जगदीश्वर चतुर्वेदी-आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोग गालियों का खूब प्रयोग करते हैं। हम उसे तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष आरंभ करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है।इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे। आपकी क्या राय है ।
जगदीश्वर चतुर्वेदी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर। पता- jcramram@gmail.com
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
मेरा बचपन- माँ के दुख और हम
माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...
-
लेव तोलस्तोय के अनुसार जीवन के प्रत्येक चरण में कुछ निश्चित विशेषताएं होती हैं,जो केवल उस चरण में पायी जाती हैं।जैसे बचपन में भावानाओ...
-
बाबा रामदेव फिनोमिना मध्यवर्गीय घरों में घुस आया है। बाबा के सिखाए योगासन के अलावा उनकी बनाई वस्तुओं का भी बड़े पैमाने पर घरों में सेवन ...
-
मैं नहीं चाहता- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सड़े हुए फलों की पेटियों की तरह बाजार में एक भीड़ के बीच मरने की अपेक्षा एकान्त में किसी सूने वृ...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें