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शनिवार, 30 जुलाई 2011

साइबर अन्ना और लोकतंत्र


  
      अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल के लिए आंदोलन धीरे धीरे अंगड़ाई ले रहा है। अन्ना को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर आमरण अनशन करने की अनुमति नहीं दी है। सवाल उठता है वे जंतर-मंतर पर ही आमरण अनशन क्यों करना चाहते हैं  ? वे दिल्ली के बाहर कहीं पर भी आंदोलन क्यों नहीं कर रहे ? अन्ना अपने कर्मक्षेत्र महाराष्ट्र में ही आमरण अनशन पर क्यों नहीं बैठते ? जंतर-मंतर तो लोकपाल का मुख्यालय नहीं है। संसद को सुनाने के लिए संसद के गेट पर ही आमरण अनशन होगा और तब ही संसद सुनेगी,यह तर्क गले नहीं उतरता।
   असल में अन्ना का दिल्ली का जंतर-मंतर एक्शन अप्रासंगिक है। दूसरे शब्दों में कहें तो लोकपाल बिल की एक मसले के रूप में विदाई हो गयी है और अन्ना अपने अहंकार के शिकार हो गए हैं। केन्द्र सरकार ने लोकपाल बिल बनाने के लिए उन्हें पिछलीबार अनशन से उठाकर लोकपाल बिल की एक विषय के रूप में पहल अन्ना के हाथ से छीन ली।अन्नाटीम को मसौदे की बातचीत में उलझाए रखा और अपना मसौदा संसद के सामन पेश करके अन्ना को हाशिए पर डाल दिया है।
      केन्द्र सरकार ने जिस तरह लोकपाल बिल को तैयार किया है और संसद में पेश करने की घोषणा की है उससे एक ही संदेश गया है कि सरकार लोकपाल बिल पर काम कर रही है और सिस्टम बनाने में लगी है। इस तरह उसने अन्ना टीम के जन लोकपाल बिल को महज एक दस्तावेज में तब्दील कर दिया है। केन्द्र सरकार ने चालाकी करके अन्नाटीम के अधिकांश सुझाव अपने बिल के मसौदे में शामिल कर लिए हैं। सरकारी मसौदे में अन्नाटीम के 32 सुझाव शामिल किए गए हैं। केन्द्र सरकार का अन्नाटीम के अधिकांश सुझावों को मानना ही जनलोकपाल बिल की मौत की घोषणा है।
     अन्ना के आंदोलन को जिस तरह कारपोरेट घराने समर्थन कर रहे हैं और कारपोरेट मीडिया कवरेज दे रहा है उसका एक अर्थ  यह भी है कि भारत में 'एंटी कारपोरेट आंदोलन' का अंत हो गया है। यह उस संघर्ष के इतिहास के अंत की घोषणा है जिसे पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष कहते हैं।
     अन्ना प्रतीक है उस समापनक्षण के जिसमें कारपोरेट घरानों के खिलाफ अब जंग नहीं लड़ी जा रही। अन्नाटीम का संघर्ष महत्वपूर्ण है कि उसने एंटी कारपोरेट आंदोलन को विदाई दे दी है। अन्ना की मीडिया इमेज की अहर्निश वर्षा का संदेश है कि अब वैकल्पिक दुनिया संभव नहीं है। अन्ना के मतवाले साइबरवीरों से लेकर दनदनाते स्वयंसेवकों तक सभी का लक्ष्य है आम जनता के मूड को एंटी कारपोरेट अनुभूतियों से बाहर निकालना।
   अन्नाटीम को आमतौर पर मीडिया ने सिविल सोसायटी नाम दिया है। इस आंदोलन में अनेक छोटे स्वयंसेवी संगठनों की शिरकत है। लेकिन अन्ना आंदोलन के पास भारत की जनता के लिए,संघर्षशील सामाजिक और वर्गीय आंदोलनों के लिए प्रेरणा देने लायक न तो कोई भाषण है और न कोई वक्तव्य है। अन्नाटीम आज तक एक भी ऐसा प्रेरणाप्रद बयान जारी नहीं कर पायी है जो सारे देश की इमेजिनेशन को पकड़े और अपनी ओर आकर्षित करे।
     अन्ना की भाषा में मर्मस्पर्शी माधुर्य नहीं है।  उनकी आवाज में हमेशा एक सैनिक का कर्कश कण्ठस्वर सुनाई देता है। वे जब बोलते हैं तो एक हायरार्की पैदा करते हुए बोलते हैं। उनकी भाषा में विनम्रता कम और अहंकार का भाव ज्यादा है। आंदोलनकारी की भाषा गांधी की भाषा होनी चाहिए। विनम्रभाषा होनी चाहिए। आंदोलनकारियों की नई फौज ऐसी भाषा बोल रही है जिसमें विचारधारा नहीं दिखती,खाली मांग दिखती हैं। जनता के मर्म को सम्बोधित करने का भाव व्यंजित नहीं होता। इसके विपरीत रेटोरिक व्यक्त होता है। रेटोरिक अपने आपमें विषय के अंत की घोषणा है।
    अन्ना के साथ विभिन्न रंगत और विचारधारा के लोग जुड़ गए हैं। उनको समर्थन देने वालों में माकपा से लेकर भाजपा तक सभी शामिल हैं। उनके साथ काम करने वाले संगठनों में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले संगठन भी हैं। इतने व्यापक विचारधारात्मक संगठनों का अन्ना के पीछे समाहार इस बात का संकेत है कि अब कारपोरेट घरानों को घबड़ाने की जरूरत नहीं हैं। विचारधारा की जगह व्यवहारवाद ने ले ली है। व्यवहारवाद का केन्द्र में आना एंटी कारपोरेट आंदोलन की समाप्ति है।      
     अन्नाटीम को जितना व्यापक मीडिया कवरेज मिल रहा है वैसा हाल के वर्षों में किसी आंदोलन को कवरेज नहीं मिला। अन्नाभक्तों के हजारों संदेश, ईमेल, बयान आदि मीडिया से लेकर इंटरनेट तक छाए हुए हैं लेकिन कारपोरेट घरानों और नव्य आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ कोई स्मरणीय प्रतिवाद नहीं है। जबकि सच यह है कि भ्रष्टाचार का गोमुख कारपोरेट घराने और नव्य आर्थिक उदार नीतियां हैं।
    अन्ना हजारे बार -बार कड़े लोकपाल का हल्ला करके अपनी वर्गीय भूमिका पर से ध्यान हटाना चाहते हैं। अन्ना का मीडिया और इंटरनेट पर प्रौपेगैण्डा खूब है लेकिन यह आम जनता में नीचे नहीं जा रहा। मीडिया और नेट प्रचार की यह सीमा है कि उसे आप आम जनता के निचले और सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक प्रसारित नहीं कर सकते। आप इंटरनेट और मोबाइल संदेशों से इवेंट निर्मित कर सकते हैं। आंदोलन नहीं कर सकते। अन्ना ने अब तक इवेंट निर्मित किए हैं। आंदोलन नहीं। आगे भी वो इवेंट ही बनाने जा रहे हैं। इवेंट को आंदोलन में तब्दील करने की कला अन्ना को नहीं आती।
     अन्ना का 16 अगस्त का इवेंट निश्चित रूप से सरकारी बिल को लेकर क्रिटिकल है। लेकिन आम जनता के मन को स्पर्श करने में असमर्थ है। अन्ना टीम की मुश्किल यह है कि वे अपने आंदोलन के जरिए एक ही एक्शन करना चाहते हैं। और यह भी चाहते हैं कि कोई सरप्राइज घटना घटित हो। यही पद्धति बाबा रामदेव ने अपनायी थी। अन्ना और रामदेव के विगत दिनों हुए आंदोलन में सरप्राइज यहीथा कि केन्द्र सरकार ने पर्याप्त दिलचस्पी ली और मंत्रियों को एक्शन में उतारा।
     अन्नाटीम की विशेषता है कि उनके पास अंतर्राष्ट्रीय से लेकर राष्ट्रीय और राज्य स्तर तक के नेटवर्क सांगठनिक कनेक्शन हैं। लेकिन इनके पास कोई विज़न नहीं है। कोई क्रांतिकारी या परिवर्तनकामी दर्शन नहीं है। अन्नाटीम और उनके अनुयायियों के नेट पर बयान और अस्वाभाविक सक्रियता का अर्थ यह भी है कि इन लोगों की नागरिक अभिलाषाओं को डिजिटल संचार हजम कर रहा है।
    अन्ना के यहां डिजिटलकल्चर का व्यापक दोहन हो रहा है। इंटरनेट पर तमाम किस्म के समूह हैं जो विभिन्न विषयों पर सक्रिय हैं। ये जीवनशैली से लेकर हिन्दुत्व, अन्ना से लेकर सेक्स, माल की बिक्री से लेकर निजी प्रचार के क्षेत्र तक सक्रिय हैं। नेट की साइबर भीड़ वस्तुतः नागरिक का विकल्प है,यह नागरिक नहीं हैं। इस साइबर भीड़ का अपना साझा एजेण्डा भी है।
     साइबर भीड़ के अचानक उदय का प्रधान कारण है समाज में सामूहिक समूहों और समुदायों की सक्रियता का ह्रास। सामाजिक जीवन में सार्वजनिक स्पेस का क्षय होने के कारण साइबर भीड़ में इजाफा भी हो रहा है। आमजीवन में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रतिवाद गायब है। इसीलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ इंटरनेट पर लोगों की संख्या बढ़ रही है। आमजीवन में दोस्त गायब हैं लेकिन फेसबुक पर सैंकड़ो-हजारों मित्रों की संख्या बढ़ रही है। आम जीवन में संवाद गायब है,आमने-सामने मिलते हैं तो बात ही नहीं करते लेकिन साइबर चैट,ईमेल.फेसबुक संवाद आदि ज्यादा करने लगे हैं। यह असल में नागरिक जीवन में संवाद,मित्रता,संगठन,समुदाय आदि के साथ नागरिकता के क्षय की सूचना है यह लोकतंत्र के क्षयिष्णु रूप की सूचना है। यह कारपोरेट घरानों के लिए आराम की नींद सोने का दौर है।
    अन्नाटीम या अन्य किसी को इंटरनेट और मीडिया में अपनी खबरों और संदेशों के प्रवाह को देखकर यह महसूस हो सकता है कि देखो कितनी जनता बात कर रही है,देख रही है,समर्थन कर रही है। लेकिन सच यह है कि यह जनता नहीं साइबर भीड़ है। वे सामाजिक या राजनीतिक घटना को कवरेज नहीं दे रहे हैं। बल्कि नजारा बना रहे हैं। वे कोई घटना नहीं बनाते बल्कि पहले से बने हुए मीडिया वातावरण में 'कुछ बयां' करते हैं। इस क्रम में वे चैनल,सेवा और माल (अन्ना आदि) की बिक्री करते हैं।यहां जो आत्मीयता और लगाव दिखाई देता है वह मार्केटिंग की कला है।  








शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

कारपोरेट मीडिया का अन्ना ऑब्शेसन


 अन्ना हजारे ने अपने अनशन की घोषणा कर दी है। वे 16 अगस्त से अनशन पर बैठेंगे। असल में इस अनशन का कोई अर्थ नहीं है। अन्ना हजारे की राजनीति का आधार है 'मैं सही और सब गलत' । लोकतंत्र में ' मैं' के लिए जितनी जगह है उससे ज्यादा 'अन्य' के लिए जगह रखनी होती है। अन्ना के राजनीतिक एजेण्डे में 'अन्य ' के लिए कोई जगह नहीं है। अन्ना की राजनीति में 'जिद' का बड़ा महत्व है,यह ऐसे व्यक्ति की जिद है जिसकी कोई सामाजिक जबावदेही नहीं है। अन्ना और उनकी टीम की लोकतंत्र के मौजूदा ढ़ांचे में कोई जबाबदेही नहीं है। वे सर्वतंत्र-स्वतंत्र हैं।

     अन्ना की पूरी समझ इस धारणा पर टिकी है कि 'सरकारी लोकपाल' भरोसेमंद नहीं है। वे 'सरकार' के प्रति संदेह की नजर रखते हैं। सरकार के प्रति अविश्वास के आधार पर राजनीति नहीं चलती। सरकार के प्रति आलोचनात्मक हो सकते हैं लेकिन सरकार के पक्ष को पूरी तरह दरकिनार नहीं कर सकते। आखिरकार सरकार भी तो देश की बृहत्तर जनता का प्रतिनिधित्व कर रही है। जबकि अन्ना तो अपने गुटों और सहयोगी संगठनों का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
      अन्ना की एक अन्य दिक्कत है कि वे हथेली पर सरसों जमाना चाहते हैं। लोकतंत्र में यह संभव नहीं है। तानाशाही में यह संभव है कि किसी एक ने कहा और उसे सारे देश पर थोप दिया गया। अन्ना की जिद है जो कहा है उसे मानो।जैसा कह रहे हैं वैसा करो। जिस दिन करने को कह रहे हैं उसदिन करो। अन्ना का स्वभाव लोकतंत्र की प्रक्रियाओं के बाहर रमण करता है। वे चाहते हैं भ्रष्टाचार पर लगाम लगे,भ्रष्ट लोगों को दण्ड मिले लेकिन मुश्किल यह है कि वे इसे अपनी गति और मति के आधार पर करना चाहते हैं।
      अन्ना की गति और मति का लोकतंत्र की गति और मति से दूर-दूर तक तार नहीं जुड़ता। अन्ना लोकतंत्र के डिक्टेटरर हैं। लोकतंत्र में डिक्टेटरशिप नहीं चलती चाहे जितनी भी अच्छी बातें करे डिक्टेटरर। अन्ना की पहले अनशन के समय मांग थी कि सारे देश में  मजबूत लोकपाल की स्थापना हो और उसके लिए तुरंत लोकपाल बिल लाया जाए। केन्द्र सरकार ने उनकी यह मांग बुनियादी तौर पर मान ली है और संसद के अगस्त से आरंभ हो रहे सत्र में लोकपाल बिल पेश होने जा रहा है। अनशन आरंभ होने के बाद अन्ना ने स्टैंड बदला और कहा कि लोकपाल के लिए संयुक्त समिति बने जिसमें सरकार और 'अन्ना ब्रॉण्ड सिविल सोसायटी' के लोग हों। सरकार ने यह भी मान लिया। संयुक्त मसौदा समिति बना दी गयी। बाद में अन्ना स्वयं ही समिति में चले आए जबकि आरंभ में वे किसी समिति में रहना नहीं चाहते थे। मजेदार बात यह है कि अन्ना क्या चाहते हैं और उनकी मांगे क्या हैं उनके विवरण और ब्यौरे बादमें आम जनता में आए। आरंभ में मांग थी लोकपाल बिल लाओ।
अन्ना अब कह रहे हैं केन्द्र सरकार ने लोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया है वह देश की जनता के साथ छल है। अन्ना जानते हैं  छल तब होता है जब कोई बात छिपायी जाए। धोखा तब होता है जब ठगा जाए। केन्द्र सरकार ने अपने नजरिए से न तो ठगा है और न किसी को धोखा दिया है। केन्द्र सरकार ने कभी नहीं कहा कि वह अन्ना की सारी बातें मानते हैं।
      केन्द्र सरकार ने अपने नजरिए से एक लोकपाल बिल तैयार किया है और उसे वह संसद में पेश करने जा रही है। सांसदों के ऊपर है कि वे उसे किस रूप में पास करें। केन्द्र सरकार ने लोकपाल बिल का वायदा किया था और वे जिस नजरिए से देख रहे हैं उसके आधार पर एक मसौदा संसद में पेश करने जा रहे हैं। सारी चीजें पारदर्शी हैं। अन्ना के लोग खुलेआम जितना बोल रहे हैं और अपनी असहमतियों का इजहार कर रहे हैं वैसा अन्य दल नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि मीडिया ने सारे मसले को अन्ना बनाम सरकार का मसला बना दिया है।
    अन्ना और सरकार के अलावा अनेक राजनीतिक दल हैं और विभिन्न किस्म के सैंकड़ों संगठन हैं जिनकी लाखों-करोड़ों की मेम्बरशिप है। मीडिया की बहस में ये संगठन एकसिरे से गायब हैं। इससे एक बात का पता चलता है कि अन्ना को लेकर मीडिया ऑब्शेसन का शिकार है। मसलन् विभिन्न विचारधारा के महिला,किसान ,मजदूर,युवा और छात्र संगठन हैं,इसके अलावा ऐसे भी स्वयंसेवी संगठन हैं जिनकी सैंकड़ों यूनिटें हैं। इनकी राय एकसिरे से गायब है।
