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बुधवार, 20 जुलाई 2016

मेरे साइबर शत्रु

       कुछ दिन पहले एक पुराने शत्रु से मुलाकात हुई,देखते ही मैंने पूछा कैसे हो,गुस्से में बोले ठीक हूं,मैंने कहा कम से कम यह बात तो हंसकर कह दो,बोले तुम्हारी शक्ल देखते ही घृणा होती है,मैंने कहा शक्ल नहीं चरण देखो,घुटना देखो,शक्ल ही क्यों देखते हो ,बोले ,पता नहीं क्यों बार -बार तुम्हारे चेहरे पर ही नजर जाकर टिक जाती है,मैंने कहा तो मन लगाकर चेहरा देखो,बोले फेसबुक में यही करता रहता हूँ,तुम्हारी वॉल पर जाता हूँ और निहारता रहता हूँ,कुछ फोटो भी प्रिंट करा लिए हैं, मैं सब समय तुम्हारे बारे में बुरा सोचता हूँ लेकिन तुम्हारी शक्ल भूल नहीं पाता ,मैंने कहा चलो चाय पी लेते हैं,फिर बढ़िया पान खाते हैं,वे बोले तुम्हारे साथ अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा,तुम शैतान हो,कमीने हो,मैंने कहा सब सुनूँगा लेकिन यह बताओ क्या पीछे से फेसबुक फोटो को भी गालियां देते हो,बोले नहीं,वहां मेरी आवाज ही नहीं निकलती,बल्कि नींद आ जाती है।मैंने कहा तुम बहुत भले हो।आनंद लो फेसबुक में ही मिलते हैं,वहीं वर्चुअल चाय पिलाएंगे,एक कप तुम्हारा होगा और दूसरा कप हमारा होगा।

फेसबुक का मजा यह है कि इसमें दुश्मन को खोजकर पढ़ते हैं,दुश्मन की खबर रखते हैं,उसके विचारों को सहेजकर रखते हैं,जो बेगाने हैं ,वे बेगाने रहते हैं लेकिन मिलते हैं,छुपकर पढ़ते हैं,गजब मजा है,जिसकी शक्ल देखनी पसंद नहीं है उसकी वॉल पर रोज जा रहे हैं,जिसको गाली देते हैं,उसको रोज पढ़ रहे हैं।फेसबुक बंधनहीन आदत है।



शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

इंटरनेट स्वाधीनता हनन का श्रीगणेश

अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला किया है इसके दूरगामी परिणाम होंगे। उल्लेखनीय है राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में इंटरनेट स्वतंत्रता का वायदा किया था और नेट तटस्थता की वकालत भी की थी,लेकिन हाल ही में जो फैसला आया है वह ओबामा के बदले हुए मिजाज और वायदाखिलाफी को दरशा रहा है ।

ओबामा प्रशासन ने कारपोरेट घरानों के सामने सीधे समर्पण कर दिया है। इस फैसले में ब्रॉडबैंड यूजरों और मोबाइल इंटरनेट यूजरों में भेदभाव रखा गया है। दूसरा भेदभाव यह है कि इंटरनेट की बेहतर सुविधाएं उनके लिए होंगी जो ज्यादा भुगतान करने की स्थिति में होंगे। जो विशेष साइट देखना चाहते हैं। फलतः इंटरनेट में दो तरह के यूजर हो जाएंगे त्वरित सेवा पाने वाले यूजर और धीमी गति से सेवा पाने यूजर, ज्यादा सूचना पाने वाले यूजर और कम सूचना पाने वाले यूजर। तेजगति की लाइन वाले यूजर और धीमी गति की लाइन वाले यूजर। यह बुनियादी तौर पर सूचना समृद्ध और सूचना दरिद्र की पहले से मौजूद खाई को और भी चौड़ा करेगा।
     एफसीसी का फैसला 3-2 के आधार पर आया है। इस फैसले से संचार कंपनियों की मनमानी बढ़ेगी। इंटरनेट स्वतंत्रता का सरकारी नियमन और कारपोरेट नियमन बढ़ जाएगा। अब संचार कंपनियों के रहमोकरम पर वेबसाइट रहेंगी। संचार कंपनियां जब चाहें जिस किसी भी वेबसाइट को खत्म कर सकेंगी। बंद कर सकेंगी। अभी जैसे हमें सभी किस्म के नेटवर्क में जाने की स्वतंत्रता है,लेकिन यदि यह निर्णय लागू हो जाता है तो यह स्वतंत्रता नहीं होगी। मसलन आप वेरीजॉन कंपनी के सर्वर की सेवाएं लेते हैं तो और अपने यहां गूगल का नक्शा देना चाहते हैं तो वेरीजॉन कंपनी आपको रोक सकती है। आपसे गूगल का नक्शा इस्तेमाल करने के लिए पैसा मांग सकती है क्योंकि आप उसकी सेवाओं के तहत ऐसा कर रहे हैं। कोई मोबाइल कंपनी आपको किसी भी कैम्पेन विशेष की सामग्री डाउनलोड करने से रोक सकती है,किसी भी प्रचार को रोक सकती है।




गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

आओ राजनीति करें -विकीलीक और सीआईए के मुख्यालय पास-पास

          ( ए- विकीलीक का मुख्यालय, बी- सीआईए का मुख्यालय)
    विकीलीक और अमेरिकीतंत्र की तथाकथित टकराहट अब एक नयी मंजिल पर पहुँच गयी है। जो लोग रात-दिन विकीलीक में अमेरिकी विरोध और साम्राज्यवाद विरोध की गंध लेते रहे हैं उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि विकीलीक ने विगत शुक्रवार से अपना अमेरिकी ऑफिस चालू कर दिया है। विकीलीक का पहले सारा कारोबार Silicon Valley Web Hosting  के जरिए हो रहा था लेकिन अब ServInt के जरिए हो रहा है। तब से अमेरिका का कोई नया खुलासा सामने नहीं आया है। कुछ अर्सा पहले विकीलीक ने अमेरिका से अपना सारा ऑपरेशन समेटकर अन्यत्र स्थानान्तरित कर दिया था। पहले विकीलीक के सारे मेल रीडायरेक्ट करके रूस भेज दिए जा रहे थे। लेकिन विगत शुक्रवार से विकीलीक ने अपना अमेरिका स्थित मुख्यालय चालू कर दिया है। अमॉजान ने जब विकीलीक के लिए वेब सुविधा देने से मना कर दिया तो विकीलीक के समस्त वेबतंत्र को यूरोप में नए स्थान पर रीडायरेक्ट किया गया । उसके लिए एक ऐसी नेट व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया जिसमें उसका आईपी एड्रेस पता न चले। यह पद्धति इसलिए अपनायी गयी जिससे उस कंपनी को अमेरिकी हमलों से बचाया जाए। अमेरिका का सारी दुनिया की कंपनियों पर दबाब है कि कोई भी देशी-विदेशी कंपनी विकीलीक की मदद न करे। इस तरह की अपील अमेरिकी सीनेट की गृहसुरक्षा कमेटी के जे.लीवरमेन ने जारी की है। लीवरमैन ने कहा - "No responsible company – whether American or foreign – should assist Wikileaks in its efforts to disseminate these stolen materials."
    अब नए सिरे से विकीलीक  वेबसाइट के मुख्यालय को सीआईए के मुख्यालय के पास ले आया गया है।उल्लेखनीय है सीआईए का मुख्यालय और  ServInt  का ऑफिस चंद कदमों की दूरी पर हैं। इन दोनों के ऑफिस पास होने के पीछे भी क्या कोई राजनीति भी हो सकती है ?  विकीलीक ने सीआईए से कहा है उसके ऊपर वह जासूसी करना बंद करे। दूसरी ओर अमेरिकी प्रशासन ने कंपनियों पर दबाब डालना आरंभ किया है कि वे विकीलीक की किसी तरह की मदद न करें। साथ ही वे अपने कर्मचारियों को कहें कि वे विकीलीक न पढ़ें।            










