मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

कर्णसिंह चौहान के बहाने उठे सवाल

        कल मैंने जब हिंदी के आलोचक कर्णसिंह चौहान को अंध मोदीभक्त की तरह मोदीजी की नोट नीति की हिमायत में फेसबुक पर पढा तो मैं सन्न रह गया।वे बेहतरीन व्यक्ति हैं,सुंदर समीक्षा लिखते हैं और उन्होंने बेहतरीन अनुवाद किए हैं।साहित्य के मर्मज्ञ हैं।लेकिन अर्थशास्त्र में वे एकदम शून्य हैं,वे हर चीज को पुराने माकपा कार्यकर्ता की तरह मात्र आस्था के आधार पर देख रहे थे,उनके लेखन से मन बहुत खराब हुआ,उनके चाहने वाले अनेक मित्रों ने उनके नोट नीति के समर्थन पर मुझे फोन पर उनके रूख पर हैरानी व्यक्त की।तब मैंने सोचा कि हमें समस्या की जड़ों में जाना चाहिए।यह मसला एक लेखक का नहीं है,बल्कि उससे कहीं गहरा है।
        भारत इस समय बहुत गंभीर संकट से गुजर रहा है।शिक्षितों का एक बड़ा वर्ग इस संकट को संकट ही नहीं मान रहा।संकट यह नहीं है कि बैंक में लाइन लगी है,एटीएम में पैसा नहीं है,संकट यह नहीं है कि किसान कर्ज में डूबा हुआ है और वे आत्महत्या कर रहे हैं, संकट यह है हम सबकी आँखों से यथार्थ रूप में ठोस मनुष्य और उसकी तकलीफें गायब हो गयी हैं।हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब मनुष्य गायब हो गया है।चीजें गायब हो गयी हैं। बौद्रिलार्द की मानें तो चुनौती यह है कि यथार्थ ही अदृश्य हो गया है।पहले समस्या यह थी कि साहित्य और मीडिया में कोई प्रवृत्ति आती और जाती थी,आंदोलन आते और जाते थे,राजनीतिक दल सत्ता में आते और जाते थे,लेकिन मनुष्य के यथार्थ पर हमारी पकड़ बनी हुई थी,हम ठोस रूप में मनुष्य को जानते थे,उसके दुखों को जानते थे,ठोस हकीकत के रूप में मनुष्य की समस्याओं पर बातें करते थे।लेकिन नव्य-आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद से समूचा पैराडाइम ही बदल गया है।यही वह दौर है जिसमें मनुष्य और उसका यथार्थ अदृश्य हुआ है।अब हर चीज,घटना,वस्तु, फिनोमिना आदि हठात् आ जा रहे हैं।हम देखरहे हैं लेकिन कुछ भी करने,हस्तक्षेप करने में असमर्थता महसूस करते हैं।

यथार्थ के अदृश्य हो जाने के कारण हमने यथार्थ पर बातें खूब की हैं,हत्याओं पर बातें खूब की हैं,लेकिन हत्या का यथार्थ हमने कभी महसूस नहीं किया,मसलन् 2002 के गुजरात के दंगों के बारे में जितना लिखा और बोला गया उतना तो संभवतःभारत-विभाजन के समय की विभीषिका पर भी नहीं बोला गया।इसके बावजूद दंगों के यथार्थ को हम पकड़ने में असमर्थ रहे।दंगे हुए,लोग मारे गए,लेकिन पीड़ितों का दर्द और त्रासदी गायब रही।यानी हम जब से वर्चुअल रियलिटी और इंटरनेट की दुनिया में दाखिल हुए हैं तब से यथार्थ का साक्षात अनुभव और उसकी विचारधारात्मक समझ गायब हुई है। सवाल यह है यथार्थ के अदृश्य हो जाने के पहले हमने यथार्थ को जानने की कितनी कोशिश की थी ॽ

यही हाल नोट नीति का है.आज नोट नीति के संकट को हम समझ नहीं पा रहे हैं और सरकार के इकतरफा प्रचार अभियान से सीधे प्रभावित हैं तो सबसे पहले तो यही सवाल उठता है हम बुद्धिजीवी नोट नीति लागू होने के पहले भारतीय अर्थव्यवस्था,कालेधन, आतंकवाद आदि के बारे में कितना जानते थे ॽ हिन्दी में बहुत छोटा अंश है जो इन समस्याओं के बारे में जानता है और उन समस्याओं का विश्लेषण करके लिखता रहा है। अधिकतर बुद्धिजीवियों में कॉमनसेंस से विचार विमर्श चलाने की प्रवृत्ति है।ऐसी स्थिति में यदि हिंदी का कोई लेखक-आलोचक-पत्रकार यदि नोट नीति का भक्त नजर आता है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।