     कारपोरेट मीडिया का अन्ना के प्रति ऑब्शेसन इस बात का सबूत है कि वह भारत की बृहत्तर ओपिनियन की उपेक्षा कर रहा है। विगत दिनों टीवी स्टूडियो में डिशकशन के नाम पर जो भीड़ अन्नाभक्तों की जुटायी गयी थी वह भी कारपोरेट मीडिया के अन्ना ऑब्शेसन को ही सामने लाती है। अन्न्भक्त स्टूडियो में अन्नाटीम से भिन्न राय व्यक्त करने वालों को हूट कर रहे थे।
     अन्नाभक्तों की बॉडी लैंग्वेज में लोकतांत्रिक विनम्रता नहीं है। वे आक्रामक और उद्धत हैं। जबरिया मनवाने में विश्वास करते हैं और मीडियासेवी लोग हैं। इन्हें लोकतंत्र के अधीर नागरिक कहना समीचीन होगा। लोकतंत्र अधीरों से नहीं धीरवान समाज से चलता है। लोकतंत्र में जिद्दीभाव की नहीं लोकतांत्रिक भाव की जरूरत है। लोकतंत्र 'मैं 'का नहीं 'हम' का खेल है।
     लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं संस्थान महत्वपूर्ण हैं। अन्ना -मनमोहन,सिविल सोसायटी-कांग्रेस-भाजपा-माकपा आदि से बहुत बड़ा दायरा है लोकतंत्र का। लोकतंत्र का आधार हैं संस्थान। संस्थानों की अपनी काम करने की गति है। उस गति की उपेक्षा करने से लोकतंत्र के नष्ट हो जाने का खतरा है। अन्ना की मुश्किल यह है कि वे लोकतंत्र के साथ संस्थान की गति के बाहर रहकर संबंध बनाना चाहते हैं।
     अन्ना का 16 अगस्त को अनशन पर बैठना एकसिरे से गलत है। उन्हें लोकपाल बिल के अंतिम शक्ल लेने तक का  इंतजार करना चाहिए। अभी पहला चरण है जिसमें मसौदा तैयार हुआ है और वह संसद में जाएगा तो उसको अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसमें जो भी समय लगे वह देना होगा ,लेकिन अन्ना के पास धैर्य नहीं है। अधीरता से अन्ना की छोटी टीम तो चल सकती है लोकतंत्र नहीं चल सकता। लोकतंत्र में प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं और उसके विभिन्न चरणों में गति बनाए रखने के लिए अपार धैर्य की जरूरत है।
     अन्ना की एक और मुश्किल है कि वे लोकतंत्र के काल्पनिक संसार में रहते हैं। लोकतंत्र को कल्पना में पाना और संस्थान की प्रक्रियाओं में ठोस रूप में देखने में जमीन- आसमान का अंतर है। लोकतांत्रिक संस्थाएं भेड़-बकरी नहीं हैं जिन्हें कोई चरवाहा हांककर ले जाए।
    लोकपाल बिल आरंभ है यह अंतिम पड़ाव नहीं है लोकपाल का। अन्ना की मुश्किल है कि वे लोकपाल और भ्रष्टाचार के भविष्य की सारी समस्याएं एक ही साथ पूरे परफेक्शन के साथ सिलटा देना चाहते हैं। लोकतंत्र में परफेक्शन, अनुभव से आता है।ख्यालों से परफेक्ट बिल या कानून हमेशा डिक्टेटर बनाते हैं। इस अर्थ में अन्ना लोकतंत्र के डिक्टेटर हैं। हमें लोकतांत्रिकअन्ना कहीं पर भी नजर नहीं आ रहा जिसमें धैर्य हो, अन्य के लिए जगह हो,संसद की प्रक्रियाओं के प्रति नमनीय भाव हो।
     अन्ना टीम का सारा प्रचार अभियान मीडिया ऑबशेसन पर टिका है। सभी बहसों में अन्नाटीम को सैलीब्रिटी के रूप में रखा जाता है। सामान्यतौर पर स्टूडियो में ऐसे लोग बुलाए जाते हैं जो अन्ना के फेन हैं या अनुयायी हैं। अन्नाटीम को मीडिया ने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बल्कि सैलीब्रिटी के रूप में कल्टीवेट किया है।
     अन्ना के इस समय जितने अनुयायी नेट पर हैं उतने जमीन पर नहीं है। जमीन पर वेही हैं जो नेट पर हैं। इनमें अधिकांश वे लोग हैं जो सोशल नेटवर्क से जुड़े हैं और सोशल नेटवर्किंग और मीडिया के ऑब्शेसन के शिकार हैं।
     इनमें एक वर्ग उन लोगों काभी है जो भीडतंत्र का हिस्सा हैं। भीडतंत्र और लोकतंत्र में कारपोरेट मीडिया भेद करना नहीं जानता। भीडतंत्र की भाषा में ही बौखलाकर अन्नाटीम ने लोकपाल बिल  को जोकपाल बिल कहा है। भीड़तंत्र के तर्कशास्त्र में सरकार या अधिकारी की बात न मानने का भाव होता है। वे सरकार की जमकर खिल्ली उड़ाते हैं। अन्नाटीम के लोग लोकतंत्र की खिल्ली उड़ा रहे हैं, मतदाता की खिल्ली उड़ा रहे हैं, वे वोटर की अज्ञानता,उपेक्षा,संवादहीनता,शिरकत के अभाव की खिल्ली उड़ा रहे हैं। स्वयं अन्ना हजारे यही हथकंडा अपना चुके हैं। स्वयं अन्ना ने आम नागरिकों की खिल्ली उड़ायी है। अन्नाटीम अपने को ज्ञानी और आम आदमी को मूर्ख मानकर तर्क दे रही है। संस्थान के नियम,कानून का शासन,कानून की गति,सरकार की मजबूरियां और जिम्मेदारियों आदि के प्रति अन्नाटीम का अनैतिहासिक नजरिया है। वे न तो संरचनाओं को ऐतिहासिक नजरिए से देख रहे हैं और न संसद और संविधान को ही।







