शनिवार, 15 अगस्त 2009

अमरीका का मुस्‍लि‍म द्वेष ,शाहरूख खान और बहुराष्‍ट्रीय मीडि‍या

आज खबर आई कि‍ कल अमेरि‍का में न्‍यूयार्क में हवाई अड्डे पर शाहरूख खान को मुसलमान होने के नाते हवाई अड्डे के अधि‍कारि‍यों ने दो घंटे तक परेशान कि‍या। अंत में भारतीय दूतावास के हस्‍तक्षेप के बाद ही मामला सि‍लटा। शाहरूख का मामला अकेला मामला नहीं है बल्‍कि‍ इसके पहले और अनेक मुस्‍लि‍म अभि‍नेताओं को परेशान कि‍या गया है। इनमें आमि‍र खान,सलमान खान आदि‍ के नाम शामि‍ल हैं। अभी दो दि‍न पहले ही अमेरि‍का के एक संगठन ने इस बात के लि‍ए भारत की घनघोर आलोचना की थी भारत में अल्‍पसंख्‍यकों के साथ भेदभाव कि‍या जाता है उन पर हमले होते रहे हैं। इसी प्रसंग में गुजरात,मुम्‍बई आदि‍ के दंगों के साथ सि‍ख नरसंहार का भी हवाला दि‍या गया। मजेदार बात यह है कि‍ जि‍स संगठन ने भारत के बारे में धार्मिक भेदभाव की रि‍पोर्ट छापी है उसने अमरीका में अल्‍पसंख्‍यकों के साथ हो रहे धार्मि‍क भेदभाव के बारे में कुछ भी नहीं लि‍खा, लेकि‍न सारी दुनि‍या जानती है कि‍ अमेरि‍का में मुसलमानों के साथ दूसरे दर्जे के नागरि‍कों जैसा व्‍यवहार कि‍या जाता है, उन्‍हें तरह-तरह से उत्‍पीडि‍त कि‍या जाता है,उनके ऊपर पुलि‍सि‍या नि‍गरानी रखी जाती है। चि‍ट्ठि‍यां पढ़ी जाती हैं,ई मेल की नि‍गरानी और छानबीन की जाती है। यह सारा मामला नाइन इलेवन की घटना के बाद तो अनि‍वार्य नि‍यम की श्‍ाक्‍ल ले चुका है।
अमेरि‍की मीडि‍या में मुसलमान सबसे घृणि‍त पात्र होता है,इस्‍लाम धर्म,मुसलमान और अरब देशों को लेकर जहर उगलने में अमेरि‍की मीडि‍या की अग्रणी भूमि‍का रही है। इसमें हॉलीवुड से लेकर बहुराष्‍ट्रीय मीडि‍या कंपनि‍यों के वि‍भि‍न्‍न माध्‍यम घि‍नौनी भूमि‍का अदा करते रहे हैं, शाहरूख खान की ताजा फि‍ल्‍म के नि‍र्माता फॉक्‍स कंपनी ने भी मुस्‍लि‍म वि‍रोधी घृणा पैदा करने में अग्रणी भूमि‍का अदा की है। शाहरूख के प्रति‍ जि‍स तरह का दुर्व्‍यवहार कि‍या गया है उसे लेकर तेज प्रति‍क्रि‍या हुई है और 'जैसे को तैसा' की बदले की भावनासे काम लेने की बातें हो रही हैं।अम्‍बि‍का सोनी ,जो प्रसारण मंत्री हैं, उन्‍होंने भी अपने बयान में बदला लेने की बात कही है। बदला लेने वाले भाव से बचना चाहि‍ए।
अमेरि‍का मुसलमान वि‍रोधी है और अमेरि‍की मीडि‍या भी मुस्‍लि‍म वि‍रोधी स्‍टीरि‍योटाईप में लगा रहा है। कायदे से इस समस्‍या को व्‍यापक परि‍प्रेक्ष्‍य में गंभीरता के साथ समझने की जरूरत है।
आमतौर पर भूमंडलीय जनमाध्यमों में इस्लाम धर्म और मुसलमान के बारे में 'स्टीरियोटाइप' प्रस्तुतियां मिलती हैं।इनमें इस्लाम एवं मुसलमान को आतंकवाद,पिछडेपन,बर्बरता और तत्ववाद का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया जाता है।इसके अलावा हिन्दू धर्म बनाम इस्लाम धर्म,ईसाइयत बनाम इस्लाम धर्म,पश्चिमी सभ्यता बनाम प्राच्य सभ्यताएं आदि रुपों में प्रस्तुतियां मिलती हैं।

