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शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

मिस्र के जनांदोलन की बदलती तस्वीर



मिस्र के जनांदोलन की तस्वीर और भी ज्यादा जटिल रूप ग्रहण करती जा रही है और राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक की राजनीतिक चालें पिटती चली जा रही हैं। सेना और प्रतिवादियों में मुठभेड़ को टालने के लिए लिहाज से मुबारक ने अपने समर्थकों को मैदान में उतारा ,जगह-जगह उनके समर्थकों ने रैलियां की और मुबारक विरोधियों से मुठभेडें कीं, जिनमें आठ लोग मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए हैं।
    जब बृहत्तर जनसमूह मुबारक के खिलाफ मैदान में था और सेना ने सीधे कार्रवाई से मना कर दिया तो ऐसे में मुबारक समर्थकों का रैलियां आत्मघाती कदम ही कहलाएगा। इस एक्शन के गलत परिणाम निकले है और कल मिस्र के प्रधानमंत्री ने इन मुठभेड़ों के लिए माफी मांगी है।

    नवनियुक्त प्रधानमंत्री अहमद शफ़ीक़ ने देश में हुई घटनाओं के लिए माफ़ी मांगी है.उल्लेखनीय है राष्ट्रपति समर्थक और विरोधी गुटों की बीच झड़पों में आठ लोग मारे गए हैं और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं. उन्होंने हिंसा की जाँच का वादा किया है.
      प्रधानमंत्री ने कहा, "मैं इस घटना के लिए सबके सामने खुलकर माफ़ी माँगता हूँ इसलिए नहीं कि यह मेरी ग़लती थी या किसी और की. मैं तो इस बात से दुखी हूँ कि मिस्र के ही लोग इस तरह आपस में लड़ रहे हैं. फूट तो परिवारों में भी होते हैं लेकिन कल जो हुआ वह किसी योजना का हिस्सा नहीं था, मैं उम्मीद करता हूँ कि इंशा अल्लाह सब ठीक हो जाएगा।"
     जनांदोलन का ही दबाब है कि मिस्र के शासनाध्यक्ष संविधान में जरूरी परिवर्तन की बात कह रहे हैं।  उपराष्ट्रपति ने टेलीविजन से प्रसारित अपने संदेश में कहा, "हम संवैधानिक और विधायिका संबंधी सुधार लागू करेंगे और हर मुद्दे के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन करेंगे. इसके बाद हम इसकी भी जाँच करेंगे कि ऐसी घटनाएँ क्यों हुई.।"
    मुश्किल यह है कि जनता लोकतंत्र की मांग कर रही है और लोकतंत्र का संविधान में प्रावधान ही नहीं है। लोकतंत्र से कम पर वह कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। मुबारक को हटाने की मांग उनकी पहली मांग है लेकिन असल मांग है मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना की जाए। मुबारक और उनके समर्थक यदि संविधान संशोधन करके लोकतंत्र की स्थापना का संकल्प व्यक्त करते हैं तो उसका कुछ असर भी होगा।
           मुबारक और अमेरिका की रणनीति है कि किसी तरह आंदोलनकारी जनता को शांत किया जाए और उन्हें तहरीर स्क्वेयर से वापस घर भेजा जाए। लेकिन आंदोलनकारी वापस जाने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। आंदोलनकारियों को शांत करने के लिहाज से अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अल बरदाई,उपराष्ट्रपति सामी अनान,सेना के मुखियाओं की मदद लेने का फैसला किया है साथ ही कैमिस्ट्री में नोबेल पुरस्कार प्राप्त अहमद जुएल की भी मदद ली जा रही है लेकिन अभी तक कोई अनुकूल परिणाम नहीं मिले हैं। इसका प्रधान कारण है अलबरदाई और अहमद जुएल का मिस्र में आंदोलनकारियों में कोई जनाधार नही है।
    तहरीर चौक पर सेना और टैंकों की घेराबंदी बनी हुई है। चौक पर आंदोलनकारी जमे हुए हैं। आंदोलन के दबाब में मुबारक ने पुराने मंत्रीमंडल को भंग करके जो नया मंत्रीमंडल बनाया है उसमें बड़े पैमाने पर सेना के बड़े अफसरों को रखा गया है इससे एक बात तो यह निकलती है कि अमेरिका मिस्र में आने वाले समय में जनता का शासन नहीं चाहता बल्कि नग्न सैन्यशासन चाहता है क्योंकि ये सारे परिवर्तन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के इशारे पर हो रहे हैं।
     मुबारक और उनके साथी यह हौव्वा खड़ा कर रहे हैं कि मिस्र में ब्रदरहुड नामक फंडामेंटलिस्ट संगठन के सत्ता में आ जाने का खतरा है अतः सेना की मदद बेहद जरूरी है। असल में मिस्र के मौजूदा प्रतिवाद को संगठित किया है लोकतांत्रिक शक्तियों ने,इसमें बड़े पैमाने पर मजदूरों संगठनों की भी भूमिका है। यह सच है  मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन मिस्र का सबसे बड़ा मुबारक विरोधी संगठन है और वह इस प्रतिवाद में शामिल है लेकिन जनता के और भी तबके शामिल हैं प्रतिवाद में।
   मुबारक विरोधियों की मांग है कि सबसे पहले राष्ट्रपति इस्तीफा दें और उसके बाद एक सभी गुटों को मिलाकर एक राष्ट्रीय सरकार का गठन किया जाए और आंदोलनकारियों की मांगों पर विचार किया जाए।
     मिस्र के प्रतिवादी आंदोलन में आम जनता पर व्यापक हमले हुए हैं साथ ही मीडिया पर भी हमले हुए हैं। यहां तक कि विदेशी पत्रकारों को गिरफ्तार और उत्पीडित किया गया है।अब तक24 पत्रकार गिरफ्तार किए गए हैं और 21 पत्रकारों पर हमले हुए हैं। पांच मामलों में पत्रकारों के उपकरण सेना ने जब्त कर लिए हैं। मुबारक प्रशासन का सबसे ज्यादा गुस्सा अल जजीरा टीवी चैनल पर है। सेना ने उसके 3 पत्रकारों को बंद कर दिया है,चार पर हमला हुआ है और एक पत्रकार लापता है। अलजजीरा के अनुसार सेना ने दर्जनों पत्रकारों के कैमरा और दूसरे संचार उपकरण छीनकर नष्ट कर दिए गए हैं।






बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

मिस्र में जनता के प्रतिवाद का भविष्य


    मिस्र में लोकतंत्र के लिए आंदोलन चल रहा है बड़े पैमाने पर जनता राष्ट्रपति हुसनी मुबारक के खिलाफ सड़कों पर निकल आयी है। 150 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। सैंकड़ों लोगों को जेलों में डाल दिया गया है। मुबारक के बारे में यह सब जानते हैं कि वह अमेरिका के पिट्ठू शासक हैं और सेना के बल पर शासन चला रहे हैं।
     मध्यपूर्व में इस्राइल के बाद मिस्र दूसरा देश है जिसे अमेरिका के द्वारा सबसे ज्यादा आर्थिक मदद दी जाती है। मुबारक के शासन को सालों से सालाना 2बिलियन डॉलर की मदद मिलती रही है। यह पैसा मिस्र में विकासकार्यों पर खर्च नहीं होता। यह पैसा कहा जाता रहा है ? इस पैसे से मिस्र केशासक सैन्य सामग्री, खरीदते रहे हैं। न्यू अमेरिका फाउण्डेशन के अनुसार  “It’s a form of corporate welfare for companies like Lockheed Martin and General Dynamics, because it goes to Egypt, then it comes back for F-16 aircraft, for M-1 tanks, for aircraft engines, for all kinds of missiles, for guns, for tear-gas canisters [from] a company called Combined Systems International, which actually has its name on the side of the canisters that have been found on the streets there.”
हाल ही में प्रकाशित एक किताब, “Prophets of War: Lockheed Martin and the Making of the Military-Industrial Complex.” में हर्तुंग ने लिखा है- “Lockheed Martin has been the leader in deals worth $3.8 billion over that period of the last 10 years; General Dynamics, $2.5 billion for tanks; Boeing, $1.7 billion for missiles, for helicopters; Raytheon for all manner of missiles for the armed forces. So, basically, this is a key element in propping up the regime, but a lot of the money is basically recycled. Taxpayers could just as easily be giving it directly to Lockheed Martin or General Dynamics.” मिस्र की जनता सैनिक तानाशाही से तंग आ चुकी है और इस मौके का भी अमेरिका मध्यपूर्व में अपने हितों के विस्तार के लिए लाभ उठाना चाहता है।
     अनेक लोग यह भी कह रहे हैं कि मिस्र में संचार क्रांति के उपकरणों इंटरनेट, मोबाइल आदि के साथ अलजजीरा की बड़ी भूमिका है। यह सच है कि संदेशों के आदान-प्रदान में संचार तकनीक से मदद मिली है लेकिन संचार तकनीक के जरिए प्रतिवाद पैदा नहीं हुआ है प्रतिवाद की जननी है मिस्र की जनता।
    मिस्र की जनता को मुबारक ने भरोसा दिया है वह आगामी 30 सितम्बर को राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ेगे। लेकिन जनता तुरंत राष्ट्रपति पद छोड़ने की मांग कर रही है। कुछ लोग यह तर्क भी दे रहे हैं मिस्र में जनता सड़कों पर इसलिए उतर आयी है क्योंकि मिस्र में आर्थिक असमानता बहुत है। आर्थिक असमानता के पैमाने से देखें तो सारी दुनिया में असमानता की सूची में मिस्र का 90वां स्थान है और अमेरिका का 42वां। आज अमेरिका के हालत काफी बदतर हैं। अमेरिका में कई स्थान ऐसे हैं जिनकी तुलना हित्ती और जिम्बाबे से की जा सकती है। जिन देशों में लोकतंत्र है वहां पर गरीब और अमीर के बीच में भयानक अंतर है। आखिर क्या करें ?
     मिस्र और ट्यूनीशिया में जो व्यापक जन प्रतिवाद हो रहा है उसमें प्रसिद्ध मार्क्सवादी स्लावोज जीजेक के अनुसार गरीबी और भ्रष्टाचार प्रधान कारण हैं। जीजेक का भी मानना  हैं कि वहां फंडामेंटलिस्ट ताकतें इस संघर्ष में नहीं हैं। इससे यह भी मिथ टूटता है कि मिस्र आदि मध्यपूर्व के देशों में फंडामेंटलिस्ट और राष्ट्रवादी ताकतें ही जनता को गोलबंद कर सकती हैं।
    प्रसिद्ध मार्क्सवादी जीजेक का मानना है मिस्र और ट्यूनीशिया में ''old regime survives but with some liberal cosmetic surgery, this will generate an insurmountable fundamentalist backlash. In order for the key liberal legacy to survive, liberals need the fraternal help of the radical left. Back to Egypt, the most shameful and dangerously opportunistic reaction was that of Tony Blair as reported on CNN: change is necessary, but it should be a stable change. Stable change in Egypt today can mean only a compromise with the Mubarak forces by way of slightly enlarging the ruling circle. This is why to talk about peaceful transition now is an obscenity: by squashing the opposition, Mubarak himself made this impossible. After Mubarak sent the army against the protesters, the choice became clear: either a cosmetic change in which something changes so that everything stays the same, or a true break.''
जो लोग मिस्र में क्रांति देख रहे हैं वे द्विवा-स्वप्न देख रहे हैं। यह सच है जनता सड़कों पर है लेकिन मुश्किल यह है कि मुबारक के विरोध में जो लोग आ रहे हैं उनके अमेरिका के साथ और भी गहरे संबंध हैं। मसलन उपराष्ट्रपति और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष अल बरदाई को अमेरिकी गुलामी करते हुए इस संगठन में अनेक मर्तबा देख चुके हैं। अमेरिका कोशिश में है कि सत्ता मुबारक के हाथ में रहे या विपक्ष के हाथ में रहे लेकिन उसे अमेरिकापंथी होना चाहिए।  

