शनिवार, 20 मार्च 2010

धर्म से ज्यादा सुरक्षित है फैशन में समाज



     लोकवादी संस्कृति फैशन की जननी है। फैशन की भाषा सामाजिक हैसियत की भाषा है। फैशन ने व्यक्ति को बेझिझक, औपचारिक और संशयहीन बनाया, जीवन में खुलेपन को बढ़ाया। फैशन सजावट या पहनावा या शैली मात्र न होकर 'एटीटयूड' है, दृष्टिकोण है, विचार है। मनुष्य के भावों को संयमित, नियमित और अभिव्यक्त करने का माध्यम है। आत्माभिव्यक्ति के बहाने सामाजिक हैसियत, वर्गीय अवस्था और जीवन की प्रतिस्पर्धा को व्यक्त करने का चैनल है। जीवन के विविध मायावी रूपों की जननी होने के साथ धार्मिक रूढ़ियों और बंधनों के खिलाफ हस्तक्षेप है। यह प्रभुत्वशाली वर्ग की माया है। आस्कर वाइल्ड के शब्दों में कहें तो 'फैशन ने व्यक्ति को जो सुरक्षा दी है वह धर्म कभी नहीं दे सकता।' यानी फैशन सामाजिक सुरक्षा का कवच है। यह सामाजिक संवृत्ति है।
फैशन के पर्याय के रूप में पहनावे को देखने की परंपरा बड़ी पुरानी है। यह फैशन के विकास का सबसे पुराना तत्व है। पहनावा हमें पर्यावरण से सुरक्षा दिलाने का उपकरण भी है। नंगे और वस्त्रहीन समाज में फैशन की संवृत्ति की जबर्दस्त भूमिका हो सकती है।
आरंभ में फैशन का संबंध पहनावे से था, कालांतर में कामुकता से संबंध बना। यह एकदम नया क्षेत्र था। जे.सी. फ्लीगल ने 'वस्त्र का मनोविज्ञान' (1930) शीर्षक निबंध में लिखा कि ‘पहनावे के प्रति हमारा दृष्टिकोण शुरू से ही अस्थिर रहा है। हम ड्रेस की पूजा करते रहे हैं, उसे सम्मान का दर्जा देते रहे हैं। ड्रेस की पूजा और सम्मान के भाव-
बोध के बीच अंतर्विरोध रहे हैं। ड्रेस इन दोनों के बीच संतुलन का काम करता है। यह सदा से उदारता का समर्थक रहा है। 'पूजा' और 'सम्मान' के भावबोध का आधार है कामुक इच्छाएं।’’
    कामुक इच्छाओं को ड्रेस का एकमात्र आधार नहीं मानना चाहिए, इससे फैशन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण बनाने में मदद नहीं मिलती। फैशन वस्तुत: सामाजिक संस्थान है जो मनुष्य की इमेज बनाता है और बिगाड़ता है। यह सार्वभौम संवृत्ति है। समग्रता में मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करना इसका मूलमंत्र है। फैशन के विकास में कला एवं संस्कृति आंदोलनों की गहरी भूमिका रही है। भारत में राजनीतिक स्वाधीनता संघर्ष की फैशन के रूपों के निर्माण में बड़ी भूमिका रही है। आंदोलनों के प्रभावस्वरूप नए-नए फैशन रूपों का जन्म हुआ। दीर्घकालिक प्रक्रिया में ये फैशन क रूप स्थिर होते चले गए। सार्वभौम रूप में बदल गए। उनके साथ जातीय पहचान के तत्व जुड़ गए।
फैशन की यह विशेषता होती है कि जब कोई एक शैली चल पड़ती है तो वह सार्वभौम रूप ग्रहण कर लेती है। कालांतर में यही सांस्कृतिक पहचान बन जाती है। आंदोलनों के गर्भ से उपजी शैलियों की यह विशेषता होती है कि वे सुनिश्चित संरचना में ही विकास करती हैं। फैशन का यह लक्षण है कि वह उदार होता है और समाहित कर लेता है, परिणामत: फैशन में अनेक संस्कृतियों के अनेक रूपों का समाहार मिलेगा। फैशन के कुछ रूप सदाबहार और सार्वभौम बन जाते हैं तो कुछ अल्पजीवी रह जाते हैं।
मसलन, भारतीय साड़ी, धोती और कुर्त्ता को ही लें। ये तीनों वस्त्र कभी भी कामुकता या कामुक इच्छाओं का प्रतीक नहीं रहे। बल्कि भद्रता, सौम्यता और सादगी के प्रतीक रहे हैं। हाल के 25-30 वर्षों से साड़ी को थोथी विलासिता, कामुकता एवं पुरुषत्ववादी दृष्टि से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
    अब साड़ी को सादगी एवं भद्रता का प्रतीक नहीं, विलासिता, समृद्धि और अभिजन के वस्त्र के रूप में उभारा जा रहा है। आज वह भोग-विलास का पर्याय है। साड़ी के साथ जुड़ी सहिष्णुता, उदारता एवं अनौपचारिक दृष्टिकोण की जगह नए मूल्यों का लाया जा रहा है। भारतीय साड़ी को पहनने की जो शैली आम जीवन और विज्ञापनों में दिखाई देती है उसमें गंभीर अंतर है। साड़ी पहनने की क्षेत्रीय शैलियां रही हैं। क्षेत्रीय स्तर पर साड़ी का आकार, स्वरूप, छापा आदि तय होता रहा है, इससे राष्ट्रीय बाजार निर्मित करने में बाधा आई। राष्ट्रीय बाजार एवं राष्ट्रीय पहचान के लिए पहनावे का एक ही रूप जरूरी था, इस ऐतिहासिक मांग की पूर्ति राष्ट्रीय आंदोलन ने की।

आधुनिक साड़ी पहनने की शैली पूरी तरह नई है। इसका श्रेय ज्ञानदानंदिनी देवी को है। वे सत्येंद्रनाथ टैगोर (प्रथम आई.सी.एस.) की पत्नी और रवींद्रनाथ टैगोर की भाभी थीं। वे आधुनिक चेतना से संपन्न थीं। संकीर्णता से मुक्त थीं। उन्होंने पारसी और कोंकणी शैली की साड़ी पहनने की शैलियों को मिलाकर आधुनिक भारतीय साड़ी पहनने की शैली बनाई जिसका आंचल बाएं कंधे से होता हुआ चला जाता है। आरंभ में यह टैगोर परिवार की साड़ी की शैली थी, बाद में इसे मध्यवर्ग में स्वीकृति मिली। इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि फैशन का आरंभ हमेशा आभिजात्य के यहां होता है। किंतु आभिजात्य इसे जिंदा नहीं रख पाता। फैशन तब ही फैशन होता है जब यह जनता में लोकप्रिय हो जाए।
    

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