शनिवार, 1 मई 2010

फिल्मी गीतों में प्रेम और बांसुरी




    फिल्मी गीतों और फिल्म में प्रेम की संरचना का आधार है राधा-मीरा और कृष्ण की त्रयी। प्रेम का रूप राधा-कृष्ण के मिथ का रूपक की तरह उपयोग मिलता है। जब कृष्ण की बांसुरी बजती थी तब राधा और गोपियों को प्रेम की अनुभूति होती थी। बांसुरी के माध्यम से वे कृष्ण की मौजूदगी महसूस करती थीं। यह कृष्ण और बांसुरी के संवेदनात्मक भटकावों को दर्शाता था। सतह पर यह निर्दोष प्रेम था। यह उनके बीच कामुक एवं अविस्मरणीय रूपांतरण को दर्शाता था। बांसुरी के बगैर कृष्ण और राधा के प्रेम की परिकल्पना असंभव थी। बांसुरी उत्प्रेरक थी।
     बांसुरी हमारे ग्राम्य जीवन के रोमांस का प्रतीक है। यह व्यक्तिगत उपकरण है। यह राधा-कृष्ण के मिथ का महत्वपूर्ण प्रतीक चिद्द भी है। राधा-कृष्ण का प्रेम स्त्री-पुरुष का प्रेम है जबकि मीरा और कृष्ण के प्रेम में भक्ति का तत्व प्रमुख है। 
    मीरा ने कृष्ण को त्याग के माध्यम से अर्जित किया है। यह अकामुक, आध्यात्मिक संबंध है। मीरा के यहां शारीरिक एवं संवेदनात्मक संतुष्टि सैकेंडरी है। प्रेम के इन दो मिथकीय रूपों ने ्रूहदी सिनेमा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मीरा का प्रेम दासी का प्रेम है। राधा का प्रेम संवेदनात्मक है किंतु अतिरंजित नहीं है। प्रेम के ये दो रूप दो तरह की औरत के रूप हैं। 
    हिंदी फिल्मों में औरत को मां, प्रेमिका और पत्नी इन तीन रूपों में रूपायित किया गया है। इन तीन संबंधों में औरत को आदर्शीकृत किया गया है। औरत की त्यागमयी मूर्ति का आदर्श नमूना नरगिस (मदर इंडिया) है। यह ऐसी औरत का चरित्र है जो अपने बेटे के लिए जान तक देने को तैयार है (अच्छी औरत आमतौर पर हीरो की मां होती है)। बेटे के अलावा उसके पास कोई काम नहीं है। वह उसकी शादी की चिंता में मगन है। शादी के बाद वह शांति से मरना चाहती है। 
   दूसरी तरफ हीरो है। वह जिस लड़की के पीछे पड़ा है उसे सेक्स के माल से अधिक कुछ नहीं समझता। प्रेम की अस्पष्ट धारणा के बावजूद हिंदी सिनेमा 'शुद्ध प्रेम' के थोड़े-बहुत प्रयत्न करता रहता है।
 मसलन, बुरे आदमी और बुरी औरत का कभी-कभी अच्छे व्यक्ति के रूप में रूपांतरण दिखाया जाता है। यह तब होता है जब उनमें सच्चा प्यार हो। इस तरह की अस्वाभाविक प्रस्तुति प्रेम की शक्ति को दर्शाती है। यानी प्रेम के कारण बुराइयों से मुक्ति संभव। यह अवस्था प्रेमी की या मां के प्यार की भी हो सकती है।
इस तरह की प्रेम संरचनाओं में राधा-कृष्ण और मीरा-कृष्ण का मिथकीय तत्व प्रत्यक्षत: सक्रिय नजर आता है।
     मसलन, 'स्ट्रीट सिंगर' में 'शुद्ध प्रेम' की धारणा का प्रतिपादन है। समूची कहानी में हीरो प्रत्यक्षत: कोई भी ऐसा हाव-भाव पेश नहीं करता जो प्रेम को व्यक्त करे। इस फिल्म ने प्रेम और संगीत के अंतस्संबंध को स्थापित किया था वह आज भी बरकरार है। मसलन, कोई हीरो हवाई जहाज में गाना गा रहा है जबकि हीरोइन अपने कमरे की खिड़की के सहारे खड़ी गाने की पंक्तियां गुनगुना रही है। इस तरह की अर्थहीनता भारतीय मानस सहज ही हजम कर जाता है क्योंकि संगीत एवं प्रेम के बीच में सक्रिय अर्थहीनता की हमारे साहित्य में सुदीर्घ परंपरा रही है और इस परंपरा के प्रति आस्था भी रही है। यही वजह है कि प्रेम की संरचना पर बनी फिल्में ज्यादा लोकप्रिय और प्रेमगीत ज्यादा हिट हुए। 