इस प्रसंग में सबसे बड़ी बात यह है कि देश विशेष को धर्म की पहचान से जोड़ना ठीक नहीं है।यह गलती वे देश भी करते हैं जो अपने को इस्लामिक राष्ट्र कहते हैं और भूमंडलीय माध्यम भी करते हैं।आमतौर पर यह मान लिया गया है कि जहां मुसलमान रहते हैं वे इस्लामिक राष्ट्र हैं।यदि इस केटेगरी के आधार पर वर्गीकरण करेंगे तो आधुनिक समाजविज्ञान की राष्ट्र-राज्य के विमर्श की समस्त वैज्ञानिक धारणाएं धराशायी हो जाएंगी। धर्म को यदि भारत,अमेरिका,ब्रिटेन आदि में राष्ट्र की पहचान से जोड़ना गलत माना जाता है तो यही बात उन देशों पर भी लागू होती है जिन्हें इस्लामिक राष्ट्र कहते हैं। असल में इस तरह की कोई भी केटेगरी राष्ट्र-राज्य के विमर्श को तत्ववाद के दायरे में ले जाती है।जाने-अनजाने हम सभी यह गलती करते हैं।

इस्लामिक समाज बेहद जटिल समाज है।इसकी संरचना का देश विशेष के उत्पादन संबंधों और आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन किया जाना चाहिए।इसके बावजूद यह सच है कि मध्य-पूर्व के देशों में जनतंत्र का अभाव है,आधुनिक उत्पादन संबंधों का अभाव है,कल्याणकारी कार्यक्रमों का अभाव है,शिक्षा,सामाजिक सुरक्षा,रोजगार ,चिकित्सा आदि का अभाव है।लम्बे समय से इन देशों में राजशाही है या तानाशाही है।सेंसरशिप है।इसके बावजूद सरकारें हैं जिनका आर्थिक-राजनीतिक कार्यक्रम है।समाज को ये सरकारें ही चला रही हैं। किन्तु इन समाजों में वैविध्य है। जीवन शैली और शासन के रुपों में अंतर है।मध्य-पूर्व के सभी देश एक जैसे नहीं हैं।इनका आंतरिक ताना-बाना और परम्पराएं अलग-अलग हैं।भूमंडलीय माध्यम कभी-भी इन समाजों में प्रवेश करके जानने की कोशिश नहीं करते। अत: इन देशों को एक कोटि में रखकर विश्लेषित नहीं किया जा सकता।यह सच नहीं है कि इन समाजों को मुल्ला या इसी तरह की कोई संस्था संचालित करती है।

सच्चाई यह है कि पश्चिमी समाजों के उद्भव और विकास के बारे में विस्तृत अध्ययन हुए हैं।जबकि इस्लामिक समाज के बारे में गंभीर अध्ययन अभी तक नहीं हुए हैं।सामान्यत: इस्लामिक समाज के बारे में एक अनुसंधान कर्त्‍ता की बजाय एक पत्रकार की अतिरंजित बयानबाजी देखने को मिलेगी। इस तरह के लेखन में आमतौर पर इस्लाम का आतंकवाद या तत्ववाद से संबंध जोड़ दिया जाता है।इस तरह की प्रस्तुतियों का लक्ष्य इस्लाम के खिलाफ ईसाइयत या हिन्दू तत्ववाद को उभारना और एकजुट करना होता है।साथ ही इस्लामिक समाज के बारे पश्चिम के विचारों को आरोपित करना होता है।इस तरह की प्रस्तुतियां जातीय और राष्ट्रीय पहचान के ऊपर धार्मिक पहचान को वरीयता प्रदान करती हैं।यही वजह है कि मुसलमान हमेशा धार्मिक होता है,राष्ट्रीय नहीं।राष्ट्रभक्त नहीं होता अपितु मुल्लाभक्त होता है।पोंगापंथी होता है आधुनिक नहीं होता।

