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शनिवार, 19 अगस्त 2017

नायक के लिए तरसता समाज


   अजीब तर्क दिया जा रहा है वे कह रहे हैं विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं है, कोई ऐसा नेता नहीं है जो मोदीजी का विकल्प हो!यह असल में उनका तर्क है जो नायक के सहारे समाज की मुक्ति के दिवा-स्वप्न देखते हैं। नायक केन्द्रित मनोदशा हमारी राजनीति की रही है उसने नायक पूजा को सबसे बड़ा बनाया है। अभावों में जीने वाले लोग हमेशा नायक में मुक्ति की खोज करते  हैं, हमारे समाज की बुनावट भी कुछ ऐसी है कि हमें नायक के बिना नींद नहीं आती, बस नायक मिल जाए तो हम चैन की नींद सोएँ! 
      सवाल यह है नायक की तलाश करके हम जाना कहाँ चाहते हैं ? किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं ? नायक पूजा की संस्कृति निर्मित करके हमने देश को शक्तिशाली बनाया या खोखला ?क्या भारत को नायक चाहिए या विकल्प में कुछ और चाहिए ? आमतौर पर वैचारिक संकट के समय नायक की तलाश सबसे ज्यादा करते हैं, हम अच्छे विचार नहीं खोजते,अच्छे मूल्य नहीं खोजते ,अच्छी नीति नहीं खोजते,उलटे नायक खोजते हैं, चाहे नायक मूल्यहीन हो।
       नायक खोजने की आदत समाज में परजीविता की गहरी जड़ों को रेखांकित करती है।हमें जब राजनीति के नायक से बोरियत होने लगती है तो हम फ़िल्मी नायक से दिल बहलाने लगते हैं।नायक की आड़ में जीने और आनंद लेने की मानसिकता बुनियादी तौर पर वैचारिक और सांस्कृतिक दरिद्रता की प्रतीक है।हमें हर हालत में नायक पूजा से बचना चाहिए।नायक पूजा हमारे आलोचनात्मक विवेक को सबसे पहले अपहृत करती है।हम मूल्यों पर बहस नहीं कर रहे, नीतियों पर संवाद-विवाद नहीं कर रहे, बल्कि नायक पर विवाद कर रहे हैं। 
     भारत में नायक का विचार अजर,अमर है।दिलचस्प बात है एक नायक के जाते ही हठात् दूसरा नायक हमारी आँखों के सामने आ बैठता है।कल तक जो नायकपूजा के रुप में इंदिरा गांधी से  नफरत करते थे वे ही नायक के रुप में नरेन्द्र मोदी की अहर्निश पूजा कर रहे हैं।मोदी में उन्होंने तकरीबन वे सारे गुण खोज लिए हैं जिन गुणों के लिए वे इंदिरा गांधी की आलोचना कर रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि मोदी अनेक मामलों में   इंदिरा गांधी के अनुयायी नजर आते हैं।मसलन् इंदिरा गांधी ने नक्सलवाडी आंदोलन को कुचलने के नाम पर बंगाल के युवाओं की बडे पैमाने पर हत्याएँ कीं , ठीक यही हालात कश्मीर में मोदीजी ने किए हैं,निर्दोष कश्मीरी आए दिन में मारे जा रहे हैं, १९७२-७७ केबंगाल के अर्द्ध फासी आतंक को लेकर सारे देश में बेगानापन था यहां तक कि बाबू जयप्रकाश नारायण से ज्योति बसु ने कहा कि हमारे बंगाल में जुल्म हो रहा है विधानसभा चुनावों में व्यापक धाँधली हुई है तो  बाबू जयप्रकाश नारायण को विश्वास नहीं हुआ,सन् १९७२ में बंगाल में विधानसभा चुनाव में भयानक धाँधली हुई और सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री बने, बंगाल में नक्सलवाडी आंदोलन से लेकर १९७७तक कई हजार वाम युवा पुलिस की गोलियों के शिकार हुए।ठीक वही पैटर्न कश्मीर और बस्तर में चल रहा है।
       मूल मुद्दा यह है कि भारत को नायक खोजने की बीमारी से कैसे छुट्टी दिलाई जाए।हम सबको नायक केन्द्रित राजनीति की बजाय जनराजनीति पर जोर देना चाहिए। जनता को शिक्षित करना चाहिए , जनता की समस्याओं को प्रमुखता से केन्द्र में रखना चाहिए। 
       हमारी राजनीति में जनता की समस्याएँ केन्द्र में नहीं रहतीं नायक केन्द्र में रहता है।नायक के केन्द्र में रहने का अर्थ है जनता की समस्याओं का चेतन जगत में अंत, हम समस्याओं पर सोचना बंद कर देते हैं, नायक के भाषण, कपड़े, मीडिया जलवे, शोहरत के झूठे क़िस्सों में समय व्यतीत करने लगते हैं। 
      मोदी के प्रचार की सबसे बडी विशेषता है कि उसने सार्वजनिक जीवन से बुनियादी समस्याओं पर बहस को गायब कर दिया है और हम सब मोदी के जश्न और शोहरत के क़िस्सों में व्यस्त हो गए हैं। नायक के रुप में मोदी के भाषण,जश्न,जलसों और शोहरत से आम जनता के जीवन में ख़ुशहाली आने वाली नहीं है, ये सारी चीजें तो मोदी मोह में बाँधे रखने की कला के नुस्ख़े हैं।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

कैंसर है मोदीमोह !




अब बेचारे बेरोज़गार गाली खाएँ।मोदीजी को बेकारी नजर नहीं आ रही , बेकारी का हल्ला करने वालों को वे बेकारों का दलाल कह रहे हैं।वे रोजगार देने वाली कोई नई स्कीम लागू नहीं कर पाए उलटे जितनी स्कीम उन्होंने लागू की हैं , नए कानून बनाए हैं ,उनसे बेकारी बढी है।इसी को कहते हैं चौपट राशि प्रधानमंत्री!
        मसलन् , पीएम ने हाल ही में एनपीए यानी बैंकों का बडी कंपनियों से क़र्ज़ा वसूल करने के लिए कानून लागू किया जिसके तहत क़र्ज़ा भुगतान न करने वाली कंपनियों से वसूली होनी थी लेकिन इस कानून के लागू होते ही इंफ़्रास्ट्रक्चर की कंपनियां आवेदन लेकर चली आईं कि वे बैंकों का क़र्ज़ा चुकाने की स्थिति में नहीं हैं।परिणाम सामने हैं आम्रपाली और जेपी इंफ़्रास्ट्रक्चर को पैसा दे चुके हजारों लोगों का अपना घर बनाने का सपना चूर चूर हो गया वे करोडों के बैंक कर्ज में डूब गए,वे कह रहे हैं हम बैंकों की किश्त देने की स्थिति में नहीं हैं।इससे बैंकों का एनपीए कम होने की बजाय और बढ़ेगा ।वहीं दूसरी ओर कंपनियों का क़र्ज़ा ठिकाने लगा दिया जाएगा उनको दिवालिया घोषित कर दिया जाएगा दूसरी ओर मध्यवर्ग को न तो घर मिलेगा और न बैंकों से राहत मिलेगी । एक अन्य परिणाम यह भी निकलेगा कि भवन निर्माण में सन्नाटा गहराता चला जाएगा।हम अपील करेंगे कि मोदीमोह से निकलो यह कैंसर की तरह है।
   मोदीमोह में जो वर्ग फँसा वह मौत के मुँह में गया ।मोदी मोह में व्यापारी और दुकानदार सबसे पहले फँसे वे आज सबके सब मोदीमोह की पीडा से करो रहे हैं, इनमें सबसे पहले सोने के व्यापारी मोदी कैंसर के शिकार हुए , बाद में नोटबंदी और जीएसटी ने समूचे व्यापार को मोदी कैंसर की चपेट में ले लिया, दूसरे चरण में मोदी कैंसर ने जिओ कनेक्शन के जरिए समूचे दूरसंचार उद्योग को तबाही के कगार पर पहुँचा दिया है,पतंजलि के बहाने समूचे घरेलू वस्तु बाजार कंपनियों को मोदी कैंसर के हवाले कर दिया है। पतंजलि खुलेआम मिलावटी सामान बेच रहा है ।
     युवाओं में मोदीमोह ने अविवेक और असभ्यता को वैध बनाया है।घरेलू महिलाओं में राष्ट्रवादी हिंसा और घृणा के प्रति प्रेम पैदा किया है।राष्ट्रीय फिनोमिना के रुप में मोदीमोह ने छद्म यथार्थ में जीने के संस्कार पैदा किए हैं।वहीं दूसरी ओर जनता की सुनने और समझने की क्षमता का  अपहरण कर लिया है।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

फासिज्म का नया मुहावरा



मोदी ने फासिज्म को नया रुप दिया है उसने हिंदुत्व को सर्वोपरि स्थान दिया है देश -विदेश सब जगह हिंदुत्व के फ्रेमवर्क में चीजों को पेश किया है। हिंदू मिथकों और मिथकीय पात्रों को सामान्य अभिव्यक्ति का औज़ार बनाया है। हिंदू नैतिकता को महान नैतिकता बनाया है और उसके कारण  देश में हिंदुत्व का माहौल सघन हुआ है।दूसरा बडा परिवर्तन यह कि किया है उसने "सर्जिकल स्ट्राइक " या "युद्ध "इन दो पदबंधों को हिंदुत्व की नैतिकता बना दिया है।अब हर चीज के खिलाफ मोदीजी "सर्जिकल स्ट्राइक "कर रहे हैं या "युद्ध "कर रहे हैं।मसलन् , कालेधन के खिलाफ सर्जीकल स्ट्राइक, गंदगी के खिलाफ युद्ध , गरीबी के खिलाफ युद्ध आदि पदबंध  आए दिन सत्तातंत्र के प्रचार के रुप में कारपोरेट मीडिया हमारे ज़ेहन में उतार रहा है। वे "सर्जीकल स्ट्राइक'' या "युद्ध" के नाम पर सभी किस्म के वैचारिक मतभेदों को अस्वीकार कर रहे हैं।वे मांग कर रहे हैं कि वैचारिक मतभेद बीच में न लाएँ ।वे यह भी कह रहे हैं यह बहस का समय नहीं है ,काम करने का समय है बहस मत करो, सवाल मत करो, सिर्फ सत्ता का अनुकरण करो।
   एक जमाना था आम आदमी साम्प्रदायिक विचारों से नफरत करता था अपने को उनसे दूर रखता था लेकिन आज स्थिति गुणात्मक तौर पर बदल गयी है, आज साम्प्रदायिक विचारों से आम आदमी नफरत नहीं करता बल्कि उससे जुड़ना अपना सौभाग्य समझता है।कल तक धार्मिक पहचान मुख्य नहीं थी लेकिन आज दैनन्दिन जीवन में वह प्रमुख होउठी है, पहले जाति पूछने में संकोच करते थे आज खुलकर जाति पूछते हैं।
       आज फासिज्म वह है जो आपको पसंद नहीं है।आज आप पुरानी फासिज्म की अवधारणाओं के आधार पर उसे समझा नहीं सकते।मसलन् मोदीभक्तों और मोदी सरकार को जो पसंद नहीं है उसे वे  मानने को तैयार नहीं हैं। वे सिर्फ इच्छित बात ही सुनना चाहते हैं। अनिच्छित को इन लोगों ने फासिज्म बना दिया है।यह ओरवेलियन परिभाषा है कि जो बताती है अनिच्छित है वह फासिज्म है।

नए किस्म का फासिज्म



फासिज्म के मायने क्या हैं इस पर भारत में बहुत बहस है और इस बहस में बड़े बड़े दिग्गज उलझे हुए हैं लेकिन आजतक उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा तय नहीं कर पाए हैं। फासिज्म वह भी है जो हिटलरऔर मुसोलिनी ने किया , फासिज्म वह भी जो आपातकाल में श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया,फासिज्म का एक रुप वह भी है जो पीएम नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं। मोदी के फासिज्म की लाक्षणिक विशेषताएँ भिन्न हैं। मोदीजी का फासिज्म विकास और गरीब के कंधों पर सवार है लेकिन इसके प्रशासन के संचालक  कारपोरेट घराने हैं।इसकी धुरी है मीडिया प्रबंधन और राज्य के संसाधनों की खुली लूट ।यह अपने विरोधी को राष्ट्रद्रोही , राष्ट्र विरोधी कह कहकर कलंकित करता है,इसके पास मीडिया और साइबर मीडिया की बेशुमार ताकत है।यह ऐसी सत्ता है जो किसी की आवाज नहीं सुनती बल्कि सच यह है यदि जीना चाहते हैं तो सिर्फ उसकी आवाज़ें सुनो।मोदी के शासन में आने के बाद से अहर्निश मोदी की सुनो,मोदी के भक्तों की सुनो।दिलचस्प पहलू यह है कि इस समय मोदी और भक्तों के अलावा कोई नहीं बोल रहा ।सब लोग इनकी ही सुन रहे हैं । जनता बोल नहीं रही। वो सिर्फ सुन रही है और आज्ञा पालन कर रही है।हमारे जैसे लोग जो कुछ कह रहे हैं उसे न तो जनता सुन रही है और  न सत्ता सुन रही है सिर्फ हम ही अपनी आवाज सुन रहे हैं।हम तो सहमत को सुना रहे हैं । अपने ही हाथ से अपनी पीठ ठोक रहे हैं। जब जनता न सुने , सरकार न सुने, संवादहीनता हो तो समझो फासिज्म के माहौल में जी रहे हैं।इस माहौल को पैदा करने के लिए प्रत्यक्षत: हक छीनने , या संविधान को स्थगित करने या बर्बर हमले करने की जरूरत नहीं है।

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

उठो और जागोःसंवैधानिक मान्यताएं खतरे में हैं

         बिहार के घटनाक्रम को मात्र भ्रष्टाचार का मामला न समझें।नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार कई स्तरों पर संवैधानिक मान्यताओं और परंपराओं को नष्ट करने का काम कर रही है।अफसोस की बात है आम लोगों को यह नजर ही नहीं आ रहा।हो सकता है लालू यादव के परिवार ने भ्रष्टाचार किया हो लेकिन उससे लड़ने और निबटने के लिए महागठबन्धन को तोड़ना तो गले नहीं उतरता।

महागठन्धन जब बना था तब भी बिहार और लालू के परिवार में भ्रष्टाचार था,लेकिन एक अंतर था,महागठबंधन का निर्माण साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए किया गया था।उसके उद्देश्यों में कहीं पर भ्रष्टाचार का जिक्र नहीं है।लेकिन बिहार में चीजें जिस तरह संचालित की गयी हैं, न्यायपालिका की देश में जिस तरह खुली अवहेलना हो रही है, संसदीय मर्यादाओं को ताक पर रखकर जिस तरह हंगामे किए जा रहे हैं,मीडिया को सत्य और विवेक की हत्या के लिए जिस तरह नग्नतम रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है वह अपने आपमें विरल घटना है।