रविवार, 19 दिसंबर 2010

विकीलीक प्रमुख जूलियन असांजे निर्दोष है

           विकीलीक के रहस्योदघाटन के बाद से ओबामा प्रशासन विकीलीक के खिलाफ बहुस्तरीय आक्रामक मुद्रा में सामने आया है। इस एक्सपोजर को वे सहज रूप में नहीं ले रहे हैं। ओबामा प्रशासन ने इस रहस्योदघाटन की निंदा की है। वे जूलियन असांजे के खिलाफ जासूसी कानून का इस्तेमाल करने की धमकी दे रहे हैं। विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने तो असांजे को अपराधी तक कहा है। यह भी कहा है कि यह अमेरिकी विदेश नीति पर हमला है। विकीलीक को बहाना बनाकर डोमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों ही दल इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी को नियंत्रित करने के लिए जल्दी से नया कानून बनाने की मांग कर रहे हैं।
   विकीलीक के रहस्योदघाटन से यह बात भी साफ हो गयी है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने चुनाव के दौरान इराक-अफगानिस्तान युद्धविरोध का जो वायदा किया था वह सफेद झूठ था। कायदे से ओबामा प्रशासन को असांजे की मदद करना चाहिए थी और उसके एक्सपोजर का स्वागत करना चाहिए था। लेकिन ओबामा प्रशासन ने एकदम उलटा रास्ता पकड़ा है। ओबामा प्रशासन विकीलीक एक्सपोजर के बहाने इंटरनेट स्वतंत्रता को ही खत्म कर देना चाहता है। वे अपनी नीतियों की असफलताओं के बारे में आत्मालोचना नहीं कर रहे बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ही खत्म कर देना चाहते हैं।
   कायदे से ओबामा प्रशासन को इस बात को बताना चाहिए कि आखिरकार इतने बड़े पैमाने पर पेंटागन,सीआईए और विदेश विभाग के दस्तावेज,केबल आदि को विकीलीक ने कैसे हासिल किया ? अमेरिका के इतने विशाल सुरक्षा तंत्र को विकीलीक की टीम भेदने में कैसे सफल रही ? इस एक्सपोजर ने अमेरिकी विदेश नीति के सभी दावों को गलत साबित किया है। खासकर इराक और अफगानिस्तान में जो कुछ चल रहा है और जिस भयावह तरीके से हो रहा है, उससे अमेरिकी मंशाओं और दावों की पोल खुल गयी है। विकीलीक के एक्सपोजर ने यह भी बताया है कि विभिन्न देशों में अमेरिका के दूतावास बुनियादी तौर पर संबंधित देश में जासूसी और राजनीतिक हस्तक्षेप का काम कर रहे हैं। एक ही वाक्य में कहें तो अमेरिका के दूतावास जासूसी के केन्द्र बन गए हैं।
    विकीलीक के एक्सपोजर के बारे में दक्षिणपंथी विचारकों ने तो यहां तक कहा है कि जूलियन असांजे की हत्या कर देनी चाहिए। इसके लिए जरूरी हो तो माफिया गिरोहों की मदद ली जाए,ड्रोन विमान से हमले किए जाएं या किसी भी तरह असांजे को उठा लिया जाए।
     विकीलीक के एक्सपोजर के बारे में यह बात कह सकते हैं कि इसमें मिथ्या कुछ भी नहीं है ये दस्तावेजी सबूत हैं। इन्हें गॉसिप कहकर खारिज नहीं कर सकते। ये किसी पत्रकार की कलम की उपज नहीं हैं ,ये दस्तावेज हैं ,ये पत्रकारिता की कच्ची सामग्री हैं,ये अमेरिकी विदेश नीति के आधिकारिक दस्तावेज हैं। विश्वप्रसिद्ध विद्वान नॉम चोम्स्की ने कहा है कि इन दस्तावेजों से यह पता चलता है कि अमेरिकी प्रशासन में लोकतंत्र के प्रति कितनी गहरी घृणा भरी हुई है।साथ ही अमेरिकी विदेशसेवा -हिलेरी क्लिंटन से लेकर अदने अफसर तक- में जो लोग काम कर रहे हैं उनमें लोकतंत्र के प्रति कितनी घृणा भरी हुई है। जो लोग जूलियन असांजे का विरोध कर रहे हैं वे असल में लोकतंत्र के प्रति अपनी घृणा का ही इजहार कर रहे हैं। लोकतंत्रविरोधी घृणा को असांज की ओर मोड़ दिया गया है।
    उल्लेखनीय है  कारपोरेट मीडिया अहर्निश लोकतंत्र विरोधी प्रचार कर रहा है और उसे वे सारी चीजें नापसंद हैं जो लेकतंत्र के पक्ष में हों। विकीलीक का एक्सपोजर लोकतंत्र की महानसेवा है और यही वह बुनियादी बिंदु है जहां पर हमें इसके खिलाफ शस्त्र उद्योग, मीडियाविशेषज्ञों और अमेरिकी प्रशासन के बीच गहरी सांठगांठ साफ नजर आती है। भारत में भी कारपोरेट मीडिया उन नेताओं और बाहुबलियों का महिमामंडन करता रहता है जो आए दिन अपराध करते हैं,विभिन्न किस्म के हिंसाचार में शामिल रहे हैं।
      विकीलीक के एक्सपोजर ने यह तथ्य रेखांकित किया है कि हमें लोकतंत्र के विकास के लिए जूलियन असांजे जैसे असंख्य लोगों की जरूरत है जो लोकतंत्र की आड़ में चल रहे लोकतंत्रविरोधी समूचे तंत्र को निरंतर नंगा करते रहें। इससे अबाध सूचनाओं का प्रसार होगा। अभिव्यक्ति की आजादी का विस्तार होगा। लोकतंत्र में पारदर्शिता,खुलापन और सत्ता के खिलाफ बोलने की हिम्मत पैदा होगी।
    उल्लेखनीय है सन् 1971 में जब पहलीबार वियतनाम युद्ध के दस्तावेज मीडिया में प्रसिद्ध पत्रकार डेनियल एल्सबर्ग ने प्रकाशित किए थे तो उस समय अमेरिकी प्रशासन ने उसे गद्दार,देशद्रोही आदि तक कहा था। विकीलीक के प्रकाशन पर डेनियल ने कहा है उस समय मुझे गद्दार ही नहीं बल्कि आतंकवादी तक कहा गया था। आज जो लोग जूलियन असांज को निशाना बना रहे हैं औऱ आतंकवादी बता रहे हैं, मैं इस संदर्भ में यही कहना चाहता हूँ कि असांज आतंकवादी नहीं है।
    असांज पर अमेरिकी प्रशासन जासूसी एक्ट के तहत कार्रवाई करने की सोच रहा है, साथ ही अन्य कानूनों के तहत उसे कैसे फंसाया जा सकता है उस पर भी ओबामा प्रशासन के अधिकारी तैयारी कर रहे हैं। इसी बीच में ‘हाउस जुडीशियरी कमेटी’ के सदर ने कहा है कि जूलियन असांजे ने गुप्त दस्तावेजी खुलासा करके जासूसी कानून का उल्लंघन नहीं किया है। सदर जॉन कॉनवेयर्स  ने विकीलीक के प्रसंग में चल रही सुनवाई के प्रसंग में कहा कि अमेरिका में वक्तृता परम पवित्र है। उन्होंने उन तमाम मांगों को खारिज कर दिया जिनमें विकीलीक के दस्तावेजों के मीडिया में प्रकाशन पर पाबंदी लगाने की मांग की गयी थी।
    उल्लेखनीय है ओबामा प्रशान विकीलीक के प्रधान संपादक जूलियन असांजे पर जासूसी एक्ट के तहत कार्रवाई करने की मांग कर रहा ता। जॉन ने कहा कि अभी यह मामला आरंभिक अवस्था में है और विकीलीक अलोकप्रिय भी है। अनेक लोग सोच रहे हैं कि विकीलीक ऑफेंसिव है। जॉन ने कहा कि अलोकप्रियता कोई अपराध नहीं है। इसी तरह  ऑफेसिव चीजें छापना भी अपराध नहीं है। अनेक राजनेताओं,पत्रकारों और विशेषज्ञों ने मुझे बार बार फोन करके उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने की मांग की इससे मुझे असुविधा हुई है। जॉन कॉनवेयर्स ने कहा "And so whatever you think about this controversy, it is clear that prosecuting Wikileaks would raise the most fundamental questions about freedom of speech, about who is a journalist, and about what the public can know about the actions of its own government," आगे कहा "But let us not be hasty, and let us not legislate in a climate of fear or prejudice,"
   उल्लेखनीय है अमेरिका के कारपोरेट मीडिया और दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सीनेटरों ने विकीलीक के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। ये लोग इस तरह के एक्सपोजर को रोकने के लिए नए कानून बनाने की मांग भी कर रहे हैं। इस पर सदर जॉन कॉनवेयर्स ने आगे कहा ‘‘For, in such an atmosphere, it is our constitutional freedoms and our cherished civil rights that are the first to be sacrificed in the false service of our national security."





शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

फेसबुक पर इमेजों में टैग और जासूसी

       फेसबुक के मालिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिसके तहत यूजर इमेज को कम्प्यूटर पहचान लेगा और उस पर टैग भी लगा देगा। अभी इस तकनीक का प्रयोग अमेरिका में किया जाएगा। फेसबुक के अनुसार अभी वह प्रतिदिन दस करोड़ फोटो पर टैग लगाने का काम कर रहा है। फेस रिकॉगिनीशन प्रोसेस के नाम से यह प्रक्रिया फेसबुक ने आरंभ की है। इस प्रक्रिया का निहितार्थ यह भी है कि फेसबुक पर नकली फोटो के साथ भ्रमण करना अब खतरे से खाली नहीं होगा। प्रत्येक इमेज पर टैग होगा। जब इमेज के साथ कोई टैग लगी है तो आप सहज ही उससे अपने को विच्छिन्न नहीं कर पाएंगे। यह काम फेसबुक का सिस्टम स्वचालित ढ़ंग से करेगा। मसलन मेरे नाम के साथ अगर कोई टैग तय हो चुका है तो फिर उसका कोई अन्य दुरूपयोग नहीं कर पाएगा। आप जो भी इमेज पोस्ट करेंगे उसकी टैग दिखाई जाएगी,आप चाहें तो अपनी टैग में रद्दोबदल कर सकते हैं, लेकिन बिना टैग के अब फेसबुक पर कोई इमेज नहीं होगी। इससे फेसबुक पर नजरदारी बढ़ जाएगी। संबंधित टैग से जुड़ी सूचनाएं स्वतः एक जगह संचित होती जाएंगी।  







मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

इंटरनेट स्वतंत्रता खतरे में

     अब हम संचार क्रांति के अंतिम चरण में दाखिल हो चुके हैं। कम्प्यूटर-इंटरनेट और उपग्रह संचार ने जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जन्म दिया था उसके साथ सत्ता और खासकर अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ टकराव घनीभूत होता जा रहा है। इंटरनेट और सत्ता के अन्तर्विरोधों को नियंत्रित करने के लिए ही इन दिनों साइबर निगरानी पर तेजी से काम हो रहा है,इस तरह के साइबर कानूनों को बनाया जा रहा है जिससे इंटरनेट पर मुक्त अभिव्यक्ति को बाधित किया जाए। इस काम में इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनियां चौकीदार की भूमिका अदा कर रही हैं। वे रीयलटाइम में ऑनलाइन पर आने वाले लाखों संदेशों को विश्लेषित करके साथ ही साथ सत्ताकेन्द्रों को संप्रेषित कर रहे हैं। पहले किसी को यह समझ में नहीं आया था कि इंटरनेट को कैसे नियंत्रित किया जाएगा लेकिन बाद में इसका भी रास्ता निकाल लिया गया और अब इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनी ही यूजर पर निगरानी करने लगी हैं। सभी इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनियां पेंटागन और सीआईए के सामने समर्पण कर चुकी हैं। अमेरिका किस तरह की दादागिरी कर रहा है इसे सहज ही विकीलीक मामले में अमाजॉन कंपनी के बदले रूख से समझ सकते हैं। अमाजॉन कंपनी ने विकीलीक को अपनी सेवाएं देनी बंद कर दी हैं और कहा है विकीलीक ने समझौते के नियमों को तोड़ा है।
    अब निगरानी का एक नया फार्मूला इजाद किया गया है,नये फार्मूले के अनुसार गुमनाम टिप्पणी लिखना अपराध घोषित होने जा रहा है। अमेरिकी प्रशासन यह चाहता है कि इंटरनेट पर सही नाम से लिखा जाए। ऑनलाइन गुमनामी को खत्म करने के साथ ही इंटरनेट कंपनियों ने एक नया सिस्टम इजाद किया है जिस पर कनाडा की प्राइवेसी वाचडाग संस्था   DeepPacketInspection.ca  ने लिखा है कि गुमनामी खत्म होते ही प्रत्येक आदमी की 24 घंटे निगरानी करने में मदद मिलेगी। इसके लिए एक विकसित तकनीक  deep packet inspection  के नाम से बनायी गयी है जो हर समय नजरदारी करेगी। http://antifascist-calling.blogspot.com/  ने लिखा है -    
"all data traffic that courses across the 'net is contained in individual packets that have header (i.e. addressing) information and payload (i.e. content) information. We can think of this as the address on a postcard and the written and visual content of a postcard." All of which is there for the taking, "criminal evidence, ready for use in a trial," Cryptohippie chillingly informs. Still the illusion persists that communication technologies are somehow "neutral." Neither good nor bad but rather, much like a smart phone loaded with geolocation tracking chips or the surveillance-ready internet itself, simply there for all to use.’’ आगे लिखा है- ‘‘According to Ars Technica, the lawsuit charged the firm and ISPs "Bresnan Communications, Cable One, CenturyTel, Embarq, Knology, and WOW! of all being involved in the interception, copying, transmission, collection, storage, usage, and altering of private data from users."
‘‘NebuAd was accused by plaintiffs of exploiting "normal browser platform security behaviors by forging IP packets, allowing their own JavaScript code to be written into source code trusted by the web browser," the complaint reads. "NebuAd and ISPs together cooperate in this attack against the intentions of the consumers, the designers of their software, and the owners of the servers they visit," attorneys charged.’’
Web inventor Tim Berners-Lee told New Scientist in 2009 that the "ever-increasing power of computers that is helping the internet to grow is also threatening its future."
Berners-Lee "likened DPI to wiretapping, and pointed out that companies could use it to learn a huge amount about our 'lives, hates and fears'."
Information I might add, that is portable and readily exploitable by our political minders and the corporate grifters they so lovingly serve.
And with a national security state already monitoring huge volumes of data collected from the internet and other electronic communications' platforms, The Guardian warns that Britain and other managed Western democracies are "sleepwalking into a surveillance society."






सोमवार, 6 दिसंबर 2010

विकीलीक के राजनीतिक मायने

विकीलीक के लाखों दस्तावेज की तीसरी खेप इंटरनेट पर आ गयी है। इन दस्तावेजों के आने के बाद से अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं। इनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन दस्तावेजों के आने का मकसद क्या है ? इस तरह के एक्सपोजर का अर्थ क्या है ? क्या इन दस्तावेजों से किसी देश के लिए कोई खतरा पैदा हो सकता है ? क्या इससे सूचनाओं में इजाफा हुआ है ? यहां हम ताजा दस्तावेजों और केबल संदेशों तक ही सीमित रखेंगे।

