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बुधवार, 28 दिसंबर 2016

हिन्दू धर्म महान!कालाधन महान !





पीएम नरेन्द्र मोदी की जनविरोधी इमेज क्रमशः बेनकाब हो रही है।लेकिन वे अभी भी मीडिया में बादशाह हैं!उनका जलवा देखने लायक है,हर चैनल उनके हर भाषण को लाइव टेलीकास्ट करता है,वे जब तक बोलें लाइव प्रसारण अबाधित चलता रहता है।यह सुविधा अभी किसी भी नेता के पास नहीं है।राहुल गांधी-केजरीवाल-ममता बनर्जी –सीताराम येचुरी इनका किसी का भी कवरेज मोदी के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता।सं
चार के इस वैषम्य का लाभ मोदीजी को मिल रहा है ।
    आरएसएस और भाजपा के टीवी कवरेज का अधिकतर समय घेरा हुआ है।टीवी कवरेज ने ही मोदी का कद सामान्य से असामान्य बनाया है।जब तक टीवी कवरेज के अ-संतुलन को विपक्ष दुरूस्त नहीं करता,जमीनी हकीकत में कोई अंतर नहीं आएगा।यह सच है जमीनी स्तर पर जनता परेशान है और बड़े पैमाने पर गरीबों और मजदूरों को नोट नीति ने आर्थिक नुकसान पहुँचाया है।हम सब मध्यवर्ग के लोग इस नुकसान को देखने और सुनने को तैयार नहीं हैं,इसने मध्यवर्ग के मन में गरीबों और मजदूरों के प्रति बैठी नफरत और दूरी को एकबार फिर से उजागर कर दिया है,इससे वे लेखक और बुद्धिजीवी भी बेनकाब हुए हैं जो बातें जनता की करते हैं लेकिन संकट की इस अवस्था में उनको परेशान आदमी जनता नजर ही नहीं आ रहा !

इसके विपरीत उनको कालेधन ,मोदी की महानता,कांग्रेस के 70साल के दुष्कर्म और वाम की कमजोरियां ही याद आ रही हैं।जबकि हकीकत यह है नोट नीति के कारण आम जनता की परेशानियों को पहले हल करने पर ,उन समस्याओं को सामने लाने पर जोर होना चाहिए,लेकिन हम सब इधर-उधर भाग रहे हैं।

मोदीभक्त इस बात से भी परेशान हैं कि हमारे जैसे लोग अहर्निश मोदी के खिलाफ क्यों लिखते रहते हैं ॽअथवा विपक्ष मोदी के खिलाफ दुष्प्रचार क्यों कर रहा है ॽमोदीजी तो सही काम कर रहे हैं ॽआज समस्या यह नहीं है कि मोदीजी के खिलाफ कौन क्या बोल रहा है ,समस्या यह है नोट नीति के भंवर में से देश कैसे निकलेगा ॽ पहले ही इस भंवर में लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी को पामाली की ओर ठेल दिया गया है।देश के हर नागरिक को नोट नीति ने परेशान किया है,कष्ट दिए हैं,ये ऐसे कष्ट हैं जो जनता को मिलने नहीं चाहिए लेकिन मिले हैं,जिनको कष्ट मिले हैं या जिनकी नौकरी चली गयी ये वे लोग हैं जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया,टैक्सचोरी नहीं की,कालाबाजारी नहीं की,कालेधन को हाथ तक नहीं लगया,बेइंतहा ईमानदार थे फिर भी उनको तकलीफें उठानी पड़ रही हैं।

मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हूँ , आज तक मेरे विश्वविद्यालय की एसबीआई ब्रांच मुझे नियमानुसार एक भी बार 24 हजार रूपये नहीं दे पाई है,मैं कईबार जाकर लौट आया,जितनीबार गया काउंटर पर यही कहा गया 24 हजार नहीं मिलेंगे,मैंने प्रतिवाद में पांच हजार ,सात हजार लेने से इंकार किया,मैं हर महिने 30हजार रूपया आयकर देता हूं,मेरे पास कोई कालाधन नहीं है,भाड़े के घर में रहता हूँ,कार नहीं है,सामान्य मध्यवर्गीय जिन्दगी जीता हूँ।लिखने-पढ़ने की आदत है।इसके बावजूद यदि मैं अपना पैसा बैंक से नहीं निकाल सकता तो आप कल्पना करें आम आदमी को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा होगा,मैं नौकरी करता हूँ,लेकिन पैसा नहीं है,वे लोग जिनकी नौकरी चली गयी ,वे कैसे गुजारा करेंगे ॽयह सामान्य सच है कि भयानक सच है,यदि इस सच को देखकर आपको बेचैनी नहीं होती तो मैं यही कहूँगा आपकी नागरिकचेतना मर गयी है।आपका नागरिक व्यक्तित्व खत्म होगया है,आप गुलाम हैं और गुलामी को आप मौज में गुजारें, गुलामी में आपको कोई बेचैनी नहीं होगी।

आज यह बेमानी है कि मोदी फासिस्ट हैं या अति-राष्ट्रवादी हैं,घृणा के प्रचारक हैं या सौजन्य के प्रतीक हैं,मोदीजी सभ्य हैं या असभ्य हैं ! क्योंकि आपने गुलामी को अपनी आदत,संस्कार बना लिया है।आपका हिन्दूमन आपको कभी नागरिक की तरह सोचने नहीं देता,अन्य के कष्टों को देखकर मन में कभी प्रतिवाद करने की इच्छा नहीं होती,आपके पास बुद्धि है,डिग्री है,शोहरत है,पद है,सुविधा है,मोदीभक्ति का तमगा है,तुम कार में चलते हो,कार्ड से पेमेंट देते हो,बैंक से लेकर बिग बाजार तक तुमको कहीं पर भी दो हजार रूपये मिल जाते हैं और तुम खुश हो,क्योंकि तुम सुरक्षित जीवन जी रहे हो ! ध्यान रहे गुलाम को भी यही सब चाहिए,गुलाम मानसिकता अन्य को देख नहीं पाती !

मैंने जब हिन्दूमन से नोट नीति को जोड़ा तो अनेक हिन्दुओं को कष्ट हुआ,मैं साफ कह दूँ ,मैं हिन्दूमन,हिन्दू संस्कार,हिन्दू आदतें आदि को मानसिक गुलामी की जंजीरें मानता हूँ।मोदीजी बड़े ही कौशल के साथ इन जंजीरों का अपने पक्ष में दुरूपयोग कर रहे हैं,वे नोट नीति की आड़ में,तथाकथित कालेधन और बेनामी संपत्ति के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम की आड़ में हिन्दुओं को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। वे फासिस्ट हैं या नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण है उनका जनविरोधी चेहरा जो नोट नीति की आड़ में छिपा हुआ है।

अब तक जितने लोगों के यहां छापे पड़े हैं ये वे लोग हैं जिनको आयकर वाले पहले से जानते थे,इनमें कोई भी नया आदमी नहीं है।कालेधन का न मिलना,नए कालेधन के मालिक का मिलना ,लेकिन कालेधन का धुंआधार प्रचार करते रहना,सिर्फ हिन्दू मन से ही संभव है,धार्मिक मन भगवान की जितनी सेवा करता है भगवान के विपरीत उतना ही आचरण करता है।दिलचस्प बात है अब तक पकड़े गए कालेधन के मालिक अधिकांश हिन्दू हैं!सवाल यह है जैन मतावलम्बी कालेधन वाले कितने अमीर पकड़े गए ॽ जबकि धंधे में जैनियों का वर्चस्व है।



उल्लेखनीय है धर्म के प्रसार के साथ पाप का प्रसार तेजी से होता है।जितना धर्म रहेगा पाप उससे ज्यादा रहेगा।धर्म की महत्ता तब तक है जब तक समाज में पाप और दुष्कर्मों का साम्राज्य बना रहे,जिन समाजों में पाप और दुष्कर्म नहीं हैं वहां धर्म भी नहीं है।धर्म का उद्घोष पाप की सत्ता-महत्ता का जयघोष है,इसी तरह कालेधन के खिलाफ मोदीजी का जयघोष इस बात का संकेत है कालाधन महान है,अजेय है।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

आरएसएस, बुद्धिजीवी और मीडिया का झूठ

        हाल ही में आरएसएस के लेखकों-बुद्धिजीवियों की एक बैठक संपन्न हुई ,जिसमें आरएसएस के नेताओं ने लेखकों-बुद्धिजीवियों को यह आदेश दिया कि वामपंथी लेखकों की तरह ज्यादा से ज्यादा लेखकों को प्रभावित करो,ऐसा साहित्य लिखो जिससे आम जनता हमारे करीब आए और युवा लेखक पैदा हों जो संघ की विचारधारा का प्रचार करें।

संघी नेता जानते हैं कि संघ की विचारधारा में लेखक-बुद्धिजीवी पैदा करने की क्षमता नहीं है।यह मूलतःबांझ विचारधारा है।संघ सत्ता पा सकता है,लेकिन लेखक तैयार नहीं कर सकता।लेखन के लिए स्वतंत्र दिमाग,स्वतंत्र विचार और लेखक के पास जोखिम उठाने की मनोदशा का होना बेहद जरूरी है।संघ के साथ जुड़कर कोई भी लेखक स्वाभाविक स्वतंत्र लेखन नहीं कर सकता।संघ में रहकर स्वतंत्र चिंतन-मनन,सवाल खड़े करना और रोज नए वैचारिक संघर्षों में शामिल होना संभव नहीं है।

हिन्दुत्व बंद प्रकृति की विचारधारा है,यह स्वतंत्रता के निषेध पर आधारित है।स्वतंत्रता के बिना बेहतरीन लेखन संभव नहीं है।अनेक वाम संगठनों में भी यह समस्या है कि वे लेखक के स्वतंत्र चिंतन से परेशान होते हैं,वे स चिंतन से जरूर परेशान होते हैं जो उनकी सांगठनिक विचारधारा के विरोध में हो।इसलिए वाम संगठनों के साथ भी लेखक का कभी-कभार पंगा हो जाता है।वाम संगठनों में तुलनात्मक तौर पर लेखक के पंगे कम होते हैं,क्योंकि वाम संगठन बड़े फलक में लेखक को सोचने और लिखने की स्वतंत्रता देते हैं।यही वजह है कि सांगठनिक विचारधारा और लेखकीय स्वातंत्र्य में जब अंतर्विरोध पैदा होता है तो वाम संगठन अपने लेखक को त्याग देते हैं।लेकिन आरएसएस जैसे संगठन की तो समस्या और भी गहरी है।वे तो हर चीज को हिन्दुत्व के नजरिए से देखते हैं।यह अपने-आपमें समस्यामूलक है।अच्छा वामपंथी उसे माना जाता है जो पार्टीलाइन से बंधा रहे।इसी तरह अच्छा संघी लेखक वह है जो संघी लाइन से बंधा रहे।यह सांगठनिक लाइन से बंधने का अर्थ है लेखन की मौत,स्वतंत्र लेखन का अंत।

इस समय हालात यह हैं कि आरएसएस के पक्ष में जो लोग लिख रहे हैं उनको सत्ता की ओर से व्यापक सम्मान-सत्कार मिल रहा है।इनाम-पद आदि भी मिल रहे हैं।इस समय जिस तरह के वैचारिक हमले हो रहे हैं उनके खिलाफ बुद्धिजीवियों –लेखकों और शिक्षकों की ओर से सबसे कम बोला जा रहा है। खासकर शिक्षकों में सन्नाटा पसरा हुआ है, वे पद और इनाम का लालच देकर लेखकों-शिक्षकों को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं। विश्वविद्यालय-कॉलेज शिक्षकों में हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रति आकर्षण साफ दिखाई दे रहा है।अधिकांश शिक्षक उनके द्वारा उठाए मसलों के खिलाफ बोलने से कतरा रहे हैं।संघ के हिंसाचार के खिलाफ उनमें कहीं पर भी आक्रोश नजर नहीं आता,उलटे संघ के साथ जुड़ने का भाव साफ नजर आता है।

शिक्षकों- बुद्धिजीवियों में अपने-आसपास के मसलों पर चुप्पी बेहद चिंतित करने वाला फिनोमिना है।इसके विपरीत संघ के संगठन अ-वास्तिवक घटना को खबर बनाने में मशगूल रहते हैं या फिर गलत सूचनाएं प्रसारित करते रहते हैं। इनका टीवी से लगातार प्रसारण हो रहा है।शिक्षक-लेखक टीवी द्वारा प्रक्षेपित सूचनाओं से अभिभूत हैं और उनको सही मानकर चल रहे हैं।यह भी कह सकते हैं जनता की बुद्धि को अपहृत करने लिए टीवी का संघ दुरूपयोग कर रहा है। बुद्धिजीवियों और शिक्षकों का अपने आसपास के घटनाक्रम पर चुप रहना अंततःआरएसएस को वैचारिक मदद कर रहा है।

