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August, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

खाद्य आंदोलन की स्‍मृति‍ और वाममोर्चे के कार्यभार

वाममोर्चा ने पश्‍चि‍म बंगाल 31 अगस्‍त के दि‍न खाद्य आंदोलन की याद में शानदार रैली की। इस रैली को लेकर तरह -तरह का टीवी कवरेज था,चैनलों में जमकर इस रैली के तात्‍कालि‍क राजनीति‍क अर्थों को खोलने की कोशि‍श की गयी। हमेशा की तरह बांग्‍ला चैनल राजनीति‍क आधार पर बंटे हुए थे,चैनलों का इस रैली को लेकर सामयि‍क राजनीति‍क नफा नुकसान खोजना बेतुका प्रयास ही कहा जाएगा। कायदे से खाद्य आंदोलन को लेकर वाममोर्चे की यह नयी पहल नहीं थी, फर्क इतना भर था पहले छोटा जलसा करते थे इसबार बड़ा जलसा कि‍या । इस जलसे में वोट के संदर्भ अर्थ खोजना बेवकूफी होगी। आज से ठीक पचास साल पहले वि‍धानचन्‍द्र राय के शासनकाल के दौरान तकरीबन तीन लाख लोगों की एक रैली आज के सभा स्‍थल के पास के मैदान में हुई थी ,उस रैली में भाग लेने वाले लोग अपने लि‍ए अन्‍न की मांग कर रहे थे, उस समय पश्‍चि‍म बंगाल में गांवों में गंभीर खाद्य संकट था और तत्‍कालीन राज्‍य सरकार इससे नि‍बटने में बुरी तरह वि‍फल रही थी। गरीबों की उस रैली पर तत्‍कालीन प्रशासन के इशारे पर पुलि‍स ने नृशंस लाठीचार्ज कि‍या और आंसूगैस के गोले छोडे,कहने के लि‍ए पुलि‍स ने गोली नहीं…

लालगढ़ कत्‍लेआम पर महाश्‍वेता- राजेन्‍द्र यादव की चुप्‍पी तकलीफ देती है

भारतीय बुद्धि‍जीवी ज्‍यादातर समय सत्‍ता के एजेण्‍डे पर काम करता है। उस एजेण्‍डे के बाहर जाकर सोचता नहीं है। वैकल्‍पि‍क एजेण्‍डे पर सोचता नहीं है।आम जनता के हि‍त के एजेण्‍डे पर वहां तक जाता है जहां तक सत्‍ता जाती है। वह सत्‍ता के हि‍तों के नजरि‍ए से जनता के हि‍तों को परि‍भाषि‍त करता है। बुद्धि‍जीवीवर्ग में दूसरी कोटि‍ में ऐसे लोग आते हैं जो दलीय प्रति‍बद्धता में बंधे हैं। तीसरी कोटि‍ ऐसे बुद्धि‍जीवि‍यों की है जो मृत वि‍षयों पर नि‍रंतर बोलते और लि‍खते हैं। हमेशा परंपरा की गोद में ही बैठे रहते हैं। बुद्धि‍जीवि‍यों की इन तीनों कोटि‍यों से भि‍न्‍न ऐसे भी बुद्धि‍जीवी हैं जो हमेशा वि‍कल्‍प की तलाश में रहते हैं,जनता के हि‍तों पर सत्‍ता,दल और जड़ मानसि‍कता की कैद से परे जाकर सर्जनात्‍मक हस्‍तक्षेप करते हैं। ले‍कि‍न इन चारों ही कोटि‍ के बुद्धि‍जीवि‍यों में एक वि‍लक्षण साम्‍य नजर आ रहा है ,ये पश्‍चि‍म बंगाल के गांवों में चल रहे हिंसाचार के बारे में अपने -अपने कारणों से चुप हैं। अथवा इस हिंसा को एकहरे रंग में देख रहे हैं। एकहरे रंग में हिंसा को देखने के कारण सबसे ज्‍यादा क्षति‍ग्रस्‍त आम आदमी हो…

