकरीबन 6किलोमीटर आना था।केदारजी ने कहा आधी दूर तक मैं तुमको छोड आता हूँ,हम दोनों पैदल ही रात को चलते हुए आए,केदारजी आधी दूरी मुझे छोड़कर चले गए और बोले अब तुम आराम से चले जाओगे।मैंने उनको मना किया कि मैं अकेले चला जाऊँगा,बोले नहीं बहुत दूर है,रात गहरी है,ठंड है, तकलीफ होगी,मैं कुछ दूर साथ चलता हूँ,बोरियत कट जाएगी।मैं उनके व्यवहार और आत्मीयता से मस्तभाव में बीच रास्ते में उनको छोड़कर चला आया,दिलचस्प बात यह है आधी दूर वे पैदल चलकर अपने घर गए,मैंने जेएनयू में इस तरह का मिलनसार व्यक्तित्व नहीं देखा।

शुक्रवार, 13 मई 2016

भक्त प्रोफेसरों के प्रतिवाद में -

           जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की एकेडमिक कौंसिल की बैठक में शिक्षकों ने जिस एकजुटता का परिचय दिया है वह हम सबके लिए गौरव की बात है।इससे देश के प्रोफेसरों को सीखना चाहिए। जेएनयू के शिक्षकों ने अपने संघर्ष और विवेक के जरिए जेएनयू कैंपस के लोकतांत्रिक परिवेश और लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत किया है।हमारे देश के विश्वविद्यालयों के अधिकांश प्रोफेसर यह भूल गए हैं कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व तब तक है जब तक विश्वविद्यालय स्वायत्त हैं।प्रोफेसर अपने पेशे के अनुरूप आचरण करें।लेकिन हमारे अधिकांश प्रोफेसरों ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु विश्वविद्यालय के स्वायत्त स्वरूप पर हमलों को सहन किया ,हमलों में मदद की ,इसके कारण राजनेताओं और मंत्री का मन बढ़ा है।इस तरह के प्रोफेसरों को ´भक्त प्रोफेसर´ कहना समीचीन होगा। प्रोफेसर का पद गरिमा और बेहतरीन जीवनमूल्यों से बंधा है उसकी ओर भक्तप्रोफेसरों ने आलोचनात्मक ढ़ंग से देखना बंद कर दिया है।वे शासन की भक्ति में इसकदर मशगूल हैं कि उनको देखकर प्रोफेसर कहने में शर्म आती है,इस तरह के ´भक्तप्रोफेसरों´ की स्थिति गुलामों जैसी है।हमें हर हाल में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की रक्षा करनी चाहिए और विश्वविद्यालय के अंदर और बाहर स्वायत्तता,अकादमिक स्वतंत्रता और अकादमिक गरिमा के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।

हमारे सामने नमूने के तौर पर दिल्ली के दो विश्वविद्यालय हैं और वहां दो भिन्न किस्म के रूख प्रोफेसरों के नजर आ रहे हैं।जेएनयू में शिक्षकसंघ लोकतांत्रिक हकों के पक्ष में खड़ा है और लड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ और डीयू के अधिकांश प्रोफेसरों का रवैय्या चिंता पैदा करने वाला है।स्मृति ईरानी ने आदेश दे दिया है कि दिविवि की अकादमिक कौंसिल की बैठक का एजेण्डा पहले मंत्रालय से स्वीकृत कराओ उसके बाद अकादमिक परिषद की बैठक करो,कोई फैसला लेने के पहले मंत्री से अनुमति लो।यह सीधे डीयू की स्वायत्तता पर हमला है लेकिन भक्तप्रोफेसर चुप हैं,वे चुप क्यों हैं ॽ शिक्षकसंघ चुप क्यों है ॽकोई जुलूस या धरना इस आदेश के खिलाफ क्यों नहीं निकला ॽ क्या इस तरह चुप रहकर विवि की स्वायत्तता की रक्षा होगी ॽ पीएम की डिग्रियों को लेकर विवाद हो रहा है लेकिन दिविवि शिक्षक संघ चुप है ॽकौन रोक रहा है प्रतिवाद करने से ॽ हमें शिक्षक संघों को निहित स्वार्थी घेरेबंदी से बाहर निकालना होगा। हमें प्रोफेसर की मनो-संरचना में घुस आई भक्ति को नष्ट करना होगा।इस भक्ति का ज्ञान से बैर है।यह भक्ति वस्तुतःनए किस्म की गुलामी है जिसे हम विभिन्न रूपों में जीते हैं।

उस मनो-संरचना के बारे में गंभीर सवाल खड़े करने चाहिए जिसमें जिसमें विवि के प्रोफेसर रहते हैं। प्रोफेसर का पद स्वतंत्र और स्वायत्त चिंतनशील नागरिक का पद है।इस पद को हमने तमाम किस्म के दबाव-अनुरोध-मित्रता और निहित स्वार्थी राजनीतिक पक्षधरता का गुलाम बना दिया है।अब हमारे प्रोफेसरों को स्वतंत्र और स्वायत्त विचार पसंद नहीं हैं, अनुगामी विचार पसंद हैं।हमें बस्तर के माओवादियों की जंग तो अपील करती है लेकिन विवि में उपकुलपति के अ-लोकतांत्रिक फैसले नजर नहीं आते।मंत्री के हमले देखकर हमारा खून नहीं खौलता।ये असल में भक्त प्रोफेसर हैं,जो हर हाल में वीसी के भक्त बने रहने में अपनी भलाई समझते हैं।

हमने प्रोफेसर के नाते किसी न किसी राजनीतिकदल के लठैत का तमगा अपने सीने पर चिपका लिया है।प्रोफेसर जब अपने शिक्षा के काम को राजनीतिक दल के लक्ष्यों के अधीन बना देता है तो वह वस्तुतःआत्महत्या कर लेता है।यही वह बुनियादी बिंदु है जहां से स्वायत्तत प्रोफेसर का अंत होता है और भक्त प्रोफेसर जन्म लेता है। भक्त प्रोफेसर ´ पर उपदेश कुशल बहुततेरे´ की धारणा से ऊपर से नीचे तक लिपा-पुता होता है।इन लोगों ने ही अकादमिक गरिमा,स्तर,मूल्य आदि की गिरावट में बहुमूल्य योगदान किया है।भक्त प्रोफेसर शिक्षा में कैंसर हैं।वे स्वयं को नष्ट करते हैं,छात्रों को नष्ट करते हैं और विवि की स्वायत्ता को भी नष्ट करते हैं।





सोमवार, 9 मई 2016

जेएनयू के छात्र आंदोलन के समर्थन में राष्ट्रपति के नाम अपील

Text of the appeal authored by a former President of the JNUSU , Jagadishwar Chaturvedi , that was passed unopposed by the JNU oldies after more than 50-hours debate , discussions , deliberations , consent after dissent the world over in the larger interest of JNU and democracy in India . Dear Mr President Sir
We the Alumni of JNU, request you to kindly intervene in the ongoing student agitation on the campus and help restore normalcy.
The health of several office-bearers and other members of JNUSU, on an indefinite hunger strike under the banner of JNUSU over the last eight days, is causing serious concern.
The students have been demanding that the ‘disciplinary action’ suggested by the “High Level Enquiry Committee” set up by the University Administration be revoked forthwith.
At the very inception of the committee the students had raised several objections to the setting up of the committee and had said that it was totally unacceptable. It is worth noting that the JNUTA had also rejected the enquiry committee.
The administration rejected the objections and conducted a one sided probe. Police action was also been initiated against the students and the matter is sub-judice.
The action initiated against the students and office bearers of JNUSU is politically motivated. We therefore demand that the JNU administration immediately withdraw the proposed disciplinary action and restore normalcy on Campus
मान्यवर,
हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र आपसे अनुरोध करते हैं कि विश्वविद्यालय प्रांगण में चल रहे छात्रों के आंदोलन में हस्तक्षेप करके कैंपस में शांति बहाल करने में मदद करें।उल्लेखनीय है कैंपस में छात्रसंघ के बैनरतले अनेक छात्र और छात्रसंघ पदाथिकारी विगत आठ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं।इन सभी छात्रों की शारीरिक अवस्था चिंताजनक है।छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को तुरंत रद्द किया जाय।यह जांच कमेटी जब गठित की गयी थी तब ही छात्रों ने इसके निर्माण पर अनेक आपत्तियां प्रकट की थीं,इन आपत्तियों को प्रशासन ने एकसिरे से अस्वीकार किया और इकतरफा जांच कमेटी का गठन करके उस घटना की जांचकी।उल्लेखनीय है कि जेएनयू शिक्षक संघ ने भी जांच समिति को अस्वीकार किया था।वहीं दूसरी ओर छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई भी गयी।जिससे संबंधित मुकदमा अदालत में विचाराधीन है।हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि जिन छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी है वह राजनीति से प्रेरित है।अतःहम मांग करते हैं कि जेएनयू प्रशासन तुरंत छात्रों के खिलाफ की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को वापस ले और कैंपस में शांति बहाल करे।( चन्द्रप्रकाश झा की वॉल से साभार

