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राससुन्दरी दासी की यह आत्मकथा 'आमार जीबोन'

राससुन्दरी दासी  की यह आत्मकथा'आमार जीबोन'नाम से सन्1876में पहली बार छपकर आई। जब वे साठ बरस की थीं तो इसका पहला भाग लिखा था।88वर्ष की उम्र में राससुन्दरी देवी ने इसका दूसरा भाग लिखा। जिस समय राससुन्दरी देवी यह कथा लिख रही थी,वह समय88वर्ष की बूढ़ी विधवा और नाती-पोतों वाली स्त्री के लिए भगवत् भजन का बतलाया गया है। इससे भी बड़ी चीज कि परंपरित समाजों में स्त्री जैसा जीवन व्यतीत करती है,उसमें केवल दूसरों द्वारा चुनी हुई परिस्थितियों में जीवन का चुनाव होता है। उस पर टिप्पणी करना या उसका मूल्यांकन करना स्त्री के लिए लगभग प्रतिबंधित होता है। स्त्री अभिव्यक्ति के लिए ऐसे दमनात्मक माहौल में राससुन्दरी देवी का अपनी आत्मकथा लिखना कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। यह आत्मकथा कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। सबसे बड़ा आकर्षण तो यही है कि यह एक स्त्री द्वारा लिखी गई आत्मकथा है। स्त्री का लेखन पुरुषों के लिए न सिर्फ़ जिज्ञासा और कौतूहल का विषय होता है वरन् भय और चुनौती का भी। इसी भाव के साथ वे स्त्री के आत्मकथात्मक लेखन की तरफ प्रवृत्त होते हैं। प्रशंसा और स्वीकार के साथ नहीं;क्योंकि स्त्री का अपन…

पियरे बोर्दिओ और नव्य-उदारतावाद - 7-

बोर्दिओ के अनुसार विनियमन (डीरेगूलेशन) की नीति के खिलाफ सबसे पहले राजनीतिक चिन्तन को महत्व दिया जाना चाहिए। राजनीतिक गतिविधियों को प्रधानता दी जानी चाहिए। यह प्रस्थान बिंदु हो सकता है। इसके बाद इस संघर्ष को राष्ट्र-राज्य की सीमाओं के परे ले जाने की जरुरत है। इसके लिए विश्वव्यापी सामाजिक आंदोलन की जरुरत होगी और वैसा ही संगठन भी बनाना पड़ेगा। ये सामाजिक आंदोलन अपनी प्रकृति ,आकांक्षा और लक्ष्य में भिन्ना किस्म के होंगे। इनमें कुछ समानताएं भी होंगी जो इन्हें 'तुलनात्मक' बनाएगी । बहुत सारे आंदोलन परंपरागत राजनीतिक लामबंदी,राजनीतिक दलों की लामबंदी ,जो सोवियत टाइप हुआ करती थी, को अस्वीकार करते हुए आ रहे हैं। यह पूरी तरह इजारेदाराना भाव के प्रति प्रतिवाद है। इन आंदोलनों की धुरी है छोटे ग्रुपों पर इजारेदारी कायम करना। साथ ही ये तुरंत शिरकत की मांग करते हैं। इन आंदोलनों की खूबी है कि ये तुरंत नए एक्शन सुझाते हैं। इनमें प्रतीकात्मक सार होता है। इनके लक्ष्य और उपाय मौलिक होते हैं। ये ठोस सामाजिक लक्ष्यों को केन्द्रित होते हैं। जैसे हाउसिंग,रोजगार,स्वास्थ्य,गरीबी के प्रति सरोकार आदि। वे इन…

रश्मि खेरिया की ताजा कविता 'स्वाद'

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स्वाद
बादलों के साथ -साथ
दौड़ रहा
मन मेरा भी

खेत खलिहान नदी -नाले
रिश्तों के जंगल ---
सब पीछे छूटते रहे

बस लिया
स्वाद
मैंने
भीगने का






















रश्मि खेरिया का ताजा काव्य संकलन ' अपने होने का सच '

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रश्मि खेरिया का यह पहला संकलन है। विगत दो दशकों से काव्य साधना में लगी इस लेखिका ने रुपकों और बिम्बों में जीवनानुभवों को व्यक्त करने की जो कला विकसित की है वह हिन्दी की स्त्री कविता की बड़ी उपलब्धि है। इनकी कविता में जीवन का उल्लास और आवेग  व्यक्त हुआ है। इनके काव्य संकलन का नाम है 'अपने होने का सच'। 




                       छूटना
                          चाहा
                          बाँधना
                          कुछ क्षणों को
                          मुट्ठी में

                          न जाने कब
                          चुपके से
                           फिसल गए
                            रेत बन
                          नहीं खुली मुट्ठी
खाली मुट्ठी ही लिए

                          भरी-भरी दिखती रही.