राजेन्‍द्र यादव के 80वें जन्‍मदि‍न के साहि‍त्‍यि‍क पटाखे के जबाव में

राजेन्‍द्र यादव को 80वें जन्‍मदि‍न पर बधाई । साहि‍त्‍य का उन्‍होंने अगर जाति‍वादी आधार बनाया है और खासकर कवि‍ता का तो उन्‍ाकी बुद्धि‍ की दाद देनी होगी, क्‍योंकि‍ उनको मालूम है भक्‍ि‍त आंदोलन दलि‍तों से भरा है,उत्‍तर ही नहीं दक्षि‍ण के भक्‍त कवि‍यों में दलि‍त हैं, भक्‍ति‍ आंदोलन के दलि‍त कवि‍यों का बाकायदा इति‍हास में सम्‍मानजनक स्‍थान है,साथ ही उन पर जमकर आलोचनाएं भी लि‍खी गयी हैं। कवि‍ता की आधुनि‍क सूची में आपने जि‍न बडे लोगों के नाम लि‍ए हैं वे तो हैं ही, इसी तरह कथासाहि‍त्‍य के बारे में उनकी समझदारी गड़बड़ है,यशपाल,वृन्‍दावनलाल वर्मा,जगदीश चन्‍द्र,भीष्‍म साहनी,सुभद्रा कुमारी चौहान,होमवती देवी,कमला चौधरी, कृष्‍णा सोबती,मन्‍नूभंडारी आदि‍ अनेक बडे लेखकों के नाम उपलब्‍ध हैं जो संयोग से ब्राह्मण नहीं हैं। असल में राजेन्‍द्र यादव की दि‍क्‍कत है पटाका छोडने की, वे साहि‍त्‍य में एटमबम छोड ही नहीं सकते। आपके संवाददाता की रि‍पोर्ट यदि‍ दुरूस्‍त है तो राजेन्‍द्र यादव ने औरतों के लेखन को अपनी सूची से बाहर कर दि‍या है। क्‍या वे महादेवीवर्मा के अलावा कि‍सी भी लेखि‍का को देख नहीं पा रहे हैं ? इसी…

आलोक तोमर के कुतर्की जबाव के प्रत्‍युत्‍तर में

आलोक तोमर जी आपने मूल बातों का जबाव नहीं दि‍या। दें भी क्‍यों आपको मूर्खों से बातें करने में आनंद नहीं आता। वे इस योग्‍य नहीं लगते । आपको अगर 'भले' लोगों से फुरसत मि‍ले तो बातें करें, रही बात समय की तो हमारे पास ईश्‍वर का दि‍या समय,औकात,नौकरी , कुलपति‍यों के साथ बैठने का सुख सब कुछ है, यदि‍ कोई चीज नहीं है तो यह कि‍ गाली देकर तर्क करने का सलीका हमें नहीं आता, मैं हैसि‍यत दि‍खाने के लि‍ए नहीं लि‍ख रहा,मुझे आपसे ईनाम थोडे ही लेना है और नहीं आपसे कि‍सी के पास सि‍फारि‍श लगवानी है, रही बात योग्‍यता और अंकों की तो वह तब ही बताऊंगा जब आप मेरी बातों का तमीज के साथ जबाव देंगे। मैं पढाता कैसा हूं यह भी तब ही पता चलेगा जब पढने आएंगे,घर बैठे पता नहीं चलेगा। मूर्खता आपने की है और बि‍ना पढे की है, जाकर देख लें कि‍ कहां लि‍खा है फि‍र जबाव दें,हठी भाव से जबाव नहीं देना चाहेंगे तो यह भी आपका लोकतांत्रि‍क हक है,मैं आपके साथ सहानुभूति‍ नहीं रख पा रहा हूं क्‍योंकि‍ आपने जि‍स भाषा,असभ्‍यता और दंभ का प्रदर्शन कि‍या है उसे इस संसार में कोई दुरूस्‍त नहीं कर पाया है,मुझे पढने,पढाने और गलत करने वालों क…