रविवार, 1 मई 2016

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू- 1-

      छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू। छात्र अस्मिता की राजनीति का आरंभ सन् 65-66 में बीएचयू में समाजवादियों ने किया और जेएनयू ने उसे सन् 1972-73के बाद से नई बुलंदियों तक पहुँचाया। देश में छात्र अस्मिता और छात्र राजनीति को लोकतांत्रिक बोध देने में एसएफआई की बड़ी भूमिका रही है, खासकर जेएनयू में। जेएनयू लोकतांत्रिक छात्र राजनीति की प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला के निर्माण में मार्क्सवादियों, समाजवादियों और फ्री थिंकरों की केन्द्रीय भूमिका रही है।
आमतौर पर शिक्षा का देश में जो वातावरण है वह छात्रों को सामाजिक जड़ताओं और रूढियों से मुक्त नहीं करता। इसके विपरीत जेएनयू के संस्थापकों का सपना था शिक्षा को रूढियों और सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का अस्त्र बनाया जाए। शिक्षा केन्द्र वर्जनाओं से मुक्ति के तीर्थ बनें। जेएनयू के वातावरण में सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का संदेश छिपा है। जेएनयू में पढ़ने वाला छात्र सामान्य प्रयत्न से सामाजिक रूढियों और वर्जनाओं से मुक्त होता है । जेएनयू की संरचना में वर्जना और अछूतभाव के लिए जगह नहीं है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी बाधा है वर्जनाएं ,अछूतभाव और भेदभाव की सभ्यता। जेएनयू का इसी सभ्यता के साथ विचारधारात्मक संघर्ष है। जेएनयू का वातावरण निषेधों और वर्जनाओं के वातावरण का विकल्प देता और इस विकल्प को तैयार करने में जेएनयू के छात्रों और छात्र राजनीति की केन्द्रीय भूमिका रही है। यह वातावरण किसी एक नेता, प्रशासक, संगठन आदि की देन नहीं है बल्कि सामुदायिक प्रयासों की देन है। सामुदायिक प्रयासों ने जाने-अनजाने जेएनयू की धुरी बायनरी अपोजीशन को बना दिया। यहां पर छोटा बड़ा और बड़ा छोटा बन जाता है। भेदों की अनुभूति गायब है।
भारतीय समाज में तरह-तरह के भेद हैं किंतु जेएनयू में अभेद का वैभव है। जेएनयू भेदों को समझता है किंतु मानता नहीं है। बाकी विश्वविद्यालय भेदों को समझने के साथ भेदों में जीते हैं। शिक्षा के लिए भेद और वर्जनाएं सबसे बुरी चीजें हैं। इन्हीं दोनों चीजों को जेएनयू ने निशाना बनाया है। जेएनयू वास्तव अर्थों में संस्थान है यहां प्रत्येक स्तर पर सभी वर्ग शिरकत करते हैं। खासकर छात्रों की शिरकत अभूतपूर्व है। देश के किसी भी विश्वविद्यालय में प्रत्येक स्तर पर छात्रों की शिरकत, सम्मान और साख वैसी नहीं है जैसी जेएनयू में है। फैसलेकुन कमेटियों में सभी स्तरों पर छात्रों की शिरकत और छात्रों की राय का सम्मान जेएनयू की सबसे बड़ी पूंजी है।
जेएनयू का कोई भी आख्यान छात्रों के बिना नहीं बनता। जेएनयू छात्रों की पहचान ज्ञान ,राजनीति और लोकतांत्रिक नजरिए से बनी है। लोकतंत्र की महानता का जैसा आख्यान जेएनयू ने तैयार किया है वैसा दुनिया के किसी भी देश में देखने को नहीं मिलता। जेएनयू के छात्रों के पास दुनिया को देखने का एक विशिष्ट नजरिया है,जीवनशैली और स्वायत्ताता बोध है। यही वजह है जेएनयू का छात्र भिन्न नजर आता है।
जेएनयू के वातावरण में व्यक्तित्व रूपान्तरण की अद्भुत शक्ति है। आप किसी भी पृष्ठभूमि के हों जेएनयू में दाखिला लेने के बाद बदले बिना नहीं रह सकते। व्यक्तित्व रूपान्तरण की इतनी जबर्दस्त स्वाभाविक शक्ति अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। आखिरकार परिवर्तन की यह शक्ति आती कहां से है ?
मैं अपने छोटे से तजुर्बे के आधार पर कह सकता हूँ कि जेएनयू की स्वाभाविक धारा में शामिल होने के बाद कोई भी छात्र और अध्यापक अपने को बदले बिना नहीं रह सकता। जो बदल नहीं पाते थे वे संग्रहालय की धरोहर नजर आते थे। बदलो या धरोहर बनो। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से जेएनयू का वातावरण किसी भी छात्र की जीवनशैली और नजरिए को प्रभावित करता है।
जेएनयू में सन् 1979 में जब प्रवेश परीक्षा देने आया तो सबसे पहले गंगा ढाबे पर अनिल चौधरी से परिचय हुआ। वह उस समय एसएफआई के और छात्र संघ के महासचिव थे। उनसे मिलने का प्रधान कारण था वह मथुरा के थे। मैं भी मथुरा का था। उन्होंने बड़े ही आत्मीयभाव से स्वागत किया और अनौपचारिक ढ़ंग से व्यवहार किया। अनिल के अंदाज में खासकिस्म का गर्वीला ठेठ देसी भाव था जो अपनी चाल-ढाल और बातचीत की भाषा में अभिजात्य भावबोध को चुनौती देता था। वह तीक्ष्णबुद्धि और तेजतर्रार छात्रनेता था। अनेक विलायत पलट नेता उसके नजरिए के सामने बौने नजर आते थे। समस्याओं को सुलझाने की उसकी अपनी देशी शैली थी और भाषण का स्थानीय मथुरिया अंदाज था।
मथुरिया अंदाज की विशेषता है बेबाकी मुखरता। अंग्रेजी भाषी अभिजात्य पृष्ठभूमि के लोग उसकी पारदर्शी बुद्धि की दाद देते थे। अनेक बार छात्र आन्दोलन के संकट के क्षणों में अनिल की मेधा बिजली की चमक की तरह दिखती थी, अनिल की हमदर्दी और संवेदनशीलता के सारे कॉमरेड कायल थे और अपने सुख-दुख का उसे साथी मानते थे।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू -2-

       जेएनयू की 'स्प्रि ‍ट' का स्रोत हैं छात्र। छात्रों की एकता,सहनशीलता,मि‍तव्ययता, अनौपचारि‍कता, बौद्धि‍कता आदि‍ के सामने सभी नतमस्तंक होते हैं। जेएनयू की पहचान जी.पार्थसारथी, नायडूम्मा, मुनीस रजा,जीएस भल्ला या नामवर सिंह से नहीं बनती। जेएनयू की पहचान की धुरी है ''छात्र स्प्रिट'। यह 'छात्र स्प्रिट' सारी दुनि‍या में कहीं पर भी देखने को नहीं मि‍लेगी। जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' का आधार न वाम वि‍चारधारा है न दक्षि‍णपंथी वि‍चारधारा है। बल्कि लोकतांत्रि‍क अकादमि‍क वातावरण,वि‍चारधारात्मक वैवि‍ध्य, और लोकतांत्रि‍क छात्र राजनीति‍ इसकी आत्मा है। जेएनयू के वातावरण और 'छात्र स्प्रि ‍ट' को नि‍र्मि‍त करने में अनेक वि‍चारधाराओं की सक्रि‍य भूमि‍का रही है। जेएनयू का अकादमि‍क वातावरण वि‍चारधाराओं के संगम से बना है। जेएनयू में आपको एक नहीं अनेक वि‍चारधाराओं के अध्ययन-अध्यापन और सार्वजनि‍क वि‍मर्श का अवसर मि‍लता है । इस अर्थ में जेएनयू वि‍चारधाराओं का वि‍श्ववि‍द्यालय है। सि‍र्फ वाम वि‍चारधारा का वि‍श्ववि‍द्यालय नहीं है।फर्क इतना है कि‍ अन्यत्र वि‍श्ववि‍द्यालयों में वि‍चारधाराओं के अध्ययन -अध्यापन को लेकर इस तरह का खुलापन,सहि‍ष्णु और लोकतांत्रि‍क भाव नहीं है जि‍स तरह का यहां पर है।
जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' के अनेक नजारे हमारी आंखों से गुजरे हैं। आज भी इस 'छात्र स्प्रिट' को आप व्यंजि‍त होते देख सकते हैं। मुझे मई 1983 का ऐति‍हासि‍क क्षण याद आ रहा है। यह क्षण कई अर्थों में छात्र राजनीति‍ के सभी पुराने मानक तोड़ता है और नए मानकों को जन्मं देता है। यह वह ऐति‍हासि‍क क्षण है जि‍समें जेएनयू अपना समस्त पुराना कलेवर त्यागकर नया कलेवर धारण करता है। छात्रों में अभूतपूर्व एकता,अभूतपूर्व भूल और अभूतपूर्व क्षति‍ के दर्शन एक ही साथ हुए हैं। जेएनयू की अभूतपूर्व क्षति‍ के लि‍ए सि‍र्फ उस समय के छात्रसंघ के नेतृत्व को दोष देना सही नहीं होगा। मई 1983 की जेएनयू की तबाही के लि‍ए छात्र बहानाभर थे। असल खेल तो प्रशासकों ने खेला था। उस खेल में अधि‍कांश नामी गि‍रामी शि‍क्षकों ने प्रशासन का समर्थन कि‍या था। एकमात्र जीपी देशपाण्डे ,प्रभात पटनायक, सुदीप्ति‍‍ कवि‍राज, उत्सा पटनायक, पुष्पेंशपंत आदि ने खुलेआम छात्रों का पक्ष लि‍या था,प्रशासकों के खि‍लाफ आवाज उठायी थी। बाकी सब तो 'बदलो' ,' बदलो' कर रहे थे। मई 83 की घटना के साथ जेएनयू की समस्त पुरानी ऐति‍हासि‍क मान्याताएं, धारणाएं, वि‍श्वास, संस्कार,आदतें, राजनीति‍क मान्यताएं, प्रशासनि‍क नजरि‍या,प्रशासकीय नीति‍यां सब कुछ धराशायी हो गए । मई 83 की घटना को बहाना बनाकर जेएनयू को सुनि‍योजि‍त ढ़ंग से प्रशासकों ने तोड़ा। इस कार्य में लोकल प्रशासकों से लेकर केन्द्रीय शि‍क्षा मंत्रालय तक सभी का हाथ था। छात्र आंदोलन को तो महज बहाने के रूप में इस्तेमाल कि‍या गया था। मई छात्र आंदोलन नहीं होता तब भी जेएनयू में बुनि‍यादी परि‍वर्तन आते। मई 83 के भयानक दमन के बाद भी 'छात्र स्प्रि ट' खत्म नहीं हुई । सारे प्रशासकीय और नीति‍गत परि‍वर्तनों को लाने का बुनि‍यादी लक्ष्य था 'छात्र स्प्रिट' को नष्ट करना। छात्रों ने कभी भी यह लक्ष्य हासि‍ल करने दि‍या।उल्लेखनीय है मई आंदोलन के कारण 170 से अधिक छात्र निष्कासित हुए,एक साल दाखिले नहीं हुए,370से अधिक छात्रों पर 20 से अधिक केस दो साल तक चलते रहे। मई 83 के भयानक उत्पीडन और दमन के बावजूद छात्रों की एकता,भाईचारा, राजनीति‍क सहि‍ष्णुता और बंधुत्व बना रहा। उल्लेखनीय है मई 83 में मैं वहां की राजनीति‍ का अनि‍वार्य हि‍स्सा‍ था। जेएनयू की स्टूडेण्ट फेडरेशन ऑफ इण्डिया की जेएनयू यूनि‍ट का अध्यक्ष और दि‍ल्ली राज्य का उपाध्यक्ष था। बाद में सन् 1984 -85 के छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष बनने वाला जेएनयू का एकमात्र हि‍न्दीभाषी छात्र था। जेएनयू कि‍सी व्यक्ति का बनाया नहीं है, कुछ व्यंक्तियों का भी बनाया नहीं है। वह प्रोफेसरों का भी बनाया नहीं है। जेएनयू को बनाया है छात्र स्प्रिट ने। कि‍सी महापंडि‍त ने जेएनयू नहीं बनाया। जेएनयू में व्यक्ति नहीं 'स्प्रिट' महत्वपूर्ण है। कर्मण्यता और छात्रसेवा महत्वपूर्ण है। जेएनयू 'छात्र स्प्रिट' की धुरी है कर्मण्यता। जो छात्रों के लि‍ए काम करेगा उसे वे प्यार करते हैं। वे राजनीति‍ पर ध्यान पीछे देते हैं कर्मण्यता पर ध्यान पहले देते हैं। अकर्मण्यक होने पर वे कि‍सी भी धाकड़ नेता को घूल चटा सकते हैं। छात्रों के बीच कौन कि‍तना समय देता है, उनकी तकलीफों में कौन कि‍तना ध्यान देता है,कि‍तना समय उनकी सुख दुखभरी जिंदगी में शेयर करता है। इन चीजों को जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' पहचानती है। कोई बढ़ि‍या नेता हो लेकि‍न छात्रों के बीच में नहीं छात्रसंघ के दफतर में क्लर्क की तरह बैठा रहे। छात्रसंघ की कार्रवाईयों को ही महत्व दे। सार्वजनि‍क तौर पर कम मि‍ले या लोगों में कम घुले मि‍ले तो ऐसे नेता को जेएनयू के छात्र पसंद नहीं करते।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू-3-

