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March, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मुगलों की पहली देन

संघ परिवार के लोग आए दिन मुगलों के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं और समसामयिक जीवन में हिन्दू मुसलमानों के बीच में वैमनस्य पैदा करने के लिए अतीत की बुराईयोंका खूब पारायण करते हैं। हमारा मानना है भारत में धर्मनिरपेक्ष वातावरण बनाने केलिए अतीत की सकारात्मक उपलब्धियों पर नजर रखें तो बेहतर होगा। मुगल शासन की भारतको दस बड़ी देन हैं। इनका जिक्र इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने किया है। मुगलशासन कीपहली बड़ी देन है ,'' बाहरी दुनिया केसाथ संबंध –स्थापन,भारतीय नौशक्ति का संगठन और समुद्रपार विदेशों में वाणिज्य।''
सरकार के अनुसार ''आठवीं शताब्दी मेंनवजाग्रत हिन्दूधर्म अपने घर को संभालने में लग गया । उसने हिन्दू समाज को नए रुपमें संगठित करके उसे अति कठिन बंधनों से जकड़ दिया,जिससे विदेशी का संपूर्णबहिष्कार हुआ और समाज के अंगों में नवीनता का संयोग या किसी प्रकार का परिवर्तन मात्र ही पाप और आचारभ्रष्टतासमझी जाने लगी। उस समय हिन्दू समय 'अचलायनी' बन गया,और उसके अपने देश की भौगोलिक परिधि के अंदर ही अपनी दृष्टि कोइस तरह आबद्ध करके रखा,मानो भारत के बाहर कोई देश ही नहीं है । ''


मुगल शासक और हिन्दू लेखक

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संघ परिवार के मुस्लिम विरोधी कुप्रचार ने देश का सबसे ज्यादा अहित किया है ,खासकर नयी युवा पीढ़ी के दिमाग में मुसलमानविरोधी कु-संस्कार पैदा किए हैं। इससे आधुनिक समाज के निर्माण की प्रक्रिया बाधित हुई है। मुगल शासकों ने बड़े पैमाने पर हिन्दी के कवियों को अपने शासन से मदद दिलवायी। मसलन् ,शहाबुद्दीन गोरी के यहां आश्रित कवि थे- केदार कवि । 
हुमायूं के यहां -क्षेम बंदीजन ।

सम्राट अकबर के आश्रित हिन्दी कवियों में प्रमुख हैं- गंग,नरहरि,करण,होल,ब्रह्म (बीरबल) अमृत,मनोहर,जगदीश,जोध,जयत,जगामग,कुम्हणदास ,टोडरमल,माधौ और श्रीपति आदि।

शाहजहां के यहां पंडितराज जगन्नाथ कविराज,हरिनाथ,कुलपति मिश्र, कवीन्द्र सुंदर, चिंतामणि,शिरोमणि ,दुलह,वेदांगराय,सुकवि बिहारीलाल आदि।

औरंगजेब के यहां -ईश्वर,इंद्रजीत त्रिपाठी ,मतिराम,कालिदास त्रिवेदी,कृष्णपंथी घनश्याम,जयदेव आदि।

मुसलमानों की देन है इतिहास रचना

इतिहास के  बिना मनुष्य बोगस नजर आता है। भारत में मुग़लों के आने के पहले इतिहास लेखन की परंपरा नहीं थी । आरएसएस के लोग मुसलमानों को बर्बर और हिन्दू विरोधी प्रचारित करने के चक्कर में यह भूल ही गए कि मुसलमानों के आने के बाद ही भारत में इतिहास लिखने की परंपरा का श्रीगणेश हुआ है। मुग़लों के आने के पहले हिन्दुओं में सांसारिक घटनाओं और दैनंदिन ज़िंदगी की घटनाओं का इतिहास लिखने की प्रवृत्ति नहीं थी। हिन्दुओं के लिए तो संसार माया था और माया का ब्यौरा कौन रखे ! मुसलमानों को इसका श्रेय जाता है कि हमने उनसे इतिहास लिखना सीखा। मुग़लों के आने के पहले हिन्दूसमाज में दैनंदिन जीवन में क्या घटा और कैसे घटा इसका हिसाब रखना समय का अपव्यय माना जाता था । यही वजह है कि मुग़लों के आने के पहले कभी किसी व्यक्ति ने इतिहास नहीं लिखा। कुछ राज प्रशस्तियाँ या अतिरंजित वर्णन जरुर मिलते हैं। उनमें तिथियों का कोई कालक्रम नहीं है। इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार उस दौर में काल -निरुपण ग्रंथ तो एकदम नहीं मिलते।      यदुनाथ सरकार ने लिखा है" अरब लोग पक्के व्यवहारवादी थे और प्रकृत-वस्तुओं पर सर्वदा सजग दृष्टि रखा कर…

