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शुक्रवार, 30 जून 2017

गुलाम संविधान को नहीं मानते


                नए दौर का सबसे खतरनाक पहलू है कि गुलाम विचारधारा में यकीन रखने वाले हमारे देश के उदारतावादी संविधान को नहीं मानते।वे संविधान प्रदत्त नैतिकता को ठुकराते हैं।एक जमाना था ब्रिटिश गुलामी से मुक्त होने के लिए देश में स्वाधीनता की आकांक्षा थी, गुलामी से मुक्त होने के लिए स्वाधीनता ,स्वतंत्रता और उदारतावाद को हमने गले लगाया, उससे जुड़े मूल्यों और नैतिकता को अपना कंठहार बनाया।लेकिन आपातकाल के बाद पैदा हुए युवावर्ग में देश के लिबरल संविधान के प्रति, उससे जुड़ी नैतिकताओं के प्रति नफरत पैदा हुई ,इस नफरत की जड़ में है धर्म और जाति आधारित गुलाम विचारधाराएं।

आपातकाल के बाद पैदा हुए समाज में युवा का आतंक है, आक्रामकता है,राजनीति में जिसका चमकता हुआ चेहरा नजर आ रहा है,यह वह युवा है जिसके पास किसी भी किस्म के लोकतांत्रिक मूल्यों और हकों के लिए संघर्ष करने का कोई अनुभव नहीं है। इसे सारी लिबरल मान्यताएं बिना संघर्ष के मिली हैं।यह युवा अपने निहित स्वार्थों में इस कदर डूबा है कि उसे लोकतांत्रिक मनुष्य, लोकतांत्रिक समाज और लोकतंत्र के निर्धारक मूल्यों और नैतिकता से ऩफरत है।वह अपनी जाति और अपने धर्म की श्रेष्ठता और उनकी सर्वोपरि भूमिका के नशे में डूबा है।हर चीज को जाति और धर्म के पैमाने पर कसकर देख रहा है।यहां तक कि संविधान को भी जाति और धर्म के पैमाने पर परखकर देख रहा है।कायदे से जाति और धर्म की श्रेष्ठता पर उसे शर्म आनी चाहिए,लेकिन जाति और धार्मिक पहचान के रूप उसे इस कदर पसंद हैं कि उनके अलावा वह कोई चीज सुनने को तैयार नहीं है। यह वह युवा है जिसे बिना कोई संघर्ष किए सभी लोकतांत्रिक हक मिले हैं,लेकिन वह लोकतांत्रिक हकों, लिबरल संविधानजनित मूल्यों और नैतिकता को ठेंगे पर रखता है।हर चीज को जाति और धर्म की भीड़चेतना के आधार पर तय करना चाहता है।फलतः लोकतंत्र को इसने भीड़तंत्र में तब्दील कर दिया है।आप जरा टीवी इमेजों में जाति और धर्म के नाम पर उठे आंदोलनों को देखिए और उनमें शिरकत करने वालों की उम्र देखिए तो पाएंगे कि इनमें अधिकांश युवा हैं।

राममंदिर आंदोलन,असम आंदोलन,आरक्षण विरोधी आंदोलन आदि से यह युवा अपनी नई अ-लोकतांत्रिक पहचान के साथ समाज में दाखिल होता है। उल्लेखनीय है इन आंदोलनों में आरएसएस की केन्द्रीय भूमिका थी। समग्रता में इन सभी आंदोलनों के जरिए एक ही संदेश गया है ´हम संविधान को नहीं मानते´ ,´संविधान प्रदत्त मूल्यों और नैतिकता को नहीं मानते।´इन आंदोलनों में शामिल युवाओं को संविधानप्रदत्त हकों का लाभ मिला लेकिन इन लोगों ने संविधान प्रदत्त मूल्यों और नैतिकताओं को मानने से इंकार किया। वे अपने को विभिन्न नामों से संबोधित करने में रुचि रखते हैं लेकिन ´लोकतांत्रिक´ या ´नागरिक´ कहलाने में इनकी कोई रुचि नहीं है,मसलन्, वे कहते हैं ´हम भारतीय हैं´,´हम भारतीय मुसलमान हैं´,´हम हिंदू हैं´,´हम ईसाई हैं´,´हम दलित हैं´,आदि, लेकिन वे अपने को लोकतांत्रिक या नागरिक कहने से परहेज करते हैं।लोकतंत्र में रहना, लोकतांत्रिक उदार संविधान के हकों का उपभोग करना और लोकतांत्रिक पहचान के ´नागरिक´ रूप में अपने को न देखना,यह सबसे बड़ी कमी है।इस कमी को हमारा देश जिस दिन पूरा कर लेगा उस दिन वह संविधान का सम्मान करना सीख जाएगा।

नागरिक की पहचान हमें गुलाम पहचान के रूपों से मुक्त करती है, एक बड़ा परिवेश देती है,नए लोकतांत्रिक असंख्य विकल्पों को जन्म देती है। लोकतांत्रिक आत्म-सम्मान पैदा करती है। आयरनी यह है हम नागरिक के गौरव में जीने की बजाय जाति और धर्मगत पहचान के आत्म-सम्मान में जीना पसंद करते हैं।इससे समाज में लोकतंत्र कमजोर हुआ है और उससे फासिज्म को मदद मिली है।आज जो युवा मोदी-मोदी का नारा लगा रहा है,यह वही युवा है जिसके अंदर जाति और धर्म की गुलाम पहचान कूट-कूटकर भरी हुई है।वह गुलामी में मस्त है और निरंकुश की तरह व्यवहार कर रहा है।



बिना इज्जत के लोग


          आधुनिक युग की पहचान यह है कि मनुष्य की कोई इज्जत नहीं रहती।वह अपनी आँखों के सामने ही अपनी इज्जत खोता है।आमतौर पर आधुनिककाल में त्रासदी के सभी नायकों के साथ यह हुआ है। आधुनिक युग का महानायक है किसान और व्यक्ति के रूप में, एक वर्ग के रूप में उसकी इज्जत इस युग में जिस तरह नष्ट हुई है,उस पर जितने लांछन और आरोप लगे हैं,उसकी निजी और सामाजिक तौर पर जितनी क्षति हुई है वह अकल्पनीय है। यही हाल मजदूरों का है।यह एक तरह से मनुष्यता के पीड़ा का युग है।शिक्षित लोग लगातार जिस तरह का आचरण कर रहे हैं वह अपने आपमें शिक्षा और शिक्षित दोनों को शर्मसार करने के लिए काफी है। पहले कहा गया कि शिक्षा व्यक्ति को मनुष्य बनाती है, बेहतर मनुष्य बनाती है लेकिन व्यवहार में यह देखा गया कि शिक्षितवर्ग के लोग बड़ी संख्या में बर्बरता कर रहे हैं,मसलन्, दहेज हत्या और हत्या के आंकड़े उठाकर देखें तो पाएंगे दहेज के नाम पर लड़कियों की हत्या और उत्पीड़न में शिक्षितों की केन्द्रीय भूमिका है।दहेज हत्या की अधिकतर घटनाएं शिक्षितों में घटी हैं। इनकी तुलना में अशिक्षितों और गरीबों में यह समस्या नहीं के बराबर है।असल में विवाह करने वालों के बीच संपत्ति जितनी होगी,बर्बरता और उत्पीड़न की मात्रा भी उतनी ही ज्यादा होगी।यही हाल अपराध के बाकी क्षेत्रों का है वहां भी शिक्षित अपराधियों की भरमार है।

यही स्थिति मध्यवर्ग के दूसरे पेशेवर तबकों की है उनमें भ्रष्टाचार इनदिनों चरम पर है,कायदे से शिक्षित को ईमानदार भी होना चाहिए। लेकिन मुसीबत यह है कि हमारी शिक्षा ईमानदार नहीं बनाती, दुनियादार बनाती है।व्यवहारवादी बनाती है। इसके कारण शिक्षितों का एक बड़ा वर्ग पैदा हुआ है जो अपने पेशेवर दायित्वों के प्रति गैर जिम्मेदार है।मसलन्, भ्रष्ट अफसरों के आंकड़े देखेंगे तो आंखें फटी रह जाएंगी,सबसे बेहतरीन नौकरशाह आईएएस-आईपीएस माने जाते हैं लेकिन हालात यह हैं कि इनमें भ्रष्टाचार और घूसखोरी चरम पर है ईमानदार अफसरों की संख्या दिनोंदिन घट रही है। एक जमाना था वे सबसे ईमानदार अफसरों में गिने जाते थे आज स्थिति यह है कि वे सबसे बेईमान हैं।

उल्लेखनीय है भ्रष्ट आईएएस-आईपीएस अफसरों की संख्या तेजी से बढ़ी है।ईमानदार अफसर गिनती के रह गए हैं।दिलचस्प बात है जो ईमानदार है वह ईमानदारी के कारण पीड़ित है,सरकार उसके प्रति निर्दयता से पेश आती है,उसे स्थिर होकर काम ही नहीं करने देती।मैंने कुछ दिन पहले अपने एक आईपीएस मित्र से पूछा कि इतने दिनों से नौकरी कर रहे हो क्या कमा लिया,कितना नगद बैंकों में जमा है तो बोला ज्यादा नहीं मात्र 170 करोड़ रूपये कमा पाया हूं।मैं मन ही मन सोच रहा था कि प्रोफेसर के नाते उससे पगार मेरी ज्यादा रही है ,मैं बमुश्किल कुछ लाख रूपये बैंक में अब तक जमा कर पाया हूँ और इस बंदे ने इसी दौरान 170 करोड़ कमा लिए।यही हाल और भी बहुत से अमीर दोस्तों का है,सबके सब शिक्षित हैं,बातें ऐसी करेंगे कि आपको निरूत्तर कर दें।लेकिन भ्रष्टाचार के मामले में वे इस कदर अव्वल हैं कि लगता ही नहीं है उन पर शिक्षा का कोई असर हुआ है।मैं जब यह कहता हूं कि आधुनिक युग में मनुष्य की कोई इज्जत नहीं रही तो इस दरअसल व्यवस्था के संदर्भ में मनुष्य के भ्रष्ट रूपों को देखकर ही कह रहा हूं। आधुनिककाल के ऐसे क्षण की कल्पना करें ,जिसमें हम रह रहे हैं, इसमें कोई बड़ा जनांदोलन नहीं हो रहा,सभी दल निरर्थक होकर रह गए हैं।

इसके समानांतर देखें गुलाम विचारधारा, विजेता बन जाएगी।हिंदुत्व की विचारधारा जो आज विजेता नजर आ रही है उसकी जड़ें आधुनिक समाज के विघटन की प्रक्रिया में निहित हैं।हिंदुत्व की विचारधारा आधुनिककाल में मुक्ति की विचारधारा नहीं है।बल्कि यह गुलामी की विचारधारा है।सामान्य लोग तेजी से गुलाम विचारधारा की गोद में दौड़-दौड़कर जा रहे हैं।



उल्लेखनीय है पुरानी परंपरागत हिंदू विचारधारा हो या नई आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा हो उसका मानसिक-सामाजिक गुलामी से गहरा संबंध है, इस संबंध की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।यह दौर गुलामी की विचारधारा के उभार का है।अब संविधान की व्याख्याएं हिंदुत्व की संगति में की जा रही हैं,संविधान की वे बातें नहीं मानी जा रहीं जो संविधान निर्माताओं ने कही हैं बल्कि वे बातें मानने पर जोर है जो हिंदुत्व कह रहा है। संविधान और हिंदुत्व के बीच में सह-संबंध बनाने और संविधान की हिंदुत्व सम्मत नई व्याख्याओं पर मुख्य रुप से जोर दिया जा रहा है।यह नए खतरे की घंटी है।

रविवार, 25 सितंबर 2016

दिल्ली की बर्बरता का रहस्य

         दिल्ली ने बर्बरता के नए मानक बनाए हैं।दिल्ली में केन्द्र सरकार है,संसद है,सुप्रीम कोर्ट है, पुलिस है,सेना है,सबसे ज्यादा लेखक-बुद्धिजीवी है,राजनीतिक नेताओं का जमघट है।आईआईटी,एम्स,जामिया,डीयू जैसे संस्थान हैं। लेकिन दिल्ली में बर्बर समाज है।ऐसा बर्बर समाज जिसकी रोज दिल दहलाने वाली कहानियां मीडिया में आ रही हैं,आखिर दिल्ली इतनी बर्बर कैसे हो गयी,एक सभ्य शहर असभ्य और बर्बर शहर कैसे हो गया,इसके लक्षणों पर हम बहस क्यों नहीं करते,दिल्ली में बर्बरता के खिलाफ आम लोगों का गुस्सा कहां मर गया,वे कौन सी चीजें हैं जिनसे दिल्ली में बर्बर समाज बना है,वे कौन लोग हैं जो बर्बरता के संरक्षक हैं,क्या हो गया दिल्ली में सक्रिय राजनीतिकदलों और स्वयंसेवी संगठनों को.वे चुप क्यों हैं ?

दिल्ली के बर्बर समाज का प्रधान कारण है दिल्ली के लोगों और संगठनों का दिल्ली के अंदर न झांकना,दिल्ली से अलगाव,स्वयं से अलगाव, वे हमेशा दिल्ली के बाहर झांकते हैं,बाहर जो हो रहा है,उस पर प्रतिक्रिया देते हैं,वे मानकर चल रहे हैं कि दिल्ली में तो सब ठीक है,गड़बड़ी तो यूपी-बिहार-हरियाणा-पंजाब आदि में है,वे मानकर चल रहे हैं,दिल्ली के समाज के अंदर नहीं देश के अंदर झांकने की जरूरत है।

यह बाहर झांकने के बहाने दिल्ली के यथार्थ से आंखें चुराने की जो आदत है वही पहली बड़ी समस्या है।

दिल्ली के बाशिंदों खासकर बुद्धिजीवियों-लेखकों-राजनेताओं में राजधानी में रहने का थोथा अहंकार है,श्रेष्ठताबोध है,दूसरे से ऊँचा दिखने की उनमें थोथी होड़ है,इसने दिल्ली के यथार्थ से उनको पूरी तरह काट दिया है।

मसलन्,दिल्ली में पढ़ाने वाला हर हिन्दी का प्रोफेसर अपने को सरस्वती का पुत्र समझता है जबकि सच यह है कि वह एसएमएस खोलना तक ठीक से नहीं जानता।जहां बुद्धि का इस तरह का अहंकार हो,वहां यदि शिक्षितों का यथार्थ से अलगाव हो जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

दिल्ली के लोगों की खुशहाली,उनकी गाड़ी,शानो-शौकत,उनकी अदाएं सतह पर देखने में अच्छी लगती हैं लेकिन ये चीजें पूरे दिल्ली समाज को चिढ़ाती भी हैं।यह जिंदगी के नकलीपन का एक रूप है।

दिल्ली की जिन्दगी में नकलीपन की परतों को कायदे से खोला जाना चाहिए।नकलीपन की सबसे बड़ी परत है ग्राम्य बर्बरता का बचे रहना।यह गांवों को समाहित करके बसाया गया महानगर है।इस शहर में बाहर से लाखों लोग गांवों से आकर बस गए हैं।वे भी अपने साथ ग्राम्य बर्बरता के रूपों को लेकर आए हैं।हमने ग्राम्य बर्बरता को संस्कृति के लिए खतरे के रूप में देखा ही नहीं कभी उसके खिलाफ जंग नहीं लड़ी।बल्कि यों कहें दिल्ली ने ग्राम्य बर्बरता के साथ घोषित तौर पर सांस्कृतिक समझौता कर लिया। ग्राम्य बर्बरता असल में समूचे देश की समस्या है,लेकिन हमने कभी इसके खिलाफ कोई कार्ययोजना न तो संस्कृति में बनायी और न राजनीति में बनायी,उलटे गांवों के महिमामंडन का आड़ में ग्राम्य बर्बरता का महिमामंडन किया है। लोकसंस्कृति,लोकगीत,लोक संगीत की आड़ में उसे छिपाया है,उसके सवालों से आँखें चुरायी हैं।सवाल यह है ग्राम्य बर्बरता से क्या आज भी लड़ना चाहते हैं ?

