बुधवार, 7 सितंबर 2016

वल्गर मार्क्सवाद के खतरे

        वल्गर आलोचना और वल्गर मार्क्सवाद का गहरा संबंध है।यह संयोग की बात है कि जब मार्क्सवाद की वल्गर धारणाएं सामने आई हैं उसी दौर में सबसे ज्यादा वल्गर साहित्यालोचना भी लिखी गयी है।दोनों में एक चीज साझा है और वह है सत्य की वस्तुगत सत्ता का अस्वीकार।वे जगत और कलाओं के यांत्रिक और इच्छित चित्रण और इच्छित व्याख्या पर जोर देते हैं।इच्छित आलोचना संसार रचने के लिए अपने पक्ष में मनमाने और अप्रासंगिक उद्धरणों का उपयोग करते हैं जिससे यथार्थ को और भी आँखों से ओझल कर सकें।यह काम आलोचना बचाने और आलोचना संवारने के नाम पर करते हैं।इससे आलोचना संवरती नहीं है बल्कि पसर जाती है।

बेहतर आलोचक वह है जो आलोचना के सारवान सवालों को उठाए और उन पर केन्द्रित होकर बहस सृजित करे।बहस सृजित करने के लिए पुराने प्रचलित आलोचना के ढाँचे और साँचों से बाहर निकलने की जरूरत है।नया पाठक सीधे विषय पर केन्द्रित लेखन पढ़ना चाहता है ,वह आलोचना को आलोचना के रूप में देखना चाहता है।वह आलोचना और साहित्य के सुसंगत संबंध को देखना चाहता है।वह समस्या पर केन्द्रित विवाद देखना चाहता है।वह महाख्यान नहीं सुनना चाहता।वह हिमायत में दिए गए उद्धरणों को नहीं ,समस्या के विश्लेषण को देखना चाहता है।

आज के जमाने में इमेज,प्रक्रिया और ज्ञान के विकास से जुड़े पहलुओं पर केन्द्रित होकर विचार करने की जरूरत है।इस पक्ष की ओर सबसे पहले लेनिन ने ध्यान खींचा था।आप यदि विश्लेषण करते हुए इकतरफा ढ़ंग से विवेचन करते हैं तो भाववादी पद्धति के शिकार हो जाते हैं।चाहे आपका नजरिया कुछ भी हो।इकतरफा ढ़ंग से सोचने और लिखने की कला बुर्जुआ कला है,इसका मार्क्सवाद से कोई लेना-देना नहीं है।जब आप अपने विषय के प्रति अंधभाव से देखने और लिखने लगते हैं तो बुर्जुआ विचारधारा के नजरिए से देखने लगते हैं और संयोग की बात है अरूण माहेश्वरी की किताब ´आलोचना के कब्रिस्तान से´किताब में यह प्रवृत्ति ठोस रूप में अभिव्यक्त हुई है।

मैं यहां सिर्फ एक ही समस्या की ओर ध्यान खींचना चाहूँगा। अरूण माहेश्वरी की ´अध्यापकीय शैली´ और ´अध्यापकीय आलोचना´की अपने लेखों में कई जगह तीखी आलोचना की है और उसकी व्यर्थता की ओर ध्यान खींचा है।यह सच है साहित्यालोचना का एक अंश ऐसा भी है जिसमें अस्वीकार करने लायक बहुत कुछ है लेकिन हिन्दी के संदर्भ में यह भी सच्चाई है कि आलोचना का अधिकांश हिस्सा वही है जिसे अध्यापकों ने ही लिखा है।खासकर प्रगतिशील और उदार आलोचना के निर्माण में अध्यापकों की बहुत बड़ी भूमिका रही है।

हिन्दी आलोचना का सबसे मूल्यवान वही है जो अध्यापकों ने लिखा है।इतिहास से लेकर आलोचना तक इन अध्यापकों का लेखन फैला हुआ है।मैं अरूण माहेश्वरी के नजरिए का एक नमूना देना चाहूँगा। लिखा है ´जहां तक शुक्लजी का संबंध है,उनकी इतिहास-दृष्टि के साथ कोई निश्चित विश्व-दृष्टि जुड़ी हुई थी,यह दावा तो उनके बड़े से बड़े प्रशंसक भी नहीं करते।´यह निष्कर्ष तथ्य और सत्य से कहीं से भी मेल नहीं खाता।इसी तरह रामविलास शर्मा,नंददुलारे बाजपेयी आदि के बारे में भी अरूण माहेश्वरी ने आत्मगत निष्कर्ष निकाले हैं। आलोचना का यह तरीका स्वयं में समस्यामूलक है,इससे यह पता चलता है आलोचना की किसी भी पद्धति और परिप्रेक्ष्य में अरूण माहेश्वरी की कोई दिलचस्पी नहीं है।साहित्य समीक्षा को बिना किसी आलोचना पद्धति के सहारे लिखने के कारण इस तरह के मनमाने निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