     भारतीय सिनेमा ने प्रेम के अनेक कोड बनाए। इनमें सबसे प्रभावी कोड है दो प्रेमियों के प्रेम के बीच में संगीत का संप्रेषण। संगीत के माध्यम से प्रेम का कोड राधा-कृष्ण एवं बांसुरी की रूढ़ि से आया है। हकीकत में राधा-कृष्ण की मिथकीय संरचना पर बनी फिल्मों में वास्तविक जगत से प्रेम के नाम पर पलायन है। यह आंतरिक प्रेम है। यह शारीरिक प्रेम का अतिक्रमण कर जाता है। यह पूर्व-औद्योगिक समाज का आदर्श प्रेम है।
     सन् 1950 में बनी 'जोगन' फिल्म में मीरा की तरह का भक्ति एवं त्याग है। यहां तक कि मीरा के भजन भी हैं। फिल्म की कमजोरी यह है कि राधा और मीरा में कौन सी इमेज औरत के लिए सही होगी इसे लेकर निर्देशक केदार शर्मा अनिर्णय की स्थिति में हैं।सन् 1977 में बनी 'स्वामी' (बासु चटर्जी) और 'दुल्हन वही जो पिया मन भाए' (ताराचंद बड़जात्या) में पूर्व-औद्योगिक समाज का प्रेम व्यक्त हुआ है।
     हिंदी सिनेमा की यह विशेषता है कि इसमें जहां एक ओर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के गर्भ से उपजे मूल्यों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है वहीं दूसरी ओर 'अतीत प्रेम' का महिमामंडन है। 'स्वामी' फिल्म में वस्तुत: देवदास शैली का प्रेम है।
      इसी तरह प्रेम की संरचना के साथ पुनर्जन्म के मूल्य का रूपायन भी मिलता है। इस तरह के रूपायन की आदर्श फिल्म है 'महल'। हिंदी फिल्मों में प्रेम की धारणा में अगर कोई संशोधन आया है तो वह राजकपूर एवं गुरुदत्त की फिल्मों के द्वारा आया। राजकपूर की पचास के दशक की फिल्मों में प्रेम की कामुक अभिव्यक्तियों को सामाजिक मर्यादाएं रोकती हैं। हीरो जानता नहीं है कि हीरोइन उस पर जान देती है।
    हीरोइन का इकतरफा प्यार जब चरम पर पहुंच जाता है और अपरिहार्य हो उठता है तब हीरो को पता चलता है। हीरो सरल एवं सहज है।
   राजकपूर की फिल्मों में प्रेमसंबंध धन- दौलत के प्रति तिरस्कार भाव लेकर आता है। यहां सच्चे प्यार पर बल है और हीरो अपने लक्ष्य के प्रति वफादार है। यहां प्रेम के कामुक पहलू का ज्ञान है पर कभी-कभी उसका अस्वीकार भी है। राजकपूर-नरगिस की प्रेमी-युगल जोड़ी आदर्श मानी गई है। इन दोनों में रोमांस का प्रारंभ आंखों से आंखें मिलने से होता है। वे दोनों इसी के माध्यम से प्यार की अग्नि का अहसास करते हैं। एक-दूसरे के करीब आते हैं। मिलन की बेला आते ही निश्चित 'कोड' का इस्तेमाल कर लिया जाता है।
   मसलन, चुंबन के दृश्य के लिए फूलों का एक-दूसरे से मिलना या दो पक्षियों का चुंबन दिखाया जाता है। राजकपूर ने इस तरह के अनेक 'कोड' लागू किए हैं जो हमारी साहित्यिक परंपरा में हैं। इस तरह के 'कोड' प्रेम की शारीरिक अनिवार्यता को उदघाटित करते हैं, साथ ही, उसे अभिव्यक्त करने की अक्षमता को दर्शाते हैं। 'आग', 'आवारा', 'जागते रहो' आदि फिल्मों में देवदास फिल्म की परंपरा जारी रहती है। किंतु प्रच्छन्नत: उस परंपरा पर प्रश्नचिह्न भी लगाए गए हैं।