प्रभाष जोशी की साम्‍प्रदायि‍क पत्रकारि‍ता के कुछ नमूने

प्रभाष जोशी के संपादकत्‍व में ‘जनसत्‍ता’ में कि‍स तरह की अ-धर्मनि‍रपेक्ष पत्रकारि‍ता हो रही थी,उसके संदर्भ में प्रभाष जोशी के भक्‍तों के लि‍ए यही सुझाव दूंगा कि‍ वे सि‍र्फ राममंदि‍र आंदोलन के दौर के जनसत्‍ता को देखें,कम समय हो तो ‘टाइम्‍स सेंटर ऑफ मीडि‍या स्‍टडीज’ के द्वारा उस दौर के कवरेज के बारे में तैयार की गयी वि‍स्‍तृत सर्वे रि‍पोर्ट ही पढ़ लें, यह रि‍पोर्ट प्रसि‍द्ध पत्रकार मुकुल शर्मा ने तैयार की थी, जो इन दि‍नों अंतर्राष्‍ट्रीय मानवाधि‍कार संगठन की भारत शाखा के प्रधान हैं।’टाइम्‍स सेंटर ऑफ मीडि‍या स्‍टडीज’ की रि‍पोर्ट के अनुसार ‘जनसत्‍ता’ अखबार ने जो उन दि‍नों दस पन्‍ने का नि‍कलता था। लि‍खा है ” दस पेज के इस अखबार में 20 अक्‍टबर से 3 नवंबर तक कोई दि‍न ऐसा नहीं रहा,जि‍स दि‍न रथयात्रा अयोध्‍या प्रकरण पर 15 से कम आइटम प्रकाशि‍त हुए हों। कि‍सी -कि‍सी रोज तो यह संख्‍या 24-25 तक पहुंच गई है। ” इसी प्रसंग में ‘जनसत्‍ता’ की तथाकथि‍त स्‍वस्‍थ और धर्मनि‍रपेक्ष पत्रकारि‍ता की भाषा की एक ही मि‍साल काफी है। ‘जनसत्‍ता’ ने (३ नवंबर 1990 ) प्रथम पृष्‍ठ पर छह कॉलम की रि‍पोर्ट छापी। लि‍खा ” अयो…

आलोक तोमर की बेईमान पत्रकारि‍ता

आलोक तोमर जी ,आप 'ईमानदार' हैं,यह बात कम से कम कहनी पड रही है, प्रभाष जोशी पर जि‍तनी भी बहस हुई उसमें सबसे ज्‍यादा गंभीर बहस मैंने चलाई है,मेरा अनुमान सही था कि‍ आपने अपना लेख बि‍ना पढे लि‍ख मारा। यह टि‍प्‍पणी भी बि‍ना पढे ही पचा गए, सचमुच में मजेदार आदमी हैं,गुरू को भी पचा गए और दोस्‍तों के लि‍खें को भी हजम कर गए।
आलोक तोमर जी आपने लि‍खा है ''जगदीश्वर जी का लेख मैंने नहीं पढा है. कहाँ छपा था? '' मैं पता बताने की मूर्खता नहीं करूंगा,आप जानते हैं,नहीं जानते हैं तो जानें और अपने गुरू की रक्षा में जि‍तनी रसद हो खर्च कर दें, कम पडे तो हमसे बोलि‍एगा, प्रभाष जोशी की हजार गलति‍यों के बावजूद हम उनके साथ हैं,लेकि‍न आलोचनात्‍मक वि‍वेक को ताक पर रखकर नहीं। पगार,शि‍क्षा,औकात या सामाजि‍क हैसि‍यत वाली बात इसलि‍ए आयी थी क्‍योंकि‍ आपने पत्रकारि‍ता के उसूलों के बाहर जाकर लि‍खा था,मैंने आपसे आपके अंक नहीं पूछे थे मैंने प्रभाषजोशी के खि‍लाफ लि‍खी गयी अपनी आलोचना पर जबाव मांगा है, मैं जानता हूं आप पढे लि‍खे आदमी हैं किंतु गुरूभक्‍ति‍ में अपने आलोचनात्‍मक वि‍वेक से वि‍श्‍वासघात कर …

