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उत्तर आधुनिकतावाद,नारीवाद और मार्क्स- केरॉल ए.स्टेविले-1-

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एक वर्ष से भी अधिक समय से ओ.जे. सिंपसन का मुकदमा न केवल 'टैबलॉयड्स' में बल्कि मुख्यधारा के प्रेस में भी सुर्खियों में था। निकोल ब्राऊन सिंपसन और रॉन गोल्डमैन की भयावह हत्याओं के बाद लगभग सभी टेलीविजन या रेडियो वार्ता कार्यक्रमों में यह मामला बहस का गरमागरम मुद्दा था। यह 'टाइम' और 'न्यूजवीक' जैसी लोकप्रिय पत्रिकाओं के मुख्य पृष्ठ पर छपा तथा प्रमुख समाचारपत्रों के पहले पृष्ठ पर नियमित रूप से छाया रहा। शॉक रेडियो के होस्ट होवार्ड स्टर्न ने अब अलोकप्रिय 911 टेप बजाने के बाद अचानक घरेलू हिंसा को खोज निकाला था, जबकि लाखों टेलीविजन दर्शक लॉस एंजेलस पुलिस विभाग की सिंपसन की श्वेत ब्रोंको की शानदार छानबीन को देखने में लगे थे। आरंभ से ही इस कहानी में अति-यथार्थवादी तत्व थे; वास्तविक घटना से एक दूरी जिसने सिंपसन और गोल्डमैन की जिंदगियों का अंत कर दिया था। साथ ही लॉस एंजेलस में नस्ल, वर्ग, राजकीय दमन की वास्तविक घटनाओं से भी दूरी थी। ज्यों-ज्यों सप्ताह दीर्घ होकर महीनों में बदले, हत्या की घटना और मीडिया कवरेज के बीच दूरी बढ़ती गई, जबकि यह मामला स्वयं ही स्वास्थ्य सेवा, '…

किसान ज्ञान परंपरा- झारखंड के किसान -स्वामी सहजानंद सरस्वती

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बिहार प्रान्त को असल में 'बिहार और छोटानागपुर' के नाम से ही पुकारा जाता है। यों कभी-कभी संक्षेप में केवल 'बिहार' भी कह देते हैं। जब उड़ीसा का सम्‍बन्‍ध बिहार से था तब तो 'बिहार और उड़ीसा' अकसर कहा जाता था। मगर उड़ीसा के अलग हो जाने के बाद केवल 'बिहार' के बजाए 'बिहार और छोटानागपुर' कहना ही उचित प्रतीत होता है। यों तो उड़ीसा के मिले रहने पर भी कभी-कभी केवल 'बिहार' ही कहते थे। चाहे जो भी हो, छोटानागपुर का महत्‍व काफी है और जान या अनजान में इसकी याद हमेशा बनी रही है।
बात असल यह है कि इस प्रान्त के कुल सोलह जिलों में सिर्फ सारन, चम्पारन, दरभंगा, मुजफ्फरपुर और पूर्णिया यही पाँच ऐसे हैं जहाँ पहाड़ नहीं हैं। शेष ग्यारह में तो कमोबेश पहाड़ पाए ही जाते हैं। यह ठीक है कि छोटानागपुर के पाँच जिलोंपलामू, राँची, हजारीबाग, मानभूम और सिंहभूमतथा संथाल परगना, इन छह जिलों की भूमि जिस प्रकार पार्वत्य या पहाड़मयी है वैसी गया, मुंगेर आदि की नहीं है। ये छह तो पहाड़ों और जंगलों से घिरे हैं। मगर गया वगैरह के कुछ ही हिस्से पहाड़ी हैं। फिर भी यह बात सही है कि ये…

गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् का माओवादी प्रेम

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पश्चिम बंगाल में केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम का असली खेल सामने आ गया है। खासकर माओवादियों के संदर्भ में हम पहले भी कईबार लिख चुके हैं कि कांग्रेस का माओवादियों के प्रति याराना है। इसबार कुछ बात ही अलग है। असल में माओवादी हिंसाचार और आतंक देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व चुनावी गणित को ध्यान में रखकर माओवाद से लड़ना चाहता है। जैसा कि सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के लालगढ़ इलाके में केन्द्र और राज्य के सशस्त्रबलों का संयुक्त अभियान चल रहा है और उसमें अब तक काफी हद तक सफलता भी मिली है। अनेक नामी-गिरामी माओवादी नेता और हिंसाचार में शामिल अपराधियों को सशस्त्रबलों ने पकड़ा भी है। माओवादियों के जितने बड़े नेता पश्चिम बंगाल में पकड़े गए हैं उतने बड़े नेता अन्यत्र किसी राज्य में गिरफ्तार नहीं हुए हैं। लालगढ़ इलाके में अभी भी सैंकड़ों शरणार्थी अपने घरों से दूर पनाह लिए कष्ट में दिन काट रहे हैं। 30 हजार से ज्यादा सशस्त्रबलों के संयुक्त अभियान के बाबजूद माकपा के सदस्यों और हमदर्दों को उनके घर वापस नहीं पहुँचा पाए हैं। इन शरणार्थी शिविरों के रखरखाब,देखभाल …

ममता के पांच काल्पनिक मिथ और यथार्थ

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ममता बनर्जी को मिथ बनाने की आदत है वह उनमें जीती हैं। ममता बनर्जी निर्मित पहला मिथ है माकपा शैतान है। दूसरा मिथ है मैं तारणहार हूँ। तीसरा मिथ है माओवादी हमारे बंधु हैं। चौथा मिथ है हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा है और पांचवां मिथ है ‘हरमदवाहिनी’। इन पांचों मिथों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। छद्म मिथों को बनाना फिर उन्हें सच मानने लगना यही ममता की आयरनी है। यहीं पर उसके पराभव के बीज भी छिपे हैं। ममता बनर्जी अधिनायकवादी भाषा का प्रयोग करती हैं उनकी आदर्श भाषा का नमूना है ‘हरमदवाहिनी’ के नाम से गढ़ा गया मिथ। ‘हरमदवाहिनी’ काल्पनिक सृष्टि है। यह मिथ लालगढ़ में पिट गया है। वहां के साधारण किसान और आदिवासी समझ गए हैं कि इस नाम से पश्चिम बंगाल में कोई संगठन नहीं है। यह थोथा प्रचार है। लालगढ़ में ‘हरमदवाहिनी’ के कैंपों की एक सूची तृणमूल कांग्रेस और माओवादी बांट रहे हैं। इस सूची में 86 कैंपों के नाम हैं और इनमें कितने लोग हैं उनकी संख्या भी बतायी गयी है। उनके अनुसार ये माकपा के गुण्डाशिविर हैं और माकपा के अनुसार ये माओवादी हिंसाचार से पीड़ितों के शरणार्थी शिविर हैं। सच क्या है इसके बारे में सिर…

विनायकसेन की मुक्ति के लिए फेसबुक वाले एकजुट

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जगदीश्वर चतुर्वेदी-  विनायक सेन को आजन्म कैद की सजा सुनाकर जज महोदय ने क्या आधुनिक न्याय विवेक का परिचय दिया है ? मानवाधिकार की न्याय ने एक नयी परिभाषा गढ़ी है और भविष्य में आने वाले खतरों की चेतावनी भी दी है । आपकी क्या राय है ।10 hours ago · Like · Comment Hemlata MahishwarRatan Kumar and 2 others like this. Abinash 'Kafir' Mishraमानवाधिकार की ताक पर कानून-व्यस्था को लचीला बनाना क्या भविष्य के खतरोँ को रोकने का सही तरीका है? दंड का आकलन अपराध पर होना चाहिये न कि मानवाधिकार पर, अन्यथा सुव्यस्थित समाज का निर्माण करना कठिन हो जायेगा। 10 hours ago via Facebook Mobile ·