रविवार, 11 सितंबर 2016

भाषा सीखना और भाषा जीना एक-दूसरे से भिन्न है

           महादेवी वर्मा पर लिखते समय हमेशा यह संकट रहता है कहां से लिखूँ।उनके विभिन्न किस्म के विचार उद्वेलित करते हैं।इधर फेसबुक-ब्लॉगिंग-मोबाइल आदि ने हम सबके संप्रेषण का मूलाधार बदल दिया है।नए दौर की समस्याएं अनेक मायनों में नई हैं।मसलन्,लेखन को ही लें,हम इन दिनों इतना लिख रहे हैं,इतना पहले कभी नहीं लिखते थे।हर व्यक्ति के लेखन की क्षमता में,भाषायी कम्युनिकेशन में कई गुना इजाफा हुआ है। इस तरह का लेखन या कम्युनिकेशन पहले कभी नहीं देखा गया,मोबाइल से लेकर फेसबुक तक भाषा का इतना व्यापक और बड़ी मात्रा में प्रयोग मनुष्य ने पहले कभी नहीं किया।

सवाल उठता है इतनी बड़ी मात्रा में भाषायी कम्युनिकेशन अंततःहमें अलगाव में क्यों रखे हुए है ॽ ऐसी भाषा क्यों लिख रहे हैं जिसमें प्राण नहीं होते ॽ संवेदनात्मकता नहीं होती ॽ कहा गया था हम संप्रेषण करेंगे तो संवेदनशीलता बढ़ेगी ,लेकिन यथार्थ में उलटा नजर आ रहा है।दावा था संवेदनशीलता के आधिक्य का लेकिन घटित एकदम उलटा हो रहा है।

संभवतः महादेवी वर्मा पहली हिन्दी लेखिका हैं जिन्होंने पूंजीवादी समाज में सबसे पहले इस आने वाले संकट को पहचाना था और रेखांकित किया कि हमारी त्रासदी का कारण है संवेदनशीलता का अभाव और भाषा से संवेदनशीलता का गायब हो जाना।



हम ऐसी भाषा बोल,लिख,सुन रहे हैं जिसमें शब्द हैं,लेकिन प्राण नहीं हैं,संवेदनाएं नहीं हैं।हमने भाषा के सवालों पर विचार करते समय तेरी भाषा,मेरी भाषा,हिन्दी भाषा,राष्ट्रीय भाषा ,जातीय भाषा आदि पर विचार किया लेकिन भाषा के दार्शनिक और संवेदनात्मक आधार से जुड़े सवालों को तिलांजलि दे दी।भाषा को प्रयोजनमूलक बना दिया।हिन्दी को प्रयोजनमूलक हिन्दी बना दिया।इससे भाषा के प्रति हमारे गंभीर सरोकारों और विमर्श का अंत हो गया। महादेवी ने लिखा है ´भाषा सीखना और भाषा जीना एक-दूसरे से भिन्न हैं तो आश्चर्य की बात नहीं।प्रत्येक भाषा अपने ज्ञान और भाव की समृद्धि के कारण ग्रहण योग्य है,परन्तु अपनी समग्र बौद्धिक और रागात्मक सत्ता के साथ जीना अपनी सांस्कृतिक भाषा के संदर्भ में ही सत्य है।´

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति ब्लॉग बुलेटिन - पुण्यतिथि ~ चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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  2. बुत ही सार्थक , बहुत ही गहरी बात क्योंकि आज तो हिन्दी हिन्दी-भाषी प्रान्तों में ही उपेक्षित हो रही है .भाषा विमर्श और सरोकारों की बात तो जाने कहाँ चली गई है पहले हिन्दी सही पढ़ना-लिखना व समझना ही दु्लभ होता जा रहा है.

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  3. बुत ही सार्थक , बहुत ही गहरी बात क्योंकि आज तो हिन्दी हिन्दी-भाषी प्रान्तों में ही उपेक्षित हो रही है .भाषा विमर्श और सरोकारों की बात तो जाने कहाँ चली गई है पहले हिन्दी सही पढ़ना-लिखना व समझना ही दु्लभ होता जा रहा है.

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