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सोमवार, 31 अगस्त 2015

अपराध और अपराधी मध्यवर्ग-


      अपराध और अपराधी का कोई वर्ग नहीं होता,इसके बावजूद यह जानना समीचीन होगा कि आखिरकार इस दौर में अपराधी किस वर्ग में सबसे ज्यादा पैदा हो रहे हैं और कानून का वे किस तरह दुरुपयोग कर रहे हैं। नए आंकड़ों और मीडियायथार्थ की रोशनी में हमें अपराधी के वर्गचरित्र को भी चिह्नित करना चाहिए। मसलन्,मध्यवर्ग में सबसे ज्यादा टैक्सचोर हैं,मध्यवर्ग  में सबसे ज्यादा ह्वाइटकॉलर अपराधी हैं,दहेज उत्पीड़न,स्त्री-उत्पीड़न और साइबर अपराधी सबसे ज्यादा मध्यवर्ग में है,स्थिति यह है कि आईपीएल से लेकर बीपीएलकार्ड स्कैंडल तक,मनरेगा से लेकर खनन माफिया तक, ड्रग माफिया से लेकर बर्बर क्राइम के क्षेत्रों तक मध्यवर्ग का जाल फैला हुआ है।आतंकवाद-साम्प्रदायिकता और पृथकतावादी हिंसाचार में भी मध्यवर्गीय युवाओं का एक बड़ा अंश लिप्त है।  मध्यवर्ग के इस व्यापक बर्बर-अपराधी चरित्र की अनदेखी करके भारत के बुर्जुआजी और उसके द्वारा निर्मित शिक्षा व्यवस्था की भूमिका को सही परिप्रेक्ष्य में समझना मुश्किल है।
     मध्यवर्ग के आपराधिक चरित्र का चरमोत्कर्ष है यूपीएससी निर्मित अफसरों की एक अच्छी-खासी तादाद का विभिन्न किस्म के क्राइम में लिप्त पाया जाना। उनके किस्से आए दिन मीडिया में हमारे सामने आते रहते हैं।इसके अलावा नए व्यापारियों के रुप में उभरते मध्यवर्ग में भी क्राइम दर तेजी से बढ़ी है। इस सबने मध्यवर्ग के आपराधिक चरित्र को पुख्ता किया है। आज स्थिति यह है कि अपराध का कोई क्षेत्र नहीं है जहां शिक्षित मध्यवर्ग का वर्चस्व न हो।
    अपराधी मध्यवर्ग तो मीडिया का सबसे बड़ा खाद्य है।  मीडिया में जब भी अपराधी मध्यवर्ग के किसी व्यक्ति का कवरेज आता है वह सबसे ज्यादा दर्शक खींचता है। यही वजह है अपराध कार्यक्रम सबसे अच्छी रेटिंग में चल रहे हैं। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमें शीना बोरा हत्याकांड के कवरेज को देखना चाहिए। अब तक का कवरेज हत्या किस तरह की गयी,कैसे की गयी इसके विवरण और ब्यौरों से भरा पड़ा है। मीडिया की दिलचस्पी हत्या की प्रक्रिया को बताने में है ,वह अन्य पहलुओं को उजागर करने में कोई रुचि नहीं दिखा रहा। हत्या के तरीकों का बार-बार रुयायन अंततः अपराध के प्रति सहिष्णुभाव पैदाकरता है,अपराध को नॉर्मल, सहज,सहनीय बनाता है। कायदे से न्याय और दण्ड पर जोर होना चाहिए लेकिन न्याय और दण्ड में किसी भी टीवी चैनल की दिलचस्पी नहीं है।     
     दिलचस्प बात यह है कि इस हत्या को किसी ने खोजा नहीं है,हत्या क्यों हुई और कैसे हुए,इसके बारे में ड्राइवर ने 3साल बाद थाने में जाकर बताया है। मीडिया से लेकर पुलिस तक सभी हत्या के पीछे निहित मंशा को खोज रहे हैं। उसके प्रमाण खोज रहे हैं। इस हत्या ने एकबार फिर से परिवार नामक संस्था को कलंकित किया है। इस घटना ने यह संदेश दिया है कि हमारा समाज और परिवार किस तरह बर्बर और मूल्यहीन हो गया है।  इस हत्या ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि हमारा मध्यवर्ग किस तरह झूठ-फरेब और अपराधीकरण में मशगूल है और समाज में उसे सम्मान भी मिल रहा है। यह वह वर्ग है जो अपराध करने बावजूद अपराधी नहीं है,सम्मानित है,वह समाजीकरण की प्रक्रिया के जरिए समाज में सम्मान पा रहा है।हमारे अंदर इस वर्ग के प्रति,इसके सड़े हुए मूल्यों के प्रति घृणा पैदा नहीं हो री बल्कि किसी न किसी रुप में सम्मान का भाव है। इस तरहके अपराध की रिपोर्टिंग घृणा का संचार नहीं करती बल्कि जिज्ञासा का संचार करती है। फलतःवह वैधता प्राप्त कर लेती है।      
       शीना बोरा की मौत सामान्य नहीं है,बल्कि असामान्य है। कम से कम यह बात तो हम कह ही सकते हैं कि समाज में इस तरह का माहौल बन गया है लड़की अपने घरवालों के बीच में भी सुरक्षित नहीं है। सामान्यतौर पर घर को लड़की के लिए सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता था लेकिन शीना की हत्या ने एकबार यह तथ्य पुष्ट किया है कि हमारे घर और परिवारीजन हत्यारे गिरोह बनकर रह गए हैं। इन हत्यारे गिरोहों को हम बार –बार अपराध करते देखते हैं और इसके बावजूद हमारे मन में परिवार जैसी संस्था को लेकर  सवाल पैदा नहीं हो रहे,परिवार हमारे लिए अभी भी परम-पवित्र संस्था बनी हुई है। परिवारीजन पुण्यात्मा बने हुए हैं। शीना की हत्या को हम यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखें तो चीजें शायद बेहतर ढ़ंग से नजर आएं।

