गुरुवार, 4 मार्च 2010

सेक्स उद्योग के सामने सब बौने

     परवर्ती पूंजीवाद के दो प्रभावी अस्त्र हैं सेक्स उद्योग और शस्त्र उद्योग। जो शास्त्र से न मरे उसे सेक्स से मारो,और जब सेक्स से भी न मरे तो शस्त्र से मारो। इन दोनों ही किस्म के यथार्थ के बारे में सारे शास्त्रों के अनुमान और तर्क असमर्थ महसूस करते हैं।
    सामान्य तौर पर यह सोचा जा रहा था कि अस्सी के दशक में आयी आर्थिक मंदी से सेक्सबाजार कुछ ठंडा पड़ेगा। किन्तु हुआ इसके विपरीत। कानूनी पेचबंदियों के बाद अमेरिका में राष्ट्रपति रीगन और राष्ट्रपति सीनियर बुश ने सोचा था कि अमेरिका का पोर्न बाजार ठंडा पड़ गया है किन्तु कुछ ही अर्से बाद देखा गया कि कम्युनिकेशन की अत्याधुनिक तकनीकों को इजाद कर लिया गया और ठंड़ा सा दिखने वाला पोर्न बाजार नए सिरे से आक्रामक हो उठा।

डिजिटल तकनीक ओर उपग्रह प्रसारणों के गर्भ से पोर्न पहले से ज्यादा आक्रामक होकर सामने आया। वेश्यावृत्ति का धंधा कम होने की बजाय तेजी से फैला है। आखिरकार क्या बात है कि भू.पू.समाजवादी देशों में जहां सेक्स बाजार खत्म कर दिया गया था। स्त्रीशोषण के सभी रूपों को खत्म कर दिया गया था, समाज में स्वस्थ संस्कृति और स्वस्थ मीडिया संस्कृति थी। आर्थिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक शोषण के सभी रूपों को खत्म कर दिया गया था। इतना कुछ करने के बावजूद भू.पू. समाजवादी राष्ट्रों में सेक्सबाजार का पुन: स्थापित हो जाना इस बात का संकेत है कि कामदेव के आगे सभी बौने हैं। कामशास्त्र के सामने सारे शास्त्र कुण्ठित हैं।

शोषण के सबसे प्रभावी अस्त्र के रूप में आज भी सेक्सबाजार दुनिया का सबसे ताकतवर बाजार है। सारे कानून और सत्ता के दबाव उसके सामने असमर्थ महसूस कर रहे हैं। आधुनिक आधुनिक काल आने के बाद और औद्योगिक क्रांति के सन् अस्सी के पहले तक सेक्स बाजार का हिस्सा था,आज किन्तु वह सेक्स उद्योग है। सेक्स शरीर था,बाजार बना ओर अब उद्योग बन गया है। पहले सेक्स वर्कर क कोठे पर देख सकते थे। कभी-कभार बाजार या जलसों में भी देख सकते थे। सिनेमा के आने के बाद कोठे के दृश्य आने लगे। पोर्न साहित्य ने शारीरिक क्रियाओं और शारीरिक अंगों के दृश्यों की बाढ़ पैदा कर दी। पोर्न फिल्मों ने कामुकता के कलात्मक और राजनीतिक नजरिए की विदाई कर दी। और इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने पोर्न और सेक्स को उद्योग बना दिया।
      इण्टरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट में बताया गया है कि एशियाई आर्थिक संकट के बावजूद सेक्स उद्योग थमा नहीं। सामाजिक और आर्थिक शक्तियां सेक्स उद्योग को तेजी से आगे ले जा रही हैं। वेश्यावृत्ति का दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में इस गति से विकास हुआ है कि उसने आज व्यवसायिक क्षेत्र का दर्जा हासिल कर लिया है। आज वह इस क्षेत्र के देशों की रोजगार और राष्ट्रीय आय में अच्छा-खासा अवदान कर रहा है। इस क्षेत्र के देशों में व्यक्तिगत आय में अस्सी के बाद के वर्षो में तेजी से गिरावट आयी है। मैन्यूफेक्चरिंग क्षेत्र में औरतों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है।
        प्रावदा ( 5 दिसम्बर 2005) अखबार लिखता है कि आज सारी दुनिया में अनुमानत: 12.3 मिलियन लोग हैं जो गुलामी में जी रहे हैं। निजी कंपनियों में 9.8 मिलियन कर्मचारी हैं। 2.5 मिलियन से ज्यादा लोग ऐसे हैं जो किसी न किसी दबाव के कारण गुलामी में जी रहे हैं। के जरिए विश्व स्तर पर  सालाना आमदनी 30 विलियन डालर क आंकड़ा पार गयी है। इसके बावजद दोषी लोगों को अभी तक दण्डित नहीं कर पाए हैं।
    आईएलओ की रिपोर्ट के आधार पर प्रावदा लिखता है कि इन गुलामों में से बीस फीसदी के करीब लोगों का राज्य और सैन्यबल इस्तेमाल करते हैं। 11 फीसदी आधुनिक गुलामों का वेश्यावृत्ति और अन्य सेक्सउद्योग में इस्तेमाल किया जाता है। 64 फीसदी गुलाम परंपरागत और वैध उद्योगों  के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। बाकी पांच फीसदी के बारे में बताना मुश्किल है कि वे किस तरह के कामों में लगे हैं।

