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शुक्रवार, 25 मार्च 2011

बम की पूजा-मोहनदास करमचंद गांधी


      हमारे यानि भारत के राजनीतिक रूप से सचेत हिस्से के आसपास के माहौल में इतनी हिंसा व्याप्त है कि यहां-वहां एकाध बम फेंका जाना कोई खास बैचेनी पैदा नहीं करता। कुछ लोगों के दिलों में तो शायद ऐसी घटना पर खुशी भी छा जाती है। अगर पता नहीं होता कि यह हिंसा किसी उफनते तरल में सतह पर आ रहे झाग की तरह है तो शायद मुझे निराशा होती कि अहिंसा निकट भविष्य में हमें वह आजादी हासिल कराती नहीं लगती जिसके लिए हम तमाम लोग लालायित है। हिंसा में यकीन करने वाले भी और अहिंसक लोग भी।
      खैर है कि पिछले बारह महीनों के दौरान मध्य भारत दौरे के दौरान अपने अविरल अनुभवों के आधार पर मुझे पक्का यकीन है कि उस विशाल आवाम को हिंसा की भावना छू तक नहीं गयी है जो इस बात के प्रति जागरूक हो गया है कि उसे आजादी मिलनी ही चाहिए। इसलिए वायसराय की रेलगाडी के नीचे बम-धमाके इक्का-दुक्का हिंसक घटनाओं के बावजूद मुझे लगता है कि हमारी राजनीति की लड़ाई के लिए अहिंसा का रास्ता ही अपनाया जाना है। राजनीतिक संघर्ष में अहिंसा का असर और             जनसाधारण द्वारा इस पर अमल की सम्भावना में मेरी आस्था बढ़ती जा रही है। इसीलिए मैं उन लोगों से तर्क करना चाहता हूं जो हिंसा की भावना से इतने लबरेज नहीं हो गए हैं कि तर्क की हद के परे जा चुके हैं।
      इसलिए पल भर को सोचिए कि वायसराय अगर गंभीर रूप से जख्मी या हलाक हो गए होते तो क्या हुआ होता। तय है कि तब पिछले महीने 23 तारीख को हुई बैठक नहीं हुई होती। इसलिए यह भी निश्चित नहीं होता कि कांग्रेस कौन सा रास्ता अख्तियार करेगी। बेशक यह अवांछित नतीजा होता, हमारी खुशकिस्मती है कि वायसराय ओर उनके समूह को कुछ भी नहीं हुआ। वे बड़े संयत अंदाज में उस दिन की दिनचर्चा में लगे रहे मानो कुछ हुआ ही नहीं था। मुझे पता है कि इस अटकल पचीसी के तर्क का उन लोगों पर कोई भी असर नहीं पड़ेगा जिनके दिल में कांग्रेस के लिए भी कोई कद्र नहीं, लेकिन मुझे उम्मीद है कि अन्य लोग जिन्हें इससे कोई भी उम्मीद नहीं और जिनकी उम्मीदें हिंसा पर ही टिकी हैं, इस दलील की सच्चाई का अहसास करेंगे ओर मैं जो काल्पनिक तस्वीर पेश कर रहा हुं। इससे महत्वपूर्ण सबक लेंगे।
      राजनीतिक हिंसा पर इस देश में अमल के कुल जमा नतीजे पर ही गौर कीजिए। जब भी हिंसा हुई है हमें भारी नुकसान हुआ है। यानि सैन्य खर्च बढ़ गया है, इसके बरअक्स हमें मिला क्या है? मोरले-मिंटो सुधार। मोंटेग्यू सुधार और ऐसे ही अन्य      सुधार। लेकिन ऐसे राजनेताओं का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है जो अब महसूसने लगे हैं कि ऐसे सुधार हम पर भारी आर्थिक बोझ लादकर थमाये गए