संस्‍कृति‍हीन गद्य है आलोक तोमर का

मैंने दंभी आलोक तोमर नहीं देखा था,बेहद वि‍नम्र और मि‍लनसार आलोक तोमर देखा है, वह यह आलोक तोमर नहीं है जो मैंने अपने जेएनयू के छात्र जीवन में पढते हुए देखा था, मवालि‍यों की भाषा बोलने वाला आलोक तोमर कहां से आया ? आखि‍र यह पत्रकार दादागि‍री की भाषा क्‍यों बोल रहा है ? मैंने ऐसी भाषा में कभी कि‍सी पत्रकार को लि‍खते नहीं देखा। आलोक तोमर यह भारतेन्‍दु,महावीरप्रसाद द्वि‍वेदी,प्रेमचंद,राजेन्‍द्रयादव,प्रभाष जोशी,राजेन्‍द्र माथुर की परंपरा वाली भाषा नहीं है। आलोक तोमर यह बताओ आखि‍रकार आदमी का इतना तेजी से पतन कैसे होता है कि‍ वह पत्रकारि‍ता की समस्‍त परंपराओं, एथि‍क्‍स, नीति‍यां,मानकों,संपादकीय नीति‍ आदि‍ सबको भूल जाए और गली के दादाओं की भाषा का इस्‍तेमाल करने लगे। आलोक तोमर जानते हैं आप जो कह रहे हैं पूरे होशोहवास में कह रहे हैं। यदि‍ ये बातें बेहोशी मैं भी कही गयी हैं तब भी क्षम्‍य नहीं हैं। खासकर मेरे लेखन के संदर्भ में तो आपने अक्षम्‍य अपराध कि‍या है। आपको लठैती कब से आ गयी ? कलम का सि‍पाही संस्‍कृति‍वि‍हीन लोगों की भाषा में सम्‍बोधन कर रहा है वह भी ऐसे लोगों से जो उससे अनेक गुना ज्‍…

'हि‍न्‍दी वाला' फेमि‍नि‍ज्‍म से क्‍यों डरता है ?

हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य में औरत है किंतु उसका शास्‍त्र नहीं है। स्‍त्रीशास्‍त्र के बि‍ना औरत नि‍रस्‍त्र है। अनाथ है,पराश्रि‍त है। साहि‍त्‍य की प्रत्‍येक वि‍धा में लि‍खने वाली औरतें हैं,साहि‍त्‍यि‍क पत्रि‍काओं में 'हंस' जैसी शानदार पत्रि‍का है जि‍सके संपादक आए दि‍न स्‍त्री का महि‍मामंडन करते रहते हैं, छायावाद में स्‍त्री की महत्‍ता का उदघाटन करने वाले नामवर सिंह की इसी नाम से शानदार कि‍ताब है। इसके बावजूद 'हि‍न्‍दीवाला' (यहां लेखकों,बुद्धि‍जीवि‍यों,शि‍क्षकों से तात्‍पर्य है) स्‍त्रीवाद को लेकर भडकता क्‍यों है ?
हि‍न्‍दी में स्‍त्री शास्‍त्र नि‍र्मित क्‍यों नहीं हो पाया ? हि‍न्‍दी वाला 'फेमि‍नि‍ज्‍म' अथवा 'स्‍त्रीवाद' पदबंध के प्रयोग से इतना भागता क्‍यों है ? हि‍न्‍दी में कोई फेमि‍नि‍स्‍ट पैदा क्‍यों नहीं हुआ ? हि‍न्‍दी वि‍भागों में अरस्‍तू से लेकर मार्क्‍सवाद तक सभी सि‍द्धान्‍त पढाए जाएंगे लेकि‍न स्‍त्रीवाद नहीं पढाया जाता,ऐसा क्‍या है जो स्‍त्रीवाद का नाम सुनते ही हि‍न्‍दी वाले की हवा नि‍कल जाती है। स्‍त्री के सवाल तब ही क्‍यों उठते हैं जब उस पर जुल्‍म ह…

कंधहार फैसले में क्‍या आरएसएस शामि‍ल था ?

भूतपूर्व राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मि‍श्रा ने आज एक नि‍जी टेलीवि‍जन को साक्षात्‍कार में जो कुछ कहा है वह हमारे देश के लि‍ए शर्म की बात है और कम से कम भाजपा के नेतृत्‍व के लि‍ए यह सीधे देश के खि‍लाफ वि‍श्‍वासघात का मामला बनता है। कंधहार प्रकरण के तथ्‍य धीरे -धीरे सामने आ रहे हैं और बड़े ही पुख्‍ता तरीके से पेश कि‍ए जा रहे हैं, सवाल यह है ब्रजेश मि‍श्रा साहब ने ये सभी बातें उसी समय देश के सामने क्‍यों नहीं रखीं ? वे कौन सी मजबूरि‍यां थीं जि‍नके चलते उनका अब तक मुंह बंद था और अचानक अब उनको सत्‍य बोलने की जरूरत पड़ रही है ? यही सवाल जसवंत सिंह जी से भी पूछा जाना चाहि‍ए कि‍ उन्‍होंने जि‍स समय कंधहार मसले पर फैसला लि‍या था और आज जब इतने दि‍नों बाद उस पर रोशनी डाल रहे हैं तो क्‍या 'सुरक्षा केबीनेट कमेटी' का फैसला सही था या गलत ? क्‍या इस तरह का फैसला जब लि‍या गया और जेल में बंद आतंकि‍यों को लेकर वे जब कंधहार गए थे तब क्‍या उन्‍होंने भारत के संवि‍धान की रक्षा की थी ? आज रहस्‍योदघाटन करके वे क्‍या गोपनीयता भंग नहीं कर रहे ? यदि‍ नहीं तो उसी समय देश की जनता को क्‍यों नहीं बताया…