संघ नियंत्रित मीडिया जिस तरह का डिस-इनफॉर्मेशन प्रचार चला रहा है वह अपने आपमें गंभीर चिंता का विषय है।इस प्रचार का चौतरफा असर देखने को मिल रहा है।यह प्रचार अभियान पंक्चर हो सकता है बशर्ते बुद्धिजीवी -शिक्षक अपने आसपास घटने वाली घटनाओं पर बोलें,लिखें।इस दौरान संघ ने जो मसले उठाएं हैं वे बेहद गंभीर हैं।

आरएसएस की नई रणनीति है ´अघटित घटना´को खबर बनाओ। उसके बाद गलत- सलत सूचनाएं मीडिया में प्रसारित करो।गोरक्षकों के हमले और गोमांस के बहाने अखलाक की हत्या और उसके प्रसंग में चलाया गया समूचा हंगामा,मीडिया मुहिम इसका ताजा उदाहरण है।इस सबका परिणाम यह निकला है कि मीडिया में घटना से संबंधित सत्य एकसिरे से गायब हो गया है।इसी तरह संघ के लोग मीडिया में इतिहास के नाम पर मनमानी बातें कह रहे हैं,मनगढ़ंत बातें बोल रहे हैं,कपोल कल्पित इतिहास पेश कर रहे हैं। इन सबको कायदे से मीडिया को सेंसर करना चाहिए,यह मीडिया आचार संहिता का खुला उल्लंघन है।लेकिन मीडिया उनको सेंसर नहीं कर रहा बल्कि अबाध रूप में प्रसारित कर रहा है, इस तरह के काल्पनिक इतिहास के खिलाफ शिक्षकों का हस्तक्षेप बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन मीडिया से लेकर शिक्षा संस्थानों तक संघ के विचारों के खिलाफ प्रतिवाद नजर ही नहीं आ रहा।संघ ने बड़ी खूबी के साथ समूचे विवाद को धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मुहिम की आड़ में छिपा दिया है। सत्य बताने के नाम पर आरएसएस ऐसी चीजों का प्रचार कर रहा है जो कभी घटित ही नहीं हुई हैं।इसने खबरों की प्रामणिकता को खत्म कर दिया है,हर चीज को लेकर भावुकताभरे हमले किए जा रहे हैं।जो संघ के विचारों का विरोध करता है उसे देशद्रोही कहा जा रहा है।असहमत होना राष्ट्रद्रोह की केटेगरी में शामिल कर दिया गया है।इसने बुद्धिजीवियों और शिक्षकों के मन में डर पैदा कर दिया है।इस डर से निकलने की जरूरतहै।टीवी एंकरों से लेकर प्रवक्ताओं तक झूठ को दोहराया जा रहा है,इन सबके खिलाफ रीयल टाइम में हस्तक्षेप करने की जरूरत है।



गुरुवार, 21 जुलाई 2016

हिन्दू समाज शर्मनाक समाज


                हमारा हिन्दू समाज शर्मनाक समाज है जिसमें औरतों , दलितों और मुसलमानों को सरेआम शिक्षित लोग मीडिया से लेकर फेसबुक तक अपमानित करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते रहते हैं।इससे पता चलता है कि शिक्षितों के अंदर हमने किस तरह के असभ्य मनुष्य का निर्माण किया है।

हम कितने संस्कृतिहीन "हिन्दू "हैं कि जिन हाथों से दुर्गापूजा करते हैं उन्हीं हाथों से स्त्री को घर में आकर मारते हैं।जिस मुख से दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं उसी मुख से मादर ...बहिन ...बोलने में एक क्षण का विलम्ब नहीं करते। यहाँ तक कि औरतों को भी गालियों से अपमानित करते रहते हैं। औरतों को दी जाने वाली सबसे बर्बर गाली रंडी है जिसे विभिन्न भाषायी पदबंधों में सजाकर देते हैं। स्त्री के विभिन्न अंग -प्रत्यंगों को लेकर गालियाँ हिन्दुओं की संस्कृति और जनप्रिय भाषा का अभिन्न हिस्सा रही हैं,और आज भी हैं! इन सब पर संसद से लेकर सड़क तक कभी हल्ला नहीं सुना गया लेकिन आज मायावती ने संसद में दयाशंकर का मामला उठाकर शानदार काम किया है।उन्होंने कम से कम औरत के मान -सम्मान की रक्षा की है।ये वे हिन्दू हैं जो औरत को नागिन कहते हैं! डायन कहते हैं! हम उनके नजरिए पर कभी बात ही नहीं करते! हम फिर भी कहते हैं हिन्दूधर्म महान है! शर्म आनी चाहिए हिन्दू होने पर जिसमें औरत के नाम से सबसे घटिया भाषा का इस्तेमाल करते हुए हर पुलिस वाला और हर लठैत औरत के नाम पर आए दिन माँ- बहिन की करता रहता है।

औरत को कलंकित करना हिन्दू परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है। औरत को हिन्दुओं ने अंत में औरत नहीं रहने दिया बल्कि गाली में तब्दील करके रख दिया है। यह हिन्दूधर्म का सबसे बर्बर रूप है।हमने आज तक एक भी पुलिस वाले को माँ की गाली देने के लिए नौकरी से नहीं निकाला! हम महान हिन्दू हैं! हम गर्वित हैं हमारे यहाँ औरत अब एक गाली है! औरत को जिस हिन्दू के गाली बनाया होगा वह जरूर कोई तपस्वी रहा होगा!

वह अकेला संगठन नहीं है जिसकी ज़ुबान से बार- बार वेश्या या रंडी शब्द निकलता है। वे हर औरत में वेश्या के अलावा और कोई चीज़ नहीं देखते, इसे कहते हिन्दुत्ववादी दृष्टि ! वह उनके लिए पहले भी भोग्या थी,आज भी भोग्या है। यह वह दृष्टि है जो बार-बार विभिन्न व्यक्तियों के श्रीमुख से निकलती रहती है। जेएनयू को कलंकित करने के लिए संघ समर्थक शिक्षकों ने जेएनयू पर महान जाँच रिपोर्ट जारी की जिसमें जेएनयू की छात्राओं का नामकरण वही किया जो दयाशंकर कह रहे हैं, और वह राजस्थान का बदनाम विधायक याद करें, रवीश कुमार से लेकर बरखादत्त तक को किसी न किसी रूप में "रंडी" पदबंध से कलंकित किया गया।असल में यह संघ की प्रतिगामी विचारधारा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।इनके लिए औरत तो भ्रष्ट होती है।औरतों को कलंकित करने के लिए हिन्दू ग्रंथों में किस तरह की उपमाएँ प्रचलित हैं ज़रा उनको याद करें फिर संघ के नेताओं के स्त्री विरोधी बयानों की परीक्षा करें!

जिस समाज में औरत को रांड और रंडी कहने का चलन हो वह हिन्दू समाज गर्व की नहीं शर्म की चीज है।दूसरी बात यह मोदीजी ! गालियां जब इतनी ही बुरी हैं तो आपने दयाशंकर के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज कराने का भाजपा को आदेश क्यों नहीं दिया ? दयाशंकर के बोलने के तत्काल बाद पहले ही एक्शन क्यों नहीं लिया ? कमाल है !आप भी दयाशंकर से डरते हैं !आपको भी एक्शन लेने के लिए मायावती के सहारे की जरूरत पड़ी!मायावती प्रतिवाद नहीं करतीं तो आप क्या दयाशंकर के खिलाफ एक्शन लेते ? हम जानते हैं आपको गालियां प्रिय हैं,हर हिन्दू को गालियां प्रिय हैं,वे उनको मंत्रों की तरह पवित्र मानते हैं।

संघी हिन्दुत्व के निशाने पर तीन समुदाय रहे हैं ,पहला, मुसलमान, दूसरा दलित,तीसरा औरत। इन तीनों समुदायों के खिलाफ हिन्दुत्ववादी संगठन लंबे समय से मुहिम चलाते रहे हैं। इस समय गो आंदोलन और कश्मीर जंग के नाम पर दलितों और मुसलमानों के खिलाफ संगठित हमले किए जा रहे हैं। यह बेहद गंभीर संकट की अवस्था है , देश में दलित और अल्पसंख्यक बटुक संघ के हमलों के शिकार बन रहे हैं।

आरएसएस का गऊ आंदोलन किस तरह गरीब विरोधी और दलित विरोधी है यह गुजरात में दलितों के प्रतिवाद आंदोलन ने एक्सपोज कर दिया है।यह आंदोलन सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे देश में फैलेगा,मोदी सरकार को तुरंत घोषणा करनी चाहिए कि आरएसएस के लोग गऊ के नाम पर आम जनता को सताना बंद करें। एक ओर गऊ को उद्योग की तरह हिन्दू इस्तेमाल कर रहे हैं और दूसरी ओर गरीबों पर हमले कर रहे हैं,असल में गऊरक्षा का सवाल भाजपाईयों की कमाई और बहुराष्ट्रीय मांस उद्योग के हितों की रक्षा से जुड़ा है,यह दलित,गरीब और विकास विरोधी है।



असल में , मोदीजी के विकास का डीजल खत्म हो गया है,अब भाजपा राष्ट्रवाद के नाम पर देश में मुहिम चलाएगी। चरित्र हनन की मुहिम चलाएगी।राष्ट्रवाद के आने का अर्थ है विकास का अंत और तनावों के सिलसिले की शुरूआत।सावधान मित्रो,राष्ट्रवाद देश के लिए जहर है,प्रेमचन्द और रवीन्द्रनाथ टैगोर तक ने राष्ट्रवाद को देश के लिए नुकसानदेह माना था लेकिन मोदीजी,भाजपा और आरएसएस अब उसी विनाशकारी प्रचार के लिए निकलने की तैयार कर रहे हैं,हम सबकी जिम्मेदारी है कि राष्ट्रवाद की आड़ में आ रहे इस फासीवादी प्रचार अभियान को बेनकाब करें।

रविवार, 13 दिसंबर 2015

हिन्दुत्व और मुसलिम विद्वेष

भारत के बौद्धिकों में कमाल की क्षमता है दंगों को लेकर जब भी बातें होती हैं तो झट से भागलपुर का नाम पहले लेते हैं दिल्ली का नहीं।ऐसा क्यों? सवाल यह है कि दंगाग्रस्त क्षेत्र किसे कहें ? क्या दंगे में मारे जाने वाले लोगों की संख्या के आधार दंगाग्रस्त क्षेत्र का फैसला होगा? यदि ऐसा है तो यह सही नहीं होगा।

यह संभव है कि किसी क्षेत्र में दंगा न हो लेकिन आम जनता में बड़े पैमाने पर हिन्दुत्ववादी सामाजिक ध्रुवीकरण हो।यह भी संभव है दंगा हो,लेकिन लोग मारे न जाएं,आगजनी हो,लूटपाट हो,हिंसा हो,लोग घायल हों,लेकिन मारे न जाएं,इस नजरिए से देखें तो भागलपुर से ज्यादा खतरनाक है दिल्ली।यह तथ्य समाजविज्ञानी आशुतोष वार्ष्ष्णेय ने रेखांकित किया है।उनका मानना है दंगों के बार-बार होने और सघन भाव से साम्प्रदायिक माहौल बनने को मिलाकर देखना चाहिए।

भगवा ब्रिगेड सब समय दंगा नहीं करता लेकिन सब समय अविवेक का माहौल बनाए रखने का काम जरुर करता है,वे बार-बार ऐसे मसले उठाते हैं जिनसे अविवेकवाद के विकास में मदद मिले।अविवेकवाद की आंधी वे निरंतर चलाते रहते हैं। यही वह परिवेश है जिसके कारण आम जनता की चेतना को कभी साम्प्रदायिक लक्ष्य के लिए इस्तेमाल करने में उनको सफलता मिल जाती है।

भारत का किसान आज भी धर्मनिरपेक्षता की धुरी है, धर्मनिरपेक्षता को सबसे गंभीर चुनौती उनसे मिल रही है जो शहरों में रहते हैं और मध्यवर्ग-निम्न-मध्यवर्ग से आते हैं।समाजविज्ञानी आशुतोष वार्ष्णेय ने सन् 1950 -95 तक के साम्प्रदायिक दंगों के चरित्र और स्थान का विश्लेषण करके बताया है कि भारत में उल्लेखनीय तौर पर कम दंगे हुए हैं।जबकि गांवों में भारत की दो-तिहाई आबादी रहती है।
सन् 1950-95 के बीचमें साम्प्रदायिक दंगों में मारे गए लोगों की कुलसंख्या में मात्र चार फीसदी से भी कम ग्रामीण मारे गए,जबकि बाकी 96फीसदी शहरी मारे गए।शहरों में यह कुछ शहरों तक केन्द्रित फिनोमिना है। मसलन्,देश के सिर्फ आठ शहरों-अहमदाबाद,बंबई, अलीगढ़, हैदराबाद,मेरठ,बड़ोदरा,कलकत्ता और दिल्ली में अधिकांश लोग दंगों में मारे गए।इन शहरों में कुल 49फीसदी से ज्यादा लोग मारे गए।जबकि इन शहरों में देश की आबादी का मात्र 18फीसदी जनसंख्या रहती है।यानी 82फीसदी आबादी के लिए दंगा समस्या ही नहीं है।
यानी फेसबुक पर साम्प्रदायिकता का जो फ्लो है उसमें इन शहरों से आने वाले युवाओं की संख्या बहुत बड़ी है। फेसबुक पर जय हिन्दुत्व का सबसे बड़ा फ्लो भी यहीं से आ रहा है।यही वे लोग हैं जो मुसलमानों के खिलाफ आए दिन गंदी और घटिया टिप्पणियां करते रहते हैं।