झुंनझुने भर हैं। सही है कि कुछ मामूली सी रियायतें दी गयीं हैं। कुछ और हिंदुस्तानियों को सरकार में नौकरी मिल गयी थी लेकिन उस आवाम के ऊपर बोझ तो और बढ़ ही गया जिसके नाम और जिसके लिए हम आजादी चाहते हैं। बदले में कुछ मिला भी नहीं है। अगर हम इतना भर महसूस कर लें कि सच्ची आजादी हमें विदेशियों को आतंकित करने से नहीं बल्कि खुद डरना छोड़ने और गांव के लोगों को भी डरना छोड़ना सिखाने से मिलेगी तो हमे तत्काल मालूम पड़ जायेगा कि हिंसा का रास्ता हमारे लिए कितना घातक है।
      फिर खुद पर इसकी प्रतिक्रिया पर गौर कीजिये। विदेशी शासक के खिलाफ हिंसा का स्वाभाविक और आसान सा अगला कदम है, अपने ही लोगों के खिलाफ इसका इस्तेमाल करें जो हमें देश की तरक्की की राह में बाधक लगते हों। हिंसा का नतीजा अन्य देशों में क्या रहा है, उस पर गौर न भी करें और अहिंसा के दर्शन का हवाला न भी लें तो यह समझने के लिए हमें कोई बड़ी बौध्दिक कसरत करने की जरूरत नहीं है कि समाज को जुल्मों से मुक्त करने के लिए अगर हम हिंसा का सहारा लेते हैं जो हमारी तरक्की को बाधित कर रहे हैं तो हम और कुछ नहीं बल्कि अपनी मुश्किलों को ही बढ़ायेंगे और आजादी के दिन को और दूर धकेलेंगे।
      जिन्हें सुधार की जरूरत नहीं लगती और जो सुधरने को तैयार नहीं वे अपने खिलाफ हिंसा होता देख गुस्से से पागल हो जायेंगे और जवाबी हमला करने के लिए विदेशियों की मदद लेंगे। क्या हमने सब गुजरे कई सालों के दौरान अपनी आंखों के सामने होता नहीं देखा है जिसकी दर्दनाक यादें हमारे दिलो-दिमाग में अभी भी ताजा    हैं?
      अब इस दलील के सकारात्मक पहलू पर गौर करें। अहिंसा कांग्रेस की विचारधारा का हिस्सा 1920 में बनी। इसके बाद कांग्रेस में मानो जादुई बदलाव आया। अवाम जागृत हो उठा। कोई नहीं जानता यह कैसे हुआ। दूरदराज के गांव भी आलोड़ित हो उठे। ऐसा लगा मानो कि कई जुल्म मिट गए। लोगों को अपनी ताकत का एहसास हो गया, उन्हें सत्ता का खौफ नहीं रहा। अल्मोड़ा में बेगार की प्रथा खत्म हो गयी। देश के कई अन्य हिस्सों में भी ऐसा ही हुआ जहां लोग उस ताकत का एहसास करने लगे जो उनके भीतर छिपी थी। यह उनकी आजादी थी जो उन्होंने अपने बूते पर हासिल की थी। यह आवाम का सच्चा स्वराज था जो आवाम ने हासिल किया था।
      अहिंसा के बढ़ते कदमों को उन घटनाओं ने बीच में ही रोक दिया होता जिनकी परिणति चौरी चौरा में हुई, तो मुझे कोई शक नहीं कि आज हम स्वराज का पूरा सुखभोग रहे होते। इस बात से किसी ने भी इंकार नहीं किया। लेकिन कई लोग अविश्वास के साथ कहते रहे हैं कि 'लेकिन आप अवाम को अहिंसा नहीं सिखा सकते। यह व्यक्तिगत स्तर पर ही संभव है और वह भी विरले मामलों में।' मेरे ख्याल से यह खुद को भुलावे में रखना है। मनुष्य अगर आदतन अहिंसक नहीं होता तो वह खुद को कई युगों पहले ही बर्बाद कर चुका होता। लेकिन हिंसा और अहिंसा की ताकतों के बीच जद्दो-जहद में आखिरकार अहिंसा ही जीतती आई है। सच्चाई यह है कि हममें अब इतना धीरज ही नहीं रहा है कि हम इन्तजार करें और राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आवाम के बीच अहिंसा का प्रचार करने में खुद को दिलो जान से लगा दें।
