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मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोटबंदी पर जनमत एप का मोदी पाखण्ड -

         पी एम नरेन्द्र मोदी संसद में किसी हॉल में बैठकर भाजपा सांसदों को सम्बोधित कर सकते हैं,संसद शुरू होने के बाद वे दो बार उनको सम्बोधित कर चुके हैं लेकिन वहीं पास में संसद के सदन में आकर भाषण देने में क्यों डर रहे हैं ?
वे संसद की बिल्डिंग में जा रहे हैं लेकिन सदन में नहीं जा रहे,सदन से वे कन्नी क्यों काट रहे हैं ? उनसे क्या कोई संवैधानिक चूक हुई है ?जी हां,हमने फेसबुक पर जितने भी मसले संवैधानिक उल्लंघन के रेखांकित किए थे आज वे सभी मुद्दे विपक्ष भी उठा रहा है।
मोदीजी सदन में बोलते हैं तो वे अपने बयान की संवैधानिक पुष्टि के लिए मजबूर होंगे,दिलचस्प बात है मोदी मंत्रीमंडल के सभी लोग संसद में बोलने को तैयार हैं एकमात्र मोदी बोलना नहीं चाहते,क्योंकि वे अपने को संवैधानिक जवाबदेही से बाहर रखना चाहते हैं।
मसलन्, संसद में यदि वे कहते हैं कि मैंने नोट बंदी का फैसला लिया तो यह संवैधानिक बयान होगा जो सीधे संविधान के उल्लंघन के दायरे में आता है मोदीजी को नोट बंदी का फैसला लेने का हक नहीं है,यदि वे कहते हैं मंत्रीमंडल ने फैसला लिया तो यह कहना भी असंवैधानिक होगा।यही बुनियादी वजह है कि वे संसद से बाहर बोल रहे हैं,संसद के बाहर उनके बोलने का कोई संवैधानिक मूल्य नहीं है।
जो खबरें सामने आई हैं वे ये हैं कि मोदीजी ने नोट बंदी के लिए सभी संवैधानिक नियमों और संस्थाओं को अमान्य या दरकिनार करके नोटबंदी का फैसला लिया है,वे मीडिया और सोशलमीडिया के जरिए आम जनता की राय को मेनीपुलेट करना चाहते हैं।यही वजह है कि आज उन्होंने एक एप के जरिए नोटबंदी से जुड़े 10 सवालों पर राय जानने की कोशिश की है,पीएम की ओर से जो दस सवाल नागरिकों से पूछे गए हैं,वे सवाल गलत हैं और उन सवालों को जिस क्रम से रखा गया है उनके उत्तर पहले से ही तय हैं।
कायदे से नोटबंदी को लेकर पहले सभी आधिकारिक सूचनाएं जनता को दी जाएं और फिर सवाल किए जाएं तो कुछ हद तक संतुलित राय मिलेगी।
मसलन् ,पहले जनता को यह बताया जाए कि नोटों पर पाबंदी लगाने का संवैधानिक अधिकार किस संस्था को है ,हमारे देश में अधिकतर लोग नहीं जानते,कम से कम पीएम को नोटबंदी के फैसले लेने का संवैधानिक हक नहीं है,यह रिजर्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में आता है।
दूसरी बात यह कि रिजर्व बैंक ने यह फैसला कब लिया ,क्या यह फैसला कुछ मिनटों या घंटों में लिया यदि हां तो इस तरह का गंभीर फैसला लेने के लिए बैंक के मुखिया पर किसने दवाब डाला,नोटबंदी का फैसला सबसे बड़ा फैसला है,यह हठात नहीं लिया जा सकता।यह ऐसा फैसला है जिससे देश का हर नागरिक प्रभावित हुआ है और परेशान है,उसके संवैधानिक हक पर इस फैसले के जरिए हमला बोला गया है,बेहतर यही होगा कि रिजर्व बैंक सभी तथ्यों को आम जनता के सामने रखे।जनता को नोट बंदी से जुड़े सभी तथ्यों की जानकारी देने के बाद ही पीएम को इस फैसले पर जनमत की राय लेनी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि मीडिया तक को नहीं मालूम कि किसने फैसला लिया और क्यों फैसला लिया,मीडिया एकतरफा ढ़ंग से नोटबंदी के पक्ष में प्रचार कर रहा है और उसी भाषा में प्रचार कर रहा है जिस भाषा में 8नवम्बर2016 को आठ बजे मोदीजी बोले थे।इस तरह नियोजित प्रचार और सूचनाओं के अभाव के आधार पर कोई भी जनमत की राय एकसिरे अवैज्ञानिक और निराधार ही कही जाएगी।सूचनाओं के पर्याप्त प्रचार-प्रसार के बाद ही जनमत की राय ली जानी चाहिए।
इस प्रसंग में दूसरी बात यह कि मोदीजी को हठात् जनमत के समर्थन की जरूरत क्यों है ? वे तो मानकर चल रहे हैं कि उनके साथ सारा देश खड़ा है,वे सही कर रहे हैं,जनता खुश है,बस जरा सी तकलीफ है,सब कुछ यदि पचास दिन तक ऐसे ही चलता रहा तो मोदीजी किला फतह कर लेंगे।
जनमत की राय का एप जारी करके मोदीजी ने यह साफ संकेत दे दिया है कि आम जनता और खासकर भाजपा के सांसदों-विधायकों में एक अच्छा-खासा हिस्सा उनके पक्ष में नहीं है,इसलिए उन पर दवाब पैदा करने के लिए मोदीजी ने एप के जरिए जनमत की राय का औजार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
दूसरा ,वे विपक्ष के खिलाफ प्रचार अभियान के अंग के रूप में इस एप को लेकर आए हैं,इसके सवालों में यह बात निहित है।
दिलचस्प बात यह है कि नोट बंदी पर रिजर्व बैंक के हक पर हमला बोला गया,संसद के हक पर हमला बोला गया,मीडिया-सोशलमीडिया के जरिए आम जनता के दिमाग पर हमले चल रहे हैं,अब एप के जरिए बमबर्षा की जाएगी।

शनिवार, 31 अगस्त 2013

मनमोहन नीतियों का उल्टा खेल

भारत की अर्थव्यवस्था में अनेक समस्याएं हैं, विश्वमंदी का असर है, औद्योगिक उत्पादन कम हुआ है, भ्रष्टाचार चरम पर है,रूपया लुढ़क रहा है।बेकारी और मंहगाई है, इसके बाबजूद हालात बहुत खराब नहीं हैं। बैंकों में पर्याप्त पैसा है। सरकारी कर्मचारियों को नियमित पगार मिल रही है। संकट के बाबजूद साढ़े चार फीसदी विकास दर बनी हुई है। निवेश का माहौल भी है। कोई बैंक दिवालिया नहीं हुई है। 
जीवन की गति और विकास की गति में द्वंद्व और तनाव है लेकिन विकास धीमी गति से जारी है। इस स्थिति का श्रेय नेहरूयुगीन नीतियों के द्वारा निर्मित ठोस आर्थिक आधार को जाता है। मनमोहन सिंह के अनेक प्रयासों के बाबजूद बैंकिंग प्रणाली से लेकर अन्य क्षेत्रों में नियमों की विदाई नहीं की गयी और इसमें मजदूरों-किसानों के संगठनों खासकर वामदलों और कांग्रेस के अंदर सक्रिय नेहरूपंथियों की भी भूमिका रही है।
नव्य उदारवादियों की मांग थी कि अर्थव्यवस्था की सारी खिड़कियां खोल दो।यह मांग वामदलों ने कभी नहीं मानी और कहा था सारी खिड़कियां मत खोलो वरना ग्लोबल हवा में वह जाओगे वैसे भी जितनी खिड़कियां खोल रहे हो उससे भी प्रदूषित हवा ही आएगी और अब यह धारणा सही साबित हुई है।
कल मनमोहन सिंह संसद में मैन्यूफैक्चरिंग पर जोर दे रहे थे, ये ही साहब विगत बीस सालों से सेवाक्षेत्र पर जोर दे रहे थे। कल मनमोहन सिंह सादगी और कम खर्चे की बात कर रहे थे बीस सालों से खूब खर्च करो,बचत कम और खर्चे ज्यादा करो ,का नीतियों के तहत सुझाव दे रहे थे।
उपभोक्तावाद को बेलगाम हवा देने में मनमोहन सिंह की अक्षम्य भूमिका रही है। उनकी नीतियों ने सादगी को समाज में घृणा की चीज बना दिया है। अमीरी और शानोशौकत को आदर्श जीवन शैली बना दिया है। इसका ही दुष्परिणाम है कि आज मनमोहन सिंह कह रहे हैं सोना मत खरीदो। कांग्रेस को मनमोहन सिंह की नीतियों का उपभोक्तावादी और उपभोगवादी पैराडाइम बदलने के प्रयास करने चाहिए। मनमोहन सिंह और आनंद शर्मा ने विपक्ष और न्यायालयों को विकास का शत्रु या बाधक कहा है। असल में अवरूद्ध विकास तो मनमोहन सिंह की नीतियों में ही है। इनलोगों ने उत्पादक शक्तियों और बुनियादी उद्योगों के निर्माण पर कम जोर दिया और सेवाक्षेत्र पर ज्यादा जोर दिया। असंतुलित परिणाम सामने हैं। मनमोहन सिंह से पूछा जाए कि उनके विगत 9साल के शासन में केन्द्र सरकार ने कितने बड़े बुनियादी क्षेत्र में उद्योग स्थापित किए और जिन कारपोरेट घरानों के वे छूट और सहायता देते रहे हैं उनके द्वारा कितने बड़े उद्योग स्थापित किए गए ? मनमोहन सिंह से सवाल है कि उन्होंने क्या भिलाई जैसा कोई कारखाना स्थापित किया ? क्या दूरसंचार जैसा महान नेटवर्क स्थापित किया ? जी नहीं उल्टे दूरसंचार को निजीक्षेत्र को सौंप दिया ,मनमोहन सरकार को संचित पूंजी को खाने वाली सरकार कहा जा सकता है।

रविवार, 3 मार्च 2013

चुनावी पापुलिज्म की आम बजट से विदाई


       

      एक जमाना था केन्द्रीय बजट के आने के पहले आमलोगों में उत्सुकता होती थी ,आम आदमी मन लगाकर रेडियो –टीवी पर सुनता-देखता  था कि केन्द्र सरकार के आमबजट में नया क्या आनेवाला है ?  लेकिन इनदिनों बजट को लेकर जिज्ञासा एकसिरे से खत्म हो गयी है।मीडिया का भी वित्तमंत्री पर कोई दबाब नजर नहीं आया।  
     आमबजट को लेकर सांसदों से लेकर आम आदमी तक बढ़ते बेगानेपन ने एक नए किस्म के आर्थिक अज्ञान को बढ़ावा दिया है। कायदे से संचारक्रांति के दौर में बजट की सूचनाओं का विवेचन ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है। आम बजट आज सबसे ज्यादा रहस्यमय दस्तावेज है और इस रहस्य को कारपोरेट मीडिया ने जमकर बढ़ावा दिया है।
वित्तमंत्री पी.चिदम्बरम् ने जब पिछले सप्ताह सन् 2013-14 का आमबजट पेश किया तो उन्होंने पहला अच्छा काम यह किया है कि बजट को चुनावी राजनीति से पृथक् कर दिया है। पहले बजट में चुनावी प्रलोभन हुआ करते थे लेकिन इसबार के बजट में कोई आर्थिक प्रलोभन नहीं हैं।
यह मनमोहन सरकार का आखिरी बजट है। बजट को चुनावी राजनीति से अलग करने का अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था को पापुलिज्म से अलग करना। इससे यह भी संकेत मिलता है कि आगामी चुनाव में कॉग्रेस कोई पापुलिज्म का नारा और योजनाएं उछालने नहीं जा रही है ।इसका एक अन्य आयाम यह भी है मीडिया प्रौपेगैण्डा के जरिए मौजूदा विकास योजनाओं की उपलब्धियों को आने वाले समय में खूब उछाला जाएगा।
   सन् 2013-14 के आमबजट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इससे मंदी से लड़ने में कोई बड़ी मदद नहीं मिलेगी। इसका प्रधान कारण यह है कि केन्द्र सरकार के पास बजटघाटा कम करने के वैज्ञानिक विकल्पों का अभाव है। बजटघाटा 5,20,925 करोड़ रूपये का है।  जबकि लक्ष्य था 5,73,630करोड़ रूपये। यानी केन्द्र सरकार सारी कोशिशों के बावजूज बजटघाटा कम करने का लक्ष्य हासिल नहीं कर पायी है। मनमोहन सरकार के बजटघाटे के लक्ष्य को हासिल न कर पाने के पीछे प्रधान कारण है अमीरों को दी गई आर्थिक सुविधाएं। जबकि केन्द्र सरकार ने आम आदमी को मिलने वाली सब्सीडी में कटौती की है। पिछले साल के बजट की तुलना में इस साल 4फीसदी की कटौती की गयी है।
  सन् 2013-14 के आम बजट में चमड़े से बनी चीजें और सिलेसिलाए कपड़े सस्ते होने की संभावना है वहीं दो हजार से ज्यादा की कीमत के मोबाइल फोन महंगे हो जाएंगे। इसके अलावा वातानुकूलित रेस्टोरैंट में खाना महंगा होगा।
  एक करोड़ रूपये से ज्यादा आमदनी वाले 42,800 लोगों पर 10 फीसदी अधिभार लगाने की घोषणा की है जो इस इन धनियों के लिए कोई खास मायने नहीं रखता। इससे इसवर्ग के लोगों में कम आमदनी दिखाने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। महिलाओं के विकास के लिए महिला बैंक खोलने का बजट में प्रस्ताव पेश किया गया और इसके लिए आरंभिक पूँजी के तौर पर एक हजार करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। इस बैंक की परिकल्पना आंध्र में राज्य सरकार द्वारा संचालित श्रीनिधि बैंक से ली गयी है। महिला बैंक को रिजर्व बैंक के दिशा निर्देशों से मुक्त रखा गया है ,इस बैंक को सार्वजनिक क्षेत्र में खोला जाएगा और इसके लिए अलग से कानून भी बनाया जाएगा।
    इसी तरह छोटे शहरों में अपना पहला मकान खरीदने का सपना देख रहे लोगों को वित्त मंत्री ने ब्याज पर छूट का तोहफा दिया है। वित्त मंत्री ने कहा कि 40 लाख रुपये मूल्य तक के मकान खरीदने वालों को ब्याज पर मिलेगी अतिरिक्त 1 लाख रुपये की छूट मिलेगी। सरकार की शर्त के मुताबिक 25 लाख रुपये के आवास ऋण पर पहली बार घर खरीदने वालों को ही कर छूट मिलेगी। इसके अलावा यह प्रावधान बेहद छोटी अवधि के लिए किया गया है और अप्रैल 2013 से मार्च 2014 तक मकान खरीदने वालों को ही यह छूट प्राप्त होगी। 2 से 5 लाख के स्लैब में आने वालों को अब 2,000 रुपये का टैक्स क्रेडिट मिलेगा।
     आमआदमी का उपभोगखर्चा विगत 3सालों से 8फीसदी चला आ रहा है उसमें इस साल मात्र 4फीसदी इजाफा हुआ है। लेकिन इससे महंगाई पर अंकुश लगाने में सफलता नहीं मिली है। पिछले साल की तुलना में सब्सीडी कम हुई है। खाद्य सब्सीडी का मनमोहन सरकार खूब हल्ला मचाती रही है लेकिन इसबार के बजट में खाद्य सब्सीडी में पिछले साल की तुलना में पांच हजारकरोड़ रूपयों की कटौती की गयी है। जबकि वित्तमंत्री ने फूड़ सब्सीडी के लिए 10हजार करोड़ रूपये अतिरिक्त देने की बात कही है। लेकिन वास्तव अर्थ में फूड़सब्सीडी में पिछले साल की तुलना में इस साल 5हजार करोड़ रूपये की कटौती की गयी है। साथ ही पिछले साल की तुलना में इस साल तेल और पेट्रोलियम पदार्थों की सब्सीडी में तीस हजार करोड़ रूपये की कटौती की गयी है। संशोधित आंकड़े ज्यादा ही होंगे।
    मनरेगा योजना के मद में पिछले साल की तुलना में कोई बढोत्तरी नहीं हुई है। जबकि गांवों से लेकर शहरों तक बेकारी में इजाफा हुआ और आर्थिकमंदी चरम पर है।ऐसी दशा में मनरेगा के लिए अतिरिक्त राशि आवंटित करने की जरूरत थी। दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र की पचास हजार करोड़ रूपये की संपदा के विनियमन का प्रस्ताव रखा गया है। यानी मनरेगा आदि के लिए धन केन्द्र सरकार सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में बेचकर जुगाड़ करेगी।
   इस साल के बजट में पिछले साल की तुलना में शिक्षामद में आवंटित राशि में भी गिरावट आई है। स्वास्थ्य और चिकित्सा के मद में जरूरत से बहुत कम धनराशि आवंटित की गयी है। इसी तरह सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में ग्रामीण विकास के लिए आवंटित राशि कम रखी गयी। आदिवासियों के विकास के चिदम्बरम ने जो धनराशि आवंटित की है वह संवैधानिक नियमों के अनुसार आवंटित धनराशि से कम है। इससाल आदिवासियों के लिए 20900 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं जो संवैधानिक नियमों के अनुसार तयशुदा आनुपातिक आवंटन से कम है।यही दशा अनुसूचित जाति के लिए आवंटित राशि की है वहां पर भी संवैधानिक नियमों का उल्लंघन करते हुए 50फीसदी कम राशि (47000 हजार करोड़) आवंटित की गयी है।