दिल्ली के बर्बर समाज की धुरी है लंपटवर्ग।यह वह वर्ग है जिसने अपराध, असामाजिकता,ग्राम्य बर्बरता और आधुनिकता के मिश्रण से एक विलक्षण सामाजिक रसायन तैयार किया है,इस सामाजिक रसायन की निर्माण प्रक्रिया या उसके कारकों की विस्तार के साथ खुलकर चर्चा होनी चाहिए।

लंपटवर्ग की संस्कृति का समाज के विभिन्न सामाजिक समूहों पर प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है।यह नया उदीयमान वर्ग है इसका आपातकाल के बाद सारे देश में तेजी से विकास हुआ है।लंपटवर्ग में गांव से लेकर शहर तक के लोग शामिल हैं,इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।दंगों से लेकर दैनंदिन बर्बर हिंसाचार तक इस वर्ग की इमेजों को हम आए दिन मीडिया में देखते रहे हैं।लंपटवर्ग की ताकत बहुत बड़ी है।इसने धीरे धीरे नियोजित संगठित छोटे-छोटे गिरोहों की शक्ल में अपना विकास किया है।इस गिरोह का नैटवर्क केबल नैटवर्क वसूली से लेकर जाति पंचायतों तक फैला हुआ है।

सामान्य तौर पर हम लोग लंपटवर्ग की सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक शक्ति के सवालों पर बात करने से भागते रहे हैं।लेकिन सच्चाई यह है कि लंपटवर्ग आज सबसे शक्तिशाली है,भले ही वह सतह पर एकाकी नजर आता हो।लेकिन वह अकेला नहीं है,उसका अपना समाज है,उसके पास सामाजिक समर्थन है। इस लंपटवर्ग को वैचारिक खाद्य मासमीडिया और मासकल्चर के विभिन्न रूपों से मिलती रही है।

दिल्ली की महागनरीय संस्कृति के विकास के साथ लंपटवर्ग का समानान्तर विकास हुआ है । दिल्ली में लंपटवर्ग का पहला बर्बर हमला 1984 में सिख जनसंहार के समय देखने को मिला।यही वह लंपटवर्ग है जिसको हाल ही में हरियाणा के जाट आरक्षण आंदोलन में समूचे हरियाणा में लूटपाट करते देखा गया,हरियाणा,यूपी,आदि की विभिन्न जाति पंचायतों की हजारों की भीड़ में देखा गया। यही वह वर्ग है जो हठात् साम्प्रदायिक दंगे के समय हजारों की भीड़ में विभिन्न शहरों में हिंसा,आगजनी,लूटपाट करते देखा गया है।सवाल यह है लंपटवर्ग ,लंपट संस्कृति और लंपट समाज के आर्थिक स्रोत कौन से हैं और किस तरह की संस्कृति से वह संजीवनी प्राप्त करता है।



भारत में लोगों की आदत है हर चीज में जाति खोजने की।लेकिन लंपट समूह जातिरहित समूह है।लंपटों की कोई जाति नहीं होती।वे तो सिर्फ लंपट होते हैं।लंपट समूह ने एक नए किस्म की अ-लिखित आचार संहिता को जन्म दिया है।



दिल्ली की बर्बरता पर बातें करेंगे तो नेतागण तुरंत उसे गांव बनाम शहर,झोंपड पट्टी बनाम कालोनी,गरीब बनाम अमीर,निम्न जाति बनाम उच्चजाति आदि में बांट देंगे।लंपट समाज को इस तरह के वर्गीकरण में बांटकर नहीं देखा जाना चाहिए।लंपट समाज की पहली बड़ी विशेषता है संस्कृतिहीनता, प्रचलित सभी किस्म के सांस्कृतिक मूल्यों का अस्वीकार।

रविवार, 11 सितंबर 2016

भाषा सीखना और भाषा जीना एक-दूसरे से भिन्न है

           महादेवी वर्मा पर लिखते समय हमेशा यह संकट रहता है कहां से लिखूँ।उनके विभिन्न किस्म के विचार उद्वेलित करते हैं।इधर फेसबुक-ब्लॉगिंग-मोबाइल आदि ने हम सबके संप्रेषण का मूलाधार बदल दिया है।नए दौर की समस्याएं अनेक मायनों में नई हैं।मसलन्,लेखन को ही लें,हम इन दिनों इतना लिख रहे हैं,इतना पहले कभी नहीं लिखते थे।हर व्यक्ति के लेखन की क्षमता में,भाषायी कम्युनिकेशन में कई गुना इजाफा हुआ है। इस तरह का लेखन या कम्युनिकेशन पहले कभी नहीं देखा गया,मोबाइल से लेकर फेसबुक तक भाषा का इतना व्यापक और बड़ी मात्रा में प्रयोग मनुष्य ने पहले कभी नहीं किया।

सवाल उठता है इतनी बड़ी मात्रा में भाषायी कम्युनिकेशन अंततःहमें अलगाव में क्यों रखे हुए है ॽ ऐसी भाषा क्यों लिख रहे हैं जिसमें प्राण नहीं होते ॽ संवेदनात्मकता नहीं होती ॽ कहा गया था हम संप्रेषण करेंगे तो संवेदनशीलता बढ़ेगी ,लेकिन यथार्थ में उलटा नजर आ रहा है।दावा था संवेदनशीलता के आधिक्य का लेकिन घटित एकदम उलटा हो रहा है।

संभवतः महादेवी वर्मा पहली हिन्दी लेखिका हैं जिन्होंने पूंजीवादी समाज में सबसे पहले इस आने वाले संकट को पहचाना था और रेखांकित किया कि हमारी त्रासदी का कारण है संवेदनशीलता का अभाव और भाषा से संवेदनशीलता का गायब हो जाना।



हम ऐसी भाषा बोल,लिख,सुन रहे हैं जिसमें शब्द हैं,लेकिन प्राण नहीं हैं,संवेदनाएं नहीं हैं।हमने भाषा के सवालों पर विचार करते समय तेरी भाषा,मेरी भाषा,हिन्दी भाषा,राष्ट्रीय भाषा ,जातीय भाषा आदि पर विचार किया लेकिन भाषा के दार्शनिक और संवेदनात्मक आधार से जुड़े सवालों को तिलांजलि दे दी।भाषा को प्रयोजनमूलक बना दिया।हिन्दी को प्रयोजनमूलक हिन्दी बना दिया।इससे भाषा के प्रति हमारे गंभीर सरोकारों और विमर्श का अंत हो गया। महादेवी ने लिखा है ´भाषा सीखना और भाषा जीना एक-दूसरे से भिन्न हैं तो आश्चर्य की बात नहीं।प्रत्येक भाषा अपने ज्ञान और भाव की समृद्धि के कारण ग्रहण योग्य है,परन्तु अपनी समग्र बौद्धिक और रागात्मक सत्ता के साथ जीना अपनी सांस्कृतिक भाषा के संदर्भ में ही सत्य है।´

बुधवार, 27 जुलाई 2016

नरेन्द्र मोदी जब नामवरजी से मिले !

     यह सच है नरेन्द्र मोदी से नामवरजी मिल चुके हैं। एक-दूसरे को आंखों में तोल चुके हैं! इनकी ज्ञाननीठ पुरस्कार समारोह में मुलाकात हो चुकी है।यही वह मुलाकात थी जिसे नामवरजी को प्रगतिशील परंपरा से भिन्न आरएसएस की परंपरा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की! वे दोनों जब मिले तो विलक्षण दृश्य था एक तरफ जनप्रसिद्धि के नायक मोदी थे तो दूसरी ओर साहित्येच्छा के नायक नामवरजी थे।यह असल में ´जनप्रियता´ और ´इच्छा´का मिलन था।यह मिलन का सबसे निचला धरातल है। कलाहीन मोदी ,नामवरजी की प्रशंसा कर रहे थे !

कलाहीन नायक जब किसी लेखक की प्रशंसा करे तो कैसा लगेगा ॽ मोदीजी जब प्रशंसा कर रहे थे तो वे जानते थे कि नामवरजी भी साहित्य में वैसे ही ´जनप्रिय´हैं जैसे वे राजनीति में ´जनप्रिय´हैं,दोनों की ´जनप्रियता´की ऊँचाई बनाए रखने के लिए पेशेवर प्रचारक अहर्निश काम करते रहते हैं। इन दोनों का पेशेवर प्रचारकों के बिना कोई भविष्य नहीं है। दोनों को नियोजित और निर्मित प्रचार कला का हीरो माना जाता है। दोनों के पास अपने-अपने प्रशंसकों के समूह हैं।दोनों से लोग डरते हैं, महसूस करते हैं पता नहीं कब और कहां से पत्ता कटवा दें!

दोनों के चाटुकार प्रशंसक हैं!दोनों के पास कोई विशिष्ट किस्म की गतिविधि नहीं है।दोनों इसलिए ´महान्´ हैं क्योंकि सत्ता का अंग हैं!इनकी कोई राजनीतिक और साहित्यिक विशिष्टता नहीं है जिसकी वजह से ये दोनों जाने जाते हों! दोनों के पास प्रायोजित जनता है,स्वाभाविक जनता नहीं है।दोनों का प्लेटो के शब्दों में कहें तो ´प्रायोजित संसार´है।दोनों सत्ता की निर्मिति हैं,शासकवर्गों की निर्मिति हैं।दोनों यह जानते हैं कब क्या बोलना चाहिए और कब चुप रहना चाहिए।दोनों का साहित्यिक-राजनीतिक आस्वाद मौजूदा संसार से मेल नहीं खाता।दोनों अधूरे मनुष्य हैं,दोनों में गुलाम भाव है,दोनों कारपोरेट जगत के प्रशंसक हैं,दोनों सत्ता के औजार हैं,दोनों अहंकारी हैं,दोनों आस्था के आदी हैं।

दोनों ऊपर से देखने में ´भद्र´और अंदर से ´क्रूर´हैं।दोनों का मानना है ´विशिष्ट´व्यक्ति की ´क्रूरता´की नहीं ´भद्रता´की बातें करो।यही हाल इन दोनों के भक्तों का है,आज मैं यदि नामवरजी और मोदीजी की प्रशंसा करूँ तो ये लोग बड़े खुश होंगे,लेकिन यदि इनकी गलत चीजों की आलोचना करूँ तो मेरे ऊपर व्यक्तिगत हमले शुरू कर देंगे! दोनों में हजम कर जाने,आहत करने,कमजोर पर वर्चस्व जमाने,दबाकर रखने,शोषण करने की आदतें हैं।दोनों को समाज में वही घटना पसंद है जिसमें उनका संदर्भ रहे।

इसके अलावा नामवरजी की ´साहित्यिक अनैतिकता´ और मोदी की ´राजनीतिक अनैतिकता´में गहरा संबंध है।मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से को इस ´अनैतिकता´से कोई परेशानी नहीं है.वे इसको स्वाभाविक मानकर चल रहे हैं।इस ´अनैतिकता´ के गर्भ से समाज में साहित्य और राजनीति में ´अनैतिकता´का ही प्रसार होगा और यही मूल चिंता है जिसके कारण मैं इतना विस्तार में जाकर नामवरजी पर लिखने को मजबूर हुआ हूँ।


सोमवार, 4 जुलाई 2016

क्लोन नामवर और रीयल नामवर!



हिन्दी में इनदिनों नामवर सिंह का स्थान लेने की जंग चल रही है। लंबे समय से लोग कोशिश कर रहे हैं कि उनको साहित्य में वह स्थान मिले जो नामवर को मिला है। मुश्किल यह है कि वह जगह कोई ले नहीं सकता।लेकिन इस चक्कर में इलाके -दर -इलाके नामवरसिंह के क्लोनरूप में लोकल क्लोन नामवरों की बाढ़ आ गयी है। गुरूवर नामवरजी इन क्लोन नामवरों से बेहद परेशान हैं। लोक प्रचलन में क्लोन नामवरों के नाम देखें-टॉलीगंज के नामवर,जेएनयू के नामवर,बॉलीवुड के नामवर,सागरवाले नामवर,जोधपुरवाले नामवर,डीयू के नामवर आदि। मजेदार बात है इन सभी क्लोनरूपों को नामवर सिंह हंसकर विनोदी नामवर कहते हैं।


क्लोन नामवर ने गुरूवर नामवरजी से पूछा कि आप किसके लिए लिखते हैं ,बोले मैं अदृश्य पाठक के लिए लिखता हूँ,फिर पूछा आप किसके लिए बोलते हैं,कहा दृश्य जनता के लिए।
क्लोन नामवरों में से एक ने कहा हम तो छात्रों के लिए लिखते हैं,नामवरजी ने कहा कि यह लेखन नहीं गैसपेपर राईटिंग हुई। दूसरे क्लोन ने नामवरजी से कहा मैंतो सर, जब बोलता हूँ पाठ्यक्रम केन्द्रित होकर ही बोलता हूँ,नामवरजी ने कहा मूर्ख यह क्लास नोट्स तैयार कराने की स्कूल मास्टरी है।
तीसरा क्लोननामवर बोला हमने तो सारा जीवन इसी तरह पढ़ाया है ,इस पर नामवरजी बोले इसीलिए तो क्लोन हो, नामवर नहीं हो।

नामवर सिंह हमेशा हंसकर और अनौपचारिक ढ़ंग से बात करते हैं,बार बार व्यंग्य भी करते हैं। लेकिन क्लोननामवर हमेशा गंभीर रहते हैं। इस पर नामवरजी ने चुटकी ली और कहा कि बुरा हो परवर्ती पूंजीवाद का जिसने क्लोन सभ्यता को जन्मदिया है,मैंने कहा इसमें बुरा क्या है क्लोननामवर तो ज्ञान गंभीर हैं,नामवरजी ने कहा ये ज्ञानराक्षस हैं.