बलात्कार को भूलो और माफ़ करो के नज़रिए से न देखो !

आज अख़बार से पता चला कि कोलकाता के पार्कस्ट्रीट बलात्कार कांड की पीड़िता की मृत्यु हो गयी , अफ़सोस है कि अपराधी मस्त हैं और पीड़िता चल बसी। यह न्याय और राज्य सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि बलात्कार तो बर्बरता है, औरत पर सामाजिक हमला है। वह कोई 
सामान्य घटना नहीं ।यह शारीरिक हिंसा है, बलात्कार इससे भी जघन्य शारीरिक -मानसिक हिंसाचार के साथ सामाजिक हत्या है।      सामान्य हिंसाचार जैसे चांटा मारने का प्रतिकार हो सकता है, बदले में चांटा मार सकते हैं,या सहन करके रह सकते हैं। चांटा मारना सामान्य उत्पीड़न है। फिर भी हिंसा है।निंदनीय है।सामान्य हिंसा या अपमान को एक अवधि के बाद औरत भूल सकती है ,लेकिन बलात्कार तो स्त्री की सामाजिक हत्या है। बलात्कार के बाद औरत मर जाती है। उसका मन , तन और सामाजिक परिवेश नष्ट हो जाता है।     हम याद करें द्रौपदी के अपमान को जिसके कारण उसने पांडवों से कह दिया था कि जाओ पहले मेरा अपमान करने वालों का वध करके आओ। मैं फिर में केश बाँधूँगी ।स्त्री का अपमान वह छोटे रुप में हो या बलात्कार जैसे बर्बर रुप में हो , उसे"भूलो और माफ़ करो ", के नज़रिए से न…

'हाय ईसाई-हाय ईसाई' !!

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संघ प्रमुख मोहन भागवत इन दिनों ''हाय ईसाई-हाय ईसाई'' के दर्द से पीड़ितहैं। उनके दर्द की दवा भारत के किसी धर्म में नहीं है । मोहन भागवत की खूबी यह हैकि वे निजीतौर पर ''हाय ईसाई'' की पीड़ा से परेशान नहीं है वे सांगठनिक तौर परपरेशान हैं !राजनीतिकतौर पर परेशान हैं ! ''हाय ईसाई'' धीमा बुखार है। जो भागवतियोंको बारह महिने रहता है ! कभी-कभी पारा कुछ ज्यादा चढ़ जाता है !  खासकर उस समय पारा ज्यादा चढ़ जाता है जब वेईसाईयों को गरीबों की सेवा करते देखते हैं ,स्कूल चलाते देखते हैं ।अस्पताल चलातेदेखते हैं। आम लोगों के घरों में ईसामसीह की तस्वीर देखते हैं।अथवा किसी ईसाई संत कोदेखते हैं ।       कोढ़ियों की सेवा या अति गरीबों की सेवा का कामसंघ भी कर सकता है उसे किसने रोका है, उन्होंने यह काम क्यों नहीं किया ?  बतर्जमोहन भागवत ,देस तो हिन्दुओं का है ! फिरदुखी-असहाय हिन्दुओं को ये संघी लोग मदद क्यों नहीं करते ?क्यों ईसाई मिशनरी के लोग ही यह कामकरते हैं ? क्याहमें लज्जा नहीं आती कि देश हमारा है और सेवा बाहर से आया धर्म और व्यक्ति कर रहेहैं । हमें हिन्दू…