             जेएनयू की एक आयरनी है कि इसमें आइकॉन विरोधी भावबोध है। इसके बावजूद कुछ छात्रनेता ऐसे भी हुए जो अपने को जेएनयू के आइकॉन या प्रतीक पुरूष के रूप में प्रतिष्ठित करने में सफल रहे। इनमें जिसने सबसे ज्यादा शोहरत और साख हासिल की है वह देवी प्रसाद त्रिपाठी यानी डीपीटी। इन दिनों वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। देवी प्रसाद त्रिपाठी से मेरी पहली मुलाकात सन् 1979 के अक्टूबर महिने में छात्रसंघ के चुनाव के मौके पर हुई। त्रिपाठीजी के बारे में मैं लगातार अन्तर्विरोधी बातें सुनता रहता था। खासकर जेएनयू आने के बाद अनेक एसएफआई नेता थे जो नहीं चाहते थे कि त्रिपाठी जी को कभी भी एसएफआई और उससे जुड़े मंचों पर बुलाया जाए। मजेदार बात यह थी कि ये नेतागण उनके बारे में तरह-तरह की कानाफूसी भी किया करते थे। एक अवस्था तो यह भी आयी कि माकपा के दिल्ली राज्य नेतृत्व से यह तय करा लिया गया कि त्रिपाठी को कभी जेएनयू चुनाव में प्रचार के लिए नहीं बुलाया जाएगा। सन् 1979 में डी.रघुनंदन को एसएफआई ने अध्यक्ष पद पर लड़ाने का फैसला लिया। आखिरी समय में स्थितियां एसएफआई के अनुकूल नहीं थीं। उस साल एआईएसएफ के साथ चुनावी समझौता भी नहीं हो पाया था। अंत में झक मारकर जेएनयू पार्टी ब्रांच ने निर्णय लिया कि देवीप्रसाद त्रिपाठी को प्रचार के लिए इलाहाबाद से बुलाया जाए। देवी प्रसाद त्रिपाठी उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में अध्यापन कार्य कर रहे थे और माकपा के उ.प्र. राज्य कमेटी सदस्य थे। इलाहाबाद में पार्टी का काम मूलत: उन्हीं के जिम्मे था। उल्लेखनीय है उनके इलाहाबाद में पार्टी कार्य देखने के दौरान ही पहलीबार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यक्ष पद पर एसएफआई ने चुनाव जीता था। त्रिपाठीजी की इन सारी स्थितियों के बावजूद जेएनयू के कुछ नेताओं का उनके प्रति गुटपरस्तभाव मुझे आज तक समझ में नहीं आया। मेरी समझ है जब एक व्यक्ति पार्टी का सदस्य है तो उसके प्रति पार्टी के अंदर भेदभाव नहीं होना चाहिए। डीपीटी के संदर्भ में माकपा के अंदर भेदभाव और गुटपरस्ती को मैंने पहलीबार जब देखा तो माथा ठनका था। कई बार इस मसले को लेकर पार्टी में गर्मागर्म बहसें भी हुईं और उसका यह सुपरिणाम था कि मैं त्रिपाठीजी को देखना चाहता था, मैंने कुलदीपकुमार से अपनी इच्छा व्यक्त की मेरी डीपीटी से मुलाकात करा दो। कुलदीप ने कहा वे रघु के चुनाव प्रचार के लिए आ रहे हैं तुम मेरे साथ रहना मुलाकात हो जाएगी और त्रिपाठी आए तो सबसे पहले उन्हें खाना खिलाने के लिए हम दोनों डाउन कैम्पस में कटवारिया सराय में एक रेस्टोरैंट में ले गए हम तीनों ने जमकर खाना खाया और खूब बातें की। अंत में खाना खाकर तकरीबन ग्यारह बजे रात को हम ऊपर कैम्पस में आए और गोदावरी होस्टल (लड़कियों का) में चुनावसभा स्थल पर पहुँचे और तकरीबन एक बजे करीब डीपीटी ने अपना भाषण शुरू किया जो तकरीबन ढाई घंटे का था । इतना लंबा धारावाहिक, आकर्षक, विचारों से भरा भाषण्ा सुनकर सभी छात्र मुग्ध थे, मेरे लिए यह विलक्षण अनुभव था। मैंने अनेक नेताओं के भाषण सुने थे, सबसे लंबे भाषण के रूप में जयप्रकाशनारायण और चन्द्रशेखर का भाषण मैं मथुरा में सुन चुका था। किंतु डीपीटी के भाषण के बाद जो अनुभूति भाषणकला के प्रति पैदा हुई वह आनंददायी थी। डीपीटी का भाषण आकर्षक,सरस, मानवीय और विचारधारात्मक था। यह भाषण द्विभाषी था। अधिकांश समय अंग्रेजी को मिला तकरीबन आधा घंटा हिन्दी में भी बोले। अनिलचौधरी और रमेश दधीचि के अलावा त्रिपाठीजी तीसरे छात्र नेता थे जो हिन्दी में भी थोड़ा समय बोलते थे। रघु के चुनाव की यह अंतिम सभा थी और इसमें प्रकाश कारात, सीताराम येचुरी ने भी भाषण दिया और जब त्रिपाठीजी बोल रहे थे वे दोनों मुग्धभाव से सुन रहे थे और बार-बार यह संकेत भी कर रहे थे कि त्रिपाठी को सुनना एक आनंद से कम नहीं है। मजेदार बात यह थी कि उन्हें इतना मजा आ रहा था कि प्रत्येक बीस मिनट के बाद एक स्लिप डीपीटी की ओर बढ़ा देते थे कि बीस मिनट और बोलो। किसी नेता के भाषण के प्रति किसी नेता का यह आग्रह निश्चित रूप से विरल चीज थी। डीपीटी के भाषण शुरू होने के बाद कैम्पस में और कहीं पर किसी भी संगठन को अपनी चुनावी सभा जारी रखने में जबर्दस्त मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। विपक्ष के सभी नेता और कार्यकत्तर्ाा अपनी सभा खत्म करके उनका भाषण सुनने चले आते थे ,रघु की चुनाव सभा में कहने को मंच पर प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी बैठे थे वे पहले ही भाषण दे चुके थे उनके भाषणों के दौरान वह हलचल और सुनने की बेचैनी नहीं देखी गयी जो त्रिपाठी के भाषण के समय देखी गयी। त्रिपाठी को लंबे समय तक विपक्ष की सभाभंग करने वाले वक्ता के रूप में भी जाना जाता था। त्रिपाठी के भाषण के प्रति आम छात्रों में एक तरह का पागलपन था। मैंने अनेक छात्रों से पूछा कि भाई ऐसा क्या है जो पागल की तरह सुनने आ गए, सभी एक ही बात कहते थे कि त्रिपाठी को सुनने में मजा आता है। त्रिपाठी के भाषण के बाद जाना कि भाषण को आनंद देने वाला होना चाहिए। अमूमन नेतागण भाषणों के जरिए बोर करते हैं। त्रिपाठी के भाषणों में रस होता था। त्रिपाठी ने अपनी भाषणकला में राजनीतिक भाषण कला में समाजवादी, कम्युनिस्ट और पंडितों की कथाशैली का सम्मिश्रण करके एक ऐसा फॉरमेट तैयार किया था जिसमें समाजवादियों की तरह विचारधारात्मक विवाद थे, कथाओं की तरह आनंद और आख्यान था साथ ही कम्युनिस्टों की समाहार शैली भी थी। त्रिपाठी की कोशिश हुआ करती थी कि श्रोताओं को कुछ देर के लिए दैनन्दिन जंजाल के बाहर ज्ञान के जंजाल में आनंद लेने को तैयार किया जाए। फलत: भाषण में विवाद ,समाहार,और आनंद की त्रिवेणी का एक अच्छी विचारोत्तोजक सुबह में मिलन होता था। त्रिपाठी का भाषण आधी रात के बाद कभी शुरू होता था और सुबह सूर्योदय के पहले तक चलता था। रघु के चुनाव के समय जो जलवा था वही जलवा अगले साल वी. भास्कर के चुनाव के समय भी था और दोनों ही मौकों पर मैन ऑफ द मैच त्रिपाठी थे। त्रिपाठी का हिन्दी का देशी ठाठ हिन्दीभाषी प्रान्तों के छात्रों को बेहद अपील करता था। डीपीटी अकेले वक्ता थे जिनकी अभिजन और गैर अभिजनों में समान अपील और सम्मान था। रघु की चुनाव सभा खत्म करने के बाद डीपीटी और मै,ं कुलदीपकुमार के पेरियार होस्टल स्थित कमरे में चले आए तब त्रिपाठीजी ने अपने हंसी-मजाक वाले अंदाज में ही मुझसे अपनी ज्योतिष संबंधी जिज्ञासाएं रखीं और इस तरह मैंने पहलीबार किसी माक्र्सवादी को ज्योतिषी से प्रश्न करते पाया।