पोर्न वि‍रोधी घोषणापत्र- मानवता का अपमान है पोर्न

इंटरनेट आने के बाद पोर्नोग्राफी का कारोबार बढा है। पहले पोर्न को लेकर शर्म आती थी अब पोर्न नि‍र्भय होकर हमारे घर में घुस आया है। पोर्न के कारोबार में बड़े कारपोरेट घराने शामि‍ल हैं,वे बड़ी निर्लज्‍जता के साथ पोर्न का धडल्‍ले से धंधा कर रहे हैं, सरकारी और नि‍जी क्षेत्र की संचार कंपनि‍यां पोर्न से अरबों डालर कमा रही हैं। जब से इंटरनेट आया है और ब्रॉडबैण्‍ड का कनेक्‍न आया है तब से हमारी केन्‍द्र सरकार भी जाने-अनजाने पोर्न का हि‍स्‍सा हो गयी है,प्‍लास्‍टि‍क मनी के प्रचलन में आने के बाद हमारी राष्‍ट्रीयकृत बैंक भी पोर्न की कमाई में शामि‍ल हो चुकी हैं। आज पोर्न सबसे ज्‍यादा देखा जा रहा है और सबसे कम उस पर बातें हो रही हैं।
भारतीय समाज की वि‍शेषता है कि‍ वह जि‍न सामाजि‍क बीमारि‍यों का शि‍कार है उनके बारे में कभी भी गंभीरता के साथ चर्चा नहीं करता। इंटरनेट आने के बाद पोर्न का जि‍तना तेज गति‍ से वि‍कास हुआ है उतनी तेज गति‍ से कि‍सी भी चीज का वि‍कास नहीं हुआ। पोर्न ने हमारे सामाजि‍क जीवन में खासकर युवाओं के जीवन में जि‍स तरह का हस्‍तक्षेप और दखल शुरू कि‍या है उसे यदि‍ अभी तत्‍काल नहीं रोक…

राजनीति‍क असभ्‍यता का गोमुख कहां है ?

भारत में इन दि‍नों राजनीति‍क असभ्‍यता की बाढ़ आयी हुई है, असभ्‍यता कि‍सी एक दल की बपौती नहीं है, इस पर उन सबका समान हक है जि‍नका सभ्‍यता पर हक है। जो सभ्‍य होते हैं वे ही असभ्‍यता भी करते हैं। आखि‍रकार राजनीति‍क असभ्‍यता पैदा क्‍यों होती है ? इसका स्रोत कहां है ? जसवंत सिंह को भाजपा से नि‍काल दि‍या गया क्‍योंकि‍ उन्‍होंने अपनी कि‍ताब में जि‍न्‍ना की वकालत की थी, मैं भाजपा के द्वारा पारि‍त अब तक के सभी राजनीति‍क प्रस्‍ताव देख गया मुझे कहीं पर भी एक भी प्रस्‍ताव नहीं मि‍ला जहां भाजपा ने जि‍न्‍ना के बारे में अथवा भारत वि‍भाजन के बारे में पार्टी नजरि‍ए का प्रति‍पादन कि‍या हो, कृपया भाजपा उन प्रस्‍तावों को सार्वजनि‍क करे जो जि‍न्‍ना और भारत वि‍भाजन के सवाल पर उसने कभी पास कि‍ए थे।
जि‍न्‍ना,पाकि‍स्‍तान,भारत-वि‍भाजन आदि‍ मसलों पर आरएसएस के सरसंघचालक की लि‍खी कि‍ताबें जरूर मि‍लती हैं,जहां पर संघ का नजरि‍या व्‍यक्‍त कि‍या गया है, किंतु भाजपा ने कभी भी इन मसलों पर कोई प्रस्‍ताव पारि‍त नहीं कि‍या।‍ भाजपा की स्‍थापना के साथ जो प्रस्‍ताव पारि‍त कि‍ए गए थे वे भी इन दोनों मसलों पर कोई रोशनी नहीं …