नामवर सिंह और क्लोन नामवरों की 4साल पहले एकबार दिल्ली में मुलाकात हुई ,क्लोन नामवरों के कहा हम आप पर कुछ करना चाहते हैं। नामवरजी बोले आपलोग मेरे ऊपर कुछ न करें तो अच्छा है।
संयोग से ये बंदा भी वहां था, मैंने कहा ये लोग कुछ करना चाहते हैं तो कुछ करने दीजिए,बोले ,मैं इन क्लोनों के नकलीपन से आजि़ज़ आ चुका हूँ। तपाक से उनमें से एक क्लोन बोला मैं तो आपके आशीर्वाद से ही पैरों पर खड़ा हूँ। नामवरजी ने कहा नहीं भाई ,आप अपने दम पर पैरों पर खड़े हैं। दूसरा क्लोन बोला हम ही तो दूसरी परंपरा बनाते हैं। नामवरजी ने कहा अरे भाई, दूसरी परंपरा क्लोन परंपरा नहीं है। इसके बाद सब ठहाकर मारकर हंस पड़े।

नामवरसिंह और क्लोन नामवरों के बीच कलकत्ते में एकबार मुलाकात हुई थी,संभवतःराहुल सांकृत्यायन शताब्दी समारोह का मौका था। भारतीय भाषा परिषद में लोग टिके थे ,उनका ही कार्यक्रम था। वहां पर क्लोन नामवर भी मौजूद थे। मैंने मजाक में कहा आपका जैसा बनने की बड़ी इच्छा है इन क्लोन नामवरों में। वे बोले-मेरी जैसी मेधा कहां से लाएंगे ?मैं मुस्करा रहा था,लेकिन पटनावाले क्लोननामवर झेल नहीं पाए, बोले हमने आपसे कम काम नहीं किया है। गुरूवर बोले क्लोन अहर्निश काम करते हैं। वे आदमी थोड़े ही हैं।भीष्मसाहनी ठहाकर मारकर हंसे ।



क्लोन नामवरों की अनुभूतियां देखें- टालीगंज नामवर कहते हैं गोष्ठी में जाएंगे तो अध्यक्षता कराओगे तब ही जाएंगे, एक भक्त ने पूछा ऐसा क्यों तो बोले देखते नहीं हो नामवरजी को वो कहीं जाते हैं बिना अध्यक्षता के ?
डीयू नामवर के नक्शे ही कुछ और हैं जमीन पर पैर नहीं पड़ते ,उनके एक भक्त ने पूछा, सर, आपके जमीन पर पैर क्यों पड़ रहे ? बोले देखो ,नामवरजी को देखो, उनसे सीखो, हमने तो उनसे ही सीखा है।दिल्ली के पंडारा रोड वाले नामवर तो सब समय नामवरमय ही रहते हैं,हर बात के बीच में कोई न कोई नामवर स्मृति कहजाते हैं।
भोपालवाले नामवर मिले थे मैंने पूछा कैसे हैं बोले मैं नामवरजी की तरह ही ठीकठाक हूँ।
हे भगवान यह क्या हो रहा है !!

शुक्रवार, 2 मई 2014

उत्तर आधुनिकता का पुनर्पाठ


फ़्रेडरिक जेम्सन ने कहा 'उत्तर आधुनिकता परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क है।' यानी यह न बुरा है और न अच्छा है बल्कि यह तो एक अवस्था है जिसमें सबको रहना है और इसे लेकर सबको राय ज़ाहिर करनी है ।
भारत और यूरोप में उत्तर आधुनिक परिस्थितियों में बुनियादी अंतर है । यूरोप में उत्तर आधुनिकता आई है सत्तर के बाद के वर्षों में वहाँ पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के निर्माण की प्रक्रिया शिखर पर थी जापान के निर्माण का काम ख़त्म हो चुका था । पूँजीवादी विकास शिखर पर था । मुद्रा स्थिर थी ।बाज़ार सामानों से भरे पड़े थे। अमेरिका वियतनाम में करारी हार के कगार पर था । अमेरिकी समाज में ज़बर्दस्त आंदोलन थे । महँगाई थी। विकास एक जगह जाकर ठहर गया था । क़र्ज़ बढ़ रहे थे । डेविडहर्वे के शब्दों में कहें तो पूँजी को डी रेगुलेट किया गया , सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का निजीकरण किया गया। मुद्रा का अवमूल्यन हुआ। मज़दूरों के हकों पर हमले बढे।
इसके विपरीत भारत की स्थिति थी। यहाँ पर बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। पाक से १९७१ में हम युद्ध जीते । शानदार रेल हड़ताल हुई। बड़े पैमाने पर १९७४-७५ में आंदोलन हुए। आपातकाल आया।इंदिरा हारी । इंदिरा की वापसी हुई । लेकिन १९९०-९१ तक आते आते देश गहरे संकट में फँस गया और मनमोहन अर्थशास्त्र का जन्म हुआ। बेकारी और महँगाई के साथ सरकारी ख़ज़ाने में बहुत कम मुद्रा थी।
आपातकाल में उपग्रह छोड़ा गया । राजीवयुग में कम्प्यूटर क्रांति हुई । टीवी का विकास हुआ। सन् १९८० के बाद धीरे धीरे कुछ ऐसा घटा जिसको देखकर लगता था कि लोग इतिहास से बदला लेने पर आमादा हैं । मसलन् ओबीसी आरक्षण, राममंदिर आंदोलन, असम और पंजाब के आंदोलन आदि की एक ही धुन थी कि इतिहास में जो ग़लतियाँ की गयी हैं उनको दुरुस्त करना है । दलितसाहित्य और स्त्री साहित्य में भी इसे लेकर बग़ावत दिखाई दी। वे भी साहित्य में इतिहास के ख़िलाफ़ थे। इतिहास को नहीं मानते थे।
पहले रेगुलेशन पर ज़ोर था ,अब डी रेगुलेशन पर ज़ोर था । पहले लाइसेंस राज था अब लाइसेंस राज का खात्मा कर दिया गया। हर क्षेत्र में डीरेगूलेशन को लागू किया गया ।काम के घंटे बढ़ा दिए गए। पूरे सिस्टम का कम्प्यूटरीकरण आरंभ हुआ । प्रिंटयुग से कम्प्यूटर युग में आ गए। बाज़ार से माॅल के दौर में आ गए। महिलाओं ,अल्पसंख्यकों , किसानों ,मज़दूरों और आदिवासियों पर हमले तेज़ हुए। जातीय घृणा में इज़ाफ़ा हुआ। कल्याणकारी राज्य का चरित्र बदलने का प्रयास किया गया।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कारोबार अंधाधुँध गति से बढ़ा। विश्व व्यापार संगठन के ढाँचे और नियमों से हमने अपने को बाँध लिया और देश में सभी क्षेत्रों में डीरेगूलेशन या विनिमयन को लागू कर दिया। सार्वजनिक संपदा और संसाधनों की खुली लूट हुई और उसे औने-पौने दामों पर निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया । एक तरह से सार्वजनिक संपदा और कृषिभूमि के ख़िलाफ़ कारपोरेट युद्ध की घोषणा थी।
समूचे देश में नव-धनाढ्यों की आँधी आ गयी। देखते ही देखते हर शहर में करोड़पति पैदा हो गए । मध्यवर्ग के लोग करोड़पति हो गए। यह नए क़िस्म के फ्लेगजिबिल , फ़्री फ्लोटिंक और सामंजस्यवादी नए क़िस्म के यथार्थ का आगमन था।
मसलन पहले कार वाला अमीर था और अमीर से हम नफरत करते थे ,लेकिन नई वास्तविकता यह है कि हर मध्यवर्गीय व्यक्ति के पास कार है और कार अब अमीरी का प्रतीक नहीं रह गयी है। कलर टीवी अमीरों की चीज़ थी लेकिन अब नहीं है। फ़ोन बड़े लोगों के यहाँ हुआ करता था ,आज सबके हाथ में है।
हर स्तर पर सर्जनात्मक क्रांति हुई है। विज्ञापन से लेकर पुस्तक प्रकाशन तक सर्जनात्मक सौंदर्य की वर्षा हो रही है। नए क़िस्म की ग्लोबल अस्मिता ने पैर फैला दिए हैं। पहले पूँजी का सौंदर्य पर प्रभाव सीमित क्षेत्र तक था । लेकिन नई स्थितियों में पूँजी के वैभव ने आम जीवन पर असर डालना आरंभ कर दिया है । सब्सीडी पर हमले हो रहे हैं।
ग्लोबल स्तर पर चीन का पूँजीवादी बाज़ार के रुप में उदय बहुत बड़ी परिघटना है । इसने बहस के समूचे आधार को ही बदल दिया है । मज़ेदार बात यह है कि हमारा हिंदी का लेखक अभी भी नक्सलबाडी आंदोलन में फँसा है या शीतयुद्ध के मानकों में उलझा पड़ा है।
नए युग की ख़ूबी है तकनीक हमारे संचार ,राजनीति, संस्कृति आदि का निर्धारण कर रही है। समाजवाद का विघटन और कम्युनिस्ट पार्टियों के जनाधार में ज़बर्दस्त गिरावट ने मेहनतकश जनता को असहाय अवस्था में छोड़ दिया है।
महाख्यान का अंत हुआ है। बाज़ार में भयानक प्रतिस्पर्धा जन्म ले चुकी है और इससे राजनीति भी प्रभावित हुई है । अमेरिकी वर्चस्व में गिरावट आई है। चीन का महाशक्ति के रुप में उदय हुआ है । नई परिस्थितियों में राज्य के पास पूँजी निवेश को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं रहा। राज्य जब निवेश को नियंत्रित नहीं कर सकता तो वह सूचना को भी नियंत्रित नहीं कर सकता ।
किसी एक नरेटिव पर लोगों की नज़र नहीं टिकी है बल्कि लोग अलग अलग क़िस्म के नरेटिव में ध्यान लगाए हैं । यही महाख्यान के अंत का अर्थ है ।
नव्य आर्थिक उदारीकरण के दौर में व्यक्ति के निजी हितों को तरजीह दी गयी। सामाजिक हित के सवालों को पीछे छोड़ दिया गया।
फ़्रेडरिक जेम्सन ने उत्तर आधुनिकता को परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क कहा । लेकिन इसे नव्य आर्थिक उदारीतरण की विचारधारा भी कह सकते हैं। यह कोई आकाश से टपकी धारणा नहीं है बल्कि ऐतिहासिक तौर पर विकसित हुई अवधारणा है ।
बाज़ार से लेकर व्यक्ति तक मेकओवर का ग्लोबल रुप देखने में आ रहा है । इस पर सोचने की ज़रुरत है।
हिंदी में " उत्तर आधुनिकतावाद "नाम सुनकर ही समीक्षक भड़क जाते हैं । मैं तो स्वयं यह ग़ुस्सा अनेकबार देख चुका हूँ। नाम सुनकर राय बनाना और फिर उलटी सीधी राय बनाना यह हिंदी में आम बात है और दुर्भाग्यजनक बात यह है कि यह काम समीक्षकों ने किया है।
समस्या नामकरण की नहीं है समस्या बदले हुए यथार्थ को समझने और उसकी सही समझ बनाने से जुड़ी है। हिंदी समीक्षा अभी शैशव काल में है। यहाँ किसी भी अवधारणा पर कोई गंभीर लेखन नहीं हो रहा । ठोस धारणाओं के निर्माण और विमर्श का काम नहीं हो रहा। जो काम हुआ है वह हमें अवधारणाओं की सही समझ नहीं देता।
मसलन हमने आलोचना में आधुनिकतावाद , रैनेसां, औद्योगिकीकरण , प्रगतिशील साहित्य ,लोकतंत्र, भारत विभाजन ,भूमंडलीकरण आदि को लेकर कोई गंभीर अवधारणात्मक विवेचन का काम नहीं किया है । हमारे यहाँ तात्कालिक या सांगठनिक या मित्रतावश या उत्सवधर्मी आलोचना है इसमें वस्तुगतता का भयानक अभाव है।
साहित्य समीक्षा के अनेक मार्ग हैं । किसी को रैनेसां का मार्ग पसंद है ।किसी को भक्ति आंदोलन का मार्ग पसंद है ।किसी को १९१७ की अक्टूबर क्रांति से प्रभावित मार्ग पसंद है।किसी को प्रतिवाद का नक्सलबाडी मार्ग पसंद है ।कोई आधुनिकता तो कोई दलितसाहित्य या स्त्री साहित्य के मार्ग से गुज़रना चाहता है। किसी को विवेकवादी परंपरा का मार्ग पसंद है किसी को राष्ट्रवादी परंपरा का मार्ग पसंद है।
यानी साहित्य समीक्षा में हम एक नहीं अनेक मार्गों से यात्रा करते हैं । कोई अस्मिता के मार्ग से समीक्षा की यात्रा कर रहा है तो कोई समुदाय या वर्ग के मार्ग से साहित्य समीक्षा के मार्ग पर चल पडा है । इन सभी मार्गों में अंतर्क्रियाएं हैं जिनकी हमें अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
साहित्य की आलोचना के जिस मार्ग से भी यात्रा करें सवाल यह है कि जाना कहाँ है ? किस तरह के साहित्य के ज़रिए जाना चाहते हैं और अंततः क्या करना चाहते हैं ?
साहित्य समीक्षा में रमण करते समय अंतर्क्रियाएं और प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं । यदि अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की उपेक्षा करेंगे तो यह संभव है कि समीक्षा अविवेकवाद के टीले पर खड़ी मिली ।
मसलन दलित साहित्य या स्त्री साहित्य पर बातें करते समय अन्य साहित्य रुपों और विचारधाराओं के साथ चल रही अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की अनदेखी न करें। वरना स्त्रीसाहित्य के नाम पर समीक्षा में अविवेकवाद पैदा होगा और इससे स्त्रीसाहित्य का स्वाभाविक विकास और साहित्यबोध बाधित होगा । इससे साहित्यिक अधिनायकवाद पैदा होगा ।
उत्तर आधुनिक नज़रिए से देखें तो पाएँगे कि हम सब असंपूर्ण साहित्य परंपरा में जी रहे हैं। किसी मार्ग विशेष के ज़रिए साहित्य का समग्र नज़रिया बनाना कठिन हो गया है ।
साहित्य में दृष्टियों की अंतर्क्रियाओं को हमें सिद्धांतत: मानना पड़ेगा और अंतर्विषयवर्ती पद्धति से काम लेना होगा।प्रधान और गौण के वर्गीकरण के बाहर निकलकर बहुलतावादी नज़रिए से देखना पड़ेगा ।

उत्तर आधुनिक अवस्था और समाज को जानने के लिए नई संवेदना और नई चेतना की ज़रुरत है। यह ऐसा समाज है जिसमें लोग तमाशा देखते हैं ,हस्तक्षेप नहीं करते।अराजक राजनीतिक आंदोलन पैदा हो जाते हैं ।
समूचे समाज में पूँजीवाद का बोलबाला है। साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ जन्म लिया है। आधुनिकतावादी रुपों के प्रति असंतोष व्यापक तौर पर व्यक्त हो रहा है। रुढिबद्धता, बोरियत और नक़ली आशाओं का संचार में वर्चस्व है। स्थानीय स्तर पर पश्चिमी संस्कृति के प्रति ग़ुस्सा कम और प्रेम ज़्यादा है। मीडिया से लेकर स्थापत्य तक और संस्कृति से लेकर प्रफाॅर्मिंग आर्ट तक बड़े मूलगामी परिवर्तन हुए हैं।

लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संरचनाओं के विकास के साथ तीव्रगामी भूमंडलीय कम्युनिकेशन नेटवर्क का विकास हुआ है ।
आधुनिककाल आने के साथ जो कलारुप विकसित होते हैं वे पुराने कलारुपों को रुपान्तरण के लिए मजबूर करते हैं। कम्युनिकेशन की तकनीक की संगति में भाषा ,कला और साहित्य रुपों का तेज़ी से विकास होता है । सामान्यतौर पर हमने कम्युनिकेशन तकनीक एवं कलाओं के अंतस्संबंध की अनदेखी की है। लेकिन उत्तर आधुनिक अवस्था हमें साहित्य और कम्युनिकेशन तकनीक के अंतस्संबंध पर विचार के लिए मजबूर करती है।
रेल,दूरसंचार ,प्रेस , रेडियो और फ़िल्म के आने के साथ कला एवं साहित्यरुपों में किस तरह के बदलाव आए हमने कभी गंभीरता से उनका विश्लेषण नहीं किया ।
कम्युनिकेशन तकनीक के नए रुपों ने कला और साहित्य में स्टाइल या शैलियों की बाढ़ पैदा की है । स्टाइल में जितने प्रयोग इस दौर में हुए हैं उतने पहले कभी नहीं हुए।
आधुनिककाल में नए प्रयोगों की आधार स्थली है उपन्यास विधा। कम्युनिकेशन तकनीक और आम संचार के रिश्ते में बुनियादी बदलाव आया है ।
आधुनिकता के साथ आमलोगों में "औचक "भाव से चीज़ों को देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
हर क्षेत्र में "नए" की माँग बढ़ी है । "नए" के पदबंध का हर क्षेत्र में उपयोग बढ़ा है ।
ल्योतार के अनुसार उत्तर आधुनिकतावाद का मतलब यथार्थवाद का अंत नहीं है। बल्कि इसका मतलब है कि लेखक को समुदाय के रुप में देखें और समुदाय के रुप में स्वीकृति प्रदान की जाय अथवा उसे बीमार मानकर उसका उपचार किया जाय। हमारे बीच ऐसे अनेक लेखक हैं जिनके पास आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की कोई विरासत नहीं बची है। इसके कारण वे आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की परंपरा या दायरों का अतिक्रमण गए हैं। लेखक के वैचारिक अतिक्रमण को कभी गंभीरता से विश्लेषित नहीं किया गया। इसके कारण न तो कभी लेखक की मदद कर पाए और नहीं समझ ही पाए ,उलटे उसके प्रति संदेह बढ़ा । उस पर हमले किए।
विगत चालीस सालों में यथार्थ के नाम पर जो बहसें चलीं उससे सामयिक यथार्थ को समझने में मदद कम मिली। दूसरी ओर बुर्जुआजी की इतिहास में प्रतिष्ठा बढ़ती चली गयी ।यथार्थवाद के बहाने या यथार्थ रुपान्तरण के बहाने सिस्टम के जो चित्र पेश किए गए उनसे यथार्थ कम और कृत्रिम यथार्थ ज़्यादा सामने आया ।
नए तकनीकी जगत ने इतिहास के हरक्षण को मूल्यवान बना दिया है। एक फ़ोटो के हज़ार फ़ोटो ,हर क्षण के फ़ोटो ,आदि की प्रक्रिया ने इतिहास में हर अनुभव और संवेदना को सुरक्षित करने और दर्ज करने की संभावनाएँ पैदा की हैं। अब भाषा के हर रुप और सभी क़िस्म के वाक्यों के संरक्षण की संभावनाएं पैदा हो गयी हैं। इस क्रम में कम्युनिकेशन की नयी संहिता या कोड भी पैदा हुआ है । आप यदि इस कोड को खोलना जानते हैं तो यथार्थ समझ पाएँगे।
इधर के दौर में "यथार्थ" और "अस्मिता"पर केन्द्रित ख़ूब लिखा गया है । लेकिन यह युग इनके लिए पाठकों या दर्शकों की गारंटी नहीं देता । अब साहित्य में " सौंदर्य क्या है ? पर बात नहीं हो रही बल्कि "कला में क्या कहा जा रहा है " इस पर बातें हो रही हैं। फलतः यथार्थ के सवालों की जमकर उपेक्षा हो रही है और अकादमिक माँग-पूर्ति या उपयोगितावादी या नारेबाज़ी का साहित्य ख़ूब लिखा जा रहा है ।
आम जनता में समस्याओं को लेकर बेचैनी है लेकिन वह रेडीमेड समाधान चाहती है। जनता के अनुभवों में अवसाद ने बड़ी जगह घेर ली है। जनता चाहती है कि सरल ढंग से कहा जाए।इस बीच में जनता की जीवनशैली बदली है और उपभोग की डिक्टेटरशिप ने हमारे जीवन में आधिपत्य स्थापित कर लिया है । मनोरंजन की धारणा बदली है और "ख़ाली समय " की धारणा लोकप्रिय हुई है । "यथार्थ की नब्ज़" से लेखक की पकड़ से छूट गयी है जिसे वह संकीर्ण क़िस्म के ऐतिहासिक विवरण और ब्यौरों के ज़रिए भर रहा है । इसका परिणाम यह निकला है कि वह जो लिख रहा है उसमें सामयिक यथार्थ की कहीं से गंध नहीं मिलती फलत: उसका पाठक और समाज से अलगाव भी बढ़ा है । यह नीत्शे के शब्दों में एक तरह का निहिलिज्म है।
उत्तर आधुनिक दशा हो या आधुनिकता हो वहाँ पर दर्द और आनंद का द्वंद्वात्मक संबंध और अंतर्क्रियाएं साफ़ नज़र आती हैं। आनंद के जितने भी विषय हैं वे व्यक्ति के निजीदर्द से ही पैदा हुए हैं।
उत्तर आधुनिक लेखन में ऐसा बहुत सा लेखन आ रहा है जिसमें समीक्षकों के अनुसार सौंदर्य नहीं है। ऐसा भी लेखन आ रहा है जो "रुपरहित रुप" से गढ़ा हुआ है।
नया फिनोमिना है रुपरहित ,संवेदनारहित प्रस्तुतियों पर ज़ोर और वर्तमान के प्रति अंधप्रेम।
उत्तर आधुनिक अवस्था के कारण लेखक नियमरहित लेखन पर ज़ोर दे रहे हैं। यह वह दौर है जब चीज़ें घट जाने के बाद नियम बनते हैं। हमने क्या किया उसके बाद नियम बनते हैं ।
लेखन में शब्द इवेंट की तरह आ रहे हैं ।ये वे इवेंट हैं जो लेखक के ज़ेहन में बहुत देर से आए हैं। या यों कहें जिनको बहुत देर से साहित्य में व्यंजित होने का मौक़ा मिला है ।
उत्तर आधुनिक लेखन हमेशा बिडम्बनाओं के गर्भ से ख़ासकर भविष्य की बिडम्बनाओं के गर्भ से पैदा होता है ।
ल्योतार का मानना है हमारा काम यथार्थ सप्लाई करना नहीं है। बल्कि ऐसी कल्पनाओं की सृष्टि करना है जो पहले कभी लेखक के मन में नहीं आईं। या कभी पेश नहीं की गयीं । इस प्रसंग में हम दलित और स्त्री साहित्य देख सकते हैं।
उत्तर आधुनिक भाषाखेल को समझें ,इस खेल की ख़ूबी है कि यह रुपान्तरणकारी है। नया नारा है "सीमाएँ तोड़ो अंतराल भरो", लोग विभिन्न रुपों में सीमाएँ तोड़ रहे हैं । यह नारा आलोचना से लेकर विधा तक सबकी सीमाएँ तोड़ी जा रही हैं। साहित्य और सामाजिक यथार्थ के जटिल संबंधों की ओर ध्यान गया है। इन दिनों साहित्य के पाठकों पर वैचारिक या राजनीतिक प्रभाव की व्यापक चर्चा हो रही है ।
परंपरागत समीक्षा ने श्रेष्ठ और बाज़ारू साहित्य का अंतर किया था लेकिन उत्तर आधुनिकों ने इस विभाजन को नहीं माना। "डिफरेंस" और " हाइब्रीडिटी" पर ज़ोर दिया गया। विधाओं में मिश्रण से लेकर पापुलरकल्चर तक के प्रयोगों पर ज़ोर दिया ।
ल्योतार ने लिखा उत्तर आधुनिकतावाद का अर्थ है स्थानीय परिस्थितियों को सीमित संदर्भ में देखा जाय। इसमें व्यक्ति के स्तरों को खोजा जाय ।
बौद्रिलार्द के अनुसार यह युग इमेज और सूचना के उत्पादन का युग है । पहले भौतिक वस्तुओं के उत्पादन पर ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता में स्थानीयअवस्था पर ज़ोर है और सार्वभौम का निषेध है।
उत्तर आधुनिक अवस्था में अस्मिता की राजनीति केन्द्र में आ गयी है। रीतिवादी ढंग से इसके रुपों की सृष्टि हुई है। अस्मिता पर बहस कम और सृजन पर ज़ोर ज़्यादा है। अस्मिता के लेखक ठहरकर संवाद नहीं करना चाहते , वे उसके मसलों पर बहस करने की बजाय मनवाने पर ज़ोर ज़्यादा दे रहे हैं। यानी अस्मिता है और मानो। जो नहीं मानता उसको अछूतभाव से देखा जा रहा है। इसने अस्मिता की राजनीति का आतंक पैदा किया है । वस्तुगत तौर पर देखें तो अस्मिता की राजनीति का अस्मिता से ही पंगा है। अस्मिता की उपयोगिता के सवाल बड़े सवाल हो गए हैं ।
संवादहीन अस्मिता विमर्श वस्तुत:अस्मिता का रीतिवाद है। यह अस्मिता के प्रति आलोचनात्मक नज़रिए से वाद-विवाद-संवाद का निषेध करता है। इसकी अस्मिता के जड़ इतिहास में दिलचस्पी है । अस्मिता के गतिशील और रुपान्तरित पक्षों में कोई दिलचस्पी नहीं है। दलित और स्त्री आत्मकथाओं पर चल रही बहसों में हम इसे साफ़तौर पर देख सकते हैं।

साहित्य में सार्वभौम भाषा या साहित्यांदोलन की भाषा के प्रयोग की परंपरा रही है। लेकिन उत्तर आधुनिक लेखकों ने सार्वभौम भाषा का निषेध किया है । इसके विकल्प के तौर पर "निजी (प्राइवेट)भाषा", "निजी शैली" या "निजी मैनरिज्म" पर ज़ोर दिया । सामाजिक जीवन के चित्र सार्वभौम भाषा में पेश करने की बजाय निजी भाषा में पेश किए हैं। आज बड़े पैमाने पर दलित साहित्य या स्त्री साहित्य में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है वह "निजी भाषा" है। विलक्षण बात यह है कि पेशेवर लोगों में यह भाषा आ गयी है । आज लेखक इस तरह से लिख रहा है गोया वह किसी अन्य द्वीप का बाशिंदा हो। वह ऐसी भाषा बोल रहा है जो उसे सबसे भिन्न बनाती है। यह वह भाषा है जिसे विविधता के नाम पर पढ़ें और भूलें।
"निजी भाषा" का आर्थिक निजीकरण की प्रक्रिया से गहरा संबंध है । इसके अलावा "मृतभाषा" के जमकर प्रयोग हो रहे हैं। ख़ासकर नेताओं के भाषणों में यह भाषा ख़ूब इस्तेमाल की जा रही है।
"मृतभाषा" की शुरुआत आपातकाल के साथ होती है। सन् 1977 के बाद यह परवान चढ़ती है और राममंदिर आंदोलन, आरक्षण आंदोलन ,पृथकतावादी आंदोलन और आतंकी आंदोलन में यह मांसल बनती है और सोनिया,माया,मुलायम ,अन्ना हज़ारे आदि इसके नायक हैं। यह भाषणकला से बेहतरीन गद्यभाषा की विदाई की सूचना भी है।
उत्तर आधुनिक अवस्था के आने के साथ "व्यक्तिवाद" और "व्यक्ति" का एक विषय के रुप में साहित्य में अंत हो जाता है । ख़ासकर विगत 40 सालों में आई आत्मकथाओं में इसे आसानी से देखा जा सकता है। दलित और स्त्री की आत्मकथाओं में "व्यक्ति" के तौर पर कम और समूह या समुदाय के सदस्य के रुप पर ज़्यादा ज़ोर है।
आधुनिकता के दौर में व्यक्ति और व्यक्तिवाद एक महत्वपूर्ण फिनोमिना के तौर पर पैदा होता है वहीं पर " मैं" और "निजी अस्मिता" की अभिव्यक्ति पर भी ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता के आते ही पुराने व्यक्तिवाद और व्यक्ति का अंत हो जाता है ।

भाषा में समय भी होता है। इसमें सामाजिक समय , मानवीय समय, अतीत ,भविष्य और स्मृति भी समाहित होती है। इसमें निजी अस्मिता भी होती है। ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। भाषा में समय की अनुभूतियाँ भी होती हैं । वाक्य स्थिर नहीं होते। वे "समय" के साथ
चलते हैं। इसलिए भाषा और समय को एक साथ रखकर देखना चाहिए ।
नई उत्तर आधुनिक भाषा में एक पहलू उन्मादी भाषिक अनुभव का भी है। यह ऐसी भाषा है जो लेखक के भौतिक आधार से पूरी तरह कटी है। निजी अस्मिता को नहीं जानती। "मैं" को नहीं जानती। वह लेखन को 'अन्य' के लेखन से जोड़कर नहीं देखती। उसके साथ अंतर्क्रिया नहीं करती। यह संवृत्ति दलित और स्त्री लेखन में है।
जबकि पुराने मध्यकालीन स्त्री और दलितलेखन में यह नहीं है। यह उत्तर आधुनिक लेखक समय पर सवारी करने की कोशिश में है जो कि असंभव कार्य है। वह ऐसे यथार्थ को रच रहा है जिसमें आनंद नहीं है। बल्कि आनंद का विलोम ज़्यादा व्यक्त हुआ है । 