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

सेक्स उद्योग और सैन्य मिशन

     सारी दुनिया में सेक्स उद्योग में आई लंबी छलांग के दो सबसे प्रमुख कारण हैं पहला है युध्द और दूसरा है उन्नत सूचना एवं संचार तकनीकी। आज वेश्यावृत्ति और पोर्न दोनों का ही औद्योगिकीकरण हो चुका है। विश्व स्तर पर वेश्यालयों के कानूनी संरक्षण,वेश्यावृत्ति को कानूनी स्वीकृति दिलाने का आन्दोलन तेजी से चल रहा है इस मामले में सबसे आगे विकसित पूंजीवादी मुल्क हैं।

   विकसित पूंजीवादी मुल्कों में वेश्यावृत्ति पेशा है। वेश्याएं सरकार को टैक्स अदा करती हैं। सन् 2001 में जर्मनी में वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दे दी गयी। अब वेश्यावृत्ति वहां पर अनैतिक धंध नहीं रह गया है। बल्कि नैतिक और कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त धंधा है। वेश्याएं शरीर बेचने के बदले सरकार को टैक्स देती हैं। अब वेश्याओं को पुलिस परेशान नहीं करती।प्रति वेश्या प्रतिमाह 180 डॉलर टैक्स देना होता है।
    
     एक अनुमान के अनुसार वेश्यावृत्ति के धंधे में प्रतिवर्ष 40 लाख नयी लड़कियां और दस लाख बच्चे आ रहे हैं। वेश्यावृत्ति वस्तुत: गुलामी है। इसका लक्ष्य है शारीरिक और कामुक शोषण, इस शोषण का अर्थ है कामुक उत्तेजना,कामुक शांति और वित्तीय लाभ।नयी विश्व व्यवस्था ने कानूनों एवं नियमों में ढिलाई एवं परिवर्तन का जो दबाव पैदा किया है उसके कारण सेक्स और पोर्न संबंधी कानूनों में भी बदलावा आया है। सेक्स और पोर्न संबंधी कानून ज्यादा उदार बने हैं,इसके कारण सेक्स उद्योग और पोर्न उद्योग के प्रति अलगाव और अनैतिक भाव नष्ट हुआ है।

    अब पोर्न और सेक्स उद्योग सम्मानित उद्योग हैं। इस उद्योग में काम करने वाले समाज में आज सम्मानित हैं। पोर्न एवं सेक्स उद्योग की वैधता के कारण स्त्री और बच्चों का शारीरिक शोषण और भी बढ़ा है। हमारे समाज में जो लोग भूमंडलीकरण के अमानवीय चरित्र की उपेक्षा करके उसकी अंधी हिमायत में लगे हैं उन्हें फिलीपीन्स के अनुभवों से सबक हासिल करना चाहिए।