रविवार, 24 फ़रवरी 2013

आर्थिकमंदी में फंसी मनमोहन सरकार की मुश्किलें



      राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने संसद का बजटसत्र आरंभ होने पर अपना जो अभिभाषण पढ़ा है वह नई उम्मीदों की बात करता है। भारतीय राजनीति की बिडम्बना है कि राष्ट्रपति के भाषण को हमारे नेता-सांसद और अन्य जागरूक लोग ध्यान से नहीं पढ़ते। असल में राष्ट्रपति का अभिभाषण तो मनमोहन सरकार की नीतियों का आधिकारिक बयान है इस बयान में कई नए सवालों और संभावनाओं को पेश किया गया है। इस भाषण में आगामी लोकसभा चुनाव का पापुलिज्म झलक मार रहा है। आने वाले 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार और खासकर कांग्रेस किस-किस क्षेत्र के मतदाताओं की ओर नजर गढ़ाए है और किनकी ओर भविष्य में देख रही है इसकी झलक देखी जा सकती है। यह भी सच है कि मनमोहन सरकार अकल्पनीय भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी होने के बावजूद कई मामलों में कुछ मूल्यवान काम कर बैठी है। विपक्ष की सारी रणनीति इस पर टिकी है कि किसी तरह मनमोहन सरकार को अपनी उपलब्धियां प्रचारित न करने दिया और उस पर दनादन हमले जारी रहें।
    प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का पहला विश्वव्यापी असर यह हुआ है कि आज विकसित पूंजीवादी मुल्कों के राज्याध्यक्ष हमारे देश में पूंजीनिवेश का अनुरोध करने आ रहे हैं। वे चाहते हैं कि भारत के पूंजीपति उनके देश में जाकर निवेश करें और वहां के लोगों को रोजगार दें।
    एक जमाना था कि भारत का प्रधानमंत्री विदेश जाता था और विकसित देशों से अपील करता था कि आपलोग भारत आएं और पूंजी निवेश करें।लेकिन इन दिनों उलटा हो रहा है। अमेरिका,फ्रांस,ब्रिटेन,जर्मनी आदि विकसित देशों से लेकर तीसरी दुनिया के देशों खासकर अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्ष भारत से मदद मांग रहे हैं । यह बहुत बड़ा परिवर्तन है। पंडित नेहरू के शासनकाल  में विदेशनीति में सब हमारी ओर टकटकी लगाए देखते थे आज उद्योग-धंधों के लिए भारत से मदद मांग रहे हैं।इससे भारत की आर्थिक शक्ति का अंदाजा लगता है। यही वो परिदृश्य है जिसको ध्यान में रखकर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने  कहा 'एक महत्वाकांक्षी भारत का उदय हो रहा है, एक ऐसा भारत जहां अधिक अवसर, अधिक विकल्प, बेहतर आधारभूत संरचना तथा अधिक संरक्षा एवं सुरक्षा होगी। हमारे युवा जो हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय धरोहर हैं, आत्मविश्वास और साहस से परिपूर्ण हैं। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि इनका जोश, इनकी ऊर्जा और इनका उद्यम भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।'
   सपनों को देखना और उनको साकार करना भी एक राजनीतिक उपलब्धि है। मसलन् अल्पसंख्यकों की उन्नति के सवाल को ही लें और मनमोहन सरकार के रिकॉर्ड को देखें कि तथ्य और सत्य क्या है ? यह सच है कि कांग्रेस के शासनकाल में अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा अभाव में रहे हैं और सामाजिक विकास की दौड़ में एकदम पिछड़ गए थे जिसकी ओर सच्चर कमीशन ने ध्यान खींचा था। लेकिन इस रिपोर्ट के आने के बाद अल्पसंख्यकों के विकास के लिए केन्द्र सरकार ने जो 15सूत्री कार्यक्रम सारे देश में लागू किया उसके अभीप्सित परिणाम सामने आने लगे हैं। बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यकों के बच्चे पढ़ने जाने लगे हैं और उनमें नई उम्मीदें जगी हैं।
अल्पसंख्यक समुदायों का शैक्षिक सशक्तीकरण सुनिश्चित करने के लिए तीन छात्रवृत्ति स्कीमों का कार्यान्वयन किया गया है  और प्रत्येक स्कीम में 30 प्रतिशत निधि छात्राओं के लिए निर्धारित की गई है। वर्ष 2012-13 में 31 दिसंबर तक 55 लाख से अधिक विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति के रूप में लगभग  880 करोड़ रूपये की राशि का वितरण किया जा चुका है। अल्पसंख्यक समुदायों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के लिए मौलाना आजाद राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना के तहत 66 करोड़ की राशि दे दी गई है। 15 सूत्री कार्यक्रम के तहत वर्ष 2012-13 के दौरान दिनांक 30.09.2012 तक राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों को ` 1,71,960 करोड़ प्राथमिकता क्षेत्र ऋण दिया गया, जो कि कुल प्राथमिकता क्षेत्र ऋण के 15 प्रतिशत से अधिक है।
इसी तरह अनुसूचित जाति के कक्षा IX और X में पढ़ने वाले छात्रों के लिए केन्द्र प्रायोजित छात्रवृत्ति योजना शुरू की गई है, जिससे लगभग 40 लाख छात्रों को लाभ पहुँचा है।  
 ग्रामीण वोटरों का दिल जीतने के लिए राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत एक लाख से अधिक ऐसे गांवों में बिजली पहुंचाई गई, जहां अभी तक बिजली नहीं थी, लगभग 2,85,000 गांवों को सघन रूप से बिजली दी गई है और गरीबी रेखा से नीचे के 2 करोड़ से अधिक परिवारों को नि:शुल्क बिजली कनेक्शन दिए गए हैं।
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के अभिभाषण का सबसे कमजोर हिस्सा अर्थव्यवस्था को लेकर था। मनमोहन सरकार के पास अर्थव्यवस्था को चंगा करने का कोई प्रभावी फार्मूला लागू करने में विगत 4सालों में सफलता नहीं मिली है।  चालू वित्त वर्ष की प्रथम छमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वास्तविक वृद्धि दर 5.4 प्रतिशत रही। यह पिछले दशक के लगभग 8 प्रतिशत वार्षिक विकास औसत दर से काफी कम है। यह सच है कि मंदी से निकलने का कोई फार्मूला किसी के पास नहीं है लेकिन मनमोहन सरकार को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। वर्चुअल और मैन्यूफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने की बजाय औद्योगिक उत्पादन बढ़ने और नए उद्योग खोलने पर जोर देना होगा। कायदे से देश के विभिन्न इलाकों में प्राथमिकता के अनुसार बड़ी क्षमता वाले उद्योग खोले जाने चाहिए। सिर्फ मैन्यूफैक्चरिंग के जरिए मंदी और आर्थिक संकट से नहीं निकला जा सकता। साथ ही उन नीतियों को भी बदलने की जरूरत है जिनके कारण नए रोजगार पैदा करने में बाधाएं आ रही हैं। आज स्थिति बदतर है राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 5.3 प्रतिशत के बराबर हो गया है। इसका अर्थ यह है कि मनमोहन सरकार ने कमाई कम की है,निवेश भी कम किया है और खर्चे ज्यादा किए हैं। रोजगारोन्मुख उद्योग –धंधों को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए बिना मंदी के संकट से निकलना संभव नहीं है । साथ ही कृषिक्षेत्र में व्याप्त अराजकता की समस्याओं पर भी मनमोहन सरकार को ध्यान देना होगा। किसानों की सब्सीड़ी में कटौती बंद की जानी चाहिए। कृषिक्षेत्र को और भी शक्तिशाली बनाने की जरूरत है इसके लिए उनकी सब्सीड़ी में इजाफा किया जाना चाहिए। किसानों की सब्सीड़ी ऐसे समय में काटी जा रही है जब वे उत्पादन बढ़ा रहे हैं। कृषिक्षेत्र में  11वीं योजना में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में विकास दर, 10वीं योजना के 2.4 प्रतिशत की तुलना में 3.7 प्रतिशत रही। इसके अलावा मनमोहन सरकार को संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्याओं की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। हाल ही में 2दिवसीय राष्ट्रीय हड़ताल के संदेश को केन्द्र सरकार को गंभीरता से लेना होगा और मजदूरों से संबंधित मांगों और कानूनों को सख्ती से लागू करने की दिशा में प्रयास करने होंगे वरना सन्  2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का गणित गड़बड़ा सकता है।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

इंफोसिस परेशान है ममता सरकार की दिशाहीन नीतियों से

       हाल ही में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ब्लूमवर्ग मार्केट मैगजीन ने दुनिया में आर्थिक क्षेत्र में प्रभावशाली 50 नेताओं में स्थान दिया है और लिखा है कि भारत में केन्द्र सरकार की नीतियों को प्रभावित करने वाली वह ताकतवर नेत्री है। बिडम्बना यह है कि यही ताकतवर नेत्री राज्य के लिए औद्योगिक घरानों को आकर्षित करने में असमर्थ रही है। बल्कि यह कहें तो ज्यादा सही होगा कि आज ममता सरकार की नीतिहीनता सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आई है। ममता बनर्जी के आने केबाद औद्योगिक विकास एकदम बंद हो गया है।पश्चिम बंगाल के औद्योगिक दुर्दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहे।

हाल की घटनाएं बताती हैं कि ममता सरकार जिस तरह काम कर रही है उससे औद्योगिक समस्याएं हल होने की बजाय उलझती जा रही हैं। मंत्रियों से लेकर नौकरशाह तक सभी को नीतिगत दिशाहीनता ने असहाय बनाकर रख दिया है।मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जब शासन संभाला था आमलोगों में उनको लेकर जबर्दस्त उत्साह था और यह उम्मीद भी जगी थी कि वे कुछ बेहतर और नया करेंगी लेकिन उद्योगपतियों से लेकर राजनेताओं तक,साधारण ग्रामवासी लेकर फैक्ट्री मजदूर तक सबको निराशा हाथ लगी है।

विगत डेढ़ साल में ममता सरकार की साख में गिरावट आई है। इस गिरावट के दो बड़े कारण हैं ,पहला , विगत वाममोर्चा सरकार की सही नीतियों की बजाय गलत नीतियों का अनुसरण करना ।दूसरा ,केन्द्र सरकार की नीतियों के प्रति नकारात्मक नजरिया। इन दोनों कारणों की वजह से आज ममता सरकार देश सबसे निष्क्रिय राज्य सरकार के नाम से जानी जाती है। आमलोग इसे खोखली घोषणाओं और जलसों की सरकार कहते हैं।

यही वह परिदृश्य है जिसमें राज्य के उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी ने विगत सप्ताह इंफोसिस के मुख्यालय जाकर इस कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की। राजनीतिक हलकों में इस बैठक को लेकर कई तरह के सवाल उठे हैं। पहला सवाल यह उठा है कि आखिर राज्य के उद्योगमंत्री को एक कंपनी के मुख्यालय जाने की क्या जरूरत थी ?यदि बात ही करनी थी तो वे अपने कोलकाता स्थित दफ्तर में कंपनी के अधिकारियों को बुलाकर बात कर सकते थे। दूसरा सवाल इंफोसिस के मालिक ने उनसे मुलाकात क्यों नहीं की ?तीसरा सवाल पार्थ चटर्जी ने ऐसा नया क्या प्रस्ताव पेश किया जिसको कंपनी ने नहीं माना ।