बिहार में जदयू का महागठबंधन से निकलकर भाजपा के साथ सरकार बनाना ,कोई साधारण घटना नहीं है।यह घटना संकेत है कि संसदीय लोकतंत्र और जनादेश की हमारे नेताओं में कोई इज्जत नहीं है। उल्लेखनीय है इस तरह की घटनाएं पहले भी हुई हैं लेकिन बिहार हर मामले में अजूबा है,इसबार समूचे जनादेश को ही पलट दिया गया । बिना दल-बदल के समूचे जदयू का स्वैच्छिक भाव से राजनीतिक मन परिवर्तन करके रख दिया गया है। मात्र कुछ एफआईआर के बहाने, कुछ छापों के बहाने यह सब हुआ है।इसका अर्थ यह भी है कि मोदी से लेकर नीतीश कुमार तक किसी के मन में जनादेश को लेकर कोई वचनवद्धता नहीं है।

असल में मोदीजी ने समूची राजनीति में पैसे और सत्ता की भूमिका को महानतम बना दिया है।इस भूमिका को आमलोगों के जेहन में उतारने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है। मोदी फिनोमिना की सबसे बड़ी विशेषता है कि अब भाजपा कहीं पर आंदोलन नहीं करती, सिर्फ मीडिया हमले करवाती है, संगठित प्रचार अभियान चलाती है और उसके बाद लक्ष्य को निशाना बनाकर गिरा देती है।भाजपा की समूची रणनीति यह है कि हर हालत में भाजपा और मोदी का वैचारिक-प्रशासनिक वर्चस्व मानो।इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद और मीडिया के हठकंड़ों का खुलकर प्रयोग हो रहा है।

भाजपा-मोदी का वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक बात आम लोगों के जेहन में उतारी जा रही है कि ´मोदी सही और बाकी गलत´,मोदी की मानो,चैन से रहो।मोदी की मनवाने के लिए पहले प्यार से घूस देकर फुसलाया जाता है, बाद में मीडिया के कोड़े लगवाए जाते हैं,अंत में प्रशासनिक हमले होते हैं।मसलन्,यदि आप विपक्ष में हैं तो पहले भाजपा कोशिश करती है कि आप उसके साथ चले जाएं,यदि साथ नहीं जाते तो दल-बदल कराया जाता है, दल-बदल से भी मामला न संभले तो मीडिया हमले कराकर बदनाम किया जाता है, तब भी न संभले तो सीबीआई-आईडी आदि के छापे और मीडिया से अहर्निश बदनामी करके हर एक्शन को देशहित, ईमानदारी की रक्षा में,जनता की सेवा में समर्पित कर दिया जाता है।इस समूची प्रक्रिया में सत्य क्या यह महत्वपूर्ण नहीं रह जाता ,सिर्फ मीडिया में जो बताया गया है वह महत्वपूर्ण रह जाता है।मीडिया के जरिए दिमागों की इस तरह की नाकेबंदी ने हमारे सोचने-समझने और स्वतंत्र रुप से फैसले लेने की क्षमता पूरी तरह खत्म कर दी है।अब हम मीडिया में जो कहा जा रहा है उसे सत्य, न्याय, जनहित आदि के पैमानों पर नहीं परखते अपितु हमारी आदत हो गयी है कि मीडिया में जो कहा जा रहा उसे आँखें बंद करके मानने लगे हैं।

मोदी की मीडिया रणनीति की धुरी है ´घृणा´,कल तक हम मुसलमानों से नफरत कर रहे थे, विभिन्न किस्म के प्रचार अभियानों के जरिए इसे जेहन में उतारा गया,बाद में लवजेहाद के जरिए,कांग्रेस हटाओ-देश बचाओ,घृणा के तत्व के आधार पर कांग्रेस विरोधी प्रचार संगठित किया गया, घृणा के आधार पर पाकविरोधी, आतंकविरोधी प्रचार चलाया गया और अब घृणा के आधार पर ही तेजस्वी यादव और उनके परिवारीजनों के खिलाफ प्रचार अभियान चलाया गया। घृणा के आधार पर मोदी विरोधियों पर हमले किए जा रहे हैं।´घृणा´के आवरण के रूप में भ्रष्टाचार विरोध का इस्तेमाल किया गया, लेकिन मूल चीज है ´घृणा´।कहने का आशय यह कि ´घृणा´के बिना मोदी से प्यार पैदा नहीं होता। मोदी के गुण क्या हैं, मोदी ने कौन सा अच्छा काम किया है, ये चीजें मोदी प्रेम का आधार नहीं हैं बल्कि ´घृणा´ही मोदी प्रेम का आधार है। इस ´घृणा´को हम हर मसले पर मीडिया प्रस्तुतियों में सक्रिय भूमिका अदा करते सहज ही देख सकते हैं। मसलन् , मीडिया वाले गऊ गुंडई से लेकर तेजस्वी प्रकरण तक इसे साफतौर पर देख सकते हैं।यानी ´घृणा´का इतने व्यापक मॉडल के रूप में भारत में प्रयोग विगत ढाई हजार सालों में कभी नहीं देखा गया।हमारे यहां ´घृणा´थी लेकिन नैतिक रूप में। एक वैचारिक अस्त्र के रूप में मोदी ने इसका आविष्कार करके देश को गहरे संकट में डाल दिया है।अब हम गलत में मजा लेने लगे हैं,गलत हमें अच्छा लगने लगा है।यह ´घृणा´के मॉडल की सबसे बड़ी उपलब्धि है।´घृणा´के मॉडल की विशेषता है सभी किस्म के तर्क और विवेक का अंत। मोदी के व्यक्तित्व के सामने आज हम इस कदर अभिभूत हैं कि किसी भी चीज को वास्तव रूप में देखना ही नहीं चाहते।वास्तव से नफरत करने लगे हैं।





शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

व्यापारीवर्ग बनाम नरेन्द्र मोदी के पंगे

नरेन्द्र मोदी को सत्ता पर बिठाने में देश के व्यापारियों और कारपोरेट घरानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।यह वर्ग विगत तीन सालों में मोदी सरकार की नीतियों के कारण किसी न किसी रुप में परेशान है,असंतुष्ट है और धीरे धीरे विभिन्न समूहों के तौर पर सड़कों पर प्रतिवाद के लिए निकल रहा है।मसलन्, विगत बजट के समय स्वर्ण व्यापारियों ने दो महिने तक आंदोलन किया, इधर विभिन्न स्तरों पर मांस के व्यापारी विरोध करते रहे हैं,नोटबंदी के कारण छोटे उद्योगों के मालिकों में गहरा असंतोष पैदा हुआ है।सबसे दिलचस्प है जीएसटी के विरोध में व्यापारियों का एक दिन का राष्ट्रीय बंद और उसके बाद कपड़ा व्यापारियों का सघन होता आंदोलन।ये सारी चीजें इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि मोदीजी को जो वर्ग सत्ता में लेकर आया उसी वर्ग के साथ अंतर्विरोध खुलकर सामने आ गए हैं।

दिलचस्प बात यह है व्यापारियों के जन- आंदोलन हो रहे हैं, विशाल रैलियां हो रही हैं,इस तरह की रैलियां हाल-फिलहाल के वर्षों में नजर नहीं आईं। मसलन् सूरत इन दिनों अशांत है।सूरत की अशांति को सामान्य रुटिन अशांति के रूप में न देखें। बल्कि उसे व्यापक फलक पर रखकर देखें कि किस तरह व्यापारियों के विभिन्न समूहों में मोदी सरकार के खिलाफ प्रतिवाद जन्म ले रहा है।वहीं दूसरी ओर मजदूरों-किसानों के आंदोलन भी हो रहे हैं। इन सबके कारण एक नए किस्म का प्रतिवादी राजनीतिक माहौल जन्म ले रहा है।



अनेक राजनीतिक विशेषज्ञ हैं जो यह मानकर चल रहे हैं कि मोदीजी 2019 में लौटकर फिर से सत्ता में आ रहे हैं। ये विशेषज्ञ भूल रहे हैं कि 2014 में मोदी के खिलाफ कोई असंतोष नहीं था बल्कि आशाएं जुड़ी हुई थीं।लेकिन 2019 तक मोदी के खिलाफ समाज के हर स्तर पर व्यापक असंतोष पैदा होगा,यह अनिवार्य है।कम से कम व्यापारियों के विभिन्न रूपों में हो रहे प्रतिवादों को गंभीरता से लेने की जरूरत है।व्यापारी समुदाय यदि बार बार प्रतिवाद कर रहा है तो यह तय है समाज में अशांति बहुत गहरे जा घुसी है,इस अशांति को मीडिया प्रबंधन के जरिए संभालना संभव नहीं है।इंतजार करें जमीन पक रही है।

बुधवार, 28 जून 2017

जुनैद नहीं भारत की हत्या के प्रतिवाद में

         छह दिन हो गए हैं लेकिन अभी तक एक गिरफ्तारी हुई है।जबकि वे बीस से अधिक थे और उन सबके हाथों में चाकू थे,वे चाकू लिए ही ट्रेन में दाखिल हुए थे,संयोग की बात थी कि जुनैद अपने भाईयों के साथ उस ट्रेन में था।कोई तर्क जुनैद की हत्या को वैध नहीं बना सकता,लेकिन मजाल है कि भाजपा के लोगों के मुँह पर शिकन पड़ी हो,वे गम में हों !

प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक सबको मालूम है लेकिन कोई जुनैद के घर नहीं गया। हरियाणा के मुख्यमंत्री भी जुनैद के घर नहीं गए।कम से कम मानवता और संवेदनशीलता के नाते जुनैद के घर शोक व्यक्त करने जा सकते थे,ट्विटर पर एक-दो पोस्ट लिख सकते थे।लेकिन पीएम,सीएम,मुख्यमंत्री किसी के पास जुनैद की मौत पर शोक व्यक्त करने का समय नहीं है।

बेशर्मी की हद देखो कि टीवी चैनलों में जुनैद की हत्या को वर्गीकृत कर रहे हैं और बता रहे हैं यह तो यात्रियों के बीच में सीट पर बैठने का झगड़ा था।सत्ता में बैठे लोग यह देखने को तैयार नहीं है कि देश में चारों ओर घृणा की विचारधारा की जहरीली हवा चल रही है और उस हवा को चलाने में आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों की केन्द्रीय भूमिका है। हम सब जानते हैं साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद के नाम पर जब भी जहां पर भी प्रचार आरंभ होता है ,जब आम जनता उसमें भाग लेने लगती तो सबसे पहले राजसत्ता और उसके तंत्र ठंड़े पड़ जाते हैं,पुलिस-सेना के हाथ-पैर फूल जाते हैं,दिमाग सुन्न हो जाता है,अनेक मामलों में तो सत्ता के तंत्र स्वयं भी उस जहरीले प्रचार का अंग बन जाते हैं और आम जनता पर साम्प्रदायिक-पृथकतावादी ताकतों के साथ मिलकर हमला करने लगते हैं।आज ठीक देश की यही अवस्था है।सारा देश मुसलिम विरोधी प्रचार में डूबा हुआ है। मुसलिम विरोध को स्वाभाविक बनाकर हम सबके मन में उतार दिया गया है।

आज वास्तविकता यह है कि मोदीसरकार रहे या जाए मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार समाज से सहज ही जाने वाला नहीं है।इसका प्रधान कारण है साम्प्रदायिकता के खिलाफ केन्द्र और राज्य सरकारों का खुला समर्पण।देश के विभिन्न इलाको में इस समर्पण को साफ तौर पर देखा जा सकता है।मुसलिम विरोधी साम्प्रदायिक जहर महज सामान्य प्रचार या राजनैतिक कार्यक्रम नहीं है,बल्कि यह असामान्य राजनैतिक कार्यक्रम है। इसका लक्ष्य है समाज को,लोगों के दिलो-दिमाग को साम्प्रदायिक आधारों पर विभाजित करना,साम्प्रदायिक तर्कों को सहज,बोधगम्य बनाना और आम लोगों के दिलो-दिमाग में उतारना।इस काम में आरएसएस पूरी तरह सफल हो चुका है। आज उसकी साम्प्रदायिक विचारधारा की पकड़ में सारा देश है।हर आदमी है।चाहे वह किसी भी दल का हो।

जो लोग सोचते हैं साम्प्रदायिक विचार मुझे नहीं उसे प्रभावित कर सकते हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। साम्प्रदायिक विचार सबको प्रभावित कर सकते हैं,वे जिस गति ,आक्रामकता और स्वाभाविक रूप में आ रहे हैं उससे हर कोई प्रभावित होगा,वे भी प्रभावित हो सकते हैं जो उसके शत्रु दिख रहे हैं।

साम्प्रदायिकता का मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार तमाम किस्म के कॉमनसेंस विश्वासों,कपोल-कल्पित कहानियों और धारणाओं के जरिए फैलाया जा रहा है। जुनैद की हत्या सतह पर उन 20गुंडों ने की है जिनके पास चाकू थे,लेकिन असल में उन चाकुओं में धार और उनको चलाने का बहशियाना भावबोध तो मुसलिम विरोधी प्रचार ने निर्मित किया था।जुनैद के कातिल पकड़े जाएं यह जरूरी है। लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है कि मुसलिम विरोधी जहरीले प्रचार अभियान के खिलाफ बिना किसी किन्तु-परन्तु और बहानेबाजी के हम सब एकजुट हों,उसके खिलाफ जमकर लिखें,बोलें,आंदोलन करें।असल में जुनैद के हत्यारे हमारे अंदर प्रवेश कर चुके हैं। वे जुनैद को नहीं हम सबको रोज चाकुओं से मार रहे हैं,हमें साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करने से रोक रहे हैं।



जुनैद मुसलमान नहीं था।वह भारतीय नागरिक था।साम्प्रदायिक ताकतें सतह पर मुसलमान को मारती दिखती हैं लेकिन वे असल में नागरिक को मार रही होती हैं,नागरिक हकों पर हमले कर रही होती हैं,संविधान के परखच्चे उडा रही होती हैं।उनके सामने पीएम,सीएम,न्यायपालिका बौने हैं।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