बुधवार, 15 जून 2011

सिविल सोसायटी का संकीर्णतावाद


अण्णा हजारे के नेतृत्व वाले सिविल सोसायटी आंदोलन ने पुनः लोकपाल बिल पर वार्ताओं में शामिल होने का फैसला किया है उनकी शर्त है कि बंद कमरों में जो भी बातें हों उनको लाइव टेलीकास्ट किया जाए। यह मांग अपने आपमें बेतुकी है। वे जानते हैं जन लोकपाल बिल बनाने की प्रक्रिया आरंभ हो गई है और उसमें अब सरकार पीछे नहीं जा सकती। इस बिल के दायरे में प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को रखा जाए या नहीं यह निर्णय राष्ट्रीय विमर्श के बाद ही हो पाएगा। संसद में फैसला लिए जाने तक उन्हें इंतजार करना होगा। कारपोरेट मीडिया ने अण्णा हजारे और सिविल सोसायटी का जिस तरह महिमामंडन किया है उससे अण्णा का जमीनी यथार्थ समझ में नहीं आ सकता। सिविल सोसायटी के लोग कभी भी दैनंन्दिन जीवन के यथार्थ सवालों को नहीं उठाते,वे हमेशा उन्हीं सवालों को उठाते हैं जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों की संगति में आते हैं। मसलन वे महंगाई रोकने और भूमि सुधार लागू करने के लिए आंदोलन नहीं करते। उल्लेखनीय है अण्णा हजारे ने अपनी स्वयंसेवी राजनीति की धुरी धर्म को बनाया है। महाराष्ट्र के रेलीगांव सिद्धि में उन्होंने पर्यावरण को धर्म से जोड़ा है। पर्यावरण संरक्षण को हिन्दू संस्कारों और रीति-रिवाजों से जोड़ा है। अण्णा का सार्वजनिक आंदोलन को धर्म से जोड़ना अपने आप में साम्प्रदायिक कदम है। इस इलाके में अन्ना का सैन्य अनुशासन है। इस इलाके में हिन्दी फिल्मी गाने सुनना मना है। फिल्में देखना मना है। सिर्फ भजन सुन सकते हैं और धार्मिक फिल्में देख सकते हैं। अण्णा के सारे फैसले मंदिर में भगवान के नाम पर होते हैं। वहां पंचायत के चुनाव नहीं होते। दलित दोयमदर्जे का व्यवहार झेलते हैं। मासकल्चर के विभिन्न रूपों पर एकदम पाबंदी है। 
          अण्णा ने अपने एक बयान में कहा है कि "  मेरा अनशन किसी सरकार या व्यक्ति के खिलाफ पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं था बल्कि वह तो भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्योंकि इसका आम आदमी पर सीधे बोझा पड़ रहा है।" असल में अन्ना ने अनशन के साथ ही अपना स्टैंड बदला है। अण्णा का आरंभ में कहना था केन्द्र सरकार संयुक्त मसौदा समिति की घोषणा कर दे मैं अपना अनशन खत्म कर दूँगा। बाद में अन्ना ने तुरंत एक नयी मांग जोड़ी कि मसौदा समिति का अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनाया जाए जिसका नाम मैं दूं। केन्द्र ने जब इसे मानने से इंकार किया तो अन्ना ने तुरंत मिजाज बदला और संयुक्त अध्यक्ष का सुझाव दिया लेकिन सरकार ने यह भी नहीं माना और अंत में अध्यक्ष सरकारी मंत्री बना और सह-अध्यक्ष गैर सरकारी शांतिभूषण जी बने। लेकिन दिलचस्प बात यह हुई कि अन्ना इस समिति में आ गए। जबकि वे आरंभ में स्वयं नहीं रहना चाहते थे। मात्र एक कमेटी के निर्माण के लिए अन्ना ने जिस तरह प्रतिपल अपने फैसले बदले उससे साफ हो गया कि पर्दे के पीछे कुछ और चल रहा था।
       अण्णा हजारे के आंदोलन के पीछे मनीपावर काम कर रही है मात्र 4 दिन में 83 लाख रूपये चंदा इकट्ठा कर लिया गया। जिसमें से तकरीबन 32 लाख रूपये खर्च भी कर दिए गए। यानी अन्ना हजारे के लिए आंदोलन हेतु संसाधनों की कोई कमी नहीं थी।
असल में स्वयंसेवी संगठनों की एनजीओ संस्कृति नियोजित कारपोरेट पूंजी की संस्कृति है। स्वतःस्फूर्त संस्कृति नहीं है। भारत में हजारों एनजीओ हैं जिनको विदेशों से सालाना पांच हजार करोड़ रूपये से ज्यादा चंदा विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संगठनों द्वारा प्रदान किया जाता है।एनजीओ समुदाय में काम करने वाले लोगों की अपनी राजनीति है। विचारधारा है और वर्गीय भूमिका भी है। वे परंपरागत दलीय राजनीति के विकल्प के रूप में काम करते हैं। अण्णा हजारे के इस आंदोलन के पीछे जो लोग सक्रिय हुए हैं उनमें एक बड़ा अंश ऐसे लोगों का है जो विचारों से संकीर्णतावादी हैं।
       मीडिया उन्माद,अण्णा हजारे की संकीर्ण वैचारिक प्रकृति और भ्रष्टाचार इन तीनों के पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों के विचारधारात्मक स्वरूप का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। इस प्रसंग में इंटरनेट पर सक्रिय भ्रष्टाचार विरोधी फेसबुक मंच पर आयी टिप्पणियों का सामाजिक संकीर्ण विचारों के नजरिए से अध्ययन करना बेहतर होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय लोग इतने संकीर्ण और फासिस्ट हैं कि वे अण्णा हजारे के सुझाव से इतर यदि कोई व्यक्ति सुझाव दे रहा है तो उसके खिलाफ अपशब्दों का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। वे इतने असहिष्णु हैं कि अण्णा की सामान्य सी भी आलोचना करने वाले व्यक्तिगत पर कीचड उछाल रहे हैं। औकात दिखा देने की धमकियां दे रहे हैं। यह अण्णा के पीछे सक्रिय फासिज्म है। अण्णा की आलोचना को न मानना,आलोचना करने वालों के खिलाफ हमलावर रूख अख्तियार करना संकीर्णतावाद है। इस संकीर्णतावाद की जड़ें भूमंडलीकरण में हैं। अन्ना हजारे फिनोमिना हमारे सत्ता सर्किल में पैदा हुए संकीर्णतावाद का एनजीओ रूप है। इसका लक्ष्य है राजनीतिक दलों को बेमानी करार देना। संसद-विधानसभा आदि के द्वारा तय लोकतांत्रिक प्रक्रिया और परंपराओं का उल्लंघन करना। आयरनी यह है कि अण्णा हजारे के संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारों को जानने के बाबजूद बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक मनोदशा के लोग उनके साथ हैं। ये ही लोग प्रत्यक्षतः आरएसएस के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन अन्ना हजारे के साथ खड़े होने के लिए तैयार हैं जबकि अन्ना के विचार उदार नहीं संकीर्ण हैं। असल में एनजीओ संस्कृति की आड़ में संकीर्णतावादी -प्रतिगामी विचारों की जमकर खेती हो रही है।इनका तेजी से मध्यवर्ग में प्रचार-प्रसार हो रहा है। ये सत्ता के विकल्प का दावा पेश करते हैं। तुरंत समाधान की मांग करते हैं। यह 'पेंडुलम इफेक्ट' पद्धति है। इसमें चट मगनी पट ब्याह। यह संकीर्णतावादी आर्थिक मॉडल से जुड़ा फिनोमिना है। वे छद्म संदेश दे रहे हैं सरकार परफेक्ट नहीं हम परफेक्ट हैं। सरकार की तुलना में अन्ना की प्रिफॉर्मेंश सही है। जो काम 42 साल से राजनीतिक दल नहीं कर पाए वह काम एनजीओ और सिविल सोसायटी संगठनों ने कर दिया। असल में सिविल सोसायटी आंदोलन की धुरी है लोकतांत्रिक संस्थाओं ,नियमों और परंपराओं की अवहेलना करना।इसे मनमोहन सरकार बढ़ावा दे रही है।
          