      अब हम एक नये युग में प्रवेश कर रहे हैं। मुकम्मबल आजादी अब हमारा दूरगामी लक्ष्य नहीं बल्कि तात्कालिक लक्ष्य है। क्या यह बात स्पष्ट नहीं है कि अगर हमें करोड़ों-करोड़ लोगों के दिलों में आजादी की सच्ची भावना जगानी है तो ऐसा हमें अहिंसा के जरिये ही करना होगा और इसके लिए वह सब करना होगा जो जरूरी है? इतना ही काफी नहीं है कि गुप्त हिंसा के जरिये अंग्रेजों को आतंकित कर उन्हें यहां से भगा दें। यह हमें आजादी तक नहीं बल्कि घोर गड़बड़ी की ओर ले जायेगा।
      लोगों के दिलोदिमाग का आह्वान कर और अपने मतभेदों को सुलझाकर ही हम आजादी कायम कर सकते हैं। आपस में जैविक एकता विकसित कर ही कायम कर सकते हैं। अपना सविनय जन असहयोग आंदोलन हम उन लोगों को आतंकित कर या उन्हें खत्म कर नहीं चलाना चाहते जो हमें लगता है कि हमारे बढ़ते कदमों को बाधित करेंगे बल्कि उनके साथ धीरज और भद्रता के साथ पेश आकर और विरोधियों का मन बदलकर चलाना चाहते हैं। हर कोई कहता है कि यह तो अचूक इलाज है। हर कोई समझता है कि यहां 'सविनय' (सिविल) का मतलब है बिलकुल अहिंसक। और यह बात क्या अक्सर साबित नहीं हुई है कि सविनय जन अहसहयोग जन साधारण के स्तर पर अहिंसा और अनुशासन के बगैर नामुमकिन है ?
      और कुछ नहीं तो हमारे हालात की जरूरत उस सीमित किस्म की अहिंसा की मांग करते हैं जिसकी ओर मैंने इशारा किया है। इस बात का कायल होने के लिए हमें अपनी धार्मिक अवस्था का सहारा लेने की जरूरत तो नहीं है। इसलिए जो लोग विवेक से  परे नहीं हैं उन्हें इस ताजातरीन बम कांड जैसे नृशंस गतिविधियों को छिपे या खुले तौर पर समर्थन देना बंद कर देना चाहिये। इसके उलट उन्हें इन नृशंस कार्रवाहियों की खुलकर और तहेदिल से निंदा करनी चाहिये ताकि बहकावे में पड़े हमारे देशभक्तों की हिंसक भावनाओं को बढ़ावा न मिले। उन्हें हिंसा की निरर्थकता का एहसास हो और वे महसूस करें कि हिंसक कार्रवाही से हर बार कितना नुकसान पहुंचा है।





     




सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

नॉम चोमस्‍की को पेंटागन का सम्‍मान शांति‍ का अपमान है