    28 नवम्बर 2010 को विकीलीक ने 251,287 अमरीकी दस्तावेज और केबल संदेशों को इंटरनेट पर जारी किया। इनमें केबल संदेश 1966 से लेकर फरवरी 2010 तक के हैं। इनमें 274 एम्बेसियों के गुप्त संदेश हैं। इसके अलावा अमरीका के गोपनीय 15,652 केबल संदेश भी हैं। आने वाले कुछ महीनों तक विभिन्न देशों के गोपनीय केबल संदेशों का विकीलीक रहस्योदघाटन करेगा। इन संदेशों और दस्तावेजों से एक बात साफ हुई है कि अमरीका विभिन्न देशों में जासूसी करता रहा है। खासकर मित्र देशों के यूएनओ मिशनों की जासूसी करता रहा है। इन संदेशों ने अमरीकी लोकतंत्र की पोल खोलकर रख दी है। जो अमरीका को आदर्श लोकतंत्र मानते हैं वे जरा इन दस्तावेजों के आइने में नए सिरे से अमरीका को परिभाषित करें ? अमेरिका राजनयिक कामकाज की आड़ में किस तरह दूसरे देशों की संप्रभुता का हरण करता रहा है,जासूसी के नाम पर हस्तक्षेप करता रहा है, और अमेरिकी संविधान में जो वायदे किए गए हैं उनका अमरीकी सत्ता पर बैठे लोग कैसे उल्लंघन करते रहे हैं। यह भी पता चलता है कि अमेरिका दुनिया का भ्रष्टतम देश है। तकरीबन 251,287 दस्तावेज जारी किए गए हैं जिनमें 261,276,536 अक्षर हैं।यानी इराक युद्ध के बारे में जितने दस्तावेज जारी किए थे उससे सातगुना ज्यादा । इसमें 274 दूतावासों और कॉसुलेट्स के केबल संदेश हैं। इसमें 15,652 सीक्रेट हैं,101,748 कॉन्फीडेंशियल और 133,887 अनक्लासीफाइड हैं। इनमें सबसे ज्यादा इराक पर चर्चा है। तकरीबन 15,385 केबल संदेशों में 6,677 केबल संदेश इराक के हैं।अंकारा,तुर्की से 7,918 केबल हैं। अमरीका के स्टेट ऑफिस सचिव के 8017 केबल संदेश हैं। अमरीका के वर्गीकरण के अनुसार विदेशी राजनीतिक संबंधों पर 145,451 ,आंतरिक सरकारी कार्यव्यापार पर 122,898,मानवाधिकार पर 55,211, आर्थिकदशा पर 49.044,आतंकवाद और आतंकियों पर 28,801 और सुरक्षा परिषद पर 6,532 दस्तावेज हैं। असल में विकीलीक के बहाने से अमरीकी प्रशासन इंटरनेट पर अंकुश लगाना चाहता है। वे इंटरनेट उन तमाम राजनीतिक खबरों को सेंसर करना चाहते हैं जो अमेरीकी प्रशासन को नागवार लगती हैं। स्थिति का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि ओबामा प्रशासन ने सभी सरकारी कर्मचारियों के नेट पर विकीलीक पढ़ने पर पाबंदी लगा दी है। कई कांग्रेस सदस्य पाबंदी की मांग कर रहे हैं,कुछ ने विकीलीक के संस्थापक की गिरफ्तारी की मांग की है। लाइब्रेरी आफ कांग्रेस ने अपने सभी कम्प्यूटरों पर इस लीक को पढ़ने से रोक दिया है। यहां तक कि रीडिंग रूम में नहीं पढ़ सकते। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के डिप्लोमेटिक छात्रों को इस लीक को पढ़ने से वंचित कर दिया गया है,उनके पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गयी है। उन्हें कहा गया है कि इस रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी न करें। कई सीनेटरों ने ऐसे कानून बनाने का आधिकारिक प्रस्ताव दिया है जिसके आधार पर गुप्त दस्तावेज प्रकाशित करना और पढ़ना अपराध घोषित हो जाएगा। अमरीकी कानून संरक्षकों ने कॉपीराइट के उल्लंघन का बहाना करके कुछ इंटरनेट डोमेन को बंद करा दिया है। ये सारी बातें अमरीका में अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरे की सूचना दे रही हैं।
विकीलीक के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह के लीक अमरीका में होते रहते हैं, खासकर जो व्यक्ति कल तक विदेश विभाग में राजनयिक की नौकरी कर रहा था वह ज्योंही सेवामुक्त होता है अपने साथ ढ़ेर सारे गुप्त दस्तावेज ले जाता है और उनका रहस्योदघाटन करने लगता है। इसी प्रसंग में न्यूयार्क स्थित होफ्सतरा वि.वि. में राजनीतिविज्ञान के प्रोफेसर डेविड मिशेल (http://www.regressiveantidote.net/) ने महत्वपूर्ण बात कही है। डेविड ने लिखा है कि इसमें रहस्योदघाटन जैसा कुछ भी नहीं है। विकीलीक के दस्तावेज महत्वपूर्ण है लेकिन उतने नहीं जितने कहे जा रहे हैं। ये पेंटागन के रूटिन दस्तावेज हैं। ये महत्लपूर्ण इसलिए हैं कि इनमें अमरीकी सरकार की कथनी और करनी में भेद को साफ देखा जा सकता है। इस अंतर को ही आकर्षक ढ़ंग से अमरीकी‘झूठ’ कहा जा रहा है। डेविड मिशेल का पूरा लेख बेहद महत्वपूर्ण है अतः उसे पूरा उद्धृत करके पेश कर रहे हैं। डेविड मिशेल ने लिखा है-    
The third batch of WikiLeaks revelations reveals a lot.But just not so much where people think it does.Let’s start with what it is not. So far, at least, it does not appear to be anything like its obvious potential model, the Pentagon Papers.
Daniel Ellsberg’s revelations were hugely significant, but not, per se, because they were government secrets revealed to the public. Rather, they were important because of the gap in government pronouncements they exposed. Which is a fancy way of saying the ‘lies’. The reason the Pentagon Papers really matter is because, on the most crucial issue of state policy imaginable, the government was saying one thing to the public and even Congress, and something completely different to itself. Otherwise, the documents would have been merely interesting, but hardly consequential.
Which is what the WikiLeaks strike me as, at least so far. The gap that was so wide in the case of the Pentagon Papers is, in this case, rather small. Indeed, remarkably so. I have gotten so used to dishonesty out of Washington that my shock in this case is not that they’ve been lying to us so much as that they mostly have not been. The WikiLeaks trove does not, so far at least, appear to expose massive disconnects between what the government has been telling us and what it actually believes. This is not Vietnam and the endless lies about that war. This is not the Reagan administration demanding that the world embargo Iran even while secretly selling them missiles, or constantly invoking the great cause of democracy while even more constantly undermining it everywhere on the planet.Parenthetically, by the way, it is completely unclear that anybody in this country cares enough about such outrages anymore, even if they did exist and even if they were exposed. Americans are so self-focused today, and the government has gotten so expert at shielding people from the short-term, obvious consequences of its pernicious policies, that one has to wonder what the reaction would be to a genuine ‘bombshell’ of a revelation, as opposed to these little sparklers.Or not. Wonder, that is. One of the most astonishing experiences of my lifetime has been to watch the general (non-)reaction to the release of the Downing Street Memos, which conclusively prove most of the key lies the British and American governments were telling about Iraq in 2002 and 2003. It will probably take a small army of socio-psychologists to sort that particular little episode of national psychosis out, but for whatever reason, no one at the time seemed very interested in this smokingist of smoking guns, and they remain that way today. I guess if you don’t have to worry about a draft of higher taxes or missing the ball game on TV, why care what your government is doing, eh?
I have to laugh (read: cry), by the way, at all the intense effort that the New York Times is putting into exposing the WikiLeaks documents about not so much in particular, recalling how they handled the Downing Street Memos. The memos were minutes from meetings between the top British and American officials as they planned their war in Iraq and their war of lies to cover for it. They were leaked in Britain in 2005, in an effort to embarrass Tony Blair as he ran for reelection. The Times covered it in that context, in its back pages, never saying boo about the massive domestic implications in the US. It took the blogosphere to get the paper to pay any attention at all to the story’s massive American angle. I remember reading their public editor’s response to why the paper had not made this story front page news, with screaming headlines. He said the foreign desk editors told him that it just never occurred to them to pass it along to the national desk team. Oh yeah. That seems likely.In any case, pardon my cynicism, but I’m getting to the point where I don’t know whether anything that doesn’t take money out Americans’ pockets or interrupt their reality show lives would morally move them anymore. What is clear is that what has been released so far by WikiLeaks doesn’t come close.
 Which makes all the hub-bub and consternation surrounding the revealed documents a bit odd. You’d think that regressives would actually sort of laud the release of these files in a way, since they substantiate the whole war on terror riff, at least in so far as showing that the US government more or less genuinely believes its own rhetoric. It’s actually a vindication of sorts for them, against those of us who harbor deep suspicions – post-Vietnam, post-Watergate, post-Iraq – about the ability of the American national security state to speak remotely honestly about anything. You don’t generally have here a case of the government saying one thing and then doing something else completely different.
But the scary monsters of the right have not reacted this way at all. Take Peter King, for example. Please. Congressman King – who astonishingly represents a district in New York State, not, appearances to the contrary, 17th century Prussia – is an ever-reliable source of the most jingoistic nastiness a human orifice is capable of generating, and he doesn’t disappoint in this case. Giving new meaning to the concept of rank hyperbole, King avers that WikiLeaks “is worse even than a physical attack on Americans, it’s worse than a military attack”, and it puts “American lives at risk all over the world”. And, in words that ought to chill the remaining long-necked ostriches out there who still think Barack Obama is a liberal, “The Attorney General and I don’t always agree on different issues. But I believe on this one, he and I strongly agree that there should be a criminal prosecution”.
That’s a fairly common example out there on the right, which of course includes the Obama administration and all the histrionics coming out of the Secretary of State and others. Madame Clinton said that, “This disclosure is not just an attack on America's foreign policy interests – it is an attack on the international community”, proving that Democrats can be just as regressive and just as sickeningly disingenuous as the monsters of the GOP. She goes on to dissemble even more, lecturing us that, “There is nothing laudable about endangering innocent people. There is nothing brave about sabotaging the peaceful relations between nations on which our common security depends.” As if worrying about innocent people or peaceful relations is what American foreign policy is all about.
Or there’s the reactionary opinion columnist Charles Krauthammer, who writes that we should “Throw the Espionage Act of 1917 at them... Putting U.S. secrets on the Internet, a medium of universal dissemination new in human history, requires a reconceptualization of sabotage and espionage – and the laws to punish and prevent them. Where is the Justice Department? And where are the intelligence agencies on which we lavish $80 billion a year? [Yeah, funny you should ask about that, Chuck.] Assange has gone missing. Well, he's no cave-dwelling jihadi ascetic. Find him. Start with every five-star hotel in England [a tacky little bit of faux class smearing well befitting someone of Krauthammer’s ideology] and work your way down. Want to prevent this from happening again? Let the world see a man who can't sleep in the same bed on consecutive nights, who fears the long arm of American justice. I'm not advocating that we bring out of retirement the KGB proxy who, on a London street, killed a Bulgarian dissident with a poisoned umbrella tip. But it would be nice if people like Assange were made to worry every time they go out in the rain.” Note here, on top of all the other ugliness in that passage, the moral cowardice of calling for Julian Assange’s assassination without quite doing so overtly. This is the covert ops equivalent of the Bush administration’s flock of chicken-hawks. And for what reason should Assange be murdered? Krauthammer gives three examples of the “major damage” done to the United States by the WikiLeaks. First, the exposed lies of the Yemeni president and deputy prime minister as to who has actually been bombing their country, a non-example which merely demonstrates Krauthammer’s regressive arrogance and stupidity. Second, the purported lack of trust in the United States from this point forward, as if the government had leaked these documents, and as if most governments and most organizations don’t also have to worry about leaks all the time. And, third, the supposed weakness the US shows by not taking out the WikiLeaks people. He writes, “What's appalling is the helplessness of a superpower that not only cannot protect its own secrets but shows the world that if you violate its secrets – massively, wantonly and maliciously – there are no consequences.”
This latter comment gives the truth to what regressives really hate about WikiLeaks. Since the organization has not yet actually released any evidence of serious major lies, what then gives with the over the top reaction on the right? What the WikiLeaks episode actually reveals is not any major juicy secrets (so far), but rather that the enemy of the right is truth. What they are defending here – and what they are calling for murder to be used in order to defend here – is simply the privilege to lie, and the right to keep their lies and hypocrisies from being exposed.
That’s the true revelation of the last weeks, not anything that WikiLeaks has produced just yet. Indeed, the fact that WikiLeaks has not so far actually dropped such a major bomb and yet has induced a visceral reaction so intense that it includes calls for murder reveals far more about the character of regressives than it does about anything else.These are people who believe in entitlement. These are arrogant elites who believe the rest of us don’t need to know what they’re doing with and to our lives. These are people see truth as a danger. These are people who not only actively undermine democracy at home and abroad, but who are fundamentally opposed to, and frightened of, democracy’s very essence. They speak the word (endlessly), but the last thing in the world they actually would ever want is rule by the people.
 And they know that the people in a democracy just might not put up with their crimes and their lies, and thus secrecy must be jealously guarded, even if that requires the murder of a truth-teller. That, ultimately is the most substantial revelation that the WikiLeaks documents have so far produced.As Julian Assange has himself noted, “The more secretive or unjust an organisation is, the more leaks induce fear and paranoia in its leadership and planning coterie. ... Since unjust systems, by their nature induce opponents, and in many places barely have the upper hand, mass leaking leaves them exquisitely vulnerable to those who seek to replace them with more open forms of governance.” Well said, brother. Well said.Assange was asked by Time Magazine what his “moral calculus” was to justify publishing the leaks. Don’t you love that? No one asked George Bush or Dick Cheney that question. No one would dare ask the Liars of the Century about their moral calculus, even today, as they run around the world hawking their books and making millions off of ‘memoirs’ absolutely riddled with new lies covering up the old ones. No one even asks the timid-as-a-snowflake Barack Obama where he gets off tripling the forces in Afghanistan in support of a regime that – thanks to WikiLeaks – we now know that he knows is thoroughly corrupt and utterly undemocratic. But Assange, whose great crime is exposing truth, gets the dubious morality treatment from Time, that great bastion of hard-hitting independent journalism.So, here’s his moral calculus: “We are an organization that tries to make the world more civil and act against abusive organizations that are pushing it in the opposite direction.”
That’s a dangerous thing. WikiLeaks is apparently about to go after Wall Street banks next, among others. That should be really amusing to watch. You start messin’ with the money, the oligarchs really get mean, man. We live in a time where only a fool would not be despondent about the state of our country. Almost everything about our condition is ugly.There are a few reasons, however – if only just a few – to be a bit more hopeful.One is the power of the Internet.Another is the new generation of Dan Ellsbergs. Put them together and you get WikiLeaks.