यह सवाल भी उठा है कि उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कंपनी को दिए अपने नए सुझावों को पत्रकारों को क्यों नहीं बताया ? उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी जिस तैयारी और भरोसे के साथ इंफोसिस अधिकारियों के पास गए थे उससे उनकी असफलता सामने आई है और इसके कारण देर-सबेर उनकी कुर्सी जाने का खतरा है। उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी के नए प्रस्तावों को कंपनी ने एकसिरे से खारिज कर दिया है और साथ ही राज्य सरकार के रूख की तीखी आलोचना की, उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी के बार बार तर्क किए जाने पर भी उन्होंने इंफोसिस के दूसरे कैम्पस को खोलने के बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। इंफोसिस के अधिकारियों ने उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी से दो-टूक शब्दों में कहा बताते हैं कि राज्य सरकार का यही रवैय्या रहा तो वे दूसरा कैम्पस चालू नहीं कर पाएंगे और वापस चले जाएंगे । अधिकारियों ने नाराजगी जताई है कि उनके द्वारा खरीदी गयी जमीन के पूरे दाम का भुगतान कर दिए जाने के बाद भी मालिकाने के कागजात कम्पलीट होकर उनके पास नहीं आए हैं। कंपनी चाहती है कि उनके मालिकाने के कागज जल्दी दिलवाए जाएं अन्यथा उनका जमा पैसा ब्याज सहित वापस दिलवाया जाय।उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी के पास उनकी मांगों के बारे में कोई सटीक उत्तर नहीं था।

उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने इंफोसिस के अधिकारियों से अपील की कि वे कुछ समय और दें और राज्य सरकार और कंपनी के अधिकारी मिलकर दिल्ली जाएं और नए विकल्पों की खोज करें।यही वजह है कि इंफोसिस के मुख्यालय से बाहर निकलकर उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने एक सामान्य सा बयान दिया कि इंफोसिस के अधिकारियों ने राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करने का वायदा किया है। सच यह हैकि उन्होंने कोई वायदा नहीं किया बल्कि यह कहा है कि उनके औद्योगिक प्रस्ताव को मानो तो काम करेंगे वरना चले जाएंगे इस पर उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा था कुछ समय और दो और वे इसके लिए राजी हो गए।

उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने इंफोसिस की समस्याओं के समाधान के लिए दिल्ली जाने और केन्द्रीय वित्त और उद्योग मंत्रालय के अधिकारियों से मिलने का सुझाव रखा जिसे इंफोसिस ने मान लिया। जानकार सूत्रों का कहना है कि इंफोसिस के अधिकारी आगामी दिल्ली यात्रा को लेकर किसी नयी आशा की संभावनाएं नहीं देख रहे हैं। इसका प्रधान कारण ममता बनर्जी का केन्द्र सरकार के नीतिगत सुधारों में अडंगा डालनेवाला रवैय्या। मनमोहन सरकार का सभी मंत्रालयों को अप्रत्यक्ष निर्देश है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की अनुमति के बिना ममता सरकार के किसी भी प्रस्तावित पर कोई फैसला न किया जाय।

उल्लेखनीय है कि इंफोसिस ने विगत वाममोर्चा सरकार के अंतिम साल में विशेष आर्थिक क्षेत्र योजना के तहत 50 एकड़ जमीन खरीदी थी और तत्कालीन राज्य सरकार ने उनको सेज के तहत मिलने वाली सभी सुविधाएं देने का वायदा भी किया था लेकिन ममता सरकार आने के बाद इंफोसिस के साथ किए गए समझौते को राज्य सरकार ने रद्द कर दिया और इंफोसिस को विशेष आर्थिक क्षेत्र के तहत सुविधाएं देने से मना कर दिया और बाद में सेजनीति को राज्य में लागू न करने का फैसला ही कर डाला और इस सबके कारण एक खास परिस्थिति पैदा हुई हैकि जो कंपनियां सेजनीति के तहत पूंजीनिवेश करने आने वाली थीं या जिनके प्रस्ताव राज्यसरकार के पास पड़े थे वे सभी प्रस्ताव रद्दी की टोकरी में डाल दिए गए।

उल्लेखनीय है कि सेज नीति को केन्द्र सरकार ने तैयार किया है और उसने राज्यों से उस नीति की संगति में राज्यसेज नीति बनाने का अनुरोध भी किया है। पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार ने बड़ी आनाकानी के बाद सेज नीति को लागू किया था,लेकिन ममता सरकार आने के बाद पुनःराज्य विधानसभा में पास की गयीनीति को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया और राज्य फिर से नए औद्योगिक संकट में फंस गया है। पुरानी औद्योगिक नीति में औद्योगिक विकास की गुंजायश कम थी इसलिए केन्द्र सरकार ने सेजनीति बनायी थी और अधिकांश राज्यों ने उस नीति का पालन भी किया था ।

मंगलवार, 1 मार्च 2011

नया बजट और नए खतरे

नव्य उदारीकरण में भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों ने अपने को पूंजीपरस्ती से बांध लिया है। युवा इस पूंजी के नारकीय खेल से पीड़ित हैं । औरतें इसमें पिस रही हैं। किसानों और मजदूरों के जीवन में तबाही मची हुई है।  इसके बाबजूद वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी और उनकी भक्तमंडली दावा कर रही है कि भारत विकास कर रहा है और केन्द्र सरकार विकासकार्यों पर सबसे ज्यादा खर्च कर रही है। वास्तविकता यह है  कि वित्तमंत्री ने एक भी बड़ा कारखाना खोलने का संकेत नहीं दिया है। बेकारी कम करने का एक भी नुस्खा नहीं बताया है। सवाल उठता है कि बेकारी कम नहीं होगी तो देश में सामाजिक असुरक्षा बढ़ेगी और ऐसी अवस्था में कानून और व्यवस्था की एजेंसियों की मदद की जरूरत ज्यादा पड़ेगी और इस संदर्भ में देखें तो बजट में सुरक्षा एजेंसियों का खास ख्याल रखा गया है। देश की वास्तविकता यह है कि भारत सरकार सुरक्षा एजेंसियों और सुरक्षा बलों के साथ- रक्षामद में ज्यादा खर्च करने जा रही है। यह इस बात का सबूत है कि देश में कानून-व्यवस्था के प्रबंधन पर ज्यादा व्यय होगा। मसलन वित्तमंत्री ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी,बाएसएफ,सीआरपीएफ आदि के लिए ज्यादा धन का आवंटन किया गया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के लिए बजट से 55.68 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। यानी पिछले साल की तुलना में 16.33 करोड़ रूपये ज्यादा आवंटित किए गए हैं। इस संस्था को गैर-योजनामद से 2009-10 में 11.91 करोड़ रूपये आवंटित  किए गए थे जिसमें इस साल के लिए गैर-योजनामद से 42.06 करोड़ रूपये दिए गए हैं। इस संस्था को आतंकवाद से संबंधित घटनाओं पर काम करने,जांच करने,रोकने और केस चलाने का अधिकार दिया गया है। सीबीआई को पिछले साल की तुलना में इस साल कम फंड आवंटित किया गया है। बीएसएफ के लिए 7628.79 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं।सीआरपीएफ के लिए 7827.32 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं वित वर्ष की तुलना में 300 करोड़ रूपये ज्यादा है। नेशनल इंटेलीजेंस ग्रिड को 33.81 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। इस संस्था का काम है काउंटर टेररिज्म के खतरे पर निगरानी रखना,उसके डाटा की जांच-पड़ताल करना। वहीं दूसरी ओर कारपोरेट घरानों के लिए प्रत्यक्ष करों में 11,500 करोड़ रूपये के कंशेसन दिए गए हैं। इसके विपरीत साधारण जनता पर 11,300 करोड़ रूपये के नए कर लगाए गए हैं। कारपोरेट घरानों से केन्द्र सरकार ने स्वेच्छा से 2010-11 में 1,38,921 करोड़ रूपये के कर वसूल नहीं किए। इसी तरह 2009-10 में कारपोरेट घरानों से 1,18,930 करोड़ रूपये के कर वसूल नहीं किए गए थे। केन्द्र सरकार ने इस तरह कारपोरेट घरानों को पिछले तीन सालों में 4लाख करोड़ रूपये दिए हैं। इसी तरह किसानों के मद में आने वाली विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित धन में कटौती की गई है। केन्द्र सरकार का समग्र खर्चा 3लाख करोड़ के करीब बैठता है इसके लिए वह कर वसूली पर जोर नहीं दे रही है बल्कि विभिन्न तरीकों से कर्ज लेकर चला रही है। केन्द्र सरकार ने आम आदमी को और ज्यादा कंगाल बनाने के लिए तकरीबन 20हजार करोड़ रूपये की सब्सीडी कटौतियां इस बजट में की हैं। इसके अलावा विभिन्न वित्तीय क्षेत्रों में विदेशी पूंजी निवेश को आमंत्रण देकर मनमोहन सिंह सरकार ने एकसिरे से देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी वित्तीय संस्थानों के रहमोकरम पर गिरवी रख दिया है।
   सैटेलाइट टीवी चैनलों के साथ प्रतिस्पर्धा में संचार माध्यमों को ,खासकर प्रसारभारती को खड़ा रखने की जरूरत है लेकिन मनमोहन सिंह सरकार अपने नव्य-उदार एजेण्डे पर आक्रामक ढ़ंग से बढ़ रही है और निजी चैनलों की मदद करते हुए उसने इसबार के बजट में प्रसारभारती के लिए आवंटित धन में कटौती कर दी है। पिछले साल की तुलना में इस साल प्रसारभारती को 300 करोड़ रूये कम आवंटित किए गए हैं। 2010-11 में 1,757.14 करोड़ रूपये दिए गए जो इस साल के बजट में घटाकर 1,484.01 करोड़ कर दिए गए हैं। इसबार के बजट की खूबी है 9प्रतिशत विकास दर ,भयानक बेकारी,मंहगाई में उछाल और देशी वित्तीय संस्थाओं में विदेशी पूंजीका अबाध प्रवेश यानी नए किस्म की आर्थिक गुलामी का आगमन।
   










शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

अमेरिका का भयावह यथार्थः मार्क्सवाद की वापसी की बेला

    यह मार्क्सवाद की ओर लौटने की बेला है। जो लोग नव्य उदारतावाद के साथ साम्यवाद पर हमलावर हुए थे वे अपने हाथों अपने पेट में छुरा भोंक चुके हैं। हम भारतवासी सच को देखें और आंखें खोलें। आर्थिकमंदी ने अमेरिका की जनता की कमर तोड़ दी है। उन सभी लोगों को गहरी निराशा हाथ लगी है जो पूंजीवादी चेपियों और थेगडियों के जरिए नव्य-उदार आर्थिक संकट के निबट जाने की कल्पना कर रहे थे। सभी रंगत के पूंजीवादी अर्थशास्त्री और राजनेता प्रतिदिन भावी सुनहरे समय का सपना दिखा रहे थे और आश्वासन पर आश्वासन दे रहे थे उनके लिए आर्थिकमंदी ने पराभव का मुँह दिखाया है। मंदीजनित संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह मार्क्सवाद सही और नव्य-उदारतावाद गलत का साफ संदेश है।
        दुनिया में कोई देश नहीं है जिसको मंदी ने प्रभावित न किया हो। इसकी चपेट में अमेरिका से लेकर भारत,चीन से चिली तक सभी देश शामिल हैं। नव्य उदारतावाद और भूमंडलीकरण के नाम पर पूंजी की ग्लोबल लूट और गरीबी को वैधता प्रदान की गयी। अमेरिका में विगत वर्ष हुए राष्ट्रपति चुनाव में मंदीजनित संकट एक बड़ा सवाल था जिस पर राष्ट्रपति ओबामा को बड़ी जीत मिली थी । ओबामा ने वायदे के अनुसार कुछ उदार कदम भी उठाए हैं और उद्योग जगत को बड़ा आर्थिक पैकेज दिया। इस पैकेज में दिए गए सभी संसाधनों का अभी तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। अमेरिका में मंदी के कारण पैदा हुई बेकारी कम होने का नाम नहीं ले रही है।
      अमेरिका के श्रम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वहां बेकारी की दर 9.6 प्रतिशत थी जो मंदी के पैकेज की घोषणा के बाद कम होने की बजाय बढ़ी है और आज 16.7 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। अमेरिका में बेकारी खत्म करने के लिए नए 22 मिलियन रोजगारों की जरूरत होगी। अमेरिका में ऐसा शासन और समाज चल रहा है जिसका कमाने से ज्यादा खर्च करने पर जोर है। वहां लोग जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। घर के लिए कर्ज से लेकर एटीएम से कर्ज लेने वालों की संख्या करोड़ों में है।
     आश्चर्य की बात है कि मंदी के बाबजूद अमीरों की मुनाफाखोरी, फिजूलखर्ची और घूसखोरी बंद नहीं हुई है। मंदी के दो प्रधान कारण हैं पहला है भ्रष्टाचार, जिसे सभी लोग इन दिनों ‘क्लिप्टोक्रेसी’ के नाम से जानते हैं। भ्रष्टाचार के नाम पर जनता का निर्मम शोषण हो रहा और जमकर घूसखोरी हो रही है। यह काम सरकारों और नौकरशाही के द्वारा खुलेआम हो रहा है । भ्रष्ट नेताओं और अफसरों का महिमामंड़न चल रहा है। इन लोगों ने निजी और सार्वजनिक सभी स्थानों पर अपना कब्जा जमा लिया है ।
    यह अचानक नहीं है कि जो जितना बड़ा भ्रष्ट है वह उतना ही महान है। हमारे हिन्दी शिक्षण के पेशे से लेकर विज्ञान तक,अफसरों से लेकर जजों तक,मंत्रियों से लेकर पंचायत सदस्यों तक भ्रष्ट व्यक्ति की तूती बोल रही है। ये लोग बड़े ही बर्बर ढ़ंग से शोषण कर रहे हैं। इन लोगों को सत्ता,मुनाफा और पैसा की असीमित भूख है। इसके कारण साधारण आदमी के लिए सामान्यतौर पर शिक्षा,स्वास्थ्य, स्वच्छ शासन और कामकाज के अवसरों में तेजी से कमी आई है। दूसरी ओर आम जनता की क्रयशक्ति घटी है, आमदनी में कम आई है। मंहगाई,बैंक कर्जों और असमान प्रतिस्पर्धा ने आम आदमी की जिंदगी की तकलीफों में इजाफा किया है। इससे चौतरफा सामाजिक असुरक्षा का वातावरण बना है।
      मंदी ने अमेरिका की बुरी गत बनायी है। 15 मिलियन से ज्यादा लोग बेकार हो गए हैं। कुछ शहरों का आलम यह है कि वहां आधी आबादी गृहविहीन है। 38 मिलियन लोगों को खाने के कूपन दिए जा रहे हैं। इतने बड़े अभाव को अमरीकी समाज ने विगत 50 सालों में कभी नहीं देखा था। अमेरिका में गरीबों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। भारत में भी स्थिति बेहतर नहीं है। गरीबी यहां भी बढ़ी है। भारत और अमेरिका में गरीबी का बढ़ना इस बात का संकेत है कि नव्य उदारतावाद का नारा पिट गया है।  
     आज हमारा समूचा परिवेश मुक्तव्यापार, मुक्तबाजार और अबाधित सूचना प्रवाह में कैद है।  इससे निकलने के लिए जिस तरह की सांगठनिक संरचनाओं और वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत है उसके संवाहक दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं,इसने आम आदमी को हताश,असहाय, और दिशाहारा बनाया है।
    ‘क्लिप्टोक्रैसी’ के कारण बिहार से लेकर असम तक, कॉमनवेल्थ खेलों से लेकर संचार मंत्रालय तक अरबों रूपये के घोटाले हो रहे हैं लेकिन न कोई आंदोलन है और न कोई भारतबंद है। प्रतिवाद को शासकवर्ग के लोगों ने मीडिया बाइट्स में तब्दील कर दिया है।
     देश की सुरक्षा के नाम पर जितना धन इन दिनों खर्च किया जा रहा है उतना पहले कभी खर्च नहीं किया गया। सुरक्षा पर जिस गति से खर्चा हो रहा है उस अनुपात में सामान्य सुरक्षा वातावरण तैयार करने और आम लोगों का दिल जीतने में शासकों को मदद नहीं मिली है। कश्मीर और उत्तर-पूर्व सुरक्षाबलों की असफलता का आदर्श उदाहरण हैं।
     ‘क्लिप्टोक्रैसी’ की लूट में रूचि होती है आम लोगों का दिल जीतने में रूचि नहीं होती। इसके कारण अमीर और ज्यादा अमीर हुए हैं । गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है। संपदा संचय चंद घरानों के हाथों में सिमटकर रह गया है। ये लोग एक प्रतिशत से भी कम हैं और संपदा का बहुत बड़ा हिस्सा इनके पास है।
   भारत में ‘क्लिप्टोक्रैसी’ का आधार है सरकार द्वारा सार्वजनिक विकास के नाम किया जाने वाला खर्चा। विकास योजनाएं मूलतः लूट योजनाएं बन गयी है। लूट का दूसरा बड़ा स्रोत है घूसखोरी। लूट का तीसरा बड़ा क्षेत्र है किसानों और आदिवासियों की जमीन और संसाधन। इस लूट की व्यवस्था में सभी लोग समान हैं । लोकतंत्र में अमीर और गरीब के बीच में समानता त्रासदी है। समान अवसरों की बात उपहास है। हर आदमी अपने लिए कमाने में लगा है,उसके पास इतना समय नहीं है कि वह दूसरों के बारे में सोच सके।
      हमारे देश में अमेरिका के बारे में तरह-तरह के भ्रम पैदा किए जा रहे हैं। सबसे बड़ा भ्रम तो यही पैदा किया जा रहा है कि अमेरिका हमारा स्वाभाविक दोस्त है। बड़े कौशल के साथ यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिका कोई साम्राज्यवादी देश नहीं है। बहुराष्ट्रीय निगमों के बारे में बताया जा रहा है कि वे हमारे देश में सिर्फ विकास के लिए आ रही हैं। शोषण और उत्पीड़न से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वे तो हमारी मदद के लिए आ रही हैं। वे हमें आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि हमें अपने यहां विकास का चरमोत्कर्ष हासिल करना है तो अमेरिकी मॉडल का अनुकरण करें। अमेरिकी मॉडल का इस्तेमाल करते हुए हम अपनी भौतिक संपदा और आम लोगों की जीवनशैली में जबर्दस्त उछाल पैदा कर सकते हैं। प्रति व्यक्ति भौतिक उपभोग को उच्चतम स्तर तक ले जा सकते हैं।
    अमरीकी आर्थिक मॉडल कितना सार्थक है इसके लिए आज किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है अमेरिकी अर्थव्यवस्था चरमराकर गिर गयी है। आज अमेरिका में चारों ओर दुख ही दुख है। नव्य उदारतावाद का ग्लैमर, मीडिया और संचार क्राति का जादू अपना असर खो चुका है। विगत 25 सालों में अमेरिकी जनता के जीवन में दुखों में इजाफा हुआ है । अमेरिकी जनता के जीवन में दुख बढ़े हैं और सुख घटे हैं।
      अमेरिकी मॉडल जनोन्मुख है या जनविरोधी है इसका आधार है शांति और तनावमुक्त जीवनशैली। अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर चल रही है तो आम जनता के जीवन में शांति ,सुरक्षा ,विश्वास और आनंद का विकास होना चाहिए, लेकिन परिणाम इसके एकदम विपरीत आए हैं अमेरिकी जीवन में अशांति,असुरक्षा और सामाजिक और व्यक्तिगत तनाव में इजाफा हुआ है। हताशा बढ़ी है। सामान्य अमेरिकी नागरिक यह समझने में असमर्थ है कि उनके जीवन में इतनी व्यापक अशांति,असुरक्षा और तनाव कैसे आ गया। समाज के एक बड़े हिस्से की जीवनशैली का तानाबाना तहस-नहस हो गया है।
      सामाजिक-आर्थिक स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि कमाऊ और मौज उडाऊ के बीच में वैषम्य घटा नहीं है बल्कि बढ़ा है। सन् 1968 में जनरल मोटर्स के सीईओ को इसी कंपनी के कर्मचारी की तुलना में 66 गुना ज्यादा पगार मिलती थी। यह वैषम्य घटने की बजाय बढ़ा है आज वालमार्ट कंपनी के सीईओ की पगार इसी कंपनी के एक कर्मचारी की पगार की तुलना में 900गुना ज्यादा है। अकेले वालमार्ट परिवार के पास 90 बिलियन डॉलर की संपदा है जबकि इतनी संपदा अमेरिकी की 40 फीसदी आबादी के पास है।
      संपदा के निजी इजारेदारियों के हाथों में केन्द्रीकरण ने भयानक आर्थिक वैषम्य पैदा किया है। अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार ‘नेशन’ के अनुसार अमेरिका के अति समृद्धों का आर्थिकमंदी में कुछ नहीं बिगाड़ा है लेकिन मझोले अमीरों पर इसकी मार पड़ी है। न्यूयार्क टाइम्स ने अगस्त 2009 में लिखा था कि अमेरिका में जिन लोगों के पास 30 मिलियन डॉलर की संपत्ति है ऐसे लोगों की संपदा घटी है।
     अमेरिका में रहने वाले अफ्रीकी-अमेरिकन,कम कौशल का काम करने वाले कर्मचारियों की आय में गिरावट आयी है। ‘नेशन’ ने लिखा ‘‘Although they differ in theme and emphasis, the essays here, commissioned in conjunction with the Next Social Contract Initiative of the New America Foundation, are united by a belief that deep, persistent inequality doesn't merely affect less privileged Americans. It affects everyone, rending the social fabric, distorting our politics and preventing America from fulfilling its promise as a nation that offers a measure of equality and opportunity to all. Inequality is also a bipartisan phenomenon, exacerbated by the neglect of both political parties and by a society whose chattering classes have grown oblivious to wealth and income disparities that no other advanced democracy tolerates.’’ ।
   अमेरिका की वास्तविकता पर पर्दा डालकर जो लोग भारत में अमेरिकी मॉडल का जयगान कर रहे हैं और अमेरिका जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं वे नहीं जानते कि अमेरिकी मॉडल खुद अमेरिका में धराशायी हो चुका है।
   अमेरिका में व्याप्त आर्थिक असुरक्षा के बारे में रॉकफेलर फाउण्डेशन की रिपोर्ट में जो कहा गया है वह हमारी आंखे खोलने के लिए काफी है। यह संस्थान घनघोर प्रतिक्रियावादी विचारकों का अड्डा है। इस रिपोर्ट को येल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेकब हेकर ने तैयार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 25 प्रतिशत अमेरिकी परिवारों की आय में गिरावट आयी है। इन परिवारों की आय में अचानक से आई गिरावट का किसी को पहले से आभास तक नहीं था। 
      रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 1985 में आर्थिक असुरक्षा से अमेरिका में 12.2 प्रतिशत परिवार प्रभावित थे। जिनकी संख्या सन् 2000 में बढ़कर 17 प्रतिशत हो गयी। सन् 2007 को सुंदर आर्थिक साल माना जाता है इस साल आर्थिक असुरक्षा 1985 के स्तर से ज्यादा थी।यानी 13.7 प्रतिशत अमेरिकी आर्थिक असुरक्षा के दायरे में थे।
    सन् 2009 से आर्थिक तबाही का जो सिलसिला आरंभ हुआ है उसके कारण स्थिति और भी भयावह बनी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 1996 और 2006 के बीच में तकरीबन 60 प्रतिशत अमेरिकी आर्थिक असुरक्षा के घेरे में आ चुके हैं। आम अमेरिकी नागरिक की पगार स्थिर है या कम हुई है। जबकि अनिवार्य खर्चे बढ़े हैं। ज्यादातर अमेरिकी नागरिकों के पास किसी भी किस्म की बचत नहीं हो पाती। बैंकों में उनके नाम से एक भी पैसा बचत खातों में नहीं है। वे जितना कमाते हैं उससे ज्यादा के उनके पास खर्चे हैं।
   पहले अमेरिका में बेकार नागरिकों को थोड़े अंतराल के बाद काम मिल जाता था लेकिन विगत कुछ सालों से यह देखा जा रहा है कि बेरोजगारों को काम के लिए बहुत ज्यादा समय तक इंतजार करना पड़ता है। बेकारी का समय लंबा होने से आर्थिक असुरक्षा ने एक नया आयाम हासिल कर लिया है। अब बेकार और मध्यवर्ग के लोग 35 साल की उम्र में ही बूढ़ापे का अनुभव करने लगे हैं।
      अमेरिका के फिलिप्स सेण्टर फॉर हेल्थ एंड वेल-बिंग का ताजा रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक संकट और बेकारी के कारण मध्यवर्ग के अमरीकी नागरिक 35 साल की उम्र में ही बूढ़ा महसूस करने लगे हैं। 75 पर्तिशत लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से घिरे हुए हैं। बूढ़ापा और बीमारियां 30 साल की उम्र में एक अमेरिकी युवा को घेर रही हैं।  
    डेनिस पाराडिनिज ने अपनी किताब  ‘‘Quality of Life’’ में लिखा “Feeling there is a possibility of losing your job and not being able to afford to pay your child’s school fees, or having to cancel that trip you planned a long time ago, certainly causes worry and anxiety”. एक मनोशास्त्री ने कहा है “And of course this begins to affect other areas of quality of life, causing insomnia, anxiety and even depression”.  इस सबका उनके मोटापे,शरीर और उम्र पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है।
     आम अमेरिकी की इन दिनों पूरी जीवनशैली बदल गयी है। एक जमाना अमेरिकी स्वस्थ माने जाते थे आज मोटे हो गए हैं। आजकल फ्रेंच लोगों से ज्यादा अमेरिकी लोग सोने और खाने पर समय खर्च करते हैं। सवाल उठता है क्या हम इसके बावजूद अमेरिकी मॉडल पर चलना पसंद करेंगे ?   

रविवार, 4 जुलाई 2010

‘जी-20’ नहीं ‘बी-20’ कहो

(टोरंटो में जी-20 देशों के सम्मेलन के मौके पर हवाई जहाज से उतरते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह) 
           कनाडा में जी-20 देशों के सम्मेलन के मौके पर अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब बोलते हैं तो उन्हें सारी दुनिया ध्यान से सुनती है। ओबामा के इस कथन में आंशिक सत्य है। यह सच है कि मनमोहन सिंह जब बोलते हैं तो सारी दुनिया के अमीर उनकी ओर आशाभरी नजरों से देखते हैं,उनकी बातें गौर से सुनते हैं। लेकिन अमीरों और नव्य -उदारपंथी पूंजीवादी नेताओं के सुने को सारी दुनिया के सच में रूपान्तरित करना सही नहीं होगा। मनमोहन सिंह का जितना भी आर्थिक विमर्श है.नीतिगत सुझाव हैं वे उनके नव्य-उदार मॉडल की देन हैं। इस मॉडल के अनेक संस्करण प्रचलन में हैं और सभी संस्करण पिट चुके हैं।  नव्य-उदार आर्थिक मॉडल का लक्ष्य आम आदमी को सम्बोधित करना नहीं है। इस मॉडल के आधार पर आम आदमी की खुशहाली कम हुई है। अमीरों की खुशहाली बढ़ी है।
     कनाडा में हाल में हुए  जी-20 देशों के राष्ट्राध्यक्षों के सम्मेलन  के अंत में जारी घोषणापत्र विश्व की आर्थिक विषमता को सम्बोधित नहीं करता। यह घोषणापत्र उन सुझावों की घोषणा करता है जिनसे सारी दुनिया में व्याप्त आर्थिक वैषम्य और भी बढ़ेगा। हम यहां कुछ तथ्यों को रखना चाहेंगे। विगत 30 सालों में सारी दुनिया में नव्य-उदार आर्थिक नीतियों के कारण गरीब और अमीर के बाच की खाई और चौड़ी हुई है।
    तथ्य बताते हैं कि नव्य-उदार आर्थिक नीतियों के कारण गरीब और अमीर देशों के बीच आर्थिक असमानता बढ़ी है। दो प्रतिशत समृद्धों के पास सारी दुनिया की आधी से ज्यादा संपदा है। दस प्रतिशत समृद्ध लोग सारी दुनिया की 85 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हैं। दूसरी ओर सारी दुनिया के मनुष्यों के पास मात्र एक प्रतिशत से भी कम संपदा है। सारी दुनिया के तीन अति समृद्ध व्यक्तियों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गयी है। इन तीनों लोगों की संपत्ति 48 गरीब देशों की सकल संपदा से भी ज्यादा है।
     सवाल यह है कि सन् 2008 के ग्लोबल आर्थिक संकट के लिए कौन जिम्मेदार है ? जी-20 देशों के सम्मेलन में अमीरों के लिए कैसे आर्थिक सुविधाएं दी जाएं,इस पर ही बातें हुई हैं। गरीबों को गरीबी से कैसे बाहर निकाला जाए उस पर कोई चर्चा नहीं हुई है। 2008 की आर्थिकमंदी की मार से गरीब सबसे ज्यादा आहत हुए हैं। उनकी आर्थिक-सांस्कृतिक क्षति सबसे ज्यादा हुई है। विश्व मजदूर संघ के अनुसार सन् 2009 में सारी दुनिया में बेकारों की सूची में 34 मिलियन लोगों के नाम शामिल हुए हैं।
 ( कनाडा में जी-20 सम्मेलन के मौके पर प्रतिवाद करती जनता)     
आज सारी दुनिया में बेकारों की संख्या बढ़कर 239 मिलियन हो गई है। विश्व बैंक की मानें तो 2010 के अंत तक और 200 मिलियन लोगों का धंधा-रोजगार चौपट हो सकता है। जबकि सन् 2030 तक 64 मिलियन लोगों की नौकरियां जा सकती हैं।
   यह एक सत्य है कि पृथ्वी के दक्षिणी इलाके के महागनगरों की आधी आबादी झुग्गी-झोंपड़ियों में रहती है। इनके पास शिक्षा,पानी,बिजली,स्वास्थ्य और शौच-सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है।
     इसी तरह ग्लोबल पर्यावरण असंतुलन और परिवर्तन के कारण  प्रति वर्ष तीन लाख लोग मर जाते हैं और 125 बिलियन डॉलर की सालाना क्षति हो रही है। पर्यावरण के संकट को विशेषज्ञों ने मौन संकट की संज्ञा दी है। मौसम में गर्मी बढ़ी है। सन् 2010 के अंत तक तापमान दो डिग्री बढ़ जाने की आशंका है। कुलमिलाकर पर्यावरण संकट के कारण जंगल,फसल,पहाड़,बर्फीले पहाड़,नदी-नाले,समुद्र आदि के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। अनेक समुद्री जीव-जन्तुओं के अलावा जंगली पशु -पक्षियों का जीवन भी दांव पर लगा है ,यानी समूचा इको-सिस्टम संकटग्रस्त है। लेकिन जी-20 देशों के कनाडा घोषणापत्र में इस संकट से निबटने का कहीं पर कोई जिक्र नहीं है।
   सच यह है कि विश्व पूंजीपतिवर्ग ने समूची जलसंपदा को प्रदूषित कर दिया है। आज अधिकांश देशों की नदी,नहरें और तालाब प्रदूषित हैं या सूख गए हैं। आंकड़े बताते हैं कि सारी दुनिया में 6.8 बिलियन लोग रहते हैं और नदियों-नहरों आदि में सारी दुनिया में दो मिलियन टन कचरा -गंदगी,औद्योगिक-कृषि कचरा प्रतिदिन फेंका जा रहा है। यह समूची आबादी (6.8 बिलियन ) के कचरे के बराबर है। पानी को पूरी तरह प्रदूषित किया जा चुका है। इसी तरह खानों के उत्खनन से होने वाली आपदा पर भी जी-20 देशों का सम्मेलन चुप है। खानों के उत्खनन के कारण 800 ट्रिलियन लीटर पानी सूख गया है और जो पानी बचा है उसमें विषाक्त कण ज्यादा हैं। सारी पृथ्वी पर तीन बिलियन लोग हैं जिन्हें बहता हुआ पानी एक किलोमीटर के दायरे में अभी तक नसीब नहीं है। सारी दुनिया में जल प्रदूषण बढ़ रहा है,जल के लिए झगड़े और विवाद हो रहे हैं।
    कनाडा में जी-20 देशों का सम्मेलन जब हो रहा था तो उस पर प्रति मिनट एक मिलियन डॉलर खर्चा हुआ और जब यह सम्मेलन खत्म हुआ तो कुल खर्चा दो बिलियन डॉलर आंका गया। ऐसी स्थिति में सादगी से रहने, फिजूलखर्च बंद करने आदि के पूंजीवादी नेताओं के सभी दावे खोखले साबित हुए हैं।
      कुछ लोगों ने ‘जी-20’ देशों के समूह को ‘बी-20’ देशों के समूह का नाम दिया है। यानी बिजनेस घरानों का समूह। ये निजी इजारेदारियों, कारपोरेट घरानों और मुक्त व्यापार के पक्षधरों का संरक्षक समूह है। जब यह सम्मेलन हो रहा था तो कनाडा में एक हजार के करीब प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किए गए,इतनी बड़ी संख्या में कनाडा के इतिहास में कभी लोग गिरफ्तार नहीं किए गए। सुरक्षा इंतजामों पर एक बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च किया गया,इतनी कड़ी व्यवस्था और इतना ज्यादा खर्चा कनाडा के इतिहास में कभी नहीं किया गया।  
          