      फिलीपींस में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष,विश्व बैंक आदि के इशारों पर स्त्रीमुक्ति का जो रास्ता अख्तियार किया गया वह वह स्त्री को आत्मनिर्भर नागरिक नहीं बनाता ,बल्कि सेक्स बाजार में ठेलता है।लेबर एक्सपोर्ट के नाम पर साठ और सत्तर के दशक में बड़े पैमाने पर फिलीपीनी औरतों का निर्यात किया गया।सत्तर के दशक में मध्य-पूर्व में निर्माण उद्योग के लिए मर्दो का निर्यात किया गया। सत्तर और अस्सी के शक में फिलीपींस के बाहर काम करने वाली अधिकांश औरतें ही थीं। वियनाम युध्द के बाद वेश्यावृत्ति का विश्वबाजार तेजी से विकसित होता है।

    अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस आदि देशों की सेनाओं ने जिन देशों में हस्तक्षेप किया,जिन इलाकों में अपने सैनिक अड़डे बनाए उनके आसपास के देशों में वेश्यावृत्ति तेजी से फैली। यही स्थिति संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में चलने वाले शांति मिशन अभियानों की है। शांति मिशन अभियानों में शामिल सैनिकों को औरतों और बच्चों की तस्करी करते रंगे हाथों पकड़ा गया है। सोमालिया,मोगादिसु,साइप्रस,कम्बोडिया, सर्बियाबोसनियाकोसोवो आदि इलाकों में शांति सैनिक औरतों की तस्करी करते पकड़े गए हैं।

    कम्बोडिया में 1992-93 के शांतिमिशन के समय वेश्यावृत्ति कई गुना बढ़ गयी।25 फीसदी से ज्यादा सैनिक एचआईवी पॉजिटिव होकर लौटे। सोमालिया में फ्रेंच सैनिकों ने वेश्यावृत्ति में कई गुना इजाफा कर दिया।

    सन् 2002 में संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा इटली के शहर तूरिन में '' प्रोस्टयूशन ,सेक्स ट्रेफिकिंग एण्ड पीसकीपिंग'' शीर्षक से अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार आयोजित किया गया। जिसमें यह तथ्य सामने आया कि शांति मिशन के कार्य जब चरम पर होते हैं तब ही वेश्यावृत्ति और अन्य देशों के लिए औरतों कह बिक्री अचानक बढ़ जाती है।यह स्थिति निकोशिया, फामुगुस्ता, बुडापेस्ट, कोसोवो, डिली-डारविन, नोमपेन्ह-बैंकाक, होंडुररास, अल-सल्वाडोर, ग्वाटेमाला,सोमालिया  आदि देशों में देखी गयी है।

   आज स्थिति यह है कि भूमंडलीय विचारकों के दबाव के कारण भूमंडलीय आतंकवाद,जनसंहारक अस्त्र, सर्वसत्तावादी या आततायी राज्य, शक्ति संतुलन, भूमंडलीकरण आदि विषयों पर चतरफा काम हो रहा है।ये विषय सर्वोच्च प्राथमिकता की कोटि में हैं। किन्तु ' सेक्स ट्रेफिकिंग ' सर्वोच्च वरीयता की सूची के बाहर है। उसे 'वूमेन्स स्टैडीज', 'थर्ड वर्ल्ड डवलपमेंट', 'एरिया स्टैडीज' आदि क्षेत्रों के हवाले करके हाशिए पर फेंक दिया गया है। जबकि इसे वरीयता क्रम में ऊपर रहना चाहिए। इस तरह से 'सेक्स ट्रेफिकिंग' से बौध्दिकों का अलगाव बढ़ा है। वे इसे एक विच्छिन्न विषय या घटना मात्र समझते हैं। विकासमूलक अर्थव्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं।

     सवाल उठता है कि क्या इस तरह हाशिए पर रखकर इस समस्या का सही अध्ययन संभव है ? इस विषय पर जो मूल्यांकन मिलते हैं उनमें सेक्स ट्रेफिकिंग के विवरण ज्यादा होते हैं। इस तरह के मूल्यांकनों में मूलत: निम्न बातों पर जोर रहता है,जैसे, ग्राहक मनोरंजन के लिए औरतों का शोषण कर रहे हैं। दलाल मुनाफे के लिए शोषण कर रहे हैं। जो औरतें बेची जा रही हैं वे उत्पीडित हैं। इस तरह मूल्यांकन इस समस्या के समाधान की रणनीति बनाने में मदद नहीं करते।इनसे समाधान की कोई बुनियादी रणनीति नहीं निकलती।
         