मंगलवार, 8 मई 2012

आलोचना का पराभव और नामवर सिंह


हाल ही में राजकमल प्रकाशन के द्वारा नामवर सिंह के विचारों,आलोचना निबंधों ,व्याख्यानों और साक्षात्कारों पर केन्द्रित 4 किताबें आयी हैं। चार और आनी बाकी हैं। इन किताबों का ‘कुशल’ संपादन आशीष त्रिपाठी ने किया है।
   ये किताबें आधुनिक युग में विचारों की भिड़ंत के सैलीबरेटी रूप का आदर्श नमूना है।  सैलीबरेटी आलोचना चमकती है और प्रभावहीन होती है। ये किताबें ऐसे समय में आई हैं जब विचारों से हिन्दी की आलोचना भाग रही है। नामवर सिंह ने आलोचना लिखना बंद कर दिया हैं। उन्हें कम लिखने का आदर्श बना दिया गया है।
      यह मिथ है वे कम लिखते हैं और कम लिखने वाला महान होता है,विद्वान होता है। यह मिथ इन किताबों के आने से टूटा है। यह भी पता चलता है कि कई साल पहले आलोचना की विदाई हो चुकी है। नामवर सिंह के हाथों आलोचना का अंत अनिवार्य परिघटना है। मौटे तौर पर 1984-85 के बाद से आलोचना का नामवर सिंह के लेखन में समापन हो चुका है। यही वह दौर है जब कम्प्यूटर क्रांति का जन्म होता है और नामवर सिंह साहित्य से गैर-साहित्यिक विषयों की ओर प्रस्थान करते हैं। इसके पहले वे गैर-साहित्यिक विषयों पर कम लिखते थे।
        देश में जब सत्ता का फासिज्म आपात्काल में जनता पर हमले कर रहा था नामवर सिंह कुछ नहीं बोले,लेकिन रामजन्मभूमि आंदोलन के बाद संघ परिवार के फासीवाद पर ‘आलोचना’ पत्रिका का पूरा विशेषांक ही निकाल दिया। नामवर सिंह में चेतना के स्तर पर आए ये परिवर्तन संचार क्रांति और ‘पावरगेम’ की देन हैं।
      संचार क्रांति के बाद उन्होंने राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर खूब लिखा और बोला है। इस बदलाव को नामवर सिंह या उनके भक्तों को विश्लेषित करना चाहिए और बताना चाहिए कि नामवर सिंह जैसा महापंड़ित साहित्य से भागकर राजनीति में क्यों चला आया ? मार्क्सवाद से उत्तर आधुनिकता की गोद में कैसे चला आया ? पहले वे उत्तर आधुनिकता को लेकर जो सोचते थे वही समझ उन्होंने बड़ी चालाकी से क्यों छोड़ दी ? नामवर सिंह के उत्तर आधुनिक परिवर्तनों और ‘पावरगेम’ की वैचारिक कलाबाजियां इन किताबों के निबंधों में आसानी से देख सकते हैं।
      सवाल उठता है साहित्य की दुनिया से निकलकर फासीवाद,भूमंडलीकरण, साम्प्रदायिकता, बहुलतावाद,भारतीयता,अस्मिता, बीसवीं सदी का मूल्यांकन, दुनिया की बहुध्रुवीयता, उत्तर आधुनिकता और मार्क्सवाद आदि विषयों पर वे उत्तर आधुनिकता के आने के बाद ही मुठभेड़ क्यों करते हैं ? इन विषयों पर पहले क्यों नहीं लिखा ? कम्प्यूटर क्रांति के बाद ही उनकी नजर इन विषयों की ओर क्यों गयी ? इस क्रम में नामवर सिंह के विचारों में सबसे ज्यादा चंचलता, विचारहीनता और चलताऊढ़ंग नजर आता है। उनके विचारो में सबसे ज्यादा लोच इसी दौर में उभरकर आती है। यह सब नामवर सिंह के आलोचक की विदाई का पुख्ता सबूत है। नामवर सिंह से पहले रामविलास शर्मा साहित्य और मार्क्सवाद का मैदान छोड़ चुके थे।
      नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व में सबसे ज्यादा बदलाव 1980-81 के बाद ही आता है। उनके कृतित्व में उत्तर आधुनिक शब्दावली नहीं मिलेगी लेकिन उत्तर आधुनिक वैचारिक रपटन मिलेगी जिस पर वे बार-बार फिसलते हैं। वे व्यक्तिगत और सार्वजनिक तौर पर उत्तर आधुनिक शब्दावली का उपहास उड़ाते हैं लेकिन लेखन में सारे उत्तर आधुनिक पैंतरों और रणनीतियों का इस्तेमाल करते हैं। यह तो वैसे ही हुआ कि गुड़ खाएं गुलगुलों से बैर।
     नामवर सिंह की आलोचना शैली का सबसे खतरनाक पहलू वह है जिसे वे व्यक्तिगत बातचीत में इस्तेमाल करते हैं। किसी भी लेखक या व्यक्ति का भविष्य खराब करने में उनकी यह निजी बातचीत बर्बादी करती रही है। इस कला के आधार पर वे अनेक प्रतिभाओं को गुमनामी की गुफाओं में ले जा चुके हैं।
       नामवर सिंह की विश्वदृष्टि सभी किस्म की रूढ़िबद्धताओं और विचारधारा से भी मुक्त है, यह विश्वदृष्टि विश्वसनीय, गतिशील और अनिश्चित है। वे बार-बार भारतीय ज्ञानमीमांसा के क्षेत्र में विश्वदृष्टि के नए रूपों की तलाश में लौटते हैं। उनकी विश्वदृष्टि का आधार है भारतीय सत्ता के हित। वे इस चक्कर में वर्गीय,जातीय,जातिवादी और धार्मिक दायरे के परे जाकर देखते हैं। वे न तो मार्क्सवाद को विश्वदृष्टि का आधार बनाते हैं और ना ही किसी अन्य मार्क्सवाद विरोधी दृष्टिकोण को। बल्कि अमेरिकी उपयोगितावाद उनकी विश्वदृष्टि की धुरी है। हिन्दी में एक कहावत है जिसमें उनके उपयोगितावाद को बांध सकते हैं,गंगा गए गंगादास जमुना गए जमुनादास।
    वे दुनिया के साहित्य,दर्शन और समीक्षा को पढ़ते हैं,अपने को अपडेट रखते हैं, लेकिन उसमें बहते नहीं हैं। उपयोगितावादी कुशल तैराक की तरह उसमें तैरते रहते हैं लेकिन उनके विचारों को विश्राम हिन्दी साहित्य में मिलता है। इस अर्थ में वे ग्लोबल-लोकल एक साथ हैं।
     नामवर सिंह ने  अपनी उपयोगितावादी विश्वदृष्टि को सचेत रूप से विकसित किया हैं,सचेत रूप से ‘पावरगेम’ का उपकरण बनाया है,फलतः उनके पीछे सत्ताधारी वर्गों की समूची शक्ति काम करती रही है। इसके कारण वे कम्पलीट भारतीय बुद्धिजीवी नजर आते हैं। हिन्दी साहित्य में उनकी रमी हुई प्रतिभा के सब कायल हैं।
     एक जमाने में वे जनता के प्रगतिशील हितों से बंधे थे। साहित्यालोचना को उन्होंने प्रगतिशील शक्तियों के पक्ष में सृजनात्मक तौर पर विकसित किया था। उनके आपातकाल पूर्व के लेखन में यह नजरिया व्यक्त हुआ है। आपातकाल के पहले नामवर सिंह साहित्य के आलोचक थे। आपातकाल के बाद वे सत्ता के समर्थक और ‘पावरगेम’ का हिस्सा बन गए। इससे साहित्य ,समीक्षा और प्रगतिशील शक्तियों की व्यापक क्षति हुई है। आपातकाल के समय से नामवर सिंह ने लेखन में उन्हीं विषयों को उठाया है जो सत्ताविमर्श का हिस्सा हैं।
     नामवर सिंह के व्यक्तित्व के अनेक पहलू हैं जिनमें उनकी अस्मिता की दरारें साफ देखी जा सकती हैं। मसलन् उनके शिक्षक व्यक्तित्व, शिक्षा प्रशासक, पति, पिता, दोस्त,कॉमरेड, समीक्षक आदि रूपों पर आलोचनात्मक ढ़ंग से विचार किया जाना चाहिए और देखना चाहिए कि एक व्यक्ति के नाते नामवर सिंह किस तरह की सामाजिक भूमिका और व्यवहार का निर्वाह करते रहे हैं। इन सभी रूपों में नामवर सिंह एक जैसे नजर नहीं आते।
     नामवर सिंह के साहित्यिक जीवन की समीक्षा के साथ साथ सामाजिक-अकादमिक जीवन की भी समीक्षा की जानी चाहिए। हिन्दी में नामवर सिंह ने अभी तक अपनी अंशतः सामाजिक समीक्षा की है। जबकि मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा यह काम कर चुके हैं। उनकी विभिन्न किस्म की इमेजों में गहरी दरारें हैं जहां पर उनके व्यक्तित्व के विघटन को साफतौर पर देखा जा सकता हैं। वे हमेशा ‘पावर’ और ‘साहित्य’ के बीच घूमते रहे हैं। उन्होंने अपने को ‘सत्ता के खेल’ और ‘पितृसत्ता’ का हिस्सा बनाया है।
        ‘पावरगेम’ के पैराडाइम में आलोचना और आलोचक का सामाजिक प्रभाव खत्म हो जाता है। यही वजह है कि नामवर सिंह हैं लेकिन सामाजिक प्रभाव के बिना। उनकी किताबें हैं लेकिन आलोचना पर कोई प्रभाव नहीं है। नामवर सिंह के पास सत्ता के खेल के सभी झुनझने हैं, लेकिन आलोचना नहीं हैं। सत्ता के खेल का अंग बनकर नामवर सिंह ने सब कुछ पाया लेकिन आलोचना उनके पास से चली गयी है। अब यह नामवर सिंह और उनकी भक्तमंडली तय करे कि सत्ता के खेल ने नामवर सिंह की आलोचना को महान बनाया या नपुंसक बनाया ?सत्ता के खेल ने  उनके आलोचक पद का अवमूल्यन किया है उन्हें आलोचक की बजाय सैलीबरेटी बनाया है। मीडिया प्रतीक बनाया है। आज नामवर सिंह जितने प्रभावहीन हैं उतने पहले कभी नहीं थे।       
    ये चारों किताबें नामवर सिंह के मार्क्सवादी मिथों को तोड़ती हैं। मिथ बनाना और तोड़ना यह उनकी सामान्य प्रकृति है। अपने कहे को सार्वजनिक तौर पर बदलना अथवा अस्वीकार करना, विचारों की रुढ़िबद्धता को तोड़ने का उनका उपयोगितावादी अस्त्र हैं। नामवर सिंह की इन किताबों की आलोचनादृष्टि की धुरी है तात्कालिक दबाब ,पितृसत्तात्मक नजरिया और सत्ता की जरूरतें।
       भूमिका में आशीष त्रिपाठी ने नामवर सिंह को उद्धृत करते हुए लिखा है , ‘‘एक बार मेरे पूछने पर उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘चाहे निबन्ध हो या पुस्तक,मुझे उसका प्रकाशन तब ही जरूरी लगता रहा है,जबकि वह मौजूदा परिदृश्य में हस्तक्षेप करे ,उसके ठहराव को तोड़े और वाद-विवाद-संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए। मेरी ज्यादातर पुस्तकें अपने समय की बहसों में भागीदार होकर लिखी गयी हैं। इसीलिए संग्रह के लिए संग्रह निकालना मेरी प्राथमिकता नहीं रहा है।’’
      सवाल उठता है फिर ये किताबें क्यों लायी गयी हैं ? क्या ये किताबें संग्रह के लिए संग्रह नहीं हैं ? नामवर सिंह जिसे ‘हस्तक्षेप’ कहते हैं वह शीतयुद्धीय राजनीति का महामंत्र है। मौजूदा दौर ‘हस्तक्षेप’ का नहीं ‘लेखन’ का है और उसी का परिणाम हैं ये चार किताबें। ‘हस्तक्षेप’ से ‘लेखन’ के पैराडाइम में आना नामवर सिंह का कायाकल्प है। यह एक मार्क्सवादी का ‘कछुआ धर्म’ में रूपान्तरण है। यह मार्क्स के पंथ से देरिदा के पंथ में दाखिल होना है। नामवर सिंह के इन निबंधों के प्रकाशित होने से उनका पैराडाइम शिफ्ट हुआ है। वे अचानक ‘आलोचना’ से ‘विमर्श’ में चले आए हैं।
     नामवर सिंह की इन किताबों में मूलतः दो मॉडल हैं पहला साहित्यिक मॉडल कृति-व्यक्ति केन्द्रित है, दूसरा, अस्मिता मॉडल है,इसमें अस्मिता के उप-पाठ भी शामिल हैं। ये दोनों ही मॉडल उनकी इन चार किताबों में हैं। ये दोनों सत्ता विमर्श के साहित्यिक मॉडल हैं।       

     ये किताबें नामवर सिंह की पहले आयी किताबों जैसे - ‘छायावाद’,‘इतिहास और आलोचना’,‘कविता के नए प्रतिमान’,‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘वाद-विवाद-संवाद’ से बुनियादी तौर पर अलग हैं। ये चारों किताबें नामवर सिंह के विचारों के वैविध्य को सामने लाती हैं। इन किताबों में नामवर सिंह की शीतयुद्धीय धारणाओं का विध्वंस भी देखा जा सकता है।
        सवाल उठता है क्या नामवर सिंह के ये चार संकलन किसी नई बहस को जन्म देते हैं ? क्या इनके माध्यम से आलोचना में कोई नयी जान फूंकी जा सकती है ? क्या इन निबंधों से आलोचना का कोई नया वातावरण बनेगा ? जी नहीं। इन किताबों से नामवर सिंह के विचारों के बारे में और भी भ्रम पैदा होंगे, आलोचकों और लेखकों में सत्ता की शरण में जाने की मुहिम तेज होगी। आलोचना और भी नपुंसक बनेगी। अराजनीतिक बनेगी।
       नामवर सिंह की जो चार किताबें आई हैं वे हैं ‘कविता की जमीन और जमीन की कविता’,‘प्रेमचन्द और भारतीय समाज’, ‘हिन्दी का गद्यपर्व’ और ‘जमाने से दो-दो हाथ’। ये चारों किताबें मूलतः आलोचना को पुनःप्रतिष्ठित करने का असफल प्रयास है। इनमें ‘प्रेमचंद और भारतीय समाज’ कथा समीक्षा की महत्वपूर्ण किताब है। जबकि ‘जमाने से दो-दो हाथ’ उत्तर आधुनिक विषयों पर नामवर सिंह की अधूरी किताब है। इसमें नामवर सिंह वैचारिक रूप से चंचल नजर आते हैं। यही स्थिति ‘हिन्दी का गद्यपर्व’ नामक किताब की भी है इसमें नामवर सिंह के शीतयुद्धीय साहित्यिक नजरिए को देखा जा सकता है।  हिन्दी साहित्येतिहास को लेकर नामवरसिंह की विवादास्पद और कमजोर धारणाएं इसमें व्यक्त हुई हैं।
      ‘हिन्दी का गद्य पर्व’ में चार मार्क्सवादियों -जार्ज लूकाच,लुसिएँ गोल्डमान,रेमण्ड विलियम्स और लेनिन -पर नामवर सिंह के लेख सबसे कमजोर लेख हैं । चीजों को सरल बनाकर पेश करने के चक्कर में मार्क्सवादियों के विचारों की अपूर्ण इमेज प्रस्तुत की गई है। ‘लेनिन और हम’ निबंध में लेनिन को एकबार याद करने के बाद नामवर सिंह ने लेनिन को कभी दोबारा याद नहीं किया। हिन्दी के मार्क्सवादियों में रामविलास शर्मा ,राहुल सांकृत्यायन और शिवदान सिंह चौहान के उठाए कुछ ही मुद्दों पर उन्होंने लिखा है। बाकी मार्क्सवादियों को इस लायक भी नहीं समझा।
      कहने का आशय यह कि हिन्दी के मार्क्सवादियों और मार्क्सवाद पर उन्होंने न्यूनतम लिखा है। विदेशी मार्क्सवादियों पर भी न्यूनतम लिखा है। भारत के बाकी मार्क्सवादियों पर कुछ भी नहीं लिखा है। मार्क्सवादी साहित्यालोचना संबंधी धारणाओं पर कुछ भी नहीं लिखा है। सवाल किया जाना चाहिए कि नामवर सिंह ने मार्क्सवादी सिद्धान्तों और भारत के मार्क्सवादियों पर क्यों नहीं लिखा ? जबकि रामविलास शर्मा ने अपने तरीके से यह काम किया है।
    मार्क्सवादी सिद्धांत चर्चा से विश्व का कोई भी मार्क्सवादी नहीं भागा सिर्फ नामवर सिंह को छोड़कर। उल्लेखनीय है भारत में मार्क्सवादी सिद्धान्त चर्चा समाजविज्ञान, दर्शन और विज्ञान के भारतीय मार्क्सवादियों में खूब हुई है लेकिन नामवर सिंह इससे भागते रहे हैं।
     नामवर सिंह का मार्क्सवाद की मूल सिद्धान्त चर्चा से पलायन और उनका सारी जिंदगी मार्क्सवाद की बुनियादी बातों पर न बोलना और न लिखना किस बात का संकेत है ?
      सच्चाई यह है नामवर सिंह ने मार्क्सवाद पर सबसे ज्यादा पढ़ा है। सबसे बड़ा मार्क्सवादी किताबों का जखीरा उनके पास है। लेकिन मार्क्सवाद पर उन्होंने न्यूनतम भी नहीं लिखा है।
    नामवर सिंह का मार्क्सवादी सिद्धांत चर्चा से पलायन का प्रधान कारण है उनकी सामंती मनोवृत्तियां और सत्ताभक्ति।  नामवर सिंह तमाम अच्छाईयों और महानता के बावजूद अपने दिमाग की सामंती और सत्तापंथी संरचनाओं को तोड़ने में असमर्थ रहे हैं। सत्ता और सामंत उनके मार्क्सवाद पर भारी पड़े हैं। 
        मार्क्सवाद की सिद्धांत चर्चा किसी भी बुद्धिजीवी को इरेशनल वैचारिक संरचनाओं से लड़ने, पोजीशन लेने के लिए मजबूर करती है। नामवर सिंह के साथ यह प्रक्रिया जीवन और साहित्य में कभी घटित ही नहीं हुई।
     नामवर सिंह मार्क्सवाद की जटिल सिद्धान्त चर्चा में हस्तक्षेप करने के लिए कभी अपने को जाग्रत नहीं कर पाए ? नामवर सिंह के लिए मार्क्सवाद सुविधा की चीज है। मार्क्सवाद की बुनियादी सिद्धांत चर्चा में लिखित और वाचिक दोनों ही रूप में उनकी अनुपस्थिति हिन्दी में सत्ता,मार्क्सवाद और सामंतवाद के निकृष्टतम गठजोड़ की चरम अभिव्यक्ति है। उल्लेखनीय है मार्क्सवाद की सिद्धांत चर्चा पर रामविलास शर्मा,अमृतराय, शिवकुमार मिश्र,मैनेजर पांडेय आदि ने लिखा है लेकिन नामवर सिंह ने कुछ भी नहीं लिखा है।     
  इन चार किताबों में वाचिक और लिखित दो तरह के नामवर सिंह हैं। लिखित नामवर सिंह में हिन्दी समीक्षा के गद्य सौंदर्य के दर्शन होते हैं। जबकि वाचिक नामवर सिंह में जगह-जगह वैचारिक विचलन नजर आता है। कायदे से वाचिक और लिखित दोनों किस्म के नामवर सिंह में भेद करके पढ़ा जाना चाहिए। यह भेद व्यक्ति का ही नहीं मीडियम का भी है। नामवर सिंह आलोचक कम और साहित्य के प्रौपेगैण्डिस्ट या प्रचारक ज्यादा नजर आते हैं।

