गुरुवार, 8 जुलाई 2010

हिन्दू फासीवाद की प्रचार कला

     हिन्दू फासीवाद का बुनियादी लक्ष्य है शोषण को बनाए रखना और पहले से मौजूद भेदों को बनाए रखना। संघ परिवार की विशाल सांगठनिक शक्ति का आज तक शोषण के उन्मूलन के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया ? यह सवाल बार-बार मन में उठता रहा है।
     तर्क के लिए हम मान लेते हैं कि संघ देशभक्त संगठन है। संघ में अच्छे और भले लोग हैं। संघ राष्ट्र निर्माण के कामों में लगा है। सवाल यह है कि इतने अच्छे,भले और राष्ट्रवादी लोग शोषण से मुक्ति के लिए क्या कर रहे हैं ?
     संघ आज तक सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता रहा है। तथ्यतः यह दावा गलत है। लेकिन बहस के लिए इसे भी मान लेते हैं। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह मौजूद है कि संघ परिवार ने कभी शोषण से मुक्ति का कार्यक्रम पेश क्यों नहीं किया ? वे जितनी उग्रता के साथ मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं और जिस आक्रोश के साथ हिन्दू बचाओ और हिन्दुओं को एकजुट करो का नारा लगाते रहते हैं उन्होंने ऐसी ही बेचैनी शोषण के खिलाफ क्यों नहीं दिखाई ?
     संघ परिवार के प्रिय विषय हैं हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि उनके इस विस्तृत कार्यक्षेत्र में गांव के गरीबों की मुक्ति का कोई सकारात्मक एजेण्डा नहीं है। विषमता की समस्या से मुक्ति का कोई कार्यक्रम नहीं है। अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे को लागू करने के लिए वे वाचिक और भौतिक दोनों ही धरातल पर क्रूरतम हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। अपने हिन्दू लक्ष्य को पाने के लिए शारीरिक तौर पर साफ करने की संस्कृति का दंगों के माध्यम से अभ्यास करते रहे हैं।
  हिटलर की नात्सी सेना और फासिस्ट संगठनों की जो संरचना रही है उसे संघ परिवार ने अक्षरशः लागू किया है। हिटलर के रास्ते पर चलते हुए संघ का मानना है कि उसका संगठन जन संगठन हो। लाखों लोग उसके सदस्य हों। ये ऐसे लोग होने चाहिए जो खुलेआम कार्यरत हों। पहचान में आने लायक हों। उनका अपना एक यूनीफार्म हो। उसके कार्य और निर्णय पूरी तरह ज्ञात होने चाहिए। वे अपने स्वयंसेवकों को खेल के बहाने सैन्य शिक्षा के गुर भी सिखाते हैं। संघ अपने स्वयं सेवकों को सैन्य शिक्षा के साथ साथ संघ के हितों की रक्षा के लिए भी सांगठनिक तौर पर तैयार करता है।
    संघ अपने कार्यकर्ताओं को जो शिक्षा  देता है उसका लक्ष्य है आक्रमण। वे अपने विरोधी से संवाद नहीं करते उस पर आक्रमण करते हैं। सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी उनका यही रवैय्या है। वे अवरोधक और आतंक की शैली अपनाते हैं। गुजरात में उन्होंने इसी शैली को व्यवहार में परिणत किया है। वे साम्प्रदायिक सदभाव बनाने के प्रत्येक काम में अवरोध खड़े कर रहे हैं और आतंक फैलाए हुए हैं।
     आरएसएस ने अपनी सांगठनिक शक्ति के बल पर सारे भारत को यह समझा दिया है कि वे यदि सड़कों पर आक्रमण करने निकल आएंगे तो उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। दंगों की राजनीति में वे अव्वल हैं। उन्हें सडक की जंग में कोई नहीं हरा सकता। यह बात गुजरात के दंगों से सिद्ध हो चुकी है। वे बताना चाहते हैं कि जो सड़कों पर जीतेगा वही सिकंदर कहलाएगा।
   हिन्दू फासीवाद का अपने संगठन के सदस्यों के लिए संदेश है कि अंधानुकरण करें और अंध सम्मान करें। हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसा करना लाजिमी शर्त है। फासीवादी आंदोलन के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं जैसे स्वयं सेवक की यूनीफॉर्म,झंड़ा,प्रतीक चिह्न, नारे,गीत,हथियार बंद ग्रुप,नेता की उपस्थिति,भागीदारों का जमावड़ा । इन सबका कौशलपूर्ण उपयोग ही संगठन को शानदार बनाता है।
   हिन्दू फासीवादी संगठन अपने प्रचार को राष्ट्रवाद के आवरण में रखकर सम्पन्न करते हैं। राष्ट्रवाद की ओट में वे हिन्दू की श्रेष्ठता, अखण्ड भारत, पाक शत्रुता,भारत विभाजन, मुस्लिम विद्वेष, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में विदेशियों के हमले और जुल्म,गऊ हत्या का विरोध,शरणार्थी समस्या, शिक्षा आदि विषयों पर विचारधारात्मक प्रचार अभियान चलाते हैं।