     जहां वेश्यावृत्ति वैध है वहां सरकार धन कमाती है,किन्तु जहां अवैध है वहां भ्रष्ट अधिकारी और अपराधी गिरोह चांदी काटते हैं।वेश्यावृत्ति के कारोबार में व्यापार का मुनाफा इस बात पर निर्भर करता है कि नयी औरतों का फ्लो कितना है। नयी औरतें कितनी आ रही हैं।विदेशी औरते कितनी आ रही हैं।दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के महिला संगठनों की 1991 में एक काँफ्रेंस हुई जिसमें अनुमान लगाया गया कि सत्तर के बाद से सारी दुनिया में तीन करोड़ औरतें बेची गयी हैं।जापान से सालाना एक लाख औरतें जहाजों में भरकर लाकर सेक्स उद्योग के हाथ बेची जाती हैं। ये औरतें 'वार' और वेश्यालयों में काम करती हैं।र्मा ,नेपाल,थाईलैण्ड, बांग्लादेश,भारत और पाकिस्तान से सालाना तीन लाख से ज्यादा औरतें बिक्री होती हैं।
           
   सन् 1960 और 1970 के दशक में आईएमएफ और विश्वबैंक ने पर्यटन पर ज्यादा जोर दिया। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर जोर दिया।होटल और रिसोर्ट बनाने को प्राथमिकता दी।जिससे विदेशी पूंजी को आकर्षित किया जा सके।इस पर्यटन का एक आकर्षक हिस्सा सेक्स पैकेज हुआ करता था।जिसमें हवाईभाड़ा,होटल का भाड़ा,औरत या मर्द जो भी चाहिए,उसका भाड़ा,कार आदि का खर्चा शामिल हुआ करता था।वियतनाम युद्ध के कारण अकेले सैगोन में पांच लाख वेश्याएं थीं।जबकि युद्ध के पहले सैगोन की कुल आबादी ही पांच लाख की थी।

    वियतनाम युद्ध के कारण फिलीपींस,कोरिया,कम्बोडिया,थाईलैण्ड आदि देशों में वेश्यावृत्ति कई गुना बढ़ गयी।इसी तरह ओकीनावा में अमेरिकी सैन्य अड्डा बनने के बाद नए किस्म के विश्राम और आनंद के केन्द्रों का व्यापक पैमाने पर आसपास के इलाकों में निर्माण कियागया। इन सभी देशों में वेश्यावृत्ति को वैध बनाने के लिए कानून पास किए गएंसत्तर के दशक में मनीला और बैंकाक वेश्यावृत्ति के दो बड़े केन्द्र बनकार उभरे।उसके बाद नेपाल का विकास हुआ।इन तीन केन्द्रों ने सेक्स पर्यटन को तेजी से बढ़ावा दिया।सिर्फ  सेक्स पर्यटन के कारण ही इन केन्द्रों  की अरबों डालर की सालाना आय थी।मसलन् थाईलैण्ड में प्रतिवर्ष 50 लाख पर्यटक आते हैं।इनमें 75 फीसदी पुरूष होते हैं। सेक्स उद्योग के नए क्षेत्रों में कर मुक्त इलाके,औद्योगिक क्षेत्र ,पूंजी विकास केन्द्र औरतों क बिक्री के बड़े केन्द्र के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
     

बुधवार, 27 जनवरी 2010

अमरीकी सैन्य उद्योग का मध्यपूर्व में सूचना वर्चस्व



                    
  (गाजा में इस्राइली नाकेबंदी के प्रतिवाद में बनायी गयी कलाकृतियां)                                                          
       




अमेरिकी साम्राज्यवाद का उत्तर आधुनिक मंत्र है सूचना वर्चस्व बनाए रखो। विरोधी के सूचना तंत्र को नष्ट करो,अप्रासंगिक बनाओ। इस मंत्र का मध्यपूर्व में भी इस्तेमाल किया जा रहा है।जो मीडिया साथ नहीं है ,उसके साथ शत्रुतापूर्ण बर्ताव करना,दण्डित करना, उसे भी आतंकवाद विरोधी मुहिम के निशाने पर लाना। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर मीडिया को चौथा मोर्चा घोषित कर दिया गया है। मीडिया के खिलाफ भी युध्द की घोषणा कर दी गयी है।

नयी परिस्थितियों में संवाददाता,चैनल,अखबार आदि सभी को निशाना बनाया जा रहा है। मीडिया को वस्तुत: युध्द का उपकरण घोषित कर दिया गया है। यह विश्वस्तर पर चल रही अमेरिका की 'आतंकविरोधी मुहिम' का वैध निशाना है।सेना का वैध लक्ष्य है।

     इस्राइली विस्तारवाद और अमेरिकी अंध आक्रामकता का आलम यह है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर इस्राइल के बारे में किसी भी किस्म की आलोचना के लिए कोई जगह नहीं है। स्थिति इस कदर बदतर है कि इस्राइल की आलोचना को कानून का उल्लंघन माना जाता है।टेरेल इ.अरनॉल्ड ने ' अगेस्ट दि लॉ टु क्रिट्रीसाइस इस्राइल ?' शीर्षक निबंध में लिखा है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों में मध्यपूर्व से संबंधित किसी भी विषय पर आलोचना की मनाही है,खासकर उन मसलों पर जिन पर इस्राइल की आलोचना की जा सकती हो।