बंदूक सबके पास है-

               राज्य और केन्द्र में सत्ता भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है।छत्तीसगढ़ में सालों से पुलिस कार्रवाई हो रही है।नोट स्ट्राइक से सर्जीकल स्ट्राइक तक सब कुछ कर चुके हो,यह भी कह चुके हो,छत्तीसगढ़ और दूसरे इलाकों में नक्सलवाद की कमर तोड़ दी,नक्सल बर्बाद कर दिए,फिर यह अचानक 300 नक्सलों ने सीआरपीएफ पर हमला कैसे कर दिया मोदीजी ?
सीआरपीएफ के अनेक जवान नक्सली हमले में मारे गए हैं,हम सब दुखी हैं ,इस हमले की निंदा करते हैं,लेकिन जब सीआरपीएफ के हमले से नक्सली मारे जाते हैं या फिर उन पर बेइंतिहा पुलिस जुल्म होते हैं,झूठे केस लगाकर उनको फंसाया जाता है तब भी हमें तकलीफ होती है।
देश के लिए पुलिस-सेना के जवान जितने महत्वपूर्ण हैं आदिवासी नक्सली भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं,आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन बंदूक की नोंक पर छीनी जाएगी तो वे बंदूक का जवाब फूलों की माला पहनाकर नहीं देंगे।बंदूकें सबके पास हैं।
आदिवासियों की बंदूक की नोक पर बेदखली बंद करो,आदिवासियों को न्याय और सुरक्षा दो,हम भी देखते हैं नक्सल कैसे हमले करते हैं !
नक्सलों को आदिवासियों में हीरो तो भाजपा की गलत नीतियों ने बनाया है,पहले यही काम कांग्रेस कर रही थी।
आदिवासी हों या नक्सल हों या माओवादी हों ,वे सब वैसे ही भारत के नागरिक हैं जैसे सेना-सीआरपीएफ -कारपोरेट घराने आदि।लेकिन भाजपा सरकार के नजरिए में सेना-कारपोरेट घराने-सीआरपीएफ आदि तो प्रिय हैं लेकिन अन्य अप्रिय हैं,शत्रु हैं,उनको न्याय पाने का हक नहीं है।इस तरह एक आंख से यदि सरकार देखेगी और अन्याय करेगी तो आदिवासियों और नक्सलों का प्रतिवाद थमने वाला नहीं है।
नक्सली प्रतिवाद को टीवी पर विजय का डंका बजाकर,फेसबुक पर बटुकसंघ के साइबरसैनिकों से हमला कराके परास्त नहीं किया जा सकता।कम से कम मोदीजी इतना तो जान लो आपसे या रमनजी की सरकार से छत्तीसगढ़ के आदिवासी खुश नहीं हैं,आदिवासियों की संकट की घड़ी में राज्य सरकार को मदद करनी चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है,फलतःआदिवासियों की मदद करने का नक्सलों को मौका मिला है।आदिवासियों में नक्सलों का सांगठनिक विस्तार हुआ है,मोदीजी आपकी और रमन सरकार की नक्सलवादियों के बारे में की गयी सभी घोषणाएं झूठी साबित हुई हैं।आपके और रमन सरकार का आदिवासियों पर कोई असर नहीं है,कोई आदिवासी आप पर विश्वास नहीं करता।आदिवासियों का घर उजाड़कर भाजपा-आरएसएस-कारपोर्ट घरानों का घर बसाया नहीं जा सकता।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

कश्मीर पर नल्लागिरी कर रही है मोदी सरकार

        ´भाबी जी घर पर हैं ´सीरियल में एक पात्र है विभूतिनारायण मिश्रा, उनकी खूबी है वे नल्ले हैं ,यानी बेरोजगार हैं।इसी तरह कश्मीर मामले पर हमारे पीएम नल्ले हैं,बेरोजगार हैं, उनके पास कश्मीर को लेकर कोई काम नहीं है।उनका समूचा मंत्रीमंडल नल्लागिरी का शिकार है,इसके कारण कश्मीर के संदर्भ में नीतिहीनता-दिशाहीनता की स्थिति पैदा हो गयी है।
मोदी की कार्यशैली में अक्लमंदों-नीतिविशारदों की न्यूनतम भूमिका है,वे हर काम कॉमनसेंस और नौकरशाही के बल पर करने के अभ्यस्त हैं,वे भूल गए हैं कि वे अब गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं भारत के पीएम हैं।उनको अनेक ऐसे क्षेत्र देखने होते हैं जहां नीति,दूरदृष्टि और विश्वदृष्टि की जरूरत होती है।हर चीज नौकरशाही-कॉमनसेंस और गुजरातदृष्टि या एप बनाने से हल नहीं होती। मोदी का एप बनाने पर जोर मूलतः उनके तकनीकी कॉमनसेंस की देन है इसका किसी नीतिगत विवेकवाद से कोई संबंध नहीं है।
मोदी के सामने मुश्किलें तब आती हैं जब कोई जटिल नीतिगत मसला आकर फंस जाता है और यहीं पर मोदी का व्यक्तित्व एकदम बौना हो जाता है। कल वे जब मंत्रीमंडल के कुछ सहयोगियों,ढोभाल,थल सेनाध्यक्ष आदि को लेकर कश्मीर की स्थिति पर बातें कर रहे थे तो लोग इंतजार में थे कि कोई बड़ा नीतिगत बयान आ सकता है लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोई नीतिगत बयान नहीं दिया बल्कि जो बयान दिया वह पीएम और उनकी सरकार की कश्मीर पर नल्लागिरी को सामने लाता है।
पीएम यह मानकर चल रहे हैं कश्मीर में स्थिति अपने आप जब सामान्य होगी तब वे कोई कदम उठाएंगे,अब पीएम को कौन समझाए कि कश्मीर में सामान्य हालात तब बनेंगे जब मोदी सरकार झुकेगी,सेना के हस्तक्षेप को रोकेगी,पीडीपी-भाजपा चुनाव घोषणापत्र में जो वायदे किए गए थे उनको पूरा करने के लिए पहल करेगी,कश्मीर पर सभी संबंधित पक्षों को बुलाकर बातचीत करेगी।आश्चर्य की बात है कश्मीर पर सभी से बातचीत करने का चुनावी वायदा करके,हुर्रियत के वोट पाकर भाजपा नेता अब हुर्रियत से बातचीत करने को तैयार नहीं हैं।हुर्रियत से जब बात नहीं करनी थी तो संयुक्त चुनाव घोषणापत्र में हुर्रियत सहित सभी पक्षों से बातचीत आरंभ करने का वायदा क्यों किया था ॽ विधानसभा चुनाव पहले श्रीनगर बाढ़ में डूब गया था उस समय मोदी ने पीड़ितों को आर्थिक मदद देने का वायदा किया था,पैकेज घोषित किया था लेकिन आज तक मदद आम लोगों तक नहीं पहुँची।अभी भी समय है कश्मीर मसले पर निकम्मेपन को त्यागकर मोदीजी स्वयं पहल करके सभी विवाद में शामिल पक्षों को दिल्ली प्रधानमंत्री कार्यालय बुलाएं और कश्मीर में सामान्य हालात बनाने के उपायों पर खुलेमन से चर्चा करें और लोगों के देशसम्मत सुझावों को ईमानदारी से लागू करें।ध्यान रहे कश्मीर में अब छात्र मैदान में निकल पड़े हैं,इस समय हर जिले में आतंकवादी नहीं ,छात्र-युवा निकल पड़े हैं सड़कों पर,वे हर स्तर पर प्रतिवाद कर रहे हैं।

कश्मीर से आई आवाज छात्र एकता जिंदाबाद

इस साल का नारा होगा-गर्व से कहो हम छात्र हैं ।छात्रों के हकों पर जिस तरह हमले बढ़ रहे हैं,छात्र राजनीति के ऊपर अंकुश लगाने की साजिशें चल रही हैं उनसे छात्र अपने को अपमानित महसूस कर रहे हैं।यूजीसी से लेकर केन्द्र का मानव संसाधन मंत्रालय,राज्य सरकारों से लेकर शिक्षा माफिया तक सब ओर से छात्रों के हकों पर हमले हो रहे हैं।छात्रों के अपने हक हैं जिनकी लंबे समय से अनदेखी होती रही है।कश्मीर में आतंकी समस्या को हल करने में केन्द्र सरकार नाकाम रही है और उसके प्रतिवाद में विगत पांच दिनों से कश्मीर के छात्र हड़ताल पर हैं।कश्मीर में छात्रों का समूचा कैरियर और शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ठप्प पड़ी है।दुख की बात यह है कश्मीरी छात्रों का भविष्य किसी को नजर नहीं आ रहा,उनकी समस्याएं किसी को दिखाई नहीं दे रहीं।
यही स्थिति जेएनयू की है ,जिन छात्रों ने जेएनयू से एमए किया और आगे एमफिल-पीएचडी करना चाहते थे, उनके भविष्य को रोकने के लिए जेएनयू वीसी ने वहां की तयशुदा दाखिला नीति को यूजीसी सर्कुलर की आड़ में खत्म कर दिया और एमफिल्-पीएचडी के दाखिले के लिए तय सीटों में इस तरह कटौती की कि एमफिल्-पीएचडी में तकरीबन सभी सीटें बलिदान हो गयीं।वहीं दूसरी ओर पंजाब वि वि ने ट्यूशन फीस में बेशुमार बढोतरी करके पढ़ना ही मुश्किल कर दिया है।वहां ट्यूशन फीस दस गुना बढा दी गयी है। यूपी में वि वि और कॉलेजों में छह महिनों के लिए पाबंदी लगा दी गयी है।मोदी सरकार आने के बाद यूजीसी के बजट में कटौती की गयी है, केन्द्रीय वि वि से कहा गया है 30 फीसदी संसाधन वे स्वयं जुगाड़ करें।केन्द्र सरकार की नौकरियों की भर्ती मोदी सरकार आने के साथ ही बंद कर दी गयी है।ये सारे हालात बता रहे हैं कि विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसर लगातार खराब होते जा रहे हैं।कश्मीर के छात्रों का विगत पांच दिनों से जिस तरह का आक्रोश सामने आया है वह कश्मीर के छात्र आंदोलन में हाल के वर्षों में नहीं देखा गया।

सोमवार, 2 जनवरी 2017

नोटबंदी का सच और मोदी सरकार के झूठ-



मोदी सरकार झूठ बोलने में अव्वल है,उनके झूठ को दोहराने के मामले में मोदीभक्त परम अव्वल है ! नोटबंदी के समापन पर वित्तमंत्री अरूण जेटली ने जिस तरह के दावे किए जरा उनकी हकीकत को देखें।

´फाइनेंशियल एक्सप्रेस´(2जनवरी2017) ने मोदी सरकार के आंकड़ों का सच उजागर किया है।मसलन् वित्तमंत्री अरूण जेटली ने अप्रत्यक्ष करों में 26.2 फीसदी बढोतरी की बात कही,उन्होंने यह भी कहा कि सर्दी की फसल बुआई में 6फीसदी की बढोत्तरी हुई,नवम्बर माह में एक्साइज करों की वसूली में 32 फीसदी इजाफा हुआ,लेकिन सच यह है अक्टूबर माह में 41फीसदी की एक्साइज करों की वसूली हुई थी,नवम्बर में तो गिरावट आई।इसी तरह सेवा करों में 13.3फीसदी बढोत्तरी हुई थी लेकिन अक्टूबर माह मेंसेवा करों की वसूली 68.8फीसदी रही।एक्साइज ड्यूटी की वसूली में गिरावट इसके बावजूद आई कि इस दौरान एकबार पेट्रोलियम पदार्थों के करों की दर में इजाफा हो चुका था।यही हाल रवि की फसल के बुआई के आंकड़ों का है,इन आंकड़ों के संदर्भ में भी अरूण जेटली और पीएम मोदी सफेद झूठ बोल रहे हैं।रवि की बुआई में तेज गिरावट आई है।य का है।यही हाल विकासदर के बारे में किए जा रहे दावों का है,अखबार ने विस्तार के साथ अनेक वित्तीय एजेंसियों और आरबीआई के दावों की रोशनी में रेखांकित किया है कि विकासदर में निश्चित रूप से गिरावट आएगी।विस्तार से यह रिपोर्ट यहां पढ़ें-

With no clear estimates forthcoming from the government on the extent of black money unearthed by demonetisation, about a dozen agencies have trimmed their forecasts for India’s GDP growth for the current fiscal in the range of 40-330 basis points, reports fe Bureau in New Delhi. And many have cast shadow over the growth projections for 2017-18 as well. Finance minister Arun Jaitley last week cited a 26.2% annual jump in indirect tax collection and a 6% rise in winter crop sowing to suggest demonetisation didn’t hurt the economy as much as assumed by some commentators critical of the government’s unprecedented decision. However, data showed excise duty collections rose an annual 32% in November, down from 41% in October, and the growth in service tax mop-up slowed to just 13.3% in November from as much as 68.8% in the previous month. The slowdown in excise revenue growth in November was despite another round of hike in the excise duty on petroleum products in the month. Also, the increase in Rabi crop area seems rather muted at 2.8% if compared with the normal acreage by this time of year.

While the note ban put spokes in the wheels of the economy when it was struggling to accelerate (although Q2 GDP growth was 7.3% against 7.1% in Q1, investment in fixed capital contracted 5.6% in Q2, recoding third straight quarter of fall). Banks’ credit growth, at multi-year lows for quite some time, too touched a new low of 5.8% in the fortnight through December 9 from a year before even though banks were flush with funds post demonetisation.

The Reserve Bank Of India had projected only a 50-basis point drop in gross value addition in the economy in 2016-17 due to demonetisation.

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With private consumption–a key driver of GDP growth for close to two years now–hit by demonetisation, it is more incumbent on the government to continue to stir demand through its own spending. The government is relying on the expected jump in tax revenue (by an estimated Rs 1 lakh crore) from the new income disclosure scheme PMGKY to step up spending. Additionally, banks could enhance fresh lending as demonetisation has dramatically increased their liquidity (leading lenders have already announced steep rate cuts in their benchmark lending rates).

According to Nomura, demonetisation has hit rural consumption demand harder than urban demand, services more than manufacturing, and exports more than imports.Market research firm Nielsen says that the Rs 2.5-lakh crore FMCG sector witnessed a 1.2% net negative impact on consumer sales in value terms in November, with one in every five housewives surveyed said she cut spending by 50% or more. Auto sales, too, hit a 44-month low in November.



PMI for services for November witnessed the sharpest monthly decline since November 2008 (just after the Lehman crisis) and manufacturing PMI, too, slowed down. In signs that the impact of demonetisation will continue into the next fiscal, the Composite Leading Index of Nomura, which tracks non-farm GDP growth with a two-quarter lead, for early 2017 has slumped to the lowest level since the series started in 1996. Even SBI’s near-term composite index that predicts industrial activity hit a record low of 45.5 year-on-year, down from the revised level of 50 in the previous month.







शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

कर्णसिंह चौहान के कुतर्क और पलायन

       मोदी भक्ति का सबसे प्रचलित मुहावरा है विपक्ष को गाली दो !कीचड़ उछालने वाले कहो ! पंडितों –विशेषज्ञों को खराब भाषा में चित्रित करो ! तकरीबन यही पद्धति हिंदी आलोचक कर्णसिंह चौहान ने अपनायी है।समस्या है नोट नीति, चौहान साहब उस पर एक भी वाक्य बोलना नहीं चाहते,वे क्यों नहीं बोलना चाहते यह उनका सिरदर्द है,लेकिन बहस जब इस मसले पर हो रही है तो उनको बोलना चाहिए,वरना बहस न करें।बहस में शामिल भी होंगे लेकिन मूल सवाल पर नहीं बोलेंगे यह हो नहीं सकता।

नरेन्द्र मोदी के साथ जुड़ने के लिए जरूरी है कि आप अपना अतीत भूल जाएं,अपने को ज्ञानी नहीं अनुयायी बना लें,गैर-राजनीतिक लिखें,गैर-राजनीतिक दिखें,यहां तक कि अपने राजनीतिक कॉमनसेंस को भी भूल जाएं,यह दशा उनकी है जिन्होंने मार्क्सवाद के प्रमुख विचारकों को पढ़ा है,नाम है कर्णसिंह चौहान !

हम चाहते हैं चौहानजी सब समय व्यस्त रहें ! इतने व्यस्त भी न रहें कि नोट नीति पर लिखने के लिए कुछ शब्द भी न हों ! लेकिन नोट नीति की आलोचना करने वालों के खिलाफ ढेरों शब्द हों ! इसे मोदी भक्ति कहते हैं! यह मोदी पक्षधरता है!

चौहान साहब की फेसबुक वॉल पर मोदी सरकार की नीतियों को लेकर एकदम सन्नाटा पसरा पड़ा है ! चौहानजी ,यह सन्नाटा टूटना चाहिए! यदि आपसे कहा जाए कि स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों के लिखे को पढो तो तुरंत आप उनको छोटा-तुच्छ-हेय-बोगस साबित करने के लिए जल्द ही मूल्य-निर्णय दे देते हैं,मसलन् मैंने जब टीएन नाइनन से लेकर इकोनोमिस्ट के अर्थशास्त्रियों के नाम सुझाए तो कह दिया कि वे ´´ वे खुद अँधेरे में रास्ता खोज रहे हैं या अपनी जड़ता पर मुग्ध और परम संतुष्ट हैं ।´´इसे कहते हैं मोदी भक्ति में डूबा निर्मल मन !

चौहानजी,कमाल की बात यह कि आपने मोदी की नोट नीति के अर्थशास्त्री आलोचकों को कहा ´जैसे सारी जनता के लिए आध्यात्मिकता और ईश्वर के प्रतिनिधि बने महात्माओं की असलियत होती है, कुछ वही अपने विशेषज्ञों के बारे में भी सच है ।´ कम से कम इतनी घटिया टिप्पणी की आपसे उम्मीद न थी ! लेकिन जैसी कि इन दिनों बयार बह रही है कि मोदी के आलोचकों को निकृष्ट कोटि का सिद्ध करो,अफसोस है आप भी उनमें शामिल हो गए !

कर्णसिंहजी आपने कमाल की मोदी डिफेंस तैयार की है,आपके अनुसार मोदीजी की आलोचना करने वाले किताबी ज्ञानधारी हैं ! मोदी न तो गांधी हैं और न श्यामाप्रसाद मुखर्जी हैं,मोदी के पापों पर खासकर उसकी नोट नीति के पापों पर पर्दा डालने के लिए आपने जो तर्क बनाए हैं उनको देखकर यह बात पक्की है कि आपने सम-सामयिक राजनीति के सामाजिक प्रभावों को न देखने का मन बना लिया है,इसका प्रधान कारण तो आप ही जानें लेकिन अब यह बात तय है कि मोदीजी के पक्ष में बड़े ही कौशल के साथ तर्क निर्मित कर रहे हैं।

आज समस्या क्रांति,समाजवाद,वाम नहीं है,समस्या है नोट नीति लेकिन नोट नीति पर आप एक भी वाक्य बोलने को तैयार नहीं हैं।ऐसा क्या है जो आप बोलने को तैयार नहीं!बुद्धिजीवी के नाते विषय चुनने,अपने नजरिए से बोलने का आपको हक है लेकिन नोट नीति तो हम सबका विषय है,आपकी इस विषय को लेकर राय है जिसे हम देख रहे हैं कि आप नोट नीति के खिलाफ लिखे को बेहद घटिया मान रहे हैं,मेरे लिखे को स्वयं के खिलाफ जिहाद कह रहे हैं, क्या मैं मोदी की डिफेंस में लिखे आपके लेखन को जिहाद कहूँ ॽ आप मोदी के पक्के ज्ञानी अनुयायी हैं,आप मोदीभक्त या मोदी जिहादी नहीं हैं,लेकिन नोट नीति के पक्के समर्थक हैं!

कर्णसिंह चौहान ने लिखा है ´ आप लोग भी जब उसी दलदल में कीचड़ उछालू शैली में बहस करते हैं और आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं तो दुख होता है ।´यह तथ्य की दृष्टि से गलत है।हमने कभी कीचड़ नहीं उछाली, ऩ उस शैली में बहस की है।हमने आरोप-प्रत्यारोप भी नहीं लगाए हैं।चौहानजी, आप नोट नीति के पक्ष में हैं तो गंभीरता से अपना पक्ष क्यों नहीं रखते,आपको किसने रोका है,आपको यह हक किसने दिया है कि हमारे लेखन को कीचड़ उछालू लेखन कहें ! इस तरह का निष्कर्ष निंदनीय ही कहा जाएगा।मैंने आपके लेखन को कभी कीचड़ नहीं कहा,मुझे उम्मीद नहीं थी कि आप इतने नीचे गिरकर इस तरह की घटिया भाषा का इस्तेमाल करेंगे।

हमने फेसबुक पर नोटनीति के विरोध में जिन पत्र-पत्रिकाओं,अर्थशास्त्रियों को पेश किया है उनकी आम लोगों में,मीडिया में,अकादमिक जगत में पेशेवर साख है,वे सरकार या विपक्ष के भोंपू नहीं हैं,आप मेरी फेसबुक वॉल पर नोट नीति पर लिखी पोस्ट देखें और बताएं कि कहां पर कीचड़ उछालू बहस चलायी गयी है।

चौहानजी ! फेसबुक कोई किताब नहीं है ,यह तुरंत कमेंटस करने और तुरंत संवाद का मीडियम है,आप इस मीडियम पर लिखेंगे तो इसके अनुरूप ही लिखेंगे,इस पर किताब के अनुरूप या पत्रिका के अनुरूप नहीं लिखा जा सकता,हां किताब या पत्रिका के लिखे को शेयर कर सकते हैं।



मैं उम्मीद लगाए बैठा हूँ कि नोट नीति के 50 दिन गुजर गए हैं आप इस समस्या पर जरूर लिखेंगे,आप यह भूल जाएं कि मैंने क्या लिखा है,मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ,मैं आपके जैसा विद्वान और ज्ञानी भी नहीं हूँ।मैं नागरिक के नाते लिखता हूँ और नागरिक के नाते ही यहां संवाद करता हूँ।नागरिक के नाते आपके कुछ सरोकार भी बनते हैं जिनको आप मुझसे बेहतर जानते हैं,आप नागरिक के रूप में यहां लिखें !

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

हिन्दू धर्म महान!कालाधन महान !





पीएम नरेन्द्र मोदी की जनविरोधी इमेज क्रमशः बेनकाब हो रही है।लेकिन वे अभी भी मीडिया में बादशाह हैं!उनका जलवा देखने लायक है,हर चैनल उनके हर भाषण को लाइव टेलीकास्ट करता है,वे जब तक बोलें लाइव प्रसारण अबाधित चलता रहता है।यह सुविधा अभी किसी भी नेता के पास नहीं है।राहुल गांधी-केजरीवाल-ममता बनर्जी –सीताराम येचुरी इनका किसी का भी कवरेज मोदी के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता।सं
चार के इस वैषम्य का लाभ मोदीजी को मिल रहा है ।
    आरएसएस और भाजपा के टीवी कवरेज का अधिकतर समय घेरा हुआ है।टीवी कवरेज ने ही मोदी का कद सामान्य से असामान्य बनाया है।जब तक टीवी कवरेज के अ-संतुलन को विपक्ष दुरूस्त नहीं करता,जमीनी हकीकत में कोई अंतर नहीं आएगा।यह सच है जमीनी स्तर पर जनता परेशान है और बड़े पैमाने पर गरीबों और मजदूरों को नोट नीति ने आर्थिक नुकसान पहुँचाया है।हम सब मध्यवर्ग के लोग इस नुकसान को देखने और सुनने को तैयार नहीं हैं,इसने मध्यवर्ग के मन में गरीबों और मजदूरों के प्रति बैठी नफरत और दूरी को एकबार फिर से उजागर कर दिया है,इससे वे लेखक और बुद्धिजीवी भी बेनकाब हुए हैं जो बातें जनता की करते हैं लेकिन संकट की इस अवस्था में उनको परेशान आदमी जनता नजर ही नहीं आ रहा !

इसके विपरीत उनको कालेधन ,मोदी की महानता,कांग्रेस के 70साल के दुष्कर्म और वाम की कमजोरियां ही याद आ रही हैं।जबकि हकीकत यह है नोट नीति के कारण आम जनता की परेशानियों को पहले हल करने पर ,उन समस्याओं को सामने लाने पर जोर होना चाहिए,लेकिन हम सब इधर-उधर भाग रहे हैं।

मोदीभक्त इस बात से भी परेशान हैं कि हमारे जैसे लोग अहर्निश मोदी के खिलाफ क्यों लिखते रहते हैं ॽअथवा विपक्ष मोदी के खिलाफ दुष्प्रचार क्यों कर रहा है ॽमोदीजी तो सही काम कर रहे हैं ॽआज समस्या यह नहीं है कि मोदीजी के खिलाफ कौन क्या बोल रहा है ,समस्या यह है नोट नीति के भंवर में से देश कैसे निकलेगा ॽ पहले ही इस भंवर में लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी को पामाली की ओर ठेल दिया गया है।देश के हर नागरिक को नोट नीति ने परेशान किया है,कष्ट दिए हैं,ये ऐसे कष्ट हैं जो जनता को मिलने नहीं चाहिए लेकिन मिले हैं,जिनको कष्ट मिले हैं या जिनकी नौकरी चली गयी ये वे लोग हैं जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया,टैक्सचोरी नहीं की,कालाबाजारी नहीं की,कालेधन को हाथ तक नहीं लगया,बेइंतहा ईमानदार थे फिर भी उनको तकलीफें उठानी पड़ रही हैं।

मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हूँ , आज तक मेरे विश्वविद्यालय की एसबीआई ब्रांच मुझे नियमानुसार एक भी बार 24 हजार रूपये नहीं दे पाई है,मैं कईबार जाकर लौट आया,जितनीबार गया काउंटर पर यही कहा गया 24 हजार नहीं मिलेंगे,मैंने प्रतिवाद में पांच हजार ,सात हजार लेने से इंकार किया,मैं हर महिने 30हजार रूपया आयकर देता हूं,मेरे पास कोई कालाधन नहीं है,भाड़े के घर में रहता हूँ,कार नहीं है,सामान्य मध्यवर्गीय जिन्दगी जीता हूँ।लिखने-पढ़ने की आदत है।इसके बावजूद यदि मैं अपना पैसा बैंक से नहीं निकाल सकता तो आप कल्पना करें आम आदमी को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा होगा,मैं नौकरी करता हूँ,लेकिन पैसा नहीं है,वे लोग जिनकी नौकरी चली गयी ,वे कैसे गुजारा करेंगे ॽयह सामान्य सच है कि भयानक सच है,यदि इस सच को देखकर आपको बेचैनी नहीं होती तो मैं यही कहूँगा आपकी नागरिकचेतना मर गयी है।आपका नागरिक व्यक्तित्व खत्म होगया है,आप गुलाम हैं और गुलामी को आप मौज में गुजारें, गुलामी में आपको कोई बेचैनी नहीं होगी।

आज यह बेमानी है कि मोदी फासिस्ट हैं या अति-राष्ट्रवादी हैं,घृणा के प्रचारक हैं या सौजन्य के प्रतीक हैं,मोदीजी सभ्य हैं या असभ्य हैं ! क्योंकि आपने गुलामी को अपनी आदत,संस्कार बना लिया है।आपका हिन्दूमन आपको कभी नागरिक की तरह सोचने नहीं देता,अन्य के कष्टों को देखकर मन में कभी प्रतिवाद करने की इच्छा नहीं होती,आपके पास बुद्धि है,डिग्री है,शोहरत है,पद है,सुविधा है,मोदीभक्ति का तमगा है,तुम कार में चलते हो,कार्ड से पेमेंट देते हो,बैंक से लेकर बिग बाजार तक तुमको कहीं पर भी दो हजार रूपये मिल जाते हैं और तुम खुश हो,क्योंकि तुम सुरक्षित जीवन जी रहे हो ! ध्यान रहे गुलाम को भी यही सब चाहिए,गुलाम मानसिकता अन्य को देख नहीं पाती !

