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तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन की समस्याएं

काव्य या साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करने ज्यों ही जाते हैं बड़ी समस्या उठ खड़ी होती है। पहली अनुभूति यह पैदा होती है कि हिन्दी की कविता अन्य विदेशी भाषा की कविता से पीछे है। आलोचना का तुलनात्मक अध्ययन करने जाते हैं तो पाते हैं कि हिन्दी की आलोचना कितनी पीछे है। यही दशा अन्य विधाओं की है।

यानी तुलना करते ही बार-बार यह एहसास पैदा होता है कि हिन्दी का साहित्य अन्य भाषाओं के साहित्य से कितना पीछे है। ऐसा नहीं है कि हम हिन्दी वालों को ही ऐसी अनुभूति होती है। अंग्रेजी के साहित्यकारों को भी ऐसी ही अनुभूति होती है कि फ्रेंच या जर्मन साहित्य से उनका साहित्य कितना पीछे है।

मैथ्यू अर्नाल्ड पहले लेखक हैं जिन्होंने पहलीबार एकपत्र में 1848 में ‘तुलनात्मक साहित्य’ पर सुसंगत ढ़ंग से विचार किया था। सन् 1886 में पहलीबार एच.एम.पॉसनेट ने ,जो अंग्रेजी के प्रोफेसर थे, उन्होंने पहलीबार अपनी किताब का नाम इसी पदबंध से ऱखा था।

मैं निजीतौर पर महसूस करता हूँ कि ‘तुलनात्मक साहित्य’ की बजाय ‘ साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन’ कहना ज्यादा संगत होगा। ‘तुलनात्मक साहित्य’ मूलतः खोखला पदबंध है। इस प्रसंग में कॉरन…

फेसबुक और नार्सिसिज़्म -

मैकलुहान के शब्दों में कहें तो मनुष्य तो मशीनजगत का सेक्स ऑर्गन है। डिजिटल मानवाधिकार इससे आगे जाता है और गहराई में ले जाकर मानवीय शिरकत को बढ़ावा देता है। हिन्दी के जो साहित्यकार फेसबुक पर हंगामा मचाए हुए हैं वे गंभीरता से सोचें कि सैंकड़ों की तादाद में जो लाइक आ रहे हैं वे कम्युनिकेशन को गहरा बना रहे या उथला ?
कम्युनिकेशन गहरा बने इसके लिए जरूरी है डिजिटल रूढ़िवाद से बचें। डिजिटल रूढ़िवाद मशीन प्रेम पैदा करता है,तकनीक की खपत बढ़ाता है । लेकिन कम्युनिकेशन में गहराई नहीं पैदा करता। डिजिटलरूढ़िवाद की मुश्किल है कि उसके कान नहीं हैं। वह इकतरफा बोलता रहता है,वह सिर्फ अपनी कही बातें ही सुनता है अन्य की नहीं सुनता। मसलन्, मैंने यह कहा,मैंने यह किया,मैं ऐसा हूँ,मैं यहां हूँ,मैं यह कर रहा हूँ,वह कर रहा हूँ आदि।
हिन्दी के फेसबुकरूढ़िवादी जब फोटो के जरिए अभिव्यक्ति का जश्न मनाते हैं तो वे भूल जाते हैं कि वे वैचारिक तौर पर क्या कर रहे हैं। फेसबुक या किसी भी डिजिटल मीडियम का गहरा संबंध मानवीय क्रियाकलापों और संचार से है। फेसबुक पर लाइक या फोटो लगाने के बहाने हम अपने भाव-भंगिमाओं और गतिविधियों क…

नामवर सिंह और रसशास्त्र का विखंडन

रस पर इन दिनों तकरीबन बातें नहीं हो रही हैं।जबकि रसशास्त्र ने 18सौ साल तक रचना और आलोचना को प्रभावित किया,हमारे सौंदर्यबोध के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की ।सवाल यह है कि वह अचानक गायब कैसे हो गया ? क्या रस आज भी प्रासंगिक है ? क्या रसशास्त्र के जरिए नाटक, साहित्य और समाज का नया मूल्यांकन संभव है ? बकौल नामवर सिंह “रसःजस का तस या बस ?” हमें इस लक्ष्मणरेखा का मूल्यांकन करना चाहिए।अनेकबार अकादमिक आलस्य के कारण हम परंपरा में जाना बंद कर देते हैं और यही बड़ी वजह है कि रस पर हमने बातें बंद कर दी हैं।