सीनेटर रीक सेनटोरम और सीनेटर साम ब्राउनबेक के द्वारा बनबाए गए उच्च शिक्षा कानून के छठे संशोधित अनुच्छेद के अनुसार यह व्यवस्था की गई है।किसी भी विश्वविद्यालय के छात्र,शिक्षक और अंशकालिक शिक्षक यदि किसी भी किस्म की इस्राइल के खिलाफ टिप्पणी व्यक्त करते हैं तो उस विश्वविद्यालय का आर्थिक अनुदान बंद कर दिया जाएगा।इस्राइल के बारे में की गई किसी भी किस्म की आलोचना को यहूदियों के खिलाफ की गई आलोचना घोषित कर दिया गया है।इस्राइल को यहूदी का पर्याय बना दिया गया है। जो कि गलत है।
    
    अमेरिका-इस्राइल के द्वारा मध्य पूर्व में नए किस्म की रणनीति लागू की जा रही है। नयी रणनीति के तहत मध्यपूर्व का नया नक्शा बनाया जा रहा है। मध्यपूर्व के तेल और गैस के कुओं पर कब्जा जमाओ,स्थानीय स्तर पर युध्द भड़काओ,जातीय हिंसा भड़काओ।मध्य पूर्व में अमेरिकी-इस्राइल सैन्य विस्तार करो।इस रणनीति के तहत 1991-92 में सऊदी अरब में सेनाओं का जमघट लगाया गया।कुवैत में अमेरिकी सेना के स्थायी अड्डे का इंतजाम किया गया।यह सारा कार्य किया गया सद्दाम हुसैन के जुल्मोसितम को मिटाने के नाम पर।बाद में इराक पर कब्जा जमा लिया गया।अब अगला निशाना ईरान है।

     प्रौपेगैण्डा किसी भी युध्द में उसी तरह महत्वपूर्ण है जैसे सैनिक और बम। खासकर ऐसे समय में जब राज्य अपने एक्शन को वैध ठहराना चाहता हो। दूसरे इराक युध्द के समय से युध्द के संदर्भ में तैयार की गई जन-संपर्क रणनीति का काफी महत्वपूर्ण स्थान है। युध्द के समय जन-संपर्क नीति का लक्ष्य होता है भावुक इमेजों की वर्षा और युध्द के लिए समर्थन जुटाना।इससे युध्द के समय सारा वातावरण नियंत्रित रहता है।

नियंत्रित और सेंसरशिप के माहौल में जब कोई सूचना दी जाती है तो लोग उस पर विश्वास करके चलते हैं।इस सूचना में शायद ही कभी आलोचना शामिल हो। खासकर फिलीस्तीनी इलाकों पर इस्राइल के हमले के दौरान जो खबरें इस्राइली सेना के जरिए आ रही थीं उनमें इस्राइल की आलोचना का जिक्र ही नहीं था। कवरेज के दौरान लगातार हम्मास के हमलों या प्रभावित लोगों के साक्षात्कार दिखाए गए जिनके बहाने इस्राइली हिंसाचार को वैधता प्रदान करने की कोशिश की गई। ज्योंही किसी संवाददाता को इस्राइली एक्रिडिशन मिला ,उसके पास तत्काल ईमेल और फोन कॉल का तांता लग जाता है।

इस्राइली प्रशासन के द्वारा संवाददाता का खास ख्याल रखा जाता है। उसे तरह-तरह की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं,पैकेज टूर कराए जाते हैं,खबरों का पुलिंदा भेज दिया जाता है। उसे खबर खोजनी नहीं होती,बल्कि इस्राइली प्रेस विभाग के लोग स्वयं खबर की व्यवस्था कर देते हैं। लंच,विशेषज्ञ आदि की व्यवस्था कर देते हैं। ये सारी चीजें पत्रकार को बगैर मांगे ही पेश कर दी जाती हैं।यानी पत्रकार को खबर खोजने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता।ईमेल के जरिए संवाददाता के पास खबरों का अम्बार लगा दिया जाता है।पत्रकार को खबर के लिए कहीं भी जाने की जरूरत नहीं है,उसे सिर्फ फोन भर कर देना है,सारी चीजें रेडीमेड रूप में तत्काल उपलब्ध करा दी जाती हैं।