मैंने जब हिन्दूमन से नोट नीति को जोड़ा तो अनेक हिन्दुओं को कष्ट हुआ,मैं साफ कह दूँ ,मैं हिन्दूमन,हिन्दू संस्कार,हिन्दू आदतें आदि को मानसिक गुलामी की जंजीरें मानता हूँ।मोदीजी बड़े ही कौशल के साथ इन जंजीरों का अपने पक्ष में दुरूपयोग कर रहे हैं,वे नोट नीति की आड़ में,तथाकथित कालेधन और बेनामी संपत्ति के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम की आड़ में हिन्दुओं को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। वे फासिस्ट हैं या नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण है उनका जनविरोधी चेहरा जो नोट नीति की आड़ में छिपा हुआ है।

अब तक जितने लोगों के यहां छापे पड़े हैं ये वे लोग हैं जिनको आयकर वाले पहले से जानते थे,इनमें कोई भी नया आदमी नहीं है।कालेधन का न मिलना,नए कालेधन के मालिक का मिलना ,लेकिन कालेधन का धुंआधार प्रचार करते रहना,सिर्फ हिन्दू मन से ही संभव है,धार्मिक मन भगवान की जितनी सेवा करता है भगवान के विपरीत उतना ही आचरण करता है।दिलचस्प बात है अब तक पकड़े गए कालेधन के मालिक अधिकांश हिन्दू हैं!सवाल यह है जैन मतावलम्बी कालेधन वाले कितने अमीर पकड़े गए ॽ जबकि धंधे में जैनियों का वर्चस्व है।



उल्लेखनीय है धर्म के प्रसार के साथ पाप का प्रसार तेजी से होता है।जितना धर्म रहेगा पाप उससे ज्यादा रहेगा।धर्म की महत्ता तब तक है जब तक समाज में पाप और दुष्कर्मों का साम्राज्य बना रहे,जिन समाजों में पाप और दुष्कर्म नहीं हैं वहां धर्म भी नहीं है।धर्म का उद्घोष पाप की सत्ता-महत्ता का जयघोष है,इसी तरह कालेधन के खिलाफ मोदीजी का जयघोष इस बात का संकेत है कालाधन महान है,अजेय है।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

मोदी का नशा और कर्णसिंह चौहान

          हिंदी के प्रमुख आलोचक कर्णसिंह चौहान का नोट नीति पर पक्ष देखकर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ,असल में अधिकतर हिंदी बुद्धिजीवी और मध्यवर्ग के लोग वैसे ही सोचते हैं जैसे कर्णसिंहजी सोचते हैं।मुझे आश्चर्य इस बात पर हुआ कि कर्णसिंह चौहान हमेशा परिप्रेक्ष्य में चीजों को देखने के पक्षधर रहे हैं लेकिन मोदीजी की नोट नीति को लेकर उनके पास कोई परिप्रेक्ष्य ही नहीं है।मैं इस पोस्ट में मोदी सरकार ने विगत ढाई साल में क्या किया उसका लेखा-जोखा पेश नहीं करने जा रहा।यहां पर सिर्फ चौहानजी की टिप्पणी और उससे जुड़ी समस्याओं तक ही सीमित रखूँगा।

नोट नीति के संदर्भ में पहली बात यह है कि यह नीति सभी किस्म की सामान्य संवैधानिक मान्यताओं और प्रतिवद्धताओं को ताक पर रखकर लागू की गयी है।इसका सबसे खतरनाक पहलू है कि इस पर सरकार ने खुलकर न तो मंत्रीमंडल में विचार किया और न ही रिजर्व बैंक ने व्यापक पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला लिया।जिस दिन रिजर्व बैंक ने फैसला लिया उसी दिन बिना किसी बहस मुबाहिसे के मंत्रीमंडल ने पास कर दिया,अब तक के उपलब्ध तथ्य बताते हैं कि रिजर्व बैंक के मात्र 8 अधिकारियों ने इसका फैसला लिया।जबकि 24 अधिकारी पूरे बोर्ड में हैं,अधिकांश के पद खाली रखे हुए हैं,मैं उन अधिकारियों के विवरण और ब्यौरों में नहीं जाना चाहता।

बुनियादी बात यह है कि नोट नीति सीधे नागरिक के संविधान प्रदत्त हकों पर हमला है ,साथ ही रिजर्व बैंक की जो नागरिकों को दी गयी प्रतिज्ञा है उसका उल्लंघन है।अब तक मोदी सरकार, सुप्रीम कोर्ट को यह नहीं बता पायी है कि उसने यह फैसला कैसे लिया या फिर किन लोगों ने यह फैसला लिया,यहां तक कि वित्त मंत्रालय की संसदीय समिति की बैठक में रिजर्व बैंक के गवर्नर हाजिर नहीं हुए हैं।संसद में भी सरकार ने फैसले के आधिकारिक दस्तावेज पेश नहीं किए हैं,स्वयं प्रधानमंत्री संसद से भागते रहे हैं।आश्चर्य की बात है कि कर्णसिंह चौहान को इनमें से कोई भी समस्या बहस योग्य नहीं लगती ! यही है हिंदी का आलोचनात्मक विवेक!

चौहानजी, हम गाली नहीं लिखते,व्यंग्य भी नहीं लिखते,सच है जो लिखा है,हम जो भी लिखते हैं अपने विवेक से लिखते हैं,यह संयोग की बात है कि माकपा से मेरा भी संबंध रहा है और आपका भी।मैं माकपा के कामकाज और नीतियों को लेकर माकपा के सदस्य रहते हुए आलोचनात्मक नजरिया रखता था और मैंने जमकर उनकी लिखकर मुखालफत की है,लेकिन मैंने आपके उस तरह के लेखन को नहीं देखा है।माकपा के प्रति मेरा आलोचनात्मक रूख जगजाहिर है,सैंकड़ों लेख लिखे हैं,यहां तक कि पूरी किताब लिखी है,लेकिन आप हमेशा कन्नी काटते रहे हैं !

चौहानजी, मोदीजी कोई साधारण नेता नहीं है,वह सामान्य पीएम नहीं है, यह मेरी मोदी के उदय से ही समझ रही है,लेकिन मैंने गालियां नहीं लिखीं।मैं वामपंथियों की हिमायत नहीं करना चाहता वे अपनी हिमायत करने में सक्षम हैं , लेकिन आपने नोट नीति के पक्ष या विपक्ष में सीधे लिखने से हमेशा परहेज करके अपने मोदीप्रेम को ही व्यक्त किया है,आप समझदार हैं,आपका इस तरह प्रच्छन्न मोदीप्रेम हमारे गले नहीं उतरता ! हम तो चाहेंगे आप खुलकर लिखें,प्रच्छन्न रूप में न लिखें ! खुलकर जैसे मेरे ऊपर हमला करते हैं वैसे ही खुलकर मोदी के पक्ष में लिखकर मोदी विरोधियों पर हमले करें ! हम देखें तो सही आप किस तरह सोचते हैं !

अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है मोदीजी के पक्ष में आपके पास कोई तर्क नहीं है,हमसब क्या कह रहे हैं इस सबको गोली मारिए ! कम से कम जनता की जो क्षति हो रही है उसकी ओर ही आँखें उठाकर देख लेते ! बैंकों की जो क्षति हो रही है उसे ही देख लिया होता !

लेकिन आपने 8नवम्बर के बाद से अपनी वॉल पर इन सब पर कुछ नहीं लिखा,हां,मेरे ऊपर दो पोस्ट जरूर लिखीं,मैं जानता हूँ आप मुझे सच में प्यार करते हैं ! आपको मैं लिख-लिखकर परेशान करता रहता हूँ,मैं अपनी आदत से मजबूर हूँ,आप थोड़ा नाराज तो होंगे लेकिन मैं क्या करूँ मोदी सरकार लगातार जनविरोधी फैसले ले रही है और आप जैसे लोग चुप तमाशा देख रहे हैं!

चौहानजी, नोट नीति सफल रही है,आपकी आशंकाएं गलत हैं,मोदीजी जो चाहते थे वह हो चुका है,जो मुद्रा जनता के पास थी वह खींचकर बैंकों में आ चुकी है।इसलिए इस नीति की असफलता का तो सवाल ही बेमानी है।

नोट नीति का लक्ष्य था नोटों को बटोरकर बैंकों में लाना,यह काम हो गया है। इसका लक्ष्य कालाधन खत्म करना नहीं था,इससे आतंकियों की रसद पर भी कोई असर नहीं पड़ा,इससे चुनावों में कालेधन के इस्तेमाल पर भी कोई खास असर नहीं पड़ेगा,हां,एक काम जरूर हुआ है,बैंकों का प्रतिदिन का तीन हजार करोड़ रूपये का नुकसान हो रहा है,वे धंधा नहीं कर पा रही हैं,बाजार का प्रतिदिन का एक लाख तीस हजार करोड़ रूपये का नुकसान हुआ है,लाखों मजदूरों की नौकरी चली गयी है।सौ से ज्यादा लोग मारे गए हैं।एक भी कालेधन का मालिक पकड़ा नहीं गया है और न उसने आत्महत्या की है न उसे हार्ट अटैक हुआ है।बाजार से लेकर कल –कारखानों तक नोट नीति ने जो तबाही मचायी है वह हम सबके लिए चिंता की बात है लेकिन आपके लिए ये कोई समस्याएं ही नहीं हैं,आप इतने भोले या अनजान तो नहीं हैं कि यह सब न जानते हों,मैंने इन सब पर लगातार लिखकर वही किया है जो एक सचेत नागरिक को करना चाहिए।लेकिन आपकी इन सब सवालों पर चुप्पी स्तब्ध करने वाली है ! मैं नहीं कहूँगा आप मोदी भक्त हैं,भाजपा के साथ हैं,लेकिन आप चुप हैं और यह चुप्पी सिर्फ आपको ही नहीं हिंदी के आलोचकों को कठघरे में खड़ा कर रही है आप हिंदी आलोचना के प्रतिनिधि पात्र हैं!

चौहानजी,आपकी फेसबुक जैसे माध्यमों को लेकर बुनियादी समझ ही गलत है।फेसबुक का उदय ही हुआ है रीयलसटाइम संप्रेषण के लिए,इसमें लिखा अजर -अमर नहीं है,यह सामान्य संचार है जिसे हम सब अनौपचारिक बातचीत में करते हैं।यहां लिखे का ऐतिहासिक महत्व नहीं है,यहां तो सिर्फ संचार है और संप्रेषण है,यहां विचारधारा गौण है।फेसबुक पर अभियान नहीं चलाए जाते।संचार का प्रवाह रहता है इसमें एक नहीं अनेक किस्म के प्रवाह हैं।यह एकदम खुला संचार है,यहां हर बात परिवर्तन के दवाब में है,कोई चीज स्थिर नहीं है,स्थिर और टिकाऊ कोई चीज है तो परिप्रेक्ष्य,परिप्रेक्ष्य यहां पर धीमी गति से बदलता है,लेकिन आप तो नोट नीति पर परिप्रेक्ष्य के बिना फुटकल ढ़ंग से सोचते हैं जो कम से कम एक बड़े आलोचक के लिए सही नहीं लगता।





कर्णसिंह चौहान की मूल पोस्ट -



[ यह टिप्पणी जगदीश्वर जी की पोस्ट पर की गई जो ८ नवंबर की विमुद्रीकरण-पुनर्मुद्रीकरण की घोषणा के बाद विपक्षी दलों की तर्ज पर वामपंथी-सैक्युलर बुद्धिजीवियों की तरफ से इसके खिलाफ छेड़े अभियान का हिस्सा है । इस तरह के अभियान में न केवल भाषा की शिष्टता का विनाश हुआ है, तमाम तरह की मर्यादाओं का विनाश हुआ है । यह विमर्श की भाषा न होकर हिंसक भाषा है जो किसी चीज का कोई समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकती । इस अंध-विरोध ने न केवल विरोधी का मजाक उड़ाया है बल्कि जनचेतना को भी उपहास की वस्तु बना दिया है । विमुद्रीकरण की पैरोकार सरकार को इस विरोध से जितना बल मिला है शायद उतना उसके तमाम प्रचारतंत्र से नहीं । यह विरोध प्रकारांतर से भ्रष्टाचार और कालेधना का हिमायती नजर आता है और उसके विरुद्ध जनता की भावना को विरूपित करता है । इस पोस्ट में उन्होंने एक व्यंग्य बनाने की कोशिश की है जिसमें प्रधानमंत्री को हिंदू का प्रतीक, उन्हें मिल रहे जन-समर्थन को हिंदू जनता के पुनर्जन्म में विश्वास से जोड़ने आदि की कोशिश की गई है । ]

जगदीश्वर जी,

अब तक इस विषय पर लिखी सबसे खराब और भ्रांत पोस्ट है यह । विमुद्रीकरण-मुद्रीकरण, मोदी, हिंदू, पुनर्जन्म को लेकर आपने जो व्यंग्यनुमा कुछ बनाने की कोशिश की है, वह न व्यंग्य है न विचार । आपका और आपकी तरह अभियान में लगे तमाम लोगों का संपूर्ण विरोध क्यों जनता के सामने हताशा-निराशा पर बार-बार टूट रहा है ! आप इसे न समझने की कोशिश करते हैं, न स्वीकारने की । बस रात-दिन गाली-गलौज में लगे हैं ।

इसे समझने के लिए जनता पर इस या उस बहाने दोषारोपण करने की जगह अगर केवल इतना समझ लेते कि जनता, इसे सही या गलत जिस रूप में आप लें, भ्रष्टाचार, कालेधन से मुक्ति का अभियान समझ रही है । यह भी कि जनता ने इस रोग को ७० साल फलते-फूलते देखा है और इससे मुक्ति उसके लिए सर्वोपरि है । जब-जब उसे इसके विरुद्ध आवाज बुलंद करने या आक्रोश जाहिर करने का अवसर मिला उसने भरपूर साथ दिया । विरोधी दल या आप सब जब रात-दिन उसके खिलाफ गाली-गलौज करते हैं तो वह सही-गलत रूप में आपको भ्रष्टाचारियों, कालाधनधारियों का हितैषी समझती है ।

अगर यह मुहिम विरोध पक्ष या बुद्धिजीवियों के अभियान से या इसे चलाने वालों की बदनीयती या बद-इंतजामी की वजह से असफल रही तो यह जन-आकांक्षा उसी तरह पछाड़ खाकर गिरेगी जैसे पहले कई बार जे.पी. आंदोलन या अन्ना आंदोलन में गिरी है । यह गिरना कई दशकों का गैप बना जाता है ।

वैसे फिलहाल आपने जो मजमा जमा रखा है उसमें कुछ भी कहना बेकार ही है । आप लोग किसी भी अलग राय को कुछ भी ब्रांड करने में पीछे नहीं रहने वाले हैं । धीरे-धीरे असहिष्णुता की ऐतिहासिक कमी को थोड़े से समय में पूरा करना जो है । फिर भी आपके अभियान के लिए शुभकामनाएँ ।





प्रतिवाद का छंद, मीडिया और राहुल देव

     पीएम नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने और अब नोट नीति के लागू होने के बाद फेसबुक से लेकर सामान्य मध्यवर्गीय-निम्न मध्यवर्गीय लोगों में उनकी जय-जयकार सुनने के बाद अनेक लोग परेशान हैं,अनेक लोग मोदी पर फिदा है,अनेक जुदा हैं और वफादार हैं!