   








मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

फेसबुक के खतरे और राजनीति

   हिन्दी में इंटरनेट पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है उसमें अनेक मजेदार बातें सामने आ रही हैं। इंटरनेट पर ब्लॉग से लेकर फेसबुक पर लिखने वालों में उदारवादी नजरिए को लोग ज्यादा उदार ढ़ंग से पेश आ रहे हैं जबकि अनुदार लोगों की आक्रामकता और अनुदारभाव बढ़ गया है।वे और भी ज्यादा कंजरवेटिव होते जा रहे हैं।
    मैं जब भी उदार नजरिए से जब भी साम्प्रदायिक समस्या पर रोशनी ड़ालने की कोशिश करता हूँ तो पाता हूँ कि हठात मेरे ब्लॉग का नियमित पाठक नाराज है और उसके अंदर से हिन्दुत्ववादी विचार आक्रामक रूप में बाहर आने शुरू हो जाते हैं।
     मैंने यह भी देखा है कि उदार नजरिए से मोहल्ला लाइव जैसे वेबसाइट पर जब भी कोई मूल्यांकन या आलोचनात्मक टीका-टिप्पणी हुई है तो उस पर भी अनुदारपंथी नजरिया ही खुलकर सामने आया है।
    हिन्दुत्ववादी अथवा अतिवामपंथी नजरिए के नेट यूजर,साइबर लेखक पूरी कोशिश करते हैं कि किसी भी तरह उदारवादी नजरिए के साथ राजनीतिक एकजुटता तैयार न होने दी जाए।
     कायदे से देखें तो ब्लॉगलेखक डिजिटल शरणार्थी हैं। इनके साथ अनुदार विचार विमर्श करना सही नहीं है। ब्लॉग पर चलने वाली राजनीतिक बहसों के बारे में अभी यही कहा जा सकता है कि यह शैशव अवस्था में है। हिन्दी-अंग्रेजी दोनों में चलने वाली राजनीतिक बहसें राजनीतिक दलों को स्पर्श नहीं करतीं। जमीनी हकीकत पर उनका न्यूनतम असर भी नहीं होता।
    वास्तविकता है कि साहित्य संबंधी ब्लॉग पर लोग तुलनात्मक तौर पर ज्यादा नहीं जाते। कभी-कभार जाते हैं। प्रतिक्रियावादी विषयों के ब्लॉगों पर भीड़ ज्यादा होती है अथवा अतिवामपंथी विचारों के ब्लॉगों पर भीड़ ज्यादा होती है। ऐसे भी खिचड़ी ब्लॉग हैं जिन पर पर भीड़ ज्यादा होती है जैसे भडास ब्लॉग।
    दूसरी ओर फिल्मी समीक्षा या मीडिया की खबरों के ब्लॉग पर ज्यादा लोग जाते हैं। तुलनात्मक तौर पर भाजपा की वेबसाइट पर कांग्रेस की वेबसाइट से ज्यादा ट्रैफिक है। हिन्दी ब्लॉगिंग में वामपंथियों की नगण्य उपस्थिति है।  
    ब्लॉगिंग का प्रेस के साथ आदान-प्रदान बढ़ा है। विभिन्न अखबारों ने अपने ब्लॉग बनाए हैं। साथ ही वे ब्लॉगों में से चुनकर लेख वगैरह प्रकाशित करते रहते हैं। लेकिन मीडिया को प्रभावित करने की क्षमता अभी तक ब्लॉग अर्जित नहीं कर पाए हैं। नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता अभी पैदा नहीं कर पाए हैं। इसका प्रधान कारण है भारत के ज्यादातर बुद्धिजीवियों का डिजिटल लेखन से अलगाव। वे नेट पर नियमित लिखते ही नहीं हैं। यह बात दीगर है कि वे प्रिंट में भी नियमित नहीं लिखते।
    आज भी हिन्दी के अधिकांश लेखक-साहित्यकार-बुद्धिजीवी मीडिया लेखन को घटिया मानते हैं। पैसा कमाने का बुरा जरिया मानते हैं। वे एसएमएस तक खोलना नहीं जानते,ठीक से कभी ईमेल तक नहीं करते,इंटरनेट पर नियमित पढ़ना तो अभी बहुत दूर की बात है। जो इंटरनेट पर पढ़ता नहीं है वह लिखने में कितना पीछे होगा और जो इंटरनेट पर लिखता नहीं है वह डिजिटल मुद्दों पर विचार-विमर्श में कितना पीछे होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। मैं कम से कम अपने मास्टर होने के नाते यह कह सकता हूँ कि ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षक इंटरनेट पर नहीं जाते,न वे लाइब्रेरी जाते हैं। वे किताब की दुकान पर किताब खरीदने भी नहीं जाते। वे सीधे नौकरी करते हैं। नोट्स बना लेते हैं और उससे ही सारी जिंदगी काम चलाते हैं। शिक्षकों के द्वारा किताबों की व्यक्तिगत खरीद एकदम जीरो है। इक्का-दुक्का प्रोफेसर किताबें खरीदते हैं। वे मानते हैं कि जब बिना पढ़े ही काम चल रहा है तो पढ़ने की क्या जरूरत है। जब बिना पढ़े ही पगार मिल रही है तो फिर पढ़ने के लिए क्यों प्रयास किया जाए।
    सामान्य स्थिति यह है कि भाजपा को छोड़कर किसी भी पार्टी ने वेब को विगत लोकसभा चुनाव में गंभीरता से नहीं लिया। ज्यादातर उम्मीदवारों और दलों ने इस पर कोई भी पैसा खर्च नहीं किया। इससे यह भी पता चलता है कि हमारे देश में संचारक्रांति का अभी क-ख-ग भी नहीं लिखा गया है। हिन्दी में वेबसाइट वालों के पास संसाधनों का अभाव है। विज्ञापन नहीं हैं.पैसे नहीं हैं।
  सोशल नेटवर्क के बारे में चूंकि अभी राजनीतिक सचेतनता नहीं है इसलिए राजनीतिक दिक्कतें भी कम हैं ,लेकिन अमेरिका में राजनीतिज्ञों की दिक्कतें ज्यादा है। वे वेब के जरिए धन संग्रह करने पर जोर दे रहे हैं और बड़े पैमाने पर धन एकत्रित भी कर रहे हैं। वे सोशल नेटवर्क पर आने-जाने वालों की अभिरूचियों और राजनीतिक विचारों का गंभीरता के साथ अध्ययन कर रहे हैं और उसके अनुसार राजनीतिक रणनीतियां बना रहे हैं। विगत राष्ट्रपति चुनाव में अमेरिका के दोनों प्रधान राजनीतिक दलों ने वेब का जमकर इस्तेमाल किया था। सोशल वेबसाइट पर आने-जाने वालों की व्यक्तिगत चीजों को जानने के चक्कर में नागरिकों की प्राइवेसी का उल्लंघन भी किया गया।
    हाल ही में यह भी देखा गया है कि अमेरिकी प्रशासन सोशल नेटवर्क का गंभीरता के साथ इस्तेमाल कर रहा है। सीआईए और दूसरी गुप्तचर संस्थाएं नागरिकों की निगरानी कर रही हैं। इस काम के लिए सीआईए ने ‘ओपन सोर्स सेण्टर’ नामक संस्था का 2005 में गठन किया है और यह काम उसके जरिए किया जा रहा है। इसके जरिए वे ब्लॉग,वेबसाइट,टीवी कार्यक्रम,रेडियो प्रसारण आदि की निगरानी कर रहे हैं। इस सेंटर के मूल्यांकन आम लोगों के लिए उनकी वेबसाइट opensource.gov पर उपलब्ध हैं। इस पर वीडियो रिपोर्ट,इंटरनेट क्लिपिंग, अनुवाद,खास विषय का विश्लेषण आदि उपलब्ध है।
     इसके अलावा एफबीआई का अलग सिस्टम है जो इस क्षेत्र में काम कर रहा है। भारत में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जहां सरकार ध्यान देती हो. उन गतिविधियों का मूल्यांकर करती हो जो इंटरनेट पर हो रही हैं। वह पूरी तरह अपने काम के लिए लगता है अमेरिकी संस्थाओं पर निर्भर है।
       एफबीआई ने अरिजोना विश्वविद्यालय  में ‘डार्क बेव’ प्रोजेक्ट खोला है। इसके जरिए उसने नेट पर आतंकी गतिविधियों की निगरानी की जा रही है।  वे इस प्रकल्प के जरिए इंटरनेट के उन अंधेरे कोनों की खोज करते रहते हैं जहां आतंकी छिपे हैं और अपनी गतिविधियों को नेट के जरिए संयोजित कर रहे हैं। वे इंटरनेट कंटेंट की निगरानी करने के अलावा गुमनाम लेखकों और टिप्पणीकारों पर भी नजर रखे हुए हैं।  इन लोगों ने Writeprint नामक प्रोग्राम बनाया है जो अनाम संदेशों और गुमनाम लोगों की छानबीन करता रहता है। उनकी प्रोफाइल तैयार करता रहता है।
     सोशल नेटवर्क के लिए सात कौन से खतरे हैं। उनके बारे में कारपोरेट परिप्रेक्ष्य में एलन लुस्टिंगर ( डायरेक्टर ऑफ इनफॉर्मेशन सिक्योरिटी फॉर गैन कैपीटल होल्डिंग) ने लिखा हैं। वे सात खतरे इस प्रकार है-
1. Searching social sites for company names yields partial company rosters, which is a start toward softening them up for social networking attacks.
2. Work e-mail addresses gleaned from social sites can provide valuable information. If the e-mail naming scheme (first initial followed by last name or first name, underscore, last name) is the same as the password scheme that undermines security. "You're halfway to breaking their user name and password," he says.
3. Information posted on social sites give clues for passwords to try – names of children, favorite food, sports teams, etc.
4. Phony contests advertised on social sites that request all sorts of data that could be used to reset passwords – where you went to school, name of your first pet, and your favorite uncle.
5. Shortened URLs commonly used on Twitter can lead to anywhere, and there are no clues in the shortened URLs themselves about where that might be.
6. Mining bulletin boards can produce news of IT job openings at specific companies. . Attackers could line up an interview, during which they gather details about the corporate network in the course of discussing the potential job and their experience with specific gear.
7. Google Latitude's use of GPS posts where you are right now, also revealing all the places you aren't. People seeking an excuse to be inside a corporate facility can use this to drop by and ask for an employee they know isn't there.
 लुस्टिंगर का मानना है कि सभी किस्म की सामाजिक धोखाधड़ी करने वाले इन दिनों फेसबुक आदि सोशल नेटवर्क पर आ रहे हैं और उनसे सावधान रहने की जरूरत है।