गालियाँ और कु-संस्कृति

पुनरुत्थानवाद की खूबी है कि वह पुराने असभ्य सामाजिक रुपों ,भाषिक प्रयोगों ,आदतों या संस्कारों को बनाए रखता है।गालियां उनमें से एक हैं। पुनरुत्थानवाद के असर के कारण हिन्दीभाषी राज्यों में गालियां आज भी असभ्यता के बर्बर रुप के तौर पर बची हुई हैं और आम सम्प्रेषण का अंग हैं। हिन्दी में रैनेसां का शोर मचाने वाले नहीं जानते कि हिन्दी में रैनेसां असफल क्यों हुआ ? रैनेसां सफल रहता तो हिन्दी समाज गालियों का धडल्ले से प्रयोग नहीं करता। बांग्ला ,मराठी ,तमिल,गुजराती में रैनेसां हुआ था और वहां जीवन और साहित्य से गालियां गायब हो गयीं। लेकिन हिन्दी में गालियां फलफूल रही हैं। गालियां असभ्यता की सूचक हैं। जिस साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति का औजार गाली हो वह समाज पिछडा माना जाएगा। गालियां इस बात का संकेत हैं कि हमारे समाज में सभ्यता का विकास धीमी गति से हो रहा है। यथार्थ की भाषिक चमक यदि गाली के रास्ते होकर आती है तो यह सांस्कृतिक पतन की सूचना है। हिन्दी में अनेक लेखक हैं जो साहित्य में गालियों का प्रयोग करते हैं। अकविता से लेकर काशीनाथ सिंह तक के साहित्य में गालियां सम्मान पा रही हैं। गाली अभि…

किसान के हक में

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किसान का नाम आते ही राजनीति का रोमांस गायब हो जाता है। किसान के सवाल आते ही राजनीति की वर्गीयबुनाबट खुलने लगती है। लोकतंत्र के विभ्रम टूटने लगते हैं। किसानों का नंदीग्रामप्रतिवाद हाल के वर्षों का ऐसा आंदोलन रहा है जिसने मनमोहन सरकार को पुराना भूमिअधिग्रहण कानून बदलने के लिए मजबूर किया था। जबकि पुराने कानून के तहत सारे देशमें तकरीबन दस लाख एकड़ जमीन विभिन्न सरकारें किसानों से छीनकर कारपोरेट घरानों कोसौंप चुकी थीं। नंदीग्राम आंदोलन ने वाम राजनीति को शिखर से लेकर नीचे तक बुरी तरहक्षतिग्रस्त किया। उस आंदोलन के बाद मनमोहन सरकार ने नया भूमि अधिग्रहण कानूनबनाया था,जिसे पिछली संसद पास कर चुकी थी, नई मोदी सरकार को उसे लागू करना थालेकिन मोदी सरकार ने उसे लागू करने के पहले ही खत्म कर दिया और नया भूमि अधिग्रहणअध्यादेश जारी कर दिया,यह अध्यादेश क्या है इसके परिणाम क्या होंगे इस पर मीडियामें बहुत सार्थक और सटीक सामग्री और सूचनाएं आ रही हैं,यह किसानों के  पक्ष में मीडिया की सकारात्मक भूमिका को सामनेलाता है। इस कानून के खिलाफ बृहत्तर राष्ट्रीय एकता भी बनती नजर आ रही है। जरुरतहै इस कानून के खिला…

नागरिक की तलाश में

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सामान्य तौर पर हर प्रोफेसर अपने को विद्वान कहलाना पसंद करता है, लेखक कहलाना पसंद करता है। लेकिन मैं शुरु से विद्वान और लेखक के भावबोध से चिढ़ता रहा हूँ।मेरे अंदर न तो लेखक के गुण हैं और न विद्वान के लक्षण हैं। मुझे अधिकतर लेखक -प्रोफेसर लेखक अहंकारी, खोखले , गैर-ज़िम्मेदार और धूर्त प्रतीत होते हैं। मैं अपने जीवन में कभी न तो विद्वान बन पाया और न मेरी विद्वान बनने की आकांक्षा रही, यही हालत लेखक मन की भी रही है। मैंने अधिकतर प्रोफ़ेसरों को विद्वत्ता के आडंबर में लिपटे देखा है और उनके जीवन पर चालाकियों और धूर्तताओं का जो रंग चढ़ा देखा है उसने मुझे यह महसूस करने के लिए मजबूर किया है कि मैं कम से कम न तो विद्वान हूँ और न लेखक हूँ। मुझे यह देखकर दुख होता है कि हमने प्रोफेसर विद्वानों की ऐसी पीढ़ी तैयार की जो झूठ और अनपढता के मामले में अव्वल है। इनकी विशेषता है कम से कम पढ़ना और बड़ी बड़ी हाँकना, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक बातें और आचरण करना । मेरे परिचित अधिकांश हिन्दी प्रोफेसर न तो कभी समय पर कक्षा में जाते हैं और न पूरा समय कक्षा में रहते हैं, यहाँ तक कि ये लोग सारी ज़िंदगी न्यूनतम कि…

