रविवार, 9 मई 2010

इंटरनेट युग में टोमागुची हो गए हम



         हाल के वर्षों में कला और साहित्य के क्षेत्र में एक विलक्षण फिनोमिना नजर आया है। इस फिनोमिना के तहत ''इंटर पेसिविटी' पर जोर दिया जाता है। यह ''इंटरएक्टिविटी' फिनोमिना का विलोम है। ''इंटरएक्टिविटी'' के तहत अन्य विषय के जरिए व्यक्त किया जाता था। 
           हेगेलियन विचार था कि मानवीय पेसन को अपने लक्ष्य को अर्जित करने के लिए मेनीपुलेट करो। पहलीबार लाकां ने ग्रीक त्रासदी के समूहगान के संदर्भ में '' इंटरपेसिविटी'' की धारणा का विवेचन किया। लाकां ने लिखा '' शाम को जब आप थियेटर जाते हैं, आप सारे दिन के कामों से थके होते हैं। काम के दर्द के मारे थक चुके होते हैं। जब आप ऑफिस से बाहर निकलते हैं और दूसरे दिन आने के लिए दस्तखत कर रहे होते हैं तो अपने को ज्यादा श्रेय दे रहे होते हैं, ऐसी अवस्था में तुम्हारे भावों की जगह उस समय मंच पर दिखाए जाने वाली स्वास्थ्यप्रद चीजें ले लेती हैं। समूहगान इनमें आपका ख्याल रखते हैं। भावुक कमेंटरी आपको सुनाई जाती है। ... फलत: आपको चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं होती, तब भी चिन्ता करने की जरूरत महसूस नहीं होती जब आप कुछ नहीं सोच रहे होते, समूहगान आपको एहसास दिलाता रहता है कि आप महसूस कर रहे हैं।'' इस तरह की अवस्था आधुनिक भारतीय टीवी चैनल '' लाफ्टर चैलेंज'' शो जैसे कार्यक्रमों में साफतौर पर देखी जा सकती है। इस तरह के कार्यक्रम ''इंटरपेसिविटी'' के आदर्श उदाहरण हैं।
        ''लाफ्टर शो'' में हंसी को साउण्ड ट्रेक के जरिए पैदा किया जाता है। जिससे टीवी सेट हमारे लिए हंस सके। इस तरह की प्रस्तुति दर्शक के पेसिव अनुभवों को आत्मसात कर लेती है। मसलन् उस दृश्य की कल्पना करें जब हमारे बीच में सुनने वाला कोई न हो और ऐसे में कोई घटिया चुटकुला सुनाया जाए तो क्या होता है ? और चुटकुला सुनकर आप जोर से हंसने लगें और जोर से कहें '' अरे गुरू मजा आ गया।'' 
      तकरीबन यही स्थिति उस अभिनय की भी होती है जब अभिनेता अभिनय करता है और वैसी ही प्रतिक्रिया की दर्शक से उम्मीद करता है। लाफ्टर शो जैसे कार्यक्रमों में ग्रीक समूहगान की तुलना में स्थिति एकदम विपरीत होती है। ग्रीक समूहगान वाले दर्शक के अनुभवों को महसूस करते थे, दर्शक के भावों को आत्मसात करते थे,अभिनेता की पेसिव भूमिका हुआ करती थी, वहां दर्शक अनुभव करता था, किंतु लाफ्टर शो जैसे कार्यक्रमों में स्थिति एकदम भिन्ना है, यहां जो नरेटर या चुटकुला सुनाने वाला है वह चाहता है दर्शक पेसिव भूमिका अदा करे। नरेटर पेसिव भूमिका अदा नहीं करता बल्कि दर्शक पेसिव भूमिका अदा करता है, नरेटर अपने चुटकुलों पर स्वयं हंसता है। जनता के हंसने की बजाय वह स्वयं हंसता है।