भूमंडलीय माध्यमों एवं भारत के व्यावसायिक पत्रकारों की राय में अभी भी मुसलमानों की धार्मिक पहचान खत्म नहीं हुई है,उनकी पहचान का राष्ट्रीयता की पहचान में रुपान्तरण नहीं हुआ है।सच यह है कि भारत जैसे आधुनिक राष्ट्र में किसी समूह के पास धार्मिक पहचान नहीं है।अपितु राष्ट्रीयता की पहचान में रुपान्तरण हो चुका है।जनमाध्यम इस रुपान्तरण को छिपाते हैं।इसके विपरीत यह स्टीरियोटाइप निर्मित करते हैं कि मुसलमान कट्टर और पिछड़े होते हैं। वे कभी नहीं बदलते।वे धर्म के पक्के होते हैं।धर्म के अलावा उनके पास और कोई पहचान नहीं होती।इसके विपरीत पश्चिमी समाजों की धार्मिक पहचान को छिपाया जाता है।इन समाजों की राष्ट्रीय पहचान , देश की पहचान, सभ्यता की पहचान को उभारा जाता है।जबकि औपनिवेशिक राष्ट्रों की राष्ट्र या जातीय पहचान को को एकसिरे से अस्वीकार किया जाता है।इन देशों की मध्यकालीन अस्मिताओं को उभारा जाता है।कहने का तात्पर्य यह है कि मध्य-पूर्व के देशों या तीसरी दुनिया के देशों की जातीय या राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान को भूमंडलीय माध्यम विकृत रुप में पेश करते हैं।उनके लिए अस्मिता की पहचान की आधुनिक कोटियों का इस्तेमाल नहीं करते।सच्चाई यह है कि दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जहाँ धर्म न हो,धर्म के मानने वाले न हों,धार्मिक संस्थान न हों।किन्तु धार्मिक पहचान के साथ सिर्फ मुसलमानों को प्रस्तुत किया जाता है।सच यह है कि मुसलमान का धर्म के साथ वही रिश्ता है जो किसी ईसाई या हिन्दू का है।

एडवर्ड सईद ने ''कवरिंग इस्लाम''(1997) में विस्तार से भूमंडलीय माध्यमों की इस्लाम एवं मुसलमान संबंधी प्रस्तुतियों का विश्लेषण किया है।सईद का मानना है कि भूमंडलीय माध्यम ज्यादातर समय इस्लामिक समाज का विवेचन करते समय सिर्फ इस्लाम धर्म पर केन्द्रित कार्यक्रम ही पेश करते हैं।इनमें धर्म और संस्कृति का फ़र्क नजर नहीं आता। भूमंडलीय माध्यमों की प्रस्तुतियों से लगता है कि इस्लामिक समाज में संस्कृति का कहीं पर भी अस्तित्व ही नहीं है।इस्लाम बर्बर धर्म है।इस तरह का दृष्टिकोण पश्चिमी देशों के बारे में नहीं मिलेगा।ब्रिटेन और अमरीका के बारे में यह नहीं कहा जाता कि ये ईसाई देश हैं।इनके समाज को ईसाई समाज नहीं कहा जाता।जबकि इन दोनों देशों की अधिकांश जनता ईसाई मतानुयायी है।

भूमंडलीय माध्यम निरंतर यह प्रचार करते रहते हैं कि इस्लाम धर्म ,पश्चिम का विरोधी है।ईसाईयत का विरोधी है।अमरीका का विरोधी है।सभी मुसलमान पश्चिम के विचारों से घृणा करते हैं।सच्चाई इसके विपरीत है।मध्य-पूर्व के देशों का अमरीका विरोध बुनियादी तौर पर अमरीका-इजरायल की विस्तारवादी एवं आतंकवादी मध्य-पूर्व नीति के गर्भ से उपजा है।अमरीका के विरोध के राजनीतिक कारण हैं न कि धार्मिक कारण।

