गुरुवार, 11 मार्च 2010

हिन्दी के लेखक संगठनों की दिमागी गुलामी का तानाबाना-4



लेखक संगठन में वफादारी बड़ी खतरनाक प्रवृत्ति है। आज लेखकों के बीच में वफादारों की तलाश की जा रही है। वास्तविकता यह है लेखक स्वभाव से वफादार नहीं बागी होता, सिर्फ चारण लेखक वफादार होते हैं। बागी लेखक स्वयं के प्रति भी आलोचनात्मक नजरिया रखता है। भूमंडलीकरण के दौर में वफादारी सबसे बड़ा फिनोमिना है। इस अर्थ में भूमंडलीकरण और मध्यकाल एक ही जगह मिलते हैं,दोनों को वफादार की तलाश रहती है।
    लेखक को वफादार बनाने का अर्थ है नपुंसक और अप्रतिरोधी बनाना। लेखक संगठनों के द्वारा वफादारी का जो खेल चलता रहा है उससे इन संगठनों की ऊर्जा का ह्रास हुआ है। वफादारी मूलत: मध्यकालीनबोध है।
    इसी अर्थ में लेखक संगठनों में 'लेखक' कम 'वफादार लेखक' ज्यादा मिलते हैं। इनमें बागी भाव का अभाव है। जोखिम उठाने से कतराते हैं। बागीभाव के अभाव के कारण ये लेखक यथार्थ को चित्रित नहीं कर पाते, सत्य को खुलकर बोल नहीं पाते और हमेशा किसी अदृश्य भय अथवा परेशानी के आ जाने से सशंकित रहते हैं। इनकी रचना में बागीपन और यथार्थ जीवन की त्रासदी के रूपों का अभाव है। लेखक जब बागीपन,जोखिम उठाने,त्रासदी को विषयवस्तु बनाने से भागने लगे तो समझो उसने वफादारी का दामन पकड़ लिया है।
      हिन्दी में इन दिनों त्रासदी का विषयवस्तु के रूप में एकसिरे अभाव है। त्रासदी हमारे लेखक को उद्वेलित नहीं करती। त्रासदी का लेखन से गायब हो जाना और यथार्थ की बजाय निर्मित यथार्थ की रचनाओं की बाढ़ का आ जाना वैसे ही है जैसा श्रृंगार साहित्य में देखा गया था, वहां पर भी निर्मित यथार्थ था, फर्क यह है कि श्रृंगारी लेखक अपने व्यक्तिगत नजरिए को व्यक्त करने में ऐतिहासिक तौर पर असमर्थ था जबकि आधुनिक निर्मित यथार्थ वाली रचनाओं में लेखक का व्यक्तिगत नजरिया मिल जाता है।
     मध्यकालीन रीतिवाद में आलोचना नहीं प्रशंसा होती थी और कृतिकेन्द्रित प्रशंसा पर जोर था। इन दिनों आलोचना का ढ़ांचा पुराना है अंतर यह है कि प्रशंसा को सामयिक यथार्थ के साथ जोड़ दिया जाता है। मध्यकालीन आलोचक अपनी आलोचना को सामयिक यथार्थ से जोड़ नहीं पाता था, रचना में सामाजिकता की खोज नहीं करता था, मौजूदा दौर में रचना में सामाजिकता की बजाय लेखक के व्यक्तिगत नजरिए की खोज पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। नजरिए की प्रशंसा में कसीदे लिखे जा रहे हैं।
     रचना के मूल्यांकन में लेखक के नजरिये से ज्यादा महत्वपूर्ण रचना में चित्रित यथार्थ का मूल्यांकन। देखना चाहिए रचना में चित्रित यथार्थ वास्तव है अथवा निर्मित है ?
       रीतिकाल का ही असर है कि हिन्दी में नयी आलोचना की किताबें नहीं आ रहीं। यदि किताबें आयी हैं तो अकादमिक दबावों और जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से। आलोचना के लिहाज से तकरीबन काम बंद पड़ा है। आलोचनाकर्म क्यों बंद हो गया और उसकी जगह विज्ञापन की शैली में आलोचना क्यों आने लगी इसका गहरा संबंध आधुनिक रीतिकाल से है।
