गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

मानवाधिकार उल्लंघन का चरम है फिलीस्तीन जनता के कष्ट




आज मानवाधिकार दिवस है और किसी का ध्यान फिलीस्तीनी जनता की तरफ नहीं है। फिलीस्तीनी जनता अकल्पनीय कष्ट में है। फिलीस्तीन समस्या का निकट में समाधान नजर नहीं आ रहा। यह समस्या समझ से परे होती जा रही है। मीडिया इस समस्या के बारे में सूचना कम और भ्रम ज्यादा पेश कर रहा है। सवाल उठता है आखिरकार अमरीका-इजरायल गठबंधन इस इलाके की जनता के साथ क्या करना चाहता है। यह भी सवाल उठता है साम्राज्यवाद विरोधी युध्द अंत में बिखर क्यों जाता है ? स्वाधीनता संग्राम अपने चरमोत्कर्ष पर जाकर बिखराव और विभाजन का शिकार क्यों हो जाता है ? फिलीस्तीन नागरिकों ने अकल्पनीय कष्ट उठाए हैं, हजारों लोगों को कुर्बानी दी है। हजारों फिलीस्तीन अभी भी इजरायली जेलों में बंद हैं। चालीस लाख से ज्यादा फिलीस्तीन नागरिक शरणार्थी के रूप में अपने देश से बाहर शरण लिए हुए हैं।  
    फिलीस्तीनियों ने कोई अपराध नहीं किया,उन्होंने अपने देश की मांग की थी। उनका देश था किंतु वह उन्हें नहीं मिला। उनके साथ सारी दुनिया के देशों ने एकजुटता दिखाई,सिर्फ अमरीका और इजरायल को छोड़कर। संयुक्तराष्ट्रसंघ से लेकर सुरक्षापरिषद तक दुनिया के प्रत्येक मंच पर उन्हें राष्ट्र के रूप में स्वीकृति मिली किंतु इजरायल-अमरीका ने उस सबको मानने से मना कर दिया। 


    धीरे-धीरे फिलीस्तीन जनता के संग्राम को अंदर से नष्ट और भ्रष्ट करने की कोशिशें की गईं। गुटबाजी पैदा की गई ,प्रशासनिक अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार का तंत्र खड़ा किया गया और अंत में आज स्थिति है कि उनका आपसी कलह सड़कों पर आ गया है। यासिर अराफात के जीते जी यह आंतरिक कलह और भ्रष्टाचार फिलीस्तीनी मुक्ति मोर्चे में आ गया था। फर्क सिर्फ इतना था कि विभिन्न फिलीस्तीन गुट उनका बेहद सम्मान करते थे अत: आंतरिक कलह पर समय रहते काबू पाने में उन्हें सफलता मिल जाती थी, किंतु यासिर अराफात के मरने के बाद से स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन आया है। 


   फतह गुट का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथों आ गया जिनका अमरीका-इजरायल की नीतियों के प्रति नरम रुख था। इसका हम्मास ने फायदा उठाया और अपनी राजनीतिक आक्रामकता बढ़ा दी। आज हम्मास को फिलीस्तीन की अधिकांश जनता का समर्थन हासिल है। अधिकांश फिलीस्तीन इलाकों में उसका वर्चस्व भी है। यह चीज एक बात का संकेत है कि जनता अभी भी इजरायल-अमरीका के प्रति नरम रुख करने के लिए तैयार नहीं है चाहे उसे जितनी बड़ी कुर्बानी देनी पड़े। फतह गुट का जनाधार सिकुड़ता जा रहा है। जबकि यासिर अराफात के जमाने में फतह गुट का अधिकांश फिलीस्तीन इलाकों में वर्चस्व था। इसका अर्थ यह भी है फतह गुट की नरम और समझौतापरस्त नीति को जनता ने पूरी तरह ठुकरा दिया है।
        आज हम्मास और फतह के बीच खूनी लड़ाईयां हो रही हैं। इलाका दखल की राजनीति हो रही है। जो हथियार इजरायली कब्जे से मुक्ति के लिए उठे थे वे ही हथियार अब अपने ही लोगों पर उठ रहे हैं। फिलीस्तीन की आपसी कलह इजरायल-अमरीका की सबसे बड़ी विजय है। अब इस आंतरिक कलह को वे एक कदम आगे ले जाना चाहते हैं और फिलीस्तीन इलाकों का विभाजन करना चाहते हैं।