मंगलवार, 14 जून 2011

अन्ना हजारे और सिविल सोसायटी का नाटक


           सिविल सोसायटी का मीडिया में बोरिंग नाटक चल रहा है । सिविल सोसायटी के बारे में एक जमाने में समाजशास्त्रियों ने उच्चवर्ग को रखा था और आज भी सिविल सोसायटी में वे ही आते हैं। यह जड़ वर्ग का समाज है।मीडिया में अन्ना और कांग्रेस  में नोंक-झोंक चल रही है।सोनिया गांधी मजे ले रही हैं।मनमोहन सिंह आराम फरमा रहे है हैं,मीडिया बतखोरी कर रहा है। मूलतः अन्नाटीम और कांग्रेस के बीच की पूरी बहस अर्थहीन है। मूल बात है जन लोकपाल बिल और उस पर कोई बात नहीं हो रही।
अन्ना हजारे नाराज हैं कि उन्हें संघ का एजेंट कहा है कांग्रेस नेताओं ने। वैसे अन्ना का यह भी मानना हो सकता है कि वे कभी संघ की शाखाओं में नहीं गए ,संघ के ऑफिस भी नहीं गए फिर उन्हें एजेंट क्यों कहा गया ? असल में कांग्रेस नेता अन्ना के विचारधारात्मक चरित्र के आधार पर बोल रहे हैं।
     संघ ने अन्ना की जिस तरह मदद की ,वह संघ के लिए नई बात नहीं है,वह इस तरह के मुखौटों का इस्तेमाल करता रहा है।यह भी सच है अन्ना किसी दल के सदस्य नहीं हैं। लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि संघ उनका समर्थन नहीं कर रहा। संघ कह रहा है कि वह समर्थन कर रहा है। ऐसे में अन्ना के खंडन का कोई अर्थ नहीं है। संघ यदि अन्ना का समर्थन कर रहा है तो इसमें गलत क्या है ? अन्ना रक्षात्मक क्यों हैं ? संघ का समर्थन मिलना कोई गाली नहीं है। संघ के लोगों को भी समझना चाहिए कि वे इस तरह के बयानों पर भड़कें नहीं। कौन किसके साथ है यह आम लोग जानते हैं ,जो नहीं जानते थे, वे जान गए हैं ,या जान जाएंगे। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह कायम है कि अन्ना हजारे ने अपना आंदोलन तब क्यों शुरू किया जब सोनिया गांधी के नेतृत्ववाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने लोकपाल बिल पर मसौदा बना लिया था।प्रधानमंत्री वायदा कर चुके थे संसद में जल्द ही लोकपाल बिल पेश करने का। अन्नाटीम के अधिकांश लोग उस समिति में थे जो सोनिया गांधी ने बनायी थी। सवाल यह है कि उस समय प्रणव मुखर्जी को अन्ना आंदोलन में शामिल लोगों का संघ से लिंक दिखायी क्यों नहीं दिया ? अन्ना टीम के लोग आज भी सोनिया गांधी की सलहकार टीम में क्यों हैं ? असल में अन्ना बनाम कांग्रेस की यह नूरा फाइट है यह रामलीला मैदान लाठीचार्ज का विरेचन है।
प्रणव मुखर्जी और कांग्रेस के नेता जबाब दें कि सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में,जो केन्द्र सरकार को नीतियां बनाने का सुझाव देती है,वहां पर सिविल सोसायटी के लोगों को बड़ी तादाद में क्यों रखा है ? क्या भारत में सिविल सोसायटी वालों के अलावा नीतियों पर सोचने वाले विचारक नहीं हैं ? सिविल सोसायटी वालों को सरकार के सिर पर सोनिया ने बिठाया है,क्या वे उन्हें सरकार के सिर से उतारने को तैयार हैं ?असल में सिविल सोसायटी के लोगों को नीति-निर्धारक बनाकर कांग्रेस ने स्वयं ही संसद को बौना बनाया है।सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने देश के सामने गंभीर लोकतांत्रिक संकट पैदा कर दिया है। जो सलाहकार है वे चुनेहुए प्रतिनिधियों की राय की उपेक्षा कर रहे हैं,संसद,मंत्री आदि को ठेंगा दिखा रहे हैं। इस समूची प्रक्रिया में लोकतंत्र खोखला हो रहा है। ये वे लोग हैं जो आए दिन राजनीतिक दलों और नेताओं को गरियाते हैं और सबसे भ्रष्ट राजनीतिक दल की सलाहकार समिति में बैठे हैं।
अन्ना हजारे का आंदोलन जनलोकपाल बिल से ज्यादा टीवी लाइव कवरेज पर केन्द्रित है। अन्ना टाइप नेतागण और सिविल सोसायटी वाले टीवी क्रांति के टॉकशो के बातूनी बच्चे हैं । यही वजह है कि वे वीडियो कवरेज और लाइव टेलीकास्ट की मांग कर रहे हैं। प्रणव मुखर्जी का कहना है  लोकपाल बिल मसौदा कमेटी की बैठकों का ऑडियो कवरेज मिनिस्ट्री ऑफ पर्सनल की वेबसाइट पर  उपलब्ध है।सवाल यह है क्या इस तरह की सुविधा अन्य किसी कमेटी की मीटिंग को दी गई ? संयुक्त संसदीय समिति या विभिन्न मंत्रालयों की अन्य समितियों की ऑडियो रिकॉर्डिंग क्यों नहीं करायी गयी ? सिविल सोसायटी के लोगों के साथ यह खास व्यवहार क्यों ?