कुलदीप कुमार की षष्ठीपूर्ति पर विशेष-सर्जनात्मकता के साठ साल

सभ्यता के संस्कार अर्जित करना और उनको जीवन में सर्जनात्मक ढंग से ढालना सबसे मुश्किल काम है। मेरे जिन मित्रों ने सभ्यता और संस्कृति के वैविध्यपूर्ण श्रेष्ठतम मानकों को अपने दैनंदिन जीवन में विकसित किया है उनमें कुलदीप कुमार अद्वितीय है। वह बेहतरीन इंसान होने के साथ बहुत ही अच्छा मित्र भी है। मित्रता ,ईमानदारी, मिलनसारिता,सभ्यता और बेबाक लेखन को उसने जिस परिश्रम और साधना के साथ विकसित किया है वह हम सबके लिए प्रेरणा की चीज है।
कुलदीप से मेरी सन् 1979 में पहलीबार जेएनयू में दाख़िले के बाद मुलाक़ात हुई। संयोग की बात है कि कुलदीप की पत्नी और प्रसिद्ध स्त्रीवादी विदुषी इंदु अग्निहोत्री भी तब से मेरी गहरी आंतरिक मित्र हैं। कुलदीप के स्वभाव में स्वाभिमान कूट -कूटकर भरा है। मध्यवर्गीय दुर्गुणों -जैसे -सत्ताधारियों के बीच जी -जी करके रहना, जी -जी करके दोस्ती गाँठना , नेताओं और सैलीब्रिटी लोगों की चमचागिरी करना , गुरुजनों की चमचागिरी करना , संपादक की ख़ुशामद करना, हर बात में कमर झुकाकर बातें करना, मातहत भाव में रहना आदि , दुर्गुणों से कुलदीप का व्यक्तित्व एकदम मुक्त है। उसके व्यक्तित्व में ईमानदा…

'स्त्री असभ्यता' हमारी चिंता में क्यों नहीं है !

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औरत सभ्य होती है,लेकिन औरत के अंदर अनेक ऐसी आदतें,परंपराएं और मूल्य हैं जो उसे असभ्यता के दायरे में धकेलते हैं। औरत को संयम और सही नजरिए से स्त्री के असभ्य रुपों को निशाना बनाना चाहिए। असभ्य आयाम का एक पहलू है देवीभाव ।  औरत को देवीभाव में रखकर देखने की बजाय मनुष्य के रुप में,स्त्री के रुप में देखें तो बेहतर होगा । औरत में असभ्यता कब जाग जाए यह कहना मुश्किल है लेकिन असभ्यता के अनेक रुप दर्ज किए गए हैं। खासकर औरत के असभ्य रुपों की स्त्रीवादी विचारकों ने खुलकर चर्चा की है। हमें भारतीय समाज के संदर्भ में और खासकर हिन्दू औरतों के संदर्भ में उन  क्षेत्रों में दाखिल होना चाहिए जहां पर औरत के असभ्य रुप नजर आते हैं।        औरत की असभ्य संस्कृति के निर्माण में पुंसवाद की निर्णायक भूमिका है। इसके अलावा स्वयं औरत की अचेतनता भी इसका बहुत बड़ा कारक है। मसलन्, जब कोई लड़की शिक्षित होकर भी दहेज के साथ शादी करती है , दहेज के खिलाफ प्रतिवाद नहीं करती तो वह असभ्यता को बढ़ावा देती है।हमने सभ्यता के विकास को शिक्षा,नौकरी आदि से जोड़कर इस तरह का स्टीरियोटाइप विकसित किया है कि उससे औरत के सभ्यता के मार्ग का…