      कल तक फिलीस्तीन में इजरायल-अमरीका से घृणा करने वाले संगठन हुआ करते थे। किंतु आज उनके हमदर्द और हिमायती संगठन पैदा हो गए हैं, फिलीस्तीन के जो संगठन अंदर से इजरायल-अमरीका से नफरत करते थे आज उनके साथ खड़े हैं। यह एक ऐसा विपर्यय है जिसकी मिसाल सारी दुनिया के राजनीतिक इतिहास में नहीं मिलेगी। फिलीस्तीन अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता और जमीन वापस हासिल करने के पहले ही विभाजित हो गए हैं। यह विभाजन अचानक पैदा नहीं हुआ है। पहले भी यह विभाजन था किंतु संघर्ष के केन्द्र में मुक्तिसंग्राम था। आज केन्द्र में आपसी संघर्ष है।
    
       फिलीस्तीन की सामयिक सच्चाई यह है कि अभी तक इजरायल ने फिलीस्तीन की जमीन से अपने अवैध कब्जे नहीं हटाए हैं। अवैध रूप से बसायी पुनर्वास बस्तियों को नहीं हटाया  है । कुछ बस्तियों को कुछ समय पहले प्रतीकात्मक तौर पर खाली कराया गया था किंतु असल में सभी अवैध पुनर्वास बस्तियां ज्यों की त्यों बसी हुई हैं। हाल ही में घोषणा की है कि वेस्ट बैंक में बसायी गयी अवैध 149 बस्तियों को इजरायल नहीं हटाएगा। इसका अर्थ है कि फिलीस्तीनियों को स्थायी तौर पर विभाजन और घृणा में जीना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवीय कार्यकलाप संयोजन दफतर के मुताबिक अभी वेस्ट बैंक में इस समय 651 निगरानी चौकियां हैं।इन निगरानी चौकियों के जरिए फिलीस्तीनियों की चैकिंग होती है।  जबकि अवैध बस्तियों के इलाकों में मात्र आठ निगरानी चौकियां हैं।
     
    निगरानी चौकियों के बहाने फिलीस्तीनियों को दैनन्दिन जीवन में अकथनीय तकलीफों का सामना करना पड़ता है।  उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर समूची अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गयी है। आश्चर्य की बात है  जो फिलीस्तीनी नागरिक अपने वतन आना चाहते हैं उन्हें इजरायल आने नहीं देता और इसके बदले में फिलीस्तीनियों की जमीन पर अवैध ढ़ंग से यहूदियों को बाहर से लाकर बसाया जा रहा है। ऐसा करके स्थायी तौर पर वह फिलीस्तीन को पूरी तरह नष्ट करके उसका अंत ही कर देने पर आमादा है।  


    फिलीस्तीनियों पर एक तरफ हमले हो रहे हैं दूसरी ओर उन्हें बेदखल करके उनकी जमीन हथियाकर अवैध ढंग से यहूदी बस्तियां बसायी जा रही हैं। अवैध यहूदी बस्तियां सिर्फ बस्तियां ही नहीं हैं बल्कि इन्हें फिलीस्तीनी बस्तियों से अलग काटकर बसाया जा रहा है। उनकी बस्तियों से अलग इन्हें दीवार बनाकर किले की तरह बसाया जा रहा है। यह एक तरह का स्थायी विभाजन है जिसे फिलीस्तीन की सरजमीं पर थोपा जा रहा है।
      