उल्लेखनीय है कांग्रेस पार्टी ने आरएसएस के खिलाफ सीधे हमला बोला है।सवाल उठता है कांग्रेस को संघ परिवार के खिलाफ खुलकर सामने आने में इतनी देर क्यों लगी ? कांग्रेस कोरकमेटी के अंदर इतने पंगे हैं कि अन्ना हजारे पर राय बनाने में 2 माह लग गए ? यह वही कांग्रेस है जो अपने नेताओं के खुले विचारों के लिए जानी जाती थी। काश ,कोर कमेटी के कभी तो मिनट्स लीक हों ? कोई खोजी पत्रकार निकालकर लाए आखिर प्रणव मुखर्जी बाबा के साथ हैं या दिग्विजय सिंह के ?
अन्ना हजारे लाख कहें कि संघ के एजेंट नहीं हैं,प्रणव मुखर्जी तो 'ज़ौक़' के लफ़्जों में कह रहे हैं-"हम उनकी चालसे पहचान लेंगे उनको बुर्के़ में। हजार अपनेको वह हमसे छिपायें सरसे पाँवों तक।।"
        दिग्विजय सिंह का मानना है कि पीएम को भी लोकपालबिल के दायरे में लाया जाए, इसके पीछे कांग्रेस के अंदर का विचारधारात्मक संघर्ष झलक रहा है, अन्ना हजारे तो मात्र पीएम , सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और क्लर्को को उसके दायरे में लाने की बात कर रहे थे लेकिन दिग्विजय सिंह ने कारपोरेट घरानों और एनजीओ संगठनों को भी इसके दायरे में लाकर नई पहल की है ,देखना है अन्ना हजारे क्या कहते हैं ?लगता है यह राहुल गांधी का आइडिया है। असल में अन्ना वेसब्र हैं और बाबा रामदेव उग्रस्वभाव के हैं इस पर मीर का ही एक शेर याद आ रहा है,लिखा है, "ख़ुदा जाने क्या होगा अंजाम इसका। मैं वेसब्र इतना हूँ,वोह तुन्दखू है।।" ( तुन्दखू यानी उग्रस्वभावी)
अन्ना हजारे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने जो आरोप लगाएं हैं उस पर 'मीर' का एक शेर याद आ रहा हैं,शेर है- "तुहमतें चन्द अपने जिम्मे धर चले।किसलिए आए थे और क्या कर चले ?"
सवाल यह है कि जन लोकपाल बिल के दायरे में पीएम,सीएम,न्यायाधीश,मुख्यन्याधीश और सभी कोटि के कर्मचारी रख दिए जाएं तो क्या भ्रष्टाचार कम हो जाएगा ?भ्रष्ट लोगों को फांसी पर लटकाने या आजन्म कैद में रखने की व्यवस्था कर दी जाए तो क्या सतयुग आ जाएगा ? लगता है अमेरिका नहीं गए सिविल सोसायटी वाले ,वहां सब कुछ कड़ा है लेकिन भ्रष्टाचार बढ़ा है ?
यह सवाल भी उठा है कि अन्ना हजारे और उनके साथ के स्वयंसेवी संगठनों को किससे पैसा मिलता है ? उनको सरकार से कभी पैसा मिला है ? किसी कारपोरेट घराने से पैसा लिया है ? विदेश से पैसा मिला है ? आम जनता से कितना पैसा एकत्रित किया है ? हमारा मानना है स्वयंसेवी संगठनों को विदेश से मिलने वाले धन पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए । 
हाल ही में अन्ना ने दुखी होकर सोनिया गांधी को पत्र लिखा है। सच यह है कीचड़ उछालने का काम अन्ना के मित्रों ने पहले किया,उन्होंने राजनीतिकदलों और राजनेताओं पर पहले हमला बोला।साथ ही सांसदों-विधायकों को भला-बुरा कहा। अब वे यह कैसे उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी राजनीतिक मरम्मत न की जाए। यह तो राजधर्म है।अन्ना हजारे टीम को याद रखना होगा भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं राजनीतिकदल ,न कि सिविल सोसायटी और साम्प्रदायिक-धार्मिक संगठन।
अन्ना हजारे का गुस्सा जायज है,यह सच है वे संघ के सदस्य नहीं हैं क्योंकि संघ में सदस्यता की रसीद नहीं काटी जाती ,और न एजेंट का ही कोई पद है। अन्ना तो समाजसेवा करते हैं और संघ परिवार सामाजिक संगठन के नाते उनकी मदद करता है। संघ की सेवाएं वे पहले भी कई मर्तबा ले चुके हैं। कई मर्तबा संघ को सेवाएं दे चुके हैं। इसमें अन्ना को गुस्सा क्यों आ रहा है ? क्या अन्ना कहेंगे कि संघ फासिस्ट संगठन है ? अन्ना और उनका समूह देश की ठोस समस्याओं से बेखबर है। इसका दो-एक उदाहरण ही काफी हैं।
देश में विश्वविद्यालयों -कॉलेजों में 58 प्रतिशत पद अभी तक खाली पड़े हैं। खाली पदों को भरने में सरकारों की कोई दिलचस्पी नहीं है। कच्चे-पक्के बंदों से शिक्षण में मदद ले रहे हैं ,और माटी के माधो तैयार कर रहे हैं। राजनीतिक दलों , शिक्षक संगठनों , अन्ना,बाबा रामदेव और सिविल सोसायटी वाले को भी ख्याल नहीं आता,सवाल उठता है क्या शिक्षा का सिविल सोसायटी से कोई संबंध है ?
अन्ना हजारे में जो जीवन की सुंदरता देख रहे हैं संभवतःइसे ही ध्यान में रखकर अकबर इलाहाबादी ने लिखा- "बर्क़के लैम्पसे आँखोंको बचाये अल्लाह। रौशनी आती है,और नूर चला जाता है।।"हमारे कुछ मित्र हैं अन्ना हजारे- बाबा रामदेव की आलोचना कर रहे बुद्धिजीवियों पर नाराज हैं उनके लिए अकबर इलाहाबादी का एक शेर है- "हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिले-जब्ती समझते हैं।कि जिनको पढ़के,लड़के बापको खब्ती समझते हैं।।"