खासकर रेडियो और टीवी पत्रकारों को अपनी खबरों के लिए बार-बार होटल से बाहर जाना रास नहीं आता,उन्हें परेशानी होती है,उनके लिए इस्राइली प्रशासन की इस तरह की व्यवस्था से लाभ होता है। ईमेल से पत्रकारों को जिन खबरों को पोस्ट किया जाता है,उसमें चश्मदीद गवाहों के नाम,फोन नम्बर तक दिए रहते हैं,संवाददाता चाहे तो होटल में बैठे-बैठे उनसे बातें करके अपनी स्टोरी तैयार कर ले।यदि यह भी न कर सके तो उनके बयान साथ में ही रहते हैं,उनका इस्तेमाल कर ले। किसी भी चश्मदीद गवाह का बयान लेते समय भाषा संबंधी असुविधाओं का भी ख्याल रखा जाता है। अनुवादक की व्यवस्था भी करायी जाती है।इसका सारा खर्चा इस्राइली प्रशासन उठाता है। गवाहों में अनेक भाषा के लोगों के नाम रहते हैं,आप चाहे जिस भाषा के गवाह का इस्तेमाल कर सकते हैं। ये सारे जन संपर्क के हथकंडे हैं। जिनके जरिए संवाददाता को युध्द के यथार्थ से काट दिया जाता है।
मानव इतिहास में संकट की अवस्था में सबसे ज्यादा अगर किसी चीज की जरूरत होती है तो वह है वस्तुगत मीडिया। वस्तुगत मीडिया के बिना जनता को सही जानकारी नहीं मिलती।       खासकर युध्द,आतंकवाद और अतिवादी राजनीतिक कार्रवाईयों के दौर में वस्तुगत मीडिया जनता का सबसे विश्वसनीय साथी होता है। इन तीनों अवस्थाओं में सबसे पहले सत्य की हत्या होती है। सत्य को बोलना अपराध घोषित कर दिया जाता है।जबकि ऐसी अवस्था में सत्य का उद्धाटन सबसे पहली जरूरत है।

इन अवस्थाओं में मीडिया के मैथड और मंशा का बड़ा महत्व है। जब मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो और राजनीतिक ध्रुवीकरण चरम पर हो,ऐसी अवस्था में वस्तुगत मीडिया बेहद जरूरी है।जबकि यह देखा गया है कि  संकट की इन अवस्था में मीडिया वस्तुगत होने की बजाय ज्यादा से ज्यादा पूर्वाग्रहग्रस्त हो जाता है। उसके सारे पूर्वाग्रह जनतंत्र के लिए खतरा के नाम पर सामने आते हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि आज मध्यपूर्व में मीडिया तेजी से अपना विकास कर रहा है।मध्यपूर्व में मीडिया के चरमोत्कर्ष ने खुलापन पैदा किया है। मध्यपूर्व के लोगों में जनतंत्र, जनतांत्रिक मूल्य और समानतावादी विचारों के प्रति आग्रह पैदा हुए हैं। पश्चिम निर्मित यथार्थ का तिलिस्म टूटा है। बेहतरीन टीवी पत्रकारिता का प्रसार हुआ है।

मध्यपूर्व में घट रहे यथार्थ को लेकर मध्यपूर्व का मीडिया सत्य का पक्षधर बनकर सामने आया है,इसके विपरीत पश्चिम का बहुराष्ट्रीय मीडिया पूर्वाग्रहों से ग्रस्त नजर आता है,उसके ऊपर मध्यपूर्व की जनता विश्वास नहीं करती। मध्यपूर्व में एक तरह से मीडिया-सूचना क्रांति की हवा चल रही है,जिसकी धुरी है सत्य के उद्धाटन का आग्रह और पश्चिमी पूर्वाग्रहों के प्रति घृणा। पश्चिमी मीडिया को आज मध्यपूर्व में अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

पश्चिमी मीडिया को मध्यपूर्व की ऑडिएंस कुसमाचार और अमेरिकी प्रचार के तंत्र के रूप में देख रही है। अमेरिका के मीडिया को खासकर इस संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है। मध्यपूर्व में पश्चिमी मीडिया के पूर्वाग्रह खासकर इस्राइल-फिलीस्तीनी संघर्ष,लेबनान-इस्राइल संघर्ष,इराक-अमेरिकी संघर्ष के समय साफ दिखाई दिए हैं। इन तीनों क्षेत्रों में भड़काने वाले के रूप में फिलीस्तीन,हिजबुल्ला और सद्दाम प्रशासन को चित्रित किया है।

फिलीस्तीनी इलाकों में इस्राइल इसलिए गया क्योंकि फिलीस्तीनी भड़काऊ कार्रवाई कर रहे थे।यही तर्क अन्य क्षेत्रों के बारे में है। इन क्षेत्रों की रिपोर्टिंग झगड़े से शुरू होती है और झगडे तक ही सीमित रहती है। झगड़े के बुनियादी कारणों को रिपोर्टिंग में खोजने की कोशिश ही नहीं की जाती। इस क्रम में फिलीस्तीनी संगठन क्या चाहते हैं,उनका क्या मानना है, घटना विशेष पर उसकी क्या राय है, इत्यादि के बारे में कभी समग्र तस्वीर पेश नहीं की जाती। किसी घटना विशेष की रिपोर्टिंग करते समय मैनस्ट्रीम मीडिया सटीक रिपोर्टिंग का आभास देता है।