        परिवारीजननों के द्वारा लड़कियों की विभिन्न बहाने से हत्याएं,बलात्कार,शारीरिक उत्पीड़न और गुलामों जैसी अवस्था को देखकर भी हमें कभी भी गुस्सा नहीं आता,हम कामना नहीं करते कि यह परिवार और उसका क्रिमिनल ढ़ाँचा नष्ट हो। हम बार –बार इस क्रिमनल पारिवारिक ढ़ाँचे और क्रिमिनल पारिवारिक संबंधों को किसी न किसी बहाने बनाए और बचाए रखना चाहते हैं । यही वह बिन्दु है जहां पर सबसे ज्यादा प्रतिवाद करने की जरुरत है। 

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

आत्महत्या क्या है ? - एमिल दुर्खीम -2- समापन किश्त

    आत्महत्या व्यक्ति का कृत्य है और इससे व्यक्ति ही प्रभावित होता है। अत: वह पूरी तरह से वैयक्तिक तत्वों पर ही आश्रित रहना चाहिए जिनका ताल्लुक केवल मनोविज्ञान से है। लेकिन क्या आत्महंता के संकल्प में उसके मिजाज, चरित्र, पूर्ववृत्त और निजी इतिहास की कोई भूमिका नहीं है?
आत्महत्याओं का इस तरह से युक्तियुक्त अध्ययन किस डिग्री और अवस्थाओं में किया जा सकता है, इस पर फिलहाल विचार करने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह बात निश्चित है कि उन्हें एक अलग आलोक में देखा जा सकता है। यदि आत्महत्याओं को अलग-अलग अध्ययन के योग्य अलग-थलग और असंबध्द घटनाओं के रूप में देखने के बजाए एक निश्चित काल के दौरान एक निश्चित समाज में उनकी संपूर्णता में देखा जाए तो पता चलेगा कि यह संपूर्णता स्वतंत्र इकाइयों का जोड़ मात्र नहीं है। यह अपने आप में एक अद्वितीय तथ्य है जिसकी अपनी अन्विति, वैयक्तिक और अपना स्वरूप हैएक स्वरूप जो कि प्रमुख रूप में सामाजिक है। यदि बहुत लंबी अवधि को न लिया जाए तो, जैसा कि तालिका ढ्ढ (देखें पृष्ठ 45)से स्पष्ट है, उसी समाज के आंकड़े लगभग एक जैसे हैं। यह इसलिए है क्योंकि आवामों के जीवन से जुड़ी पर्यावरण परिस्थितियां वर्ष दर वर्ष अपेक्षाकृत अपरिवर्तित रहती हैं। यह सही है कि अधिक विचारणीय परिवर्तन कभी-कभार होते हैं। लेकिन वे अपवाद स्वरूप होते हैं। साथ ही वे स्पष्ट रूप में हमेशा सामाजिक अवस्था को प्रभावित करने वाले अस्थायी संकट के साथ आते हैं। 1948 में वे यूरोपीय देशों में अचानक गिरावट के रूप में आए।
यदि एक लंबी अवधि को लिया जाए तो अधिक गंभीर परिवर्तन नजर आएंगे। इसके बाद वे चिरकालिक बन जाते हैं। इससे केवल यही सिध्द होता है कि समाज की संरचनात्मक विशेषताओं में भी इसके साथ ही गंभीर बदलाव आए हैं। दिलचस्प बात यह है कि वे अत्यधिक धीमी गति से प्रकट नहीं होते जैसा कि बहुत से प्रेक्षकों का मानना है। वे अकस्मात और प्रगतिशील होते हैं। कुछ वर्षों, जिनके दौरान इन आंकड़ों में बहुत कम उतार-चढ़ाव होता है, के बाद इनमें अचानक वृध्दि होती है जो बार-बार दोलन के बाद स्थिर हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सामाजिक संतुलन में गड़बड़ी अचानक आई लगती है, लेकिन इसके सभी परिणामों के सामने आने में समय लगता है। आत्महत्या का क्रम-विकास अलग और निरंतर तरंगित हलचलों के रूप में होता है जो कि अनियमित होती है और कुछ समय तक विकसित होकर थम जाती है और फिर शुरू हो जाती है। तालिका-1- के अनुसार इस तरह की तरंग पूरे यूरोप में 1848
तालिका -1-
प्रमुख यूरोपीय देशों में आत्महत्या की स्थिरता (पूर्ण आंकड़े)
वर्ष    फ्रांस  एशिया इंगलैंड सेक्सोनी     बावरिया      डेनमार्क
1841  2,814 1,630       290         377
1842  2,866 1,598       318         317
1843  3,020 1,720       420         301
1844  2,973 1,575       335   244   285
1845  3,082 1,700       338   250   290
1846  3,102 1,707       373   220   376
1847  (3,647)     (1,852)            377   217   345
1848  (3,301)     (1,649)            398   215   (305)
1849  3,583 (1,527)            (328) (189) 337
1850  3,596 1,736       390   250   340
1851  3.598 1,809       402   260   401
1852  3,676 2,073       530   226   426
1853  3.415 1,942       431   263   419
1854  3,700 2,198       547   318   363
1855  3,810 2,351       568   307   399
1856  4,189 2,377       550   318   426
1857  3,967 2,038 1,349 485   286   427
1858  3,903 2,126 1,275 491   329   457
1859  3,899 2,146 1,248 507   387   451
1860  4,050 2,105 1.365 548   339   468
1861  4,454 2,185 1,347 (643)
1862  4,770 2,112  1,317  557
1863  4,613 2,374 1,315  643
1864  4,521 2,203 1,240 (545)       411
1865  4,946 2,361 1,392 619         451
1866  5,119  2,485 1,329 704   410   443
