रविवार, 2 मई 2010

अमरीकी खेल ,साइबरभय और मीडिया

      कल टीवी चैनलों में दिल्ली में बम धमाकों की संभावना होने की खबर को जिस तरह दिखाया गया है उसका क्या असर हो रहा है हमने नहीं सोचा है। भारत सरकार निरंतर अमरीकी पदचिह्नों पर चलते हुए आतंकवाद का अहर्निश भय पैदा कर रही है। बम धमाकों की संभावनावाली खबर को  जिस तरह प्रसारित किया गया उससे यही संदेश गया गोया बम फटने ही वाला हो !
    भारत में भी अमेरिका की तरह किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी गतिविधियों के नाम पर पकड़ लिया जाता है और उसका इस कदर प्रचार किया जाता है गोया बेहद गंभीर अपराधी को पकड़ा गया हो और यह सारी प्रक्रिया मीडिया प्रचार अभियान के जरिए इतने आक्रामक ढ़ंग से संगठित की जा रही है कि आप महसूस करें कि किसी युद्धक्षेत्र में जी रहे हैं। यह साइबरभय के विस्तार की सूचना है। साइबरभय  और आतंकीभय निर्मित भय है। यह ऐसा भय है जिसका नायक एक ही व्यक्ति है। बाकी सब भोक्ता हैं। जो आतंकवाद का संरक्षक है वही आतंकी सूचना का भी सर्जक है।
     कायदे से मीडिया का काम है आम लोगों को भयमुक्त करना,सूचना संपन्न करना। लेकिन इस तरह की सूचनाओं का प्रचार भयमुक्त नहीं करता बल्कि भय का वातावरण बनाता है। यह मीडिया की प्रतिगामी भूमिका है।    
        हाल ही में ‘आउटलुक’ मैगजीन के द्वारा जब फोन टेपिंग का सवाल सामने आया तो केन्द्र सरकार ने किसी भी किस्म की फोन टेपिंग से इंकार किया , लेकिन साइबर निगरानी करने वाली तकनीक की मौजूदगी से इंकार नहीं किया। भारत में साइबर निगरानी किस तरह हो रही है आम जनता के पास उसके विवरण उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन भारत में चल रही साइबर गतिविधियों का खाता कम से कम अमेरिका के पास जरुर है। मुंबई में हुई 26/11 की घटना के साइबर प्रमाण अमेरिकी जासूसी संस्था एफबीआई के अधिकारियों ने अदालत में आकर जरुर दिए हैं।
     अमेरिका में ऐसे कई साइबर निगरानी संस्थान हैं जो सारी दुनिया के साइबर फ्लो पर नजर लगाए हुए हैं। यह काम कई स्तरों पर कई संस्थाओं द्वारा सुपर कम्प्यूटरों की मदद से किया जा रहा है। यह सारी दुनिया पर साइबर वर्चस्व स्थापित करने की अमेरिकी रणनीति का अभिन्न अंग है। कम्प्यूटर और उपग्रहजनित संचार संबंधों के जरिए हम ऐसी संरचना में बंधते चले जा रहे हैं जिसका संचालक और नियंता कोई और नहीं  अमेरिका है।  
    सामान्य तौर पर कम्र्यूटर के जो बाहर हैं वे साइबर निगरानी के दायरे के बाहर हैं। लेकिन अनेक देश हैं जहां सारे काम कम्प्यूटर करता है। सारी जीवन प्रणाली कम्प्यूटर संचालित है। इसके कारण आम आदमी पर आज सरकारी तंत्र की नजरदारी ज्यादा होने लगी है।  
