रविवार, 8 मार्च 2015

नागरिक की तलाश में

    सामान्य तौर पर हर प्रोफेसर अपने को विद्वान कहलाना पसंद करता है, लेखक कहलाना पसंद करता है। लेकिन मैं शुरु से विद्वान और लेखक के भावबोध से चिढ़ता रहा हूँ।मेरे अंदर न तो लेखक के गुण हैं और न विद्वान के लक्षण हैं। मुझे अधिकतर लेखक -प्रोफेसर लेखक अहंकारी, खोखले , गैर-ज़िम्मेदार और धूर्त प्रतीत होते हैं। मैं अपने जीवन में कभी न तो विद्वान बन पाया और न मेरी विद्वान बनने की आकांक्षा रही, यही हालत लेखक मन की भी रही है। मैंने अधिकतर प्रोफ़ेसरों को विद्वत्ता के आडंबर में लिपटे देखा है और उनके जीवन पर चालाकियों और धूर्तताओं का जो रंग चढ़ा देखा है उसने मुझे यह महसूस करने के लिए मजबूर किया है कि मैं कम से कम न तो विद्वान हूँ और न लेखक हूँ। मुझे यह देखकर दुख होता है कि हमने प्रोफेसर विद्वानों की ऐसी पीढ़ी तैयार की जो झूठ और अनपढता के मामले में अव्वल है। इनकी विशेषता है कम से कम पढ़ना और बड़ी बड़ी हाँकना, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक बातें और आचरण करना । 

मेरे परिचित अधिकांश हिन्दी प्रोफेसर न तो कभी समय पर कक्षा में जाते हैं और न पूरा समय कक्षा में रहते हैं, यहाँ तक कि ये लोग सारी ज़िंदगी न्यूनतम किताबें तक नहीं पढ़ते ।
ये लोग जश्न, मंच,उत्सव, संगोष्ठी में जीना पसंद करते हैं लेकिन कभी कुछ भी न तो नया बोलते हैं और नहीं कभी नए विचार पर सुसंगत लिखते हैं, लेकिन विद्वत्ता की हेकड़ी में रहते हैं। वे नागरिक की तरह आचरण नहीं करते । उनमें न तो नागरिक जैसी सभ्यता है और ना ही नागरिकबोध ही है। ऐसी अवस्था में उनकी सारी भाव-भंगिमाएँ घिन पैदा करती हैं। मैं सोचता हूँ कि जो प्रोफेसर -लेखक आए दिन कबीरदास-तुलसीदास -प्रेमचंद के उद्धरण सुनाते रहते हैं वे कभी सामान्य तौर पर भारत के संविधान की बातें और उद्धरण क्यों नहीं सुनाते ? जिस लेखक में संविधानचेतना और नागरिकचेतना पैदा नहीं हुई है मैं उसे शिक्षित मानने को तैयार नहीं हूँ। लोकतंत्र में मुझे लोकतांत्रिक नागरिक चाहिए , विद्वान-प्रोफेसर-लेखक नहीं।

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