1867  5,011 3,625 1,316  752   471   469
1868  (5,547)     3,658 1,508 800  453   498
1869  5,114  3,544 1,588 710   425   462
1870        3,270 1,554             486
1871        3,135 1,495
1872        3,467 1,514
के घटनाक्रम के बाद या देशों के अनुसार 1850-1853 के दौरान आई। एक अन्य तरंग 1866 के युध्द के बाद जर्मनी में आई। फ्रांस में यह साम्राज्यवादी सरकार के शिखर पर पहुंचने के समय 1860 के आसपास आई, इंगलैंड में 1868 के आसपास या समकालीन वाणिज्यिक संधियों से उत्पन्न वाणिज्यिक क्रांति के बाद। शायद इसी कारण से 1865 के आसपास यह तरंग 1865 में इंगलैंड में फिर आई। अंत में 1870 के युध्द के बाद फिर आगे बढ़ी जो कि अभी भी और कमोबेश पूरे यूरोप में नजर आ रही है।
अपने इतिहास के प्रत्येक क्षण में प्रत्येक समाज में आत्महत्या के प्रति एक निश्चित रुझान रहता है। इस रुझान की तीव्रता स्वैच्छिक मृत्यु की संख्या और प्रत्येक आयु और लिंग की जनसंख्या के अनुपात द्वारा मापी जाती है। इस संख्यात्मक आधार को हम आत्महत्या के जरिए मृत्युदर, विचाराधीन समाज की विशेषता कहेंगे। यह प्रत्येक दस लाख निवासियों में इनकी संख्या द्वारा परिकलित की जाती है।
यह दर न केवल काफी लंबे समय तक स्थिर बनी रहती है बल्कि इसकी स्थिरता महत्वपूर्ण जनसंख्या आंकड़ों की स्थिरता से भी अधिक है। सामान्य मृत्युएं वर्ष दर वर्ष अधिक बार बदलती हैं और यह बदलाव कहीं अधिक होता है। यह बात विभिन्न अवधियों में दोनों तत्वों में परिवर्तन की तुलना करके दर्शाई जा सकती है। यह कार्य हमने तालिका ढ्ढढ्ढ में किया है। इनमें संबंध को दर्शाने के लिए प्रत्येक वर्ष में मृत्यु और आत्महत्या दोनों की दरों को उस अवधि की औसत दर के अनुपात के रूप में प्रतिशत में दर्शाया गया है। एक वर्ष से दूसरे वर्ष के अंतरों या औसत दर से अंतरों को दो कालमों में तुलनीय बनाया गया है। इस तुलना से ऐसा लगता है कि प्रत्येक अवधि में आत्महत्या के मुकाबले सामान्य मृत्यु के मामले में परिवर्तन मात्रा बहुत अधिक है। औसतन यह दुगुनी है। पिछली दो अवधियों में लगातार दो वर्षों में केवल न्यूनतम अंतर प्रत्येक मामले में स्पष्ट रूप से समान है। लेकिन मृत्यु के कालम में यह न्यूनता अपवाद रूप में कम है, जबकि आत्महत्याओं में वार्षिक परिवर्तन इससे कभी-कभार ही भिन्न है। यह औसत अंतरों में तुलना करके देखा जा सकता है।
एक निश्चित बात यह है कि यदि हम एक अवधि के लगातार वर्षों में तुलना करने के बजाए विभिन्न अवधियों के औसतों की तुलना करें तो मृत्युदर में परिवर्तन लगभग नगण्य नजर आएगा। यदि अधिक लंबी अवधि का परिकलन किया जाए तो अस्थायी या दुर्घटना कारणों से वर्ष दर वर्ष एक या दूसरी दिशा में परिवर्तन एक दूसरे को निष्प्रमाणित कर देते हैं; ये परिवर्तन औसत आंकड़ों में नहीं झलकते जिसकी वजह से उनमें अपरिवर्तनीयता और अधिक नजर आती है। उदाहरण के लिए, फ्रांस में 1841 से 1870 की अवधि में लगातार प्रत्येक दस वर्ष में यह 23.18; 23.72; 22.87 थी। लेकिन सबसे पहले तो यह उल्लेखनीय है कि एक वर्ष से अगले वर्ष में आत्महत्याएं
तालिका -2-
आत्महत्या मृत्युदर और सामान्य मृत्युदर में तुलनात्मक भिन्नता
क. पूर्ण आंकड़े
अवधि प्रति   प्रति   अवधि प्रति   प्रति   अवधि प्रति   प्रति
1841- 1,00,000    1,000 1849- 1,00,000    1,000 1856- 1,00,000    1,000
 46   आत्महत्या   मृत्यु- 55   आत्महत्या   मृत्यु- 60   आत्महत्या   मृत्यु-
      दर    दर          दर    दर          दर    दर
1841  8.2   23.2  1849  10.0  27.3  1856  11.6   23.1
1842  8.3   24.0  1850  10.1  21.4  1857  10.9  23.7
1843  8.7   23.1  1851  10.0  22.3  1858  10.7  24.1
1844  8.5   22.1  1852  10.5  22.5  1859  11.1   26.8
1845  8.8   21.2  1853  9.4   22.0  1860  11.9   21.4
1846  8.7   23.2  1854  10.2  27.4
                  1855  10.5  25.9
औसत 8.5   22.8  औसत 10.1  24.1  औसत 11.2   23.8
ख. औसत से संबंधित वार्षिक दर प्रतिशत में
1841  96    101.7 1849  98.9  113.2 1856  103.5 97
1842  97    105.2 1850  100   88.7  1857  97.3  99.3
1843  102   101.3 1851  98.9  92.5  1858  95.5  101.2
1844  100   96.9  1852  103.8 93.3  1859  99.1  112.6
1845  103.5 92.9  1853  93    91.2  1860  106.0 89.9
1846  102.3 101.7 1854  100.9 113.6            
                  1855  103   107.4            
औसत 100   100   औसत 100   100   औसत 100   100
ग. अंतर की मात्रा
      दो लगातार वर्षों           औसत से नीचे
      के बीच      और ऊपर
                 