यह दुनि‍या की वि‍लक्षण सामयि‍क घटना है कि‍ अमेरि‍की सैन्‍य संस्‍थान पेंटागन ने शांति‍ पुरूष नॉम चोमस्‍की को अपने सर्वोच्‍च सम्‍मान से नवाजा है। देखना है वह यह सम्‍मान लेते हैं या ठुकराते हैं। भारत में नागार्जुन के साथ ऐसी ही घटना हो चुकी है जब स्‍व.श्रीमतर इंदि‍रा गांधी ने नागार्जुन को पुरस्‍कार दि‍या था। नागार्जुन ने अपनी सारी जिंदगी श्रीमती गांधी के खि‍लाफ जमकर लि‍खा,जेपी आंदोलन में भी भाग लि‍या। इसके बावजूद उन्‍हें पुरस्‍कृत कि‍या गया। ठीक वैसा ही चोमस्‍की के साथ हुआ है। अमरीकी प्रशासन की वि‍देश नीति‍,घरेलू नीति‍यों और खासकर युद्धपंथी नीति‍यों के खि‍लाफ सारी दुनि‍या में शांति‍ का बि‍गुल बजाने वाले चोम्‍सकी को दुनि‍या के सबसे बर्बर सैन्‍य संस्‍थान पेंटागन ने सम्‍मान के लि‍ए आखि‍र क्‍यों चुना ? इसका अभी तक सटीक उत्‍तर नहीं मि‍ला है। स्‍वयं चोमस्‍की भी इस खबर को सुनकर गुस्‍से में बोल पडे कि‍ सर्वसत्‍तावादी सरकारें कई बार ऐसा करती हैं।
चोमस्‍की के अनुसार अमरीका आज जिस अवस्था में पहुँच चुका है उसमें जनतंत्र के साथ उसके अन्तर्विरोध पहले की तुलना में ज्यादा गहरे हुए हैं। पहले अमरीका में जनतंत्र की कम से कम शासकवर्ग के दोनों प्रधानदल वकालत किया करते थे, किंतु प्रथम मध्यपूर्व युध्द (1992-93)के बाद से  घरेलू स्तर पर इस प्रसंग में गिरावट आयी है। अमरीकी प्रशासन का नागरिकों के निजी जीवन में हस्तक्षेप बढ़ा है। प्रोपेगैण्डा के स्तर पर अमरीका के द्वारा जनतंत्र और जनतांत्रिक मूल्यों और संरचनाओं का अहर्निश प्रचार होता रहता है। जिन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और मंचों में अमरीका का प्रभुत्व है वहां पर भी इनका भोंपू की तरह प्रचार करता है और जनतंत्र के वाचिक शेर की तरह दहाड़ता है। किंतु व्यवहार में जब कोई देश अपने यहां जनतंत्र स्थापित करने की कोशिश करता है तो उसमें अमरीकी प्रशासन अडंगे लगाता है उन ताकतों को समर्थन देता है जो जनतंत्र और सुधारों के विरोधी हैं। अतिराष्ट्रवादी ,प्रतिक्रियावादी,सैन्यवादी,फासिस्ट और पृथकतावादी तत्वों को राजनीतिक समर्थन देता रहा है। जनतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को गिराने के लिए राजनीतिक और सैन्य हस्तक्षेप करता रहा है।
           चोम्स्की के अनुसार अमरीकी प्रशासन की ऐसी सरकार बनाने में दिलचस्पी है जिसकी घरेलू और विदेशी पूंजी निवेश के प्रति वचनबध्दता हो। एक्सपोर्ट के लिए उत्पादन करने में ध्यान दे और मुनाफा कमाकर देश के बाहर ले जाने में मदद करे। चोम्स्की के अनुसार अमरीका के इस लक्ष्य को कभी चुनौती नहीं दी गयी। उल्‍लेखनीय है यह नीति अमरीका के गुप्त सरकारी दस्तावेजों में मौजूद है, जिसका पहलीबार चोम्स्की ने ही रहस्योद्धाटन किया था। अमरीकी नीतिनिर्धारक इन्हीं लक्ष्यों के आधार पर सारी दुनिया को सोचने और आचरण करने के लिए बाध्य करते हैं।