हिन्दी साहित्य को जनप्रिय बनाने में उनके व्याख्यानों का बड़ा योगदान है, उन्होंने अपने व्याख्यानों से हिन्दी साहित्य के प्रति वैसे ही आकर्षण पैदा किया है जिस तरह 19वीं सदी में दयानंद सरस्वती के भाषणों ने हिन्दी भाषा के प्रति आकर्षण पैदा किया था।
    नामवर सिंह अपने व्याख्यानों में प्रौपेगैण्डा की तकनीक का बारीकी से इस्तेमाल करते हैं। इसमें सेंसरशिप भी शामिल है,जिसके तहत वे कुछ सूचनाएं छिपाते तो कुछ सूचनाएं बताते हैं। इस पद्धति के आधार पर ही वे साहित्य में लेखकों को उठाने-गिराने का काम करते रहे हैं।
      नामवर सिंह की व्याख्यान कला के चार तत्व हैं मोहित करना,छिपाना ,सरल बनाना और फुसलाना। इन तत्वों के आधार पर नामवर सिंह ऑडिएंस और लेखकों की समझ को बदलने और नियंत्रित करने का काम करते हैं। इस पद्धति का इस्तेमाल करते हुए वे लेखक,विचार और संस्थान विशेष की छद्म इमेज भी बनाते हैं।
     उनके लेखन में हिन्दी के समस्त दोषों का ठीकरा अन्य के सिर फोड़ा गया है। दोष के लिए अन्य दोषी और स्वयं दोषमुक्त। अभिव्यक्ति की यह पद्धति आलोचना की नहीं प्रौपेगैण्डा की पद्धति है। प्रौपेगैण्डा पद्धति में झूठ बोलना कला है और कम से कम सूचना देना भी कला है।
     नामवर सिंह कम से कम सूचनाएं देकर अभीप्सित प्रचार प्राप्त करते रहे हैं। उनके अधिकांश व्याख्यान प्रगतिशीलों और जनवादियों के बीच ही हुए हैं अतः उनकी राय को नियंत्रित करने में नामवर सिंह की बडी भूमिका रही है।  उल्लेखनीय है प्रौपेगैण्डा राय को नियंत्रित करता है। हिन्दी साहित्य में नामवर सिंह राय बनाने और नियंत्रित करने का काम करते रहे हैं। इस अर्थ में वे कम्प्लीट प्रचारक हैं। राय बनाना,राय नियंत्रित करना,सहमति तैयार करना यही उनका मूल लक्ष्य रहा है। यही काम बुद्धिजीवी से सत्ता कराना चाहती है। इसी को कहते हैं सत्ता का खेल।
    ये सारे काम आलोचना के कम प्रौपेगैण्डा के ज्यादा हैं। आलोचना का काम सहमति तैयार करना नहीं है,बल्कि असहमतियों का उदघाटन करना है। आलोचनात्मक वातावरण बनाना है। नामवर सिंह असहमति और आलोचनात्मक वातावरण तैयार करने का नहीं सहमति के निर्माण का काम करते रहे हैं। यह प्रौपेगैण्डा की पद्धति है आलोचना की नहीं।
   नामवर सिंह को हिन्दी में आलोचक कम और ‘ साहित्य के अधिकारी विद्वान’ के रूप में ज्यादा जनप्रियता हासिल है। यह ‘अधिकारी विद्वान’ का पद प्रचारक का पद है आलोचक का नहीं।
    वे जब बोलते हैं तो ऑडिएंस का ख्याल रखते हैं और उन्हीं बातों,विचारों आदि का प्रचार करते हैं जिसको ऑडिएंस की स्वीकृति मिले। उनके भाषणों में हिन्दी प्रेम,भारत प्रेम,भारतीय परिवार प्रेम, गांव,ग्राम्य दुर्दशा,स्वाधीनता का समर्थन और दर्शक की इच्छाओं का महिमामंडन खूब हुआ है।
    नामवर सिंह के अनेक व्याख्यान लेखकों के मनोबल को बढ़ाने के लिहाज से दिए गए हैं। हिन्दी में जिसे अपना मनोबल टूटता सा लगता है दौड़कर नामवर सिंह के पास जाता है और अनुरोध करता है चलो भाषण दो। यह काम मूलतः प्रौपेगैंडिस्ट का है। वह नैतिक मनोबल बढ़ाने का काम करता है। इस काम में नामवर सिंह अपनी साख और आदर्शों का जमकर इस्तेमाल करते रहे हैं।
    नामवर सिंह की साख सबसे ज्यादा है, जिसका वे व्यक्तियों,लेखकों और साहित्य पाठकों के नैतिक मनोबल बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इस प्रक्रिया में साहित्य की ग्रहण क्षमता बढ़ाने पर उनका खास ध्यान रहा है।
    नामवर सिंह अपने भाषणों से हस्तक्षेप करते हैं, ऑडिएंस को एकजुट करते हैं फिर सुनने वालों में एकमत राय कायम करते हैं। वे अपने व्याख्यानों के जरिए संबंधित विषय पर मतभेदों को कम करते हैं। मतभेदों के दायरे को कम करने के चक्कर में सरलीकरण और विभ्रम भी पैदा करते हैं,लेकिन उनका मूल लक्ष्य विभ्रम पैदा करना नहीं है,वे मतभेद और गुटबाजियां कम करने के लिए व्याख्यान का इस्तेमाल करते हैं। व्याख्यान के अंत में उनकी भविष्य पर नजर होती है और आशा का संदेश देते हैं। भविष्य के प्रति ऑडिएंस में जो अज्ञान है उस पर से पर्दा हटाते हैं। यह काम बेहद सतर्क ढ़ंग से करते हैं।
    नामवर सिंह अपने विचारों में जिस क्षेत्र या विषय पर बातें करते हैं उस पर समाधान भी सुझाते हैं वे महज बातें नहीं करते। ऑडिएंस उनके समाधानों से सामने सहमत होती है। इसके लिए वे अभिभूत करने की कला का जमकर इस्तेमाल करते हैं। इसी अर्थ में वे साहित्य के महान् प्रचारक हैं।
   नामवर सिंह के व्याख्यान ऑडिएंस को फुसलाते ज्यादा हैं ज्ञान कम देते हैं। वे साहित्य के प्रति आस्था पैदा करते हैं साहित्य का ज्ञान कम देते हैं। यही वजह है नामवर सिंह के व्याख्यान पढ़ते हुए साहित्य के प्रति आस्था बनती है ज्ञान कम मिलता है।
    नामवर सिंह की व्याख्यान शैली आक्रामक होती है और इसके जरिए वे किसी न किसी व्यक्ति के विचारों पर हमला करने के बहाने ऑडिएंस के विचारों पर उच्च नैतिक धरातल से हमला बोलते हैं और फिर उसे अपनी राय मानने के लिए फुसलाते हैं।        
     हिन्दी में  आलोचना को प्रतिष्ठित करनें में नामवर सिंह की अग्रणी भूमिका रही है और उनके अथक वाचिक प्रयासों ने  आलोचना को जनप्रियता  दिलायी है। इसके बावजूद इन चार किताबों में नई बातें कम हैं पुरानी बातें ज्यादा हैं। इन किताबों का महत्व इस लिहाज से ज्यादा है कि इनके जरिए हिन्दी आलोचना के बारे में नामवर सिंह के विचारों को पहलीबार पेश किया गया है। ये किताबें आलोचना के स्टीरियोटाईप का खंडन-मंड़न हैं।
      आलोचना के प्रति नामवर सिंह का हमेशा से सर्जनात्मक रवैय्या रहा है। नामवर सिंह ने अपभ्रंश से लेकर जनवादी साहित्य तक जो कुछ भी लिखा है वह  आलोचना का हिस्सा है। इस प्रक्रिया में नामवर सिंह का मुख्य जोर वर्तमान को बेहतर बनाने और नवीन दिशा देने पर है।
     वर्तमान को बेहतर बनाने के लिए नामवर सिंह अतीत में नहीं जाते  बल्कि वर्तमान में रहकर ही बेहतरी के सत्तापंथी यूटोपिया का निर्माण करते हैं। इसके लिए उन तमाम स्रोतों की मदद लेते हैं जिनसे वर्तमान की सही समझ बने। वर्तमान को बेहतर बनाने के लिए उसकी बेहतर समझ का होना जरूरी है। युगीन अन्तर्विरोधों की सटीक समझ पर ही सही समझ निर्भर करती है। सही समझ के आधार पर ही सही दृष्टिकोण का निर्माण संभव है।
    आलोचना का लक्ष्य है सटीक अन्तर्विरोधों को रेखांकित करना। हिन्दी के अधिकांश समीक्षकों की मुश्किल यह है कि वे अपने युग के प्रधान और उप-प्रधान अंतर्विरोधों को नहीं जानते।   युगीन अन्तर्विरोधों की भ्रामक समझ आलोचना को नष्ट करती है। कहीं न कहीं अन्तर्विरोधों की भ्रामक समझ का हिन्दी आलोचना के ह्रास में बड़ा योगदान है।
     हिन्दी में खूब लिखा जा रहा है किन्तु अन्तर्विरोधों की सही समझ के अभाव, अतिरेक और भ्रष्ट धारणाओं में ज्यादा लिखा जा रहा है। अवधारणाओं का भ्रष्टीकरण जितना हिन्दी में हुआ है वैसा अन्यत्र नजर नहीं आता। यह परवर्ती पूंजीवाद की विशेषता है। अवधारणाओं के भ्रष्टीकरण में हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं और उनमें छपने वाले तथाकथित समीक्षकों की सक्रिय भूमिका रही है। नामवर सिंह की ये चारों किताबें साहित्य में अवधारणात्मक भ्रष्टीकरण में ईंधन का काम कर सकती हैं।             
     इन किताबों में दो बातें गायब हैं पहली बात जो गायब है वह है नामवर सिंह के द्वारा उपेक्षित विषय और लेखों का संदर्भ। संपादक को कम से उन विषयों पर नामवर सिंह से बात करनी चाहिए थी जिन पर उन्होंने नहीं लिखा और जो लिखा और बोला है उसके संदर्भ को नामवर सिंह से बातें करके लिखा जाना चाहिए। अथवा आलोचना के उन सवालों पर संपादक को स्वयं लिखना चाहिए जिन पर नामवर सिंह ने नहीं लिखा अथवा ऐसा लिखा है जिस पर संपादक की असहमति है अथवा विवादास्पद लिखा है।
       संपादक को महज संवाददाता नहीं होना चाहिए। इससे यह संदेश जाता है कि नामवर सिंह के निबंधों पर लिखने की संपादक की क्षमता नहीं है अथवा नामवर सिंह के साथ समझौते के तहत संकलन तैयार किया गया और हिदायत दी गयी कि नामवर सिंह पर कलम नहीं चलाओगे। इस प्रसंग में संपादक ने यदि नामवर सिंह के द्वारा संपादित संकलनों की भूमिकाओं से ही कुछ सबक हासिल किया होता अथवा मार्क्सवादी आलोचकों के द्वारा तैयार किए गए संकलनों की भूमिका से ही कोई सीख ली होती और ठीक से भूमिका लिखी होती तो निबंधों में व्याप्त विभ्रमों,धारणाओं और विवादों पर संपादक के नजरिए का भी अंदाजा लगता ?
    नामवर सिंह के निबंधों का संकलन व्यापक कालखंड़ में फैला है ,निबंधों में समय का अंतराल है ,इसके कारण निबंधों में असम्बद्धता भी है। इसमें चुप्पी  वाले साल और जिन विषयों को नामवर सिंह ने नहीं उठाया है उनका कारण जानने में मदद नहीं मिलती।
      नामवर सिंह मित्र शैली के आलोचक हैं। उनका पंसदीदा मित्र आलोचक-लेखकों के साथ इन निबंधों में संवाद दिखता है। दूसरा महत्वपूर्ण बात यह कि नामवर सिंह व्यक्ति के आलोचक हैं,व्यवस्था के नहीं। जबकि रामविलास शर्मा ने व्यक्ति और व्यवस्था केन्द्रित दोनों ही किस्म की आलोचना लिखी है।
     नामवर सिंह अकादमिक स्तर पर जितने गंभीर हैं और जिस ठंड़े मन के साथ समस्त जटिलताओं के साथ सोचते और लिखते हैं वैसी मनोदशा इन किताबों में एकसिरे से नदारद है। इन किताबों के आधार पर नामवर सिंह के बारे में कोई भी राय नहीं बनायी जा सकती और जो राय  बनेगी वह बेहद खराब होगी। ये किताबें उनके  द्वारा पहले लिखी किताबों का वस्तुतः निरस्तीकरण है।
      नामवरसिंह के लेखन की गंभीरता ,स्थिर होकर सोचने और लिखने की विद्वतापूर्ण शैली का उनके वाचिक निबंधों में अभाव दिखाई देता है।  वाचिक निबंध तात्कालिकता और पापुलिज्म की सोच से संचालित हैं। इन किताबों से यह भी पता चलता है कि नामवर सिंह जो कुछ भी बोलते रहे हैं वह सब तैयारी से नहीं बोलते थे। संपादकीय दबाब ,तात्कालिकता और मंचीय दबाब इन वाचिक लेखों में साफ नजर आते हैं। नामवर सिंह के निबंधों में तात्कालिकता और उत्सवधर्मिता के दबाबों को भी देखा जा सकता है। ये चीजें नामवर सिंह के धीर-गंभीर अकादमिक व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं हैं।