गुलामी और जोर-जबर्दस्ती काम कराने की प्रक्रिया आज भी समाज में जारी है। सारी दुनिया में किसी न किसी रूप में ये प्रक्रिया चल रही है। एशिया ,अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में गुलामी का सबसे कारण है कर्ज। भूमंडलीकरण ओर माइग्रेशन समसामयिक गुलामी के रूप हैं। ये मूलत: नियोजित अपराधी गतिविधियों , कर्ज में डूबो देने वाले कारोबार जैसे कृषि,भवननिर्माण ,सिलाई और खाद्य उपस्करण उद्योग। अपराधी गिरोह बच्चों की खरीद-फरोख्त केकाम को सुनियोजित ढ़ंग से अंजाम दे रहे हैं।

सेक्स गुलामी के बड़े पैमाने पर लोग शिकार हो रहे हैं। अपराधी गिरोह औरतों को ज्यादा पैसा दिलाने के लालच में औरतों का विदेशों के लिए निर्यात कर रहे हैं। पर्यटन उद्योग में औरतों का देह-व्यापार के क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहा है।युवा लडकियों और तरूणियों की ज्यादा मांग है।क्योंकि उनमें समर्पणभाव ज्यादा होता है। थाईलैण्ड में पडोसी देशों की औरतें देह-व्यापार के धंधे में ज्यादा हैं।खासकर बर्मा,लाओस,कम्बोडिया की लड़कियां वेश्यावृत्ति के पेशे में हैं।

इसी तरह वियतनाम की औरतें और बच्चे कम्बोडिया में देह-व्यापार में ज्यादा हैं।इसी तरह जबरिया शादी और जबरिया काम के नाम पर चीन, आस्ट्रेलिया, हांगकांग, जापान,दक्षिण कोरिया आदि देशों में इण्डोनेशिया और फिलीपीन्स की लड़कियां सबसे ज्यादा सेक्स उद्योग में हैं।

जापान भी अपराधी कारोबार  का बड़ा केन्द्र है। जापान में दक्षिण-पूर्व एशिया,लैटिन अमेरिका और पूर्वी यूरोपीय देशों की लड़किया देह-व्यापार के धंधे में सबसे ज्यादा हैं। जापान में सेक्स उद्योग व्यावसायिक उद्योग के दायरे में आता है। इसका काम है सेक्स सेवाएं प्रदान करना। इस पूरे उद्योग को ताकतवर अपराधी गिरोह चलाते हैं। समाजवादी सोवियत संघ के पतन और विघटन के बाद वहां के देशों में भी देह-व्यापार तेजी से फैला है।

भू.पू. समाजवादी देशों से अब तक पांच लाख से ज्यादा लड़कियां दुनियाभर के देशों में सेक्स उद्योग में सप्लाई की गई हैं। इन तथ्यों को रखने का प्रधान कारण यह है कि देह-व्यापार में स्थानान्तरित करके लायी गयी लड़कियां बड़ी संख्या में हैं।

भारत में देह-व्यापार में सक्रिय लड़कियों में सबसे बड़ी तादाद बंगलादेश और नेपाल से आई लड़कियों की है। यानी देह-व्यापार का धंधा माइग्रेशन पर टिका है। माइग्रेशन के कई कारण हैं । इनमें सबसे बड़ा कारण है गरीबी, स्थानीय स्तर पर आजीविका का अभाव,कम परिश्रम से ज्यादा धन कमाने की लालसा,जबरिया श्रम और विकास के नाम पर हो रहा विस्थापन। 
       


2 टिप्‍पणियां:

  1. मनुष्य की इस जैविक इच्छा को भुनाने के लिये बाज़ार सक्रिय है और फिलहाल तो इसे रोकने का कोई उपाय नही दिखाई दे रहा । यह अच्छा विश्लेषणपरक आलेख है ।

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