        स्लावोज़ ज़ीज़ेक ने कुछ अर्सा पहले टोमागुची नामक वर्चुअल टॉय के बारे में लिखा था। यह खिलौना, बच्चे की तरह व्यवहार करता है। यह शब्द करता है और अपने मालिक के सामने मांगे पेश करता है। आप तुरंत संबंधित बटन को दबाएं और उसकी मांग पूरी करें, उसे संतुष्ट कर दें। मसलन् आप खिलौने में चाभी देकर उसे चालू करते हैं, उससे खेलते हैं, टोमागुची खिलौने में ऐसी बटन हैं जो खिलौने की प्रत्येक मांग की पूर्ति करती हैं, उस खिलौने के पास छोटा सा हृदय भी है ,आप देख सकते हैं कि खिलौना कितना खुश है। यदि आप टोमागुची की मांग की एक-दो बार पुनरावृत्ति होने पर पूर्ति नहीं करते तो तीसरी बार खिलौना गिर पड़ता है और इसके बाद ऑब्जेक्ट निश्चित रूप से मर जाता है। अथवा वह फंक्शन करना बंद कर देता है। ऐसी स्थिति में टोमागुची के लिए श्मशान की व्यवस्था की गई है। वे बच्चे जो अपाहिज हैं वे टोमागुची के साथ खेलते हैं और उसके बहाने अपने को व्यक्त करते हैं। यदि आप उनकी तरफ ध्यान नहीं देते हो तो वे हंगामा खड़ा कर देते हैं।

      ज़ीज़ेक ने लिखा जापान के बच्चों में टोमागुची के व्यापक नकारात्मक प्रभाव देखे गए हैं। यह एक तरह का ऑटोमेटिक खिलौना है। इस तरह के स्वचालित खिलौनों में आप सक्रिय होते हैं ,किंतु छद्म रूप में,सक्रिय हैं इसलिए कि कुछ हो न जाए, पहले हम सक्रिय होते थे कुछ करने के लिए अब सक्रिय होते हैं कि कुछ घटे नहीं। हम अब एक्टिव है कुछ हासिल करने के लिए नहीं बल्कि एक्टिव हैं रोकने के लिए। 
     नए मीडिया की समस्या यही है उसने हमें सक्रिय किया है किंतु कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि रोकने के लिए। आज हम अपनी दैनन्दिन जिन्दगी में छद्म गतिविधियों में बंद होकर रह गए हैं। ऐसी गतिविधियों में कैद हैं जिनसे हमें कुछ हासिल नहीं होना है। 
      पहले गतिविधि का लक्ष्य हासिल करना होता था ,इन दिनों गतिविधियों का लक्ष्य रोकना होता है। राजनीति में भी पुराने विचारधारात्मक सवाल हाशिए पर हैं अथवा पृष्ठभूमि में चले गए हैं। आज सवाल यह नहीं है कि बिल्ली लाल है या काली बल्कि सवाल यह है कि चूहा कैसे पकड़ा जाए, आज लोग यह कहते हैं कि अच्छा विचार कहीं से भी मिले ,उसे तुरंत लागू करो, उसकी विचारधारा कुछ भी हो। ''अच्छा विचार'' का यहां अर्थ क्या है ? इसका अर्थ है कि जो विचार काम करे, उसे लागू करो। इसका अर्थ यह भी है कि मौजूदा परिस्थति में यथास्थिति बनाए रखकर काम करो। यथास्थिति को मत बदलो। सामाजिक-राजनीतिक संबंधों को मत बदलो। जब हम राजनीतिक भूमिका की बात करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि जो विचार लागू कर सकते हो उसे लागू कर दो। बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप अच्छे विचार को एडवांस में ही स्वीकृति दे देते हैं।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत स‌ही लिखा है, स‌र आपने। अच्छा लगा, साथ ही बेचैन भी कि आखिर कहाँ ले जाएगा यह स‌बकुछ हमें! ‌- कुमार विश्वबन्धु

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