मंगलवार, 2 मार्च 2010

संघ जानता है पश्चिम बंगाल और गुजरात का अंतर-2-



जिस तरह किसी संत-मंहत और सन्यासी के हजारों-करोड़ों भक्त भारत में मिलेंगे, उसके पीछे खड़ी अनुगामी भक्त मंडली मिलेगी,ठीक वैसी ही अनुगामी जनता पश्चिम बंगाल में तैयार करने में लाल को सांगठनिक सफलता मिली है। 

भक्त जनता भारत में हमेशा से महान रही है। भक्त को हमारे यहां के भक्ति आंदोलन के कवियों ने भगवान से भी बड़ा दरजा दिया है। हमने कभी भक्त के दोषों की नहीं भक्त की भक्ति को महान बताया है और उसके सभी दोषों को माफ किया है। भक्त बनाने के इस सांस्कृतिक- धार्मिक मॉडल को रैनेसां में सबसे पहले नए सांचे में ढाला गया ,नए किस्म की भक्ति परंपरा के सांचे में ढाला गया, इस कार्य में भक्ति का नवीकरण हुआ अनुगामी भाव का भी नवीकरण हुआ। भक्त,भक्ति और एकजुटता के आलोक में जो नयी नेटवर्किंग रैनेसां के प्रभाववश तैयार हुई उसके साथ आधुनिक संगठन संरचनाओं,संस्थानों आदि के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई।
     

कालान्तर में आजादी के बाद धीरे-धीरे रैनेसां के दौर में उपजी नये किस्म की भक्तिभावना को सचेत रूप से राजनीति में क्रमश: शामिल किया गया और माक्र्सवाद की नयी विचारधारा के आलोक में उसे पेश किया गया। मार्क्सवाद के साथ रैनेसां के मेलबंधन के रास्ते तलाशे गए, रैनेसां को माक्र्सवादी संगठन की विचारधारा के साथ जोड़ा गया, रैनेसां के अनुगामी बनाने के मंत्र को तेजी से आत्मसात किया गया। यही वह प्रस्थान-बिंदु है जहां से पश्चिम बंगाल का कम्युनिस्ट आंदोलन अपनी असली ऊर्जा लेता रहा है। रैनेसां के अंदर भक्ति का पुराना मंत्र शामिल था,कुछ संशोधनों के साथ। किंतु इसमें एक धागा था जो समूची बंगाली जाति को बांधे था वह धागा था भक्ति का। आधुनिक भक्ति का। समाजसुधार संगठनों के पीछे चलो, उनके अनुयायी बनो,चाहे जो करो।
   

''अनुयायी बनो चाहे जो करो'' यह नारा रैनेसांयुगीन सुधारवादी धार्मिक संगठनों ने बंगाल में दिया  था। कम्युनिस्टों ने ठीक इसी नारे को आत्मसात करके पश्चिम बंगाल में धीरे-धीरे अपनी सांगठनिक संरचनाओं का निर्माण किया है।

 रैनेसांकालीन भक्ति पुराने भक्ति-आंदोलन से बुनियादी तौर पर भिन्न है। पुरानी भक्ति ''चाहे जो करो'' की अनुमति नहीं देती, चाहे जो करो वाले लोग पुरानी भक्ति में नहीं मिलेंगे, वहां भक्ति की संरचनाएं भी नहीं मिलेंगी। पुरानी भक्ति राजनीतिमुक्त थी। राजनीति से परे थी। 

इसके विपरीत रैनेसांकालीन भक्ति ने पुरानी भक्ति से विचार पर जोर देने वाला तत्व और आंखें बंद करके उपासना करने का भाव लिया, आधुनिक पूंजीवाद से स्वतंत्रता और अनुगामी भावबोध लिया। इस प्रक्रिया में ही  यह नारा निकला ''भक्त बनो और कुछ भी करो।'' पुराना भक्ति आंदोलन कंठीबंद ,चेलापंथी नहीं था। वहां भक्ति और सिर्फ भक्ति थी, वहां स्वतंत्रताबोध नहीं था।
   