मुस्लिम विद्वेष के कई रुप प्रचलन में हैं इनमें वाचिक साम्प्रदायिक विद्वेष बेहद खतरनाक है। इसके कारण अंततःसाम्प्रदायिक हिंसा का वातावरण बनता है। साम्प्रदायिक हिंसा यकायक पैदा नहीं होती,बल्कि वह निरंतर चल रहे मुसलमान विरोधी,इस्लाम विरोधी प्रचार अभियान की देन है।लंबे समय तक साम्प्रदायिक हिंसा,मुसलिम विद्वेष आदि शहरी फिनोमिना बना रहा लेकिन राममंदिर आंदोलन के उदय और विकास के बाद साम्प्रदायिकता का ग्रामीण जनता में भी तेजी से प्रसार हुआ। तब से साम्प्रदायिकता,मुसलिम विद्वेष और इस्लाम धर्म के खिलाफ विषवमन शहरों और गांवों में तेजी से फैला है,इसको तेजगति प्रदान करने में हिन्दुत्ववादी संगठनों के अलावा संचार तंत्र ने बहुत बड़ी भूमिका निभायी है।मुसलिम विद्वेष वहां तेजी से फैला है जहां पर हिन्दुत्ववादी संगठनों ने काम शुरु किया है। जहां पर ये संगठन कमजोर हैं वहां पर मुसलिम विद्वेष नजर ही नहीं आता। इसलिए मुसलिम विद्वेष से बचने का सबसे सही उपाय तो यही है हिन्दुत्ववादी संगठनों को जनाधार ही तैयार न करने दिया जाय। ये संगठन जब एकबार आधार तैयार कर लेते हैं तो फिर इनको उखाड़ना आसान नहीं होता,ये अपने विषाक्त प्रचार अभियान के जरिए अपना सांगठनिक विस्तार करते रहते हैं। उल्लेखनीय है हिन्दुत्ववादी संगठनों ने जहां पर भी अपना सांगठनिक विस्तार किया है वहां पर भ्रष्टाचार को नई बुलंदियों तक पहुंचाया है,वहीं दूसरी ओर साम्प्रदायिक सद्भाव को नष्ट किया है।Top of Form


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देश में हिन्दू संस्कृति और मुस्लिम संस्कृति के नाम पर बहुत सारा सांस्कृतिक कचरा फेंका जा रहा है।हिन्दीभाषी क्षेत्र में इस तरह के विभाजन को न मानने वाले कवियों -लेखकों की विशाल परंपरा है।दिलचस्प बात यह है कि जो मुगल शासक भारत में बाहर से आए वे इस्लाम,फारसीपन आदि के उतने दीवाने नहीं थे जितने वे भारत की परंपराओं और भाषाओं के दीवाने थे।संस्कृति में हिन्दू-मुसलिम संस्कृति की विभाजनरेखा अंग्रेज शासकों ने खींची,उनकी खींची रेखा का आज भी साम्प्रदायिक संगठन इस्तेमाल कर रहे हैं।
सच यह है कि अधिकांश शासक तुर्कभाषी थे न कि फारसीभाषी।स्वयं बाबर ने अपनी आत्मकथा तुर्की में लिखी थी।गाँवों में मुसलमानों के लिए तुरक शब्द का प्रचलन था।दिल्ली के राजसिंहासन पर पश्तोभाषी जरुर बैठे,लेकिन जिनकी मातृभाषा फारसी थी उनको यह सौभाग्य कभी प्राप्त नहीं हुआ। फारसी का भारतीय साहित्य और भाषाओं पर असर मुगल साम्राज्य के पतनकाल में पड़ना शुरु हुआ और बाद में अंग्रेजों ने इसका इस्तेमाल किया।यहू वह दौर था जिसमें संस्कृत को देववाणी कहकर प्रतिष्ठित करने की कोशिश हुई,जिसका तुलसीदास ने विरोध किया और लिखा ," का भाषा का संस्कृत,प्रेम चाहिए साँच।काम जो आवै कामरी,का लै करे कमाच।।" मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुत्ववादियों के द्वारा जिस तरह का घृणा अभियान चलाया जा रहा है उसकी जितनी निंदा की जाय,कम है,वे मुसलमानों को सामाजिक जहर के रुप में प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं। हमारे अनेक युवाओं में इस जहरीले प्रचार का सीधे असर हो रहा है, युवाओं को भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और मुसलमान लेखकों के योगदान के बारे में कोई जानकारी नहीं है,और इसी अज्ञान का हिन्दुत्ववादी लाभ उठा रहे हैं।
मुझे सिंधी भाषा के समर्थ कवि अब्दुल बहाव उर्फ़ सचल सरमस्त याद आरहे हैं,ये धार्मिक संकीर्णता के कट्टर शत्रु थे और इनको पूरी कुरान कंठस्थ थी। उन्होंने लिखा- "मज़हब नि मुल्क में माण हूं मूँझाया। शेख़ी बुजुर्गी बेहद भुलाया।।"
इसी तरह बंगला में संस्कृत के विद्वान् थे दौलत काज़ी।उनके काव्य में कालिदास की उपमाओं के अनेक प्रयोग मिलते हैं।जयदेव के असर में लिखी कविता में चंद पंक्तियां बानगी के रुप में देखें- "श्यामल अंबर श्यामल खेती।श्यामल दश दिशा दिवसक जोती।।"
मलिक मोहम्मद जायसी ने मुहर्रम के दिनों में ईरान की शहजादी,हजरत इमाम हुसेन की पत्नी बानो पर जो कविता लिखी उसकी चंद पंक्तियां देखें-
" मैं तो दूधन धार नहाय रही,मैं तो पूतन भाग सुहाय रही।
मैं तो लाख सिंगार बनाय रही,मेरा साईं सिंगार बिगार गयो।
मोरे साह के तन पर घाव लगो,मोरा अकबर रन मां जूझ गयो।
कोऊ साह नज़फ़ से जाए कहो,तुम्हरे पूत का बैरी मार गयो।। "

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

टीवी इवेंट के परे स्वच्छ भारत का सपना !


      प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता अभियान से किसी को मतभेद नहीं हो सकता। समस्या नीति और नज़रिए की है। इस अभियान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सारी सदइच्छाएं टीवी फ़ोटो कवरेज से आगे नहीं जा रही हैं । उनके इस मसले पर सभी भाषण और राजनीतिक आचरण में भी प्रदर्शनप्रियता ही प्रमुख है।
    स्वच्छता की समस्या सफ़ाई का नया सिस्टम बनाने, सफ़ाई के सिस्टम में लगे लोगों के हितों और माँगों पर ग़ौर करने से जुड़ी है। भारत में इससे मिलता जुलता अभियान कांग्रेस ने 'निर्मल भारत' के नाम से यूपीए सरकार के शासन में आरंभ किया था लेकिन वह फ़ाइलों में दबा रह गया। मोदी ने उसे इवेंट और स्टंट बना दिया है!
   सफ़ाई अभियान को टीवी फोटोशूट तक ले जाने में मोदी सफल रहे लेकिन 'स्वच्छता नीति 'की घोषणा नहीं कर पाए । इससे यह भी पता चलता है कि मोदी इस देश को किस तरह चलाना चाहते हैं ?  मोदी इवेंट और जलसे -मेले-ठेले की राजनीति के जरिए देश को चलाना चाहते हैं ,इनके लिए समय दे रहे हैं लेकिन कोई बनाने के लिए उनके पास कोई समय नहीं है। यदि सरकार के मंत्रियों के काम करने की गति देखें तो वहाँ पर भी कोई पहलकदमी नजर नहीं आती। यानी मंत्रालयों में भी कोई पहलकदमी नजर नहीं आती! वरना  स्वच्छता अभियान को लेकर नीति तो होनी चाहिए बिना नीति के देश कैसे चलेगा ? राज्यों और नगरपालिकाओं को कैसे भागीदार बनाया जाएगा ? स्वच्छता अभियान में केन्द्र और राज्य कितना पैसा निवेश करेंगे ? सफ़ाई कर्मचारियों की समस्याओं और रिक्त पदों का समाधान किस तरह किया जाएगा ?नई जरुरतों के मुताबिक़ कितने लाख नए पद सृजित किए जाएँगे ? 
     सफ़ाई की समस्या एकदिन की समस्या नहीं है । यह दैनंदिन समस्या है और इसके लिए मुस्तैद सिस्टम चाहिए। ऐसा सिस्टम चाहिए जो वैज्ञानिक तकनीक का भी भरपूर इस्तेमाल करे। सफ़ाई का मोदी का नज़रिया हिन्दू -कारपोरेट नजरिया है। हिन्दू के लिए सफ़ाई  दीपावली की सफ़ाई योजना है जो घर, मंदिर, दुकान से बाहर नहीं निकलती।मोदी इसे कचडा परिशोधन परियोजना तक लेजाएँगे। 
      जबकि भारत में सफ़ाई कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग है जो आज भी अस्पृश्यता का शिकार है और दशकों से वे अपनी समस्याओं के लिए विभिन्न राज्य सरकारों और ज़िला प्रशासन के सामने अपनी माँगे रखते आए हैं ,आश्चर्य की बात है मोदी ने इन सफ़ाई कर्मचारियों और अछूत समस्या पर एक भी वाक्य नहीं बोला। सफ़ाई कर्मचारियों की बदहाल ज़िंदगी और भयावह गंदगी से भरे उनके रिहायशी इलाक़ों को दरकिनार करके मोदी सरकार प्रच्छन्न ढंग से बहुसंख्यकवाद के राजनीतिक लक्ष्य की दिशा में आगे बढ रही है। वरना मोदी को दलितों की बस्ती में जाकर सफ़ाई अभियान को केन्द्रित होकर चलाना चाहिए मोदी दलित मलिन बस्ती में न जाकर बाल्मीकिरामायण मंदिर गए जो हमेशा साफ़ रहता है। महात्मा गांधी ने स्वच्छता अभियान को सामाजिक सुधार कार्यक्रम के रुप में चलायाथा और सफ़ाई, दलितमुक्ति और अस्पृश्यता निवारण को लक्ष्य बनाया। गांधी के लिए स्वच्छता का मतलब इवेंट नहीं था वे स्वच्छता को समाजसुधार के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखते थे। सफ़ाई उनके लिए नैतिक या स्वास्थ्य तक सीमित नहीं थी। जबकि मोदी के लिए स्वच्छता के सामाजिक आधार का कोई मूल्य नहीं है। 
अस्वच्छता हमारे समाज के जातिप्रथा के कलंकित अध्याय से जुडी है। यही वजह है कि तमाम वैभव और संसाधनों के बावजूद धार्मिक शहर सबसे गंदे रहे हैं। हमारे समाज में आज़ादी के बाद जातिप्रथा बढी हैं ख़ासकर दलित जातियों पर ज़ुल्म बढे हैं ।हमने कभी ईमानदारी और सतत निगरानी के साथ दलितों और सफ़ाई कर्मचारियों की समस्याओं पर संसद में समग्रता में चर्चा नहीं की है।
    केन्द्र -राज्य सरकारोंके लिए दलित ,वोटबैंक से ज़्यादा महत्व नहीं रखते और हमेशा किश्तों या टुकड़ों में दलितों की समस्याओं पर संसद में तदर्थभाव से चर्चा हुई है।  हम चाहते हैं दलितों के प्रति तदर्थभाव ख़त्म हो और समग्रता में राष्ट्रीय एकता परिषद में खुलकर केन्द्र -राज्य मिलकर बातें करके स्वच्छता नीति बनाएँ और इसके लिए दलितों के सभी रंगत के संगठनों को भीबुलाकर सुझाव लिए जाएँ और उनकी राय को राष्ट्रीय एकता परिषद गंभीरता से सुने ।
            नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान की तुलना में अरविंद केजरीवाल का नजरिया ज़्यादा सही लगता है।मसलन् मोदी गए बाल्मीकि मंदिर जबकि केजरीवाल ने नाले की सफ़ाई में भाग लिया और दलित परिवार के घर जाकर खाना खाया।
   सफाई की समस्या हमारे हिन्दू संस्कारों और आदतों से मुक्ति से जुडी है। हम जब तक हिन्दू आदतों के शिकार रहेंगे समाज में अस्वच्छता रहेगी।सामाजिक अस्वच्छता का सम्बन्ध मन और मूल्यों की स्वच्छता से है। हमें देखना होगा मोदी जी स्वयं और उनके मंत्री-सांसद-विधायक कितनी जल्दी हिन्दूमन की आंतरिक सफाई करते हैं!
      समाज हमारे मन का आईना है यह कचडा साफ़ करने की समस्या मात्र नहीं है ,यह गंदगी फैलाने पर जुर्माने ठोक देने से सुलझनेवाली समस्या नहीं है।
   हमारे देश ने यूरोप से कपड़े लिए, शिक्षा ली,रहन-सहन लिया, बाथरुम लिया लेकिन हिन्दूमन नहीं बदला !जीवनशैली नहीं ली। यही वह प्रस्थान बिन्दु है जिस पर प्रहार करने की ज़रुरत है। हिन्दूमन की गंदगियों और जीवनशैली को निशाना बनाए बग़ैर स्वच्छता अभियान सफल नहीं होगा ।  सफ़ाई का सम्बन्ध आदतों से हैं और आदतें हिन्दूजीवनशैली से जुड़ी हैं और इनका समाज के ऊपर व्यापक असर है।हिन्दूजीवनशैली को मोदी सरकार को निशाना बनाना होगा। यह काम जब तक नहीं होता स्वच्छ भारत टीवी इवेंट से आगे नहीं जा पाएगा।




गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

हिन्दूतंत्र के उपासक अन्ना हजारे


                 
 हाल के दिनों में अन्ना हजारे के बारे में कारपोरेट मीडिया  ने अनेक मिथों का प्रचार किया है। कारपोरेट मीडिया की अति सक्रियता ने पहला संदेश यह दिया है कि कारपोट मीडिया अब बुद्धिहरण और विवेकहरण का औजार बन गया है। वे एक ऐसा काल्पनिक जगत बनाने में लगे हैं और उस जगत में आम जनता को ठेलने की कोशिश कर रहे हैं जो प्रतिगामी है।
    अन्ना हजारे के तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की परतें खोलने के साथ साथ अन्ना हजारे के आसपास निर्मित वातावरण पर भी हमें नजर रखनी चाहिए। अन्ना को जो लोग देवता मान रहे हैं और उनके जरिए लोकतंत्र का सुंदर भविष्य देख रहे हैं वे नहीं जानते कि अन्ना की राजनीति क्या है ?
       अन्ना की राजनीति ,खासकर पर्यावरण राजनीति के आधार पर उनके वास्तव स्वरूप को जाना जा सकता है। दुखकी बात है कि अन्ना की राजनीति को कारपोरेट मीडिया भारत की भावी राजनीति बनाना चाहता है। अन्ना के प्रति व्यक्तिगत आग्रहों-पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर हमें गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि अन्ना ने अपने कर्मक्षेत्र वाले गांवों में आखिरकार कैसी राजनीतिक संस्कृति रची है ? मीडिया ने सारे देश में किन लोगों को अन्ना के पीछे गोलबंद किया है ?अन्ना अंततः किस तरह की राजनीतिक शक्तियों के हाथों में खेल रहे हैं और जमीनी स्तर पर किस तरह की राजनीति कर रहे हैं ? इन सवालों के उत्तर अन्ना के कर्मक्षेत्र के माहौल में छिपे हैं। अन्ना के राजनीतिक सोच में छिपे हैं।
          अन्ना की एनजीओ राजनीति का आधार लोकतंत्र नहीं संघ मार्का हिन्दू धर्म है। इसका वे अपने हरित गांवों में इस्तेमाल कर रहे हैं।  अन्ना की राजनीति को खासकर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को जो लोग जाति,धर्म,राष्ट्र, लिंग,राष्ट्रवाद,अतिवादी राष्ट्रवाद आदि से परे मानते हैं वे विभ्रम के शिकार हैं। प्रसिद्ध पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता मुकुल शर्मा ने अपने एक लेख में यह बात कही है। यह लेख काफिला डॉट कॉम पर छपा है।
    इस लेख का महत्व यह है कि इसमें मुकुल शर्मा ने व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर अन्ना हजारे का विश्लेषण किया है। अन्ना हजारे के विचारधारात्मक चरित्र को जानना इसलिए भी जरूरी है कि उससे हमें उनकी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की संभावनाओं को समझने में मदद मिल सकती है। अन्ना हजारे को सैलीब्रिटी के रूप में मीडिया ने पेश किया है। मुकुल ने पर्यावरण और संकीर्णतावाद के अन्तस्संबंध के संदर्भ में अन्ना ङजारे का विवेचन किया है। इससे यह भी अंदाजा लगेगा कि अन्ना किस तरह का नागरिक समाज बनाना चाहते हैं।
    अन्ना हजारे के महाराष्ट्र स्थित रेलीगन सिद्धी गांव के पर्यावरण संबंधी कामों की बड़ी प्रशंसा हुई है और उसे सत्ता की खास किस्म की वर्चस्वशाली विचारधारा से भी खुराक मिलती रही है और बदले में वे शासकीय विचारधारा की सेवा करते रहे हैं। मुकुल शर्मा ने लिखा है -
"The rural environmental works by Anna Hazare in Ralegan Sidhi village in Maharashtra have been hailed widely, which are fed by, and feed into, certain dominant political cultures of the state. Though developmental and environmental works form the core of his ideological structures, they include other important issues. A belief system of force and punishment, liberal use of Hindu religious symbols, strict rules and codes, evocation of nationalism and ultra-nationalism, ‘pure’ morality and caste hierarchies, with a marginalisation of women, Muslims and Dalits, form the core of his village regeneration. The basis for the authority of Anna comes from a belief system, where the people following him consider it their natural duty to obey, and the exercising person thinks it a natural right to rule. Thus a former village sarpanch of the region states: ‘Whatever Anna says, we do. The whole village follows his words. Anna’s orders work like the army.’ For another villager, ‘Annajee is like God.’ The absolute recognition of an authority locally works in several internalised ways."

"In the process of social transformation, Anna believes that advice, persuasion or counselling do not always work and occasionally force has to be applied. Force can be applied in many forms, physical and social, and often the simple persistent fear of its application regulates society. Force gives a safe and solid grounding to socially accepted values. It is not only Anna Hazare who proposes flogging and fear as essential parts of a green village; it has its wide audience in the village."

आज अन्ना का एक ईमेल मीडिया में आया है जो उन्होंने मल्लिका साराभाई के लिए लिखा है जिसमें अन्ना ने कहा है कि मैं जातिप्रथा को नहीं मानता। लेकिन मुकुल ने साफ लिखा है कि अन्ना अपने कर्मक्षेत्र में ग्राम्य निर्माण की आड़ में हिन्दू धार्मिक प्रतीकों ,उनके कठोर नियमों और कोडस का व्यापक इस्तेमाल करते रहे हैं। साथ ही राष्ट्रवाद और अति राष्ट्रवाद को उभारते रहे हैं। शुद्ध नैतिकता की आड़ में वे जाति श्रेष्ठत्व और हायरार्की को भी उभारते रहे हैं और इस क्रम में उन्होंने दलित,स्त्री,अल्संख्यकों आदि को हाशिए पर डाल दिया है।
     अन्ना के गांवों में उनकी आवाज अंतिम आवाज होती है। मुकुल की बात मानें तो अन्ना ने एकदम फासिस्टों की राजनीति से मिलता जुलता वातावरण इस क्षेत्र में बनाया है। हिन्दू धर्म,भय और ताकत इन तीन तत्वों का वे अपने हरे गांवों के निर्माण के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
   उल्लेखनीय है मुकुल शर्मा ,भारत के उन चंद पत्रकारों में आते हैं जिनकी रिपोर्टिंग विश्वसनीय और लोकतांत्रिक राजनीति के पैराडाइम पर आधारित रही है। विकासमूलक पत्रकारिता में मुकुल शर्मा का क्षेष्ठतम योगदान रहा है।वे इन दिनों एमनेस्टी इंटरनेशनल के भारत में प्रधान हैं।
    मुकुल ने रेखांकित किया है  अन्ना की हरे गांव की राजनीति जिन इलाकों में हैं वहां पर वास्तव में अन्ना का तालिबानी शासन चलता है। मुकुल के शब्दों में-
   " environmentally sound Ralegan Sidhi, religious symbols are core vehicles for transformation and imposition. Its embodiment in certain places/people legitimises them. The command-obedience relationship also gets its rationale from the belief that a God or a temple is ‘supreme’ and any decision taken in front of them must be obeyed. According to Hazare, Lord Rama set an ideal before every citizen of how to conduct everyday life by his own example. There is need for Lord Shri Krishna to reincarnate and save the country."
" It is not only environmental rules, but also rules governing the entire socio-political life of people that make an authority acceptable. Those who make these rules and those who obey them are legitimate; others illegitimate/illegal. Anna Hazare is deeply concerned with rules and norms with a definite model: “The daily routine enforced in the army such as getting up early in the morning, jogging and physical training thereafter, cleanliness of body, clothing, living quarters and the neighbourhood etc. led to development of a disciplined life, benefits of which I am availing of even today. The habit of giving due respect and regard to the seniors by age, post, or competence was inculcated in us…. This has helped me in conducting the village development work at Ralegan Siddhi according to the rules and regulations decided by us by common consent.” "
अन्ना के गांव की वास्तविकता यह है कि इस इलाके की अनेक मायनों में तालिबानी सांस्कृतिक परिस्थितियां हैं। मुकुल ने आगे लिखा है-
    "Villagers normally say that their village works like an army. As a commandant, Anna orders and we follow. Army discipline is the ideal. The path of rural development here depends in a large measure on many other ‘dos’ and ‘don’ts’. No shop in Ralegan can sell bidis or cigarettes. Film songs and movies are not allowed. Only religious films, like Sant Tuka Ram, Sant Gyaneshwar can be screened. Only religious songs are allowed on loudspeakers at the time of marriages. It is emphasised in the village that the villagers themselves decided not to sell bidis in their shops; they themselves do not watch films or listen to film songs. However, the language of acquiescence can be highly brahaminical and hegemonic."
     हरित गांवों में अन्ना का जो सांस्कृतिक नजरिया व्यवहार में लागू किया जा रहा है उसमें साम्प्रदायिक कठमुल्लेपन और फासिज्म के अनेक तत्व सक्रिय हैं। मुकुल ने आगे लिखा है- "The concept of morality and subsequent codes/behaviours/practices based on it are important elements in the notion of development. Anna’s concern with the moral is couched in his discourse of the nation that exercise control over the private and the public, the personal and the political. For school children there is moral education and practice, comprising physical training, body building, patriotism, obedience, samskars and Hindu culture. Doing surya namaskar and chanting Om is regular for the students. For women, it is stressed that they should certainly look after the household but they must also participate in activities intended to help their community and country. It is stated, ‘Woman is the Universal Mother, The Great Mother. Many such Great Mothers have given birth to Great Sons — Chhatrapati Shivaji Maharaj, Swami Vivekananda for instance.’ She is also a symbol of purity, sublime as well as innate strength. It is significant that much of the problematisation of morality of children, youth and village is done in the context of influence of western, modern culture. ‘Western lifestyle’, ‘modern development’ and ‘invasion of western culture’ invariably emerge as repeated expressions, signifying the collapse of morality in modern India."
     क्या अन्ना हजारे के बारे में इतने व्यापक एक्सपोजर के बाद भी यह कहने की जरूरत है कि अन्ना स्वभाव से लोकतंत्र में नहीं हिन्दूतंत्र में विश्वास करते हैं और हिन्दूतंत्र के भी सबसे संकीर्ण और पिछड़े हुए विचारों,व्यवहार,संस्कार आदि का अभ्यास करते रहे हैं। उनके इस तरह के विचारों का विवेकानन्द ,गांधी,आम्बेडकर ,विनोवा भावे आदि के विचारों के साथ कोई लेना-देना नहीं है। अन्ना के विचार यदि किसी एक संगठन से ज्यादा मिलते हैं तो वह है राष्ट्रीय स्वयं संवक संघ।