रविवार, 27 मार्च 2016

जेएनयू और छिपाने की कला


        जेएनयू का 9फरवरी2016 का मुद्दा राजनीतिक-डिजिटल है।राजनीतिक आयाम समझ में आ रहेहैं उन पर बहस भी हो रही है।लेकिन डिजिटल दुरूपयोग के आयाम खुलने बाकी हैं। जिस समय 9फरवरी की घटना घटी उसी दिन मौके पर पुलिस मौजूद थी,कोई वीडियोग्राफर भी था,लेकिन तत्काल किसी ने पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं की।पुलिस ने मौके पर रहते हुए किसी की गिरफ्तारी नहीं की,यहां तक कि बाद में भी पुलिस ने किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं करायी।चूंकि घटना कैम्पस में हुई थी अतःइस घटना पर विश्वविद्यालय की एफआईआर दर्ज कराने की जिम्मेदारी बनती है लेकिन वि.वि. ने भी इस घटना पर पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करायी,यही वह बिंदु है जहां से जेएनयू की 9फरवरी की घटना एक नियोजित सत्ता षडयंत्र प्रतीत होती है।जो भी शिकायतें या एफआईआर पुलिस में हुई हैं वे भाजपा के सांसद और एबीबीपी के जेएनयू नेताओं ने करायी हैं।जबकि तकनीकी तौर पर वे इसके लिए अधिकारी नहीं हैं। असल में ,डिजिटल मेनीपुलेशन के जरिए जेएनयू के छात्रों,वि.वि.समुदाय और शिक्षकों के साथ समूचे वि.वि. को बदनाम करने की कोशिश की गयी।जेएनयू के 5 छात्रनेताओं ,जिनमें छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार शामिल है,को राष्ट्रद्रोह के झूठे मुकदमे में फंसाया गया और कन्हैया को जेएनयू से गिरफ्तार किया गया,सारे कैम्पस में पुलिस ने छापे मारे,तलाशी ली।सबसे खतरनाक बात हुई कि 9फरवरी2016 की घटना के एक वीडियो का कई टीवी चैनलों ने जमकर दुरूपयोग किया और जबकि यह वीडियो मेनीपुलेशन से तैयार किया गया था।फेक वीडियो था।

इस समूचे प्रसंगने राजनीतिक शत्रुता के लिए डिजिटल दुरूपयोग की नई मिसाल कायम की,इस तरह के डिजिटल मेनीपुलेशन की हरकतें मुजफ्फरनगर के दंगों के समय भी हुई हैं। राजनीतिक शत्रुता के लिए डिजिटल को औजार की तरह इस्तेमाल करने की इस तरह की हरकतों ने डिजिटल सचेतनता के सवालों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है।इस तरह की घटनाओं ने यह भी साफ कर दिया है कि आरएसएस डिजिटल मेनीपुलेशन में बादशाह है।

डिजिटल मेनीपुलेशन नए किस्म का खतरा है जो जमीनीस्तर पर कलह पैदा करता है। आजकल घटनाएं घट रही हैं लेकिन हम नहीं जानते कि क्या हो रहा है ॽक्यों हो रहा है ॽकौन लोग कर रहे हैं ॽघटना हो रही हैं लेकिन हम उसके ´तथ्य´और ´सत्य´को नहीं जानते।असलमें, हम सब राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं।राजनीतिक लक्ष्यों से भी दूरी बनाकर रखते हैं इसलिए नहीं जानते कि यह सब क्यों हो रहा है। साम्प्रदायिक- विभाजनकारी-आतंकी संगठनों से लेकर समर्थ भाजपा जैसा दल भी डिजिटल मेनीपुलेशन का जमकर इस्तेमाल कर रहा है। इसे ´´तकनीकी विभ्रमवाद´´कहे तो बेहतर होगा।इसका दायरा इराक,बोस्निया,अफगानिस्तान से लेकर जेएनयू तक के घटनाक्रम तक फैला हुआ है। इस दौर में जो हमले हो रहे हैं उनमें एक ओर से सत्ता हमलावर है तो दूसरी ओर हमलावर मीडिया है। लोकतांत्रिक हकों पर हमले को ´राष्ट्रसेवा´ या ´राष्ट्रवाद´कहा जा रहा है।अंधविश्वास के खिलाफ बोलने वालों पर बर्बर हमले किए जा रहे हैं।इन हमलों को वैचारिक ´श्रेष्ठत्व´कहा जा रहा है।जिन घटनाओं पर माफी मांगनी चाहिए उन पर नेतागण हेकड़ी और अहंकार से उनकी हिमायत में बोल रहे हैं।

आयरनी यह है सत्ता के हमलों को लोकतंत्र कहा जा रहा है,कानून के दुरूपयोग को न्यायपालन कहा जा रहा है।मीडिया और साइबर हमलों के जरिए सभी किस्म के कानूनों को मुक्ति दे दी गयी है।सभ्यता के मानकों को त्यागकर अधिकांश मीडिया ने आतंक का मार्ग ग्रहण कर लिया है। इसे साइबर डी-रेगूलेशन कह सकते हैं।जिसके आधार पर इराक से लेकर सीरिया तक स्वचालित मिसाइलों के हमले हो रहे हैं ,और कानूनभंग हो रहा है,´हमलावर´ को क्षमादान दे दिया गया है। ´हवाई ट्रांसपोर्ट ´और ´साइबर संचार´का पूरी तरह ´डी-रेगूलेशन´करके ग्लोबल पूंजीवाद ने नई परिस्थितियों को पैदा किया है। शांति स्थापना के नाम पर सेना और हथियारों के जरिए घेराबंदी और हमले,देश में शांति के नाम पर हिन्दुत्ववादियों के हमले,कुल मिलाकर त्रासद समय की सृष्टि कर रहे हैं।

पहले ´मतभेद´ होते थे तो उनको सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करते थे,लोग सुनते थे,लेकिन नयी संस्कृति है ´हमला करो´, ´हिंसा के जरिए´ ´कानूनी आतंक´के जरिए मुँह बंद करो। पहले राजनैतिक विवाद को जमीनी स्तर पर हल करने या जीत हासिल करने की कोशिश की जाती थी लेकिन इन दिनों विवाद को सत्ता के तंत्र के जरिए,बाहुबल के जरिए हल करने की कोशिशें हो रही हैं।पहले प्रतिवाद करने वाले का सम्मान करते थे,इन दिनों उसके खिलाफ घृणा प्रचार हो रहा है।जेएनयू की घटना इस फिनोमिना का आदर्श उदाहरण है। पहले प्रतिवाद का सम्मान करते थे, इन दिनों प्रतिवाद का अपमान करते हुए प्रतिवाद का प्रतिवाद करते हैं।इस बहाने प्रतिवाद से ही वंचित करने की कोशिशें हो रही हैं।इस हठकंडे का आरएसएस जमकर इस्तेमाल कर रहा है।अब खबरों को भी मैन्युफेक्चर किया जा रहा है,इनके आधार पर हिन्दूभारत के निर्माण की कोशिशें हो रही हैं।

इन दिनों ´विवादों´में राजसत्ता का हस्तक्षेप सबसे बड़ी चुनौती है।जेएनयू के मसले पर यह तत्व सबसे उग्र रूप में सामने आया है, राजनेताओं,केन्द्रीय मंत्रियों और पुलिसतंत्र के जरिए जिस तरह स्थानीय छोटी समस्या में मोदी सरकार ने हस्तक्षेप किया है वह अपने आपमें लक्षण है कि संघ किस तरह की राजनीति कर रहा है।संघ सीधे सत्ता के जरिए नाकेबंदी करके हस्तक्षेप कर रहा है,तथाकथित आम सहमति के नाम पर आतंक पैदा कर रहा है,अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित कर रहा है। इसके अलावा संघ के दबाव में लेखकों के कॉलम बंद कराए जा रहे हैं,किताबों की खरीद-फरोख्त में विचारधारा के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं।ये सब चुप कराने के तरीके हैं।

दिक्कत यह है कि अब हर चीज तेजगति से आ रही है। तेजगति से ही संघ के हमले हो रहे हैं। जो तेजगति के मंत्र जानता है वह तो इन हमलों से बच सकता है जो नहीं जानता वह इन हमलों में मर सकता है। विश्व परिप्रेक्ष्य में देखें तो मानवाधिकार बचाने के नाम पर युद्ध हो रहे हैं।लेखक,संस्थान और राष्ट्र की संप्रभुता पर हमले हो रहे हैं।क्षेत्र,राष्ट्र-राज्य और मनुष्य की संप्रभुता खतरे में है।धर्मनिरपेक्षता और संविधान पर संविधान का नाम लेकर हमले किए जा रहे हैं।´हस्तक्षेप´को परम पुनीत कर्त्तव्य के रूप में पेश किया जा रहा है।जो लोग आरएसएस के खिलाफ हैं उनके खिलाफ सूचना युद्ध की घोषणा हो चुकी है।इस काम में कारपोरेट मीडिया और इंटरनेट का सुनियोजित ढ़ंग से इस्तेमाल हो रहा है।