एडवर्ड सईद का मानना है कि 'इस्लामिक जगत' जैसी कोटि निर्मित नहीं की जा सकती।मध्य-पूर्व के देशों की सार्वभौम राष्ट्र के रुप में पहचान है।प्रत्येक राष्ट्र की समस्याएं और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।यहाँ तक कि जातीय ,सांस्कृतिक और भाषायी परंपराएं अलग-अलग हैं।अत: सिर्फ इस्लाम का मतानुयायी होने के कारण इन्हें 'इस्लामिक जगत' जैसी किसी कोटि में 'पश्चिमी जगत' की तर्ज पर वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण देखें तो पाएंगे कि भूमंडलीय माध्यमों का मध्य-पूर्व एवं मुस्लिम जगत की खबरों की ओर सन् 1960 के बाद ध्यान गया।इसी दौर में अरब-इजरायल संघर्ष शुरु हुआ।अमरीकी हितों को खतरा पैदा हुआ।तेल उत्पादक देशों के संगठन'ओपेक' ने कवश्व राजनीति में अपनी विशिष्ट पहचान बनानी शुरु की।तेल उत्पादक देश अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते थे वहीं पर दूसरी ओर विश्व स्तर पर तेल संकट पैदा हुआ।ऐसी स्थिति में अमरीका का मध्य-पूर्व में हस्तक्षेप शुरु हुआ।अमरीकी हस्तक्षेप की वैधता बनाए रखने और मध्य-पूर्व के संकट को 'सतत संकट' के रुप में यहीबनाए रखने के उद्देश्य से भूमंडलीय माध्यमों का इस्तेमाल किया गया।यही वह दौर है जब भूमंडलीय माध्यमों से इस्लाम धर्म और मुसलमानों के खिलाफ घृणा भरा प्रचार अभियान शुरु किया गया।माध्यमों से यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि मध्य-पूर्व के संकट के जनक मुसलमान हैं।जबकि सच्चाई यह है कि मध्य-पूर्व का संकट इजरायल की विस्तारवादी-आतंकवादी गतिविधियों एवं अमरीका की मध्य-पूर्व नीति का परिणाम है।इसे भूमंडलीय माध्यमों द्वारा इस्लाम एवं मुसलमान विरोधी प्रचार अभियान का प्रथम चरण कहा जा सकता है।इसी दौर में अमरीकी एवं इजरायली इस्लामवेत्ताओं के इस्लाम संबंधी दर्जनों महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुए।जिनमें इस्लाम एव मुसलमानों के बारे में बेसिर-पैर की बातें लिखी हैं। कालान्तर में ये ही पुस्तकें इस्लाम विरोधी प्रचार अभियान का हिस्सा बन गयी।इन पुस्तकों के अधिकांश लेखक अरबी भाषा नहीं जानते थे और न कभी अरब देशों को उन्हें करीब से जानने का मौका मिला।ऐसी तमाम पुस्तकों की एडवर्ड सईद ने अपनी पुस्तक में विस्तृत आलोचना की है।

भूमंडलीय माध्यमों के इस्लाम धर्म विरोधी अभियान का दूसरा चरण 1975से शुरु होता है। इस दौर में 'ईरान क्रांति' और अफगानिस्तान की घटनाओं ने इस मुहिम को और भी तेज कर दिया।सन् 1975 से भूमंडलीय माध्यमों के एजेण्डे पर ईरान आ गया। बाद में 1979 में अफगानिस्तान में कम्युनिस्टों के सत्तारुढ़ होने के बाद सोवियत सैन्य हस्तक्षेप हुआ और भूमंडलीय माध्यमों ने इस्लाम विरोधी मुहिम में एक नया तत्व जोड़ा वह था तत्ववाद और आतंकवाद।अब तेजी से विभिन्न किस्म के सोवियत विरोधी आतंकवादी एवं तत्ववादी गुटों को अमरीकी साम्राज्यवाद की तरफ से खुली आर्थिक,सामरिक,राजनीतिक एवं मीडिया मदद मुहैया करायी गयी।अमरीकी साम्राज्यवाद ने पाकिस्तान के साथ मिलकर मुजाहिदीन सेना का गठन किया। इसके लिए अमरीकी सीनेट ने तीन विलियन डॉलर की आर्थिक मदद भी की। ध्यान देने वाली बात यह है कि सन् 1970 के बाद से अनेक मुस्लिम बहुल देशों में संकट आए किन्तु किसी में भी भूमंडलीय माध्यमों ने रुचि नहीं ली। मसलन इसी दौर में इथोपिया और सोमालिया में गृहयुध्द चल रहा था।अल्जीरिया और मोरक्को में दक्षिणी सहारा को लेकर झगड़ा हो गया।पाकिस्तान में राष्ट्रपति को हटा दिया गया,मुकदमा चलाया गया,फौजी तानाशाही स्थापित हुई।ईरान-ईराक में युध्द छिड़ गया।हम्मास और हिजबुल्ला जैसे संगठनों का उदय हुआ।अल्जीरिया में इस्लामपंथियों एवं प्रतिष्ठाहीन सरकार के बीच गृहयुध्द शुरु हो गया। इन सब घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने और इनकी नियमित रिपोर्टिंग करने में भूमंडलीय माध्यम असमर्थ रहे।