गुरुवार, 4 नवंबर 2010

सिर फोड़ने का सलीका

      हिन्दुत्व का स्वप्नलोक बदल रहा है। स्वप्नलोक से यहां तात्पर्य है यूटोपिया से। जो लोग भारत को हिन्दूराष्ट्र बनाना चाहते हैं उनके पास हिन्दू राष्ट्र और हिन्दुत्व की समग्र परिकल्पना है,ऐसा उनका दावा है। वे सिर्फ एक मौका चाहते हैं। उनका दावा है कि वे यदि केन्द्र सरकार सिर्फ अपने बलबूते पर बनाने में सफल हो जाते हैं तो वे हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार कर देंगे। सिर्फ एक मौका मिल जाए।
     हिन्दुत्व के यूटोपिया की सबसे बुनियादी समस्या है भारत का संविधान जो धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद को प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित बनाता है। भारत को यदि वे हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो उन्हें साफ तौर पर जनता के बीच संविधान परिवर्तन के प्रस्तावों को अपने चुनावी मैनिफैस्टो में लेकर जाना होगा। उन्हें बताना होगा कि आखिरकार वे भारत को हिन्दू राष्ट्र में रूपान्तरित करने के लिए किस तरह का संविधान देंगे और मौजूदा संविधान की किन बातों को वे नहीं मानते। लेकिन जहां तक हमारा अनुभव है जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने ,जो संघ परिवार से जुड़ा राजनीतिक दल है,उसने संविधान में क्या बदलाव जरूरी हैं इन्हें केन्द्र में रखकर कोई बहस नहीं चलायी है उलटे उसने मौजूदा संविधान के प्रति अपनी आस्थाएं व्यक्त करते हुए भाजपा का चुनाव आयोग में पंजीकरण कराया है।
    जैसाकि सभी लोग जानते हैं कि माओवादियों की भारत के संविधान में कोई आस्था नहीं है। वे संविधान को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं,इसी तरह और भी कई पृथकतावादी संगठन हैं उत्तरपूर्वी राज्यों और कश्मीर में जो भारत के संविधान और जम्मू-काश्मीर के कानूनों को एकसिरे से अस्वीकार करते हैं। सवाल उठता है कि संघ परिवार ने जब जनसंघ-भाजपा के जरिए राजनीति आरंभ की तो उसने मौजूदा संविधान के सामने नतमस्तक होकर काम करने की प्रतिज्ञा क्यों की ? वे यदि सचमुच में यह मानते हैं कि संविधान उनके हिन्दूराष्ट्र के यूटोपिया के लक्ष्यों की पूर्ति नहीं करता तो उन्हें यह कहने का हक था कि वे हिन्दू राष्ट्र की अवधारणाओं के अनुरूप नया संविधान बनाने के लिए संघर्ष जारी रखेंगे और चुनाव में भाग नहीं लेंगे। लेकिन उन्होंने यह सब नहीं किया। भाजपा और संघपरिवार ने जिस दिन भारत के संविधान को मान लिया उसी दिन हिन्दू राष्ट्र के सपने का बुनियादी तौर पर अंत हो गया था।
    असल में हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र का सपना वोटबैंक राजनीति का प्रौपेगैण्डा अस्त्र है। यह यूटोपिय़ा नहीं है। असल में वे हिन्दुत्व का प्रचार करते हुए बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के दायित्वों से भागना चाहते हैं।यहां तक कि हिन्दू समाज को बदलने के दायित्वों से पलायन कर रहे हैं।  वे हिन्दुत्व-हिन्दुत्व की रट लगाकर आम लोगों का ध्यान उनकी सामाजिक जिम्मेदारियों से हटाना चाहते हैं।  वे इसके जरिए पूंजीवादी शोषण से ध्यान हटाना चाहते हैं। इस अर्थ में वे पूंजीवाद के खिलाफ पैदा हो रहे गुस्से को सामाजिक और सामूहिक तौर पर एकत्रित नहीं होने देते।  
 
    बुनियादी सवाल यह है कि हिन्दुत्व का यूटोपिया अपूर्ण क्यों है ? इसने समग्रता में यूटोपिया की शक्ल अख्तियार क्यों नहीं की ? हिन्दुत्ववादी ताकतों ने राजनीतिक अवसरवाद का सहारा क्यों लिया ? क्या वे लोग हिन्दुत्व के सपने को लेकर आश्वस्त नहीं थे ? उन्होंने हिन्दुत्व के एजेण्डे को क्यों त्याग दिया । ऐसा राजनीतिक कार्यक्रम क्यों बनाया जिसमें सत्ता संघ के हाथ में हो,या उसके निर्देश पर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार में संघी लोग काम करें और राजनीतिक आधार को विस्तार दें ?
    हिन्दुत्व के यूटोपिया और राजनीतिक कार्यक्रम के बिना हिन्दुत्व और उनके दल रीढ़विहीन हैं। दिशाहीन हैं। वे अपनी राज्य सरकारों के जरिए आज तक कोई भी हिन्दू कार्यक्रम लागू नहीं कर पाए हैं। मसलन गुजरात की सरकार को ही लें,उसके पास जितने भी कार्यक्रम हैं वे सबके सब पूंजीवादी कार्यक्रम हैं,यह पूंजीवाद कम से कम हिन्दुत्व की विचारधारा से पैदा नहीं हुआ है। गुजरात सरकार की अधिकांश योजनाएं केन्द्र सरकार यानी कांग्रेस पार्टी की पहल पर तैयार की गयी योजनाएं हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हिन्दुत्व अभी तक अपना स्वतंत्र राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बना पाया है।   
 हिन्दुत्व के पास आर्थिक कार्यक्रम के अभाव का प्रधान कारण है कि उसने सामाजिक  समस्याओं की कभी गंभीरता के साथ हिन्दूवादी परिप्रेक्ष्य में मीमांसा नहीं की है। उसके पास ऐसे समाजविज्ञानियों का अभाव है जो हिन्दुत्व के नजरिए से सामाजिक मीमांसा तैयार करके दें। फलतः हिन्दुत्व बहुत ही संकीर्ण दायरे में राजनीतिक विचरण करता रहा है।
    हिन्दुत्व की अवधारणा अधूरी है। इसमें सामाजिक शोषण से मुक्ति दिलाने की क्षमता नहीं है। इस अधूरेपन के कुछ आंतरिक कारण हैं और कुछ बाह्य भौतिक कारण हैं। हिन्दुत्व के यूटोपिया न बन पाने का दूसरा बड़ा कारण है हिन्दू समाज और समूचे भारतीय समाज की रूढ़ियों के प्रति उसका मोह और अनालोचनात्मक नजरिया। वे अपने देशप्रेम को अतीत से बांधकर रखते हैं। वे इस बात को कभी पसंद नहीं करते कि वे जिस अतीत को स्वर्णकाल मानते हैं,गौरवपूर्ण मानते हैं अथवा जिस अतीत को बुरा मानते हैं उसके बारे में कोई सवाल खड़े किए जाएं। वे अतीत के हिन्दूसमाज और उसकी विचारधारा और नैतिकता-अनैतिकता,श्लील-अश्लील की कल्पित तस्वीर बनाते हैं और उसमें मगन रहते हैं और यही प्रचार करते हैं उन्होंने जो तस्वीर बनायी है वह सही है उसे कोई बदल नहीं सकता,उस तस्वीर को कोई भी उलट-पलटकर देख नहीं सकता।
    हिन्दुत्व को रूढ़िवाद बेहद प्रिय है। वे जानते हैं कि हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना संभव नहीं है। जानते हैं कि उनके पास कारपोरेट जगत की सेवा करने के अलावा और कोई काम नहीं है। उनका कार्यक्रम हिन्दू अर्थशास्त्र पर आधारित नहीं है बल्कि कारपोरेट पूंजीवादी अर्थशास्त्र पर आधारित है।
   हिन्दुत्ववादी मूलतःयथास्थितिवादी हैं। उनके सोचने का ढ़ंग बड़ा विलक्षण है। उनकी आलोचना की पद्धति विलक्षण है। वे किसी भी बात का खंडन कर देते हैं बगैर प्रमाण दिए। वे अपनी स्थापनाओं को बगैर किसी प्रमाण के पेश करते हैं।
       हम हिन्दुत्वपंथी ,इस्लामिक,ईसाईयत वाले तत्ववादी ज्ञानियों से सवाल करना चाहते हैं क्या इंसान को धर्म में लपेटकर पढ़ा जाना सही है? क्या मज़हब का ढ़ोल बजाकर इस दुनिया को समझा जा सकता है ? यदि हां,तो एक सवाल का जबाब दो इंसान को भूख पहले भी लगती थी,अब भी लगती है। ताकत का नशा उसे पहले भी था आज भी है,शेरो-शराब का शौकीन पहले भी था आज भी है। आज ऐसा क्या परिवर्तन आय़ा है जिसके कारण इंसान को हम बदला हुआ पाते हैं ? यहां पर मुझे सआदत हसन मंटो के शब्द याद आ रहे हैं।
    मंटो ने लिखा था, ’’ यह नया जमाना  नए दर्दों और नई टीसों का जमाना है। एक नया दौर पुराने दौर का पेट चीरकर पैदा किया जा रहा है। पुराना दौर मौत के सदमे से रो रहा है,नया दौर ज़िंदगी की खुशी से चिल्ला रहा है।दोनों के गले रूँधे पड़े हैं,दोनों की आँखें नमनाक हैं-इस नमी में अपने कलम डुबोकर लिखने वाले लिख रहे हैं। नया अदब ? ज़वान वही है,सिर्फ लहजा बदल गया है। दरअसल इसी बदले हुए लहजे का नाम नया अदव, तरक्कीपसंद अदव,फहशअदव या मजदूरपरस्त अदव है।’’
मंटो ने सवाल उठाया है ‘‘ दुनिया बहुत वसी है। कोई च्यूँटी मारना बहुत बड़ा पाप समझता है, कोई लाखों इंसान हलाक कर देता है और अपने इस फ़अल को बहादुरी और शुजाअत (वीरता) से तावीर करता है।कोई मज़हब को लानत समझता है,कोई इसी को सबसे बड़ी नैमत-इंसान को किस कसौटी पर परखा जाए ? यूँ तो हर मज़हब के पास एक बटिया मौजूद है जिस पर इंसान कसकर परखे जाते हैं मगर वह बटिया कहाँ है ? सब कौमों ,सब मज़हबों,सब इंसानों की वाहिद कसौटी जिस पर आप मुझे और मैं आपको परख सकता हूँ,वह धर्मकाँटा कहाँ है,जिसके पलड़ों में हिन्दू और मुसलमान,ईसाई और यहूदी,काले और गोरे तुल सकते हैं?’’
   ‘‘ यह कसौटी,यह धर्मकाँटा जहाँ कहीं भी है, नया है न पुराना है।तरक्कीपसंद है न तनज्ज़ुलपसंद । उरियाँ है न मस्तूर (गुप्त) ,फ़हश है न मुतहर् (श्लील)- इंसान और इंसान के सारे फ़अल इसी तराजू में तोले जा सकते हैं। मेरे नजदीक किसी और तराजू का तसव्वुर करना बहुत ही बड़ी हिमाकत है।’’
    मंटो ने यह भी लिखा ‘‘ हर इंसान दूसरे इंसान के पत्थर मारना चाहता है,हर इंसान दूसरे इंसान के अफ़आल (करतूतों) परखने की कोशिश करता है। यह उसकी फि़तरत है जिसे कोई भी हादिसा तब्दील नहीं कर सकता। मैं कहता हूँ अगर आप मेरे पत्थर मारना ही चाहते हैं तो खुदारा ज़रा सलीके से मारिए। मैं उस आदमी से हरगिज-हरगिज अपना सिर फुड़वाने के लिए तैयार नहीं जिसे सिर फोड़ने का सलीका नहीं आता। अगर आपको यह सलीका नहीं आता तो सीखिए-दुनिया में रहकर जहाँ आप नमाज़ें पढ़ना,रोज़े रखना और महफ़िलों में जाना सीखते हैं,वहाँ पत्थर मारने का ढ़ंग भी आपको सीखना चाहिए।’’
 ‘‘ आप खुदा को खुश करने के लिए सौ हीले करते हैं। मैं आपके इस क़दर नज़दीक हूँ ,मुझे करना भी आपका फ़र्ज़ है। मैंने आपसे कुछ ज्यादा तलब तो नहीं किया ? मुझे बड़े शौक़ से गालियाँ दीजिए ।मैं गाली को बुरा नहीं समझता ,इसलिए कि यह कोई ग़ैर फितरी चीज़ नहीं,लेकिन ज़रा सलीके से दीजिए। न आपका मुँह बदमज़ा हो और न मेरे ज़ौक़ को सदमा पहुँचे।’’
    अंत में ,फंडामेंटलिस्ट दोस्तों से कहना चाहते हैं कि वे धार्मिक तत्ववाद का मार्ग त्यागकर साहित्य के मार्ग पर चलें। मंटो के ही शब्दों में ‘‘ अदब दर्जाए हरारत है अपने मुल्क का,अपनी कौम का-अदब अपने मुल्क,अपनी कौम,उसकी सेहत और अलालत की खबर देता रहता है-पुरानी अल्मारी के किसी ख़ाने से हाथ बढ़ाकर कोई गर्द आलूद किताब उठाइए,बीते हुए ज़माने की नब्ज़ आपकी उँगलियों के नीचे धड़कने लगेगी।’’

















शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

मनुष्यत्व का अपमान है धार्मिक फंडामेंटलिज्म

    कोई हिन्दू बने या मुसलमान हमें इसमें आपत्ति नहीं है। हमारी आपत्ति इसमें है कि वे भारत को हिन्दूराष्ट्र क्यों कहते हैं। भारत संवैधानिक तौर पर हिन्दू राष्ट्र नहीं है। भारत का संविधान,हिन्दू राष्ट्र का संविधान नहीं है। भारत कभी भी हिन्दू राष्ट्र नहीं था। बात-बात में हिन्दू राष्ट्र की दुहाई देना,भाषणों से लेकर लेखन तक में उसका इस्तेमाल करना अवैज्ञानिक है,गलत है।
     हिन्दूराष्ट्र और हिन्दुत्व को भारतवासियों का पर्याय बताना सफेद झूठ है और यह भारतवासियों का अपमान है। भारत की बहुसांस्कृतिक विरासत और बहुसांस्कृतिक जनता का अपमान है। यदि राम को रावण के नाम से बुलाया जाएगा तो वह गलत होगा। राम को राम के  नाम से ही सम्बोधित किया जाना चाहिए। उसी तरह भारत को भारत के नाम से पुकारें।  ‘भारत एक हिन्दूराष्ट्र है’ यह कहकर न पुकारें ,यह भारत का अपमान है,भारतवासियों का अपमान है। मनुष्यता का अपमान है। यह हिन्दू फंडामेंटलिज्म है।    
     आज के हिन्दुस्तान की सच्चाई यह है कि यहां एक नहीं अनेक किस्म की पहचानें प्रत्येक व्यक्ति के पास हैं। लेकिन संघ परिवार एक ही अस्मिता का बारबार ढ़ोल पीटता रहता है। वे लोग संविधान में उपलब्ध अभिव्यक्ति की आजादी और विचारों के प्रसार की आजादी का दुरूपयोग कर रहे हैं और भारतीय समाज के बारे में गलत समझ पैदा कर रहे हैं । बहुजातीयता और बहुसांस्कृतिकता का अपमान कर रहे हैं।   
    संघ जब हिन्दू राष्ट्र के नाम पर इस्लाम और ईसाई धर्म की निंदा करता है और उन्हें पराए धर्म के रूप में चित्रित करता है तो बहुलतावाद को अस्वीकार करता है। संविधान की मूल स्प्रिट का उल्लंघन करता है।   
    हिन्दू से इतर अस्मिताओं और धर्मों का इतिहास भारत में सैंकड़ो-हजारों साल पुराना है। देश का समूचा तानाबाना बहुसांस्कृतिक-बहुधार्मिक-बहुजातीय मान्यताओं और विश्वासों पर टिका है। इसे रचने में हिन्दुओं,मुसलमानों, जैनियों, नाथों-सिद्धों,योगियों,शाक्तों,बौद्धों आदि का योगदान रहा है। संघ के लोग जब भारत को हिन्दूराष्ट्र के रूप में चित्रित करते हैं तो गैर हिन्दू धर्मों और संस्कृतियों की भारत के निर्माण में जो भूमिका रही है उसे अस्वीकार करते हैं।
   भारत आज एक तरह से खुले समाज के रूप में अपना विकास कर रहा है और इसमें सभी धर्मों-जातीयताओं और संस्कृतियों के लिए समानता का भाव है। इन सबको समान संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। भारत का संविधान खुले तौरपर बहुसांस्कृतिकता और बहुधार्मिकता की हिमायत करता है। इसके बावजूद संघ के नेताओं का भारत को बार-बार हिन्दू राष्ट्र कहना वस्तुतः बहुसांस्कृतिक जातीयताओं और धर्मों का अपमान ही कहा जाएगा।
      संघ परिवार के लोग हिन्दू राष्ट्र के नाम पर आम लोगों के हृदय में बहुसांस्कृतिवाद और बहुधार्मिकवाद के खिलाफ ज़हर भरना चाहते हैं। वे यह भी जानते हैं कि भारत कभी हिन्दू राष्ट्र नहीं था , न आज है और न भारत कभी भविष्य में हिन्दू राष्ट्र बनेगा।
   भारत की बहुसांस्कृतिक-बहुधार्मिक-बहुजातीय राष्ट्र-राज्य की पहचान है। भारत की पहचान का आधार हिन्दूधर्म नहीं है। कोई भी धर्म भारत की पहचान का आधार नहीं है। बहुजातीयता,बहुधार्मिकता और बहुसांस्कृतिकता राष्ट्रीय पहचान का आधार हैं।
     भारत आज खुले समाज का हिमायती है। हिन्दूसमाज जैसे बंद समाज की धारणा का पक्षधर नहीं है। आज भारत के खुले समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती हिन्दुत्व और इस्लामिक फंडामेंटलिस्टों की ओर से आ रही है। ये दोनों ही विचारधाराएं अपने-अपने तर्कों के आधार पर आम आदमी की जिंदगी और खासकर बहुसांस्कृतिक स्वतंत्रता पर हमले कर रहे हैं। इन दोनों ही फंडामेंटलिस्ट विचारधाराओं के भारत में अब तक के कारनामे भारत के खुले समाज के वातावरण को नष्ट करने वाले हैं।
    आज जनतंत्र के बुनियादी तानेबाने के लिए इन दोनों ही किस्म के संगठनों से गंभीर खतरा है। हिन्दू और मुस्लिम फंडामेटलिज्म के झंडाबरदार समाजवाद और पूंजीवाद के विकल्प के रूप में अपनी फंडामेंटलिस्ट विचारधारा को पेश कर रहे हैं। वे इसे सामाजिक विकास के तीसरे मार्ग के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें इन दोनों ही फंडामेंटलिस्ट विचारधाराओं की आलोचना करते समय सतर्कता से काम लेना चाहिए। इन दोनों को ही इस्लाम और हिन्दू धर्म से अलगाने की जरूरत है।
    मसलन आरएसएस के हिन्दुत्व का हिन्दूधर्म से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। उसी तरह केरल में हाल के वर्षों में पैदा हुए मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट संगठन पापुलर फ्रंट का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है। य़ह एक मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट संगठन है और अनेक मायनों में यह संघ का अनुकरणकर्ता है।
     यूरोप के अनेक देशों में घटिया किस्म की हरकतें हो रही हैं। ये हरकतें उन देशों में हो रही हैं जिन्हें उदार पूंजीवादी मुल्क माना जाता है। मसलन इटली में मुसलमान औरतों के लिए अलग से समुद्रतट बनाए गए हैं जहां पर वे कपड़ों में निर्भय होकर समुद्रस्नान कर सकें और पतनशील पश्चिमी नग्नता से बची रह सकें।
    हॉलैण्ड में मुसलमानों के लिए अलग से अस्पताल बनाए जाने की बातें हो रही हैं जहां पर मुस्लिम औरतें अपने पिता,पति,भाई आदि के साथ गैर मुस्लिमों की मौजूदगी में मिल सकें। यह कोशिश की जा रही है कि कोई गैर मुस्लिम डाक्टर मुस्लिम बीबी,बहन और माताओं को हाथ भी न लगा सके। इन दिनों यूरोप की सड़कों पर बुर्का ज्यादा नजर आ रहा है। इतना बुर्का तीस साल पहले नहीं दिखता था।
   हिन्दू फंडामेंटलिस्टों ने उन तमाम सुधारों,मान्यताओं और मूल्यों को चुनौती दी है जिन्हें भारत ने रैनेसां के दौरान और बाद के वर्षों में अर्जित किया था। बहुलतावाद का प्रत्येक क्षेत्र में सम्मान करना रैनेसां की उपलब्धि थी। इसे हमें राजा राममोहन राय सौंप गए हैं।
        हिन्दू शुद्धता ,हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की धारणा पर विगत 30 सालों में जिस आक्रामक भाव से संघ परिवार ने जोर दिया है उससे भारत का बहुलतावादी सामाजिक-राजनीतिक ढ़ांचा हिल गया है। वे हिन्दुत्व -हिन्दुत्व करके भारत के बहुलतावादी तंत्र को बर्बाद करना चाहते हैं जिसे बड़ी तकलीफों के बाद रैनेसां में हमारे समाज ने अर्जित किया था। बहुलतावाद के लिए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर जोर दिया गया।
   फंडामेंटलिस्टों का मानना है कि हम कानून का सम्मान करते हैं लेकिन धर्म के मामले में हम किसी की बात नहीं मानेंगे। हमारे लिए धर्म का मतलब क्या है यह हम तय करेंगे। शाहबानो केस के फैसले से लेकर रामजन्मभूमि विवाद पर आए फैसले तक एक ही रूझान है। दोनों ही रंगत के फंडामेंटलिस्ट मानते हैं कि धर्म एक ऐसी चीज है जिसे कानून या कोई स्पर्श नहीं सकता। वह परम पवित्र अपरिवर्तनीय है। शुद्ध है।
     ये लोग धार्मिक जीवनशैलियों को अपनाने पर जोर दे रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता दोनों को ही नापसंद हैं। धर्मनिरपेक्ष लोग काम बिगाड़ने शत्रु लगते हैं। फंडामेंटलिस्टों को कम्युनिस्ट ,उपभोक्तावादी ,व्यक्तिवादी इन तीनों से नफरत है। फंडामेंटलिस्टों का मानना है कि कम्युनिज्म और पूंजीवाद दोनों में ही करोड़ों लोग मारे गए हैं। वहां शांति,सुख और सुरक्षा संभव नहीं है। शांति ,सुख और सुरक्षा तो सिर्फ धार्मिक फंडामेंटलिज्म में ही दे सकता है। उनका दावा है कि हिन्दू और मुस्लिम फंडामेंटलिज्म ही उपभोक्तावाद और समाजवाद का एकमात्र सही विकल्प है । असल में धार्मिक फंडामेंटलिज्म विध्वंसक विकल्प है विकास का विकल्प नहीं है।  










बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

शूद्र सांस्कृतिक बंधुत्व से भागे हुए हिन्दू

    हम सबके अंदर जातिप्रेम और दलितघृणा कूट-कूट भरी हुई। किसी भी अवसर पर हमारी बुद्धि नंगे रूप में दलित विरोध की आग उगलने लगती है। दलितों से मेरा तात्पर्य शूद्रों से है। अछूतों से हैं।
      सवाल उठता है अछूतों से आजादी के 60 साल बाद भी हमारा समाज प्रेम क्यों नहीं कर पाया ? वे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से हम आज भी दलितों से नफरत करते हैं। उन्हें पराया मानते हैं। मेरे कुछ हिन्दुत्ववादी पाठक हैं वे तो मुझपर बेहद नाराज हैं। मैं उनसे यही कह सकता हूँ कि अछूत समस्या,दलित समस्या मूलतः सामाजिक- आर्थिक -राजनीतिक समस्या ही नहीं है। बल्कि यह एक सांस्कृतिक समस्या भी है।
    दलित समस्या को हमने अभी तक राजनीतिक समस्या के रूप में ही देखा है। उसके हिसाब से ही संवैधानिक उपाय किए हैं। उन्हें नौकरी से लेकर शिक्षा तक सब चीजों में आरक्षण दिया है। आजादी के पहले और बाद में मौटे तौर पर वे राजनीतिक केटेगरी रहे हैं। उनकी सांस्कृतिक और आर्थिक नजरिए से हमने कभी सामूहिक मीमांसा नहीं की है। संस्कृति और आर्थिक जीवन के उन चोर दरवाजों को बंद करने का प्रयास ही नहीं किया जिनसे हमारे मन में और समाज में दलित विरोधी भावनाएं मजबूती से जड़ जमाए बैठी हैं।
     जाति को राजनीतिक केटेगरी मानने से जातिविद्वेष बढ़ता है। जाति व्यवस्था सांस्कृतिक-आर्थिक केटेगरी है। संस्कृति इसकी धुरी है आर्थिक अवस्था इसका आवरण है।  अंग्रेजों को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने आधुनिक भारत में जातिप्रथा को प्रधान एजेण्डा बनाया। सामाजिक व्यवस्था के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रयासों से ही जातिप्रथा का अध्ययन आरंभ हुआ।
    कंपनी शासन के लोग नहीं जानते थे कि जातिप्रथा क्या है ? वे यहां शासन करने के लिए आए थे और यहां के समाज को जानना चाहते थे।यही बुनियादी कारण है जिसके कारण अंग्रेज शासकों के अनुचर इतिहासकारों, मानवविज्ञानियों,प्राच्यविदों आदि ने जातिप्रथा का गंभीरता के साथ अध्ययन आरंभ किया।
     अति संक्षेप में इतिहासकार रामशरण शर्मा के ‘शूद्रों का प्राचीन इतिहास ’ ग्रंथ के आधार पर कह सकते हैं कि प्राचीनकाल में मवेशियों को लेकर जमकर संघर्ष हुए हैं और बाद में जमीन को लेकर संघर्ष हुए हैं। जिनसे ये वस्तुएं छीनी जाती थीं और जो अशक्त हो जाते थे,वे नए समाज में चतुर्थ वर्ण कहलाने लगते थे।फिर जिन परिवारों के पास इतने अधिक मवेशी हो गए और इतनी अधिक जमीन हो गयी कि वे स्वयं संभाल नहीं पाते थे,तो उन्हें मजदूरों की आवश्यकता हुई और वैदिककाल के अंत में वे शूद्र कहलाने लगे।
  हमारे बीच में शूद्रों के बारे में अनेक मिथ प्रचलन में हैं इनमें से एक मिथ है कि शूद्र वर्ण का निर्माण आर्य पूर्व लोगों से हुआ था। यह नजरिया एकांगी है और अतिरंजित है। इसी तरह यह भी गलत धारणा है कि आरंभ में सिर्फ आर्य ही थे।
    वास्तविकता यह है कि आर्थिक तथा सामाजिक विषमताओं के कारण आर्य  और आर्येतर ,दोनों के अंदर श्रमिक समुदाय का उदय हुआ और ये श्रमिक आगे जाकर शूद्र कहलाए। यह ऐतिहासिक सच है कि वैदिककाल के आरंभ में शूद्रों और दासों की संख्या कम थी। लेकिन उत्तरवर्ती वैदिककाल के अंत से लेकर आगे तक शूद्रों की संख्या बढ़ती गई, उत्तर वैदिक काल में वे जिन अशक्तताओं के शिकार रहे हैं,वे वैदिककाल में नहीं थीं।
       एक मिथ यह भी है कि शूद्र हमेशा से मैला उठाते थे,अछूत थे। यह तथ्य और सत्य दोनों ही दृष्टियों से गलत है। यदि हिन्दूशास्त्रों के आधार पर बातें की जाएं तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि त्रेता-युग का आरंभ होने के समय वर्णव्यवस्था का जन्म नहीं हुआ था। न कोई व्यक्ति लालची था और न लोगों में दूसरों की वस्तु चुराने की आदत थी।
    चतुर्वर्ण की उत्पत्ति के संबंध में सबसे प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद के पुरूषसूक्त में मिलता है। अनुमान है कि इसे संहिता के दशम मण्डल में बाद में जोड़ा गया था। बाद में इसे वैदिक साहित्य,गाथाकाव्य,पुराण और धर्मशास्त्र में अनुश्रुतियों के आधार पर कुछ हेर-फेर के साथ पेश किया गया। इसमें कहा गया है कि ब्राह्मण की उत्पत्ति आदिमानव (ब्रहमा) के मुँह से,क्षत्रिय की उनकी भुजाओं से,वैश्य की उनकी जांघों से, और शूद्र की उनके पैरों से हुई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि शूद्र और अन्य तीनों वर्ण एक ही वंश के थे और इसके फलस्वरूप वे आर्य समुदाय के अंग थे।
     शूद्रों के प्रति भेदभाव और घृणा सामाजिक विकास के क्रम में बहुत बाद पैदा हुई है। कायदे से हम सब एक हैं हममें और शूद्रों में बुनियादी तौर पर कोई अंतर नहीं है। कालांतर में श्रम और श्रम विभाजन की प्रक्रिया में हमने शूद्रों को अलग करने की आदत डाली,उनसे भेदभावपूर्ण व्यवहार आरंभ किया। उनके साथ उत्पीड़क का व्यवहार करने लगे और एक अवस्था ऐसी भी आयी कि हमने उनके सांस्कृतिक-सामाजिक उत्पीड़न को वैधता प्रदान करने वाला समूचा तर्कशास्त्र ही रच डाला।
    सवाल उठता है कि शूद्र पदबंध आया कहां से ? रामशरण शर्मा ने लिखा है कि जिस प्रकार सामान्य यूरोपीय शब्द ‘स्लेव’ और संस्कृत शब्द ‘दास’ विजित जनों के नाम पर बने थे, उसी प्रकार शूद्र शब्द उक्त नामधारी पराजित जनजाति के नाम पर बना था। ईसापूर्व चौथी शताब्दी में शूद्र नामक जनजाति थी। क्योंकि डियोडोरस ने लिखा है कि सिकंदर ने आधुनिक सिंध के कुछ इलाकों में रहने वाली सोद्रई नामक जनजाति पर चढ़ाई की थी। इतिहासकार टालमी ने लिखा है सिद्रोई आर्केसिया के मध्यभाग में रहते थे जिनके अंतर्गत पूर्वी अफगानिस्तान का बहुत बड़ा हिस्सा पड़ता है और इसकी पूर्वी सीमा पर सिन्धु है।
  सवाल यह है शूद्र हमारे आदिम बंधु हैं। क्या उन्हें हम आधुनिककाल में समस्त भेदभाव त्यागकर अपना मित्र नहीं बना सकते ? अपना पड़ोसी,अपना रिश्तेदार,अपना भाई, अपना जमाई,अपना बेटा नहीं बना सकते ?
     हमें गंभीरता के साथ उन कारणों की तलाश करनी चाहिए जिनके कारण शूद्र हमसे दूर चले गए और आज भी हमसे कोसों दूर हैं। हम सांस्कृतिक तौर पर पहले एक-दूसरे के साथ घुले मिले थे लेकिन अब एक-दूसरे के लिए पराए हैं,शत्रु हैं।
    पहले शूद्र एक ही शरीर और एक ही समाज का अनिवार्य अंग थे। आज एक-दूसरे से अलग हैं,एक-दूसरे के बारे में कम से कम जानते हैं,एक-दूसरे बीच में रोटी-बेटी-खान-पान-पूजा-अर्चना के संबंध टूट गए हैं। यह विभाजन हम जितनी जल्दी खत्म करेंगे उतना ही जल्दी सुंदर भारत बना लेंगे। भारत की कुरूपता का कारण है जातिभेद और शूद्रों के प्रति अकारण घृणा।
   भारत सत्ता,संपदा,तकनीक,इमारत,इंफ्रास्ट्रक्चर,उद्योग-धंधे,आरक्षण आदि में कितनी ही तरक्की कर ले, कितना ही बड़ा उपभोक्ता बाजार खड़ा कर ले हम जब तक शूद्रों के साथ सांस्कृतिक संबंध सामान्य नहीं बनाते सारी दुनिया में हमारा नाम पिछड़े देशों में बना रहेगा। समाज में  सामाजिक तनाव बना रहेगा।
    कुछ अमरीकीपंथी दलित विचारक हैं जो यह मानकर चल रहे हैं कि दलितों की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी तो दलितों की मुक्ति हो जाएगी। दलितों के पास दौलत आने ,उनके उपभोक्ता बनने से जातिभेद की दीवार नहीं गिरेगी बल्कि जातिभेद और बढ़ेगा। उपभोक्तावाद भेदभाव खत्म नहीं करता बल्कि भेदभाव बढ़ाता है।
    वस्तुओं के समान उपभोग से सांस्कृतिक भेदभाव की दीवारें गिरती नहीं हैं उलटे सांस्कृतिक भेदभाव की दीवारें मजबूत होती हैं। उपभोक्तावाद को भेदभाव से मदद मिलती है वह बुनियादी सामाजिक भेदभाव को बनाए रखता है।
उपभोक्तावाद में यदि भेदभाव की दीवार गिरा देने की ताकत होती तो अमेरिका और ब्रिटेन में नस्लीय भेदभाव की समाप्ति कभी की हो गयी होती। वस्तुओं का उपभोग भेद की दीवारें नहीं गिराता। वस्तुएं सांस्कृतिक मूल्यों को अपदस्थ नहीं करतीं। जातिभेद के सांस्कृतिक मूल्यों को अपदस्थ करने वाले नए मूल्यों को बनाने की पूंजीपति वर्ग में क्षमता ही नहीं है यदि ऐसा ही होता तो काले लोगों को विकसित पूंजीवादी मुल्कों में भयानक नस्लीय भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता।   

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

बाबरी मस्जिद विवाद- मुसोलिनी से साम्य है ‘हिन्दू आस्था ’ का


       बाबरी मस्जिद प्रकरण के दौरान आस्था पर सांप्रदायिक विचारधारा ने ज्यादा जोर दिया है तथा तर्क, कानून, वाद-विवाद इन सबसे परे माना है। पहली बात तो यह है कि अगर यह 'आस्था' एवं 'भावना' का मसला है तो इसे इतिहास से नहीं जोड़ा जाए। न 'स्थापत्य' से जोड़ा जाए, न हिंदू से जोड़ा जाए, न ही इसे धर्मनिरपेक्षता से जोड़ा जाना चाहिए। 'आस्था' सिर्फ 'आस्था' है, वह न धर्म है, न इतिहास है, न ईश्वर है, न संस्कृति है। न वह मात्र राम ही है वह सिर्फ आस्था है। 'आस्था' एवं 'विश्वास' के आधार पर आधुनिक युग की किसी भी समस्या का समाधान संभव नहीं है और अगर 'आस्था' तर्कातीत है तो फिर मिल-बैठकर समाधान की संभावना कैसी ? तथा कोशिशें क्यों ?
जब 'आस्था' सर्वोपरि है तो प्रत्येक व्यक्ति की 'आस्था' सर्वोपरि है। किसी एक व्यक्ति की या संगठन या विचारधारा की 'आस्था' सर्वोपरि नहीं हो सकती जो कोई यह माने कि उसी की 'आस्था' सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोपरि है, अगर ऐसा होता है तो वह मुसोलिनी एवं हिटलर के शब्दों में ही 'आस्था' दोहरा रहा होता है। हिंदू सांप्रदायिक संगठनों ने अपनी 'आस्था' को सबसे बड़ी 'निर्णायक' वस्तु माना है, तथा रेखांकित किया है। इसकी तुलना मुसोलिनी की सबसे निर्णायक वस्तु आस्था से ही की जा सकती है।

हिंदुत्ववादी संगठन भी आस्था के सहारे रामराज्य रूपी आध्यात्मिक राज्य का प्रत्येक नागरिक को सदस्य बनाना चाहते हैं। मुसोलिनी भी 'आस्था' के सहारे 'आध्यात्मिक समाज का जागरूक सदस्य' बनाना चाहता था।

हिंदुत्ववादी संगठनों जिनमें आरएसएस की केंद्रीय भूमिका है इसके सांप्रदायिक प्रचार अभियान की दिशा फासिस्ट संगठनों के नक्शेकदम पर तैयार की गई है जिसका बाबरी मस्जिद प्रकरण के दौरान जमकर प्रचार किया गया।
हिटलर की तर्ज पर ही आर्य श्रेष्ठता के सिद्धांत की तर्ज पर हिंदू श्रेष्ठता का नारा उछाला गया। यहूदी हनन की तरह मुस्लिम हनन एवं मुस्लिमों के प्रति घृणा को लक्ष्य रखा गया। विचारधारात्मक श्रेष्ठता के लिए धर्म में ही गहनतम अभिव्यक्ति देखी गई। हिटलर भी ऐसा ही सोचता था। हिटलर की ही तरह धर्म को सबसे ऊपर स्थान दिया गया।

अभिजनवाद की धारणा के आधार पर हिटलर ने एक नस्ल को दूसरी से घृणा करना सिखाया। हमारे यहां सांप्रदायिक संगठनों ने भी ऐसा ही प्रचार किया हिंदू सांप्रदायिक संगठनों ने इस दौरान भाषावार राज्यों के गठन का विरोध किया और नारी के प्रति फासिस्ट नजरिया होने के कारण उसे वर्ण व्यवस्था के तहत ही रहने-जीने की वकालत की। सांप्रदायिकता को इसी मायने में फासिस्ट विचारधारा के परिप्रेक्ष्य में रखा जाना चाहिए। राममंदिर निर्माण की योजना एवं आरएसएस के अभीप्सित लक्ष्य में अंतस्संबंध है, उसे भूलना नहीं चाहिए। मंदिर बनाना उसका अंतिम लक्ष्य नहीं है बल्कि अंतिम लक्ष्य हिंदू राष्ट्र के लिए राजसत्ता हासिल करना है।
इस समूची प्रक्रिया में कांग्रेस की भूमिका सबसे ज्यादा खतरनाक रही है। उसने निहित स्वार्थी नजरिए के कारण सबसे पहले शाहबानो प्रकरण में मुस्लिम सांप्रदायिकता के आगे घुटने टेके। बाद में हिंदू सांप्रदायिक शक्तियों के आगे शिलान्यास के प्रश्न पर आत्मसमर्पण किया। कांग्रेस के ढुलमुल नेतृत्व के कारण ही पिछले कई दशकों में सांप्रदायिक शक्तियों का एक नया उभार आया है जिसमें भाजपा एक उभरती आक्रामक हिंदू सांप्रदायिक विचारधारा को अभिव्यक्ति दे रही है तो महाराष्ट्र में शिवसेना, उत्तर-पूर्वी राज्यों एवं जम्मू-कश्मीर में भी सांप्रदायिक तथा पृथकतावादी ताकतें शक्तिशाली होकर उभरी हैं।

बाबरी मस्जिद प्रकरण पर उन तमाम संगठनों का यकायक सक्रिय एवं जिंदा संगठन के रूप में रूपांतरित हो जाना, इस बात का ही द्योतक है कि कांग्रेस ने सन् 80 के बाद से नई रणनीति के तहत पिछड़ी सामाजिक शक्तियों को अपने साथ जोड़ने एवं प्रोत्साहित करने की जो प्रक्रिया शुरू की थी उसका तात्कालिक लाभ उसे जरूर मिला पर मूलत: सांप्रदायिक एवं पिछड़ी शक्तियां ही मजबूत हुई हैं।
कांग्रेस नेतृत्व ने सन 1977 में जो जनाधार खोया था, उसे पुन: पाने के लिए ऐसा किया गया था। इसका तात्कालिक तौर पर सन् 1980 एवं 1984 के चुनावों में उसे लाभ मिला, पर इस प्रक्रिया में सांप्रदायिक शक्तियां ज्यादा मजबूत हुईं और सांप्रदायिक विचारधारा का व्यापक विस्तार हुआ।

