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July, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बत्रापंडित के पोंगापंथ के ख़तरे

ये जनाब मुकदमेबाज हैं। संघ की नई रणनीति के तहत ये शिक्षाजगत में संघ के मुखौटे हैं । अब तक का राजनीतिक अनुभव रहा है कि संघ पहले वैचारिक हमले करता है , फिर राजनीतिक हमले ,उसके बाद शारीरिक और अंत में क़ानूनी आतंकवाद का सहारा लेता है और फिर विजय दुंदुभि बजने लगती है !      उदार  आधुनिक लोकतांत्रिक , वैज्ञानिक और संवैधानिक वैविध्यपूर्ण  विचारों और किताबों पर प्रतिबंध लगाना फंडामेंटलिज्म है । इस फंडामेंटलिज्म को हमेशा शिक्षा की रक्षा के नाम पर सक्रिय देखा गया है ।     सवाल यह है कि बत्रापंडित जैसे पोंगापंथियों के मुखौटे की संघ को ज़रुरत क्यों पड़ी ? संघ  और उससे जुड़ा राजनीतिक दल इस काम को अपने नाम से सीधे क्यों नहीं करता ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि केन्द्र या राज्य में जहाँ पर बत्रापंडित को मौक़ा मिलता है वे शिक्षा पर ही मेहरबानी क्यों करते हैं ?          आधुनिककाल में  शिक्षा को राजनीति के बाद सबसे बड़ा विचारधारात्मक जंग का मैदान माना जाता है और यही वजह है कि संघ और उनके मुखौटे राजनीति और शिक्षा पर सबसे ज़्यादा हमले करते हैं।      संघ के बजरबट्टुओं की वैचारिक जंग का तीसरा बड़ा क्षेत्र ह…

मोदी बाबू के कमाल के ६० दिन-

एक तरफ़ हाफ़िज़ सईद से अपने दूत के ज़रिए गप्पें ! दूसरी ओर सईदभक्त आतंकियों की घुसपैठ और सीमा पर निरंतर गोलीबारी!
एक तरफ़ संसद में सर्वधर्म सद्भाव की नक़ली अपील ! दूसरी ओर मुरादाबाद में नए क़िस्म के मुज़फ़्फ़रनगर मार्का 'सद्भाव'की अथक कोशिश ! अहर्निश संविधान की मूलभावनाओं भाजपा और सहयोगी दलों के घटिया वैचारिक हमले !
एक तरफ़ देश को स्वच्छ प्रशासन का गुजरात के नाम पर भरोसा !दूसरी ओर गुजरात में नौ हज़ार करोड़ रुपयों के खर्चे का हिसाब किताब न देना !
सीएजी के अनुसार रिलायंस-अदानी आदि को सारे क़ानून तोड़कर लूट में हज़ारों करोड़ रुपयों की मदद करना ! 

एक तरफ़ संविधान के अनुसार काम करने का वायदा दूसरी ओर संवैधानिक नियमों और क़ायदों का सरेआम उल्लंघन !
एक तरफ़ देशभक्ति का नक़ली नाटक दूसरी ओर विगत ६० दिनों में पाक फ़ायरिंग में मारे गए शहीदों के घर मोदी बाबू का न जाना !
एक तरफ़ चुनाव के समय सोनिया- राहुल - वाड्रा के ख़िलाफ़ नक़ली मंचीय नाटक और इधर साठ दिनों में इनके 'अवैध 'धंधों पर हमले न करना ! 
महँगाई का बढ़ना , ख़ासकर टमाटर का १००रुपये के पार पहुँच जाना आदि बातें हैं जो मोदी को सबसे नि…