     सवाल उठता है कि साइबर निगरानी से अपराध घटेंगे या बढ़ेंगे ? कुछ लोगों का मानना है कि साइबर निगरानी से हमें समाज में अपराध कम करने में मदद मिलेगी ,कुछ लोग यह भी मानते हैं कि साइबर निगरानी से अपराध कम नहीं होंगे बल्कि अपराध बढ़ेंगे। यह भी देखने में आया है कि साइबर निगरानी के बाद से काले बाजार का तंत्र और भी मजबूत हुआ है।   
      अमेरिका में संचार क्रांति के सबसे ज्यादा प्रयोग हुए हैं । अमेरिका में संचार तकनीक के संदर्भ में राष्ट्र की रक्षा के नाम पर जो भी कानून बनता है उसका अनुकरण बाद में अन्य देशों में होने लगता है। यही हाल साइबर तकनीक का है। साइबर  तकनीक के अनुकरण ने हमें अमरीकी मार्ग का राही बना दिया है।
      साइबर जासूसी से लेकर साइबर संवाद की जितनी भी हलचलें हैं वे अंततः साइबरवार,साइबर निगरानी के साथ नागरिक समाज और अंतरिक्ष के सैन्यीकरण की ओर ले जा रही हैं। यह सारी प्रक्रिया साइबर संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। आप साइबर में जाएंगे,गूगल सर्च में जाएंगे,फेसबुक या ट्विटर पर जाएंगे आपकी सूचनाएं सीआईए,पेंटागन अथवा अमेरिकी सैन्य और जासूसी संस्थाओं के यहां जमा होंगी। आपकी सारी प्राइवेसी एक तरह से अमेरिका के यहां बंधक रखी हुई है। भारत में जो लोग चार नेताओं की सामान्य बातचीत की फोन टेपिंग पर हंगामा मचा रहे हैं अथवा ‘आउटलुक’ पत्रिका के संपादक जो कुछ भी बता रहे हैं,वह सारे मामले को संचार तकनीक के प्रयोग का लोकल मामला बनाकर पेश कर रहे हैं।
    आज सारी दुनिया में साइबर में वर्चस्व की तेज जंग चल रही है। साइबर तकनीक के सवाल लोकल -ग्लोबल सवाल हैं। साइबर ,इंटरनेट ,आरकुट, फेसबुक, ट्विटर, नेट सर्च,मोबाइल संवाद आदि सारी चीजें साइबर निगरानी के दायरे में हैं। साइबर निगरानी ग्लोबल -लोकल है। साइबर निगरानी के पक्ष में राष्ट्र की सुरक्षा के नाम से तर्क जुटाए जा रहे हैं।
साइबर वर्चस्व के मामले में अमेरिका आज भी बढ़त बनाए हुए है। अमेरिका में घट रहे घटनाक्रम पर नजर रखें तो समूची प्रक्रिया साफ नजर आने लगेगी। ‘वाशिंगटन टैक्नोलॉजी’ ने खबर दी है कि बूज़ एलिन हेमिल्टन ने हाल ही में अकादमिक रिसर्चर,दूरसंचार शोधार्थियों और दूरसंचार उद्योग के बीच सामंजस्य और तालमेल बिठाने के लिए हाल ही में 20 मिलियन डॉलर का एक समझौता किया है। यह समझौता नेटवर्क सुरक्षा और सूचना प्राप्ति के फ्लो को बनाए रखने के नाम पर किया गया है। इस समझौते के तहत अमेरिकी वायुसेना को ज्यादा लाभ होगा। आगामी पाँच साल में यह समझौता 152 मिलियन डॉलर का हो जाएगा। इसके तहत अमेरिकी वायुसेना अपने दूरसंचार नेटवर्क की रक्षा करना चाहती है। इस समझौते के तहत अमेरिकी वायुसेना अपने सैनिकों के लिए सैन्य जासूसी के अत्याधुनिक उपकरणों का जुगाड़ करना चाहती है।
    उल्लेखनीय है अमेरिका का सन् 2011 का रक्षा बजट 800बिलियन डॉलर का है ,इसका अच्छा खासा हिस्सा साइबर निगरानी के यंत्रों और तकनीक के विकास पर खर्च होगा। संचार कंपनियों में अमेरिकी रक्षा बजट के ज्यादा से ज्यादा कॉण्ट्रेक्ट पाने की होड़ लगी है और इस प्रतिस्पर्धा का लक्ष्य है बड़े पैमाने पर अमेरिकी सेनाओं के जंग अभियानों की मदद करना।
