सोमवार, 15 मार्च 2010

इंटरनेट की आंधी में ज्ञान की तलाश

  
    इंटरनेट का अंधड़ शिक्षितों के घर में घुस आया है। जहां नहीं घुसा है वहां पर नेट की लू के हल्के थपेड़े पड़ रहे हैं। नेट के अंधड़ के प्रति यदि हम सजग नहीं हुए तो आंखों के जाने का खतरा है। जिस तरह धर्म के प्रचारक होते हैं वैसे ही नेट के भी प्रचारक हैं, वे नेट के प्रति अंधभक्ति का पाठ पढ़ाते रहते हैं। नेट के प्रचारकों ने नेट के प्रति देवत्वभाव पैदा किया है।
     नेट के प्रति देवत्वभाव अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपहृत कर सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्राथमिक शर्त है देवत्वभाव की विदाई, सामाजिक जीवन में शिरकत,अन्य के जीवन में सहयोग और विवेक की कसौटी पर परीक्षा।
    नेट पर जाते समय हम कितना विवेक का इस्तेमाल करते हैं और कितना अनुकरण का,यह देखने वाली बात है। अनुकरण करेंगे तो नेट के गुलाम बनेंगे और विवेक का इस्तेमाल करेंगे ते नेट पर मास्टरी हासिल कर सकते हैं। हम तय करें कि गुलाम बनना है या मास्टर बनना चाहते हैं।
       यह सच है कि नेट से संचार तेज होता है। नेट ने हमें रीयलटाइम संचार के युग में पहुँचा दिया है। मनुष्य के ज्ञान की भूख को कई गुना बढ़ा दिया है। लिखना और संचार और भी सुंदर हो गया है। यह मिथ पैदा किया जारहा है कि नेट पर जाने,नेट पर लिखने का अर्थ है ज्ञानी होना।
   असल में नेट ज्ञानी कम ज्ञान से दूरी ज्यादा पैदा करता है। ज्ञान तब ही भौतिक शक्ति बनता है जब आप उसे व्यवहार में लागू करें और व्यवहार में लागू करने के लिए जमीनी संपर्क,जमीनी संवाद और जमीनी दोस्ती बेहद जरुरी है।
    विचारों और ज्ञान की जंग अंतरिक्ष में ,वर्चुअल में, ख्यालों में नही लड़ी और जीती जाती। ज्ञान जब तक जमीनी हकीकत से दो-चार नहीं होता उसकी परीक्षा नहीं होती। विचारों और ज्ञान की दुनिया कोई सूखी मेवा नहीं है जिससे पेट भर लिया जाए। मेवा को अन्न का, विचारों को वास्तव जिंदगी का विकल्प नहीं समझना चाहिए।
    नेट का अभी जो परिदृश्य नजर आ रहा है उसमें नेट के विचारों और वास्तव जिंदगी की समझ में व्यापक अंतराल नजर आता है। नेट का संपर्क और संबंध वर्चुअल है। विचार भी वर्चुअल हैं। यहां जितनी सूचनाएं हैं उससे ज्यादा कु-सूचनाएं हैं। अधूरी सूचनाएं हैं। ज्ञान है लेकिन अधूरा।
     नेट यूजरों को एक बुनियादी बात समझने की जरुरत है कि ज्ञान के पैर नहीं होते, ज्ञान किताब नहीं है। ज्ञान किताब से नहीं ,वेब के पन्नों से नहीं जीवन-व्यवहार में शिक्षण-प्रशिक्षण से अर्जित करना होता है। ज्ञान महज बौद्धिक क्रिया नहीं है बल्कि सामाजिक अन्तर्क्रियाओं में भागीदारी से अर्जित किया जाता है।
     ज्ञान प्राप्ति का अर्थ सूचना पाना मात्र नहीं है। ज्ञान कोई निर्जीव आंकड़ा भी नहीं है। ज्ञान किताब में नहीं जीवन में होता है, किताबों और वेब के पन्नों में ज्ञान की खोज करना बेवकूफी है। मनुष्य को ज्ञान जीवन में शिरकत से, जीवन संघर्षों में हिस्सेदारी से मिलता है। हम तय करें हमें नेट का सूखा संचार और जीवनरहित ज्ञान चाहिए अथवा जीवन के रस और सामाजिकता से बना ज्ञान चाहिए।        
      
















1 टिप्पणी:

  1. "ज्ञान प्राप्ति का अर्थ सूचना पाना मात्र नहीं है। ज्ञान कोई निर्जीव आंकड़ा भी नहीं है।"
    निश्चय ही ज्ञान और सूचना में अंतर है चतुर्वेदी जी पर यह भी नहीं है की दोनों के बीच कोई सम्बन्ध न हो! इन दोनों के बाच परासरण सहज और स्वतः भी होता चलता है गर कोई सायास अवरोध न उत्पन्न हो /किया जाए !

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...