    फिलीस्तीन-इजरायल विवाद का निष्कर्ष यह है कि साम्राज्यवाद के लिए शांति बेकार की चीज है। शांति बोगस है। खोखली है। शांति का जाप करना बेकार है। शांतिवार्ताएं व्यर्थ हैं। कब्जा सच्चा शांति झूठी। इजरायल-अमरीकी विदेशनीति सारी दुनिया को एक ही संदेश संप्रेषित कर रही है शांति के एजेण्डे को साम्राज्यवाद ने त्याग दिया है। अब उसकी शांति में कोई दिलचस्पी नहीं है। अमरीकी विदेशनीति की सैन्य बर्बरता की जितनी बड़ी सच्चाई मध्यपूर्व में सामने आयी है वह अन्यत्र पहले देखने को नहीं मिली। असल में अमरीका ने इजरायल से सीखा है।
     


     इजरायल लगातार अपने विस्तारवादी इरादों के साथ फिलीस्तीन पर हमले करता रहा है, उनकी जमीन पर कब्जे करता रहा है। यही नीति है जिसे अमरीका ने इराक में लागू किया। इजरायल ने फिलीस्तीन पर हमले करते हुए किसी की नहीं मानी अमरीका ने भी इराक पर हमला करते समय किसी की नहीं मानी। इजरायल को फिलीस्तीन का राजनीतिक समाधान स्वीकार नहीं है अमरीका को भी इराक का राजनीतिक समाधान स्वीकार नहीं है। इजरायल के लिए समस्त समझौते और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रस्ताव बेमानी हैं यही स्थिति अमरीका की भी है। इजरायली अधिकारी शांति के नाम पर कभी कभार मिलते हैं, हाथ मिलाते हैं, बयान देते हैं किंतु व्यवहार में एकदम उलटा करते हैं और भी ज्यादा बर्बर हमले और अत्याचार करते हैं। यही रास्ता अमरीका ने भी अपना लिया है।
    
    मध्यपूर्व का नीतिगत पथप्रदर्शक पहले अमरीका था आज इजरायल है। पहले अमरीका के रास्ते पर इजरायल चलता था आज इजरायल के रास्ते पर अमरीका चल रहा है। इजरायल अकेला देश है जिसने सारी दुनिया में शांति को निरर्थक बना दिया है। 


    हर बार मीडिया बताता है कि 'शांतिवार्ता शुरू हुई' और तुरंत ही एक-दो दिन के बाद रिपोर्ट करता है  'शांतिवार्ता में गतिरोध' आ गया, यदि कभी 'शांतिवार्ता' सफल हो जाती है तो समझौता कभी लागू नहीं होता ,इसके विपरीत लगातार यही देखा गया है  इजरायल ने हमले तेज कर दिए, अवैध पुनर्वास बस्तियों के निर्माण का काम तेज कर दिया। 


    शांति समझौते को लागू करने के पहले ही इजरायल किसी न किसी बहाने हिंसाचार को हवा देकर शांति समझौते से पीछे हट जाता है। किसी भी छोटी सी घटना को बहाना बनाकर शांति समझौते का उल्लंघन करने लगता है। मजेदार बात यह है कि प्रत्येकबार शांतिवार्ता में शामिल सभी पक्ष यही वायदा करते हैं कि 'फिलीस्तीन राष्ट्र का निर्माण' उनका लक्ष्य है और व्यवहार में इसका वे एकसिरे से पालन नहीं करते। फिलीस्तीन राष्ट्र उनके लिए सिर्फ वाचिक प्रतिज्ञा होकर रह गया है।
     इजरायल-अमरीका की बुनियादी समस्या यह है वे दोनों फिलीस्तीन के यथार्थ को जानबूझकर समझना नहीं चाहते, फिलीस्तीन के राजनीतिक समीकरणों को समझना नहीं चाहते। इजरायल-अमरीका जानबूझकर फिलीस्तीन समस्या को बरकरार रखना चाहते हैं। जिससे मध्यपूर्व में अशांति बनी रहे,सैन्य हस्तक्षेप के बहाने बने रहें। सारी दुनिया में आर्थिक संकट बना रहे। 


