गुरुवार, 8 सितंबर 2016

´नवजागरण´ कहना एक फैशन है

           हमारे हिन्दी आलोचकों में ´´नवजागरण” या ´रैनेसां´ पदबंध और उसके आधार पर परिप्रेक्ष्य बनाकर आलोचना लिखने का जबर्दस्त आकर्षण है।भारत में ´रैनेसां´ हुआ है यह सभी हिन्दी आलोचक मानकर चलते हैं,अनेक हैं जो यह मानकर चलते हैं कि हिन्दी में बंगला की तरह नवजागरण हुआ है। मोटे तौर पर ´रैनेसां´ या ´नवजागरण´ का दौर 1814 से आरंभ होता है और 1919 प्रथम असहयोग आंदोलन तक रहता है। यानी राजा राममोहन राय के 1814 में कलकता में आकर रहने से लेकर महात्मा गांधी के राजनीतिक क्षितिज में छा जाने के दौर को नवजागरण कहते हैं। सवाल यह है क्या महान् विभूतियों के पदार्पण या राजनीतिक आंदोलन विशेष को ´नवजागरण´का आधार बनाकर देखना सही होगा ॽ क्या ´नवजागरण´ के चरित्र को इससे समझने में बुनियादी तौर पर मदद मिलेगी ॽ

´नवजागरण´के प्रसंग में सबसे सटीक सवाल तो सुशोभन सरकार ने ही उठाए हैं।उन्होंने ´रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा बंगाल का नवजागरण´ निबंध में ये सवाल उठाए हैं,यह 1961 में लिखा निबंध है, उन्होंने लिखा है ´बंगाल की 19वीं शताब्दी की सचेतनता को नवजागरण कहना आजकल फैशन सा हो गया है जिसे पिछले दो दशकों में विशेष लोकप्रियता प्राप्त हुई है।अतः15वीं तथा 16वीं शताब्दियों के यूरोपीय नवजागरण से इसकी तुलना करना आवश्यक सा है।´ इस उद्धरण में ´फैशन´शब्द बहुत ही अर्थपूर्ण है। इसके बात वे लिखते हैं ´सचमुच दोनों में पर्याप्त भिन्नता है।सर्वप्रथम तो यह कि मूल नवजागरण से आया विचार-स्वातन्त्र्य उस युगान्तरकारी बहुमुखी पुनरूत्थान का एक पहलू था जिसमें यूरोप द्वारा दुनिया की खोज की गई,धर्म के क्षेत्र में भारी क्रांति आई,आधुनिक विज्ञान की नींव पड़ी,केन्द्रीकृत राज्यों का उदय हुआ,प्राचीन सामाजिक पद्धति विघटित हुई तथा व्यापार,उद्योग और कृषि पद्धतियों का पुनर्गठन हुआ।किंतु हमारे नवजागरण में उस प्रचंड प्रवाह या निहित शक्ति का दावा नहीं किया जा सकता।भारत में अंग्रेजी शासन ने प्राचीन व्यवस्था नष्ट करने का मार्ग प्रशस्त किया,किंतु न तो उसमें इतनी शक्ति थी और न उनका यह विचार ही था कि उस व्यवस्था के स्थान पर नए समाज की रचना हो।उदासीन एवं निष्क्रिय देशवासियों की तुलनात्मक दृष्टि से,इस प्रकार की पहल-शक्ति और उद्देश्य-दृढ़ता का सर्वथा अभाव था।´ इसके अलावा हमारे समाज में औपनिवेशिक गुलामी आई, निरूद्योगीकरण हुआ।यूरोप में आधुनिक पूंजीपतिवर्ग पैदा हुआ,वैसा आधुनिक पूंजीपतिवर्ग भारत में पैदा नहीं हुआ।यूरोप में औद्योगिक शहरों का जन्म हुआ,नई शहरी संरचनाओं का जन्म हुआ जिसमें पुराने किस्म की शहरी बसावट को नष्ट कर दिया गया।इसके विपरीत कोलकाता की पुरानी बसावट ज्यों की त्यों बनी रही।

सुशोभन सरकार ने यह भी लिखा ´अतः यह स्पष्ट है कि परिस्थितियों के कारण,यूरोपीय नवजागरण की तुलना में,बंगाल का नवजागरण सीमित,आंशिक तथा कुछ हद तक कृत्रिम है।किंतु इसका यह अभिप्राय नहीं कि हमारे जागरण का ऐतिहासिक महत्व नगण्य है।´ उन्होंने सही लिखा है ´बंगाल के जागरण की अनुचित प्रशंसा अथवा उसकी तिरस्कारपूर्ण अवहेलना दोनों ही ऐतिहासिक वस्तुपरकता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।´

सुशोभन सरकार के नजरिए से यह बात साफ है ´नवजागरण´ पदबंध की किस तरह ´फैशन´की तरह 1940 के बाद भारतीय विमर्श में दाखिल होता है।यही वह दौर है जब पहलीबार हिन्दी में राहुल सांकृत्यायन ´नवजागरण´ पदबंध का इस्तेमाल करते हैं,बाद में रामविलास शर्मा आदि इस्तेमाल करते हैं । इनमें से अनेक ने 1857 को नवजागरण का प्रस्थान बिंदु माना।कुछ ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के आगमन को ´नवजागरण´ नाम दे दिया।सवाल यह है इस युग को ´नवजागरण´ कहें या ´जागरण´ या ´राष्ट्रीय जागरण कहें ॽ मेरे ख्याल से ´राष्ट्रीय जागरण´ या ´जागरण´ कहना समीचीन होगा।



दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि क्या साहित्येतिहास के लिए ´नवजागरण´ नामकरण सही होगा ॽ इस युग की सामग्री के आधार पर कोई साहित्यिक नामकरण क्यों नहीं किया गया ॽ क्या सामाजिक इतिहास लेखन में प्रयुक्त नाम को साहित्येतिहास में आधार बनाना सही होगा ॽ ऐसा करना भी सही नहीं होगा। स्वयं शिशिर कुमार दास ने ´ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर´(1991)नामक दो खंडों में लिखे विशाल ग्रंथ में रैनेसां या नवजागरण नामकरण का कहीं पर भी उपयोग नहीं किया है,उलटे उन्होंने नवजागरण के नाम के उपयोग को लेकर सवाल उठाए हैं।18वीं सदी के बाद किस तरह के परिवर्तन हुए हैं उन परिवर्तनों को शिशिर कुमार दास ने विश्लेषित किया है। मूल बात यह कि ´नवजागरण´या ´रैनेसां´ पदबंध का प्रयोग लेखन की सुविधा के लिए होता रहा है।इसके साथ वे कारक कहीं पर भी नहीं दिखते जो यूरोप में थे।

1 टिप्पणी:

  1. सर, एक परिघटना देश-काल विभेद से अलग-अलग रूपों में संभव होती ही है। इसलिए मुझे लगता है कि नवजागरण पद को एकदम यूरोपीय संदर्भ में रूढ़ कर देना बहुत उचित नहीं है।

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