अमरीकी नीति का लक्ष्य है जनतंत्र और सामाजिक सुधारों का विरोध करना। अमरीकी प्रशासन के अनुसार उत्पीडित देशों में जनतंत्र और सामाजिक सामाजिक सुधार कभी भी जनप्रिय नहीं रहे हैं। उत्पीड़ित देशों में जनतंत्र और सामाजिक सुधारों के पक्ष में बोलने और आन्दोलन करने वाले ज्यादा लोग नजर ही नहीं आएंगे। आमतौर पर बहुत छोटा सामाजिक तबका ही इनके पक्ष में दिखाई देगा। अमरीकी नीति की सम्पूर्ण निर्भरता सेना पर है। वह ऐसे संगठनों के साथ मोर्चा बनाना पसंद करता रहा है जो सैन्यवादी हों, फौजी हों। अमरीकी प्रशासन ऐसे सभी किस्म के गुटों के सफाए के लिए काम करता रहा है जो अमरीका विरोधी प्रचार अभियान में संलग्न रहते हैं। वे ऐसे किसी भी स्थानीय अथवा जातीय प्रतिरोधी ग्रुप को भरने नहीं देते जो अमरीकी प्रशासन के हाथ के बाहर चला जाए। यदि ऐसा होता है तो उसका सफाया कर दिया जाता है अथवा हाशिए पर पहुँचा दिया जाता है।
    चोमस्‍की के अनुसार अमरीकी प्रशासन की नीति‍ है  जनतांत्रिक ढंग़ से चुनी गई सरकारों को गिराना, इसके लिए जरूरी हो तो खून-खराबा भी करना। खून-खराबे में मारे गए अथवा उत्पीड़ित गरीबों के लिए आर्थिक और अन्य किस्म की मदद पहुँचाना। आर्थिक मदद के काम में अमूमन बहुराष्ट्रीय  कंपनियों की मदद ली जाती है। तीसरी दुनिया के देशों में चोम्स्की के अनुसार अमरीकी नीति है '' थोड़ा पालन और नकली प्रेम का प्रदर्शन।''  अमरीका ने लगातार ऐसे जनतंत्र का विरोध किया है जिसके परिणामों पर उसका नियंत्रण न हो। जनतंत्र की बिडम्बना यह है कि उसके जरिए आने वाली सरकार अमरीकी निवेशकों की बनिस्पत अपने देश की जनता की जरूरतों के प्रति जबावदेह होती है, जनता की जरूरतों के प्रति राय जाहिर करती है। चोम्स्की ने लंदन स्थित रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के एक अनुसंधान का जिक्र किया है। जिसके अनुसार अमरीका जनतंत्र के प्रति रश्म-अदायगी करता रहा है।
चोम्स्की ने अमरीकी हस्तक्षेप की पध्दति के बारे में लिखा अमरीकी उत्पीडन की सामान्य पध्दति वही है जिसे कोंट्रा विद्रोहियों ने निकारागुआ में लागू किया था। अथवा अलसल्वाडोर या ग्वाटेमाला में अप्रत्यक्ष ढंग से आतंकी गिरोहों की मदद के जरिए लागू किया गया, इन ग्रुपों के हिंसाचार का लक्ष्य होता है साधारण लोगों की हत्या करना, बर्बर हिंसाचार, परपीडक आनंददायी पिटायी, पहाडों से बच्चों को फेंक देना, औरतों को फांसी लगाकर मार देना, उनके स्तन काट लेना, उनकी चमड़ी उधेड़ देना, चेहरे की चमड़ी को नष्ट कर देना जिससे होने वाले खूनी रिसाव के कारण उनका मौत हो जाती थी, साधारण लोगों के हाथ,पैर अथवा सिर अलग कर देना। अमरीका नीति का लक्ष्य है स्वतंत्र राष्ट्रवाद की हत्या करना और इसके लिए संघर्षरत ताकतों को कुचलना।
  हमें सोचना चाहि‍ए क्‍या अमरीकी प्रशासन के बारे में इतनी कटु राय रखने पर भी चोमस्‍की को यह सम्‍मान लेना चाहि‍ए ?
     








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