कुछ लोग हैं जो मोदी की इमेज के बनाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को देख रहे हैं,कुछ किं-कर्त्तव्य विमूढ़ हैं ! मोदी के सत्ता में आने का सबसे बड़ा प्रभाव यह पड़ा है कि उसने प्रतिवाद के छंद को ही तोड़ दिया है,अब लोग प्रतिवाद की भाषा में नहीं सहमति की भाषा में हर चीज को देखने लगे हैं ,यह परिवर्तन बहुत ही खतरनाक और त्रासद है ! इस परिवर्तन के अनेक जागरूक बुद्धिजीवी भी शिकार हैं।

मोदी का सत्ता में आना,कोई अनहोनी घटना नहीं है,अनहोनी घटना है प्रतिवाद के छंद का टूट जाना। इसने प्रतिवाद का अभाव पैदा किया है।इस स्थिति से कैसे निकलें इस पर ध्यान देने की जरूरत है।मोदीजी को कप्यूटर की क्लिक ने ही महान बनाया है, एक ही क्लिक में जानने और हजम करने की अनक्रिटिकल मानसिकता ने प्रतिवाद के छंद को तोड़ा है।क्लिक करके जानने की आदत ने ही हमारे अंदर छिपे परपीड़क आनंद को हवा दी है।

आज वास्तविकता सामने घट रही है लेकिन हम उसे जानने की कोशिश नहीं करते।इसका प्रधान कारण है टीवी पर उसका अदृश्य हो जाना।टीवी स्क्रीन से हम अपनी राय बना रहे हैं।मीडिया में हम जब चीजें देखते हैं तो हमें यही बताया जाता है कि मीडिया तो वही दिखाता है जो घट रहा है या जो हम देखना चाहते हैं।आज एक पत्रकार चिंतक राहुल देव ने फेसबुक पर तकरीबन इसी तरह की बातें लिखी हैं।ये जनाब लंबे समय से मीडिया से जुड़े रहे हैं। राहुलजी की राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के बारे में नहीं बोलना चाहता।वे मोदीजी के साथ हैं।मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं। लेकिन उन्होंने मीडिया के बारे में फेसबुक पर जो लिखा है वह बुनियादी तौर पर गलत है।

मीडिया में आमतौर पर जिस चीज को पेश किया जाता है वह है अनुपस्थित ।यह वह अनुपस्थित है जो आमतौर पर क्षितिज से गायब है,यह खाली स्पेस या स्थान या समय को भरने का सामान है,वस्तु है।इसकी कला की तरह कोई सौंदर्यबोधीय अपील नहीं होती।कला की तरह इसमें यथार्थ की अभिव्यंजना नहीं होती।इसे यथार्थ के साथ जोड़कर भ्रमित नहीं होना चाहिए।राहुलदेव और उनके जैसे तमाम मीडियाकर्मी चाहें तो बौद्रिलार्द के मीडिया संबंधी दार्शनिक विवेचन को पढ़कर ज्ञान लाभ कर सकते हैं।मीडिया प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह यथार्थ को ही ध्वस्त कर देता है।यथार्थ का केरीकेचर करता है।वह अपने को यथार्थ की तरह पेश करता है।मीडिया प्रस्तुतियों में यथार्थ को एक भिन्न आयाम में ले जाता है जिसे थर्ड डायमेंशन कहते हैं।इसके जरिए वह जहां एक ओर यथार्थ को हजम कर जाता है वहीं यथार्थ के सिद्धांतों के बारे में ही सवाल खड़े कर देता है।वहां यथार्थ नहीं होता.बल्कि खाली स्थान होता है।

मोदी के प्रचार की खूबी यह नहीं है कि वे यथार्थ को पेश कर रहे हैं ,बल्कि इसके उलट वे यथार्थ को तो पेश ही नहीं कर रहे,यही काम मीडिया कर रहा है।मीडिया प्रस्तुतियों में यथार्थ का गायब हो जाना सामान्य घटना नहीं है। मीडिया में प्रस्तुत या मोदी के भाषणों मे प्रस्तुत यथार्थ में सम-सामयिकता तो है लेकिन यथार्थ नहीं है,यथार्थ की गंभीरता नहीं है।मोदी की समूची प्रस्तुति के निशाने पर प्रतिवाद का छंद रहा है।वे शुरू से प्रतिवाद के छंद पर हमला करते रहे हैं।नोट नीति के साथ भी उन्होंने प्रतिवाद के छंद को ही निशाना बनाया है,वे लगातार प्रतिवाद पर हमला कर रहे हैं।प्रतिवाद के प्रति उनका एकदम असहिष्णु भाव है।

भारत में प्रतिवाद के रूप एक नहीं अनेक हैं लेकिन मोदीजी ने सभी प्रतिवादी रूपों को एक ही बंडल में बांध दिया है।हम सब जानते हैं कि देश में साम्प्रदायिकता-आरएसएस-भाजपा आदि का विरोध करने वाले विभिन्न रंगत के राजनीतिक दल और स्वयंसेवी संगठन हैं इनमें कोई विचार साम्य नहीं है,लेकिन मोदीजी ने पक्ष और विपक्ष में इस तरह वर्गीकरण किया है कि प्रतिवाद की विविधता ही खत्म हो गयी है।अब सामूहिक तौर पर मोदी के साथ हो या मोदी के विरोध में हो।इस बुनियादी धारणा का व्यापक असर देखने में आ रहा है।

मोदीजी के खिलाफ बोलने वाले संगठन और विचारधाराएं अनेक हैं।उनके अपने स्वतंत्र राजनीतिक कार्यक्रम हैं।मोदी और मीडिया जब पक्ष-विपक्ष में वर्गीकरण करते हैं तो प्रतिवाद के छंद को ही तोड़ देते हैं। प्रतिवाद का छंद तब ही अच्छा लगता है जब वह अपनी मूल भावना और विचारधारा के साथ राजनीति में व्यक्त हो। प्रतिवाद के वैविध्य को मीडिया ने विपक्ष में फूट के नाम से उछाला है। यहां तक कि गूगल में भी मोदी के नाम से क्लिक करके पक्ष -विपक्ष में चीजें खोजने की आदत पड़ गयी है।गूगल या इंटरनेट पर मोदी का शोर वैसे ही है जैसा वह टीवी या अखबार में है।इसी वर्गीकरण के पक्ष -विपक्ष में गूगल पर आंकडों की जमकर खेती हो रही है।

मोदी की प्रस्तुतियों ने मोदी के साथ जनता के अंतर को खत्म कर दिया है।मीडिया में मोदीजी पूरी तरह जनता के साथ एकाकार हो गए हैं।जबकि यथार्थ में ऐसा नहीं है,उनको मात्र 31फीसदी जनता का समर्थन मिला था।इस अंतर को उनकी मीडिया प्रस्तुतियों में सहज ही देख सकते हैं।इसे मीडिया मेनीपुलेशन भी कह सकते हैं।मोदी को महान बनाने के लिए मीडिया ने पहले भाजपा में मोदीजी के साथ उठे मतभेदों और अंतरों को छिपाया ,भाजपा और मोदी को एकाकार करके पेश किया।इसके बाद मोदी और जनता के बीच के अंतर को खत्म किया।मीडिया में गंभीरता से देखेंगे तो मोदी और जनता के बीच में कोई अंतर दिखाई नहीं देता।जबकि जीवन में अंतर हैं,राजनीति में फर्क है।
       मोदीजी के नजरिए को सिद्धांततः ´निषेध का निषेध´ के नजरिए से देखें।वे पहले कांग्रेस ने जो कहा उसका निषेध करते हैं,फिर स्वयं जो कहते हैं,कुछ समय बाद उसका निषेध करते हैं,इन सब निषेधों का तीव्र गति से प्रचार,अति -प्रचार करते हैं और यही वह अति -संप्रेषण की कला है जिसके जरिए वे विभिन्न रंगत के प्रतिवाद और अंतरों को निशाना बनाते हैं,इस समूची प्रक्रिया में जो चीज नष्ट हुई है वह है भारत का यथार्थ ।
     आज आम आदमी का मोदी से संपर्क है लेकिन भारत के यथार्थ से संबंध टूट चुका है।वे जो कुछ भी कहते हैं उनकी सरकार उससे तत्काल पलट जाती है।नोट नीति के संदर्भ में यह बात खासतौर पर सामने आई है।हर रोज रिजर्व बैंक ने पीएम के कहे का उल्लंघन किया कल जो नियम बनाया उसे दूसरे दिन ही बदल दिया।बार बार बदलना,निषेधका निषेध करना,असल में प्रतिवाद के छंद को स्थिर नहीं रहने देता।

कर्णसिंह चौहान के बहाने उठे सवाल

        कल मैंने जब हिंदी के आलोचक कर्णसिंह चौहान को अंध मोदीभक्त की तरह मोदीजी की नोट नीति की हिमायत में फेसबुक पर पढा तो मैं सन्न रह गया।वे बेहतरीन व्यक्ति हैं,सुंदर समीक्षा लिखते हैं और उन्होंने बेहतरीन अनुवाद किए हैं।साहित्य के मर्मज्ञ हैं।लेकिन अर्थशास्त्र में वे एकदम शून्य हैं,वे हर चीज को पुराने माकपा कार्यकर्ता की तरह मात्र आस्था के आधार पर देख रहे थे,उनके लेखन से मन बहुत खराब हुआ,उनके चाहने वाले अनेक मित्रों ने उनके नोट नीति के समर्थन पर मुझे फोन पर उनके रूख पर हैरानी व्यक्त की।तब मैंने सोचा कि हमें समस्या की जड़ों में जाना चाहिए।यह मसला एक लेखक का नहीं है,बल्कि उससे कहीं गहरा है।
        भारत इस समय बहुत गंभीर संकट से गुजर रहा है।शिक्षितों का एक बड़ा वर्ग इस संकट को संकट ही नहीं मान रहा।संकट यह नहीं है कि बैंक में लाइन लगी है,एटीएम में पैसा नहीं है,संकट यह नहीं है कि किसान कर्ज में डूबा हुआ है और वे आत्महत्या कर रहे हैं, संकट यह है हम सबकी आँखों से यथार्थ रूप में ठोस मनुष्य और उसकी तकलीफें गायब हो गयी हैं।हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब मनुष्य गायब हो गया है।चीजें गायब हो गयी हैं। बौद्रिलार्द की मानें तो चुनौती यह है कि यथार्थ ही अदृश्य हो गया है।पहले समस्या यह थी कि साहित्य और मीडिया में कोई प्रवृत्ति आती और जाती थी,आंदोलन आते और जाते थे,राजनीतिक दल सत्ता में आते और जाते थे,लेकिन मनुष्य के यथार्थ पर हमारी पकड़ बनी हुई थी,हम ठोस रूप में मनुष्य को जानते थे,उसके दुखों को जानते थे,ठोस हकीकत के रूप में मनुष्य की समस्याओं पर बातें करते थे।लेकिन नव्य-आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद से समूचा पैराडाइम ही बदल गया है।यही वह दौर है जिसमें मनुष्य और उसका यथार्थ अदृश्य हुआ है।अब हर चीज,घटना,वस्तु, फिनोमिना आदि हठात् आ जा रहे हैं।हम देखरहे हैं लेकिन कुछ भी करने,हस्तक्षेप करने में असमर्थता महसूस करते हैं।

यथार्थ के अदृश्य हो जाने के कारण हमने यथार्थ पर बातें खूब की हैं,हत्याओं पर बातें खूब की हैं,लेकिन हत्या का यथार्थ हमने कभी महसूस नहीं किया,मसलन् 2002 के गुजरात के दंगों के बारे में जितना लिखा और बोला गया उतना तो संभवतःभारत-विभाजन के समय की विभीषिका पर भी नहीं बोला गया।इसके बावजूद दंगों के यथार्थ को हम पकड़ने में असमर्थ रहे।दंगे हुए,लोग मारे गए,लेकिन पीड़ितों का दर्द और त्रासदी गायब रही।यानी हम जब से वर्चुअल रियलिटी और इंटरनेट की दुनिया में दाखिल हुए हैं तब से यथार्थ का साक्षात अनुभव और उसकी विचारधारात्मक समझ गायब हुई है। सवाल यह है यथार्थ के अदृश्य हो जाने के पहले हमने यथार्थ को जानने की कितनी कोशिश की थी ॽ

यही हाल नोट नीति का है.आज नोट नीति के संकट को हम समझ नहीं पा रहे हैं और सरकार के इकतरफा प्रचार अभियान से सीधे प्रभावित हैं तो सबसे पहले तो यही सवाल उठता है हम बुद्धिजीवी नोट नीति लागू होने के पहले भारतीय अर्थव्यवस्था,कालेधन, आतंकवाद आदि के बारे में कितना जानते थे ॽ हिन्दी में बहुत छोटा अंश है जो इन समस्याओं के बारे में जानता है और उन समस्याओं का विश्लेषण करके लिखता रहा है। अधिकतर बुद्धिजीवियों में कॉमनसेंस से विचार विमर्श चलाने की प्रवृत्ति है।ऐसी स्थिति में यदि हिंदी का कोई लेखक-आलोचक-पत्रकार यदि नोट नीति का भक्त नजर आता है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।

मसलन् आप हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं उठाकर आसानी से देख सकते हैं कि हिंदी में अर्थशास्त्र के विषयों पर कितने हिंदी पत्रकार नियमित अखबारों में लिखते रहे हैं अथवा कितने हिंदी के आलोचक हैं जो साहित्यिक पत्रिकाओं या अपनी किताबों में अर्थशास्त्र के विषयों पर लिखते रहे हैं।यह ठोस हकीकत है अर्थशास्त्र के विषयों पर लिखने वाले समझदार किस्म के एक दर्जन बुद्धिजीवी भी हिंदी के पास नहीं हैं।ऐसी स्थिति में यदि किसी लेखक को नोट नीति में आशा की किरण नजर आए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

असल बात यह है कि यथार्थ के कारकों को जाने बिना यथार्थ पकड़ नहीं सकते.कल जब हिंदी के एक प्रतिष्ठित लेखक को मैं नोट नीति पर बलिहारी भाव-भंगिमा में फेसबुक पर लिखते देख रहा था तो मुझे उनकी स्थिति देखकर तकलीफ हो रही थी,मैं जानता हूँ कि उन्होंने अर्थशास्त्र को न तो पढा है और न कभी उस पर लिखा है,ऐसे में अर्थशास्त्र का सच वे कैसे बता सकते हैं ! वे तो अपनी चेतना के सबसे निचले धरातल पर खड़े होकर बातें कर रहे थे,उनकी भंगिमा अर्थशास्त्र के ज्ञान से नहीं मोदी की नोट नीति के प्रति आस्था से बनी थी।

नोट नीति से जुड़े अर्थशास्त्र के सवाल हैं,ये आस्था के सवाल नहीं हैं ,ये कॉमनसेंस के सवाल नहीं है,ये अर्थशास्त्र के गंभीर जटिल संबंधों और संश्लिष्ट प्रक्रिया से जुड़े सवाल हैं और इन सवालों पर हमें विशेषज्ञों की राय को पढ़ने और समझने की जरूरत है।