     साइबर युद्धापराधों का गोमुख है पेंटागन। साइबर अपराधियों की विश्वव्यापी फौज तैयार करने में पेंटागन की केन्द्रीय भूमिका है। साइबर अपराधियों का प्रभावशाली नेटवर्क पेंटागन ने तैयार किया है। पेंटागन के प्रकाशन Quadrennial Defense Review में इस साइबर योजना के विस्तृत ब्यौरे पढ़े जा सकते हैं। इसे यूएससाइबरकॉम नाम दिया गया है। Quadrennial Defense Review (QDR) ने अमेरिकी वायुसेना के लिए 10 स्पेस और साइबरस्पेस यूनिटें बनाने का निर्णय लिया है।
      इस फैसले के खिलाफ अमेरिका स्थित http://antifascist-calling. blogspot.com नामक संगठन ने आरोप लगाया है कि यूएस साइबरकॉम योजना के तहत सिर्फ सैन्य प्रसंगों पर ही ध्यान नहीं दिया जा रहा है बल्कि बड़े पैमाने पर नागरिकों पर भी निगरानी रखना इसका लक्ष्य है। इस योजना के तहत अतरिक्ष में जनसंहारक हथियारों को स्थापित किया जाएगा और साथ ही आम नागरिकों पर भी निगरानी रखी जाएगी। घरेलू जासूसी करके प्रतिवादी तत्वों को सबक सिखाने और दण्डित करने का काम भी किया जाएगा।
      साइबर संस्कृति की आक्रामक या हमलावर प्रकृति है। अंतरिक्ष अब शून्य नहीं रहा है। बल्कि युद्ध की जगह है। यहां इलैक्ट्रोनिक मैगनेटिक स्पैक्ट्रम के जरिए अंतरिक्ष क्षेत्र का दुरुपयोग चल रहा है। अमेरिका की साइबर और परमाणु गतिविधियों का अंतरिक्ष आज केन्द्रबिंदु है। अंतरिक्ष सभी किस्म की शक्ति और गतिविधियों की धुरी है। इस पर ही आज सारी चीजें निर्भर हैं। हमला करने की आजादी और हमले  से बचने की आजादी का भी यही स्रोत है।
    साइबर पक्षपात और साइबर आक्रमण इन दोनों ही प्रवृत्तियों का अमेरिकी साम्राज्यवाद के हितों के विस्तार और नागरिकों की साइबर निगरानी के लिए व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। नागरिकों की साइबर निगरानी और अंतरिक्ष को हथियारों की होड़ का अंग बनाने के चक्कर में अमेरिकी सत्ता के प्रचारक तरह-तरह झूठे नारे,भय पैदा करने वाले तर्क,भय पैदा करने वाली चेतावनियां जारी करते रहते हैं। साइबर खतरों ,साइबर हमलावरों,साइबर चोरों ,हैकर आदि से बचाने के नाम पर समय समय पर जो चेतावनियां आती रहती हैं इनका बुनियादी लक्ष्य साइबर निगरानी और साइबर वर्चस्व को सुनिश्चित बनाना है।
    साइबर निगरानी के कारण अब प्राइवेसी गुजरे जमाने की बात हो गयी है। साइबर संस्कृति ने ऐसा वातावरण बनाया है कि हम अहर्निश किसी अनहोनी घटना के घटने का इंतजार करते रहते हैं।














2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उम्दा सोच विचार और चिंतन कर लिखी गयी इस प्रस्तुती के लिए आपका धन्यवाद /

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