हमें नए युग की प्रक्रियाओं को बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए।खासकर ´कम्प्यूटर विवेकवाद´ के नजरिए से देखना चाहिए। ´कम्प्यूटर विवेकवाद´ के बहाने नए किस्म के विवेकवाद को आरोपित किया जा रहा है।यह वह विवेकवाद है जिसे कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग के जरिए थोपा जा रहा है।इसका आरंभ युद्ध में स्वचालित मिसाइलों के प्रयोग से हुआ।आज यह साइबर सत्ता का सबसे प्रभावशाली औजार है।इसका जनक है कम्प्यूटर इंजीनियरिंग,और भोक्ता है शासकवर्ग।इसके जरिए सुनियोजित ढ़ंग से रेशनेलिटी को ´स्पेस´से लेकर दैनंदिन जीवन तक आरोपित किया जारहा है।इसे ´साइबर हमलावर´ कहें तो अत्युक्ति न होगी।

´साइबर हमलावर´वे हैं जिनका कोई सामाजिक दायित्व नहीं है।संविधान,कानून,संसद,समाज आदि किसी के प्रति ये लोग जबावदेह नहीं हैं।पॉल विरिलिओ के अनुसार यह ऐतिहासिक ´शिफ्ट´ है. पहले जो लोग हस्तक्षेप थे उनको आप जानते थे,उनकी भूमिका थी,दायित्व तय थे। लेकिन आज ऐसा नहीं है,आज सारा कार्य-व्यापार ´वर्चुअल स्पेस ´ से संचालित है।वहीं से चीजें देखी जा रही हैं और वहीं से ´एक्शन´ तय हो रहे हैं। इस तरह के हस्तक्षेप के बारे में पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं है।आज सत्ता को परिभाषित करने के रूप बदल गए हैं।इनमें वर्चुअल स्पेस की बड़ी भूमिका है। ´वर्चुअल स्पेस´ के जरिए व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक सबकी संप्रभुता पर हमले किए जा रहे हैं।पहले राष्ट्र संरक्षक था ,लेकिन इन दिनों राष्ट्र हमलावर है।आजकल वर्चुअल स्पेस बहुत महत्वपूर्ण है ,इसे भौगोलिक क्षेत्रफल के पूरक के रूप में देखना चाहिए ।इसी तरह साइबर अभिव्यक्ति को अभिव्यक्ति के पूरक के रूप में देखना चाहिए।पहले हस्तक्षेप के जरिए बहस या संवाद करने में मदद मिलती थी, लेकिन अब हस्तक्षेप का मतलब है ´तर्कहीनता´ और ´अन्य´के स्पेस का खात्मा।अब ऐसा माहौल बना है जिसमें ´अन्य´ अप्रासंगिक है। हस्तक्षेप के नाम पर आवाज बंद की जा रही है।इससे समूचा समाज टेंशन में है।यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसमें जेएनयू और रोहित वेमुला के आंदोलन को देखने की जरूरत है।

एक तरफ मीडिया नियंत्रण बढ़ा है,वहीं दूसरी ओर साइबरसंसार के विकास के साथ ´साइबर लॉजिक बम´से हमले किए जा रहे हैं।इससे अराजकता बढ़ी है। असल में सारी चीजें ´ग्लोबल सूचना वर्चस्व´ के परिप्रेक्ष्य में विकसित हो रही हैं।इस सिस्टम की विशेषता है हर चीज को रीयल टाइम में खोजना,निशाना बनाना और वर्चुअल हमले करना। ´ग्लोबल सूचना वर्चस्व´ के तीन प्रमुख तत्व हैं,1.देश के ऊपर स्थायी उपग्रह प्रणाली की स्थापना,2.सूचना का रीयल टाइम में स्थानांतरण और प्रसारण,3.डाटा का तेजी के साथ विश्लेषण,खासकर विभिन्न चैनलों,माध्यमों आदि के जरिए आ रहे डाटा का तुरंत विश्लेषण ।

विरिलिओ कहते हैं यह असल में ´बिना दीवारों के किले´ का युग है।यह अंतरिक्ष श्रेष्ठता का युग है।जहां भी ’टकराव´ हो वहां अबाध हमले किए जाएं।साइबर स्मगलिंग पर जोर दिया जाए।पुराने संस्कारों, जिनमें धर्म भी आता है,उस पर कुछ न कहो।मसलन्, कोसोवो में बड़े पैमाने पर कब्रें खोज निकाली गयीं,उनकी सैटेलाइट इमेजों की वर्षा की गयी,लेकिन एबीसी टीवी चैनल ने एक भी कब्र नहीं दिखाई। पेंटागन से सैटेलाइट के जरिए यह दिखाया गया कि कोसोवो में पहाड़ों पर रहने वाले लोग पलायन कर रहे ये लोग ´जनसंहार´के डर से भाग रहे थे।जबकि बताया गया कि वे ´उत्पीडन´के कारण भाग रहे हैं। यह भी कहा गया कि अमेरिका का काम है ´अपराधी´खोजना। ठीक यही पद्धति जेएनयू के 9फरवरी के घटनाक्रम पर लागू की गयी।अचानक एक वीडियो ,फिर दूसरा और फिर तीसरा,चौथा.पांचवां वीडियो साइबर स्पेस में अवतरित होता है और जेएनयू पर हमले शुरू हो जाते हैं।किसी भी मीडिया घराने ने घटनास्थल पर जाकर सत्य जानने की कोशिश नहीं की,नारे लगाने वालों को कभी टीवी पर दिखाया नहीं, पुलिस घटनास्थल पर मौजूद थी लेकिन किसी भी नारे लगाने वाले को पकड़ा नहीं,यहां तक कि संघ के लोगों ने भी नहीं पकड़ा।साइबर से लेकर मीडिया तक जेएनयू पर जिस तरह का मीडिया हमला हुआ है वह टिपिकल ´मीडिया संहार´है,इसका लक्ष्य है जेएनयू को कलंकित करना,बदनाम करना,राष्ट्रविरोधी संस्थान बताना।संभवतःआजाद भारत में किसी वि.वि. पर इतना व्यापक हमला पहले कभी नहीं हुआ।यह हमला परंपरागत जासूसी,हमले,अफवाह आदि के हथकंडों से परे है। कम्प्यूटर की भाषा में यह ´ऑप्टिकल हमला´ है ,यह ऐसा हमला है जिसमें जेएनयू पर तो कड़ी निगरानी है ही,जेएनयू आंदोलन का समर्थन करने वालों पर भी निगरानी जारी है।इसके लिए ´पब्लिक ओपिनियन´पर भी निगरानी रखी जा रही है,उसको भी नियंत्रित किया जा रहा है। इसमें साइबर जासूसी से लेकर मीडिया जासूसी तक के हठकंडों का प्रयोग हुआ है। यह समूचा मॉडल ’टेली-सर्विलेंश´के नजरिए से संचालित है।इसके जरिए ही जेएनयू के बारे में आम जनता के नजरिए को प्रभावित किया जा रहा है,सामाजिक व्यवहार और आचरण को प्रभावित किया जा रहा है।

जेएनयू का आंदोलन मूलतः इमेज युद्ध के मानकों से लड़ा गया है।इमेज युद्ध में सूचनाओं के प्रवाह पर नजर रहती है,मोदी सरकार और संघ ने संगठित ढ़ंग से मीडिया से लेकर इंटरनेट तक फेक सूचनाओं के ´ फ्लो´ को बनाए रखा,उसे नियंत्रित किया।इससे बड़े पैमाने पर मीडिया प्रभावित भी हुआ। अधिकांश मीडिया घराने संघ के ´फ्लो´ में संप्रेषित सूचनाओं को ही परोस रहे हैं।इसे मीडिया का सर्वसत्तावादी हस्तक्षेप भी कह सकते हैं।इसके बहाने तर्क,प्रत्युत्तर सभी को अपदस्थ करने की कोशिश की गयी। इस हमले की विशेषता है- ´तुम सिद्ध करो कि तुमने नारे नहीं लगाए,तुम सिद्ध करो कि तुम झूठ नहीं बोल रहे,´ यानी निराधार आरोप लगाएंगे आरएसएस-पुलिस-मोदी सरकार के मंत्री ,वे आरोप के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं देंगे ,वे सिर्फ आरोप लगाएंगे ,आरोपों की अंधाधुंध वर्षा करेंगे,अब तुम जेएनयूवालो सिद्ध करो कि आरोप झूठे हैं,तुम प्रमाण दो।यह ´आरोप´ लगाने की अमेरिकी पद्धति है,इस पद्धति के आधार पर अफगानिस्तान,इराक,सीरिया आदि को तबाह किया जा चुका है।



जेएनयू की जो इमेज वर्षा हुई है उसमें बार-बार एंकर से लेकर भाजपा-पुलिस-संघ के प्रवक्ता तक यही कह रहे थे कि ´जेएनयू में देशद्रोही नारे लगे हैं,जिन्होंने नारे लगाएं वे देशद्रोही हैं,´यही मूल आधारभूत वाक्य है जिसका करोड़ों बार प्रक्षेपण किया गया।इस पंक्ति के आधार पर समूचे मीडिया में हंगामा खड़ा किया गया।भ्रम पैदा किया गया। अंत में ,जेएनयू के छात्रनेताओं,जिनमें वर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार सहित पांच नेताओं को ´राष्ट्रद्रोह´में भाजपा सांसद महेश गिरि की एफआईआर के आधार पर निशाने पर रखा गया,इन छात्रनेताओं की गिरफ्तारी वैध ठहराने के लिए ´जेएनयू में देशद्रोही नारे लगे हैं,जिन्होंने नारे लगाएं वे देशद्रोही हैं,´इस पंक्ति को अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया गया।इसके इर्द-गिर्द मीडिया-साइबर प्रौपेगैण्डा निर्मित किया गया। यह विशुद्ध असत्य प्रचार अभियान था।इस प्रचार अभियान के जरिए जेएनयू के छात्रों से पूछा गया तुम नाम बताओ,उनको खोजकर लाओ, बताओ वे कौन थे,कहां रहते हैं,यदि नहीं बताओगे तो तुम जिम्मेदार हो।इसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए आरएसएस ने वोटक्लव से लेकर राजघाट तक भगवा ब्रिगेड को सड़कों पर उतार दिया,इनमें असामाजिक तत्वों से लेकर कुछ सौ पूर्व सैनिक भी थे।इस तरह के जुलूसों के जरिए यह माहौल बनाने की कोशिश की गयी कि जेएनयू देशद्रोहियों की शरणस्थली है।यह टिपिकल फासिस्ट तरीकों से जेएनयू की घेराबंदी है। जिसका लक्ष्य है आम जनता को जेएनयू के छात्रों के खिलाफ खड़ा करना,इसमें संघ कुछ हद तक सफल रहा,लेकिन शिक्षित समुदाय के बड़े तबके को जेएनयू के छात्र अपने साथ लाने,मीडिया के अंश को अपने सत्य के करीब लाने में सफल रहे,यह लड़ाई अभी बंद नहीं हुई है इसलिए और भी चौकन्ने रहने की जरूरत है।