चूंकि हिंदी के बुद्धिजीवियों से हमारा संबंध ज्यादा है इसलिए हम यही कहना चाहते हैं कि कहानी या उपन्यास पर बात करने के लिए महज पाठक होना ही काफी नहीं है।यदि आलोचना करनी है तो आलोचकीय विवेक ,आलोचना के उपकरणों और आलोचना की विधागत परंपरा का ज्ञान होना भी जरूरी है।मात्र कृति पढ़कर पाठकीय अनुभव के आधार पर आलोचना विकसित नहीं हो सकती।



मसलन् ,किसी बड़े लेखक ने लिखा है इसलिए उसकी रचना अच्छी ही होगी,यह निष्कर्ष सही नहीं है।बड़े लेखक की रचनाएं भी कमजोर होती है,महज आस्था के आधार पर हम यह कहें कि प्रेमचंद या नागार्जुन की सभी रचनाएं क्लासिक हैं,तो गलत होगा।जिस तरह साहित्य में लेखक के प्रति आस्था के आधार पर रचना के बारे में मूल्य-निर्णय करना गलत है ठीक वैसे ही नोट नीति के बारे में मात्र मोदीजी के प्रति आस्था के आधार पर समर्थन देना ,नोट नीति के समर्थन में फतवे देना गलत है।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

विध्वंस के स्तूप बनाते मोदीजी

           पीएम मोदी की विशेषता है जो कहते हैं उससे एकदम उलटा आचरण करते हैं,नोटबंदी उनकी इसी खासियत का परिणाम है।पहले वायदा किया था कि पांच सौ और हजार के नोट 30दिसम्बर तक बदले जा सकेंगे, लेकिन आज सरकार ने घोषणा की है कि पुराने नोट अब बदले नहीं जाएंगे।इसी तरह पहले कहा करते थे संसद सर्वोच्च है अब कहते हैं ट्विटर और एप सर्वोच्च हैं ! नोट नीति के पक्ष में उन्होंने जो सर्वे किया है उसमें करोड़ों पीड़ित किसानों की राय शामिल नहीं है। सवाल है ये पाँच लाख कौन हैं जो जनता के कष्ट को सही मान रहे हैं? जनता की तकलीफ़ों को जायज ठहराने की मोदी एप सर्वे ने जो कोशिश की है उससे एक बात साफ़ है कि यह सर्वे तयशुदा ढंग से तैयार किया गया है। यह जनता की नेचुरल राय का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इस सर्वे का लक्ष्य है नोटबंदी के फैसले में निहित संविधानविरोधी फैसले को छिपाना और मोदी के नोटबंदी के फासिस्ट और संविधान विरोधी फैसले को वैध ठहराना।मोदी एप सर्वे में वे ही लोग शामिल हैं जो स्मार्टफ़ोन वाले हैं। देश की अधिकांश जनता के पास न स्मार्टफ़ोन हैं और न इंटरनेट है। करोड़ों दैनिक मज़ूरी करने वालों की राय का इस सर्वे से कोई लेना देना नहीं है। नोटबंदी से यह वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है।

कालेधन और नोटबंदी पर अर्थशास्त्रियों की राय महत्वपूर्ण होगी लेकिन इसबार कहा जा रहा है संसद नहीं, अर्थशास्त्री नहीं, राजनीतिक दल नहीं, सिर्फ भाजपा,सिर्फ पाँच लाख मोदी यूजर तय करेंगे कि मोदी की नोट नीति सही है। मोदीभक्तों को जवाब देना चाहिए कि भाजपा करोड़ों सदस्यों वाला दल है उसमें से मात्र पाँच लाख लोग ही मोदी एप में वोट देने क्यों आए ? करोड़ों मोदी भक्त कहाँ हैं ? क्या मोदी एप के सर्वे का भाजपा सदस्यों ने बहिष्कार किया है? दिलचस्प बात है जो अर्थशास्त्र नहीं जानते, नोट नीति के बारे में नहीं जानते , वे बता रहे हैं नोटबंदी सही है, मोदी एप सर्वे की धुरी इसी तरह के लोग हैं।

संसद में पूर्ण बहुमत होने के बाद भी नोटबंदी का प्रस्ताव संसद में पेश करने से मोदी सरकार क्यों भाग रही है? मोदीजी क्यों डरे हुए हैं? मात्र पाँच लाख लोगों ने मोदी एप पर नोटबंदी पर पीएम के सर्वे का जवाब दिया। 125 करोड़ की आबादी में मात्र इतने कम लोगों के प्राथमिकतौर पर रिएक्शन सामने आए हैं। करोड़ों रूपये सोशलमीडिया पर ख़र्च करने बाद मात्र पाँच लाख लोगों ने सर्वे में भाग लिया है। इससे मोदी की इंटरनेट जनता पर बहुत कम लोगों तक पकड़ का अंदाज़ा लगता है।मात्र पाँच लाख लोग मोदी नीति के पक्ष में बोले हैं।बाकी जनता जो चुप है वह साथ नहीं है।

नोटबंदी के कारण अब तक 75 से ज्यादा लोग मारे गए हैं,इनमें 17लोग अस्पताल में पुराने नोट न लेने और इलाज के अभाव में मारे गए हैं।८नवम्बर के बाद पुराने नोट नहीं लिए जा रहे, खासकर निजी अस्पताल में पुराने नोट नहीं लिए जा रहे हैं।सवाल यह है सरकार ने पुराने नोटों को सरकारी अस्पताल में वैध रखा लेकिन निजी अस्पताल में वैध क्यों नहीं रखा ?

हम माँग करते हैं कि जिन लोगों के पास आधारकार्ड और जनधन खाता है और राशन ख़रीदने के पैसे नहीं हैं उनको केन्द्र सरकार गेहूँ,आटा, दाल, तेल और सब्ज़ी उधार दे । नोट नीति की तबाही थमने वाली नहीं है।इसके अलावा जिसके पास आधार कार्ड और जनधन खाता है उसे सरकारी और निजी अस्पताल में मुफ्त दवा और इलाज की सुविधा दी जाय ।

रिजर्व बैंक ने संविधान प्रदत्त अधिकारों , स्वायत्तता और जवाबदेही का जिस तरह त्याग किया है और रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने जिस तरह की गैर ज़िम्मेदाराना और संविधानविरोधी भूमिका अदा की है उसका हर स्तर पर प्रतिवाद होना चाहिए, साथ ही पीएम की नोटबंदी के असंवैधानिक निर्णय का भी प्रतिवाद होना चाहिए। आज बैंक कर्मचारी सबसे ज्यादा संकट में घिरे हैं। अब बैंक कर्मचारियों को संघर्ष का एलान करना चाहिए और साफ कहना चाहिए कि उनको अकारण असंवैधानिक और जनविरोधी नोट नीति का अंग बना दिया गया है।आप जरा बैंक कर्मचारियों की मुश्किलों और बैंकिंग व्यवस्था के बारे में सोचें नोट नीति के कारण विगत दस दिनों से बैंकों का सारा कारोबार ठप्प पड़ा है। फिलहाल बैंक रूपये लेने देने के काम में लगे हैं।बैंकों की आमदनी ठप्प पड़ी है, कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ गया है। कर्मचारी बेहद तनाव में काम कर रहे हैं।बैंकों के समूचे कामकाज के ठप्प हो जाने से प्रतिदिन कितने हजार रूपये की क्षति हो रही है ? विगत दस दिनों से जो काम बंद पड़े हैं उस बक़ाया काम को समाप्त करने में बैंक कर्मचारियों को कितने हजार घंटे काम करना पड़ेगा ?यही हालात यदि कुछ सप्ताह और रहते हैं तो बैंक कर्मचारी शारीरिक तौर पर भयानक दवाब में आ जाएंगे।

फेडरेशन ऑफ राजस्थान ट्रेड ऐंड इंडस्‍ट्री (फोर्टी) का मानना है नोटबंदी से राजस्थान में आगामी दो माह में करीब एक लाख करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित होगा, समाचार पत्रों, सोशल मीडिया आदि के जरिये भ्रांति व भय के माहौल में व्यापारी वर्ग डरा हुआ है तथा मजदूर वर्ग को रोजगार की उपलब्धता के बावजूद भी आर्थिक तंगी का सामना करना पड रहा है। फोर्टी ने प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह को कल सौंपा है जिसमें प्रधानमंत्री से व्यापार व उद्योग जगत के साथ-साथ आमजन को राहत पहुंचाने की मांग की गई है। उन्होंने कहा कि नोट बंदी के कारण विनिर्माण क्षेत्र और खुदरा क्षेत्र में बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। मजदूरों को मजदूरी का भुगतान करने के लिए पर्याप्‍त नकदी उपलब्ध नहीं होने के कारण उत्पादन पर भी असर पडा है।





गुरुवार, 24 नवंबर 2016

नोट बंदी यानी मोदी सरकार ठप्प है !

            पीएम नरेन्द्र मोदी ने 9नवम्बर से नोटबंदी की नीति लागू करते समय आम जनता से पचास दिन मांगे हैं।कहा है पचास दिन में यह नीति अभीप्सित लक्ष्य हासिल न कर पाए तो जनता पीएम को दण्डित कर सकती है।सवाल यह है नोट बंदी के पहले जो वायदे पूरे करने की बात थी उनका क्या हुआ ॽ क्या उन वायदों को भी 50दिन के लिए स्थगित कर दिया जाय ॽ सवाल यह है नोटबंदी की घोषणा के बाद सरकार ठप्प क्यों हो गयी ॽ

यह सच है नोटबंदी के कारण सब कुछ ठहर गया है। नोटबंदी के बारे में जो कुछ कहा गया उससे उलट परिणाम सामने आने शुरू हो गए हैं।मसलन् यह नहीं कहा गया कि नोटबंदी से कामगारों को बेकारी का सामना करना पड़ेगा,खासकर दैनिक मजूरी करने वालों को तत्काल रोजी-रोटी से हाथ धोना पडेगा।बाजार में सन्नाटा पसर जाएगा।बैंकिंग के नियमित कामकाज बंद हो जाएंगे।आयकर विभाग के नियमित काम ठप्प हो जाएंगे।पुराने नोटों का कालाधन धंधा शुरू हो जाएगा,मुद्रा दलालों की चाँदी ही चाँदी होगी।निर्माण कार्य,विकास कार्य,सरकारी योजनाओं का कार्यान्वयन ठप्प हो जाएगा।

नोटबंदी लागू करने के साथ यह कहा गया इससे काले धन पर रोक लगेगी।लेकिन व्यवहार में ठीक उलटा हुआ है।व्यवहार में मुद्रा दलालों ने बड़ी मात्रा में बैंकरों की मदद से करोड़ों रूपये का धंधा किया है।अभी तक किसी ने यह नहीं बताया कि पुराने खारिज नोट कितनी बड़ी संख्या में मुद्रा दलालों के जरिए बदले गए हैं।अभी तक जन-धन एकाउंट में 21हजार करोड़ रूपये जमा होने की बात केन्द्र सरकार ने मानी है।लेकिन दलालों ने अमान्य मुद्रा में से कितनी मुद्रा को परिवर्तित कराने में मदद की,इसका कोई आंकड़ा सरकार नहीं दे पायी है।जन-धन एकाउंट में अवैध पैसा जमा होने वाली बात भी इसलिए कही जा रही है जिससे ममता बनर्जी और राहुल गांधी को इस मुहिम से जोड़ा जाए,क्योंकि जन-धन एकाउंट में बड़े पैमाने पर पैसा सरकार के मुताबिक बंगाल और कर्नाटक में ही जमा हुआ है।

मोदी सरकार ने सब कुछ जानते हुए भी कि किनके पास अवैध कालाधन कैश में घरों रखा हुआ है उनके यहां घरों पर छापे न मारकर नोटबंदी का रास्ता चुना।सरकार यदि कालेधन के मगरमच्छों को पकड़ना चाहती तो आसानी से पकड़ सकती थी लेकिन उसने यह सब करना जरूरी नहीं समझा,उलटे उनको जन-धन एकाउंट के जरिए धन जमा करने की सुविधा मुहैय्या करायी।जिस तरह अनाप-शनाप तरीकों से जन-धन एकाउंट खुलवाए गए थे उस समय अनेक लोगों ने इन खातों के दुरूपयोग होने की ओर ध्यान खींचा था लेकिन सरकार ने एक भी बात नहीं मानी।आज यही जन-धन एकाउंट कालेधन को बैंकों में जमा करने के सबसे बड़े स्रोत बनकर सामने आए हैं।

नोटबंदी के बाद बैंकों में पारदर्शिता दिखनी चाहिए। केन्द्र सरकार तुरंत अब तक छापे गए और बैंक से दिए गए नोटों का हिसाब सार्वजनिक करे और बताए कि नए नोट कितनी संख्या में जारी किए गए हैं ॽइस समूची प्रक्रिया की गहराई में जाकर जांच करने की जरूरत है।दिलचस्प बात है मोदी सरकार नोटबंदी की नीति लागू होने के बाद एक भी मुद्रा दलाल को अवैध मुद्रा के लेन-देन के चक्कर में पकड़ नहीं पायी है।इसका प्रधान कारण हमारे यहां अवैध,खारिज,फटे-पुराने नोट आदि का कारोबार करने वाले पचासों वर्षों से यह धंधा कर रहे हैं और वैध ढ़ंग से वे अपना काम करते रहे हैं। सवाल यह है जब उनका धंधा वैध है तब आप कालेधन वाले को पकड़ेंगे कैसे ॽ

दूसरा सवाल यह है जुलाई से सितम्बर माह 2016 के बीच में बैंकों में जमा पूंजी में जबर्दस्त उछाल आया है,वे कौन लोग हैं जिन्होंने अचानक बैंकों में बड़ी मात्रा में धन जमा किया है ॽ बैंकों के सारे खातों को खंगालने की जरूरत है, साथ ही राजनीतिक दलों के खातों को भी खंगालने की जरूरत है। इस अवधि के बीच में जिन लोगों ने पांच लाख ,दस लाख,पचास लाख या उससे ऊपर धन जमा किया है उन लोगों कि शिनाख्त की जानी चाहिए,उनसे आय के स्रोतों की जानकारी देने के लिए कहा जाना चाहिए।इसके अलावा दो लाख से ऊपर के गहने खरीदने वालों की जांच हो।खासकर उन लोगों की जिन्होंने हठात् 8नवम्बर के बाद से महंगे दाम पर सोना खरीदा है, विगत 15दिनों में सोना खरीदने वालों के नाम तो सरकार जारी कर ही सकती है।यह कैसे संभव है कि जिन लोगों ने पहले सोना नहीं खरीदा अचानक 8नवम्बर की 8बजे की घोषणा के बाद ही सोना खरीदा ! उन कंपनियों और ठेकेदारों की भी खोज की जाए जिन्होंने एडवांस में अपने मजदूरों को कई महिने की पगार दे दी और अपना कालाधन सफेद कर लिया। ये बातें उस गोरखधंधे की एक झलक देती हैं जो नोटबंदी के नाम पर विगत 15 दिनों से हो रहा है और मोदी सरकार की इसे रोकने में कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती,उलटे हुआ यह है कि नोट बंदी के बाद सरकार के सभी विभाग ठप्प हो गए हैं। नोटबंदी को यदि अचानक लागू करना था तो सरकारी विभाग ठप्प क्यों हो गए ॽ