प्रभाष जोशी का कचरा इति‍हास ज्ञान

प्रभाष जोशी के पूरे साक्षात्‍कार पर एक बात रेखांकि‍त करना बेहद जरूरी है इस साक्षात्‍कार में उन्‍होंने अपना जो इति‍हास ज्ञान प्रदर्शित कि‍या है, उसका इति‍हास के तथ्‍यों से कोई लेना देना नहीं है बल्‍कि‍ यह इति‍हास के बारे में गलतबयानी है। इस गलतबयानी की जड़ है इति‍हास की गलत समझ। कुछ नमूने दखें और गंभीरता के साथ वि‍चार करें कि‍ प्रभाष जोशी कि‍तना सच बोल रहे हैं।
प्रभाष जी ने कहा है ''मारिया मिश्रा नाम की एक ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की महिला हैं, उन्होंने एक अच्छी किताब लिखी है India since the Rebellion: Vishnu's Crowded Temple. उसमें उन्होने कहा है कि जवाहर लाल नेहरू तो आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल थे. क्योंकि उन्होंने उन्हीं चीजों को कंटिन्यू किया जो कि गवर्नर जनरल करते थे।''
क्‍या यह बयान तथ्‍यों से पुष्‍ट होता है ? क्‍या‍ भारत की आज जो आत्‍मनि‍र्भर देश की छवि‍ है वह क्‍या अंग्रेजों के मार्ग पर चलने के कारण संभव थी ? सार्वजनि‍क क्षेत्र का जो वि‍शाल तंत्र खड़ा कि‍या गया वैसा क्‍या अंग्रेजों की नीति‍यों पर चलते हुए संभव था ? आज स्‍थि‍ति‍ यह है अमेरि‍का को आर्थि‍क मंद…

चीन के कम्‍युनि‍स्‍टों का संपत्‍ति‍ प्रेम

हाल ही में जारी हुरून रि‍पोर्ट में बताया गया है कि‍ दुनि‍या के सबसे ज्‍यादा अमीर चीन में रहते हैं। एक लाख तेतालीस हजार मल्‍टीमि‍लि‍नि‍यर और आठ हजार आठ सौ बि‍लि‍नि‍यर चीन में हैं। अकेले शंघाई में 1,16,000 मल्‍टीमि‍लि‍नि‍यर और सात हजार बि‍लि‍नि‍यर हैं। इनमें ज्‍यादातर वे लोग हैं जो चीन के कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी के सदस्‍य हैं,अथवा सदस्‍यों के करीबी रि‍श्‍तेदार हैं,अथवा भू.पू. सेना अधि‍कारी हैं। इनके शौक हैं शानदार बड़े बड़े रि‍हाइशी भवन,वि‍ला ,मर्सडीज कार आदि‍ खरीदना,इनकी बीबि‍यों के शौक हैं मंहगे शानदार क्‍लबों में जाना,पि‍यानो बजाना सीखना,कलाकृति‍यां खरीदना ,दुनि‍या के वि‍त्‍तीय जगत के बारे में अपडेट रहना। काश भारत में कम्‍युनि‍स्‍ट अरबपति‍ होते।