    नामवर सिंह के प्रति अनालोचनात्मकता से लड़ना पहली समस्या है। नामवर सिंह को आलोचना के भगवान का दर्जा देकर हिन्दीभक्तों ने उनका तो नुकसान किया ही साथ ही हिन्दी आलोचना का भी गंभीर नुकसान किया है। उन्हें ‘कल्ट व्यक्तित्व’ बनाया है।
        इन चार किताबों से यह पता नहीं चलता कि नामवर सिंह असल में क्या करते रहे हैं और इस तरह का लेखन और वाचन क्यों करते रहे हैं । नामवर सिंह का कहना है कि मैं लेखन के लिए लेखन में विश्वास नहीं करता। यदि यह सच है तो सवाल किया जाना चाहिए कि वे बोलने के लिए बोलने पर क्यों विश्वास करते हैं ? बोलने के लिए बोलना ज्यादा खतरनाक है । नामवर सिंह का अधिकांश संकट यहीं पर है।
     उनके विचारों में गंभीर विचलन वाचिक निबंधों में सामने आया है। लिखित निबंधों में विचलन कम है। अतः उनके लिखे और बोले को एक ही ढ़ंग और परिप्रेक्ष्य में नहीं पढ़ा जा सकता। विचारधारा और परिप्रेक्ष्य का संकट उनके वाचिक निबंधों में ज्यादा और लिखित निबंधों में कम है। लिखित निबंधों में नामवर सिंह ज्यादा सुसंगत ,बौद्धिक और व्यवस्थित नजर आते हैं। वाचिक निबंधों मैं भटके हुए नजर आते हैं। सवाल यह है कि वे बोलने के लिए बोलने की कला का इस्तेमाल क्यों करते रहे हैं ?
    बोलने के लिए बोलने की कला के कारण वे सामाजिक ज्यादती के भी शिकार हुए हैं या उन्हें शिकार बनाया गया है ? वे प्रतिदिन बोलते हैं, प्रतिदिन भाषण देना जोखिम का काम है। नामवर सिंह नए-नए विषयों पर बोलते हैं और कम के कम अथवा कभी कभी वगैर जाने भी बोलते हैं। वे बौद्धिक रिस्क लेते हैं।
     उनके विचारों की फिसलन का स्रोत है बोलने के लिए बोलना। बोलते समय नामवर सिंह ‘केजुअल आलोचक’ के रूप में सामने आते हैं। पेशेवर आलोचक का रूप लिखित निबंधों में दिखाई देता है। ‘केजुअल आलोचक’ के रूप में नामवर सिंह ने विषय विशेष पर बोलते हुए संदर्भ,अवधारणा,ऐतिहासिकता आदि चीजों को लेकर घल्लूघारा किया है। यह प्रवृत्ति उनके निबंधों में व्यापक रूप में फैली हुई है।
     इस समस्या का दूसरा पहलू ऑडिएंस से जुड़ा है। नामवर सिंह की वाह -वाह करने वाली ऑडिएंस है। यह क्रिटिकल ऑडिएंस नहीं है। अन-क्रिटिकल ऑडिएंस में अहर्निश भाषण देने के कारण उन्हें यह एहसास नहीं हुआ कि वे क्या सही और क्या गलत बोल रहे हैं। सचेत समीक्षकों की आलोचना पर नामवर सिंह के आलोचक मन ने कभी ध्यान नहीं दिया,सचेत ऑडिएंस उन्हें मिली नहीं। इसका प्रभाव इन किताबों में दिखता है। इन किताबों में अनेक भूलें सहज ही देखी जा सकती हैं।
    भक्त ऑडिएंस में बोलने के कारण नामवर सिंह को कभी अपनी कमजोरियों का एहसास तक नहीं हुआ और वे इस मुगालते में रहे हैं कि वे जो कुछ भी बोल रहे हैं सही बोल रहे हैं। उनके भाषणों जो चीजें नष्ट हुई हैं वह हैं विषय की शोधपरक गंभीरता, ऐतिहासिकता ,जटिलता एवं संश्लिष्टता। इसके कारण अनेक स्थानों पर वे सरलीकरण और कॉमनसेंस के तर्कों का इस्तेमाल करते हैं। यहां हम सिर्फ दो प्रसंगों का जिक्र करना चाहेंगे,ये हैं आपात्काल और स्त्री-पुरूष संबध।
आपात्काल - व्यक्ति-कृति केन्द्रित लेखन अंततःअधिनायकवादी राजनीति की ओर ले जाता है। स्त्री के प्रति पितृसत्तात्मक रवैय्या इसकी स्वाभाविक परिणति है। नामवर सिंह की व्याख्यान कला के सभी कायल हैं। लेकिन उनके लेखन में निहित अधिनायकवादी रणनीतियों की ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया। अधिनायकवादी रणनीति में संदर्भ ,तथ्य और सत्य को सबसे पहले विकृत किया जाता है। उदाहरण के लिए यहां सिर्फ उनके लेख ‘साम्प्रदायिकता,राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता’ लेख को ही लें। यह समूचा लेख ऐतिहासिक भूलों ,सरलीकरण और अनैतिहासिकता से भरा हुआ है।
    नामवर सिंह ने लिखा है ‘‘ सन् 1975 में जब आपात्काल की घोषणा हुई थी ,तब 44वें संशोधन के द्वारा हमारे संविधान में ‘स्टेट’ को एक ‘सेकुलर स्टेट’ घोषित किया गया।’’ यह बात बुनियादी दौर पर गलत है। भारत के संविधान के निर्माण की सारी बहसों में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा केन्द्र में थी,संविधान का अन्तर्ग्रथित हिस्सा है धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा। ‘सेकुलर‘ पदबंध को आपात्काल में ‘प्रियंबल’ में जरूर शामिल किया गया था ,यह कांग्रेस पार्टीं के तानाशाही राजनीतिक चरित्र से ध्यान हटाने की बृहद योजना का हिस्सा था।
       यहां पर आपात्काल को अधिनायकवादी राजनीति की अभिव्यक्ति देखने की बजाय नामवर सिंह को सत्ता का साम्प्रदायिक चेहरा नजर आया।  वे आपात्काल को अधिनायकवादी राजनीति के रूप में देखते ही नहीं हैं। वे आपात्काल में तुर्कमानगेट के सफाई अभियान को सत्ता के साम्प्रदायिक अभियान के रूप में देखते हैं। जबकि यह अभियान संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम के सौंदर्यीकरण अभियान का हिस्सा था। आपात्काल मूलतः लोकतंत्र पर हमला था,यह साम्प्रदायिक कार्रवाई नहीं है फासीवाद है। आपात्काल का राष्ट्रवाद से कोई लेना देना नहीं है।
    आपात्काल में सभी किस्म के लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए गए थे। आपात्काल में नामवर सिंह चुप क्यों थे और आपातकाल का उन्होंने समर्थन क्यों किया इसका जबाब उन्हें कम से कम जरूर देना चाहिए। इस दौर के प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन और जेएनयू की कारगुजारियां अभी भी पुराने छात्र भूले नहीं हैं। नामवर सिंह के अजनतांत्रिक भाव को इन संग्रहों से समझने में असुविधा होगी। नामवर सिंह के बयानों की सबसे कमजोर कड़ी है उनकी राजनीतिक धारणाएं।      
     इसके अलावा नामवर सिंह के इन वाचिक निबंधों में पितृसत्तात्मक रूझानों को भी आसानी से देखा जा सकता है। यह वाचन की मार्क्सवादी पद्धति नहीं है बल्कि अधिनायकवादी पद्धति है। यह सेंसरशिप की पद्धति है।
      साहित्य में सेंसरशिप और आत्म सेंसरशिप के आदर्श हैं नामवर सिंह। वे साहित्य में सेंसरशिप अथवा दिमाग की खिड़कियों को एक ही दिशा में खोलने का काम करते रहे हैं। यह फासिस्ट प्रवृत्ति है। वे साहित्य, कृतियों और कृतिकारों के बारे में तय करके ,अघोषित प्रतिबंध लगाकर बातें करते रहे हैं, वे यह भी तय करते रहे हैं कि किस पर अब हिन्दी जगत बोले और क्या बोले । यह साहित्य में अधिनायकवाद है,प्रगतिवाद नहीं है।
     साहित्य में अधिनायकवादी नजरिया जीवन में कमजोर लोगों को निकट रखने,चाटुकारों को रखने की मनोदशा बनाता है। साथ ही साहित्य और शिक्षा संस्थानों के प्रति अजनतांत्रिक नजरिया पैदा करता है। अजनतांत्रिक नजरिया वस्तुतः दीमक की मनोदशा है। जिस तरह दीमक जहां रहती है उसे ही खाती है वैसे ही नामवर सिंह का अधिनायकवादी नजरिया साहित्य और शिक्षा संस्थानों से लेकर आलोचना तक को दीमक की तरह खाता रहा है। कभी-कभार घुड़ाक्षरन् न्याय के तहत कुछ अच्छा भी हुआ है। वैसे ही जैसे दीमक काठ खाते-खाते कभी अक्षर भी लिख देती है।        
        आपात्काल में नामवर सिंह की भूमिका में परिवर्तन आया। वे अधिनायकवादी राजनीति के साथ जा मिले और उन्होंने आपात्काल का समर्थन किया। अपने इस रूख की उन्होंने कभी आत्मालोचना नहीं की, आपात्काल की कोई भी आलोचना नहीं लिखी।
      हमें यह भी देखना चाहिए कि अन्य आलोचक जैसे रामविलास शर्मा,हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि आपातकाल में क्या कर रहे थे  ?  क्या आपात्काल ने हिन्दी आलोचना और रचना को बदला है ? यह बदलाव किस रूप में आया है ?
    आपात्काल सामान्य राजनीतिक फिनोमिना नहीं है। बल्कि असामान्य फासिस्ट फिनोमिना है। इस पर नामवर सिंह का लेखन और व्यवहार चिंता पैदा करता है।  यह पहलू उनके लेखन से गायब क्यों है ? उन्होंने कभी आपात्काल में उसके खिलाफ और बाद में विस्तार के साथ क्यों नहीं लिखा ? उन्होंने आपात्काल का समर्थन किया था जबकि अज्ञेय ने आपात्काल का विरोध किया था।
      जिस तरह भारतेन्दु युग महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु है वैसे ही स्वातंत्र्योत्तर भारत में किसी भी लेखक के नजरिए को परखने के चार प्रस्थान बिंदु हैं पहला है भारत विभाजन,दूसरा ,आपातकाल , तीसरा है स्त्री, और चौथा है किसान। दुर्भाग्य से नामवर सिंह का आपात्काल और स्त्री के प्रति अलोकतांत्रिक और अवैज्ञानिक नजरिया है। जबकि किसान पर उन्होंने प्रेमचंद के बहाने व्यापक रूप में विचार किया है। इसमें उन्होंने किसान जीवन के जिस सत्य को सामने रखा है जिस सत्य के छिपाया है उस पर भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है।भारत विभाजन पर कभी विचार ही नहीं किया.         
 