अन्ना हजारे के संदर्भ यह सवाल उठता है कि क्या भारत में लोकतंत्र के साथ command-obedience relationship का मेल बैठता है? यह लोकतंत्र की मूल स्प्रिट के ही खिलाफ है ।अपने कर्मक्षेत्र रेलीगांवसिद्धि में अन्ना ने इसी संबंध को लागू किया है। सवाल यह है क्या मंदिरों में जनता के भविष्य के फैसले होंगे ?  
जिस तरह भक्ति साहित्य को प्रेम के बिना नहीं पढ़ सकते वैसे ही लोकतंत्र को धर्म को त्यागे बिना नहीं समझ सकते। धर्म तो लोकतंत्र की महाबाधा है। लोकतंत्र का कुर्बानी के बिना विकास नहीं होता । बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के पीछे की जनता पर बहुत जोर दिया है मीडिया ने। बाबा के यहां जनता नहीं योग शिविर वाले लोग आए थे। और अन्ना के साथ में वे लोग ज्यादा थे जो विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों में काम करते थे।इनका नेटवर्क है । इनमें सैंकड़ों स्वयंसेवी होलटाइमर हैं। जनता कम थी दोनों के यहां। सरकार में बैठे अन्ना के अंधभक्तों पर हसरत मोहानी का शेर याद आ रहा है,शेर है," हम हाल उन्हें यूँ सुनाने लगे हैं। कुछ कहते नहीं ,पाँव दबानेमें लगे हैं।।"









शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे, एनजीओ राजनीति और मीडिया का कटु सत्य