      सर्वाधिक     न्यूनतम     औसत अधिकतम    अधिकतम
      अंतर  अंतर  अंतर  नीचे   ऊपर
                  प्रतिशत 1841-46
सामान्य मृत्यु 8.8   2.5   4.9   7.1   4.0
आत्महत्या मृत्यु     5.0   1     2.5   4     2.8
                  प्रतिशत 1849-55
सामान्य मृत्यु 24.5  0.8   10.6  13.6  11.3
आत्महत्या मृत्यु     10.8  1.1    4.48  3.8   7.0
                  प्रतिशत 1856-60
सामान्य मृत्यु 22.7  1.9   9.57  12.6  10.1
आत्महत्या मृत्यु     6.9   1.8   4.82  6.0   4.5
अवधिवार सामान्य मृत्युओं से अधिक नहीं तो बराबर स्थिर है। इसके अलावा औसत मृत्युदर सामान्य और अव्यक्तिक होकर ही इस तरह की नियमितता प्राप्त करती है। इससे किसी समाज की बहुत अपूर्ण तसवीर ही उभरती है। वास्तव में एक जैसी सभ्यता मात्रा वाले सभी आवामों में यह लगभग एक समान है। यदि अंतर है तो बहुत कम। उदाहरण के लिए, फ्रांस के मामले में जैसा कि हमने अभी देखा 1841 से 1870 के बीच यह प्रति हजार निवासी 23 मृत्यु के आसपास रही। इसी अवधि के दौरान बेल्जियम में यह 23.93, 22.5, 24.04 थी; इंगलैंड में 22.32, 22.21, 22.68; डेनमार्क में 22.65 (1845-49), 20.44 (1855-59), 20.4 (1861-68); रूस, जो कि केवल भौगोलिक दृष्टि से यूरोपीय है, को छोड़कर बड़े यूरोपीय देशों में केवल इटली में मृत्युदर में काफी अंतर है। 1961 और 1867 के बीच यह बढ़कर 30.6 हो गई। ऑस्ट्रिया में यह और भी अधिक (32.52) थी। इसके विपरीत आत्महत्या दर के वार्षिक परिवर्तन तो बहुत कम हुए हैं, लेकिन समाज के अनुसार वह दुगुनी, तिगुनी चौगुनी और उससे भी ज्यादा है (। इस प्रकार मृत्युदर से इसकी मात्रा अधिक है और प्रत्येक सामाजिक समूह, जिसमें इसे विशेषता सूचकांक माना जा सकता है, के मामले में अलग है। यह राष्ट्रीय मिजाज के गहरे तत्व के साथ इतनी घनिष्ठता के साथ संबध्द है कि इस दृष्टि से विभिन्न समाजों का जो क्रम बनाया गया है, वह विभिन्न अवधियों में बना रहता है। यह बात इसी तालिका की जांच से सिध्द हो जाती है। यहां जिन तीन कालों की तुलना की गई है, उन सभी में आत्महत्या बढ़ी है लेकिन इस वृध्दि में सभी आवामों ने एक दूसरे से अपनी दूरी बनाए रखी है। वृध्दि का प्रत्येक का अपना एक गुणांक है।
इस प्रकार आत्महत्या दर एक वास्तविक पध्दति है, एकीकृत और निश्चित। यह बात इसकी स्थिरता और अस्थिरता दोनों से ही स्पष्ट है। यह स्थिरता और कुछ नहीं बल्कि अलग विशेषताओं के समूह का परिणाम है। ये विशेषताएं परस्पर आश्रित हैं और अलग आनुषंगिक परिस्थितियों के बावजूद एक साथ प्रभावी होती हैं। अस्थिरता इन्हीं विशेषताओं के ठोस और वैयक्तिक स्वरूप को सिध्द करती है क्योंकि उनमें समाज के वैयक्तिक स्वरूप के अनुसार परिवर्तन होता है। संक्षेप में ये आंकड़े पूरे समाज को सामूहिक रूप में ग्रसित करने वाली आत्महत्या प्रवृत्ति को अभिव्यक्त करते हैं। इस प्रवृत्ति के वास्तविक स्वरूप को व्यक्त करने की जरूरत नहीं है अर्थात यह सामूहिक मानस की अद्वितीय मनोदशा है जिसकी अपनी वास्तविकता है या यह व्यक्ति मनोदशाओं का जोड़ मात्र है। पहले के विचारों का दूसरी परिकल्पना के साथ संगति बिठाना मुश्किल है। इस बारे में हम इस पुस्तक में आगे चर्चा करेंगे। इस विषय के बारे में किसी का कुछ भी अभिमत क्यों न हो इस तरह की प्रवृत्ति किसी न किसी  शीर्षक से जरूर मौजूद रहती है। प्रत्येक समाज में स्वैच्छिक मृत्युओं का एक निश्चित कोटा रहता ही है। यह स्थिति समाजशास्त्र में विशेष अध्ययन का विषय हो सकती है। हम इसी का अध्ययन करना चाहते हैं।
इस प्रकार हम व्यक्ति आत्महत्या के मूल को प्रभावित करने वाली सभी स्थितियों की यथासंभव पूरी सूची नहीं तैयार करना चाहते। हम तो केवल उन स्थितियों की जांच करना चाहते हैं जिन पर यह निश्चित तथ्य, जिसे हमने सामाजिक आत्महत्या दर कहा है, निर्भर करता है। इन दोनों सवालों के बीच चाहे जितना ताल्लुक हो लेकिन ये स्पष्ट रूप में भिन्न हैं। निश्चित रूप में कुछ वैयक्तिक स्थितियां इतनी आम नहीं हैं कि वे कुल स्वैच्छिक मृत्युओं और जनसंख्या के बीच संबंध को प्रभावित कर सकें। ये इस या उस व्यक्ति द्वारा आत्महत्या का कारण बन सकती हैं, लेकिन वे पूरे समाज में आत्महत्या की छोटी या बड़ी प्रवृत्ति नहीं बन सकतीं। चूंकि ये स्थितियां सामाजिक गठन की किसी निश्चित अवस्था पर आश्रित नहीं होतीं इसलिए उनकी कोई सामाजिक प्रतिक्रियाएं भी नहीं होतीं। इस प्रकार उनका ताल्लुक मनोविज्ञानिक से है समाजशास्त्री से नहीं। समाजशास्त्री उन कारणों का अध्ययन करता है जो अलग-अलग व्यक्तियों को नहीं बल्कि समूह को प्रभावित करने में सक्षम हैं। इसलिए उसका ताल्लुक आत्महत्या के केवल उन तत्वों से है जिनका प्रभाव पूरे समाज द्वारा महसूस किया जाता है। आत्महत्या दर इन्हीं तत्वों का परिणाम है। यही कारण है कि हम केवल उन्हीं की ओर ध्यान देंगे।
मौजूदा काम के इस विषय को तीन खंडों में रखा गया है।
स्पष्टीकरण के लिए चुना गया प्रस्तुत तत्व व्यापक सामान्यतया वाले समाजेत्तर कारणों पर निर्भर कर सकता है या स्पष्ट रूप में सामाजिक कारणों पर। पहले हम समाजेत्तर कारणों का अनुसंधान करेंगे और देखेंगे कि या तो इनका कोई अस्तित्व ही नहीं है या फिर बहुत नगण्य।इसके बाद हम सामाजिक कारणों के स्वरूप को तय करेंगे और यह देखेंगे कि विभिन्न प्रकार की आत्महत्याओं से जुड़ी व्यक्ति मनोदशाओं के साथ उनका क्या ताल्लुक है।
इसके बाद ही हम निश्चित रूप से कह पाएंगे कि आत्महत्या के सामाजिक तत्व क्या हैं; अभी हमने जिस सामूहिक प्रवृत्ति की बात की वह क्या है, इसका दूसरे सामाजिक तथ्यों के साथ क्या संबंध है और इसका मुकाबला कौन से साधनों से किया जा सकता है।






शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

'भूमंडलीकरण और ग्‍लोबल मीडि‍या' पुस्‍तक अंश,लेखक जगदीश्‍वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह- 'मनोरंजन में अपराध '

मीडिया और मानवता के रिश्ते की खोज पर बहुत कुछ लिखा गया है।किंतु मीडिया और अमानवीयता के संबंध की अमूमन अनदेखी की जाती है। मीडिया में खासकर समाचार चैनलों की विशेषता है कि वे चाहें तो जरूरी को गैर-जरूरी और और गैर जरूरी को परमावश्यक बना सकते हैं। समाचार चैनलों में इन दिनों यह खूब हो रहा है। अपराध की खबरों के नाम पर अपराधियों का महिमा-मंडन चल रहा है और निरपराध लोगों पर चैनल अपनी तरफ से खबरों के जरिए मुकदमा चला रहे हैं। स्थिति यह है कि दैनन्दिन अदालती सुनवाई को भी चैनल कवरेज दे रहे हैं। इस तरह की खबरों में खबर की बजाय उत्पीड़न और सामाजिक कष्ट देने का भाव ज्यादा है। इससे मीडिया और व्यक्ति के अन्तस्संबंध से जुड़े अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं। क्या मीडिया को किसी अपराध के बारे में समानान्तर प्रचार अभियान के माध्यम से हस्तक्षेप करने का हक है ? किसी भी व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं है कि वह मीडिया में जारी प्रचार अभियान का रोज प्रत्युत्तर दे। साथ ही यह भी देखना होगा कि अपराध खबरों की प्रस्तुति के बारे में मीडिया की क्या भूमिका होनी चाहिए।

इन दिनों विभिन्न चैनलों से अपराध खबरों का ज्यादा से ज्यादा प्रसारण हो रहा है। यह प्रवृत्ति अभी तक दैनिक अखबारों में थी। किंतु अब टेलीविजन चैनलों ने इसे अपना लिया है। सामान्य तौर पर प्रेस अपराधी तत्वों के महिमामंडन से दूर रहा है। किंतु राजनीतिक और आर्थिक अपराधियों के महिमा-मंडन में लिप्त रहा है।इसके विपरीत समाचार चैनलों की खबरों में वस्तुगत प्रस्तुति के बहाने अपराधियों और अपराध कर्म का महिमा मंडन चल रहा है। चैनलों में दो तरह की प्रवृत्तियां दिखाई दे रही हैं। पहली प्रवृत्ति है तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। दूसरी प्रवृत्ति है अपराधकर्म को सस्पेंस और रसीला बनाकर पेश करने की। दूसरी प्रवृत्ति के तहत चैनलों में पुरानी किसी घटना का जीवंत या नाटकीय रूपायन दिखाया जाता है। इस तरह की प्रस्तुतियों में अपराध को व्यापकता प्रदान की जाती है। अमेरिकी पुलिस की सजगता,चुस्ती,मुस्तैदी पर जोर रहता है।

इसके विपरीत अपराध की तथ्यपरक रिपोर्टिंग के नाम पर आजतक,सहारा समय,एनडीटीवी आदि चैनलों में अपराध खबरें सामाजिक प्रभाव के बारे में सोचे बगैर दिखाई जा रही हैं। इन चैनलों से अपराध खबरें इस तरह पेश की जा रही हैं जिससे यह लगे कि अपराध आम जीवन का सामान्य अंग है। खबरों में साधारण और असाधारण अपराध में फ़र्क नहीं किया जा रहा। इन्हें आम खबर के रूप में पेश किया जा रहा है। जबकि अपराध की खबरें आम खबर की कोटि में नहीं आतीं। सभी अपराध और अपराधी समान नहीं होते। ध्यान रहे किसी अपराधी का महिमा-मंडन उसकी छवि को सुधार देता है। साथ ही अपराध के प्रति आम जनता में अपराध विरोधी चेतना को कुंद कर देता है। डब्ल्यू.आई.थॉमस ने 'पीत पत्रकारिता का मनोविज्ञान' नामक पुस्तक में अपराध खबर के बारे में लिखा ये पाप और अपराध के सकारात्मक एजेण्ट हैं। नैतिकता की अवस्था,मानसिकता आदि के संदर्भ में समाज इनके अनुकरण्ा पर निर्भर करता है। जनता इनसे खूब प्रभावित होती है।अपराधी का नाम यदि किसी ग्रुप से जुड़ा हो और मीडिया उसका प्रचार कर दे तो उससे अपराधी को मदद मिलती है। इसी तरह किसी अपराधी गिरोह का सरगना मारा गया और उसकी जगह नए मुखिया की नियुक्ति की खबर से भी अपराधी को बल मिलता है। अपराध खबरों के प्रसारण या प्रकाशन के बारे में मीडिया का तर्क है कि अपराध खबरों को छापकर वह जनता और कानून को सचेत करता है। इस संदर्भ में पहली बात यह है कि शांत और नियमित माहौल में ही अपराध खबरें सचेत करती हैं। अशांत माहौल में असुरक्षा पैदा करती हैं।