     संबंधित घटना को पेश करते समय उसका आरंभ अनुकूल तर्क को केन्द्र में  रखकर होता है।जिससे वह आकर्षक और तार्किक लगे।इसके लिए घटना को क्रमवार पेश किया जाता है। किंतु मुख्यधारा का मीडिया फिलीस्तीन नागरिकों के दैनंदिन जीवन के कष्टों के बारे में हमें खबरें नहीं देता। वह यह नहीं बताता है कि किस तरह इस्राइली कार्रवाई ने उनका जीना दूभर कर दिया है ।

   इस्राइली आतंक के कारण उन्हें किस तरह की मानसिक,शारीरिक,आर्थिक और राजनीतिक यंत्रणाओं से गुजरना पड़ रहा है ? इस्राइली विमानों के द्वारा बस्तियों पर नीचे तक आकर उडान भरने,बम फेंकने आदि के कारण किस तरह रोज आतंक,उत्पीडन और भड़कानेवाली यंत्रणाओं से गुजरना पड़ता है। गर्भवती औरतों का इसके कारण गर्भपात हो जाता है।बच्चों और औरतों के कान के पर्दे फट जाते हैं।रात में जब ये विमान बस्तियों के ऊपर मडराते रहते हैं तो रात की नींद गायब हो जाती है। मीडिया ने कभी इस्राइल के इस तरह के अमानवीय आचरण को अपनी रिपोर्टिंग का हिस्सा नहीं बनाया।
    मध्यपूर्व में दो युध्द चल रहे हैं,पहला युध्द इस्राइली सेना  लड़ रही है,दूसरा युध्द मीडिया लड़ रहा है।मीडिया के पर्दे पर बम के धुंए और तबाही के चित्र आते हैं,भागते हुए लोग दिखाई देते हैं। किन्तु मीडिया कभी अपने को आलोचनात्मक नजरिए से नहीं देखता।वह संकट की प्रक्रियाओं को नहीं दिखाता।बल्कि वह ऐसा दृश्य पेश करता है कि सभी पक्ष पूर्वाग्रह से घिरे हैं।इस प्रक्रिया में अनेक किस्म के आख्यान और व्याख्याएं एक ही साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए नजर आते हैं।
    सवाल यह नहीं है कि सत्य क्या है और आप इसे कैसे जानते हैं ?बल्कि समस्या यह है कि तेजी से परिवर्तित परिस्थितियों में आप क्या जानना चाहते हैं,क्या परिवर्तित परिस्थितियों के सही संदर्भ में चीजें पेश की जा रही हैं ? डच पत्रकार जोरिस लियोनदिजिक ने अपनी नयी किताब ' देआर जस्ट लाइक ह्यूमन विंग' में इस प्रसंग को विस्तार से विश्लेषित किया है।उसने लिखा है ''जब फिलीस्तीन-इस्राइल संघर्ष की रिपोर्टिंग की जाती है तो 'मीडियावार' पदबंध का शायद ही कोई अर्थ हो,समाचारपत्र और टीवी इस संघर्ष की तटस्थ  खिड़की नहीं हैं।बल्कि वह मंच ज्यादा बेहतर जगह है जहां लड़ाई लड़ी जा रही है।दोनों ही पक्षों के परिप्रेक्ष्य एक-दूसरे से कोसों दूर नजर आते हैं। ऐसे में निष्पक्षता का बने रहना एकदम असंभव है।

इस समूची प्रक्रिया में मीडिया भाषा और नजरिए का महत्वपूर्ण स्थान होता है।यहां सारी प्रक्रिया शब्द चयन से शुरू होती है,आतंकवादी या स्वाधीनता सेनानी,शांति की प्रक्रिया या शांति स्थापित करने के प्रयास,ज्यों ही इस्राइल के बारे में कवरेज आना शुरू होता है तो इस्राइल की नीतियों की आलोचना आती है तो इस्राइल यही कहना शुरू कर देता है कि मीडिया के उसके प्रति पूर्वाग्रह हैं।जबकि सच यह है कि अधिकांश मैनस्ट्रीम मीडिया इस्राइलपंथी है।पीडितों को ही आक्रामक के रूप में पेश करता है।
     सामान्यत: मध्यपूर्व में इस्राइली हिंसा से पीडित हैं उन्हें ही आक्रामक के रूप में पेश किया जाता रहा है। किंतु इस्राइली बमबारी और तबाही के जो विवरण और ब्यौरे आने चाहिए थे,वे एकसिरे से गायब हैं। मुख्यधारा के मीडिया ने इस्राइली हमलों को आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई कहा। मध्यपूर्व संघर्ष में मीडिया को सीधे दोषी ठहरा दिया जाए, यह एक तरह का सरलीकरण होगा। मीडिया का काम है मध्यपूर्व में जो मीडिया युध्द चल रहा है उसे उद्धाटित किया जाए। मीडिया युध्द में जो भी पक्ष गलत काम कर रहा है,उसे उजागर किया जाय।
                   

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