एडवर्ड सईद ने लिखा कि इस दौर में पश्चिम के माध्यम ऐसी सामग्री परोस रहे थे जिसका संकटग्रस्त क्षेत्र की वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था।इसके विपरीत यह सामग्री ज्यादा से ज्यादा भ्रम की सृष्टि करती थी। असल में भूमंडलीय माध्यम 'क्लासिकल इस्लाम' की धारणाओं के आधार पर आधुनिकयुगीन घटनाओं और इस्लाम का विश्लेषण करते रहे हैं।इसका अर्थ यह भी है कि पश्चिमी विशेषज्ञों की नजर में इस्लामिक जगत में कोई बदलाव नहीं आया है।सईद ने लिखा कि पश्चिमी जगत की अज्ञानता का आदर्श नमूना था 'ईरान क्रांति' का पूर्वानुमान न कर पाना।

सईद ने लिखा कि पश्चिमी जगत में इस्लाम के बारे में सही ढ़ंग़ से बताने वाले नहीं मिलेंगे।अकादमिक एवं माध्यम जगत में इस्लामिक समाज के बारे में बताने वालों का अभाव है।यही वजह थी कि ईरानी समाज में हो रहे परिवर्तनों को पश्चिमी जगत सही ढ़ंग से देख नहीं पाया।ईरान देशों में ऐसी ताकतें भी हैं जो अमरीकीकरण या आधुनिकीकरण की विरोधी हैं।इनमें कई तरह के ग्रुप हैं।

सत्तर के दशक में ईरान में जो परिवर्तन हुए उससे आधुनिकीकरण की अमरीकी सैध्दान्तिकी धराशायी हो गयी।ईरान की क्रांति न तो कम्युनिस्ट समर्थक थी और न अमरीकी शैली के आधुनिकीकरण की समर्थक थी।ईरान की क्रांति से यह निष्कर्ष निकला कि अमरीकी तर्ज के आधुनिकीकरण से ईरान के शाह को कोई लाभ नहीं पहँचा।अमरीकी विशेषज्ञों की राय थी कि सैन्य-सुरक्षा के आधुनिक तंत्र के जरिए आधुनिक शासन व्यवस्था का निर्माण हो सकता है,इस धारणा का खंडन हुआ।इसके विपरीत हुआ यह कि ईरान क्रांति ने सभी किस्म के पश्चिमी विचारों के प्रति घृणा पैदा कर दी।यहाँ तक कि विवेकवाद को भी खोमैनी समर्थक स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।एडवर्ड सईद ने लिखा कि इस तरह की भावना सुचिंतित एवं सुनियोजित ढ़ंग से पैदा नहीं हुई अपितु स्वर्त:स्फूत्त ढ़ंग से पैदा हुई।इसका प्रधान कारण यह था कि ईरानी लोग इस्लाम से जुड़े थे और इस्लाम ईरान से जुड़ा था।इस संबंध को पागलपन और मूर्खता की हद तक निभाया गया।यह सत्ता का प्रतिगामी ताकतों के सामने आत्मसमर्पण था।किन्तु यह स्थिति सिर्फ ईरान की ही नहीं थी अपितु इजरायल की भी थी।वहाँ पर शासकों ने धार्मिक सत्ता के सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया।किन्तु इजरायल के घटनाक्रम को माध्यमों ने छिपा लिया और ईरान के खोमैनी समर्थकों पर हल्ला बोल दिया।