नया रैनेसां कंठीबंद भक्तों की पूरी जमात तैयार करने में लग गया। उदीयमान पूंजीवाद ,साम्राज्यवाद आदि के सबसे बड़े अनुगामी और विरोधी इसी रैनेसां के गर्भ से पैदा हुए। नई पूंजीवादी संरचनाओं के सर्जक इसी आंदोलन के गर्भ से पैदा हुए। नए पूंजीवादी विचारों के प्रचारक इसी रैनेसां के आन्दोलन के द्वारा तैयार किए गए। ये वे लोग थे जो पुराने उजड़े सामंती परिवारों से आए थे। इन लोगों ने आरंभ में एकल परिवार पर कम परिवार पर ज्यादा जोर दिया, स्त्री के महिमामंडन का महाख्यान तैयार किया, आधुनिकता का महाख्यान तैयार किया, यही वह वर्ग है जो कालान्तर में लाल का महाख्यान तैयार करने में लग गया, लाल को इस अर्थ में रैनेसां से बहुत कुछ सीखने को मिला, बहुत कुछ ऐसा भी था जो आधुनिक पूंजीवादी था।
       
जिस स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी के प्रथम जयघोष का श्रेय रैनेसां के बंगाली बुद्धिजीवियों को जाता है उनकी विरासत के साथ वाम ने अपने को जोड़ा। उनसे स्वतंत्रता और अनुगामिता को ग्रहण किया और उसे अपनी सांगठनिक पूंजी में तब्दील किया। कालान्तर में सन् 1977 में सत्ता में आने के बाद लाल ने एक नया तत्व अपनी रणनीति में जोड़ा जिसे सोवियत संघ,चीन आदि के अनुभवों से सीखा गया, इसके तहत जनता को निष्क्रिय दर्शक बनाने की कला का कौशलपूर्ण ढ़ंग से विकास किया गया। वाम ने विगत तैंतीस साल के शासन में इस कला का क्रमश: विकास किया,निष्क्रिय दर्शक जनता को रैनेसां की अनुगामिता के सहमेल के साथ दिलो-दिमाग में सांगठनिक संरचनाओं के जरिए जेहन में उतारा गया है। यह बेहद मुश्किल और जटिल काम है।

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3 टिप्‍पणियां:

  1. शीर्षक और आलेख में क्या सम्बन्ध है. आलेख दो बार पढ़ा पर कुछ समझ नहीं आया. बंगाल में भक्ति आन्दोलन के बाद ऐसा क्या हो गया जिसे आप पुनर्जागरण के साथ जोड़ रहे हैं, जो हुआ वह तो क्रांति भी नहीं थी. जनता और सर्कार सभी सोये हुए हैं. नहीं तो व्यवस्था विरोधी नक्सलवाद बंगाल से ही जन्म न लेता न पनपता. संघ शीर्षक में है पर आलेख से नदारत है.

    या क्या आप यूरोप के पुनर्जागरण को भारत के रीतिकाल से जोड़ रहे हैं?!!! हद है. आपका लिखा केवल महाविद्वान् ही समझ सकेंगे.

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    असल में आप को भी नहीं पता की आपने क्या लिख दिया है, जब वाम की आलोचना करने का मौका पड़ता है तब ऐसा ही हो जाता है. कोई नई बात नहीं है, सभी बंगाल के बुद्धिजीवियों के साथ होता है.

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  2. Sachha alochak wah hai jo bangal aur gujrat me jo bhi galat hua uski khuleaam alochna kare. vichardhara me badhne ka yah arath nahi hai ki aap sach se muah moday.aapne sahi kaha hai ki lal ne janta ko niskriya darssak bana dia tha par ab yah mithak tut raha hai. ager tum janta ko bhulawoge to janta tumko ek din bhula degi. yah bat lal ko samajh me aa gai hai.mujhe lagta hai ki es lal ko nakli bampanthieon ne sabse jayada nuksan pahuchaya hai. Ab lal ko en nakli jhanda dhonewalo se sajag hona padega.Warna lal aur bhagwa me koi pharak nahi rahega.

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  3. ब्रह्म भ्रम नही है लेकिन जो लिखा वह भ्रम न होते हुए भी भरमाने की कोशिश से किया भ्रमपुर्ण लेखन होते हुए भी आपकी प्रशंसा क्यो की जाए या क्यो न कि जाए ईस दुविधा से उबरने की कोशिस करते करते यह लिख बैठा।

    क्रांति की उर्जा हरपल सामाजिक चेतना मे संचित होती रहती है। लेकिन अर्द्ध क्रांति से उर्जा का क्षय होता है - जिस के कारण सम्पुर्ण क्रांति नही हो पाती और समाज अपेक्षित परिवर्तन से वंचित रह जाता है। इतना ही नही अर्ध या कहे प्री-मेच्योर क्रांती कराने वालो के पीछे अक्सर साम्राज्यवादी शक्तिया ही होती हैं। कुछ लाल है जो हरे हरे पत्तो पर मोहित हो जाते है।

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