बुधवार, 23 नवंबर 2016

नोटबंदी और मीडिया के अक्षम्य अपराध-


          नोटबंदी के आतंकियों और माओवादियों पर असर की झूठी खबरों से मीडिया भरा पड़ा है,जबकि आँखों के सामने भारत के प्रत्येक नागरिक के यहां तबाही मची हुई है,कम से कम पचास लाख घरों में शादियां हो रही हैं और वहां सभी एकस्वर से मोदी सरकार की निंदा कर रहे हैं लेकिन मीडिया में यह सब गायब है , नोटबंदी का आतंकियों पर क्या असर हुआ है,यह बताने में मीडिया मगन है,जबकि मीडिया को किसी आतंकी से कोई पुष्ट और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिली है।इनमें सारे फोटो पुराने हैं,सिर्फ ऑफिस में बैठकर गप्पें तैयार की जा रही हैं।नोटबंदी ने समूचे बैंकिंग सिस्टम को पंक्चर कर दिया है।आयकर विभाग परेशान है कि कैसे काम करे,मुश्किल से दस लोगों को आयकर विभाग ने नोटिस भेजा और उससे यह आभास पैदा किया गया कि पता नहीं कितना बड़ा तीर मार लिया गया,जबकि आयकर विभाग को मालूम है कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठा है।

मोदी जी सरेआम मायावती और दूसरे नेताओं पर हमले कर रहे हैं और सफेद झूठ बोल रहे हैं।नोटबंदी से इन नेताओं पर कोई खास असर नहीं पड़ा है।कम से कम अब तक 14 दिनों में मोदीजी ने किसी नेता के यहां छापा मारकर एक लाख के अमान्य नोट तक नहीं पकड़े हैं,उलटे आयकर विभाग ने 91लाख के नोट महाराष्ट्र के भाजपा विधायक और मंत्री की कार से पकड़े हैं।नोटबंदी लागू होने के कुछ समय पूर्व भाजपा के खाते में कोलकाता में 3करोड़ रूपये के नोट जमा कराए गए हैं।इसके बाद भी यह हल्ला कि विपक्ष के पास कालाधन है और उसको नोटबंदी से नष्ट कर दिया गया है।यह पहला मौका है जब मीडिया पीएम और वित्तमंत्री के बयानों की तथ्यपरक जांच नहीं कर रहा। उसका कमर कसकर अफवाह अभियान में जुट जाना इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है।

भारत के इतिहास में सहकारी बैंकों को कभी सामान्य बैंकिंग प्रणाली से काटकर नहीं रखा गया,लेकिन नोटबंदी के बाद सहकारी बैंकिग व्यवस्था ठप्प पड़ी है। वहां कोई लेन-देन नहीं हो रहा,कोई काम नहीं हो रहा।यहां तक कि तुलनात्मक तौर पर पोस्ट ऑफिस से भी इन बैंकों का बुरा हाल है।

इस समस्त प्रक्रिया में पेट्रोल पंप वाले से लेकर बिग बाजार के मालिक तक पर हमारी सरकार को विश्वास है ,उनको किसी न किसी रूप में दो हजार रूपये नागरिकों को निकालने की वहां से सुविधा दे दी गयी है,लेकिन सहकारी बैंकों को तो बिग बाजार और पेट्रोल पंप मालिक कंपनियों जैसे लेन-देन की भी सुविधा नहीं दी गयी है।

सवाल यह है कि ये कंपनियां क्या अपने पॉकेट से नागरिकों को दो हजार रूपये बांटेगी ?कहीं नई मुद्रा को सलेक्टिव ढ़ंग से कारपोरेट घरानों को देने की मुहिम तो नहीं चल रही ?मसलन् बिग बाजार ने दो हजार की मुद्रा डेबिड कार्ड के आधार पर नागरिक को दी तो आखिरकार वह मुद्रा बिग बाजार कहां से जुगाड़ करेगा ,जिस समय बैंकों के पास मुद्रा न हो वैसे में बिग बाजार जैसे निजी नैटवर्क को दो हजार रूपये डेबिड कार्ड के जरिए देने का फैसला नए किस्म की मोदी -कारपोरेट मिलीभगत का नमूना है।यह नोटबंदी की आड़ में चल रहा मोदी करप्शन है।

इसी तरह यह प्रचार भी तथ्यहीन है कि कैशलैस सोसायटी करप्शन मुक्त होती है।सारी दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो कैशलैस हो,यहां तक कि जिन देशों में कैशलैस सिस्टम बहुत पुख्ता है वहां पर भी करचोरी बड़ी मात्रा में होती है।कैशलेस सिस्टम अंततःकैश पर ही चलता है।सिर्फ अंतर यह है कि चलमुद्रा का एक बड़ा अंश चलन से बाहर रहता है, वह बैंकों के पास रहता है।

पहले से ही एक लाख करोड़ रूपये की प्लास्टिक मनी चलन में है।यह प्लास्टिक मनी मोदीजी के पीएम बनने के पहले से ही चलन में है।प्लास्टिक मनी बाजार की पूरक मुद्रा है, विनिमय की मुद्रा है,यह वस्तुतः मुद्रा नहीं, मुद्रा का वायदा है,गारंटी है।असल मुद्रा तो इसके कारण चलन के बाहर है।

सारी दुनिया में 1.2 बिलियन लोग हैं जिनकी जिंदगी प्रतिदिन एक डॉलर से भी कम पैसे से चलती है,भारत में आबादी का बहुत बड़ा अंश है जिसकी रोज की आय तीस रूपये से भी कम है।ऐसे में कैशलैस विनिमय की बात करना अवैज्ञानिक है,साथ ही गरीबों के साथ भद्दा मजाक है।

इस दौर में आम जनता की राय को बनाने और नियंत्रित करने में मीडिया सबसे बड़ी भूमिका अदा कर रहा है अतः मीडिया की भूमिका पर व्यापक बहस होनी चाहिए।सवाल यह है मीडिया यह मानकर क्यों चल रहा है कि नोटबंदी अच्छी बात है,सही फैसला है ?बिना इस नीति की तहकीकात किए,उसके बुनियादी आधार के बारे में सवाल खड़े किए बिना मीडिया ने जिस तरह का माहौल बनाया है उससे पहली बात यह निकलती है कि मीडिया वालों में साक्षरता का अभाव है,मीडिया साक्षरता के अभाव के कारण नोटबंदी के प्रति इस तरह का अनालोचनात्मक रवैय्या पैदा होता है।आम जनता देखती है कि मीडिया समर्थन कर रहा है फलतः जनता मानकर चल रही है कि मोदीजी की नोट बंदी सही है।मीडिया बार बार असुविधाओं को चित्रित कर रहा है उसमें भी वह बड़ी कृपणता के साथ पेश आ रहा है। विगत 14 दिनों में मीडिया का समूचा कवरेज नोटबंदी के प्रति अनालोचनात्मकता से लबालब भरा रहा है।

मीडिया का काम है कि वह जनता की आवाज बने,लेकिन हमारे यहां मीडिया खुल्लमखुल्ला सरकार और कारपोरेट घरानों की आवाज के रूप में काम कर रहा है,ऐसे में मीडिया साक्षरता का काम और भी महत्वपूर्ण हो उठा है।

नोटबंदी के सवाल पर मीडिया ने दो बड़े अपराध किए हैं उसने आर्थिक सूचनाओं को छिपाया है और अ-प्रासंगिक सूचनाओं का प्रसार किया है। दूसरा अपराध यह किया है कि मीडिया अपनी भूमिका भूलकर सरकार के भोंपू की भूमिका अदा कर रहा है।हम सब जानते हैं आम जनता मीडिया द्वारा प्रसारित सूचनाओं पर पूरी तरह निर्भर है ऐसे में आम जनता से सही सूचनाएं छिपाना और सरकार की ही सिर्फ सूचनाओं को प्रसारित करना अपराध की कोटि में आता है।



















मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोटबंदी पर जनमत एप का मोदी पाखण्ड -

         पी एम नरेन्द्र मोदी संसद में किसी हॉल में बैठकर भाजपा सांसदों को सम्बोधित कर सकते हैं,संसद शुरू होने के बाद वे दो बार उनको सम्बोधित कर चुके हैं लेकिन वहीं पास में संसद के सदन में आकर भाषण देने में क्यों डर रहे हैं ?
वे संसद की बिल्डिंग में जा रहे हैं लेकिन सदन में नहीं जा रहे,सदन से वे कन्नी क्यों काट रहे हैं ? उनसे क्या कोई संवैधानिक चूक हुई है ?जी हां,हमने फेसबुक पर जितने भी मसले संवैधानिक उल्लंघन के रेखांकित किए थे आज वे सभी मुद्दे विपक्ष भी उठा रहा है।
मोदीजी सदन में बोलते हैं तो वे अपने बयान की संवैधानिक पुष्टि के लिए मजबूर होंगे,दिलचस्प बात है मोदी मंत्रीमंडल के सभी लोग संसद में बोलने को तैयार हैं एकमात्र मोदी बोलना नहीं चाहते,क्योंकि वे अपने को संवैधानिक जवाबदेही से बाहर रखना चाहते हैं।
मसलन्, संसद में यदि वे कहते हैं कि मैंने नोट बंदी का फैसला लिया तो यह संवैधानिक बयान होगा जो सीधे संविधान के उल्लंघन के दायरे में आता है मोदीजी को नोट बंदी का फैसला लेने का हक नहीं है,यदि वे कहते हैं मंत्रीमंडल ने फैसला लिया तो यह कहना भी असंवैधानिक होगा।यही बुनियादी वजह है कि वे संसद से बाहर बोल रहे हैं,संसद के बाहर उनके बोलने का कोई संवैधानिक मूल्य नहीं है।
जो खबरें सामने आई हैं वे ये हैं कि मोदीजी ने नोट बंदी के लिए सभी संवैधानिक नियमों और संस्थाओं को अमान्य या दरकिनार करके नोटबंदी का फैसला लिया है,वे मीडिया और सोशलमीडिया के जरिए आम जनता की राय को मेनीपुलेट करना चाहते हैं।यही वजह है कि आज उन्होंने एक एप के जरिए नोटबंदी से जुड़े 10 सवालों पर राय जानने की कोशिश की है,पीएम की ओर से जो दस सवाल नागरिकों से पूछे गए हैं,वे सवाल गलत हैं और उन सवालों को जिस क्रम से रखा गया है उनके उत्तर पहले से ही तय हैं।
कायदे से नोटबंदी को लेकर पहले सभी आधिकारिक सूचनाएं जनता को दी जाएं और फिर सवाल किए जाएं तो कुछ हद तक संतुलित राय मिलेगी।
मसलन् ,पहले जनता को यह बताया जाए कि नोटों पर पाबंदी लगाने का संवैधानिक अधिकार किस संस्था को है ,हमारे देश में अधिकतर लोग नहीं जानते,कम से कम पीएम को नोटबंदी के फैसले लेने का संवैधानिक हक नहीं है,यह रिजर्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में आता है।
दूसरी बात यह कि रिजर्व बैंक ने यह फैसला कब लिया ,क्या यह फैसला कुछ मिनटों या घंटों में लिया यदि हां तो इस तरह का गंभीर फैसला लेने के लिए बैंक के मुखिया पर किसने दवाब डाला,नोटबंदी का फैसला सबसे बड़ा फैसला है,यह हठात नहीं लिया जा सकता।यह ऐसा फैसला है जिससे देश का हर नागरिक प्रभावित हुआ है और परेशान है,उसके संवैधानिक हक पर इस फैसले के जरिए हमला बोला गया है,बेहतर यही होगा कि रिजर्व बैंक सभी तथ्यों को आम जनता के सामने रखे।जनता को नोट बंदी से जुड़े सभी तथ्यों की जानकारी देने के बाद ही पीएम को इस फैसले पर जनमत की राय लेनी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि मीडिया तक को नहीं मालूम कि किसने फैसला लिया और क्यों फैसला लिया,मीडिया एकतरफा ढ़ंग से नोटबंदी के पक्ष में प्रचार कर रहा है और उसी भाषा में प्रचार कर रहा है जिस भाषा में 8नवम्बर2016 को आठ बजे मोदीजी बोले थे।इस तरह नियोजित प्रचार और सूचनाओं के अभाव के आधार पर कोई भी जनमत की राय एकसिरे अवैज्ञानिक और निराधार ही कही जाएगी।सूचनाओं के पर्याप्त प्रचार-प्रसार के बाद ही जनमत की राय ली जानी चाहिए।
इस प्रसंग में दूसरी बात यह कि मोदीजी को हठात् जनमत के समर्थन की जरूरत क्यों है ? वे तो मानकर चल रहे हैं कि उनके साथ सारा देश खड़ा है,वे सही कर रहे हैं,जनता खुश है,बस जरा सी तकलीफ है,सब कुछ यदि पचास दिन तक ऐसे ही चलता रहा तो मोदीजी किला फतह कर लेंगे।
जनमत की राय का एप जारी करके मोदीजी ने यह साफ संकेत दे दिया है कि आम जनता और खासकर भाजपा के सांसदों-विधायकों में एक अच्छा-खासा हिस्सा उनके पक्ष में नहीं है,इसलिए उन पर दवाब पैदा करने के लिए मोदीजी ने एप के जरिए जनमत की राय का औजार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
दूसरा ,वे विपक्ष के खिलाफ प्रचार अभियान के अंग के रूप में इस एप को लेकर आए हैं,इसके सवालों में यह बात निहित है।
दिलचस्प बात यह है कि नोट बंदी पर रिजर्व बैंक के हक पर हमला बोला गया,संसद के हक पर हमला बोला गया,मीडिया-सोशलमीडिया के जरिए आम जनता के दिमाग पर हमले चल रहे हैं,अब एप के जरिए बमबर्षा की जाएगी।

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