आम तौर पर टेलीविजन में जो अपराध खबरें आ रही हैं उनमें अपराधी के व्यवहार को रोमांटिक रूप में पेश किया जा रहा है। इनमें अपराधी ने जो मैथड अपनाया उस पर जोर रहता है। अपराध को नियंत्रित करने वाली मशीनरी की तीखी आलोचना रहती है अथवा उसके निकम्मेपन पर जोर रहता है। मजेदार बात यह है कि अपराध के बारे में बताया जाता है,गिरफ्तारी के बारे में बताया जाता है किंतु दण्ड के बारे में नहीं बताया जाता। अपराध खबरों में जब सरकारी मशीनरी पर हमला किया जाएगा तो इससे अपराधी को बल मिलेगा।अपराधी ताकतवर नजर आएगा।अपराध के मैथड बताने से अनुकरण को बल मिलता है। अपराध खबरों के प्रसारण के पीछे यह दर्शन संप्रेषित किया जाता है कि अपराध से कोई लाभ नहीं। इस परिप्रेक्ष्य में पेश की गई खबरों में यह भाव निहित होता है कि 'यह सामान्य बात है और दण्ड मिलेगा ही।' अपराध खबरों के बारे में यह ध्यान रखें कि आनंद या भूलवश किए गए अपराध का प्रसारण नहीं किया जाना चाहिए।साथ ही 'इफेक्ट' और 'इफेक्टिवनेस' के बीच अंतर किया जाना चाहिए।

हिंसा और अपराध की खबरों के बारे में सभी एकमत हैं कि इसका तीव्रगति से असर होता है। अपराध खबरों का असर व्यक्तिगत न होकर सामाजिक होता है। इससे आक्रामकता और प्रतिस्पर्धा में वृध्दि होती है। टेलीविजन समाचारों के आने के बाद से समाचार के क्षेत्र में क्रांति आई है।जल्दी और ताजा खबरों की मांग बढ़ी है।फोटो का महत्व बढ़ा है। स्वयं को देखने,सजने,संवरने और ज्यादा से ज्यादा मुखर होने की प्रवृत्ति में इजाफा हुआ है। व्यक्तिवाद में वृध्दि हुई है।व्यक्ति की हिस्सेदारी बढ़ी है। किंतु इसके साथ-साथ खबरों को छिपाने या गलत खबर देने की प्रवृत्ति में भी वृध्दि हुई है। खासकर मानवाधिकारों के हनन की खबरों को छिपाने के मामले में टेलीविजन सबसे आगे है। टेलीविजन खबरों का जिस तरह स्वरूप उभरकर सामने आया है उससे यह बात सिध्द होती है कि टेलीविजन खबरों का प्रेस की तुलना में खबरों को छिपाने के लिए ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है।टेलीविजन को नियंत्रित करना ज्यादा सहज और संभव है।खबरों में निरंतरता जरूरी है।प्रेस आम तौर पर निरंतरता के तत्व का ख्याल रखता है किंतु टेलीविजन ऐसा नहीं करता।बल्कि निरंतरता के तत्व का वह चुनिंदा मामलों में ही ख्याल रखता है। समाचार चैनलों में इन दिनों सनसनीखेज खबर बनाने या फिर खबर छिपाने का चक्र चल रहा है। इसके कारण सबसे ज्यादा उन्हें क्षति पहुँच रही है जो अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अपने जायज अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।समाचार चैनलों में गैर जरूरी सवालों पर ज्यादा ध्यान देने से ऑडिएंस के अ-राजनीतिकरण की प्रक्रिया को बल मिलता है। चैनल खबरों के इतिहास में नहीं जाते और न सही खबरों का चयन करते हैं। नया दौर खबर का नहीं मनोरंजक खबरों का है।

अब हम ब्रेकिंग न्यूज में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं।इसी तरह अप्रत्याशित खबरों पर ज्यादा जोर है। ये दोनों ही प्रवृत्तियां इंटरनेट में भी हैं। वहां इन दोनों प्रवृत्तियों के अलावा खबर को निरंतर अपडेट करने की प्रवृत्ति भी देखी जा सकती है। वहां समय का कोई दबाव नहीं होता। कोई डेडलाइन नहीं है। किसी भी किस्म की अस्पष्टता नहीं है। खबरों या मीडिया में पहले भी प्रतिस्पर्धा थी। किंतु इंटरनेट के आने के बाद प्रतिस्पर्धा ने एकदम नया आयाम ग्रहण कर लिया है। खासकर हाइपर टेक्स्ट की संरचना ने प्रतिस्पर्धा को नई बुलंदियों तक पहुँचा दिया है। हाइपर टेक्स्ट के युग में पाठक के हाथ में सत्ता आ गई है। हाइपर टेक्स्ट खुला,अस्थायी और इसका डिजाइन परिवर्तनीय होता है। हाइपर टेक्स्ट नेटवर्क में होता है। वहां एकाधिक दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं। उसमें एक कहानी के अनेक परिप्रेक्ष्य होते हैं। हाइपर टेक्स्ट प्रतिस्पर्धी वर्णन ,विवरण और ब्यौरों को सामने लाता है। यहां किसी घटना का न तो समाधान मिलेगा और न आप अस्वीकार ही कर सकते हैं बल्कि आप पाते हैं कि पाठक की समझ निरंतर गहरी हो रही है। इसके अलावा हाइपर टेक्स्ट अंतर्विरोधों का उद्धाटन करता है। चीजें वहां खण्ड रूप में आती हैं। बहुलतावाद को बनाए रखता है। उसका 'सत्य' पर जोर नहीं है। 'सत्य' की खोज करना तो प्रेस का लक्ष्य था। इसके विपरीत उसका उत्तर आधुनिकों की तरह यह मानना है कि यथार्थ का एक रूप नहीं होता बल्कि यथार्थ के एकाधिक रूप हो सकते हैं। एकाधिक व्याख्याएं हो सकती हैं। नयी मीडिया तकनीकी पाठक को शिरकत का मौका देती है। हाइपर टेक्स्ट ने पाठक के लिए इच्छा और अभिरूचियों का जनतंत्र पेश किया है। हाइपर टेक्स्ट के लिए पाठक उपभोक्ता नहीं है बल्कि सहभागी है। अब रिपोर्टिंग और लेखन से ध्यान हट जाता है। वैविध्यपूर्ण सूचनाओं के विकास और डिजायन पर जो दिया जाने लगता है।