शनिवार, 11 जुलाई 2009

आर्थिकमंदी और मीडिया की चालाकियां

आर्थिकमंदी का मीडिया खेल

मौजूदा आर्थिक मंदी दौर की खबरें जुलाई 2008 से आनी शुरू हो गई थीं। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक सन् 30 की मंदी के बाद की यह सबसे बड़ी आर्थिक मंदी है। मंदी के क्या प्रभाव हैं और मंदी से उबरने के लिए किस तरह के आर्थिक पैकेज आने चाहिए और इन पैकेज का किसे लाभ होगा। इसका बार-बार जिक्र आ रहा है। मंदी के प्रभावों को बहुराष्ट्रीय मीडिया भयरहित रूप में पेश कर रहा है।
मीडिया का मूल रवैयया है आर्थिकमंदी से घबड़ाने की जरूरत नहीं है। जीवन में जैसे और बहुत सारी घटनाएं घट रही हैं वैसे ही आर्थिकमंदी भी एक घटना है। यह सामान्य है। सहज रूप में स्वीकार करें। 'भयभीत' होने की जरूरत नहीं है। मजेदार बात यह है कि सामान्य मौत से होने वाले खतरों और असुरक्षा को बार-बार 'भय' के वातावरण के साथ पेश करने वाला मीडिया अचानक आर्थिकमंदी की खबर को 'भय' के बिना प्रस्तुत कर रहा है। आर्थिकमंदी को सामान्य घटना बनाना और समाज को भय के वातावरण के बाहर रखना समग्रता में सकारात्मक और खतरनाक दोनों है।
आर्थिकमंदी के आते ही कहा जाने लगा मंदी जल्दी जाने वाली नहीं है विभिन्ना देश की सरकारों ने (खासकर अमरीका और भारत) ने यह आभास दिया कि वे तुरंत ऐसे कदम उठाने जा रहे हैं जिससे आर्थिकमंदी से बचा जा सके। उसके दुष्प्रभावों को कम किया जा सके। आर्थिकमंदी में मुनाफा तेजी से नीचे गिरता है। बेकारी में तेजी से इजाफा होता है। बाजार में चीजों के दाम कम होने लगते हैं। बैंकों में जमा धन की कीमत कम हो जाती है। शेयरों के दाम गिरने लगते हैं। जीवनस्तर में गिरावट आनी शुरू हो जाती है। कारखाने और कंपनियां बंद होने लगते हैं। छंटनी बढ़ जाती है।
आर्थिकमंदी से बचाने के लिए सरकारी स्तर पर विशेष सलाहकार अथवा निगरानी कमेटियों का गठन कर दिया जाता है। आर्थिक सलाहकारों की टीम तेजी से काम करने लगती है। आर्थिक सुविधाओं के पैकेज दनादन घोषित होने लगते हैं। बाजार में मुद्रा की कमी को पूरा करने के लिए विभिन्ना उपायों के जरिए मुद्रा को बैंकों से निकाला जाता है। सरकार की तरफ से आर्थिकमंदी से निकलने के लिए सतर्क मशीनरी का निर्माण कर दिया जाता है। संकटमोचक ग्रुप बार-बार यही संदेश देते हैं 'घबड़ाने की जरूरत नहीं है।' 'मौजूदा कानूनों को और भी ज्यादा चुस्त-दुरूस्त करने की जरूरत है।'
संकटमोचक ग्रुपों का विचारधारात्मक काम होता है सरकारी नीतियों की साख को बनाए रखना। वित्तीय संस्थानों की प्रभावशीलता, नियमबध्दता और बाजार की प्रतिस्पर्धा में इजाफा करना। जिससे निवेशकों का राष्ट्रीय बाजार में विश्वास बना रहे। सरकारी मशीनरी पूरी तरह युध्द की अवस्था में आ जाती है। सरकार गुप्त और प्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में बाजार में हस्तक्षेप करती है।
भारत में आर्थिकमंदी का असर आने के साथ ही अर्थव्यवस्था की कमान प्रधानमंत्री ने सीधे अपने हाथों में ले ली। संकट से उबरने के क्या-क्या उपाय हो सकते हैं इसके बारे में सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से फैसले आने लगे। विशेष आर्थिक सलाहकारों की टीम का गठन कर दिया गया जो अहर्निश अर्थव्यवस्था पर नजर रखे हुए हैं और तुरंत फैसले ले रहे हैं। इसके बावजूद अर्थव्यवस्था में गिरावट का रूझान बना हुआ है। केन्द्र सरकार की ओर से उद्योग जगत के लिए दो आर्थिक पैकेज की घोषणा की जा चुकी है। किंतु संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा। अमरीका में भी उद्योग जगत को मुँह मांगी आर्थिक सहायता सरकारी पैकेजों के जरिए जारी की गयी है किंतु संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा। बाजार में गिरावट का रूख बना हुआ है। बाजार से बार-बार असफलता की खबरें आ रही हैं। आए दिन नए-नए आर्थिक घोटाले सामने आ रहे हैं। नामी-गिरामी कंपनियां आर्थिक घोटालों में लिप्त पायी जा रही हैं। कल तक जो कंपनियां आदर्श उदाहरण थीं, जिन्हें परवर्ती पूंजीवाद की कारपोरेट तरक्की का आदर्श माना जाता रहा था वे ही कंपनियां धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार की आदर्श प्रतीक के रूप में सामने हैं। सत्यम्,विप्रो,माइक्रोसॉफ्ट यदि भारत में परवर्ती पूंजीवाद की कलंकगाथा का आख्यान लिख रही हैं तो अमरीका,ब्रिटेन आदि विकसित पूंजीवादी मुल्कों में तथाकथित आदर्श कंपनियों की सूची का अभाव नहीं है।
आर्थिकमंदी के दौर में नामी-गिरामी कंपनियों,वित्तीय संस्थानों,बैंक आदि परवर्ती पूंजीवाद की काली करतूतों में सामने आना,बैंकों से लेकर वित्तीय बाजार की गतिविधियों का नियमन करने वाली संस्थाओं का अपने ही बनाए नियमों को गुप्त रूप से तोड़ना और घोटालेबाजों को खुल्लमखुल्ला दुरूपयोग करने देना यह दरशाता है कि परवर्ती पूंजीवाद में बाजार की ताकतें बाजार के नियमों का दुरूपयोग कर रही हैं। 'अबाध कारपोरेट लूट' और 'नियमभंग' का परिणाम है आर्थिकमंदी। बाजार के नियमों का सिर्फ निजी क्षेत्र ही दुरूपयोग नहीं कर रहा बल्कि सरकार भी दुरूपयोग कर रही है। सत्यम और एनरॉन के मामले में इसे साफ देखा जा सकता है। परवर्ती पूंजीवाद का मूलमंत्र है 'दुरूपयोग' और 'नियमभंग'। यही परवर्ती पूंजीवादी अराजकता का स्रोत है।
नव्य उदारतावादी मुक्त बाजार के लिए पहले सरकारी नियमों को बदला गया। नियमों को बाजार की शक्तियों के अनुकूल बनाया गया। यह भी सुविधाजनक नहीं लगा तो नियमभंग शुरू हो गया। बैंकों ने धड़ाधड़ दिवालिया घोषित कर दिया। सत्यम् और विप्रो जैसी कंपनियों को विश्वबैंक ने काली सूची में डाल दिया। क्योंकि उन्होंने नियमभंग किया।
परवर्ती पूंजीवाद के विकास के लिए जब नियम बदले जा रहे थे तो बार-बार बाजार की पवित्रता की सौगंध ली जा रही थी आज उसी बाजार की गंगा को आदर्श पूंजीपतियों,बैंकों,वित्तीय संस्थानों और बहुराष्ट्रीय निगमों ने प्रदूषित कर दिया है। आज बाजार जितना प्रदूषित है और बाजार की खुली प्रतिस्पर्धा जितनी सडांध से भरी है वैसी गंदगी पूंजीवाद के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गयी।
परवर्ती पूंजीवाद के आगमन के साथ 'पारदर्शिता' का वायदा किया गया। 'कारपोरेट प्रशासन' को आदर्श प्रशासन घोषित किया गया। किंतु विगत पांच सालों का अनुभव इन सभी वायदों को पुष्ट नहीं करता। आज पहले की तुलना में कम 'पारदर्शिता' है। आम लोगों पर कर्जा बढ़ा है। आज प्रत्येक मध्यवर्ग का आदमी कर्ज में डूबा है। पूंजीपति कर्ज में डूबा है। किसान कर्ज में डूबा है। मजदूर पामाली और कर्ज में डूबा है। देश की अर्थव्यवस्था कर्ज में डूबी है। इसके बावजूद कहा जा रहा है परवर्ती पूंजीवाद समाज में बहार ,मस्ती और आनंद लेकर आया है। सवाल उठता है इतने व्यापक कर्ज के बावजूद आम आदमी इतनी गहरी नींद में क्यों सोया हुआ है ? आखिरकार क्या वजह है कि आर्थिक तबाही में फंसे होने के बावजूद लोगों में गुस्सा नहीं है ?
परवर्ती पूंजीवाद का पहले वाले पूंजीवाद के साथ मीडिया के संदर्भ में केन्द्रीय अंतर क्या है ? पहले वाला पूंजीवाद अपनी आलोचना को मीडिया में स्थान देता था। ऐसे लेखकों को छापता था जो पूंजीवाद की निर्मम आलोचना करते थे। किंतु परवर्ती पूंजीवाद ऐसा नहीं करता मीडिया में पूंजीवाद के कटु आलोचकों के लिए कोई जगह नहीं है। मीडिया में परवर्ती पूंजीवाद की आलोचना लिखने वाले नियमित पत्रकारों, संवाददाताओं और अर्थशास्त्रियों के लिए कोई जगह नहीं है। परवर्ती पूंजीवाद का अपनी आलोचना से डरना सबसे बड़ी बाधा है। इसके कारण पता नहीं चलता क्या हो रहा है।
अमूमन मीडिया में अति साधारण किस्म की आलोचनाएं प्रकाशित -प्रसारित हो रही हैं। परवर्ती पूंजीवाद को आलोचना के परे ले जाने का ही दुष्परिणाम है कि आज अचानक आर्थिक क्षेत्र के घोटाले बम के गोले की तरह गिर रहे हैं। मीडिया ने रिपोर्टिंग करते समय व्यक्तिगत हितों का तो ख्याल रखा किंतु सामूहिक हितों की अभिव्यक्ति और संरक्षण के काम को त्याग दिया। व्यक्तिगत और सामूहिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखने में मीडिया पूरी तरह असफल रहा।
परवर्ती पूंजीवाद के पहले मीडिया ने यथार्थ के उद्धाटन पर जोर दिया, यथार्थ ज्ञान पर जोर दिया। भारत में यह प्रेस का दौर था। परवर्ती पूंजीवाद के आगमन के साथ भारत इलैक्ट्रनिक मीडिया क्रांति में दाखिल होता है। नव्य आर्थिक उदारीकरण के साथ इलैक्ट्रोनिक मीडिया में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का पूंजी निवेश होता है। यह प्रक्रिया सन् 1990 के बाद गति पकड़ती है। सन् 1995 के बाद परवान चढ़ती है।
मोटेतौर पर सन् 1995 के बाद से मीडिया ने यथार्थ का ज्ञान कराने का कार्य छोड़ दिया। यथार्थ ज्ञान के नाम छोटे भ्रष्टाचार, घूसखोरी ,उत्पीडन खूब आए। किंतु भ्रष्टाचार,उत्पीड़न के बड़े यथार्थ को मीडिया ने उद्धाटित करना बंद कर दिया। अब कोई भी घोटाला मीडिया में तब ही आता है जब घोटालेबाज बताए। मीडिया की खोजी प्रतिभाएं अब खबर नहीं देतीं। सत्यम का घोटाला हो या संसद में घूसखोरी का मामला हो। इन सबके बारे में तब ही पता चला जब अपराधी तत्वों ने स्वयं बताया। कहने का अर्थ है मीडिया में यथार्थ स्वयं चलकर जाता है तो मीडिया बता देता है वरना मीडिया ने यथार्थ के पास चलकर जाना बंद कर दिया है।
नव्य अर्थशास्त्री मानते हैं कौन सी वस्तु समाज के लिए अच्छी है यह बताना बेहद मुश्किल है। समाज के लिए क्या अच्छा है यह बात समाज को बाजार में जाकर सीखनी चाहिए। पहले मीडिया का काम था यथार्थ का ज्ञान कराना। आज मीडिया का काम है बाजार का ज्ञान कराना। पहले यथार्थ में हस्तक्षेप करना मीडिया का लक्ष्य था इन दिनों बाजार में हस्तक्षेप करना लक्ष्य है। यथार्थ में हस्तक्षेप के क्रम में मीडिया बताता था समाज के लिए क्या सही है और क्या गलत है। किंतु इन दिनों मीडिया यह सब नहीं बताता। बल्कि बताता है बाजार में क्या आया ,कहां से खरीदें और कैसे खरीदें। मीडिया यह नहीं बताता कि क्या नहीं खरीदें।
मीडिया की हस्तक्षेपकारी भूमिका के कारण यथार्थबोध में इजाफा होता है। ज्ञान में वृध्दि होती है। सामाजिक अनुभव समृध्द होता है। ज्ञान अनंतता और ज्ञान अपरिहार्यता का बोध पैदा होता है। परवर्ती पूंजीवाद ने यथार्थ ज्ञान को बाजार ज्ञान बना दिया। बाजार की वस्तुओं को बिठा दिया। अब हम वस्तुओं को जानते हैं उनके प्रयोजनमूलक आयाम को जानते हैं। इसके अलावा ज्ञान के सभी रूपों को मीडिया ने अप्रासंगिक बनाया है। अब हमारे पास वस्तुओं का संचय है ,ज्ञान का नहीं। हमारे घर वस्तुओं से भरे हैं और मन यथार्थ ज्ञान से शून्य है। मीडिया में अहर्निश प्रसारण हो रहे हैं किंतु यथार्थ जीवन से इन प्रसारणों को जोड़ नहीं पा रहे हैं।