प्रभाष जोशी पर बहस व्‍यक्‍ति‍गत नहीं पेशेवर है

सि‍द्धार्थ जी ,लगता है आप समझदार व्‍यक्‍ति‍ हैं,लि‍खा हुआ पढ़ लेते हैं,मेरा सारा लि‍खा आपके सामने है आप कृपया बताएं कि‍ कहां पर गाली-गलौज की भाषा का इस्‍तेमाल कि‍या गया है। क्‍या आलोचना लि‍खना गाली है ? यदि‍ आलोचना लि‍खना गाली है तो फि‍र आलोचना वि‍धा को क्‍या कहेंगे ? लि‍खा हुआ और यथार्थ की कसौटी पर परखा हुआ छद्म नहीं वास्‍तवि‍क होता है,छद्म लेखन के लि‍ए जि‍न उपायो की जरूरत होती है उनमें से एक है रूपकों के जरि‍ए अनेकार्थी बातें करना और यह काम प्रभाष जोशी ने अपने साक्षात्‍कार में खूब कि‍या है ,सती के प्रसंग में।
कि‍सी के लि‍खे पर लि‍खना,आलोचनात्‍मक नजरि‍ए से लि‍खना गाली-गलौज नहीं कहलाता,यह स्‍वस्‍थ समाज का लक्षण है, आंखें बंद करके रखना,जो कहा गया है उसे अनालोचनात्‍मक ढ़ंग से मान लेना आधुनि‍क होना नहीं है, आधुनि‍क व्‍यक्‍ि‍त वह है जो असहमत होता है,आप जब असहमत होने वालों को गलत ढ़ंग से व्‍याख्‍यायि‍त करते हैं तो हमें दि‍क्‍कत होगी ,हम चाहेंगे आप हमसे तर्क के साथ असहमति‍ व्‍यक्‍त करें।नि‍ष्‍कर्ष और जजमेंट सुनाकर फैसला न दें।

भाई रणवीर जी, इंटरनेट पर जाओगे तो कुछ भी हो सकता है,मैं बहुत ही भर…

'सच का समाना' और रि‍यलि‍टी टीवी का खेल

हाइपररियलिटी का सबसे बड़ा खेल टेलीविजन इमेजों में चल रहा है। टीवी इमेजों के माध्यम से हमारे बीच रियलिटी शो पहुँच रहे हैं। रियलिटी टेलीविजन के जरिए हाइपररीयल और रीयल के बीच का भेद खत्म हो गया है। टेलीविजन अब हाइपररीयल इमेजों को ही प्रक्षेपित कर रहा है। यथार्थ और फैंटेसी के बीच फर्क भूल गए हैं। बगैर सोचे समझे फैण्टेसी के जाल में उलझ जाते हैं। ऐसी अवस्था में हम जान ही नहीं पाते कि क्या कर रहे हैं।
हाइपररीयल की चारित्रिक विशेषता है यथार्थ को समृध्द करना। इस प्रसंग में देरिदा का तर्क है यथार्थ को समृध्द करने के नाम पर कृत्रिमता को पेश किया जाता है और उसको ही दर्ज किया जाता है। दर्ज से अर्थ है घटनाविशेष की प्रस्तुति । इस तरह की प्रस्तुतियां पुंसवाद में इजाफा करती हैं और निजता (प्राइवेसी) पर हमला करती हैं। बौद्रिलार्द ने लिखा इससे ऑबशीन के प्रति हमारे मन में आकर्षण पैदा होता है। देखने की इच्छा का ही परिणाम है कि अन्य देखने के लिए आएं।
रियलिटी शो में हम अपनी सुविधाओं ,सत्‍य और आराम का महिमामंडन करते हैं। रियलिटी शो या खबरों में अन्य के कष्टों को देखकर परपीडक आनंद लेते हैं। टेलीविजन इमेज यथार्थ …

लालगढ़ के असली अपराधी हैं माओवादी

संतोष राणा के आलेख में बड़े ही वि‍स्‍तार और पारदर्शिता के साथ लालगढ़ आन्‍दोलन के बारे में वि‍श्‍लेषण कि‍या गया है ।यह वि‍श्‍लेषण जि‍स चीज पर रोशनी डालता है वह है लालगढ़ आन्‍दोलन की असफलता। क्‍या लालगढ़ में कोई आंदोलन चल रहा था ? लालगढ़ में कोई आंदोलन नहीं चल रहा था,सालबनी की बारूदी सुरंग वि‍स्‍फोट की घटना के बाद जि‍स तरह का बर्बर व्‍यवहार पुलि‍स ने कि‍या था उसके लि‍ए राज्‍य प्रशासन ने यदि‍ स्‍थानीय लोगों की मांगों को मान लि‍या होता तो यह समस्‍या उसी दि‍न खत्‍म हो जाती। राज्‍य सरकार ने अपनी दीर्घकालि‍क योजना के तहत पुलि‍स कैंप हटाने का फैसला लि‍या था, जनता का यदि‍ इलाके में कोई आंदोलन रहा होता तो वि‍गत बीस सालों से नि‍कम्‍मे लोग पंचायतों से लेकर लोकसभा तक चुनाव नहीं जीत पाते,इस इलाके में माकपा का वि‍गत बीस सालों से राजनीति‍क वर्चस्‍व नहीं है बल्‍कि‍ अन्‍य दलों का है। लालगढ़ में माओवादि‍यों ने जो हिंसाचार कि‍या है,जनता को उत्‍पीड़ि‍त कि‍या है,सजाएं दी हैं,माकपा और अन्‍य दलों के कार्यकर्त्‍ताओं की हत्‍याएं की हैं, उन्‍हें लेकर क्‍या कानूनी और राजनीति‍क कदम उठाए जाने चाहि‍ए ? दूसरी बात, आ…