        राजकपूर की फिल्मों में परंपरागत मूल्यों एवं उदीयमान औद्योगिक समाज के मूल्यों की टकराहट भी मिलती है। मसलन, 'आग' और 'आवारा' में बेटे ने पिता के खिलाफ विद्रोह किया। बेटा समाजवादी एवं इगेलिटेरियन दार्शनिक भावों को व्यक्त करता है। गुरुदत्त की फिल्मों में सामाजिक विषमता के प्रश्नों को उठाया गया है। इनकी फिल्मों में औद्योगिक समाज के भौतिकवादी दृष्टिकोण के प्रति प्रतिक्रियाएं मिलती हैं।
   वे 'देवदास' के विजन के दायरे में ही सीमित रहते हैं। नए मूल्यों का विरोध करते हैं। प्रेम के आदर्श रूप के तौर पर 'प्यासा' को लिया जा सकता है। फिल्म का हीरो सच्चे प्यार एवं त्याग के लिए प्रतिबध्द है जबकि मीना ऐसे विश्व का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें औद्योगिक समाज के भौतिक मूल्यों का दृष्टिकोण अभिव्यक्त होता है। सन 1956 में गुरुदत्ता की फिल्म 'सीआईडी' में देवानंद की जो इमेज पेश की गई वह राजकपूर, दिलीपकुमार की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है।
   देवानंद ऐसा हीरो है जो इगेलिटेरियन और कामुक संबंधों को स्वीकार करता है। वह कामुक उत्तोजनाओं को पैदा करता है। स्वयं भी कामुक प्रतीक के रूप में उभरकर आता है। यह कामुक हीरो आज तक फिल्मों के केंद्र में है। कामुक उद्दीपन के लिए ऐसी नायिका की जरूरत महसूस की गई जो पुरुष-प्रधान ईगो को उभारे, कामुक उत्तेजना पैदा करे। अब नायिका कामुक प्रतीक बन गई। अब उसे दो तरह की भूमिकाएं अदा करनी थीं, एक ओर आदर्श हीरोइन की भूमिका थी तो दूसरी ओर काम देवी की भूमिका अदा करनी थी। मसलन, 'सीआईडी' में वहीदा रहमान ने पहले 'वेंप' और बाद में अच्छी औरत की भूमिका अदा की। वह दोनों भूमिकाएं बखूबी निभाती है। 
     इसी तरह 'गाइड' में वहीदा रहमान ने अच्छी औरत की भूमिका अदा की जो कामोत्तेजना पैदा करनेवाले नृत्य भी पेश करती है। यह एक नए किस्म की औरत है। उसमें आधुनिकतावाद एवं परंपरा का मिश्रण है। शिक्षा एवं मुक्त प्रेम की हिमायती, प्रेम के साथ शारीरिक लगाव, मानसिक तौर पर कामुक आकांक्षाओं, पहनावे, फैशन आदि में पश्चिमी। यह औरत ऐसे समय में परंपरा की ओर मुड़ती थी जब कहानी का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु आता था। तब वह अपनी आधुनिकतावादी खूबियों को छिपा लेती है। उस समय वह सदियों पुराने पिता, भाई, पति-भगवान वाले एटीटयूड को व्यक्त करती है। इस तरह का स्टीरियोटाइप दर्शकों में सहज स्वीकार्य रहा है। क्योंकि वह बुनियादी समस्या कामुक असमर्थता का समाधान देता था।

1 टिप्पणी:

  1. नमस्कार! आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ / स्वर्गीय Bibhooti bhooshan bandyopaadhyaay ने मेघमल्लार नामक कहानी लिखा था / उसमें प्रद्युम्न नामक कथापात्र बांसुरी संगीत के जरिये माँ सरस्वती को बंधनस्था कर दिया, एक शाक्तेय की प्रेरणा से / फिर उसने स्वजीवन का त्याग किया और अम्बिका को स्वंतंत्र कर दिया /
    आपसे सादर प्रश्न पूछूंगा कि इस कहानी की हिंदी परिभाषा (तर्जुमा) किसीने किया हैं ? मैं केवल हिंदी और अंग्रेजी और मेरी मातृभाषा मलयालम जानता हूँ /
    आपने क्या इस कहानी का अंग्रेज़ी translation देखा हैं ? कृपया बता दीजियेगा // मेरी हिंदी में जो गलतियाँ हैं , उनके नाम में क्षमा मांगता हूँ // धन्यवाद !

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