     आलोचना के लिए असहमति का होना जरूरी है। आलोचना के साहित्यिक उपकरणों का होना जरूरी है। आज जो आलोचना प्रचलन में है वह आलोचना के किसी पैराडाइम को आधार बनाकर नहीं लिखी जा रही बल्कि स्वांत सुखाय, आदेश और अनुरोध पर लिखी जा रही है। इसका बुनियादी आधार है वफादारी। उल्लेखनीय है वफादारी के आधार आलोचना नहीं लिखी जा सकती। राजनीति कर सकते हैं। सांस्कृतिक कर्म नहीं कर सकते।वफादारी के आधार पर आलोचनात्मक वातावरण नहीं बनाया जा सकता।
     आलोचनात्मक वातावरण बनाने के लिए जरूरी है आलोचना को सही ढ़ंग से लिखा जाए। आलोचना को रूढ़ियों के बाहर लाया जाए। वफादारी के आधार पर जब भी आलोचना लिखी जाएगी, प्रस्ताव पास किए जाएंगे,सम्मेलन अथवा सेमीनार होंगी उससे आलोचनात्मक माहौल नहीं बनेगा।
     वफादारी के आधार पर सांस्कृतिक कर्म का अर्थ है अपने को सही ठहराना, अपने हाथों अपनी पीठ ठोकना। जो पहले से सहमत है उसे सहमत बनाना। फलत: लेखक संगठन कोल्हू के बैल की तरह एक ही घेरे में परिक्रमा कर रहे हैं और आगे नहीं बढ़ पाए हैं। लेखक संगठन यदि लक्ष्मणरेखा खींचकर ,नियम से बंधकर काम करेंगे तो नियमों और रूढियों के खिलाफ संघर्ष कौन करेगा ? लेखक संगठन यदि सिर्फ सहमतियों को ही बढ़ावा देंगे तो असहमति के लिए लेखक कहां और किस मंच पर जाएगा ?
      लेखक संगठनों को बुनियादी तौर सहमति का नहीं असहमति का मंच होना चाहिए। बिडम्वना है कि लेखक संगठनों ने असहमति की बजाय सहमति को तवज्जह दी है। किसी भी लेखक का मूल्यांकन लिखे के आधार पर नहीं वैचारिक सहमति अथवा वफादारी के आधार पर हो रहा है।
     मसलन् इस सवाल सोचें कि क्या हिन्दी के तीनों बड़े लेखक संगठनों ने कभी ऐसे लेखक के बारे में विस्तार के चर्चा की है जिसके विचारों और नजरिए से वे एकदम असहमत हों ? मुक्तिबोध,रघुवीरसहाय, नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल,त्रिलोचन आदि पर बातें करना रीतिवाद है क्योंकि ये लेखक तो इन तीनों संगठनों के किसी न किसी एजेण्डे से सहमत हैं।
    सहमत पर सहमत होना और उसका प्रौपेगैण्डा करना अनालोचनात्मक माहौल बनाता है। इसके कारण सांस्कृतिक शत्रु कहीं पीछे छूट जाता है। नैतिक और राजनैतिक सहीपन के दावे अथवा अपने ही हाथों अपनी पीठ ठोंकने की प्रवृत्ति बल पकड़ लेती है। ज्योंही कोई संगठन इस पैराडाइम में दाखिल होता है वह अन्तर्विरोधों को सम्बोधित करना बंद कर देता है। क्योंकि वे सामाजिक-सांस्कृतिक स्पेस में अपने विरोधी को शिरकत ही नहीं करने देते। इसके कारण अलोकतांत्रिक प्रतिवादी रूपों का उदय होता है। 



3 टिप्‍पणियां:

  1. aap ka yah lekh bahas ki mang karta hai. aapne jo likha hai wah keya lekhak biradari nahi janti hai. ager janti hai to yah sawal uathta hai ki aise lekhak jo khud napunsak aur aapratirodhi hai unpar pathak ko kahan tak biswas karna chaiheya? aaj to wafadari ka aarth hi badal gaiya hai sir ? aaj wafadari ke naam par jo ho raha hai wah nai pedhi aur khud hame ek nirasajank mahaul me dhakel raha hai. tu meri pith thok mai teri pith thokta hun. jinka koi pith thokne wala nahi hai wah kahan jaeyan? Asahmati ko virodh man lia jata hai aur jo asahmat hai use haseiya par phenk dia jata hai.

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  2. लेखक को वफादार बनाने का अर्थ है नपुंसक और अप्रतिरोधी बनाना। सही कहा आपने।

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