सवाल उठता है रचना लिखने के बाद और रचना लिखने के दौरान लेखक अपनी रचना का आनंद लेता है या नहीं ? कुछ कह रहे हैं रचना लिखने के बाद रचना स्वायत्त हो जाती है। यह भी कहा जा रहा है कि रचना कभी स्वायत्त नहीं होती,वह पाठक से हमेशा जुड़ी रहती है,पाठक के आत्मगतबोध से जुड़ी रहती है। सृजन के बाद लेखक से रचना अपने को स्वायत्त कर लेती है , लेखक अपनी रचना का लिखने के दौरान आस्वाद भी लेता है लेकिन असल आस्वाद तो पाठक लेता है। लेखक को तो लिखकर ही शांति मिलती है,सुख मिलता है। रचना कैसी है यह…

- संस्कृत आलोचना के अनुत्तरित सवाल -

इन दिनों प्रशंसा महान है और आलोचना गुम ! आलोचना के गुम होने की स्थिति में उन पक्षों को देखना जरुरी है जिनके कारणो से आलोचना गुम हुई है। आलोचना गुम तब होती है जब समाज पर साहित्यकार-आलोचक की पकड़ ढ़ीली पड़ जाती है अथवा आलोचना रुपवादी मार्ग पर चल निकले।आधुनिककाल में आलोचना का रुपवादी मार्ग सीधे सर्वसत्तावाद तक ले जाता है। जिन देशों में रुपवादी आलोचना आई वहां पर आगे-पीछे सर्वसत्तावाद या अधिनायकवादी शासन भी आया,रुपवादी आलोचना के राजनीतिक आयामों को हमने कभी खोलकर देखने की कोशिश ही नहीं की।रुपवादी समीक्षा का श्रेष्ठतम रुप देखना हो तो हमें संस्कृत काव्यशास्त्र की यात्रा करनी चाहिए।आलोचना के ह्रास के मर्म को समझने में संस्कृत काव्यशास्त्र का पुनर्मूल्यांकन हमारी बेहतर ढ़ंग से मदद कर सकता है। इससे हमें उन विचार-सरणियों को समझने में भी मदद मिलेगी जिन पर चलकर संस्कृत काव्यशास्त्र का मूल्यांकन विगत दो सौ सालों में विकसित हुआ है।

भरत कृत नाट्यशास्त्र और समाज-

संस्कृत काव्यशास्त्र को देखने के कई दृष्टिकोण मिलते हैं। पहला, विंटरनित्स,मैक्समूलर,कीथ आदि पाश्चात्य भारतविदों का नजरिया है, ज…

संस्कृत काव्यशास्त्र की समस्याएं

काव्यशास्त्र की प्रमुख समस्या है नए अर्थ की खोज।नए अर्थ की खोज के लिए आलोचकों ने रूपतत्वों को मूलाधार बनाया,जबकि वास्तविकता यह है कि नया अर्थ रूप में नहीं समाज में होता है।रूप के जरिए नए अर्थ की खोज के कारण संस्कृतकाव्यशास्त्र भाववादी दर्शन की गिरफ्त में चला गया।इसके लिए रूपकेन्द्रित मॉडल को चुना गया,समाज को अर्थ की खोज में शामिल ही नहीं किया गया। इस अर्थ में काव्यशास्त्र का समूचा कार्य-व्यापार रूपों तक ही सिमटकर रह गया।मसलन् ,संस्कृत के किसी आलोचक ने किसी कृति का विस्तार के साथ मूल्यांकन नहीं किया।इसके कारण संस्कृत काव्यशास्त्र आरंभ से ही एक समस्या रही है वह रूपों के प्रयोगों का शास्त्र है।नए-नए रूपों की खोज और निर्माण की जितनी कोशिशें काव्यशास्त्रियों ने की हैं उतनी कोशिशें उन्होंने नई अंतर्वस्तु को खोजने में नहीं की। काव्यशास्त्र की सबसे सुंदर बात यह है कि इसके सभी स्कूल आवयविक तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हैं।      मसलन्,आरंभ रस से हुआ,जो अलंकार,रीति, ध्वनि और वक्रोति सिद्धांत तक पहुँचा ।पूर्ववर्ती आलोचना से नई आलोचना अपने को अलग तो करती है लेकिन पुराने को अंदर समेटे रहती है।…