नव्य उदारतावादी मीडिया के तानेबाने में 'ब्रेकिंग' न्यूज अथवा स्वर्त:स्फूत्त समाचार प्रस्तुति ने पैर जमा लिए हैं। खबर की स्वर्त:स्फूत्तता को अपरिहार्य और अनिवार्य बना दिया है। स्वर्त:स्फूत्त खबर पर ही विवेचन आते हैं। खबर की स्वर्त:स्फूत्तता के पीछे दर्शन है कि मानवीय एक्शन के पीछे कोई सुचिंतित बोध नहीं होता। मनुष्य की स्वर्त:स्फूत्त भूमिका में सरकारी एजेंसी की निर्णायक भूमिका नहीं होती। नैतिकता और कानून के क्षेत्र में सरकारी एजेंसी की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती। सब कुछ स्वर्त:स्फूत्त है। बाजार भी स्वर्त:स्फूत्त है।
मीडिया ने स्वर्त:स्फूत्तता का हर क्षेत्र में महिमामंडन किया है। स्वर्त:स्फूत्तता की भाषा को संप्रेषण का औजार बनाया है। स्वर्त:स्फूत्तता पर निर्भर होने के कारण खबर को किसी नीति,निर्देश,लक्ष्य आदि की जरूरत नहीं होती अथवा ये चीजें अप्रासंगिक हैं। अब प्रासंगिक है किसी भी तरह खबर प्रसारित करना।
पहले अभिव्यक्ति की आजादी को व्यक्त करते समय उसकी चुनौतियां नजर आती थीं। खबर को पेश करते समय खबर में निहित चुनौतियां दिखाई देती थीं। खबर हासिल करना चुनौतीभरा काम था। इन दिनों खबर में चुनौती नजर नहीं आती। स्वर्त:स्फूत्तता ने खबर में निहित अन्तर्विरोधों और चुनौतियों को दफन कर दिया है। 'ब्रेकिंग' न्यूज में स्वर्त:स्फूत्तता ही महान है।
परवर्ती पूंजीवाद मूलत: राज्य की आलोचना पर केन्द्रित है। साथ ही राज्य की मदद पर टिका है। हाल ही में आर्थिकमंदी आयी और अनेक वित्तीय संस्थान और कंपनियां आर्थिक पामाली के कगार पर चले गये उन्हें आर्थिक मदद का पैकेज किसी कंपनी से नहीं आया बल्कि सरकारी आर्थिक पैकेज दिया गया तब ही वे संकट से उबरने की स्थिति में आए हैं। परवर्ती पूंजीवाद का नारा है '' राज्य की आलोचना और राज्य पर निर्भरता।'' राज्य के हस्तक्षेप के बिना परवर्ती पूंजीवाद अपने पैंरों पर खड़ा नहीं होता। राज्य की मदद पर ही उसकी प्रभावशीलता नजर आती है।
परवर्ती पूंजीवाद के सारे होहल्ला के बावजूद आज भी सार्वजनिक सुविधाएं और सार्वजनिक प्रसारण की बड़ी भूमिका है। सार्वजनिक सुविधाओं की संरचनाओं का परवर्ती पूंजीवाद तरह-तरह से दोहन कर रहा है। मसलन् संचार के जितने भी रूप आज निजी क्षेत्र में दिखाई दे रहे हैं वे सार्वजनिक संपदा पर आधारित हैं। रेडियो तरंगों से लेकर संचार नेटवर्क तक सभी क्षेत्र में सरकारी सुविधाओं का निजी कंपनियां लाभ उठा रही हैं। संचार के क्षेत्र के अलावा बैंकों से बड़ी मात्रा में सरकारी धन का इस्तेमाल आम बात है।
परवर्ती पूंजीवाद की केन्द्रीय विशेषता है बाजार के पैराडाइम का केन्द्र में आ जाना और लोकतंत्र के पैराडाइम का गौण हो जाना। सब कुछ बाजार और बाजार की शक्तियों से संचालित होता है। पहले लोकतंत्र से संचालित होता था। बाजार के स्थानीय और ग्लोबल अन्तस्संबंध पर जोर है। लोकतंत्र के स्थानीय और ग्लोबल अन्तस्संबंध की अनदेखी की जा रही है। लोकतंत्र को कारपोरेट लोकतंत्र के जरिए अपदस्थ कर दिया गया है।
परवर्ती पूंजीवाद सार्वजनिक संपत्ति के बल पर किस तरह समृध्दों की सृष्टि करता है इसका आदर्श नमूना है चीन। चीन में लंबे समय तक कोई अमीर नहीं था। सन् 2007 की 'फोर्बिस' पत्रिका की अमीरों की सूची में चीन के चालीस अरबपतियों के नाम हैं। ये अरबपति मात्र सत्ताईस साल में पैदा हुए हैं। अमरीका से प्रकाशित 'फोर्बिस' पत्रिका के अनुसार चीन के चालीस अरबपतियों के पास 38 बिलियन (अमेरिकी डालर) की संपत्ति है। कल तक चीन गरीबों का देश था आज हठात् अरबपतियों का देश बन गया। कल तक 'कम्युनिस्ट' देश था आज धनियों का देश है।
'फोर्बिस' की धनी सूची जारी होने बाद पांच दिन बाद जारी वार्षिक 'हारून धनिक सूची' के अनुसार चीन में 120 अरबपतियों के नाम थे। सन् 2006 में चीन में मात्र 15 अरबपति थे,सन् 2002 में एक भी अरबपति नहीं था। किंतु सन् 2007 में अरबपतियों की संख्या बढ़कर 120 हो गयी। उल्लेखनीय है अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा अरबपति चीन में हैं।
अमेरिका में सन् 2007 में 410 अरबपति थे। जिस कंपनी ने इस हारून रिपोर्ट को तैयार किया उसके ब्रिटिश एकाउंटेंट रूपर्ट हॉगबर्फ के अनुसार चीन में 200 से ज्यादा अरबपति हैं। अनेक अरबपति ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी संपदा का खुलासा नहीं किया है। 'हारून' रिपोर्ट में चीन के 800 समृध्दों के नाम शामिल हैं। इनमें वे लोग शामिल हैं जिनके पास औसत 562 मिलियन डालर की संपत्ति है। कुल मिलाकर चीनी अरबपतियों के पास 459.3 बिलियन डालर की संपत्ति है जो सन् 2006 के सकल घरेलू उत्पाद का 16 फीसद है। इस सूची में उन लोगों के नाम शामिल नहीं हैं जिन्होंने शेयर बाजार और सट्टे से दौलत कमायी है।
उल्लेखनीय है चीन के शेयर बाजार में टोक्यो के शेयर बाजार से ज्यादा पूंजी का निवेश और कारोबार होता है। रिपोर्ट के अनुसार 800 चीनी अरबपतियों में एक-तिहाई कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं और 38 नेशनल पीपुल्स कांग्रेस के सदस्य हैं। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं में अभिजनवाद का वर्चस्व है। राष्ट्रपति हू जिन ताओ की बेटी का ब्याह चीन की इंटरनेट कंपनी 'सीना' के भू.पू. अध्यक्ष के साथ हुआ। यह व्यक्ति महाधनाढ्य है। चीन के प्रधानमंत्री का दामाद चीन की सबसे कीमती फुटबाल टीम का मालिक है। चीन के भू.पू. प्रधानमंत्री और महान् कम्युनिस्ट नेता ली पेंग का बेटा चीन की सबसे बड़ी ऊर्जा उत्पादन कंपनी को नियंत्रित करता है। यही स्थिति देंग जियाओ पिंग के नाते-रिश्तेदारों की भी है। सार्वजनिक संपदा का इसी तरह भू.पू.सोवियत संघ में कम्युनिस्ट के सदस्यों के बीच निजीकरण किया गया और रातों-रात सोवियत संघ में अनेक महाधनाढ्य पैदा हो गए।
परवर्ती पूंजीवाद का महाख्यान ''गौरव से संकट'' तक फैला हुआ है। इस प्रक्रिया में अभिजन समाज को कैसे बचाया जाए और कैसे उसके हितों की रक्षा की जाए इसी पर जोर है। भूमंडलीकरण की नव्य उदारतावाद जितना व्यक्त है उससे ज्यादा अव्यक्त है। यह कहना ज्यादा सही है कि 'व्यक्त और अव्यक्त में अदला-बदली हो गयी है।' इन दिनों तथ्यों की कोई परवाह नहीं करता। तथ्यों की वैधता की पुष्टि कोई नहीं करता। आपको उपयुक्त न लगे तो किसी भी राय को तुरंत अवैध बना सकते हैं,खारिज कर सकते हैं। मीडिया में तथ्यों का बगैर जांच-पड़ताल के प्रसारण और प्रकाशन हो रहा है। तथ्यों को आलोचनात्मक ढ़ंग से देखना मीडिया ने बंद कर दिया है। 'गप्प' का 'तथ्य' की तरह इस्तेमाल हो रहा है। अब 'गप्प' ही खबर है, 'गप्प' ही 'तथ्य' है।
आर्थिकमंदी के नाम पर जो आर्थिक पैकेज दिए जा रहे हैं और आर्थिक विकास के नाम पर जो सब्सीडी खत्म की गयी थीं उनके बीच में भी तुलना करने की जरूरत है। संभवत: आर्थिक सब्सीडी पर इतना खर्चा नहीं आता जितना आर्थिक पैकेज देने पर आ रहा है। आर्थिक सब्सीडी काटने पर जितना जोर दिया गया उससे कई गुना ज्यादा धन 'बुरी अर्थव्यवस्था' को दुरूस्त करने के नाम पर खर्च किया जा रहा है। कहने के लिए किसानों की ऋण माफी का ढोल खूब पीटा गया किंतु किसानों के लिए मात्र 71 हजार करोड़ रूपये के कर्ज माफ किए गए। इसके विपरीत विभिन्ना मदों में कंपनियों के लिए आर्थिक मदद के जिन दो आर्थिक पैकेज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषित किए हैं उनसे उद्योग जगत को कई लाख करोड़ रूपये का लाभ मिलेगा और सरकार को पचास हजार करोड़ के राजस्व की हानि उठानी पड़ेगी। गुजरात में सिर्फ 'नानो' कार के कारखाने के लिए गुजरात सरकार ने अकेले टाटा गु्रप को 40 हजार करोड़ रूपये का लाभ दिया है। यह राशि कई दशकों तक टाटा ग्रुप को मिलेगी। जबकि इसका दशांश भी किसानों को राज्य सरकार नहीं दे पायी है।
मीडिया में अमीर ही प्रमुख आख्यान है। खाते-पीते लोग,सुखी लोग, सुखियों के नाते-रिश्तेदार, सुखियों की आराम-तलब जिंदगी ही बहुराष्ट्रीय मीडिया आख्यान की प्रमुख विषयवस्तु है। सुखियों की जीवनशैली को आदर्श जीवनशैली के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। डेविडर् कोत्तिन ने लिखा है पूंजीवाद ने हमारे ऊपर कैंसर की तरह कब्जा जमा लिया है। कैंसर जैसे शरीर के सभी हिस्सों को अधीन कर लेता है और धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। वही स्थिति पूंजीवाद ने की है।
मीडिया में आर्थिकमंदी की खबर न तो सचेत करती है और न भय पैदा करती है।बल्कि यह आभास दिया जाता है कि 'संकट' है। 'संकट' को विशिष्ट संकट के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जाहिर है 'विशिष्ट संकट' है तो विशेष समाधान भी होना चाहिए। आर्थिकमंदी की खबर आते ही समाधान भी आने लगते हैं। सरकारी एक्शन भी आने लगते हैं। जबकि किसानों की कर्ज से होने वाली मौत को मीडिया में आने में कई साल लग गए और कर्ज माफी का समाधान आने में कई दशक लग गए।
मीडिया में 'आर्थिकसंकट' और 'आर्थिकमंदी' बहुत सीमित रूप में आख्यान आ रहा है। इसकी प्रस्तुतियों बयान ज्यादा होते हैं यथार्थपूर्ण ,तथ्यपूर्ण वैध रिपोर्ट नहीं होतीं। आर्थिकमंदी के जीवंत दृश्य आख्यान प्रस्तुत नहीं किए जाते। आर्थिकमंदी है तो एक ही समाधान है कि 'विशेष आर्थिक पैकेज' के रूप में सरकारी सहायता की घोषणा। मीडिया और सरकार दोनों ही यह जानने की कोशिश नहीं कर रहे कि इस प्रसंग में सच और झूठ क्या है। मीडिया प्रस्तुतियों में पैकेज की वैधता को लेकर को विवाद नजर नहीं आता। मान लिया गया है कि आर्थिकमंदी का एक ही समाधान है 'विशेष आर्थिक पैकेज' की घोषणा।
सबसे अच्छा यह होता कि आर्थिकमंदी की जड़ों में जाकर कारण खोजने की कोशिश की जाती और उन्हें सामने लाया जाता । अनेक अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि विशेष आर्थिक पैकेज से मंदी के संकट से कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है किंतु खतरा टला नहीं है। शेयरधारक लगातार तबाह हो रहे हैं। उनकी अरबों की संपत्ति डूब चुकी है। यह संपत्ति आखिरकार कहां गयी ? अचानक बैंकों में मुद्रा का अकाल क्यों पड़ा ? बैंक और बीमा कंपनियां दिवालिया क्यों हो रही हैं ? जिस क्षेत्र में जाओ वहां पर मंदी का असर है । प्रत्येक क्षेत्र के लोग विशेष आर्थिक पैकेज की मांग कर रहे हैं। अमेरिका में तो पोर्न उद्योग ने भी विशेष आर्थिक पैकेज की मांग की है। पोर्न उद्योग के मालिकों का तर्क है कि मंदी की वजह से पोर्न बेवसाइट पर आने वालों की कमी हो गयी है ,फलत: पोर्न का व्यापार तेजी से गिरा है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक क्षेत्र सरकार से राहत की अपील कर रहा है। मंदी के टीवी दृश्यों में सरकार के सामने अमीर भीख मांग रहे हैं। 'बचाओ-बचाओ' की अपील कर रहे हैं।