       आपात्काल के पहले के साहित्यिक सवाल और आपात्काल के बाद के साहित्यिक सवालों पर नामवरसिंह का रूख एक ही परिप्रेक्ष्य को सामने नहीं लाता। आपात्काल के बाद नामवरसिंह में अतीत में जाने ,मृत मुद्दों में रमण करने और एकायामी ढ़ंग से पापुलिज्म के दबाब में ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक विषयों पर लिखने और बोलने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
    दुनिया में सभी मार्क्सवादी समीक्षकों ने अपने देश के पूजीवाद के चरित्र,स्वभाव और सांस्कृतिक-साहित्यिक प्रभावों के बारे में लिखा है,लेकिन नामवर सिंह संभवतः अकेले मार्क्सवादी हैं जो भारत के पूंजीवाद पर अपना कहीं पर भी समग्र मूल्यांकन व्यक्त नहीं करते वे सिर्फ प्रकारान्तर या किसी लेखक के बहाने से पूंजीवाद पर छोटी चलताऊ टिप्पणियां करके अपने वास्तविक सोच को छिपाए रखते हैं। उनका पूंजीवाद ,कल्याणकारी राज्य और परवर्ती पूंजीवाद के प्रति अनालोचनात्मक नजरिया गंभीर चिंता की चीज है,इसने एक खास किस्म की पूंजीवाद निरपेक्ष प्रगतिशील आलोचना को विकसित किया है जो इन दिनों खूब फलफूल रही है।
  स्त्री - नामवर सिंह के लेखन और व्याख्यानों में स्त्री तकरीबन गायब है और जो व्यक्त हुई है वह नकारात्मक और अवैज्ञानिक है। उनके इसी रूप को सामने लाने वाली एक टिप्पणी है ‘ मुक्त स्त्री की छद्म छबि’। यह टिप्पणी ‘जमाने से दो दो हाथ’ नामक संकलन में शामिल है। इस टिप्पणी का पहला वाक्य ही नामवर सिंह जैसे महापंडित के लिए अनुपयुक्त है। वैसे पूरी टिप्पणी उनके स्त्री संबंधी अवैज्ञानिक और पुंसवादी सोच का आदर्श नमूना है।
     नामवर सिंह ने लिखा है, ‘ स्त्री-पुरूष संबंधों पर हम तीन दायरों में विचार कर सकते हैं। कानून ,समाज और परिवार।’ वे भूल ही गए स्त्री-पुरूष संबंधों पर इन तीन के आधार पर नहीं ‘लिंग’ के आधार पर विचार विमर्श हुआ है। स्त्री-पुरूष का मूल्यांकन गैर-लिंगीय आधार पर करने से गलत निष्कर्ष निकलेंगे और गलत समझ बनेगी।
    कानून में स्त्री-पुरूष संबंधों को लेकर क्या लिखा है यह नामवर सिंह नहीं जानते अथवा जानबूझकर गलतबयानी कर रहे हैं,कानून में विवाह संबंधी प्रावधान हैं,लेकिन विवाह को कानून ने स्त्री-पुरूष संबंधों का मूलाधार नहीं बनाया है। भारतीय कानून लिंगीय समानता के आधार पर स्त्री-पुरूष संबंधों पर विचार करता है। न कि विवाह के आधार पर।
    भारतीय कानून लंबे समय तक स्त्री विरोधी प्रावधानों से भरा था लेकिन विगत 60 सालों में औरतों के संघर्ष ने उसमें स्त्री अधिकारों के प्रति जो असंतुलन था उसे कम किया है। उसके पुंसवादी रूझान को तोड़ा है।
      स्त्री-पुरूष संबंध का मतलब शादी का संबंध नहीं है। स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में नामवर सिंह की समझ बेहद सीमित है। वे इस टिप्पणी में स्त्री-पुरूष संबंधों को शादी के संबंध में रिड्यूज करके देखते हैं। शादी में भी बहुविवाह या अवैध विवाह में रिड्यूज करके स्त्री-पुरूष संबंध को कानूनी नजरिए से देखते हैं, वे बात शुरू करते हैं स्त्री-पुरूष संबंधों की और अचानक शिफ्ट कर जाते हैं विवाह,बहुविवाह,अवैध संबधों पर और उसमें भी निम्न-मध्यवर्गीय पुंसवादी नैतिकता के नजरिए को व्यक्त करते हैं ,विवाह के साथ ही औरतों के बारे में नामवर सिंह की टिप्पणियां पुंसवाद को अभिव्यक्त करती हैं।
    नामवर सिंह ने लिखा है ,‘यह तो मानना ही होगा कि समलैंगिकता एक अपवाद है, कोई प्रचलन नहीं। वह चाहे पुरूष पुरूष या स्त्री स्त्री के बीच हो,पर वह अप्राकृतिक है। साहित्य में इसे इसी रूप में आना चाहिए। कुछ अंग्रेजी लेखक पश्चिम के प्रभाव में इस अपवाद को ग्लोरिफाई करके सस्ती लोकप्रियता बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो मुझे स्त्रियों के अधिकारों को लेकर चल रहे आन्दोलनों का उद्देश्य समझ में नहीं आता। कहा जा रहा है कि स्त्रियाँ चूँकि अब कामकाजी हो गई हैं इसलिए वे उग्रता से अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं। पर मुझे कोई यह तो बताए कि स्त्रियाँ कब कामकाजी नहीं थीं। यह अलग बात है कि पहले वे घरों में काम करती थीं ,अब दफ्तरों में करने लगी हैं। पर घरों का काम क्या दफ्तरों के काम से कम था। इससे भी बड़ी बात यह कि क्या घरों में काम करते हुए उनके अधिकार कम थे।’( जमाने से दो दो हाथ,पृ.123)
    नामवरसिंह जैसे प्रगतिशील विद्वान की उपरोक्त टिप्पणी स्वयं में इस बात का प्रमाण है कि उन्हें सेक्स ,परिवार और स्त्री के बारे में कितना कम और कितना गलत पता है। वरना कोई व्यक्ति इस तरह की टिप्पणी कैसे कर सकता है ‘क्या घरों में काम करते हुए उनके अधिकार क्या कम थे।’
    सच यह है कि आज भी घरों में औरतों के साथ दोयम दर्जे से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। हमारे घरों में औरतें आज भी अधिकारहीन हैं। इस बात को नामवर सिंह जानते हैं। औरतों के पास आज की तुलना में पहले भी घरों में अधिकार शून्य के बराबर थे, यदि ऐसा न होता तो औरतों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष ही नहीं करना पड़ता। घर वस्तुतःऔरत का कैदखाना है।
    यदि नामवरसिंह के अनुसार औरतों के पास पहले अधिकार थे तो बताएं वह कौन सा जमाना था जब अधिकार थे ? औरत अधिकारहीन थी,असमानता की शिकार थी, और आज भी है। यही वजह है कि आधुनिककाल में औरत के अधिकारों ,महिला संगठनों और संघर्षों का जन्म हुआ।
   इसी तरह समलैंगिकता पर भी नामवर सिंह अवैज्ञानिक बातें कह रहे हैं। समलैंगिकता स्वाभाविक आनंद है,मित्रता है। यह वैज्ञानिक सच है कि समलैंगिकता अस्वाभाविक नहीं है। वरना इस्मत चुगताई ‘लिहाफ’ जैसी महान समलैंगिक कहानी न लिखतीं। हिन्दी में आशा सहाय ‘एकाकिनी’ जैसा महान समलैंगिक उपन्यास नहीं लिख पातीं।
      नामवर सिंह की महिला आंदोलन के बारे में भ्रांत धारणा है। उनका मानना है कि महिला आंदोलन का सामाजिक परिणाम है पति-पत्नी में तलाक। महिला आंदोलन पर चलताऊ ढ़ंग से नामवर सिंह ने लिखा है ‘ इन आंदोलनों की खास बात यह थी कि पुरूषों ने स्त्रियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। बाद में गांधी के असहयोग आन्दोलन और मार्क्सवाद से प्रेरित समाजवादी आन्दोलनों में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यहाँ एक बात और कहना चाहूँगा कि पश्चिमी समाज में ऐसे आंदोलनों के अन्ततः क्या परिणाम निकले ? वहाँ हमारे समाज से अधिक तलाक होते हैं। और खासकर  सम्बंधों के मामले में वहाँ स्त्रियों का हमारे समाज से कहीं अधिक शोषण होता है। साहित्य में ये सब बातें प्रतिबिम्बित होती रही हैं। भारतीय साहित्य में स्त्री को हमेशा ही एक सम्मानित दर्जा दिया गया है। पति-पत्नी की मर्यादा का सभी लेखक निर्वाह करते आए हैं। निजी जीवन में कैसी भी स्थिति हो परन्तु साहित्य में उन्होंने पत्नी की गरिमा का ध्यान रखा है।’ (उपरोक्त,पृ.123-124)
    नामवर सिंह के अनुसार महिला आंदोलन की परिणति क्या है ? तलाक। साथ ही वे महिला आंदोलन की स्वतंत्र भूमिका और विकास को नहीं देखते बल्कि मर्दों के संघर्ष का हिस्सा मानते हैं। सच यह है कि महिला आंदोलन का परिप्रेक्ष्य  और मर्दों के द्वारा संचालित नवजागरण और समाजवादी आंदोलन के परिप्रेक्ष्य और सवालों में बुनियादी फर्क है।
     दूसरी महत्वपूर्ण भूल यह है कि स्त्री का भारतीय परिवार में पश्चिम की तुलना में कम शोषण होता है। यह बात तथ्य और सत्य दोनों ही दृष्टियों से गलत है। इस बयान में भारतीय साहित्य में स्त्री के प्रति  जिस रवैय्ये की बात कही गयी है वह गलत है। भारतीय साहित्य की मूलधारा पुंसवादी है,वहां स्त्री का पुंसवादी परिप्रेक्ष्य में व्यापक चित्रण हुआ है। साहित्य में स्त्री साहित्य की भयानक उपेक्षा हुई है। स्त्री के पुंसवादी चित्रण जैसे पति-पत्नी की मर्यादा के पुंसवादी चित्रण को नामवरसिंह आदर्श चित्रण मानते हैं।  स्त्री के प्रति पुंसवादी नजरिए और स्त्री नजरिए में वे अंतर नहीं करते।
       फिल्मों से लेकर साहित्य तक स्त्री का जो चित्रण है उसे नामवर सिंह मनमाने ढ़ंग से पेश करते हैं ,गलत तर्क देते हैं और गलत निष्कर्ष निकालते हैं। वे औरत के सामयिक तेवर से परेशान हैं और उसे संयमित होने का उपदेश देते हैं। सवाल यह है कि क्या नामवर सिंह नहींजानते कि औरतें सैंकडों सालों से पुरूषों के आक्रामक तेवर की शिकार रही हैं।
    स्वयं नामवर सिंह की इतनी घृणित और आक्रामक स्त्री विरोधी टिप्पणी की हिन्दी जगत में कायदे से भर्त्सना होनी चाहिए थी लेकिन हुआ उलटा उसे  चार-पांच प्रकाशित प्रगतिशील संकलनों में शामिल किया गया । इससे हिन्दी में प्रचलित प्रगतिशील साहित्यकारों के प्रकाशनों में छायी पितृसत्तात्मक विचारधारा की मजबूत पकड़ को देखा जा सकता है।
     प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका ‘वसुधा’ ने भी इस टिप्पणी को छापा था, इससे यह भी पता चलता है कि मार्क्सवाद के नाम पर भारत में पितृसत्ता को बनाए रखने का वैचारिक और सांगठनिक तामझाम नग्नतम रूप में काम कर रहा है। यह टिप्पणी नामवर सिंह के पितृसत्तात्मक नजरिए का आदर्श उदाहरण है यह प्रगतिशील आलोचना के क्षय की भी सूचना है।
      अंत में, नामवर सिंह की आलोचना पद्धति पर उनके ही हवाले से कहना चाहता हूँ  कि नामवर सिंह ने आलोचना टुकड़ों में लिखी है। उन्होंने ‘छायावाद’ को छोड़कर किसी भी लेखक या आंदोलन पर समग्रता में नहीं लिखा है।
     उनका एक चर्चित व्याख्यान है ‘ ‘गोदान’ को फिर से पढ़ते हुए’ यह सन् 2009 में प्रकाशित हुआ है,यह उनके नजरिए का ताजा पैमाना है। इसमें नामवर सिंह ने प्रेमचंद के स्त्री और दलित समीक्षकों पर जो कहा है, वह उन पर भी लागू होता है,नामवर सिंह ने कहा है ‘‘ मैं पहली बात उनसे कहना चाहता हूँ कि जो लोग ‘गोदान’ में दलित विमर्श देखना चाहते हैं, और जो स्त्री विमर्श देखना चाहते हैं,ये देखना, ‘गोदान’ को टुकडे़ में देखना है और सम्पूर्ण की उपेक्षा करना है। ये मिथ्या चेतना और एक अर्थ में ऑडियोलॉजिकल दृष्टि है। प्रेमचंद में केवल दलित विमर्श ढूँढना और उसे गलत ठहराना या केवल स्त्री विमर्श ढूँढना ऐसा है जैसे अंधों का हाथी देखना। हाथी की पूँछ हाथ लगी तो कहा हाथी ऐसा ही होता है, यह ऑडियोलॉजिकल दृष्टि है। अर्द्धसत्य झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है। उसी तरह उतना ही खतरनाक होगा-प्रेमचंद को किसी एक दृष्टि से देखना।’’ ( प्रेमचंद और भारतीय समाज,पृ.174)
    आश्चर्य की बात यह है नामवर सिंह को प्रेमचंद को समग्रता में देखने का ज्ञान 2009 में हुआ। क्या नामवर सिंह जबाब देंगे कि उन्होंने प्रेमचंद पर टुकड़ों में विचार करते हुए अपने विचारों को 24 निबंधों में अलग-अलग क्यों व्यक्त किया ? उन्होंने प्रेमचंद पर समग्रता में विचार करते हुए एक किताब क्यों नहीं लिखी ? समग्रता में विचार करते हुए कोई निबंध क्यों नहीं लिखा ?
    यदि किसी एक दृष्टि का सहारा लेकर लिखना विचारधारात्मक दृष्टि है तो उनकी इन चार किताबों में शामिल निबंधों में विभिन्न विषयों पर लिखे और बोले जिस अर्द्धसत्य को स्वयं नामवर सिंह ने व्यक्त किया है क्या उसे भी खतरनाक मानें ?
     वे जबाब दें कि उनके स्त्री के बारे में व्यक्त विचार झूठ से भी ज्यादा खतरनाक हैं या नहीं ? हम चाहेंगे नामवर सिंह स्त्री पर लिखे अपने सबसे घृणिततम लेख में व्यक्त विचारों को सार्वजनिक तौर पर अस्वीकार करें   ।
        नामवर सिंह टुकडों में बोल-लिखकर समग्रता में मलाई खाते रहे हैं। क्या उनके प्रेमचंद पर व्यक्त विचारों को समग्रता में व्यक्त विचार मान लें ? क्या वे कह सकते हैं कि उन्होंने जो लिख दिया वह सम्पूर्ण है,अब भविष्य में प्रेमचंद पर नया सोचा ही नहीं जा सकता  ? यदि ऐसा होगा तो हम आलोचना से लौटकर काव्यशास्त्र की दुनिया में पहुँच जाएंगे। फिर व्याख्या और पुनर्व्याख्या का क्या होगा ?
     क्या मार्क्स ने समग्रता में पूंजी को देख लिया था ? क्या संचार क्रांति युग के परवर्ती पूंजीवाद का रूप उनके यहां है ? क्या मार्क्स के विचारों के आगे जाकर पूंजी की भूमिका को देखने की जरूरत है या नहीं ?
    नामवर सिंह ,रामविलास शर्मा, विजयदेवनारायण साही आदि के नजरिए से भिन्न नजरिए से किसी एक दृष्टि से प्रेमचंद को देखना यदि विचारधारा है तो फिर इन आलोचकों में से किसने समग्रता में प्रेंमचंद पर विचार किया है ? यदि समग्रता में विचार हो ही गया है तो फिर नामवर सिंह के व्याख्यान की क्या प्रासंगिकता है ? एक सवाल यह भी उठता है नामवर सिंह को अपना सारा लिखा और बोला प्रासंगिक क्यों लगता है ? क्या वे कार्ल मार्क्स ,जार्ज लूकाच आदि की अपने लिखे को अस्वीकार करने की परंपरा से कुछ सीख ले सकते हैं ? एक अच्छे मार्क्सवादी में अपने गलत विचारों के अस्वीकार का साहस होना चाहिए। नामवर सिंह अपने गलत विचारों से अपने को अलग क्यों नहीं करते ? वे संस्कृत के काव्यशास्त्रियों की तरह अपने लिखे को परम सुंदर और सही क्यों मानते हैं ? उनकी इन किताबों में बहुत सारा हिस्सा ऐसा है जो अधूरा और विभ्रमों से भरा है,अवधारणात्मक तौर पर गलत समझ से भरा है।    
     असल में नामवर सिंह स्त्री विमर्श और दलित विमर्श को अप्रासंगिक मानते हैं। नामवर सिंह बताएं कि औरतें और दलित क्या करें ? क्या वे अपने नजरिए का निर्माण न करें ? क्या स्त्री और दलित के नजरिए से समाज,साहित्य ,संस्कृति,राजनीति,अर्थनीति को न देखा जाए ? यदि नामवर सिंह का आशय यह है कि स्त्री और दलित नजरिए से चीजों को न देखा जाए तो यह तो वर्णाश्रम व्यवस्थापंथी दृष्टिकोण की शरण में वापसी होगी । यह साहित्य की शव साधना है। प्रेमचंद पर नामवरसिंह का 2009 का व्याख्यान प्रेमचंद को सिर के बल खड़ा करने की बुद्धि का आदर्श प्रमाण है।              











































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