     फिलीस्तीन संकट सिर्फ फिलीस्तीनियों का संकट नहीं है। आज यह सारी दुनिया के लिए समस्या बन चुका है। फिलीस्तीन का प्रपंच सिर्फ फिलीस्तीनियों की आत्मनिर्भरता और अर्थव्यवस्था पर ही दुष्प्रभाव नहीं डाल रहा बल्कि इसके कारण सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था जर्जर हो गयी है। इस क्रम में सिर्फ सैन्य-मीडिया उद्योग के बल्ले-बल्ले हुए हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अमरीकी वर्चस्व में इजाफा हुआ है। फिलीस्तीनियों की अपने वतन से बेदखली सारी मानवता को परेशान किए हुए है। दुख की बात यह है कि फिलीस्तीनियों के दुख और त्रासदी की ओर से हमने धीरे-धीरे आंखें बंद कर ली हैं। वहां पर जो युध्द चल रहा है उसके प्रति संवेदनहीन हो गए हैं।
      
    बुध्दिजीवियों और सचेतन नागरिकों के मन से फिलीस्तीन की त्रासदी का लोप इस बात का भी संकेत है कि हम कितने बेगाने,खुदगर्ज और गुलाम हो गए हैं कि हमें अपने सिवा कुछ और दिखाई ही नहीं देता। अपने हितों के अलावा कुछ भी सोचने के लिए तैयार ही नहीं हैं। यह एक तरह से स्वयं की सचतेन आत्मा का लोप है। 


     जब सचेतन आत्मा का लोप हो जाता है तो मानवता के ऊपर संकट का पहाड़ टूट पड़ता है। वर्चस्वशाली ताकतें इसी अवस्था का इंतजार करती हैं और अपने हमले तेज कर देती हैं। सचेतनता और अन्य के प्रति सामाजिक प्रतिबध्दता नागरिक होने की पहली शर्त है। लेकिन फिलीस्तीनियों की मुश्किल तो यही है उन्हें न तो अपना देश मिला और न उसकी नागरिकता ही मिली,आज वे जहां रह रहे हैं ,कहने को वहां पर फिलीस्तीन सरकार है, उसका राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री है,मंत्रीमंडल है। निचले स्तर तक स्वायत्त प्रशासन है,चुनी गयी सरकार है। किंतु इसके ऊपर इजरायल-अमरीका का पहरा बैठा हुआ है।


      फिलीस्तीन की जमीन पर अभी भी फिलीस्तीनियों की नहीं इजरायलियों की चलती है। इजरायल ने अभी तक फिलीस्तीन की जमीन को खाली नहीं किया है। जिन इलाकों में फिलीस्तीन प्रशासन है वहां पर भी इजरायल का ही व्यवहार में वर्चस्व है। कभी भी इन इलाकों में घुसकर इजरायल हमले कर जाता है। सारे इलाके की नाकेबंदी की हुई है। फिलीस्तीन में वही आ जा सकता है जिसे इजरायल अनुमति दे। आर्थिक -राजनीतिक तौर पर फिलीस्तीन प्रशासन के पास कोई अधिकार नहीं हैं।
    


     इजरायल अपने अवैध कब्जे को फिलीस्तीन हिंसा के बहाने वैध ठहराने की कोशिश करता रहा है। फिलीस्तीन शासित इलाकों में बार-बार इजरायल के द्वारा किए गए हमलों को हिंसा के प्रत्युत्तार में की गई कार्रवाई कहा गया जबकि सच यह है  इजरायल ने फिलीस्तीनियों की जमीन पर वर्षों से अवैध कब्जा किया हुआ है। 