गुरुवार, 10 मार्च 2016

जेएनयू की आँखें और विश्वचेतना

        जेएनयू पर बहस कर रहे हैं तो हमें यह सवाल उठाना चाहिए कि हमारे विश्वविद्यालयों की आंखें कैसी हैं ॽ विश्वविद्यालयों की आंखें कैसी हैं यह इस बात तय होगा कि विश्वविद्यालय ,सरकार को कैसे देखता हैं ॽ सरकार की उसके पास किस तरह की अवधारणा है ॽसरकार की अवधारणा चांस से पैदा नहीं होती ,वह क्लासरूम में पैदा होती है। विश्वविद्यालय सरकार को कैसे देखते हैं यह इस बात से तय होगा शिक्षक कक्षा में पढ़ाते कैसे हैं ॽ विश्वविद्यालय को संगठित कैसे करते हैं ॽ संचालित कैसे करते हैं ॽ किस तरह के शिक्षकों की नियुक्ति करते हैं ॽ

इसी तरह शिक्षक और छात्र पढ़ते हुए तटस्थ नहीं हो सकते।उनको यह कहने का हक नहीं है कि सरकार के बारे में हम कुछ नहीं बोलेंगे।आमतौर पर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में सरकार के प्रति यही रूख है या फिर सरकार का अनुकरण करने की प्रवृत्ति है। विश्वविद्यालय के अंदर का समाज हमारे समाज का प्रतिबिम्बन है। उसमें छात्र जहाँ समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं दूसरी ओर शिक्षक समाज के दूसरे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।ये असल कारीगर हैं,ट्रस्टीहै, जो अपने शिक्षण से छात्रों को तराशने का काम करते हैं।उनका काम है छात्रों को अंतर्विरोधों के लिए तैयार करना। शिक्षक वस्तुतः लक्ष्य है जिसको पाना छात्रों की इच्छा होती है।किसी भी विश्वविद्यालय की आँखें कैसी होंगी यह निर्भर करता है कि शिक्षक कैसे हैं ॽ शिक्षक वि.वि. के ट्रस्टी होने के नाते सामुदायिक तौर पर वि.वि. के मर्म का निर्माण करते हैं।वे इस क्रम में अपनी स्वायत्तता भी निर्मित करते हैं।

शिक्षक महज शिक्षक नहीं होता वह स्कॉलर या विद्वान होता है ।विद्वान की परख विद्वान ही कर सकता है,अन्य नहीं।मोदी सरकार आने के बाद यह मुश्किल बढ़ी है कि विद्वान की परख विद्वान नहीं कर रहे लफंगे और जाहिल किस्म के लोग कर रहे हैं।इसके कारण सारे देश में विद्वानगण अपने को लज्जित और अपमानित महसूस कर रहे हैं।जेएनयू के वीसी ने ठीक वही काम किया जो आरएसएस चाहता है।उसने विद्वान की भूमिका नहीं निभायी। हमारे अधिकांश विश्वविद्यालयों में शिक्षक तो ढ़ेर सारे हैं लेकिन विद्वान या स्कॉलर बहुत कम हैं।

विश्वविद्यालय की आँखें विद्वान होते हैं,शिक्षक नहीं।हमने शिक्षक बनाने पर खूब जोर दिया और सारे देश को शिक्षकों से भर दिया है,इससे शिक्षा का स्तर गिरा है,शिक्षा को हमने रूपये – कौडी के धंधे में तब्दील कर दिया है।शिक्षा को बाजारू बना दिया है, और शिक्षक को बिकाऊ मजदूर ! दुखद है कि हम लेकिन वि.वि. को वि.वि. न बना पाए।जेएनयू इसलिए सारे देश के विश्वविद्यालयों से अलग है क्योंकि यहां विद्वान या स्कॉलरों की परंपरा है। यहां शिक्षक कम और विद्वान ज्यादा पाए जाते हैं।वे अपने छात्रों को पढ़ाते नहीं हैं,ज्ञान में साझीदार बनाते हैं,ज्ञान का भोक्ता नहीं सर्जक बनाते हैं। इस अर्थ में जेएनयू सारे देश के विश्वविद्यालयों से भिन्न है।

यहां हर छात्र-शिक्षक निडर होकर सरकार के खिलाफ,वि.वि.प्रशासन के खिलाफ बोल सकता है।यहां छोटे-बड़े का भेद एकदम नहीं है।यहां हर छात्र को अपनी हाइपोथीसिस पर काम करने का हक है।किसी भी वि .वि . में ज्ञान के विकास की यह बुनियादी शर्त है।कोई भी छात्र जब हाइपोथीसिस बनाकर काम करता है तो ज्ञान का सृजन करता है।जनता के बीच में अपनी क्षमता का प्रदर्शन करता है।ज्ञान के संदर्भ में शक्ति अर्जित करता है। वह जो ज्ञान निर्मित करता है उसका आम जनता पर असर भी होता है।इस अर्थ में वह अपनी स्वायत्तता को निर्मित करता है,स्वायत्त संसार बनाता है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से जेएनयू अपने को सरकार के नाभिनाल से काटता है।

जेएनयू के स्कॉलरों की आँखें हैं उनके ज्ञान की वैज्ञानिकक्षमता।जो सरकार और उसके तंत्र से पूरी तरह स्वतंत्र है। देश में कहने को अनेक वि.वि. हैं जो कागज पर स्वायत्त हैं,जेएनयू भी स्वायत्त है, लेकिन जेएनयू स्वायत्तता से भी एकदम आगे जाकर काम करता रहा है,स्वायत्तता के आधार वि.वि.सिर्फ अपने अंदर के कामकाज को लेकर स्वायत्त रह सकते हैं।यह स्वायत्तता की सीमा है।स्वायत्तता के तहत वि.वि. वही काम कर सकते हैं जो उनको सौंपे गए हैं।लेकिन जेएनयू उससे भिन्न भूमिका अदा करता रहा है,वह उनके प्रति भी जिम्मेदारी निभाता रहा है जो स्वायत्तता देनेवाली एजेंसी नहीं हैं। यानी गैर-सत्ताकेन्द्रों या विश्वसमाज के बृहत्तर तबकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा है।यही वजह है कि जेएनयू के छात्रों में सरकारीचेतना की बजाय विश्वचेतना,सामाजिकचेतना प्रबल होती है।इस अर्थ में वे देश के अन्य संस्थानों से भिन्न होते हैं।



जेएनयू प्रसंग में विश्वविद्यालय का अर्थ ॽ

        जेएनयू के 9फरवरी के प्रसंग ने विश्वविद्यालय की अवधारणा को देश की केन्द्रीय समस्या बना दिया है,दिलचस्प बात है हम सब लोग न तो जेएनयू के आंतरिक चरित्र पर बातें कर रहे हैं और न विश्वविद्यालय की अवधारणा पर बहस कर रहे हैं ! यह कुल मिलाकर वैसे ही हुआ कि बीमारी है कैंसर की और इलाज मलेरिया का हो रहा है ! विश्वविद्यालय ´हम´ के प्रतीक हैं, ´हम´और ´तुम´ के वर्गीकरण में वि.वि. को बांटा नहीं जा सकता।यदि देश के बारे में बातें कर रहे हैं तो ´हम´की अवधारणा में सोचना होगा । वि.वि. कैसे होंगे यह इससे तय होगा कि ´हम´की धारणा क्या है ॽ यानी स्वयं से सवाल करे कि ´हम´क्या हैं ॽ ´हम´वि.वि. में किसका प्रतिनिधित्व करते हैं ॽवि.वि. को किसकी आंखों से देखते हैं ॽ´हम´किसके प्रति जवाबदेह हैं ॽ ये कुछ प्राथमिक सवाल हैं जिनसे हमें बहस को प्रारंभ करना चाहिए। ये सवाल हमें स्वयं से और अन्य से भी पूछने चाहिए। इन सवालों से बचना नहीं चाहिए।

भारत में किनाराकशी की आदत है खासकर राजनेताओं में उपेक्षा करने,अपने विचार थोपने की आदत है।लेकिन जेएनयू ने हमें यह मौका दिया है हम सवाल ये उठाएं और उनके उत्तर खोजने की कोशिश करें।इन सवालों पर विचार करते समय हम सबको न्यूनतम जिम्मेदारी तो लेनी ही पड़ेगी। आरएसएस के लोग इस मामले में चालाकी से पेश आ रहे हैं वे इन सवालों पर बहस नहीं कर रहे,वे वि.वि. की बजाय 9फरवरी के नारों पर बहस करना चाहते हैं,राष्ट्रवाद पर बहस करना चाहते हैं,वे मूल सवालों से इसके साथ बहाने से बचकर निकलना चाहते हैं। आरएसएस के साथ जुड़े बौद्धिक भी इन सवालों पर चुप हैं।