शनिवार, 19 जून 2010

साइबर सुरक्षा के नाम पर अमेरिकी खेल

      सामान्य तौर पर मिथ है कि इंटरनेट पर हम जो कर रहे हैं उसे कोई नहीं जानता। लेकिन यह बात सच नहीं है। अमेरिका में साइबर निगरानी करने का प्रयास सरकारी स्तर पर सन् 2003 से चल रहा है। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने जनवरी 2008 के इंटरनेट निगरानी का आदेश जारी किया और अमेरिकी गुप्तचर विभाग को यह कहा कि वह इंटरनेट निगरानी करे। क्योंकि हैकरों के द्वारा फेडरल एजेंसियों के कम्प्यूटर सिस्टमों पर हमले की घटनाएं बढ़ गयी हैं। यह गुप्त आदेश था ।   
        इस आदेश के अनुसार नेशनल सुरक्षा एजेंसी को खास तौर पर यह दायित्व सौंपा गया है। कि वे सभी फेडरल एजेंसियों के कम्प्यूटर नेटवर्क पर निगरानी रखने का काम करेंगी। इसमें वे कम्प्यूटर नेटवर्क भी शामिल हैं जिनकी वे पहले निगरानी नहीं करती थीं। इस पूरे काम को ऑफिस ऑफ दि डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलीजेंस के द्वारा संयोजित किया जा रहा है।
        अमेरिकी गृह मंत्रालय का काम है सिस्टम की रक्षा करना और पेंटागन का काम होगा जबाबी हमले की रणनीति तैयार करना। जिससे नेट घुसपैठियों को तबाह किया जा सके।
      सन् 2005 से लेकर अब अमेरिका के कई मंत्रालयों के कम्प्यूटर नेटवर्क पर चीनी हैकरों के निरंतर हमले होते रहे हैं। खासकर रक्षा,कॉमर्स,गृह मंत्रालयों को हैकरों ने निशाना बनाया है। यहां तक कि परमाणु ऊर्जा विभाग के कम्प्यूटरों को भी चीनी हैकरों ने नहीं बख्शा है। अमेरिका के ये नेट सुरक्षा उपाय सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि अमेरिका की सीमा के परे भी इनका दायरा है।
     सबसे पहले यहखबर ‘बाटलीमूर सन ’नामक अखबार ने सितम्बर 2007 में छापी थी उस समय इस खबर की ओर ज्यादा लोगों का ध्यान ही नहीं गया। इसे ‘साइबर पहल’ नाम दिया गया है।   इस काम में NSA, CIA  और FBI के साइबर विभाग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
      इस कार्य के लिए मोटी रकम भी बजट मे आवंटित की गयी है और इसके दायरे में सरकारी और निजी क्षेत्र के सभी संस्थान ले लिए गए हैं। मूल बात यह है कि अब अमेरिका के प्रत्येक नागरिक और संस्थान की साइबर पहरेदारी की जा रही है। अब अमेरिका में सरकारी गुप्तचर संस्थाएं क्लासीफाइड और अन-क्लासीफाइड सभी किस्म की नेट निगरानी कर रही हैं इससे प्राइवेसी खतरे में पड़ गयी है।  
      बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद इस योजना में और भी तेजी आयी है और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ( 3जुलाई 2009) के अनुसार साइबर सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता का क्षेत्र है। इसे ‘आइंस्टाइन 3’ नाम दिया गया है। इसके लिए 17 बिलियन डॉलर धन आवंटित किया गया है। इस प्रकल्प के पायलट सर्वे के लिए एटी एण्ड टी नामक विश्व विख्यात दूरसंचार कंपनी की मदद ली गयी है । इसके जरिए गैर सरकारी क्षेत्र की निगरानी का पायलट सर्वे किया जाएगा। इस समूची प्रक्रिया में मूल खतरा यह है कि निजी क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी के हाथों सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख क्षेत्रों के कम्प्यूटर कोड और सिगनेचर चले जाएंगे। सेना के तमाम कोड जो अभी तक सरकार के ही कब्जे में थे  वे अब निजी कंपनी के पास चले जाएंगे।
     उल्लेखनीय है अमेरिका मे बगैर वारंट के अमेरिकी नागरिकों के फोनकॉल और ईमेल की जासूसी संस्थाओं के द्वारा निगरानी का आदेश बुश प्रशासन के समय से चला आ रहा है। एटी एण्ड टी के पायलट सर्वे से इसे अलग रखा गया है।
     ‘आइंस्टाइन 3’ कार्यक्रम के साइबर राडार के जरिए नागरिकों की निगरानी हो रही है। इसके तहत गृह विभाग किसी नसेड़ी ड्राइवर को नशे में गाड़ी चलाते पकड़ सकता है। अथवा तेज गति से गाड़ी चलाने वालों को सीधा पकड़ सकता है।
    दूसरी ओर नागरिक अधिकार संगठनों की मांग है कि नागरिकों के निजी ईमेल ,निजी संदेश  और प्रेम संदेश न पढ़े जाएं। वे चाहते हैं नागरिकों की प्राइवेसी और नागरिक अधिकारों की हर हालत में रक्षा की जाए। उनके निजी डाटा जैसे इंटरनेट प्रोटोकॉल एड्रेस की हिफाजत की जाए। मुश्किल यह है कि सुरक्षा एजेंसियां किसी भी व्यक्ति को महज संदेह के आधार पर अपनी जांच के दायरे में ला सकती हैं।
          
