सोमवार, 12 जुलाई 2010

अमरीकीकरण की सेवा में डूबे हैं बाबा रामदेव-रविशंकर-मुरारीबापू

    अमेरिका की प्रशंसा में मगन रहने वालों के लिए रॉबर्ट पुटनाम की किताब '' बॉवलिंग एलोन: दि कॉलेप्स एंड रिवाइवल ऑफ अमेरिकन कम्युनिटी'' को जरूर पढ़ना चाहिए। इस किताब में रॉबर्ट ने लिखा है  अमेरिकी लोगों में सामाजिक बंधन खत्म होते जा रहे हैं। इसका अर्थ क्या है ? हम क्या करें ? यह सच है कि कोई व्यक्ति अकेले इस स्थिति में नहीं है। बल्कि समूचा समाज भोग रहा है। इस उबलते हुए समाज में जो भी कूद पड़ा है वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ उबल रहा है। अब लोगों को सगे-संबंधी नहीं मिल रहे हैं, इस अभाव को लोग स्वयंसेवी संस्थाओं की सदस्यता लेकर भरने की कोशिश कर रहे हैं।
     रॉबर्ट पुटनाम ने रेखांकित किया है कि प्रत्येक स्तर पर सामाजिक शिरकत में गिरावट आई है। बिखरते सामाजिक तानेबाने ने बड़ी भारी कीमत लगा दी है। इसके कारण अवसाद, हताशा आदि स्वास्थ्य समस्याओं ने घेर लिया है। हम ज्यादा से ज्यादा इस बात पर जोर देने लगे हैं कि हमें अपने पड़ोसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। नागरिक मसलों पर शिरकत घटी है,मतदान के प्रतिशत में गिरावट आई है,राष्ट्रपति चुनाव से लेकर स्थानीय चुनावों तक सभी स्तर पर मतदान में गिरावट का फिनोमिना देखा गया है। जिन देशों ने अमरीकीपथ का अनुसरण किया है वहां पर भी ये प्रवृत्तियां साफतौर पर देखी जा सकती हैं,सिर्फ उन देशों को छोड़कर जहां पर वोट देना कानूनन अनिवार्य है।जैसे बेल्जियम,डेनमार्क आदि।
      इसी तरह सार्वजनिक सभाओं में जाने वालों की तादाद में भी गिरावट दर्ज की गई है।इसके अलावा नगर या स्कूल की समस्याओं को लेकर होने वाली सभाओं में जाने वालों की संख्या में गिरावट आई है। सर्वे के परिणाम बताते हैं कि ज्यादातर लोग 'कभी-कभार ही ''वाशिंगटन प्रशासन'' पर भरोसा करते हैं। बल्कि पूरी तरह अविश्वास करने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। सन् 1966 में अमरीकी सरकार पर भरोसा करने वालों की संख्या 75 फीसद थी जो 1992 में 30 फीसद ही रह गयी।  राजनीति और सरकार के कामों में लोगों की शिरकत में तेजी से गिरावट आई है। जबकि व्यक्तिगत तौर पर शिक्षा का स्तर सुधरा है किंतु राजनीतिक शिरकत में गिरावट आई है। इसी तरह चर्च की गतिविधियों में अमेरिकनों की हिस्सेदारी में सन् 1966 की तुलना में छह गुना गिरावट आई है। इसी तरह मजदूर संगठन एक किस्म का हिस्सेदारी का अवसर देते थे,मंच थे। किंतु यूनियनों की सदस्यता में चौगुना गिरावट दर्ज की गई है। नागरिकों की हिस्सेदारी के मंच के रुप में अभिभावक संघ बड़ा मंच था। किंतु अभिभावक-शिक्षक मंचों में हिस्सेदारी घटी है। मसलन् 1964 में इस तरह के मंचों में 12 मिलियन लोगों ने शिरकत की थी, किंतु 1982 तक आते-आते यह संख्या घटकर मात्र पांच मिलियन रह गयी। इसी तरह अमरीकी समाज में सक्रिय विभिन्ना किस्म के संगठनों की सदस्यता को भी देख सकते हैं, उनमें हिस्सेदारी में ह्रास के लक्षण देखे गए हैं।