मैं पहले अरूण माहेश्वरी की किताब पर लिखने से बच रहा था लेकिन उसने जिस तरह प्रतिवाद में लिखा है उसने मजबूर कर दिया है कि उसकी उठाई समस्याओं पर वस्तुगत ढ़ंग से बात की जाय।पहली बात यह कि भारत में नवजागरण जैसी कोई परिघटना घटित नहीं हुई है।इसलिए नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन करने से बचना चाहिए।कम से कम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर प्रेमचंद तक निराला से लेकर य़शपाल तक के लेखन में कहीं पर भी नवजागरण पदबंध नहीं आता।इनमें से कोई भी लेखक नवजागरण पदबंध का प्रयोग नहीं करता।यहां तक कि बंगाल –महाराष्ट्र के राष्ट्रीय जागरण को नवजागरण नहीं कहा जा सकता,इसमें यूरोप नवजागरण से मिलते-जुलते न तो तत्व हैं और न परिस्थितियां ही हैं। भारत में नवजागरण आलोचकों की इच्छित कल्पना का परिणाम है,इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।

मार्क्सवाद के नजरिए से यथार्थ की वस्तुगत सत्ता और उसकी साहित्यिक अभिव्यंजना का मूल्यांकन होना चाहिए। न कि इच्छित धारणा और चुनिंदा यथार्थ के बीच के संबंध का। अभी भी साहित्यालोचना में अनंत अनसुलझी समस्याएं पड़ी हुई हैं। दिलचस्प बात यह है 19वीं शताब्दी के विमर्श के जरिए हम बहुत कुछ नया जान पाए हैं लेकिन अभी भी बहुत बड़ा यथार्थ ऐसा है जिसे हमने कभी जानने या उद्घाटित करने की कोशिश नहीं की है।यही दशा मध्यकालीन समाज की है।

मार्क्सवादी आलोचक की चिन्ताएं दो स्तरों पर काम करती हैं,पहला,जो मूल्यांकन किया गया है वह उसके सारवान अंशों को ग्रहण करता है ,दूसरा,यथार्थ के अदृश्य पहलुओं को सामने लाता है।अरूण माहेश्वरी सिर्फ अपनी आलोचना में आलोचकों ने जो लिखा है उसको अस्वीकार करने और खारिज करने में ही सारी शक्ति लगा देते हैं।इस तरह के लेखन का मार्क्सवाद से कोई संबंध नहीं है।

19वीं शताब्दी का राष्ट्रीय जागरण सार्वभौम परिघटनाओं और संवृत्तियों को अपने अंदर समेटे हुए है। उसमें सार्वभौम अंतर्विरोध भी हैं।उसका जितना महत्व है,उसके अंतर्विरोधों का भी उतना ही महत्व है।उसके मिश्रित और शुद्ध रूपों का भी महत्व है।यहां तक कि उसके अधूरेपन का भी महत्व है।हमें उसके विकास के सामाजिक गति के नियमों की खोज करनी चाहिए।हमें यह काम करते समय मूल्य-निर्णय करने,खारिज करने,तिरस्कार करने आदि से बचना चाहिए।अफसोस है कि अरूण माहेश्वरी की उक्त किताब में यह चीज हर निबंध में है।

हमारे लिए फिनोमिना महत्वपूर्ण है,आलोचक नहीं।हमारे लिए समस्या महत्वपूर्ण है आलोचक महत्वपूर्ण नहीं है,उसका पेशा महत्वपूर्ण नहीं है।आलोचना की प्रत्येक पद्धति में अधूरापन है,उसकी सीमाएं,इसके बावजूद उसमें से ही नई संभावनाओं के द्वार खुलते हैं।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,रामविलास शर्मा,हजारी प्रसाद द्विवेदी,मुक्तिबोध,नामवर सिंह के लेखन की सीमाएं हैं,उनके मूल्यांकन में बहुत कुछ ऐसा है जो छूट गया लगता है लेकिन बात वहीं से शुरू होनी चाहिए।वल्गर मार्क्सवाद इस सबको देख ही नहीं पाता।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी मूल चिंता से पूरी तरह सहमत हूँ। आलोचना वैचारिक अराजकता का दूसरा नाम नहीं है। मुक्तिबोध ने तो बहुत पहले चेताया था कि वैचारिक अराजकता पूंजीवाद की ही परिचारिका होती है। मैं जानता हूँ मैं साहित्य के न तीन में हूँ न तेरह में। फिर भी अनधिकृत ही सही, इसे लेकर परेशान तो रहता ही हूँ और मेरी टिप्पणी को मेेरे अज्ञान से नहीं, मेरी परेशानी से जोड़कर ही समझा जा सकता है।

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