नई मीडिया तकनीकी ने कई अभूतपूर्व कार्य किए हैं।इसने सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों में समाजवाद को ध्वस्त करने में अग्रणी भूमिका अदा की है।ईरान में राजशाही के खात्मे और खोमैनी के आगमन, चीन में जनतंत्र की मांग और सारी दुनिया में आतंकवाद के उभार में नई मीडिया तकनीकी की सक्रिय भूमिका रही है। इसी तरह इण्डोनेशिया में सुहार्तो के शासन के खात्मे ,पूर्वी तीमूर की मुक्ति,अनेक देशों में जनसंहारों के उद्धाटन में सक्रिय भूमिका रही है। कहने का अर्थ यह है कि नई मीडिया तकनीकी अंतर्विरोधी है। इसका मूल झुकाव जनतंत्र और समानता की ओर है। इसे वर्चस्व और अन्याय से नफरत है। इसने नागरिक को नए सिरे से शक्ति संपन्न बनाया है। सतह पर देखें तो समाज में सूचनाओ की बाढ़ आई हुई है। साथ यह भी सच है कि पाठक जागरूक हुआ है ,वह तथ्यपूर्ण सूचना और निरर्थक सूचना या ध्यान हटाने वाली सूचना में फर्क करना सीख गया है। सारे परिवर्तनों के बावजूद ज्यादातर लोग आज भी सत्य के पक्ष में खड़े हैं। इन दिनों तथ्य की बजाए एपीयरेंस या दिखने पर जोर दिया जा रहा है। किसी भी व्यक्ति की प्रभावशीलता का पैमाना यह है कि वह मीडिया में कितना नजर आता है। अब मीडिया में दिखना मुख्य है तथ्य मुख्य नहीं है। इसके कारण जनतंत्र की अंतर्वस्तु का क्षय हुआ है। जनतंत्र का विकास दिखने से नहीं होता। सूचना के स्रोत हमारे नागरिक के चेहरे को ज्यादा विकसित नहीं करते। संयुक्त प्रयासों को कम से कम जगह दी जा रही है। इन दिनों व्यक्तिगत प्रयासों का बोलवाला है। टीवी, रेडियो, और इंटरनेट ने सरलता और उपलब्धता इन दो तत्वों का जिस तरह विकास किया है उसने जनतंत्र के लिए गंभीर संकट पैदा कर दिया है। सरलता और उपलब्धता के कारण घृणा और सामाजिक विखंडन के प्रचारकों और पोर्नोग्राफी की मीडिया में चांदी हो गई है। उन्हें सबसे ज्यादा कवरेज मिल रहा है। यह भी कह सकते हैं कि घृणा के बयानों और पोर्नोग्राफी का लोकतांत्रिकीकरण हुआ है। घटिया अंतर्वस्तु मुखर हो उठी है। उसे वैधता मिल रही है। एक जमाना था कि घटिया सामग्री छापने से पत्र-पत्रिकाएं परहेज करती थीं किंतु इन दिनों मामला ही कुछ और है। अब इसे सहज ही परोसा जा रहा है। संगीत के गीत,फिल्म,वीडियोगेम, हिंसा और पोर्नोग्राफी का महिमामंडन चल रहा है। इनके सबसे ज्यादा यूजर हैं। ये सहज उपलब्ध हैं।इनमें परोसी जाने वाली सामग्री में स्त्रियों और बच्चों पर होने वाले कामुक हमलों,परपीडक और नस्ली हिंसा या घृणा पैदा करने वाली कॉमेडी ,सरकार के खिलाफ हिंसा, अल्पसंख्यकों और यहूदियों के प्रति घृणाभाव कॉमन चीजें हैं। आज ये सब चीजें नए और पुराने मीडिया रूपों में सहज रूप में उपलब्ध हैं। अनेक देशों में खासकर रवाण्डा और बोसनिया में इस तरह की सामग्री को जनसंहारों के लिए इस्तेमाल किया गया है। तथ्यों का मीडिया में सुचिंतित तरीके से विकृतिकरण्ा हो रहा है। खबरों या मुद्दों का चयन ,खासकर राजनीतिक खबरों और मुद्दों का चयन इस आधार पर हो रहा है कि आखिरकार इससे किस राजनीतिक दल को लाभ या हानि होगी। खबरों या मुद्दों के चयन का यह सबसे घटिया मानदण्ड है।इससे यह भी पता चलता है कि जब हमें ज्यादा से ज्यादा वैविध्यपूर्ण सूचनाओं की जरूरत होती है तो पत्रकार अपनी जिम्मेदारी भूल जाते हैं। इन दिनों समाचार चैनलों की खबरों को देखकर लगता है इन चैनलों ने समाचार देने का दायित्व त्याग दिया है। वे छद्म जिम्मेदारी के भाव का प्रदर्शन कर रहे हैं। वे खबरों से ज्यादा मनोरंजक ,नाटकीय खबर में रूचि ले रहे हैं या अफवाह को खबर बना रहे हैं। अब खबरों में स्कैण्डल की खबरें ज्यादा आ रही हैं। गैर स्कैण्डल खबरें कम हो गई हैं। नेटवर्क चल रहे हैं किन्तु खबरें गायब हो गई हैं। पाठकवर्ग की चेतना पर इसका बुरा असर पड़ा है। जनतंत्र और पत्रकारिता के विकास के लिए वास्तव मुद्दों पर खोजी रपटों का महत्व है। उनकी जगह अर्थहीन, गप्पबाजी, स्कैण्डल, अप्रामाणिक खबरें आने लगी हैं। इसका दो रूपों में बुरा असर हो रहा है पहला, इस तरह की खबरों के जरिए ऑडिएंस के समय और ध्यान को नष्ट किया जाता है। साथ ही नीति-निर्धारकों के अनुकूल माहौल बन रहा है। नीति निर्धारकों के कामों को जनता जान नहीं पाती है। फलत: उनके बारे में जनता की कोई राय ही नहीं बन पाती। नीतियों के लिए चैनलों पर समय ही नहीं दिया जाता। जनता का वास्तव मुद्दों से ध्यान हट जाता है। दूसरा दुष्प्रभाव यह होता है कि स्कैण्डलों का व्यापक कवरेज सरकार की जनता के प्रति जिम्मेदारी को कम कर देता है। साथ ही जनता की नजर सरकार की जिम्मेदारी की तरफ नहीं जाती। चर्चित व्यक्तित्वों और स्कैण्डलों को दिखाने का यह अर्थ नहीं है कि मीडिया जनता की सेवा कर रहा है।