मजेदार बात यह है जेएनयू के वीसी भी उन्हीं सवालों पर बोल रहे हैं जो आरएसएस ने उठाए हैं।जबकि उनको तो कम से कम वि.वि. की अवधारणा,जेएनयू की अवधारणा पर बहस करनी चाहिए। जेएनयू के मौजूदा आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है जेएनयू की पुनःअपनी पहचान की खोज करना,जेएनयू कैसा है ,यह इस दौरान व्यापक स्तर पर बहस के केन्द्र में आया है।खासकर जेएनयू कैंपस में यह बहस गर्मागर्म है।दिलचस्प बात है कि जेएनयू क्या है ॽ इस सवाल से संघ के जेएनयू कैंपस में मौजूद समर्थक भागते रहे हैं या फिर वि.वि. को भारतीय दण्ड संहिता के फ्रेमवर्क में अवधारणा पेश कर रहे हैं। यह बात में उनकी टीवी प्रस्तुतियों में दिए गए बयानों के आधार पर कह रहा हूँ।

सवाल यह है क्या विश्वविद्यालय की समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी है ॽ अथवा वि.वि. सिर्फ डिग्री देने के केन्द्र हैंॽ ज्यॉक देरिदा ने जिम्मेदारी की अवधारणा के साथ विश्वविद्यालय की अवधारणा को जोड़कर देखने पर जोर दिया है।विश्वविद्यालय का काम सत्ता की तरह सोचना नहीं है।वे सत्ता के तंत्र के दाँते - पेंच नहीं हैं।मोदी सरकार की जेएनयू को लेकर मुश्किल यहीं पर है।मोदी सरकार अपने विचारतंत्र के अनुरूप जेएनयू तंत्र को ढालना चाहती है और यह काम वे घोषित करके करना चाहते हैं,इसके लिए वे बहाना संविधान का ले रहे हैं।लेकिन वि.वि. का काम तो संविधान के कल-पुर्जे की तरह काम करना नहीं है।वि.वि. तो संविधान की तरह काम नहीं करता। विश्वविद्यालय जब संविधान,सत्ता या सरकार के तंत्र के अंग के रूप में काम करेंगे तो जाहिरातौर पर उनमें अंतर्विरोधों के लिए कोई जगह नहीं होगी।वि.वि. पूरी तरह अंतर्विरोधरहित होंगे।दुर्भाग्य से हमारे देश में अधिकांश वि.वि.सरकारी तंत्र के अंग के रूप में काम करते हैं और वे पूरी तरह अंतर्विरोधरहित हैं। विश्वविद्यालय की अवधारणा अंतर्विरोधरहित नहीं होती।यदि उसे सत्ता से जोड़ देंगे तो वि.वि. अंतर्विरोधरहित बन जाएंगे।जेएनयू के प्रसंग में आरएसएस-मोदी सरकार असल में यही चाहते हैं। वि.वि. की खूबी है अंतर्विरोध और अंतर्विरोधों की विभिन्न धुन और छंदों के आधार पर खुला माहौल।वि. वि. सरकारी धुन में नहीं रहते,असल वि.वि. वह है जो अंतर्विरोधों के छंद पर नाचे,गाए और विकास करे।

विश्वविद्यालय को हम एक समाज के रूप में देखें।वह ज्ञानसमाज है।इसमें औद्योगिक श्रम विभाजन की तरह विभिन्न किस्म के विभाग हैं जिनमें विभिन्न विषयों की शिक्षा की व्यवस्था है। शिक्षक एकतरह से इसके ट्रस्टी हैं।शिक्षक-छात्र मिलकर वि.वि. का सचेतन समाज बनता है।यह ऐसा समाज है जिसमें सभी को स्वायत्तता है।सोचने,विचारने,बोलने,संगठन बनाने की स्वतंत्रता है।इसके विभिन्न विभाग वस्तुतः छोटे-छोटे समाज हैं।जो तरह-तरह से सोचते हैं और उसके अनुसार आचरण करते हैं। विश्वविद्यालय को अपने हक स्वयं हासिल करने होते हैं।वह किसी से हक नहीं लेता,वि.वि. को अपनी सत्ता स्वयं बनानी होती है,वि.वि. की वैधता बाहर निर्भर नहीं होती ,वह उसके अंदर होती है। वि.वि. डिग्री देने का नहीं,सर्जना का केन्द्र हैं।जो लोग इसे डिग्री बांटने वाले तंत्र या सरकार के तंत्र के अंग के रूप में देखते हैं वे गलत रूप में देखते हैं।



वि.वि.तो स्वायत्त सर्जना केन्द्र है,डिग्री केन्द्र नहीं। वि.वि. का आधार है ´स्वाभाविक तर्क´,इस तर्क के आधार पर वि वि अपने सभी छात्रों-शिक्षकों को ´स्वाभाविक तर्क´के आधार पर सोचने और काम करने का अवसर देता है।जबकि सरकार के अंग के रूप में यदि वि.वि. को देखेंगे तो यह सुविधा प्राप्त नहीं होगी। सरकार के लिए वि.वि. एक कृत्रिम संस्थान है ,जबकि जेएनयू के अकादमीशियनों के लिए वि.वि. का अर्थ ही अलग होता है। उनके लिए वि.वि. का अर्थ है वह स्थान जो स्वाभाविक लगे,आदतों को भी स्वाभाविक लगे।जेएनयू को असल में इस अर्थ में देखना चाहिए। जेएनयू की खूबी है उसकी नेचुरलनेस।यहां कृत्रिमता नहीं है। आप अपनी नेचुरल आदतों के साथ इसके परिवेश में जी सकते हैं।देश के बाकी संस्थानों में यह चीज अनुपस्थित है।लोग तर्क दे रहे हैं कि सरकार फण्ड देती है अतःसरकार के तर्क के अनुसार विवि को चलना चाहिए। सरकार की फण्डिंग महज इत्तफाक है,चांस की बात है।इसके आधार पर वि.वि.को सरकारी तंत्र के अंग के रूप में निर्मित नहीं कर सकते।जेएनयू आज भी देश के विभिन्न वि.वि.से भिन्न इसलिए है क्योंकि वह सरकार के तर्क से नहीं वि.वि. के तर्क और नियमों से चलता है। जेएनयू के जो छात्र आंदोलन कर रहे हैं वे इसलिए आंदोलन कर रहे हैं कि वे नहीं चाहते कि वि.वि. की अवधारणा को नष्ट करके जेएनयू को देश के बाकी वि.वि. की तरह बना दिया जाय।

बुधवार, 9 मार्च 2016

मकरंद परांजपे सच देखने से क्यों डरते हो ॽ


        प्रोफेसर मकरंद परांजपे ने जेएनयू में बोलते हुए जेएनयू के वामपंथियों से सारी दुनिया के साम्यवाद की गलतियों का हिसाब मांगा।कमाल की शैली और दृष्टि है परांजपे साहब की ! गलतियां करें स्टालिन लेकिन दण्ड मिलेगा भारत के कम्युनिस्टों को ! यानी नया बुर्जुआशास्त्र है करे कोई और भरे कोई ! , असल में परांजपे सच जानना ही नहीं चाहते।सच जानोगे नहीं तो मानोगे कैसे ! शीतयुद्धीय बौद्धिक तरीका है झूठ बोलो, लांछित करो ! खासकर कम्युनिस्टों के बारे में कभी सच मत बोलो।

परांजपे साहब ने जेएनयू में भाषण देते हुए फरमाया है कि कम्युनिस्टों ने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया,जनसत्ता (9मार्च 2016) में छपी रिपोर्ट के अनुसार परांजपे ने कहा ´‘भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने अंग्रेजों को लिखा कि वे प्रदर्शन नहीं करेंगे। जब आप लोग लडेंगे तो हम आपका साथ देंगे। जब हम यह कहते हैं कि हमने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी तो मैं सबूत देखना चाहता हूं।’ इसके अलावा भी उन्होंने बहुत कुछ कहा है।लेकिन हम यहां सिर्फ कम्युनिस्टों की स्वाधीनता आंदोलन में भूमिका तक ही सीमित रखना चाहते हैं और कम्युनिस्टों ने क्या कहा उसको प्रमाण के रूप में देना नहीं चाहते बल्कि ब्रिटिश शासक क्या कहते हैं उसका जिक्र करना चाहते हैं।

स्वाधीनता आंदोलन में भारत के कम्युनिस्टों की शानदार भूमिका रही है और वे संघर्ष और कुर्बानी की अग्रणी कतारों में रहे हैं,जबकि उन दिनों सारे देश मे बहुत कम संख्या में कम्युनिस्ट हुआ करते थे।कम्युनिस्ट देशभक्त संग्रामी थे यह बताने के लिए महाकाव्य लिखा जा सकता है,महाख्यान रचा जा सकता है।लेकिन यहां तथ्य ही रखना समीचीन होगा।

परांजपेजी आपने ´पेशावर षडयंत्र´केस का नाम तो सुना ही होगा।उस केस में अनेक कम्युनिस्टों को ब्रिटिश न्यायपालिका ने दण्डित किया,’ पेशावर षडयंत्र केस ´में 12-13 कम्युनिस्टों को बर्बर यातनाएं दी गयीं। जबकि इन्होंने कोई अपराध नहीं किया था।इनका एकमात्र लक्ष्य था भारत को ब्रिटिश गुलामी से मुक्त कराना।यह वाकया है 1922 के आसपास का।तकरीबन 40 के आसपास मुहाजिर अफगानिस्तान के रास्ते होते हुए ताशकंद और मास्को गए थे।वहां पर उनमें से 26 लोगों ने सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। ये लोग अक्टूबर1920 से अप्रैल 1921 तक ताशकंद और मास्को में रहे।वहां उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक-सैनिक स्कूल में प्रशिक्षण प्राप्त किया।इन कॉमरेडों का पहला ग्रुप 3जून1921 को पेशावर लौटा।इस ग्रुप से भारत सरकार के गुप्तचर विभाग के ऑफीसर इंचार्ज मि.इबर्ट ने गहरी पूछताछ की।उस पूछताछ में पता चला कि पेशावर से मास्को 40 या उससे ज्यादा कॉमरेड गए थे।इनको उन दिनों मुहाजिर कहा जाता था।मास्को में इन लोगों ने कम्युनिस्ट वि.वि. में प्रशिक्षण प्राप्त किया।इस पूछताछ के बाद ब्रिटिश पुलिस की मास्को से आने वालों पर कड़ी नजरदारी आरंभ कर दी और1922 के मध्य में कम्युनिस्टों के खिलाफ ´पेशावर षडयंत्र केस´दायर किया गया जिसमें 12-13 कॉमरेडों को दण्डस्वरूप भयानक यातनाएं दी गयीं।यह समूचा वाकया सन् 1927 में बंगला साप्ताहिक अखबार ´कॉम्पस´में ´पेशावर टु मास्को´शीर्षक से धारावाहिक रूप में छपा,इसको लिखा था शौकत उस्मानी ने। इस प्रसंग में दूसरा विवरण रफीक अहमद ने लिखा जिसका मुजफ्फर अहमद की किताब ´दि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया एंड इटस फॉर्मेशन´(1962) में जिक्र है।