     फिलीस्तीन प्रशासन को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।  अब कोई फिलीस्तीन के लिए शांति लाने वाला कैम्प नहीं है। इजरायल बार-बार यही कह रहा है वह तो शांति चाहता है किंतु फिलीस्तीन ही हैं जो आतंकी हमले कर रहे हैं, बच्चों की हत्याएं कर रहे हैं। प्रौपेगैण्डा की यह पुरानी शैली है जिसके तहत इजरायल को फिलीस्तीन के द्वारा उत्पीडित चित्रित किया जाता है। इजरायल तो शांति चाहता है। वह चाहता है  फिलीस्तीन इस बात को समझें उसके धैर्य और उदारता को समझें। इजरायली प्रचारक बार-बार फिलीस्तीनी हिंसा की बात करते हैं किंतु एक बार भी अवैध कब्जे का जिक्र नहीं करते।
       
    इजरायली कब्जे के कारण लाखों फिलीस्तीनियों को सामूहिक तौर पर उत्पीड़ित और दण्डित किया जा रहा है। 53 वर्ष से इजरायल ने फिलीस्तीन के रास्ते घेरे हुए हैं। हवाई बमबारी होती रहती है। लाखों फिलीस्तीन शरणार्थी शिविरों में असहनीय जिन्दगी जी रहे हैं। उनके पास न्यूनतम सुविधाएं तक नहीं हैं।  जिन लोगों के घर-द्वार,संपत्ति की इजरायली हमलों में तबाही हुई है उन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं दी जा रही। राज्य उनके प्रति संवेदनहीन हो गया है। 
    
     फिलीस्तीन सन्1967 से लगातार सैन्य प्रशासन में जी रहे हैं। इजरायली सेना ने उनकी जमीन पर कब्जा किया हुआ है और यही असल में हिंसा का स्रोत है। जब तक फिलीस्तीन की जमीन पर इजरायल का कब्जा बना हुआ है तब तक इस इलाके में शांति के लौटने की कोई संभावना नहीं है। टैंकों के जरिए कब्जा, सैनिकों के द्वारा नाकेबंदी, अवैध पुनर्वास बस्तियों का निर्माण आदि हिंसा है। यह फिलीस्तीनियों के धैर्य की तुलना में सबसे भयानक हिंसा है। दुनिया के 99 फीसदी लोग जो अखबार पढ़ते हैं,टीवी खबरें देखते हैं ,वे एकदम भूल चुके हैं कि इजरायल ने विगत  सालों से फिलीस्तीनियों की जमीन पर कब्जा किया हुआ है। इसलिए उन्हें इस कब्जे के बारे में बार-बार बताना होगा। यह मुश्किल काम नहीं है बल्कि बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण काम है।




      इस उत्पीड़न की तुलना में फिलीस्तीनियों का प्रतिरोध प्रतीकात्मक और सीमित है। आज प्रत्येक फिलीस्तीन बंदी है। गाजा को बिजली के तारों के द्वारा तीन ओर से घेरा हुआ है। वहां पर लोग पशुओं की तरह बंदी हैं। गाजा से कोई आ जा नहीं सकता। कोई काम नहीं कर सकता,अपने साग-सब्जी-फल आदि बिक्री नहीं कर सकता,बच्चे स्कूल नहीं जा सकते। वे लोग इजरायली बमबर्षक विमानों और हेलीकोप्टरों के सामने खुले पड़े हैं, कभी भी उन पर गोलाबारी शुरू हो जाती है। टैंक और मशीनगनों से हमले शुरू हो जाते हैं।
      
    अभाव और अकाल में गाजा के लोग मर रहे हैं। गाजा में लोग कालरात्रि में जी रहे हैं। इन लोगों को किसी भी किस्म की मेडीकल सुविधा उपलब्ध नहीं है। यह सुनियोजित सामूहिक दण्ड है। इस समूची प्रक्रिया में फिलीस्तीन की भाषा में आशा पदबंध गायब हो गया है।