ब्रिक्स में मोदीजी और भोंपू नेटवर्क

नरेन्द्र मोदी का पीएम के नाते ब्रिक्स सम्मेलन पहला बड़ा कूटनीतिक सम्मेलन था । इस सम्मेलन में क्या हुआ ? भारत ने क्या खोया और क्या पाया यह बात भारत का मीडिया कम से कम जानता है ।   मोदीजी ने अपनी ख़ामियों को छिपाने की रणनीति के तहत मीडिया के समूचे तामझाम को अपनी यात्रा से बेददखल कर दिया।     'नियंत्रित ख़बरें और सीमित कवरेज 'की रणनीति के तहत स्थानीय स्तर पर भक्तटीवी चैनलों का भोंपू की तरह इस्तेमाल किया। यह एक तरह से भोंपू टीवी कवरेज यानी अधिनायकवादी कम्युनिकेशन माॅडल की वापसी है। दुर्भाग्यजनक है कि भारत में व्यापक मीडिया नेटवर्क के रहते हुए मोदी ने भोंपूनेटवर्क का ब्रिक्स कवरेज के लिए इस्तेमाल किया।         ब्रिक्स भोंपू टीवीकवरेज की ख़ूबी थी कि पीएम कम और भोंपू ज़्यादा बोल रहे थे। पहलीबार ऐसा हुआ कि जो मीडिया साथ में गया था उससे भी सम्मेलन और सामयिक विश्व घटनाक्रम पर मोदीजी ने  प्रेस काॅफ्रेंस करके अपने ज्ञान -विवेक और विश्व राजनीतिक नज़रिए का परिचय नहीं दिया। यहाँ तक कि सम्मेलन में भी मोदीजी ने सरलीकृत रुप में गोल गोल बातें कीं।      ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी अपने विदेशनीति विज़न क…

मोदी और वर्चुअल मुखौटालीला -किश्त १ -

नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री मीडिया लहर ने बनाया अब यही मीडिया लहर मुश्किलें खड़ी कर रही है । मोदी संभवत: पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका मीडिया ने सबसे जल्दी अलोकप्रियता का भाष्य लिखना आरंभ कर दिया है।    मोदी को मीडिया ने मुखौटों के माध्यमों से आम लोगों के बीच में जनप्रियता दिलाई इसलिए मोदी का मीडिया विवेचन कभी मुखौटों को हटाकर नहीं किया जा सकता। मोदी ने अपनी ऐसी इमेज बनाकर पेश की थी कि वह हर उस व्यक्ति में है जो उसका प्रचारक है इस तरह मोदी ने अपने नायक का निर्माण किया था। सभी निजी व्यक्तियों की इमेज और निजता को अपहृत करके मोदी 'महान' की इमेज को मीडिया ने तैयार किया था । निश्चित रुप से यह बेहद खर्चीला ,सर्जनात्मक और कलात्मक काम था ।फलत: मोदी व्यक्ति नहीं मुखौटों का संगम है।          मोदी को देखने का हम नज़रिया बदलें मोदी पहले भी बहुत गरजते थे ,अब भी गरज रहे हैं , पहले भी वे मुखौटों के ज़रिए गरज रहे थे ,अब भी मुखौटों के ज़रिए गरज रहे हैं ,मोदी को निजी तौर पर प्रधानमंत्री के रुप में देखना ,अंश को देखना  है, मोदी समग्रता में सिर्फ़ मुखौटों में मिलेगा,निचले स्तर पर सभी संघी सदस्यों औ…

कोलकाता में गाली,हिंसा और बम

कल मैं बंगला टीवी चैनल पर टीएमसी सांसद और अभिनेता तापस पाल को हिंसक भाषा में भाषण देते हुए देख रहा था तो मन में सोच रहा था कि बंगाली जाति के कितने बुरे दिन आ गए हैं कि उनके आइकॉन आम जनता में  हिंसक भाषा में बोल रहे हैं और दर्शक तालियां बजा रहे हैं।      बंगाली जाति मधुरभाषी,सांस्कृतिकतौर पर सभ्यजाति है। इसमें हिंसकभाषा कहां से आई ? बंगाली जाति के नेता भारत में सभ्यता और राजनीति के सिरमौर रहे हैं और देश उनको बड़े ही सम्मान की नजर से देखता रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं है।    सांसद तापस पाल की भाषा इतनी खराब और दबंगई से भरी थी कि ममता सरकार में शिक्षामंत्री पार्थ चटर्जी तक ने इस तरह की भाषा के इस्तेमाल पर आपत्ति प्रकट की। नेता हो या नागरिक , गाली और हिंसा की भाषा में बोलना तो अपराध है, असभ्यकर्म है।       प.बंगाल में गाली,हिंसा और बम की राजनीति में गहरा संबंध है ।  हिंसा हमेशा गाली की भाषा के दरवाजे से ही दाखिल होती है। राजनीति में गाली की भाषा कब आती है और कब वह हिंसा में तब्दील हो जाती है इसका ठीक से अध्ययन तो हमारे समाज में नहीं हुआ लेकिन यह सच है कि गाली और हिंसा जुड़वां बहनें हैं। ये…