अन्ना हजारे वायदे के मुताबिक आज सुबह 10 बजे अनशन तोड़ देंगे और अपने ठीया पर चले जाएंगे। अन्ना हजारे का अनशन निश्चित रूप से एक सकारात्मक अनशन था। यह अनशन नव्य उदार राजनीति की दबाब की राजनीति का हिस्सा है। नव्य उदार राजनीति अनेक काम जनता के दबाब से करती है।सत्ता पर्दे के पीछे रहती है और आंदोलनकारी आगे रहते है। यह पॉलिटिक्स फ्रॉम विलो का खेल है। आम तौर पर जमीनी राजनीति प्रतिवादी होती है रीयलसेंस में। लेकिन नव्य उदार परिप्रेक्ष्य में काम करने वाले संगठनों के द्वारा सत्ता,संगठन और आंदोलन का दबाब की राजनीति के लिए इस्तेमाल हो रहा है। अन्ना हजारे का आमरण अनशन उसका ही हिस्सा है।
अन्ना हजारे ने जो कहा और किया है उस पर कम से कम इस आंदोलन के संदर्भ में गंभीरता के ताथ विचार करने की जरूरत है। अन्ना का मानना है लोकपाल बिल के लिए जो कमेटी बने उसका प्रधान किसी ऐसे व्यक्ति को बनाया जाए जो अ-राजनीतिक हो। आयरनी यह है कि अन्ना की तरफ से सह-अध्यक्ष के रूप में शांतिभूषण का नाम दिया गया जो आजीवन राजनीति करते रहे हैं ,देश के कानून मंत्री रहे हैं। वे वाम ऱूझान की राजनीति करते रहे हैं। अतः अन्ना की कथनी और करनी में अंतर है।
दूसरी बात यह कि एनजीओ की राजनीति करने वाले संगठनों में सूचना अधिकार रक्षा आंदोलन से जुड़े केजरीवाल भी राजनीति कर रहे हैं। यह बात दीगर है कि वे किसी दल से जुड़े नहीं हैं। जनाधिकार,मानवाधिकार आंदोलनों से जुड़े प्रशांतभूषण पेशे से वकील है लेकिन मानवाधिकार राजनीति से जुड़े हैं। हां संतोष हेगडे राजनीति से जुड़े नहीं हैं। उससे भी बडा सवाल यह है कि एनजीओ वाले जिस अ-राजनीति की राजनीति की हिमायत करते हैं उसका लक्ष्य भी राजनीति है।
भारतीय लोकतंत्र में नामांकित लोकतंत्र नहीं चलता जैसा अन्ना हजारे और उनके जैसे समाजसेवी सोच रहे हैं। वे जानते हैं कि अमेरिका में सिविल सोसायटी आंदोलन बहुत ताकतवर है लेकिन वे लोकतंत्र में चुनाव नहीं जीत पाते।सिविल सोसायटी आंदोलन का आर्थिक स्रोत है कारपोरेट घराने। अन्ना हजारे और उनके समर्थकों को राजनीति की गंदगी को साफ करना है तो उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए। चुनाव लड़कर ईमानदार छवि के लोगों को जिताना चाहिए। वे यह भी देखें कि आम जनता कितनी उनकी सुनती है ? कितना उनके साथ है ?यह भी तय हो जाएगा कि मोमबत्ती मार्च और जनता के मार्च में कितना साम्य और बैषम्य है ? मोमबत्ती वाले युवा कितने टिकाऊ हैं ? कितने संघर्षशील है ?

अन्ना हजारे जानते हैं तथाकथित सिविल सोसायटी के नेतागण सिर्फ मीडियावीर हैं। जनता में बहुमत का समर्थन पाना उनके बूते के बाहर है। लोकतंत्र को हम सिविल सोसायटी के नाम पर ऐसे लोगों के रहमोकरम पर नहीं छोड़ सकते जिनकी कोई राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं है।भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबू जयप्रकाश नारायण का जनता पार्टी का प्रयोग पूरी तरह फेल हुआ है। केन्द्र में सत्ता मिलने के बाबजूद जनता पार्टी की सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल पास नहीं करवा पायी। उस सरकार में स्वयं शांतिभूषण भी थे। आज वही शांतिभूषण कह रहे हैं कि हम 1978 का लोकपाल बिल पास कराना चाहते हैं। अजब बात है जब स्वयं सत्ता में थे तो कर नहीं पाए और अब दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना चाहते हैं।

अन्ना हजारे जानते हैं राजनीतिक दलों में वामपंथियों ने लंबे समय से लोकपाल बिल के दायरे में प्रधानमंत्री को भी शामिल करने की मांग की थी,उस समय इसका सभी ने विरोध किया। यहां तक बाबू जयप्रकाश नारायण भी पीछे हट गए।भाजपा और कांग्रेस ने भी विरोध किया था। खैर अब देखना होगा कि वामदलों की लोकपाल बिल के बारे में एक जमाने में सुझायी सिफारिशों के अलावा कौन सी नई चीज है जिसे नयी कमेटी सामने लाती है।
अन्ना हजारे का टेलीविजन चैनलों से जिस तरह धारावाहिक कवरेज हुआ है वह अपने आप में खुशी की बात है लेकिन इस कवरेज में एक बात साफ निकलकर आयी है लोग भ्रष्टाचार से दुखी हैं। वे इससे मुक्ति की आशा में ही आए थे,लेकिन लोकपाल बिल का आम जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार से कोई संबंध नहीं है। इसका संबंध जन प्रतिनिधि के भ्रष्टाचार से है। सरकारी अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी ढ़ेर सारे कानून आज भी हैं और सबसे ज्यादा भ्रष्ट कौन हैं ? हमारे आईएएस-आईपीएस अफसरान ।
विगत 60 सालों में भ्रष्ट अफसरों की एक पूरी पीढ़ी पैदा हुई है। यह पीढ़ी भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों के होते हुए पैदा हुई है। इनसे भी ज्यादा करप्ट हैं देशी-विदेशी कारपोरेट घराने जो येन-केन प्रकारेण काम निकालने के लिए खुलेआम भ्रष्ट तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। कारपोरेट भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे ने कोई मांग क्यों नहीं उठायी ? अन्ना जानते हैं कि सरकारी बैंकों का 80 हजार करोड़ रूपया बिना वसूली के डूबा पड़ा है और उसमें बड़ी रकम कारपोरेट घरानों के पास फंसी पड़ी है। क्या कोई समाधान है जन लोकपाल बिल में ?कारपोरेट करप्शन के 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में हाल के बरसों में टाटा-अम्बानी आदि का नाम आया है। क्या राय है अन्ना हजारे की ? किसने हल्ला मचाया करपोरेट लूट के खिलाफ ? राजनीतिक दलों ने।

देश के एनजीओ आंदोलन की धुरी है देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों का डोनेशन। इसके जरिए विभिन्न स्रोतों से 5 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा पैसा विदेशों से एनजीओ संगठनों को आ रहा है । क्या गांधी के अनुयायियों को यह पैसा लेना शोभा देता है ? गांधी ने भारत में आंदोलन के लिए विदेशी धन नहीं लिया था। लेकिन एनजीओ आंदोलन,सिविल सोसायटी आंदोलन , तथाकथित गांधीवादी,मानवाधिकारवादी,पर्यावरणपंथी संगठन विदेशी फंडिंग से चल रहे हैं।
    सवाल यह है कि वे देश की जनता की सेवा के लिए यहां की जनता से चंदा लें,विदेशी ट्रस्टों,थिंकटैंकों,कारपोरेट धर्मादा दानदाता संस्थाओं से चंदा क्यों लेते हैं ? क्या यह गांधीवादी राजनीति के साथ राजनीतिक भ्रष्टाचार नहीं है ?यदि है तो अन्ना हजारे सबसे पहले एनजीओ संगठनों को विदेशी धन लेकर संघर्ष करने से रोकें। ध्यान रहे एनजीओ को विदेशी धन ही नहीं आ रहा , राजनीति करने के विदेशी विचार भी सप्लाई किए जा रहे हैं। वे विदेशी राजनीति की भारतीय चौकी के रूप में काम कर रहे हैं। काश अन्ना उसे रोक पाते !

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