आर्थिक मंदी के आते ही यह आभास दिया जा रहा है कि यह संकट अचानक पैदा हुआ है। यह सच नहीं है। 'पारदर्शिता' के नाम पर 'तथ्य' और 'सत्य' दोनों पर पर्दादारी है। पूंजीवाद में 'तथ्य' और 'सत्य' की धाधंली आम बात है। यह धांधली उस समय और भी बढ़ गयी जबसे वर्चुअल पैराडाइम को आधार बनाकर कम्प्यूटर ,इंटरनेट आदि का विशाल तंत्र खड़ा किया गया। सुनने में यह बात अटपटी लग सकती है किंतु वास्तविकता है कि साइबर संस्कृति के मौजूदा दौर में यथार्थ के साथ जितनी धांधलियां हुई हैं उतनी पहले कभी नहीं हुई।
ग्लोबल वर्चुअल संस्कृति की भाषा भी विशिष्ट है। आर्थिकमंदी के बारे में कुछ इस तरह बताया जा रहा है कि लोगों को तकलीफ जैसी चीज महसूस ही न हो। बल्कि 'स्वास्थ्यप्रद भय' की अनुभूति हो। सब कुछ कह बताने के नाम पर सतह को ही गहराई बताया जा रहा है। इसके लिए ग्लोबल भाषा और ग्लोबल पदबधों का प्रयोग हो रहा है। यह ऐसी भाषा है जो किसी एक देश तक सीमित नहीं है । एक देश से दूसरे देश में भ्रमण कर रही है। यह पेशेवर लोगों की कोडभाषा है। आर्थिक संकट को कोडभाषा में प्रस्तुत करने के कारण इस संकट के बारे में साधारण लोग तकरीबन अनभिज्ञ हैं। कोडभाषा साधारण लोगों को प्रभावित नहीं करती।
कोडभाषा भाषा में समस्या पर कम आर्थिक पैकेज प्राप्त करने पर तोर है। प्रधानमंत्री के द्वारा दो आर्थिक पैकेज घोषित कर दिए जाने के बाद से चैनलों और अखबारों से मंदी की खबर मुखपृष्ठ से गायब हो गयी है। गोया सरकार से आर्थिक पैकज हासिल करना ही प्रधान लक्ष्य था। आर्थिकमंदी के बारे में जब मीडिया बताता है तो उसकी उत्पत्ति के कारणों को नहीं बताता । हठात् घटित घटना के रूप में पेश करता है। किन कारणों से आर्थिकमंदी आयी है उन पर मीडिया में एकदम चर्चा नहीं हो रही । आर्थिकमंदी मूलत: नव्य-उदारतावाद की असफलता का संकेत है। पूंजीवाद की असफलता को युध्द के बहाने कम करने की कोशिश होती रही है किंतु इस बार यह हथकंडा भी काम नहीं आया।
मंदी से निकलने के नाम पर बार-बार ऐसी नीतियां और मॉडल बनाए और लागू किए जाते हैं जो यह वायदा करते हैं कि अब मंदी नहीं आएगी। मजेदार बात यह है इस तरह के सारे प्रयास बार-बार असफल हुए हैं। सवाल यह है कि प्रत्येक बार मंदी किस तरह की सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक तबाही छोड़कर जाती है। किस तरह के यथार्थ को छोड़कर जाती है। हम किस तरह के यथार्थ में पहुँच जाते हैं ? किस तरह का यथार्थ कला और साहित्य विधाओं में व्यक्त होता है ?
आर्थिकमंदी की कहानी यथार्थ का एक नया संसार पैदा करती है। यह कथासंसार पहले कभी व्यापक रूप में उपलब्ध नहीं था। सन् 30 की मंदी ने प्रेमचंद जैसा महान् लेखक दिया। छायावाद और प्रगतिवाद जैसा आन्दोलन दिया। स्वाधीनता और त्रासदी को साहित्य में व्यापक अभिव्यक्ति मिली। युध्दजनित अलगाव और अजनबीपन ने अज्ञेय का श्रेष्ठतम कथासंसार दिया। हमने कभी आर्थिकमंदी के संदर्भ में साहित्य और भाषा में आए परिवर्तनों को विश्लेषित नहीं किया है। हमने आर्थिकमंदी के आर्थिक और राजनीतिक आयाम पर चर्चा की है किंतु संस्कृति और कलाओं पर इसका क्या असर होता है इसके बारे में कभी नहीं सोचा।
आर्थिकमंदी मूलत: उत्तर आधुनिक वैचारिक 'खेल' है। इसमें 'खेल' के सभी लक्षण मौजूद हैं। प्रत्येक खेल के नियम,भाषा आदि अलग होते हैं। उसी तरह आर्थिकमंदी के 'खेल' के भी नियम,भाषा ,चरित्र और कहानी अलग है। पहले की आर्थिकमंदी से यह आज की मंदी भिन्न है। आर्थिकमंदी का 'खेल' उदार और अतिरंजित है। उदारता और अतिरंजना के बिना कोई 'खेल' संभव नहीं होता। उदार और अतिरंजना के आधार पर आर्थिकमंदी के बारे में समझ बना रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप देशों और संस्कृतियों की बाधाओं का 'मंदी' अतिक्रमण करती है।
उदारता और अतिरंजना ही 'मंदी' में शिरकत का माहौल बनाते हैं। मजेदार बात यह है मंदी का अनुभव समाज को तब हुआ जब नव्य-उदारतावादी विचारधारा के वायदे असफल हुए। 'मंदी' तब आती है जब पूंजीवाद नियमों को ताकपर रख दे। सिस्टम को असमर्थ बना दे। आर्थिकमंदी हमारे किसी एक क्षेत्र को प्रभावित नहीं करती बल्कि समग्र जगत को प्रभावित करती है।
'मंदी' का स्वाद कडुवा होता है। 'मंदी' में चीजों को आलोचनात्मक ढ़ंग से देखने में असमर्थ होते हैं। अमूमन मंदी पर बातें उसकी जटिलता को ताक पर रखकर की जाती हैं। जिसके कारण मंदी के अर्थ की गंभीरता को पकड़ नहीं पाते। मंदी यदि 'खेल' है तो सकारात्मक है। 'मंदी' के गर्भ से अनेक अच्छी-बुरी चीजें पैदा हुई हैं। किंतु मंदी का सबसे बड़ा परिणाम सकारात्मक ही होगा।
सन् 1930 की आर्थिकमंदी के सकारात्मक परिणाम के तौर पर आज हमारे सामने स्वचालितीकरण और सूचनातंत्र का बृहत्तम तंत्र है।यह सच है कि मंदी के गर्भ से फासीवाद के अनेक दैत्य पैदा हुए,दूसरा विश्वयुध्द हुआ । उससे भी बड़ी चीज यह हुई कि पुराना उपनिवेशवादी तंत्र नष्ट हुआ। आज भी आर्थिकमंदी के खेल में से किसी बड़े सकारात्मक तत्व के पैदा होने की संभावनाएं हैं। सन्30 की मंदी ने पुराने किस्म के अनेक पैराडाइम नष्ट किए और मौजूदा मंदी भी भविष्य में अनेक पैराडाइम नष्ट करेगी।
आर्थिकमंदी का मौजूदा रूप विश्वव्यापी है। रीयल टाइम में सब कुछ घटित हो रहा है। आर्थिकमंदी का स्रोत विकसित पूंजीवादी मुल्क हैं। पहली वाली मंदी के भी जनक ये ही देश थे। विकासशील देशों को यह मंदी ब्याज में झेलनी पड़ रही है। 'मंदी' का खेल प्रतिस्पर्धा और अन्तर्विरोधों को तेज करता है। इस खेल में जिसका भाग्य अच्छा है वहीं बच पाएगा वरना दुर्भाग्य तो सबका पीछा तो किसी तरह विकास की दौड़ में टिके रहेंगे और जो देश तेज दौड़ में भाग नहीं सकते उन्हें मंदी का खेल अपाहिज बन देगा। '
मंदी' के खेल में हम एक-दूसरे की नकल कर रहे हैं। तेज दौड़ और नकल के आधार पर भरोसा पैदा करना चाहते हैं हम दूसरों जैसे हैं। अमरीका में मंदी आयी तो सारी दुनिया में मंदी आयी। मंदी के खेल में उस देश का तो नुकसान होता ही है जो मंदी का स्रोत है किंतु उसके अलावा देशों को ज्यादा नुकसान होता है। मंदी का खेल आर्थिक अराजकता के गर्भ से पैदा हुआ है और पूरी तरह नियोजित है। मंदी का कभी असंगठित ढ़ंग से मुकाबला करना संभव नहीं है। मंदी के नायक भी वही हैं जो मंदी के बहाने सबसे ज्यादा आर्थिक पैकेज से राहत पा रहे हैं। आर्थिकमंदी की प्रक्रिया लंबी और प्रच्छन्न होती है। फलत: इसके मुख्य खिलाडियों को कभी जनता पकड़ ही नहीं पाती है। मंदी के जो मुख्य खिलाड़ी हैं वे ही मंदी के सबसे ज्यादा फल खा रहे हैं। आम आदमी मंदी को जल्दी ही भूल जाता है। मंदी की सनसनी ही कुछ समय तक याद रहती है। निजी तौर पर जो चीजें खोयी होती हैं वही याद रहती है। कुछ समय के बाद बाहरी जगत सामान्य लगने लगता है। चारों ओर मंदी के मारे लोग दिखते हैं उनके कष्ट दिखते हैं और यह सब हमें सामान्य लगने लगता है।
मंदी का खेल 'स्व' को केन्द्र में रखकर संचालित होता है। वास्तव में मंदी 'हम' को प्रभावित करती है। 'हम' को प्रभावित करने के कारण सब कुछ सामान्य लगता है। मीडिया के प्रचार ने यह अनुभूति पैदा की है कि अमरीका का कष्ट और भारत का कष्ट एक जैसा है। अमरीका में जो राहत दी जा रही है वही यहां पर भी दी जा रही है। जिन सांस्कृतिक और आर्थिक 'कोड' के जरिए वहां बातें हो रही हैं उसी तरह यहां पर भी हो रही हैं। उनके अर्थ और हमारे अर्थ में कोई अंतर नहीं है। यह एक तरह की 'स्वचालित उत्पत्तिमूलकता' है। यह 'स्व-प्रेरित' मानसिकता है।
मंदी का खेल सिस्टम से बांधे रखता है। सिस्टम की प्रासंगिकता और अपरिहार्यता को संप्रेषित करता है। सिस्टम से बंधे रहकर ही सिस्टम के खेल को आगे बढ़ाते हैं। सिस्टम के मूड और सिस्टम की सहयोगी शक्तियों के साथ सहमेल और संतुलन बनाकर चलते हैं। मंदी के खेल का सामान्य संप्रेषण नहीं होता बल्कि महासंप्रेषण होता है। इसी महासंप्रेषण के लिए आम लोगों के जीवन व्यवहार को निर्देशित और नियमित किया जाता है।
मंदी का खेल जोखिमों से भरा है। पग-पग पर जोखिम है। इन जोखिमों को पारकर करके ही मंदी के परे जाकर समाज का विकास हुआ है। यथार्थ जगत का निर्माण हुआ है। सन् 30 की मंदी के बाद सारी दुनिया में इतनी ज्यादा संपदा का सृजन हुआ है उतना विगत सैंकड़ों वर्षों में नहीं हुआ। मंदी का खेल मंदी में नहीं रखता बल्कि मंदी के परे विकास की ओर ले जाता है। नयी विश्वव्यापी संरचनाओं की ओर ले जाता है। मंदी के खेल में वे ही आगे जाते हैं जो शक्तिशाली हैं।
मंदी से उबरने के लिए शक्तिशाली प्रयासों की जरूरत होती है। जो सक्षम हैं वे मंदी के परे चले जाते हैं जो अक्षम हैं वे तबाह हो जाते हैं। मंदी से उबरने के लिए कायिक,मानसिक,ज्ञानात्मक और भौतिक धक्के की जरूरत है। हर समय यह खतरा बना रहता है कहीं मंदी के संकट में घिरकर तबाह न हो जाएं। मंदी का यथार्थ निगल तो नहीं लेगा ? किंतु मंदी की चुनौती को जो देश स्वीकार करते हैं और उसका शक्ति के साथ मुकाबला करते हैं उन्हें सफलता भी मिलती है।
मंदी के खेल के बाहर आने के लिए मंदी के तर्क को जानना जरूरी है। मंदी में निहित हायरार्की को जानना जरूरी है। किस स्तर पर मंदी का क्या असर होगा और किस स्तर पर क्या किया जाए ये चीजें तार्किक तौर पर तय करने के बाद ही मंदी के खेल के बाहर आना संभव होता है। मंदी किसी देश विशेष तक सीमित नहीं है। यह अन्तर्निर्भर है।
मंदी का प्रधान कारण है अर्थव्यवस्था का राज्य ,समाज और नियमों की परिधि के बाहर चला जाना। मंदी तब ही कटती है जब अर्थव्यवस्था पुन: राज्य के दायरे में लौटती है, राज्य से राहत की मांग करती है, नियमन की मांग करती है। अराजकता और नियमन के बीच की रस्सा-कसी में नियमन जब कमजोर होता है तो मंदी दाखिल होता है। आर्थिक संतुलन गड़बड़ाता है, विषमता बढ़ती है।
सन् 30 की मंदी से आज की मंदी में कई बुनियादी अंतर हैं पिछली मंदी को परंपरागत आर्थिक उपायों के जरिए संभालने में सफलता मिल गयी थी किंतु इस बार की मंदी परंपरागत आर्थिक समाधानों से संभलने वाली नहीं है। मजेदार बात यह है कि उद्योग को बचाने के लिए जो आर्थिक पैकेज घोषित किए जा रहे हैं उनका अंतत: दबाव उपभोक्ता पर ही पड़ेगा। अकेले भारत सरकार को ही करीब चालीस हजार करोड़ रूपये के करों का नुकसान होगा। दूसरा सबसे बड़ा प्रभाव यह होगा कि विकास कार्यों के लिए धन की कमी होगी। बजट घाटा बढ़ेगा। कर वसूली घटेगी। व्यापार घाटा बढ़ेगा।
इस प्रक्रिया में आम शेयर धारकों को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है। आम नागरिक की बचत घटी है। बैंकों में जमा धन में गिरावट आयी है। बैंकों में जमा राशि से होने वाले लाभों में कमी आयी है। दूसरी ओर संस्कृति और समाज में अपराध की प्रवृत्ति में इजाफा हुआ है। आर्थिक मंदी से बचने के लिए यदि करों में कमी की जाती है तो उसका यह भी असर होगा कि सुरक्षामद में भी खर्चे घटाने पड़ सकते हैं। यदि सुरक्षामद के खर्चे कम नहीं किए जाते तो यह भी संभव है कि आंतरिक सुरक्षा में कमी आ जाए। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अमरीका के पास युध्द उद्योग को चंगा करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। युध्द उद्योग को चंगा करने का अर्थ है विश्व स्तर पर युध्द की आग को भड़काए रखना। तनाव के क्षेत्रों का विस्तार करना।