     वे अपने प्रचार को जनता के दिल पर उतारने की कला में माहिर होते हैं इसीलिए भावुकता का अभिव्यक्ति में जमकर इस्तेमाल करते हैं। वे ऐसी भाषा,शैली और मुहावरों का प्रयोग करते हैं जो दिमाग की बजाय दिल को सम्बोधित करते हैं। वे अपने प्रचार से आम लोगों के दिल को प्रदूषित करते हैं।
    हिटलर मानता था ‘ प्रचार को मानव आवेग के ज्वालामुखी और आत्मिक स्थिति का विस्फोट करना चाहिए।’ वे हिन्दू राष्ट्र और राष्ट्रवाद की इतनीबार पुनरावत्ति करते हैं जिससे वे स्टीरयोटाइप लगने लगता है। प्रचार की यह कला फासिस्ट कला है। हिटलर मानता था कि अपनी बात को इतनी बार दोहराओ कि वह स्टीरियोटाइप लगने लगे। स्वयं को और शत्रु को हमेशा स्याह-सफेद रूप में पेश करो।
     फासीवाद अपने प्रचार में अपने विरोधी को लगातार बुरा बताता रहता है। कुत्सा प्रचार करते रहते हैं। उनके प्रचार का लक्ष्य सत्य बताना नहीं है ,प्रचार का कभी भी लक्ष्य सत्य की खोज करना नहीं है। प्रचार का लक्ष्य होता है आंदोलन की मदद करना। इस संदर्भ में संघ के प्रचार को देखें तो पाएंगे कि संघ अपने प्रचार के द्वारा हिन्दू सत्य को पेश नहीं करता , उसकी बातों को सत्य नहीं समझना चाहिए बल्कि संघ के प्रचार अभियान का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र के सपने को लोगों के दिलों में उतारना। एक वाक्य में कहें प्रचार सत्य नहीं होता।
रोजे बूर्दरों ने  ‘‘फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार’’ नामक ग्रंथ में फासीवादी प्रचार पर  लिखा है कि ‘‘प्रभावी होने के लिए प्रचार को थोड़े सी बातों के बार-बार इस्तेमाल की तकनीक पर आधारित होना चाहिए। हिटलर के अनुसार वे इतनी दोहराई जाएं कि 'स्टीरिओटाइप' लगने लगें। यह प्रचारात्मक लामबंदी उतनी ही सफल होगी जितना कि आंदोलन और उसके विरोधियों की अवस्थितियों को आमने-सामने सफेद-स्याह की तरह र¹ दिया जाएगा बिना किसी भ्रम के, एकदम साफ-साफ। हिटलर माइन कांप्फ में कहता है: 'किसी साबुन के प्रचार के लिए लगे उस पोस्टर के बारे में कोई क्या करेगा, जो यह भी कह रहा हो कि दूसरे साबुन भी अच्छे हैं, सिवाय इसके कि अपना सिर नोचे? (पृ. 183)
इस तरह विरोधी को लगातार बुरा बताना प्रचार का स्थायी मुद्दा होना चाहिए। उसके साथ कुत्सा प्रचार भी हो तो उसे ¹त्म करना आसान हो जाता है। प्रचार का यह काम नहीं है कि वह किसी न किसी सत्य का शोध करके प्रचार करेएक मात्र सत्य वह है कि आंदोलन को लाभ पहुंचे।’’
‘‘आंदोलन और विरोधी पक्ष के अंतर को इस कौशल के साथ प्रस्तुत करने से शत्रु पक्ष निकट आ जाता है और जनता के सामने चयन के बहुत से विकल्प नहीं रह जाते और एकीकृत शत्रुपक्ष पर संकेंद्रित आक्रमण आसान हो जाता है।
'विरोधी पक्ष की बहुलता को हमेशा एक ही पलड़े पर रना चाहिए ताकि हमारी पक्षधर जनता को लगे कि उसका संघर्ष एक ही शत्रु से है। उससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। अपने ऐसे शत्रु पर हमला करने का आवेश बढ़ता है।' (माइन कांप्फ, पृ. 122)
यही खिचड़ी सारे आंदोलनों में पकाई गई थी। हमें याद ही होगा कि प्रीमो ने समर्थो के बोल्शेविज्म पर किस तरह हमला किया है। लेकिन सबसे उग्र मिश्रण नात्सीवाद में दिखाई देता है यहूदियों के मुद्दे पर, जहां उन्हें सबसे धनी और सबसे अधिक कम्युनिस्ट चित्रित किया गया है।
यहां आकर लोगों को अनुकूलित करने के उद्देश्य से आतंक और अंतर्भावों को जमाने के लिए विवेक के निषेध का ज्वार देसकते हैं। ऐसे प्रचार की भाषा बेहद आवेगमय होती है। हालांकि बात ऐसे उठाई जाती है जैसे अन्याय के विरुद्ध न्याय की लड़ाई हो। पर वह वहीं तक नहीं रुकती। बात और गहराई तक जाती है स्वास्थ्य की बीमारी से संघर्ष, साफ हवा का बदबू के विरुद्ध संघर्ष, शुध्दता का अशुध्दता के विरुध्द संघर्ष। शत्रु जीना मुश्किल कर रहा है। ऐसे में उससे घृणा कैसे न हो ? क्योंकर उसे ध्वस्त करने के लिए सब कुछ दांव पर न लगे ?’’
    
          किताब का नाम- फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
           लेखक-  रोजे बूर्दरों, प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष   
            चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092,  मूल्य -275 














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