     सामाजिक संपदा नॉर्म बनाती है। इससे मानसिक ढ़ांचा ,व्यवहार,संस्कार और आदतें निर्मित होती हैं। सामाजिक संपदा के चरित्र की सही पहचान ही हमें सामाजिक बिखराव के खतरों के प्रति सतर्क कर सकती है।  सामाजिक बंधनों को बिखरने से बचाने के लिए जरुरी है कि हम बिखराव के कारणों का गंभीरता से मूल्य-व्यवस्था के रुप में विश्लेषण करें। हमें सामाजिक स्तर पर लगाव और बंधन के भाव को पुख्ता बनाना होगा। व्यक्तिवादिता और इंडिफरेंस को खत्म करना होगा। अन्य के प्रति समर्थन और सहयोग की भावना पैदा करनी होगी। 
    हमारे बीच ऐसे लोग हैं जो व्यक्तिवादी ढ़ंग से काम करते हैं, इनका नारा है '' अपने काम स्वयं करो।'' '' अपनी खुशियां स्वयं पैदा करो।'' '' अधिकारियों को चुनौती दो।'' '' यदि अच्छा लगे तो करो।'' ''वैधता को धता बताओ।'' '' दूसरों पर अपने मूल्य मत थोपो।'' '' अपने व्यक्तिगत अधिकारों के लिए लड़ो।'' ,'' अपनी प्राइवेसी की रक्षा करो।'' '' टैक्स में कटौती करो और कार्यकारी अधिकारी की तनख्वाह बढ़ाओ।'', '' व्यक्तिगत आमदनी को साझा वस्तु की तुलना में वरीयता दो।'' , ''अपने हृदय की आवाज सुनो।'' ,'' सामुदायिक धर्म की तुलना में एकाकी आध्यात्मिकता और धर्म का अनुसरण करो।'', '' स्वयं को आत्मनिर्भर बनाओ।'' ,'' दूसरों से उम्मीद करो और स्वयं पर विश्वास करो। स्वयं का निर्माण करो।''
   ये नारे व्यक्तिवादिता के गर्भ से पैदा हुए हैं और जिन्हें परवर्ती पूंजीवाद ने किसी न किसी रुप में हवा दी है। इन्हीं नारों के इर्दगिर्द मध्यवर्ग-उच्चवर्ग का अधिकांश सामाजिक विमर्श भी निर्मित होता रहा है। यही वे नारे हैं जिन्हें अमरीकीकरण के मंत्र के रुप में सारी दुनिया में प्रक्षेपित किया जा रहा है। लोगों को कहा जा रहा है कि वे इन नारों का पालन करेंगे तो समुदाय के बिना खुशहाल जिन्दगी बसर कर सकेंगे। इस तरह के सोच के शिकार लोग अपने को समुदाय का सदस्य मानने की बजाय समुदाय से ऊपर मानने लगते हैं। ये वे लोग हैं जो खुशहाल जिन्दगी जीना चाहते हैं बगैर अन्य को खुशहाल किए बिना। अन्य के संपर्क में आए बिना। इस तरह के लोगों के लिए ही बाबा रामदेव, श्रीरविशंकर,ओशो आदि जैसे कारपोरेट संतों के उपदेश आए दिन टीवी पर सुनने को मिलते हैं। सामाजिक विकास का यह व्यक्तिवादी रास्ता समाज को आगे की बजाय पीछे की ओर ले जाता है। यह ऐसा व्यक्तिवाद है जिसके लिए हम बाबा रामदेव,रविशंकर आदि को पैसा भी दे रहे हैं। इसी तरह परंपरागत संतों से लेकर कथावाचकों की भी भीड़ इसी रास्ते पर चल पड़ी है। परवर्ती पूंजीवाद ने विगत पचास सालों में जिस तरह की व्यक्तिवादिता को जन्म दिया है वह स्वभावत: पुंसवादी है। इसने पुंसवादी नैतिकता को वरीयता दी है। उसे सामाजिक एजेण्डा बनाया है। इसके ही आधार पर हम कामुक आनंद, अनियंत्रित कामुकता,अबाधित कामुकता आदि को महिमामंडित करते रहे हैं,साथ ही कामुक परवर्जन को भी वरीयता दी है। इसी के प्रभावस्वरुप व्यक्तिगत आकर्षण और युवा हमारे समाज में केन्द्रीय मूल्य बनकर सामने आए हैं। ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं का उपभोग भी आनंद का स्रोत हो गया है। आज का नया संचार आंदोलन भी व्यक्ति के इन्हीं अधिकारों और जिम्मेदारियों का महिमामंडन कर रहा है।

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