मंदी की मीडिया में रिपोर्टिंग करते हुए आदमी और मुद्रा का अंतर खत्म हो गया है। समूचा मीडिया कवरेज इस तरीके से आ रहा है गोया मंदी का आम आदमी से कोई लेना-देना नहीं है। सिर्फ लेना-देना है तो सिर्फ उद्योग जगत का। मंदी के बारे में राजनीतिक रिपोर्टिंग एकसिरे से गायब है। मंदी के बारे में विभिन्न राजनीतिक दलों और नीतियों की क्या भूमिका है, इसके बारे में कोई चर्चा नहीं हो रही। इस तरह की प्रस्तुतियों का अर्थ है मीडिया ने साधारण आदमी को मंदी के दायरे के बाहर कर दिया है।
मीडिया नहीं चाहता आम आदमी मंदी के सवाल पर शिरकत करे। मीडिया कवरेज के केन्द्र में कारपोरेट घरानों की तकलीफें हैं। विशिष्ट क्षेत्र के लाभ और हानि के सवाल हैं। 'विशेष क्षेत्र' के नाम पर जो पैकेज लाए गए हैं वह इस बात का सबूत है कि मंदी के बहस-मुबाहिसे से आम आदमी गायब रहे। मीडिया संवाददाताओं के डिस्पैच,विशेषज्ञों, स्तम्भकारों और अर्थशास्त्रियों के केन्द्र में भी आम आदमी नहीं है। इनका लेखन भी क्षेत्र विशेष को केन्द्र में रखकर चलता है। आश्चर्य की बात है कि आर्थिक पैकेज घोषित करते हुए यह जानने की भी जरूरत महसूस नहीं की गयी कि जिन लोगों को पैकेज का लाभ मिलने वाला है वे वास्तव में इसके हकदार भी हैं ?
जनता के द्वारा चुने प्रतिनिधियों की जबावदेही समूचे समाज के प्रति है, वे विशिष्ट समूहों के नुमाइंदे नहीं हैं। विशिष्ट समूहों को मदद देने के नाम पर अभी तक जो आर्थिक पैकेज आए हैं उससे बड़े कारपोरेट घरानों को सीधे लाभ मिलेगा। यह बात सीधे पैकेज में ही बता दी गयी है। विशेष क्षेत्र में वे ही शामिल किए गए हैं जिनसे मुनाफा होता है। घाटे वाले क्षेत्रों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। विशेष क्षेत्र के लिए जारी किए गए पैकेज को मीडिया ने इस तरह पेश किया है गोया विशिष्ट क्षेत्र ही देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। विशेष क्षेत्रों को राहत देने का अर्थ देश को राहत देना है।
आज अमरीका में जिस आर्थिकमंदी को देख रहे हैं उसके दो आख्यान हैं जो मीडिया में मिलते हैं पहला आख्यान बताता है कि मंदी पैदा करने में बैंकरों,दलालों,सट्टेबाजों, झूठे कर्जगीरों, भ्रष्ट डेमोक्रेटों,सस्ते कर्जों और क्रेडिट कार्ड धारकों की बड़ी भूमिका है। ये ही लोग मंदी की चपेट में हैं। कर्ज लेकर आनंद करने वाली अर्थव्यवस्था के चलते मौजूदा मंदी आयी है। अब बचत कम है ,खर्चे ज्यादा हैं। आमदनी कम है खर्चे ज्यादा हैं। कर्जे पर सवार होकर अमरीकी अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ रही है। साधारण अमेरिकी से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक सभी कर्ज में आकंठ डूबे हैं।
मंदी का दूसरा आख्यान बताता है कि मंदी की जड़ है रेगूलेशन। नियमन के चलते ही बैंकों ने घरों के लिए कर्ज दिए। व्यापार के कर्जे दिए। इस आख्यान के वाचकों का सारा गुस्सा नियमन के खिलाफ है। इन लोगों का मानना है कि नियमन की बंदिश एकदम हटा देनी चाहिए। इससे साधारण लोगों की आमदनी में इजाफा होगा। बाजार चंगा होगा। इसके पक्ष में तर्क दिया जा रहा है कि विनियमन से सबको लाभ पहुँचा है, लोगों की आमदनी बढ़ी है। संपदा पैदा हुई है। यह सच है कि संपदा पैदा हुई है किंतु इस संपदा का लाभ बहुत कम लोगों तक पहुँचा है। धनी और भी धनी बने हैं।
आए दिन मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग और धनी घरानों को आदर्श मॉडल के रूप में पेश किया जाता है। मीडिया समझा रहा है कि विनियमन के कारण समृध्दि आयी है। इस क्रम में मीडिया यह भूल ही गया कि कामकाजी लोगों के काम के घंटों में इजाफा हुआ है। पालन-पोषण का खर्चा बढ़ा है। औरतों,बच्चों,खेत मजदूरों और बेकार मजदूरों की संख्या बढ़ी है। इन लोगों पर विनियमन का सीधे नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। मजदूरों की आमदनी में इजाफे का खोखला दावा किया जा रहा है।
हकीकत में मजदूरों की आमदनी घटी है। विनियमन के नाम पर पहले सरकारी कानूनों को बदला गया। वित्तीय संस्थानों को बगैर किसी नियम कायदे कानून के काम करने की अनुमति दी गयी और यह सब किया गया पारदर्शिता और नव्य उदारता के नाम पर। आज स्थिति यह है कि विनियमन की वकालत करने वाले, बाजार के तर्कों पर चलने वाले अपनी रक्षा के लिए राज्य के खजाने से मदद मांग रहे हैं। जिन लोगों ने समस्त सरकारी नियमों के तंत्र को तोड़ दिया वे ही सरकार से मदद की गुहार लगा रहे हैं। चोम्स्की ने सही कहा है कि सरकारी नियमों को खत्म करने का परिणाम है तबाही और सिर्फ तबाही। अब आम जनता से कहा जा रहा है कि वह नव्य उदारतावादियों की विचारधारा की कीमत अदा करे।
नॉम चोम्स्की के अनुसार मौजूदा आर्थिक संकट की जड़ें 35 साल पुरानी हैं। विगत 35 सालों में यह संकट क्रमश: गहरा हुआ है। संकट और तथ्य दोनों से वाकिफ हैं। पैंतीस साल पहले जिस नव्य उदारतावाद की शुरूआत की गयी थी यह संकट उसकी चरम परिणति है।
नव्य उदारतावाद के नाम पर जो नीतियां अपनायी गयी उनका 'अन्य' पर क्या असर होगा इसका ख्याल ही नहीं रखा गया। बाजार की शक्ति का गुणगान इस कदर किया गया कि हम भूल ही गए कि बाजार की सीमाएं भी हैं। बाजार को अनंत बनाने और सीमाओं को भूल जाने के कारण आज गंभीर संकट में फंसे हैं।
बाजार का तर्क सिर्फ 'स्व' को केन्द्र में रखता है, 'अन्य' को नहीं। बाजार का 'स्व' पर क्या असर होगा, 'स्व' को क्या लाभ होगा। यह तो हमें खूब बताया गया किंतु 'अन्य' पर क्या असर होगा इसके बारे में कुछ भी नहीं बताया गया। कंपनियों और कारपोरेट घरानों को क्या लाभ होगा यह तो बताया गया किंतु व्यवस्थागत तौर पर क्या क्षति होगी ,इसके बारे में कभी नहीं बताया।
कल तक जो वित्तीय संस्थान अपने को सबसे शक्तिशाली बता रहे थे आज वे स्वयं का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं हैं। उन्हें अपनी रक्षा के लिए राज्य की आर्थिक मदद की जरूरत है। नव्य उदारतावाद की नीतियों में जोखिम अन्तर्निहित था। जोखिम पर पर्दादारी चलती रही आज पर्दादारी से भी जोखिम को छिपाया नहीं जा सकता। यह वैसे ही है जैसे किसी को कैंसर हो जाए और वह छिपाने की कोशिश करे। किंतु कैंसर छिपाने से छिपता नहीं है। नव्य उदारतावाद कैंसर है। उसी का परिणाम है मौजूदा आर्थिक मंदी।
बाजार की जय हो जय हो करने वालों को मालूम था एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि बाजार जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं होगा। बाजार में चीजें भरी पड़ी हैं। खरीददार नहीं हैं। आम लोगों के पास खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। आम आदमी अपनी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने की स्थिति में नहीं है। आम आदमी की दीर्घकालिक जरूरतें पूरा करना सपने की तरह है।
नव्य उदारतावाद के नाम पर विकास का आख्यान चरम पर रहा है। विकास के नाम पर गरीबी की अनदेखी हुई है। गरीबी पर बातें करना बंद हो गया। गरीबी के विमर्श की जगह अचानक विकास का विमर्श आ गया। गरीबी की जगह सड़क,बिजली,पानी के मुद्दे आ गए और हमने भी यही मान लिया कि विकास ही सर्वस्व है। विकास होगा तो गरीबी अपने आप खत्म हो जाएगी। इस क्रम में हमने पलटकर देखने की कोशिश नहीं की है कि विगत पैंतीस सालों में आम जिंदगी में गरीबी बढ़ी है या घटी है ?
विकास के लंबे चौड़े आख्यान की रोशनी में मीडिया को गरीबी के अंधेरे नजर नहीं आए। नव्य उदारतावाद ने किस तरह की चौतरफा क्षति की है उसकी ओर कभी नहीं देखा ं। अचानक नव्य उदारतावाद का विकास रथ जब रूक गया तो गरीबी,बेकारी,लेऑफ,छंटनी, मुद्रा की कमी, कर्ज की अदायगी आदि समस्याएं नजर आने लगीं। ये समस्याएं मंदी के पहले भी थीं किंतु सामने नहीं आती थीं। पूंजीपतिवर्ग ने अपनी जोखिम को सामाजिक जोखिम बना दिया और मुनाफे को निजी खातों में पहुँचा दिया। बाजार और नव्य उदारतावाद के नाम पर जो खेल चल रहा था उसके पीछे राज्य की संपत्ति ही दांव पर लगी थी, राज्य की संरचनाओं का बाजार की शक्तियां दोहन कर रही थीं। आज बाजार जब संकट में हैं तो पुन: राष्ट्र की शरण में आया है।
बहुराष्ट्रीय मीडिया ने चौतरफा हताशा और किर्ंकत्तव्यविमूढ़ जैसी अवस्था पैदा की है। सूचनाओं का सचेत ढ़ंग से मेनीपुलेशन किया जा रहा है । मेनीपुलेशन को वैधता प्रदान की जा रही है। मेनीपुलेशन के पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश की जा रही है। मीडिया का समूचा एजेंडा शोरगुल और हंगामे से भरा है। सतही,अर्थहीन और चर्चित चेहरों वाली संस्कृति ने खोजी पत्रकारिता को विदा कर दिया है। मीडिया में अमेरिकन आइडल से लेकर इंडियन आइडल का तांता लगा। 'आइडल' को विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
बहुराष्ट्रीय मीडिया नागरिकबोध की बजाय उपभोक्ता बोध को उभार रहा है। मीडिया में विज्ञापन के प्रभाव पर जोर है और परिवर्तनकामी राजनीतिक कार्र्यकत्ताओं के प्रति नकारात्मक रवैयया पैदा किया जा रहा है। मीडिया से जो बाइट्स प्रसारित की जा रही हैं वे जागरूक नहीं बना रहीं बल्कि मनोरंजन कर रही हैं। टीवी बाइट्स ऊर्जा पैदा नहीं कर रहीं,नयी चीजों पर रोशनी नहीं डालतीं। इसके विपरीत हताशा और निष्क्रियता पैदा कर रही हैं।
बहुराष्ट्रीय मीडिया का एक ही संदेश है 'खरीदो-खरीदो और खरीदो।' दूसरी ओर खबरों के नाम सरकारी खबरें परोसी जा रही हैं। कल तक दूरदर्शन पर यही आरोप था कि उसका सरकारी भोंपू की तरह इस्तेमाल हो रहा है। इसके विकल्प के रूप में टीवी का निजीकरण किया गया। चैनलों का निजी संसार पेश किया गया। किंतु खबरों के नाम निजी चैनलों ने सरकारी भोंपू वाला मार्ग ही पकड़ा। टीवी के स्वतंत्र स्रोत से न्यूनतम खबरें आ रही हैं। वे निरंतर सरकार के भोंपू की तरह बज रहे हैं। मीडिया का सबसे बड़ा स्रोत है सरकार और सिर्फ सरकार।
बहुराष्ट्रीय मीडिया का एक ही नारा है अमरीका अच्छा देश है, आदर्श देश है। अमरीका में आदर्श प्रशासन है। अमरीका में जिस तरह मीडिया प्रशासन के प्रौपेगैण्डा अस्त्र का काम करता है भारत में भी मीडिया ने यह संस्कृति अपना ली है अब टीवी से लेकर अखबारों तक सरकारी प्रचार अभियान की आंधी चल रही है। सरकार की किसी भी नीति के परिणामों के बारे में आलोचनात्मक आवाज एकसिरे से गायब है। सरकारी प्रचार और खबर का अंतर खत्म हो गया है। आम लोगों को सरकारी प्रचार पर विश्वास करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इसे ही कहते हैं समाचार मंदी।

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