  इजरायल का लक्ष्य है  फिलीस्तीनियों को तब तक उत्पीडित करो,मारो,वंचित करो जब तक  वे पूरी तरह टूट नहीं जाते। अब उनके पास अपनी रक्षा के लिए कुछ भी नहीं बचा है अब वे रक्षाविहीन फिलीस्तीन नागरिकों का दुरूपयोग कर रहे हैं। आज फिलीस्तीनियों के पास कोई सेना नहीं है, टैंक नहीं है,गोला-बारूद नहीं है,कोई सैनिक नहीं है, फिलीस्तीनियों का कहीं पर भी कब्जा नहीं है, उनकी कोई सरकार भी नहीं है जो उनके लिए बोले। 


   फिलीस्तीनियों की तरफ से कोई भी प्रभावी प्रतिवाद अभी नहीं हो पा रहा। फिलीस्तीनी स्कूल,कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद हैं, वे अभी भी पश्चिमी विद्वानों की तरह लिखने की स्वतंत्रता का इंतजार कर रहे हैं। अमरीका में बैठे लोग जिस अकादमिक स्वतंत्रता में बैठे हुए आत्मघाती हिंसा की निंदा कर रहे हैं वे बताएं कि क्या उन्होंने कभी फिलीस्तीनियों की अकादमिक स्वतंत्रता के लिए आवाज बुलंद की ? क्या फिलीस्तीनियों को ज्ञान हासिल करने, पढ़ने और स्कूल जाने का अधिकार नहीं है ? इजरायल अथवा पश्चिम जगत के अकादमीशियन इस मामले में आवाज बुलंद क्यों नहीं करते।
    
     फिलीस्तीनियों को हम धीरे-धीरे मरने दे रहे हैं।जिससे इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इसके लिए बताया जा रहा है कि इजरायल विशेष असुरक्षा में फंस गया है और सारी दुनिया की उसके प्रति सहानुभूति होनी चाहिए।


    इसके विपरीत फिलीस्तीन अनाथों,बूढ़ी बीमार औरतों,वंचित समुदाय, पीड़ित बंदियों की आवाज को कोई सुनने वाला नहीं है, उनके कष्टों को किसी ने लिपिबध्द नहीं किया है। निस्संदेह,हम बताएंगे, यह भयानक भय परपीड़क आनंद से भी ज्यादा लक्ष्यपूर्ति कर रहा है।  इस हिंसा को बंद होना चाहिए।  इस हिंसा में सिर्फ एक ही पक्ष है, दो नहीं। एक के पास सेना है देश है। दूसरा पक्ष राज्यविहीन,विस्थापित जनसंख्या वाला है। इसके पास कोई अधिकार नहीं हैं। वह इन अधिकारों को हासिल भी नहीं कर सकते। उनके पास सिर्फ कष्टों की भाषा है और उनके दैनन्दिन जीवन का अपहरण किया जा चुका है।  इसके बावजूद इजरायली नीति असफल होगी। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. दुखद, शर्मनाक। लेकिन हम इसी दुनिया में रहते हैं बिना किसी परेशानी के। बेशक उनके दैनन्दिन जीवन का अपहरण किया जा चुका है, लेकिन इससे दुनिया रुक तो नहीं जा रही...सब चल रहा है, यहां तक कि शांति का नोबेल भी लेने और देने में देर नहीं हो रही। पूरा लेख पढ़कर मन अवसाद में घिरा लेकिन अंतिम पंक्ति पढ़कर एक उम्‍मीद फिर जागी कि इसके बावजूद इजरायली नीति असफल होगी।
    बढिया पोस्‍ट।

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  2. यदि अमेरिका चाहे तो यह स्थिति हल हो सकती है पर लगता है कि वहां की यहूदी लाबी इतनी सशक्त है कि सरकार भी फ़लिस्तीन की समस्या हल करने में असमर्थ दिखाई देती है॥

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