मीडिया में सुनियोजित ढ़ंग से मनोरंजकमूलक खबरें पेश की जा रही हैं।हिंसा और स्कैण्डल खबरों की तलाश हो रही है। इस तरह की खबरें सारवान राजनीतिक खबरों की कीमत पर पेश की जा रही हैं।सारवान् राजनीतिक विमर्श एकसिरे से नदारत है। चैनलों की जनतंत्र की खबरों में कम और चर्चित व्यक्तित्व और अपराध और सेक्स की खबरों में ज्यादा दिलचस्पी हो गई है। इस प्रक्रिया में जनहित की खबरें घट गई हैं।हम नहीं जानते कि हमारी सरकार क्या कर रही है ? जो कर रही है उसके राजनीतिक निहितार्थों के बारे में समाचार चैनलों ने विमर्श बंद कर दिए हैं। वे सिर्फ एक ही नजरिए को पेश कर रहे हैं। कभी दृष्टिकोणगत भिन्नता को पेश नहीं करते। अब सिर्फ आधी-अधूरी राजनीतिक खबरें या चटखारेवाली या उन्माद पैदा करने वाली खबरें होती हैं। इसके कारण साधारण जनता में अ-राजनीतिकरण बढ़ा है। आम आदमी सोचने लगा है कि राजनीतिक व्यवस्था का उससे नहीं किसी अन्य से संबंध है। राजनीतिक व्यवस्था उनकी वास्तविक जरूरतों का हिस्सा नहीं है। कायदे से अपराध और हिसा की खबरें तब ही पेश की जाएं जब वे जनता के हित में हों। किंतु निजी त्रासदी, आत्महत्या, व्यक्तिगत मुकदमे, परिवार के झगड़े या हिंसा आदि की खबरें तुरंत पेश कर दी जाती हैं।

ग्लोबलाइजेषन का टेलीविजन के बिना प्रसार संभव नहीं है। चैनलों के आंतरिक स्वरूप की खूबी है विखंडन का आनंद। कहीं समाचार प्रसारित हो रहे है। कहीं सीरियल,कहीं फिल्म,कहीं खेल,कहीं महिला कार्यक्रम,कहीं बच्चों के कार्यक्रम,कहीं राष्ट्रीय खबरें,कहीं अंतर्राष्ट्रीय खबरें,यानी चैनलों में कार्यक्रमों की विविधता सामान्य लक्षण है। यह विविधता किसी एक चैनल के स्वरूप में भी हो सकती है। गंभीरता से देखें तो एक कार्यक्रम दूसरे कार्यक्रम से एकदम असंबध्द और भिन्न परिप्रेक्ष्य को व्यक्त करता हुआ। कार्यक्रमों में असंबध्दता के कारण बोरियत का अहसास नहीं होता। आनंद की सृष्टि होती है। देखने का आकर्षण और उत्सुकता बनी रहती है। दूसरी विशेषता यह है कि समाचार चैनलों को संकट और तनाव पसंद है। जहां तनाव और संकट है वहां की खबरें सबसे पहले आती हैं। इस तरह की खबरें ज्यादा से ज्यादा ऑडिएंस देती हैं। विज्ञापन दिलाती हैं। यदि सामान्य तौर पर तनाव और संकट की खबरें नहीं आतीं तो चैनल उनका निर्माण करते हैं। इन दोनों ही अवस्थाओं में घटना या खबर का महत्वपूर्ण पक्ष गायब रहता है।

समाचार चैनलों की बुनियादी विशेषता है ग्लोबलाइजेषन का समर्थन करो। खबरों और समस्याओं से यदि ग्लोबलाइजेशन का संबंध है तो उसे छिपाओ। टेलीविजन स्थानीय भाषा में कार्यक्रम देते हैं। किंतु उनका दृष्टिकोण हमेशा ग्लोबल होता है। ग्लोबल नजरिए के बिना न तो खबरें होती हैं और नहीं मनोरंजन कार्यक्रम होते हैं। वोट की राजनीति नाटकीयता और गैर जरूरी मुद्दों पर चल रही है। ग्लोबलाइजेशन जहां भी गया है उसने नागरिक की पहचान खत्म की है। यहां भी चैनल यही कर रहे हैं। चुनाव में जब भी भ्रष्टाचार का मुद्दा वोट या विमर्श का आधार बनेगा आम जनता को इससे कुछ नहीं मिलेगा। बल्कि अ-राजनीतिकरण की प्रक्रिया तेज होगी। अ-राजनीतिकरण से फासीवादी राजनीति को सबसे ज्यादा लाभ होता है। भ्रष्टाचार, आरक्षण, स्थानीयतावाद स्वभाव से अ-राजनीति की राजनीति की देन हैं। ग्लोबल संस्कृति में अल्पसंख्यक गायब रहते हैं। वास्तव मसले गायब रहते हैं। अस्मिता के पुराने रूप हावी रहते हैं। ग्लोबल संस्कृति गैर- महत्वपूर्ण को महत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण को महत्वहीन बनाती है।

संदर्भहीनता टेलीविजन खबरों का प्रधान लक्षण है।संदर्भों से काटकर राजनीति, कानूनी, सांस्कृतिक,सामाजिक सवालों और खबरों को पेश करना टेलीविजन खबर का प्रमुख फिनोमिना है।टेलीविजन खबरों को जो लोग स्वयं प्रमाण मानकर चल रहे हैं वे भूल जाते हैं कि संदर्भहीन खबरों की प्रस्तुति से फासीवादी मानसिकता तैयार होती है। फासीवाद को संदर्भ और खासकर ऐतिहासिक संदर्भ में चीजों,वस्तुओं,घटनाओं और विचारों को देखने से सख्त नफरत है। टेलीविजन अपनी खबरों में संदर्भहीनता के तत्व का सबसे ज्यादा प्रयोग करता है।

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