 (प्रकाशक- रेमाधव पब्लिकेशंस प्रा.लि. सी 22, तृतीय तल, डी.सी.राजनगर,गाजियाबाद-201002)

पियरे बोर्दिओ और नव्य-उदारतावाद - 6-

क्रिश्चियन फंडामेंटलिस्टों का अमेरिका में व्यापक स्तर पर शिक्षा और मीडिया नेटवर्क है।इसमें बॉब जॉन यूनीवर्सिटी का नाम सबसे ऊपर है।इजराइली तत्ववादियों का अनुकरण करते हुए इस विश्वविद्यालय ने ईसाइयों में धार्मिक शुध्दता का पाठ पढ़ाया जाता है। ये लोग समाज में किसी भी किस्म के सम्मिश्रण को स्वीकार नहीं करते। रूढ़िवादी विचारों और संस्कारों में पूरी तरह आस्था रखते हैं। बाइबिल इनके लिए अंतिम और एकमात्र सत्य है। ये आक्रामक और रक्षात्मक दोनों ही किस्म की रणनीति का अपने सांगठनिक विकास के लिए इस्तेमाल करते हैं। 


बॉब जॉन यूनीवर्सिटी के छात्र सिर्फ विचारों और संस्कारों में ही तत्ववादी नहीं होते अपितु उग्रवादी भी होते हैं। ये किसी भी किस्म की विज्ञानसम्मत शिक्षा और विचारों का विरोध करते हैं। शिक्षा के पाठ्यक्रमों में किसी भी किस्म की उदारतावादी दृष्टि को स्वीकार नहीं करते। इस विश्वविद्यालय के द्वारा पृथकतावादी और तत्ववादी ताकतों काखुलकर समर्थन किया जाता है। ये लोग नस्लवादी श्रेष्ठत्व पर जोर देते हैं। नस्लवादी श्रेष्ठत्व इनके धार्मिक उसूलों से जुड़ा हुआ है। 


आमतौर पर तत्ववादी या पृथकतापंथी संगठन अपने क…

पोप पर हमले की कोशिश

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क्रिसमस के मौके पर एक महिला ने बेरियर से फांदकर पोप के ऊपर कूद कर छलांग लगा दी। अचानक 82 वर्ष के पोप उठ खड़े हुए और बच गए, उन्हें कोई चोट नहीं आयी। इस घटना का फुटेज इटली के सरकारी टीवी चैनल RAI पर दिखाया गया। पूरी खबर देखें -

VATICAN CITY - A woman jumped the barriers in St. Peter’s Basilica and knocked down Pope Benedict XVI as he walked down the main aisle to begin Christmas Eve Mass yesterday.

The 82-year-old pope quickly got up and was unhurt, said a Vatican spokesman, the Rev. Ciro Benedettini.

Footage aired on Italy’s RAI state TV showed a woman dressed in a red jumper vaulting over the wooden barriers and rushing the pope before being swarmed by bodyguards.

The commotion occurred as the pope’s procession was making its way toward the main altar and shocked gasps rang out through the public that packed the basilica. The procession came to a halt and security rushed to the trouble spot.

Benedettini said the woman who pushed the pope appeared to be mentally unstable and had been arres…

पियरे बोर्दिओ और नव्य-उदारतावाद - 1-

पियरे बोर्दिओ की समाजशास्त्रीय और मीडिया दृष्टि पर परवर्ती मार्क्सवाद, समाजशास्त्र, चिन्हशास्त्र और मीडिया संरचना सैध्दान्तिकी का गहरा असर है। हिन्दी में अभी तक बोर्दिओ के बारे में चर्चा नहीं हो रही है,कभी-कभार एक दो उध्दरण मात्र दिखाई दे जाते हैं।बोर्दिओ फ्रांस की माक्र्सवादी-समाजशास्त्रीय परंपरा के प्रमुख स्तम्भ थे।


    पूंजीवाद और परवर्ती पूंजीवाद के दौर में किस तरह की सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक संरचनाएं निर्मित हो रही हैं और समाजशास्त्रीय सैध्दान्तिकी की नयी बदली हुई परिस्थितियों में किस तरह की संरचनाएं बन रही हैं और उन्हें किस तरह विश्लेषित करें। विश्लेषण के नए मॉडल क्या हो सकते हैं ? खासकर ऐसे दौर में जब सार्वभौमत्व की विदाई की घोषणा हो चुकी हो।बोर्द्रिओ का यहां नव्य-उदारतावाद यानी ग्लोबलाइजेशन के संदर्भ में विशेष रुप से मूल्यांकन किया गया है।

    बोर्दिओ के नजरिए का ग्लोबलाईजेशन के संदर्भ और परवर्ती पूंजीवाद के द्वारा पैदा की गई सांस्कृतिक और आर्थिक तबाही के संदर्भ में महत्व है। हमारे समाज में मध्यवर्ग के एक बड़े तबके में फैशन की तरह ग्लोबलाईजेशन का प्रभाव बढ़ा है,सरकार की नीति…

