गुरुवार, 15 जुलाई 2010

यथास्थितिवादी होते हैं मीडिया प्रतीक

     मीडिया प्रतीक कभी परिवर्तन नहीं करते। यथास्थितिवाद को बनाए रखते हैं। प्रतीक का अर्थ सतह पर कुछ भी प्रतीत हो किंतु आंतरिक अर्थ हमेशा यथास्थितिवादी होता है। परिवर्तन के नाम पर हमारे बीच में आधुनिक युग में जितने भी प्रतीक आए हैं वे सभी अंत में पूंजीवादी व्यवस्था के मददगार साबित हुए हैं। यहां तक कि समाजवाद को जब प्रतीक बनाया गया तो वह भी यथास्थितिवाद या पूंजीवाद की ओर मुड़ गया। समाजवाद का प्रतीक के रूप में रूपान्तरण दूसरे विश्वयुद्ध के बाद होता है।
   दूसरे विश्वयुद्ध तक समाजवाद ने विकल्प की व्यवस्था के रूप में विकास किया उसके बाद 'व्यवस्था' से 'प्रतीक' में रूपान्तरण हुआ। 'समाजवादी व्यवस्था' से प्रतीक में रूपान्तरण में दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने केन्द्रीय भूमिका अदा की। पहला, परमाणुबम का उदय । और दूसरी घटना थी अंतरिक्ष में सोवियत अंतरिक्ष यान का प्रक्षेपण।
        
      जब किसी चीज को प्रतीक में तब्दील कर दिया जाता है तो वह 'कायिक क्षेत्र' का अतिक्रमण कर जाता है। इसका मनोवैज्ञानिक धरातल पर गहरा असर होता है। मसलन् सोवियत संघ का प्रतीक में रूपान्तरण अंतत: सोवियत संघ की देश के रूप में विश्व के नक्शे में जो पहचान थी उसको भी निगल गया। यही हाल समाजवाद का भी हुआ उसे प्रचार माध्यमों ने प्रतीक बनाया , उसे खास किस्म के प्रतीकों से जोड़ा गया जैसे हंसिया-हथौड़ा आदि। प्रतीक बनने के कारण फिलीस्तीन देश का अस्तित्व ही खत्म होने को आ गया है।
    कहने का अर्थ है देश को प्रतीक बनाने से देश के नक्शे से गायब होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। आज रावण की श्रीलंका, राम की अयोध्या आदि का कहीं पता नहीं है। आजादी के संग्राम के दौरान भारत को भी प्रतीक बनाया गया और आजादी आयी भारत के प्रतीक के विभाजन के साथ। यही हाल पाकिस्तान का भी हुआ पाकिस्तान का उदय एक धार्मिक राष्ट्र के प्रतीक के रूप में हुआ और उसे भी विभाजन का सामना करना पड़ा।
    यदि व्यक्ति को प्रतीक बनाया जाता है तो वह भी गायब हो जाता है। पुराने देवी-देवताओं का प्रतीक में रूपान्तरण उनकी अनुपस्थिति की घोषणा है। मार्क्स,लेनिन,माओ आदि का प्रतीक में रूपान्तरण उनके अंत की घोषणा भी है। भारत में श्रीमती इंदिरागांधी महिला सशक्तिकरण का प्रतीक थी। राजीव गांधी कम्प्यूटर क्रांति के प्रतीक थे। किंतु दोनों को ही अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ा। महात्मागांधी शांति के प्रतीक थे और मारे गए।  प्रतीक का उदय वास्तव के अस्तित्व की समाप्ति की घोषणा है। प्रतीक कभी यथार्थ में नहीं रहता बल्कि महायथार्थ में विलीन हो जाता है।
       मीडिया प्रस्तुतियों की धुरी है 'सामंजस्य', 'ग्रहण' और 'विस्मृति'। चीजें बदलती कम हैं बदलने का नाटक ज्यादा दिखता है। ऊपरी सतह बदल जाती है। प्रस्तुति का रूप बदल जाता है। बुनियादी पैराडाइम ज्यों का त्यों रहता है। दर्शक मीडिया प्रस्तुतियों के मोहजाल में फंसा रहता है।
     मीडिया दर्शन है 'बेचैनी से कुछ भी बदलने वाला नहीं है। सब कुछ सहजभाव से ग्रहण करो', 'यथार्थ के साथ सामंजस्य बिठाकर चलो।' चीजें चल रही हैं। चलती जा रही है। मंदी,युद्ध,हमले,गरीबी,बेकारी, घोटाले, चुनाव, जय- पराजय आदि चलता रहेगा। अमरीका के बड़े माध्यमों में बुश के युद्धापराध और कारपोरेट घरानों के आर्थिक अपराध मीडिया प्रस्तुतियों में दर्शन नजर नहीं आते।
         मीडिया प्रस्तुतियों आर्थिकमंदी को कम करके पेश किया जा रहा है। आर्थिकमंदी को अन्य सामान्य परेशानियों की कोटि में रखकर प्रस्तुत किया रहा है। इसके विपरीत आर्थिक आशावाद पर ज्यादा जोर है। आर्थिकमंदी को नीतियों की भूल के रूप में चित्रित नहीं किया जा रहा है बल्कि कुछ आर्थिक उपायों की असफलता के रूप में पेश किया जा रहा है।
    जबकि सच यह है कि आर्थिकमंदी नव्य उदारतावाद की नीतिगत असफलता है। यह इस बात का भी संकेत है कि पूंजीवाद में नीतिगत असफलताओं के बार-बार दर्शन होंगे। महज 'आर्थिक यूटोपिया' के वर्णन और संभावनाओं से भ्रमित किया जा सकता है,नव्य उदारतावाद की सफलता की इससे पुष्टि नहीं होती। आर्थिकमंदी इराक,अफगानिस्तान युद्ध की देन नहीं है। इस मंदी से आर्थिक पैकेज के जरिए भी निकलना संभव नहीं है। यह सफलता और असफलता का मामला नहीं है। यह आर्थिक पैकेज का भी मामला नहीं है। बल्कि यह नीतिगत असफलता है। यह भूमंडलीकरण के आदर्श प्रतीक अमेरिका की आर्थिक तबाही की सूचना भी है। हमें कायदे से नव्य उदारतावाद के राजनीतिक विकल्प की खोज करनी चाहिए।
      पूंजीवादी विचारक और नेता उम्मीद कर रहे हैं कि ऐसे उपाय किए जाएं जिससे आर्थिक मंदी कुछ कम हो जाए, आर्थिक राहत पैकेज घोषित किए जाएं, कुछ अमरीकी नौजवान नौकरी पा जाएं। कुछ सैनिक इराक - अफगानिस्तान से वापस आ जाएं। सारी दुनिया से तनाव कुछ कम हो जाए। इन सबसे तनाव कम होने वाला नहीं है।
      मीडिया प्रस्तुतियों में 'आर्थिक आशावाद' हमेशा अस्मिता के साथ दाखिल हुआ है। गरीब-अमीर,काले - गोरे आदि का चित्रण हमेशा 'आर्थिक यूटोपिया' के साथ संगति बिठाते हुए आया। हिन्दी सिनेमा से लेकर हॉलीवुड सिनेमा तक 'सजनी अमीर साजन गरीब' का मुहावरा खूब बिका है। लेकिन ‘आर्थिक आशावाद’ का यह मुहावरा हमेशा असफल साबित हुआ है। 

1 टिप्पणी:

  1. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...