मकरंद परांजपे आप प्रोफेसर हैं लेकिन झूठ बोल रहे हैं कि कम्युनिस्टों ने स्वाधीनता आंदोलन में भाग नहीं लिया,आप जरा समय निकालकर ´पेशावर षडयंत्र केस´के जजमेंट को ही पढ़ लेते तो पता चल जाता कि उस समय कम्युनिस्ट क्या कर रहे थे। ´पेशावर षडयंत्र केस´पराधीन भारत में पहला कम्युनिस्टों के खिलाफ गढ़ा गया एकदम झूठा केस था जिसमें कम्युनिस्टों को सजा सुनाई गयी थी,उन लोगों को सजा सुनाई गई जिन लोगों ने कोई हिंसा नहीं की,किसी की हत्या नहीं की।निर्दोष कम्युनिस्टों को दोषी करार करके देशद्रोह में सजाएं सुनाई गयीं।इन कॉमरेडों ने क्या किया था ॽ ये अफगानिस्तान से सीमा पार करके सोवियत संघ गए थे सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने।जिससे ये लोग आजादी के लिए संघर्ष करने वालों की मदद कर सकें।इसके लिए इन लोगों ने ताशकंद के सैन्य स्कूल और मास्को स्थित कम्युनिस्ट विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की।

´पेशावर षडयंत्र केस´के नाम से कम्युनिस्टों के खिलाफ पहला जजमेंट 31मई1922 को घोषित किया गया।इस जजमेंट में कॉमरेड मोहम्मद अकबर को तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गयी।यह सजा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 121-ए के तहत सुनाई गयी।इसी धारा में दूसरे कॉमरेड बहादुर को एक साल की सजा सुनाई गयी।जबकि हफीजुल्ला को बरी कर दिया गया। अकबर और बहादुर के खिलाफ ’अपराध´ को किस तरह सिद्ध किया गया ॽ सेशन जज जे.एच.आर. फ्रेशर ने अपने फैसले में संक्षेप में उसके बारे में लिखा ´इस ( मोहम्मद अकबर) को षडयंत्र में गिरफ्तार किया गया,यह षडयंत्र ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ताशकंद,काबुल और समरकंद में रचा गया।´इसके लिए कोई प्रमाण पेश नहीं किए गए,सीधे बिना प्रमाण के षडयंत्र के बहाने सजाएं सुना दी गयीं।जिस धारा (121 ए)में केस लगाए गए उसी धारा में बाद में कम्युनिस्टों के खिलाफ कानपुर षडयंत्र केस(1924),मेरठ षडयंत्र केस(1929-33) में मुकदमे चलाए गए और उनको दण्डित किया गया ।इसके बावजूद परांजपे आप कह रहे हैं कि प्रमाण दो कि स्वाधीनता संग्राम में कम्युनिस्टो ने कौन सी लड़ाई लड़ी,किस तरह की कुर्बानी दी।

परांजपेजी आपके लिए हम पेशावर षडयंत्र केस के जजमेंट का अंश उद्धृत कर रहे हैं आप पढें और तय करें कि आपने सच बोला या झूठ बोला,जजमेंट में जज ने लिखा “The attitude of the Bolsheviks towards all settled governments is a matter of common knowledge .so also their hostility and desire to overthrow the governments of all civilized powers as at present constituted. This general knowledge is a matter of which judicial notice can be taken.” इसी जजमेंट में आगे कहा गया कि ताशकंद को भारत की ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रचार अभियान का केन्द्र के रूप में इस्तेमाल किया गया। इनके ग्रुप में अब्दुल रब,राय,मुखर्जी और अन्य शामिल थे,इन लोगों ने मिलकर वहां अस्थायी भारत सरकार बनायी।वहां भारतीयों को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिए स्कूल खोला।वहां से भारतीय लोग प् प्रशिक्षण लेकर आते थे और फिर भारत में देशद्रोही गतिविधियां संचालित करते थे।यह एक तरह से भारत पर बोल्शेविक हमला है।

परांजपेजी आपने जेएनयू में साम्यवाद के बारे में जो कुछ कहा उसका जेएनयू के मौजूदा आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। भारत में कम्युनिस्ट हमेशा से लोकतंत्र के लिए संघर्ष करते रहे हैं अतः इनके संघर्ष के साथ अन्य देशों के कम्युनिस्टों की तुलना करना गलत है।जेएनयू का मौजूदा आंदोलन छात्रों के जनतांत्रिक हकों की रक्षा के लिए चल रहा है,यह आंदोलन कन्हैया कुमार सहित 5छात्रनेताओं पर चलाए जा रहे राष्ट्रद्रोह के झूठे मुकदमे को वापस लेने के लिए चल रहा है। इसलिए इस आंदोलन की सोवियत संघ से तुलना करना गलत है।

परांजपे साहब आपकी जानकारी के लिए बता दें जेएनयू में कई छात्रों ने सोवियत संघ में स्टालिन युग में मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ बेहतरीन शोध की है,ये सभी वाम छात्र हैं।जेएनयू के वाम छात्रों ने चीन में माओ के जमाने के मानवाधिकार हनन के खिलाफ भी काम किया है,यह इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि आप जेएनयू की परंपरा से अनभिज्ञ हैं। आप इन दिनों शीतयुद्धीय नजरिए से परिचालित होकर देख रहे हैं।जबकि जेएनयू तो शीतयुद्धीय नजरिए के खिलाफ भी जमकर वैचारिक संघर्ष करता रहा है।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

जेएनयू छात्र आंदोलन, आतंकवाद और राष्ट्रवाद


जेएनयू छात्र आंदोलन में विभिन्न रंगत की विचारधाराएं सक्रिय रही हैं।इनमें मार्क्सवादी,उग्र वामपंथी, लिबरल,समाजवादी,मुक्त चिंतक,माओवादी आदि शामिल हैं। इन सभी रंगत के विचारों को छात्रसंघ की साधारणसभा में वाद-विवाद करते सहज ही देखा जा सकता है।जेएनयू छात्र आंदोलन की सबसे अच्छी बात है अहिंसा ।इस अर्थ में जेएनयूवाले पक्के बौद्ध हैं।वे वाम नहीं है। किसी भी संस्थान या संगठन की विचारधारा उसके आचरण से तय होती है,विचारों से नहीं।जेएनयू के छात्रों का आचरण बौद्ध परंपरा के करीब है,वाम के नहीं।बौद्ध परंपरा का निर्वाह करते हुए जेएनयू छात्र आंदोलन ने कभी हिंसा नहीं की और न कभी हिंसा का समर्थन किया। असहमति और संवाद को छात्र जीवन की धुरी बनाया। यह भी उल्लेखनीय है कि जेएनयू छात्रसंघ में कभी कोई क्रिमिनल चुनकर नहीं आया।

जेएनयू छात्रसंघ देश में अकेला छात्रसंघ है जो पूरी तरह स्वायत्त है, वि.वि. प्रशासन से उसका कोई संबंध नहीं है।छात्रसंघ अपने फैसले खुद लेता है और अपनी सारी गतिविधियों की सभी जानकारी छात्रों को पर्चे आदि के माध्यम से मुहैय्या कराता है। छात्रों को वहां चुने गए नेताओं से ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं, छात्र चाहें तो छात्रसंघ के द्वारा तय लिए गए फैसले रद्द कर सकते हैं।इस तरह की व्यवस्था दुनिया में कहीं पर भी नहीं है। जेएनयू छात्रों ने अनेक आंदोलन किए हैं लेकिन हिंसा का कभी सहारा नहीं लिया।इस अर्थ में वे पक्के बौद्ध हैं।

जेएनयूछात्रसंघ की परंपरा मेें कभी किसी भी आतंकी या पृथकतावादी संगठन के पक्ष में कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ है।हमेशा समय-समय पर आतंकवाद और उससे जुड़े आंदोलनों की जेएनयू छात्रसंघ ने निंदा की है और उसके खिलाफ छात्रों को एकजुट किया है।मैं स्वयं 7साल तक जेएनयू की छात्र राजनति में सक्रिय रहा हूँ और यह वह दौर था जब पंजाब से लेकर असम तक,उत्तर-पूर्व से लेकर कश्मीर तक आंदोलन और हिंसाचार जारी था।इसलिए यह कहना कि जेएनयू के छात्र आतंकवाद के समर्थक हैं,कश्मीर की आजादी के समर्थक हैं,अफजल के समर्थक हैं,एकसिरे से गलत है। जेएनयू के छात्र किस ओर हैं यह बात छात्रसंघ के प्रस्तावों के जरिए,पदाधिकारियों के बयानों के जरिए समझी जानी चाहिए,न कि नारों या पोस्टरों के जरिए।

आरएसएस के लोग झूठा प्रचार कर रहे हैं कि जेएनयू के छात्र आतंकियों को समर्थन दे रहे हैं,वे प्रमाण पेश करें कि छात्रसंघ ने क्या कभी कोई प्रस्ताव आतंकियों के समर्थन में पास किया है ? मीडियावाले प्रमाण पेश करें।

आतंकियों के पक्ष में जेएनयू की दीवारों पर लिखे नारों या किसी संगठन के द्वारा बांटे गए पर्चों या नारेबाजी के लिए जेएनयू छात्रसंघ जिम्मेदार नहीं है। यदि कोई छात्र संगठन जेएनयू में आतंकियों का समर्थन करता है तो यह उस संगठन की राय है जेएनयू छात्रसंघ की राय नहीं है,जेएनयू के छात्रों की राय नहीं है।जेएनयूके छात्रों की राय का प्रतिनिधित्व जेएनयूछात्रसंघ करता है।वही एकमात्र आवाज है उनकी।

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