कांग्रेस का शाहबानो प्रकरण एवं शिलान्यास के समय यही लक्ष्य था कि वह इन दोनों मसलों पर हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों को संतुष्ट करके लोकसभा चुनाव में सफलता हासिल करना चाहती थी पर ऐसा हो नहीं पाया, अपितु इस प्रक्रिया में भाजपा सबसे ज्यादा सफलता हासिल करने में सफल रही।
  भाजपा ने सन 1977-79 के संक्षिप्त जनता पार्टी शासन के दौरान राम जन्मस्थान के मुद्दे को नहीं उठाया, यहां तक कि 1986 में शाहबानो विवाद पर कांग्रेस के समर्पण से पूर्व उसने कभी इस सवाल को नहीं उठाया। पर, जब भाजपा ने देखा कि राष्ट्रीय मोर्चा सरकार का अनिश्चित समर्थन उसे उसके सामाजिक आधार से काट सकता है तो भाजपा विरोध में सक्रिय हो उठी। सामाजिक आधार खोने का खतरा प्रमुख कारण था, वरना अपने जनसंघ के दौर में कभी भाजपा ने यह मसला क्यों नहीं उठाया ?
एक बार तो वह उ.प्र. की संयुक्त सरकार की सदस्य भी थी। असल बात है कांग्रेस की रणनीति की, भाजपा उसका विकल्प बनकर उभरना चाहती थी। कांग्रेस का सांप्रदायिक शक्तियों के प्रति समर्पण भाव भाजपा को ज्यादा से ज्यादा आक्रामक बनाने में सक्रिय भूमिका अदा करता रहा है।
बाबरी मस्जिद प्रकरण का एक अन्य सिरा भी है वह है लालकृष्ण आडवाणी की भूमिका, चंद्रशेखर-राजीव गांधी की वी.पी.सिंह सरकार के पतन के बाद की भूमिका एवं 30अक्टूबर एवं 2 नवंबर 1990 की घटनाएं। इन सबकी संक्षेप में पड़ताल जरूरी है। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 12 सितंबर 1990 को नई दिल्ली में प्रेस कान्फ्रेंस में 'रथयात्रा' के कार्यक्रम की घोषणा की थी और 'रथयात्रा' को देश में 25 सितंबर से 30 अक्टूबर तक अयोध्या पहुंचना था। कान्फ्रेंस में आडवाणी ने कहा 'रथयात्रा' का उद्देश्य राम जन्मभूमि के सवाल पर भाजपा की नीति बताने एवं जन समर्थन जुटाना है। इसी में उन्होंने विश्व हिंदू परिषद् के द्वारा की जाने वाली कारसेवा का भी पूरा समर्थन किया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कारसेवा की इजाजत नहीं दी गई तो वहां 'शांतिपूर्ण सत्याग्रह' किया जाएगा।

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

हिन्दू फासीवाद की प्रचार कला

     हिन्दू फासीवाद का बुनियादी लक्ष्य है शोषण को बनाए रखना और पहले से मौजूद भेदों को बनाए रखना। संघ परिवार की विशाल सांगठनिक शक्ति का आज तक शोषण के उन्मूलन के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया ? यह सवाल बार-बार मन में उठता रहा है।
     तर्क के लिए हम मान लेते हैं कि संघ देशभक्त संगठन है। संघ में अच्छे और भले लोग हैं। संघ राष्ट्र निर्माण के कामों में लगा है। सवाल यह है कि इतने अच्छे,भले और राष्ट्रवादी लोग शोषण से मुक्ति के लिए क्या कर रहे हैं ?
     संघ आज तक सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता रहा है। तथ्यतः यह दावा गलत है। लेकिन बहस के लिए इसे भी मान लेते हैं। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह मौजूद है कि संघ परिवार ने कभी शोषण से मुक्ति का कार्यक्रम पेश क्यों नहीं किया ? वे जितनी उग्रता के साथ मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं और जिस आक्रोश के साथ हिन्दू बचाओ और हिन्दुओं को एकजुट करो का नारा लगाते रहते हैं उन्होंने ऐसी ही बेचैनी शोषण के खिलाफ क्यों नहीं दिखाई ?
     संघ परिवार के प्रिय विषय हैं हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि उनके इस विस्तृत कार्यक्षेत्र में गांव के गरीबों की मुक्ति का कोई सकारात्मक एजेण्डा नहीं है। विषमता की समस्या से मुक्ति का कोई कार्यक्रम नहीं है। अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे को लागू करने के लिए वे वाचिक और भौतिक दोनों ही धरातल पर क्रूरतम हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। अपने हिन्दू लक्ष्य को पाने के लिए शारीरिक तौर पर साफ करने की संस्कृति का दंगों के माध्यम से अभ्यास करते रहे हैं।
  हिटलर की नात्सी सेना और फासिस्ट संगठनों की जो संरचना रही है उसे संघ परिवार ने अक्षरशः लागू किया है। हिटलर के रास्ते पर चलते हुए संघ का मानना है कि उसका संगठन जन संगठन हो। लाखों लोग उसके सदस्य हों। ये ऐसे लोग होने चाहिए जो खुलेआम कार्यरत हों। पहचान में आने लायक हों। उनका अपना एक यूनीफार्म हो। उसके कार्य और निर्णय पूरी तरह ज्ञात होने चाहिए। वे अपने स्वयंसेवकों को खेल के बहाने सैन्य शिक्षा के गुर भी सिखाते हैं। संघ अपने स्वयं सेवकों को सैन्य शिक्षा के साथ साथ संघ के हितों की रक्षा के लिए भी सांगठनिक तौर पर तैयार करता है।
    संघ अपने कार्यकर्ताओं को जो शिक्षा  देता है उसका लक्ष्य है आक्रमण। वे अपने विरोधी से संवाद नहीं करते उस पर आक्रमण करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी उनका यही रवैय्या है। वे अवरोधक और आतंक की शैली अपनाते हैं। गुजरात में उन्होंने इसी शैली को व्यवहार में परिणत किया है। वे साम्प्रदायिक सदभाव बनाने के प्रत्येक काम में अवरोध खड़े कर रहे हैं और आतंक फैलाए हुए हैं।
     आरएसएस ने अपनी सांगठनिक शक्ति के बल पर सारे भारत को यह समझा दिया है कि वे यदि सड़कों पर आक्रमण करने निकल आएंगे तो उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। दंगों की राजनीति में वे अव्वल हैं। उन्हें सडक की जंग में कोई नहीं हरा सकता। यह बात गुजरात के दंगों से सिद्ध हो चुकी है। वे बताना चाहते हैं कि जो सड़कों पर जीतेगा वही सिकंदर कहलाएगा।
   हिन्दू फासीवाद का अपने संगठन के सदस्यों के लिए संदेश है कि अंधानुकरण करें और अंध सम्मान करें। हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसा करना लाजिमी शर्त है। फासीवादी आंदोलन के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं जैसे स्वयं सेवक की यूनीफॉर्म,झंड़ा,प्रतीक चिह्न, नारे,गीत,हथियार बंद ग्रुप,नेता की उपस्थिति,भागीदारों का जमावड़ा । इन सबका कौशलपूर्ण उपयोग ही संगठन को शानदार बनाता है।
   हिन्दू फासीवादी संगठन अपने प्रचार को राष्ट्रवाद के आवरण में रखकर सम्पन्न करते हैं। राष्ट्रवाद की ओट में वे हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि विषयों पर विचारधारात्मक प्रचार अभियान चलाते हैं।
     वे अपने प्रचार को जनता के दिल पर उतारने की कला में माहिर होते हैं इसीलिए भावुकता का अभिव्यक्ति में जमकर इस्तेमाल करते हैं। वे ऐसी भाषा,शैली और मुहावरों का प्रयोग करते हैं जो दिमाग की बजाय दिल को सम्बोधित करते हैं। वे अपने प्रचार से आम लोगों के दिल को प्रदूषित करते हैं।
    हिटलर मानता था ‘ प्रचार को मानव आवेग के ज्वालामुखी और आत्मिक स्थिति का विस्फोट करना चाहिए।’ वे हिन्दू राष्ट्र और राष्ट्रवाद की इतनीबार पुनरावत्ति करते हैं जिससे वे स्टीरयोटाइप लगने लगता है। प्रचार की यह कला फासिस्ट कला है। हिटलर मानता था कि अपनी बात को इतनी बार दोहराओ कि वह स्टीरियोटाइप लगने लगे। स्वयं को और शत्रु को हमेशा स्याह-सफेद रूप में पेश करो।
     फासीवाद अपने प्रचार में अपने विरोधी को लगातार बुरा बताता रहता है। कुत्सा प्रचार करते रहते हैं। उनके प्रचार का लक्ष्य सत्य बताना नहीं है ,प्रचार का कभी भी लक्ष्य सत्य की खोज करना नहीं है। प्रचार का लक्ष्य होता है आंदोलन की मदद करना। इस संदर्भ में संघ के प्रचार को देखें तो पाएंगे कि संघ अपने प्रचार के द्वारा हिन्दू सत्य को पेश नहीं करता , उसकी बातों को सत्य नहीं समझना चाहिए बल्कि संघ के प्रचार अभियान का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र के सपने को लोगों के दिलों में उतारना। एक वाक्य में कहें प्रचार सत्य नहीं होता।
रोजे बूर्दरों ने  ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक ग्रंथ में फासीवादी प्रचार पर  लिखा है कि ‘‘प्रभावी होने के लिए प्रचार को थोड़े सी बातों के बार-बार इस्तेमाल की तकनीक पर आधारित होना चाहिए। हिटलर के अनुसार वे इतनी दोहराई जाएं कि 'स्टीरिओटाइप' लगने लगें। यह प्रचारात्मक लामबंदी उतनी ही सफल होगी जितना कि आंदोलन और उसके विरोधियों की अवस्थितियों को आमने-सामने सफेद-स्याह की तरह र¹ दिया जाएगा बिना किसी भ्रम के, एकदम साफ-साफ। हिटलर माइन कांप्फ में कहता है: 'किसी साबुन के प्रचार के लिए लगे उस पोस्टर के बारे में कोई क्या करेगा, जो यह भी कह रहा हो कि दूसरे साबुन भी अच्छे हैं, सिवाय इसके कि अपना सिर नोचे? (पृ. 183)
इस तरह विरोधी को लगातार बुरा बताना प्रचार का स्थायी मुद्दा होना चाहिए। उसके साथ कुत्सा प्रचार भी हो तो उसे ¹त्म करना आसान हो जाता है। प्रचार का यह काम नहीं है कि वह किसी न किसी सत्य का शोध करके प्रचार करेएक मात्र सत्य वह है कि आंदोलन को लाभ पहुंचे।’’
‘‘आंदोलन और विरोधी पक्ष के अंतर को इस कौशल के साथ प्रस्तुत करने से शत्रु पक्ष निकट आ जाता है और जनता के सामने चयन के बहुत से विकल्प नहीं रह जाते और एकीकृत शत्रुपक्ष पर संकेंद्रित आक्रमण आसान हो जाता है।
'विरोधी पक्ष की बहुलता को हमेशा एक ही पलड़े पर रना चाहिए ताकि हमारी पक्षधर जनता को लगे कि उसका संघर्ष एक ही शत्रु से है। उससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। अपने ऐसे शत्रु पर हमला करने का आवेश बढ़ता है।' (माइन कांप्फ, पृ. 122)
यही खिचड़ी सारे आंदोलनों में पकाई गई थी। हमें याद ही होगा कि प्रीमो ने समर्थो के बोल्शेविज्म पर किस तरह हमला किया है। लेकिन सबसे उग्र मिश्रण नात्सीवाद में दिखाई देता है यहूदियों के मुद्दे पर, जहां उन्हें सबसे धनी और सबसे अधिक कम्युनिस्ट चित्रित किया गया है।
यहां आकर लोगों को अनुकूलित करने के उद्देश्य से आतंक और अंतर्भावों को जमाने के लिए विवेक के निषेध का ज्वार देसकते हैं। ऐसे प्रचार की भाषा बेहद आवेगमय होती है। हालांकि बात ऐसे उठाई जाती है जैसे अन्याय के विरुद्ध न्याय की लड़ाई हो। पर वह वहीं तक नहीं रुकती। बात और गहराई तक जाती है स्वास्थ्य की बीमारी से संघर्ष, साफ हवा का बदबू के विरुद्ध संघर्ष, शुध्दता का अशुध्दता के विरुध्द संघर्ष। शत्रु जीना मुश्किल कर रहा है। ऐसे में उससे घृणा कैसे न हो ? क्योंकर उसे ध्वस्त करने के लिए सब कुछ दांव पर न लगे ?’’
    
          किताब का नाम- फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
           लेखक-  रोजे बूर्दरों, प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष   
            चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092,  मूल्य -275 














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