मसलन् आप हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं उठाकर आसानी से देख सकते हैं कि हिंदी में अर्थशास्त्र के विषयों पर कितने हिंदी पत्रकार नियमित अखबारों में लिखते रहे हैं अथवा कितने हिंदी के आलोचक हैं जो साहित्यिक पत्रिकाओं या अपनी किताबों में अर्थशास्त्र के विषयों पर लिखते रहे हैं।यह ठोस हकीकत है अर्थशास्त्र के विषयों पर लिखने वाले समझदार किस्म के एक दर्जन बुद्धिजीवी भी हिंदी के पास नहीं हैं।ऐसी स्थिति में यदि किसी लेखक को नोट नीति में आशा की किरण नजर आए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

असल बात यह है कि यथार्थ के कारकों को जाने बिना यथार्थ पकड़ नहीं सकते.कल जब हिंदी के एक प्रतिष्ठित लेखक को मैं नोट नीति पर बलिहारी भाव-भंगिमा में फेसबुक पर लिखते देख रहा था तो मुझे उनकी स्थिति देखकर तकलीफ हो रही थी,मैं जानता हूँ कि उन्होंने अर्थशास्त्र को न तो पढा है और न कभी उस पर लिखा है,ऐसे में अर्थशास्त्र का सच वे कैसे बता सकते हैं ! वे तो अपनी चेतना के सबसे निचले धरातल पर खड़े होकर बातें कर रहे थे,उनकी भंगिमा अर्थशास्त्र के ज्ञान से नहीं मोदी की नोट नीति के प्रति आस्था से बनी थी।

नोट नीति से जुड़े अर्थशास्त्र के सवाल हैं,ये आस्था के सवाल नहीं हैं ,ये कॉमनसेंस के सवाल नहीं है,ये अर्थशास्त्र के गंभीर जटिल संबंधों और संश्लिष्ट प्रक्रिया से जुड़े सवाल हैं और इन सवालों पर हमें विशेषज्ञों की राय को पढ़ने और समझने की जरूरत है।

चूंकि हिंदी के बुद्धिजीवियों से हमारा संबंध ज्यादा है इसलिए हम यही कहना चाहते हैं कि कहानी या उपन्यास पर बात करने के लिए महज पाठक होना ही काफी नहीं है।यदि आलोचना करनी है तो आलोचकीय विवेक ,आलोचना के उपकरणों और आलोचना की विधागत परंपरा का ज्ञान होना भी जरूरी है।मात्र कृति पढ़कर पाठकीय अनुभव के आधार पर आलोचना विकसित नहीं हो सकती।



मसलन् ,किसी बड़े लेखक ने लिखा है इसलिए उसकी रचना अच्छी ही होगी,यह निष्कर्ष सही नहीं है।बड़े लेखक की रचनाएं भी कमजोर होती है,महज आस्था के आधार पर हम यह कहें कि प्रेमचंद या नागार्जुन की सभी रचनाएं क्लासिक हैं,तो गलत होगा।जिस तरह साहित्य में लेखक के प्रति आस्था के आधार पर रचना के बारे में मूल्य-निर्णय करना गलत है ठीक वैसे ही नोट नीति के बारे में मात्र मोदीजी के प्रति आस्था के आधार पर समर्थन देना ,नोट नीति के समर्थन में फतवे देना गलत है।

1 टिप्पणी:

  1. Karan Singh Chauhan Jagadishwar Chaturvedi बहुत बढ़िया जगदीश्वर जी, भारत के नए अर्थशास्त्री और यथार्थदर्शी का उदय हो रहा है । अब कुछ ना ही कहा जाय तो बेहतर अन्यथा आपकी तरह टेपी खुल जायगी । बस एक मेहरबानी आप लोग करें । जनता के जीवन, दुख-दर्द, आत्महत्याओं को सोहर की तरह गाना बंद करें और अपनी बात करें ।

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