ईरान क्रांति के बाद भूमंडलीय माध्यमों ने इस्लामिक जगत की प्रत्येक घटना को इस्लाम से जोड़ा।यही वह संदर्भ है जब आतंकवाद और इस्लाम के अन्त:सम्बन्ध पर जोर दिया गया।इस संबंध के बड़े पैमाने पर स्टारियोटाइप विभिन्न माध्यमों के जरिए प्रचारित किए गए।इसके विपरीत पश्चिमी देशों में होने वाली घटनाओं को कभी भी ईसाइयत से नहीं जोड़ा गया और न 'पश्चिमी सभ्यता' या 'अमरीकी जीवन शैली' से जोड़ा गया।इसी तरह शीतयुध्दीय राजनीति से प्रेरित होकर इस्लाम और भ्रष्टाचार के अन्त:संबंध को खूब उछाला गया।

भूमंडलीय माध्यमों के इस्लाम विरोध की यह पराकाष्ठा है कि जो मुस्लिम राष्ट्र अमरीका समर्थक हैं उन्हें भी ये माध्यम पश्चिमी देशों की जमात में शामिल नहीं करते।यहाँ तक कि ईरान के शाह रजा पहलवी को जो घनघोर कम्युनिस्ट विरोधी था और अमरीकापरस्त था,बुर्जुआ संस्कार एवं जीवन शैली का प्रतीक था,उसे भी पश्चिम ने अपनी जमात में शामिल नहीं किया।इसके विपरीत अरब-इजरायल विवाद में इजरायल को हमेशा पश्चिमी जमात का अंग माना गया और अमरीकी दृष्टिकोण व्यक्त करने वाले राष्ट्र के रुप में प्रस्तुत किया गया।आमतौर पर इजरायल के धार्मिक चरित्र को छिपाया गया।जबकि इजरायल में धार्मिक तत्ववाद की जड़ें अरब देशों से ज्यादा गहरी हैं।इजरायल का धार्मिक तत्ववाद ज्यादा कट्टर और हिंसक है।आमतौर पर लोग यह भूल जाते हैं कि गाजापट्टी के कब्जा किए गए इलाकों में उन्हीं लोगों को बसाया गया जो धार्मिक तौर पर यहूदी कट्टरपंथी हैं।इन कट्टरपंथियों को अरबों की जमीन पर बसाने का काम इजरायल की लेबर सरकार ने किया, जिसका 'धर्मनिरपेक्ष' चरित्र था।इतने बड़े घटनाक्रम के बाद भी भूमंडलीय प्रेस यह प्रचार करता रहा कि मध्य-पूर्व में किसी भी देश में जनतंत्र कहीं है तो सिर्फ इजरायल में है।मध्य-पूर्व में पश्चिमी देश इजरायल की सुरक्षा को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं।अन्य किसी राष्ट्र की सुरक्षा को लेकर वे चिंतित नहीं हैं।अरब देशों की सुरक्षा या फिलिस्तीनियों की सुरक्षा को लेकर उनमें चिंता का अभाव है।इसके विपरीत फिलिस्तीनियों के लिए स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना के लिए संघर्षरत फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को अमरीका ने आतंकवादी घोषित किया हुआ है।

आज अमरीका ने अरब देशों और फिलिस्तीनियों की सुरक्षा की बजाय इजरायल की सुरक्षा के सवाल पर आम राय बना ली है।इस इलाके में अमरीका पश्चिम का वर्चस्व स्थापित करना चाहता है।वे यह भ्रम पैदा कर रहे हैं कि 'ओरिएण्ट' के ऊपर'पश्चिम' का राज चलेगा।दूसरा भ्रम यह फैला रहे हैं कि पश्चिम की स्व-निर्मित इमेज सर्वश्रेष्ठ है।तीसरा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि इजरायल पश्चिमी मूल्यों का प्रतीक है।एडवर्ड सईद ने लिखा कि इन तीन भ्रमों के तहत अमरीका का सारा प्रचारतंत्र काम कर रहा है।इन भ्रमों के इर्द-गिर्द राष्ट्रों को गोलबंद किया जा रहा है।