ब्‍लॉग लेखन के दस साल और हि‍न्‍दी का भवि‍ष्‍य

'ब्‍लाग' लेखन के दस साल पूरे हो गए हैं। वर्ष 1999 में पीटर महोर्ल्ज ने इस नाम को जन्‍म दि‍या था। इसी साल सन फ्रांसि‍स्‍को की पि‍यारा लैब ने 'वी ब्लॉग'से आगे बढकर लोगों को संवाद की सुवि‍धा मुहैयया करायी थी,ब्‍लॉग की दुनि‍या ने आज सारी दुनि‍या में संवाद की प्रकृति‍ को बदल दि‍या है। मार्च, 1999 में ब्रैड फिजपेट्रिक ने 'लाइव जर्नल' नामक वेब पत्रि‍का बनायी और लेखकों यानी ब्‍लागरों को इस पर लि‍खने की सुवि‍धा प्रदान की। जो ब्लॉगरों को होस्टिंग की सुविधा देती थी। सन् 2003 में ओपेन सोर्स ब्‍लॉगि‍ग प्‍लेटफार्म वर्डप्रेस का जन्‍म हुआ और पि‍यारा लैब्‍स के ब्‍लॉगर को गूगल ने खरीद लि‍या। इसके बाद से ब्‍लॉगिंग की सुवि‍धा सारी दुनि‍या में आम हो गयी।
'टेक्नोरॉटी' द्वारा 2008 में जारी आंकड़ों के हिसाब से पूरी दुनिया में ब्लॉगरों की संख्या 13.3 करोड़ पहुंच गई है। भारत में लगभग 32 लाख लोग ब्लॉगिंग कर रहे हैं।हि‍न्‍दी में भी ब्‍लॉगिंग लेखन जनप्रि‍यता अर्जित कर रहा है। हि‍न्‍दी में ब्‍लॉगिंग लेखन में बड़ी संख्‍या में युवा लेखक,पत्रकार और बुद्धि‍जीवी आ रहे हैं,पुराने…

संचार क्रांति‍,संस्‍कृति‍ और समाज

संचार क्रान्ति की विश्व में लम्बी परंपरा है। यह कोई यकायक घटित परिघटना नहीं है। 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के आरंभ में प्रकृति‍ विज्ञान की खोजों ने तकनीकी क्रांति का आधार तैयार किया था। पहला भाप का इंजन 1708 में आया और सुधार के बाद जेम्सवाट ने 1775 में बनाया। पहला रेलमार्ग 1829 में लीवरपूल से मैनचैस्टर के बीच बना।पहली कार 1909 में बाजार में आई।पहला जेट विमान 1937 में आया।यानी भाप के इंजन से जेट के इंजन तक की तकनीकी यात्रा में 229 वर्षों का समय लगा।
जबकि पहली पीढ़ी का कंप्यूटर 1946 में आया।दूसरी ,तीसरी और चौथी पीढ़ी का कम्प्यूटर क्रमश:सन् 1956,1965और 1988 में आया।यानी कम्प्यूटर क्रांति पांचवीं पीढ़ी के परिवर्तनों तक मात्र 36 वर्षों में पहुंच गई। सतह पर देखें तो कम्प्यूटर क्रांति की गति औद्योगिक क्रांति से तीव्र नजर आएगी। यानी 6.4 गुना ज्यादा तीव्र गति से सूचना तकनीकी का विकास हुआ।गति की तीव्रता का कारण है तकनीकी, ,ज्ञान,विज्ञान,एवं सैध्दान्तिकी के पूर्वाधार की मौजूदगी। इसके विपरीत औद्योगिक क्रांति के समय आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का पूर्वाधार मौजूद नहीं था।
औद्योगिक क्रांति क…