क्रिसमस पर सेना के हमले बंद नहीं होते

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क्रिसमस के अवसर पर मीडिया सीधे छुट्टी के मूड में होता। अधिकांश पत्रकार यह मानते हैं ये छुट्टी के दिन हैं। वे तरह-तरह से आनंद मनाते हैं। इसका अर्थ है कि क्रिसमस पर चूंकि सब छुट्टी पर हैं अत:कोई ठोस वास्तव खबर नहीं होती। ऐसी अवस्था में जो भी आकर्षक खबर लगे उसे ले लो। पुरानी खबरों का संकलन दे दो। क्रिसमस पत्रकार की नजर दफ्तर के बाहर चली जाती हैं। वह खबरों से भागता है। दफ्तर से भागता है।
   चैनलों में बाजार और चर्च की रौनक का व्यापक कवरेज आने लगता है। आनंद देने वाली वस्तुओं की खपत और मांग बढ़ जाती है। उपहार लेने देने ,खिलाने-पिलाने ,पार्टी लेने-देने का चक्कर केन्द्र में आ जाता है। सोना खूब बिकता है। सूखे मेवा ,शराब और केक खूब बिकता है। चर्च जाने वालों की संख्या बढ़ जाती है। इन्हीं सब चीजों का कवरेज आने लगता है। कवरेज के केन्द्र में आनंद आ जाता है।
  क्रिश्चियन परिवारों में यह परिवार के मिलन और नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर है। ईसाई संतों के द्वारा इस मौके पर शांति संदेश का प्रसारण किया जाता है। सबसे दुख की बात यह है कि ईसाई संतों के शांति पाठ को ईसाई राष्ट्राध्यक्ष कभी नहीं मानते। क्रिस…

सीआईए ,जुआरी और आतंकवादी

आज के गार्जियन ने खबर दी है कि सीआईए का आतंकी खेल जुआरी ले उड़ा। आज भी आतंकवादी संगठनों के नाम से काम करने वाले सैंकड़ों बंदे अमरीका में चुपचाप पड़े रहते हैं और आदेश मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे ही एक अलकायदा सदस्य का गुप्त कोड अलजजीरा चैनल के हाथ लग गया। फ्रांस और ब्रिटेन की हवाई सेवाएं रद्द कर दी गयीं ,और सारे मीडिया में खबर फैला दी गयी कि ब्रिटेन में 26/11 जैसा हमला हो सकता है। पूरी खबर देखें-
The intelligence reports fitted the suspicions of the time: al-Qaida sleeper agents were scattered across the US awaiting orders that were broadcast in secret codes over the al-Jazeera television network.
Flights from Britain and France were cancelled. Officials warned of a looming "spectacular attack" to rival 9/11. In 2003 President Bush's homeland security tsar, Tom Ridge, spoke of a "credible source" whose information had US military bracing for a new terrorist onslaught.
Then suddenly no more was said.
Six years later, Playboy magazine has revealed that the CIA fe…

शोषणकारी ताकतों से टकराता जनकवि महेन्द्र 'नेह' - रमेश प्रजापति ( 3)

आज मानव के सामने स्वप्न एवं जीवन की सच्चाई के बीच की मरूभूमि हमारे सम्मुख आकर खड़ी हो जाती है। हर तरफ अन्तर्विरोध एवं द्वन्द्व के बीच कवि बड़ी तेजी से समाज में नैतिक-मूल्यों के टूटने-बिखरने की ध्वनियाँ सुन रहा है। गहन संवेदना से लबालब इन कविताओं में गाँव की सोंधी माटी की महक और लोक ध्वनि बार-बार गूँजती है। उपभोक्तावाद ने हमारे नैतिक-मूल्यों का ह्रास बड़े पैमाने पर किया है। यदि समाज की मूल्यहीन वर्तमान गतिविधियों को देखे तो पाएंगे कि बाजारवाद के बढ़ते वर्चस्व ने हमारे सम्पूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल कर रख दिया है। आपसी संबंधों का कोई महत्तव नहीं रह गया है। व्यक्ति अवसरवादी होता जा रहा है। वह वक्त आने पर अपनों का खून भी करने से नहीं चूकता है-''निश्चित ही/ इस बीच जुड़ रहे है/ कुछ नए रिश्ते/ अभी-अभी जवान जिस्म से/ टपके गाढ़े खून के उजास में।''                                      - (गाढ़े खून के उजास में, पृष्ठ-92)
आर्थिक उदारीकरण ने सामाजिक जीवन की सभी अवधारणाओं को विघटित कर दिया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत में अन्तर्कलह, वर्ग-संघर्…