          

रविवार, 2 मई 2010

अमरीकी खेल ,साइबरभय और मीडिया

      कल टीवी चैनलों में दिल्ली में बम धमाकों की संभावना होने की खबर को जिस तरह दिखाया गया है उसका क्या असर हो रहा है हमने नहीं सोचा है। भारत सरकार निरंतर अमरीकी पदचिह्नों पर चलते हुए आतंकवाद का अहर्निश भय पैदा कर रही है। बम धमाकों की संभावनावाली खबर को  जिस तरह प्रसारित किया गया उससे यही संदेश गया गोया बम फटने ही वाला हो !
    भारत में भी अमेरिका की तरह किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी गतिविधियों के नाम पर पकड़ लिया जाता है और उसका इस कदर प्रचार किया जाता है गोया बेहद गंभीर अपराधी को पकड़ा गया हो और यह सारी प्रक्रिया मीडिया प्रचार अभियान के जरिए इतने आक्रामक ढ़ंग से संगठित की जा रही है कि आप महसूस करें कि किसी युद्धक्षेत्र में जी रहे हैं। यह साइबरभय के विस्तार की सूचना है। साइबरभय  और आतंकीभय निर्मित भय है। यह ऐसा भय है जिसका नायक एक ही व्यक्ति है। बाकी सब भोक्ता हैं। जो आतंकवाद का संरक्षक है वही आतंकी सूचना का भी सर्जक है।
     कायदे से मीडिया का काम है आम लोगों को भयमुक्त करना,सूचना संपन्न करना। लेकिन इस तरह की सूचनाओं का प्रचार भयमुक्त नहीं करता बल्कि भय का वातावरण बनाता है। यह मीडिया की प्रतिगामी भूमिका है।    
        हाल ही में ‘आउटलुक’ मैगजीन के द्वारा जब फोन टेपिंग का सवाल सामने आया तो केन्द्र सरकार ने किसी भी किस्म की फोन टेपिंग से इंकार किया , लेकिन साइबर निगरानी करने वाली तकनीक की मौजूदगी से इंकार नहीं किया। भारत में साइबर निगरानी किस तरह हो रही है आम जनता के पास उसके विवरण उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन भारत में चल रही साइबर गतिविधियों का खाता कम से कम अमेरिका के पास जरुर है। मुंबई में हुई 26/11 की घटना के साइबर प्रमाण अमेरिकी जासूसी संस्था एफबीआई के अधिकारियों ने अदालत में आकर जरुर दिए हैं।
     अमेरिका में ऐसे कई साइबर निगरानी संस्थान हैं जो सारी दुनिया के साइबर फ्लो पर नजर लगाए हुए हैं। यह काम कई स्तरों पर कई संस्थाओं द्वारा सुपर कम्प्यूटरों की मदद से किया जा रहा है। यह सारी दुनिया पर साइबर वर्चस्व स्थापित करने की अमेरिकी रणनीति का अभिन्न अंग है। कम्प्यूटर और उपग्रहजनित संचार संबंधों के जरिए हम ऐसी संरचना में बंधते चले जा रहे हैं जिसका संचालक और नियंता कोई और नहीं  अमेरिका है।  
    सामान्य तौर पर कम्र्यूटर के जो बाहर हैं वे साइबर निगरानी के दायरे के बाहर हैं। लेकिन अनेक देश हैं जहां सारे काम कम्प्यूटर करता है। सारी जीवन प्रणाली कम्प्यूटर संचालित है। इसके कारण आम आदमी पर आज सरकारी तंत्र की नजरदारी ज्यादा होने लगी है।  
     सवाल उठता है कि साइबर निगरानी से अपराध घटेंगे या बढ़ेंगे ? कुछ लोगों का मानना है कि साइबर निगरानी से हमें समाज में अपराध कम करने में मदद मिलेगी ,कुछ लोग यह भी मानते हैं कि साइबर निगरानी से अपराध कम नहीं होंगे बल्कि अपराध बढ़ेंगे। यह भी देखने में आया है कि साइबर निगरानी के बाद से काले बाजार का तंत्र और भी मजबूत हुआ है।   
      अमेरिका में संचार क्रांति के सबसे ज्यादा प्रयोग हुए हैं । अमेरिका में संचार तकनीक के संदर्भ में राष्ट्र की रक्षा के नाम पर जो भी कानून बनता है उसका अनुकरण बाद में अन्य देशों में होने लगता है। यही हाल साइबर तकनीक का है। साइबर  तकनीक के अनुकरण ने हमें अमरीकी मार्ग का राही बना दिया है।
      साइबर जासूसी से लेकर साइबर संवाद की जितनी भी हलचलें हैं वे अंततः साइबरवार,साइबर निगरानी के साथ नागरिक समाज और अंतरिक्ष के सैन्यीकरण की ओर ले जा रही हैं। यह सारी प्रक्रिया साइबर संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। आप साइबर में जाएंगे,गूगल सर्च में जाएंगे,फेसबुक या ट्विटर पर जाएंगे आपकी सूचनाएं सीआईए,पेंटागन अथवा अमेरिकी सैन्य और जासूसी संस्थाओं के यहां जमा होंगी। आपकी सारी प्राइवेसी एक तरह से अमेरिका के यहां बंधक रखी हुई है। भारत में जो लोग चार नेताओं की सामान्य बातचीत की फोन टेपिंग पर हंगामा मचा रहे हैं अथवा ‘आउटलुक’ पत्रिका के संपादक जो कुछ भी बता रहे हैं,वह सारे मामले को संचार तकनीक के प्रयोग का लोकल मामला बनाकर पेश कर रहे हैं।
    आज सारी दुनिया में साइबर में वर्चस्व की तेज जंग चल रही है। साइबर तकनीक के सवाल लोकल -ग्लोबल सवाल हैं। साइबर ,इंटरनेट ,आरकुट, फेसबुक, ट्विटर, नेट सर्च,मोबाइल संवाद आदि सारी चीजें साइबर निगरानी के दायरे में हैं। साइबर निगरानी ग्लोबल -लोकल है। साइबर निगरानी के पक्ष में राष्ट्र की सुरक्षा के नाम से तर्क जुटाए जा रहे हैं।
साइबर वर्चस्व के मामले में अमेरिका आज भी बढ़त बनाए हुए है। अमेरिका में घट रहे घटनाक्रम पर नजर रखें तो समूची प्रक्रिया साफ नजर आने लगेगी। ‘वाशिंगटन टैक्नोलॉजी’ ने खबर दी है कि बूज़ एलिन हेमिल्टन ने हाल ही में अकादमिक रिसर्चर,दूरसंचार शोधार्थियों और दूरसंचार उद्योग के बीच सामंजस्य और तालमेल बिठाने के लिए हाल ही में 20 मिलियन डॉलर का एक समझौता किया है। यह समझौता नेटवर्क सुरक्षा और सूचना प्राप्ति के फ्लो को बनाए रखने के नाम पर किया गया है। इस समझौते के तहत अमेरिकी वायुसेना को ज्यादा लाभ होगा। आगामी पाँच साल में यह समझौता 152 मिलियन डॉलर का हो जाएगा। इसके तहत अमेरिकी वायुसेना अपने दूरसंचार नेटवर्क की रक्षा करना चाहती है। इस समझौते के तहत अमेरिकी वायुसेना अपने सैनिकों के लिए सैन्य जासूसी के अत्याधुनिक उपकरणों का जुगाड़ करना चाहती है।
    उल्लेखनीय है अमेरिका का सन् 2011 का रक्षा बजट 800बिलियन डॉलर का है ,इसका अच्छा खासा हिस्सा साइबर निगरानी के यंत्रों और तकनीक के विकास पर खर्च होगा। संचार कंपनियों में अमेरिकी रक्षा बजट के ज्यादा से ज्यादा कॉण्ट्रेक्ट पाने की होड़ लगी है और इस प्रतिस्पर्धा का लक्ष्य है बड़े पैमाने पर अमेरिकी सेनाओं के जंग अभियानों की मदद करना।
     साइबर युद्धापराधों का गोमुख है पेंटागन। साइबर अपराधियों की विश्वव्यापी फौज तैयार करने में पेंटागन की केन्द्रीय भूमिका है। साइबर अपराधियों का प्रभावशाली नेटवर्क पेंटागन ने तैयार किया है। पेंटागन के प्रकाशन Quadrennial Defense Review में इस साइबर योजना के विस्तृत ब्यौरे पढ़े जा सकते हैं। इसे यूएससाइबरकॉम नाम दिया गया है। Quadrennial Defense Review (QDR) ने अमेरिकी वायुसेना के लिए 10 स्पेस और साइबरस्पेस यूनिटें बनाने का निर्णय लिया है।
      इस फैसले के खिलाफ अमेरिका स्थित http://antifascist-calling. blogspot.com नामक संगठन ने आरोप लगाया है कि यूएस साइबरकॉम योजना के तहत सिर्फ सैन्य प्रसंगों पर ही ध्यान नहीं दिया जा रहा है बल्कि बड़े पैमाने पर नागरिकों पर भी निगरानी रखना इसका लक्ष्य है। इस योजना के तहत अतरिक्ष में जनसंहारक हथियारों को स्थापित किया जाएगा और साथ ही आम नागरिकों पर भी निगरानी रखी जाएगी। घरेलू जासूसी करके प्रतिवादी तत्वों को सबक सिखाने और दण्डित करने का काम भी किया जाएगा।
      साइबर संस्कृति की आक्रामक या हमलावर प्रकृति है। अंतरिक्ष अब शून्य नहीं रहा है। बल्कि युद्ध की जगह है। यहां इलैक्ट्रोनिक मैगनेटिक स्पैक्ट्रम के जरिए अंतरिक्ष क्षेत्र का दुरुपयोग चल रहा है। अमेरिका की साइबर और परमाणु गतिविधियों का अंतरिक्ष आज केन्द्रबिंदु है। अंतरिक्ष सभी किस्म की शक्ति और गतिविधियों की धुरी है। इस पर ही आज सारी चीजें निर्भर हैं। हमला करने की आजादी और हमले  से बचने की आजादी का भी यही स्रोत है।
    साइबर पक्षपात और साइबर आक्रमण इन दोनों ही प्रवृत्तियों का अमेरिकी साम्राज्यवाद के हितों के विस्तार और नागरिकों की साइबर निगरानी के लिए व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। नागरिकों की साइबर निगरानी और अंतरिक्ष को हथियारों की होड़ का अंग बनाने के चक्कर में अमेरिकी सत्ता के प्रचारक तरह-तरह झूठे नारे,भय पैदा करने वाले तर्क,भय पैदा करने वाली चेतावनियां जारी करते रहते हैं। साइबर खतरों ,साइबर हमलावरों,साइबर चोरों ,हैकर आदि से बचाने के नाम पर समय समय पर जो चेतावनियां आती रहती हैं इनका बुनियादी लक्ष्य साइबर निगरानी और साइबर वर्चस्व को सुनिश्चित बनाना है।
    साइबर निगरानी के कारण अब प्राइवेसी गुजरे जमाने की बात हो गयी है। साइबर संस्कृति ने ऐसा वातावरण बनाया है कि हम अहर्निश किसी अनहोनी घटना के घटने का इंतजार करते रहते हैं।














शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

इतिहास सृजन के नाम पर ‘ट्विटर’ की साइबर निगरानी

    
  अमेरिका के ‘लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ ने फैसला लिया है कि ‘ट्विटर’ के द्वारा भेजे जा रहे ‘ट्विट’ को अब लाइब्रेरी के संकलन का हिस्सा बनाया जाएगा। जिसके आधार पर जनसाधारण की राय के आधार संस्कृति और सभ्यता का जन इतिहास लिखने में आसानी होगी। अमेरिका की यह210 साल पुरानी पुस्कतालय संस्था है और इस संस्था का अमेरिका से लेकर सारी दुनिया में विशाल लाइब्रेरी नेटवर्क है। आज इस संस्था के पास बेव लेखन का विश्व का सबसे बड़ा संकलन है।
    उल्लेखनीय है कि आजकल 55 मिलियन यूजर ‘ट्विटर’ के माध्यम से संदेश संप्रेषित करते हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है।  लाइब्रेरी ने ‘ट्विटर’ की टिप्पणियों को इतिहास की कच्ची सामग्री और ज्ञान के खजाने में रुपान्तरण  करने का फैसला किया है। यह खबर ‘दि न्यूयार्क टाइम्स’ ( 14अप्रैल2010)  ने दी है।
   इंटरनेट जगत और खासकर ‘ट्विटर’ की दुनिया के 140 करेक्टर के लेखकों में लाइब्रेरी के इस फैसले से काफी उत्साह बढ़ा है। वे खुश हैं कि अब ‘ट्विटर’ इतिहास का हिस्सा बन गया है। जो अकादमिक शोध करना चाहते हैं वे भी काफी खुश हैं। यह वास्तव अर्थों में अनसेंशर जन इतिहास की सामग्री के संकलन का ऐतिहासिक फैसला है।
       नेट विधा रुप ‘ट्विटर’ इतनी जल्दी पुस्तकालय संकलन का अभिन्न हिस्सा बन जाएगा यह किसी ने सोचा भी नहीं था। किताबों को पुस्तकालय का हिस्सा माना जाता था ,बाद में फिल्म, वीडियो,ऑडियो को पुस्तकालय का हिस्सा बनाया गया ,लेकिन पुस्तकालय में ‘ट्विटर’ का इतनी जल्दी प्रवेश चौंकाने वाली बात है.फिर भी स्वागतयोग्य कदम है।
   जो चर्चित लोग हैं,ज्ञानी लोग हैं,जिनके ‘ट्विट’ का पीछा करने वाले हजारों-लाखों यूजर हैं ,फिलहाल उनके ‘ट्विट’ और उनके अनुयायियों की टिप्पणियां संकलित की जाएंगी। यह एकदम नए किस्म का इतिहास है जो दर्ज होगा।
  फ्रीड आर.शापिरो (एसोसिएट लाइब्रेरियनऔर येले लॉ स्कूल में प्रवक्ता) के अनुसार यह साधारण आदमी का इतिहास है जो प्रतिक्षण ‘ट्विट‘ के जरिए पहलीबार अमेरिकी लाइब्रेरी में दाखिल होगा। कुछ समय बाद ‘ट्विटर’ की टिप्पणियों को अमेरिका के नेशनल आर्काइव में शामिल कर दिया जाएगा। 
    अमेरिकन लाइब्रेरी के कम्युनिकेशन निदेशक एम.रेमण्ड के अनुसार ‘ट्विटर’ का संस्कृति और इतिहास पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा है। उल्लेखनीय है ‘‘बेव केप्चर’’ नाम का प्रकल्प अमेरिकी पुस्तकालय विगत 10 सालों से चला रहा है। इसमें ऑनलाइन सामग्री का दुनिया का विशालतम जखीरा है। इस प्रोजेक्ट में 167 टेराबाइटस की डिजिटल सामग्री है। इतनी ही क्षमता का डिजिटल किताबों का खजाना है जिसमें 21 मिलियन किताबें हैं।
    सवाल यह भी है कि पुस्तकालय संकलन का यदि ‘ट्विटर’ को हिस्सा बना दिया जाता है तो यह तो सीधे यूजर की प्राइवेसी का उल्लंघन होगा। क्या ‘ट्विटर’ के संदेशों का सिर्फ रिसर्च स्कॉलर ही इस्तेमाल करेंगे ? क्या सीआईए का दुरूपयोग नहीं करेगा ? भविष्य में ‘ट्विटर’ के कापीराइट का सवाल भी सामने आ सकता है। अभी तक जो लोग ‘ट्विटर’ पर आराम से टिप्पणियां लिखते रहे हैं और जो भी मन में आता है उसे व्यक्त करते रहे हैं उन्हें सावधान रहने की जरुरत है क्योंकि उनकी बेहूदा बातों को इतिहास में शामिल किया जा सकता है और फिर कोई शोधार्थी बताएगा कि ‘ट्विटर’ कितने बेवकूफ थे। दूसरा बड़ा परिवर्तन यह भी होगा कि सामान्य टिप्पणी अंततः इतिहास की मूल्यवान सामग्री बन जाएगी। इससे भी बड़ी बात यह है कि ‘ट्विटर’ भी अमेरिकी प्रशासन की नेट निगरानी में आ गया है यह स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए अशुभ संकेत है। क्योंकि अमेरिका का लाइब्रेरी नेटवर्क सीआईए की सांस्कृतिक शाखा और अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रभावशाली विचारधारात्मक मंच के रुफ में काम करता रहा है। विगत 10 सालों से इसका साइबर निगरानी के एक मंच के रुप में इस्तेमाल किया जा रहा है।  











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