अमरीका में चारों ओर मीडिया ने इस्लाम की स्टीरियोटाईप इमेज पेश की है। इसके जरिए इस्लाम को बोगस,बदला लेने वाला,हिंसक,अविवेकी,तत्ववादी धर्म के रूप में प्रचारित किया गया। सईद ने लिखा कि मैं जिस विश्वविद्यालय में पढ़ाता हूँ वह बौध्दिक वैविध्य के लिए चर्चित जगह है। वहां पर भी कुरान को कोर्स में पढ़ाया नहीं जाता। मुसलमान और इस्लाम की चर्चा तब ही होती है जब कोई विवाद होता है। वे इस्लाम को सांस्कृतिक और धार्मिक विषय के रूप में कभी नहीं उठाते। फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों में हिंसक और खूनी अरब आतंकवादियों की अनाकर्षक छवियां छायी हुई हैं। इसके अलावा वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर विमान अपहरण करके हमला करने वालों को उपकरण की तरह इस्तेमाल किया गया और कहा गया कि वे जनसंहारक हैं। इनका आपराधिक इलाज किया जाना चाहिए और इस तरह इस्लाम पर हमला बोल दिया गया।

11 सितम्बर की घटना के बाद अमरीका में अरबों और मुसलमानों पर हमले बढ़े और उसके कारण हजारों निर्दोष लोगों को जेलों में डाल दिया गया, दुनियाभर में इस्लाम के प्रतीक के तौर पर विन लादेन को प्रचारित किया गया, अमरीकी जनता के सामने लादेन को इस्लाम का प्रतीक बनाया गया। इस क्रम में मीडिया का अंधाधुंध इस्तेमाल किया गया। सैंकडों निर्दोष लोगों पर मुकदमे ठोंक दिए गए। ऐसी परिस्थितियों में एडवर्ड सईद ने एक बड़ा महत्वपूर्ण लेख लिखा। सईद ने ''बेकक्लेस एंड बेकट्रेक'' ( मीडिया मॉनीटर नेटवर्क,28 सितम्बर2001) शीर्षक लेख में लिखा अमरीका में सात मिलियन अमेरिकन मुसलमान रहते हैं जिनमें दो मिलियन अरब हैं। ये लोग 11 सितम्बर की भयानक तबाही और जबावी हमलों के बीच जी रहे हैं। यह भयभीत करने वाला नाखुशगवार समय है। अनेकों निर्दोष अरब और मुसलमानों को क्षति और जुल्म का सामना करना पड़ा है। एक समूह के तौर पर उनके खिलाफ आंधी चल रही है। यह कई रूपों में व्यक्त हो रही है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. aaji amerika to galat bhumika ada kar raha hai,lekin aap kaun si sahi bhumika ada kar rahe ho.musalman jisake patra hain wo unhe mil raha hai

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  2. पता नही आपक सभी इस मुद्दे को, जाती से जोड़कर क्यों देख रहे है! मैं यहाँ रहती हूँ और जानती हूँ की अमेरिका मे किसी जाती विशेष के साथ ही ये नही होता है! यहाँ क़ानून सबसे उपर है! कोई बड़ा छोटा नही! ना ही कोई विशेष!
    अभी पिछले माह ही यहाँ एक बुक्कर प्राइज़ विजेता प्रोफ़ेसर को जैल जाना पड़ा, वो मुस्लिम नही था, बड़ा नामी आदमी था!

    मैं मिश्रा हूँ, आपको बटाऊ यहाँ मुझे भी काई बार अपना मंगलसूत्र और चूड़ीयां उतरनी पड़ती है, तब हम यह नही कहते की हिंदू के साथ ऐसा हो रहा है! मेरे सामने काई बार अँगरेज़ों को भी इसी तरह ही सुरक्षा जाँच से गुजरना पड़ता है!

    और मैं इस व्यवस्था के साथ हूँ! ये लोग अगर आपको ग़लत नही पाते तो, आपको सौ बार सॉरी बोलने है! ये सबके साथ हीऐसा करते है! बात ये है की वो एक उची हस्ती है, मुझे यह कहने मे भी संकोच नही मैं उसकी बहुत बड़ी फ़ैन भी हूँ,
    पर जो बात एक आम आदमी के लिए लागू होती आई वो सबके लिए! हमारा मीडिया और नेता इस तरह की बातों को अलग तरह से उछालतः है!

    but yes he will get hype for his new movie....

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  3. निधि मिश्रा की टिप्पणी गौर करने के लायक है.

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