मंगलवार, 2 मार्च 2010

संघ जानता है पश्चिम बंगाल और गुजरात का अंतर-3-

कम्युनिस्ट विचारधारा ने निष्क्रिय दर्शक और अनुगामी जनता के निर्माण की कला पूंजीवाद से सीखी है। यह मूलत: पूंजीवादी कला है इसका मार्क्सवाद से कोई लेना-देना नहीं है। सोवियत संघ ,चीन आदि समाजवादी देशों ने इस कला को प्रथम विश्वयुद्ध के पूंजीवादी प्रचार अभियान के अनुभवों से सीखा था। पूंजीवाद ने इसी कला को विज्ञापन और जनसंपर्क की कला में तब्दील कर दिया, जबकि समाजवादी सोवियत संघ आदि देशों ने क्रांतिकारी अनुगामिता में रूपान्तरित कर दिया। पश्चिम बंगाल में सक्रिय वाम संगठन बड़े ही कौशल के साथ जनसंपर्क और विज्ञापन की प्रचार रणनीतियों का अनुगामी बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
       
जनसंपर्क और विज्ञापन की रणनीतियों के आधार पर किया गया प्रचार अभियान जनता को अपनी ओर आकर्षित करने में तब ही सफल होता है जब उस प्रचार अभियान को नीचे ले जाने वाली संरचनाएं  उपलब्ध हों। वाम के पास ऐसी सांगठनिक संरचनाएं हैं जो प्रतिदिन अहर्निश विचारों की मार्केटिंग करती रहती हैं। ग्राहक पर कड़ी नजर रखती हैं, उसका प्रोफाइल रखती हैं, उसके मूवमेंट पर नजर रखती हैं। विज्ञापन रणनीति का मूल मंत्र है आक्रामकता। आक्रामक प्रचार और येनकेन प्रकारेण ध्यान खींचना,बांधे रखना। ये सारे मंत्र वाम के पास हैं।
      
मार्केटिंग का सबसे बढ़िया तरीका है माल को हर हाल में बेचना, सबको बेचना, पक्के ग्राहक बनाना, ऐसे ग्राहक बनाना जो खरीदें किंतु सोचें नहीं, भोग करें किंतु भागें नहीं। जो भागना चाहे उसे पाने की कोशिश करो। साम,दाम,दंड,भेद का इस्तेमाल करो। पटाओ और अनुयायी बनाओ। कोई भी आंदोलन हो ,कितना भी बड़ा आंदोलन हो, कितना ही बड़ा जनोन्माद पैदा हो, कितनी ही बड़ी गलती हो, जनता को फुसलाना और अनुगामी बनाना,उसके दिलोदिमाग को हर हालत में काबू में करना ही वाम की रणनीति रही है। वाम कभी विपक्ष के सामने नहीं झुकता किंतु जनता के बीच साम,दामदंड,भेद की कला का इस्तेमाल करता है। यह समूची विज्ञापन,जनसंपर्क और मार्क्सवादी सांगठनिक संरचनाओं के सहमेल से बनी रणनीति है।

विज्ञापन और जनसंपर्क की कला पालतू बनाने की कला है, यह आलोचनात्मक मनुष्य नहीं बनाती, बल्कि  धूर्त्त मनुष्य बनाती है। ऐसा मनुष्य बनाती है जो कभी भी अपना ब्राँड बदल लेता है बगैर किसी कारण के ब्राँड बदल लेता है। बगैर किसी कारण के जब कोई ब्राँड बदल लेता है तो पहले वाला ब्राँण्ड अपने ग्राहक को पुन: पाने की कोशिश करता है ,प्रलोभन देता है, कमीशन देता है, अतिरिक्त माल भी देता है। वह सिर्फ यही चाहता है कि उसका पुराना ग्राहक लौट आए।
 ब्रॉण्ड कल्चर के आधार पर माकपा ने अपने नेताओं की इमेज निर्मित की है। इस प्रक्रिया में सब कुछ तय है, भाषण भी तय है, फूल भी तय हैं, जनता भी तय है। आखिरकार ब्राँण्ड प्रमोशन के आधार पर जुटायी गयी जनता सिर्फ अनुगामी होती है। यही अनुगामी जनता वाम की ताकत है। यह मूलत :अनालोचनात्मक जनता है। यह वाम की गलतियों का लंबे समय तक प्रतिवाद नहीं करती थी, (सन् 2007 के बाद इसने प्रतिवाद करना आरंभ किया है) ब्राँण्ड संस्कृति की यही ताकत है। ब्राँण्ड का भोक्ता अनालोचनात्मक होता है। अनालोचनात्मक जनता वैसे ही इफरात में उपलब्ध है इसके लिए थोड़ा कौशलभर चाहिए वह किसी के साथ जा सकती है। मुश्किलें यहीं पर हैं, जनता को सिर्फ भोगना है। भोक्ता की तरह व्यवहार करना है। वाम की शक्ति और दुर्गति का प्रधान कारण है ,अनुगामी और भोक्ता जनता। 

1 टिप्पणी:

  1. yahan aap ne bampanthi sarkar ki sahi nabaj pakdi hai. baam ki shakti aur durgati ka karan anugami aur aankh mundkar biswas karne wali janta hai aur way log bhi jo hamesa ugate suraj ko pranaam karte hain. aur way log bhi hain jo sattarudh party ke sath chipke rahne ke leiy aapne aap ko uska smarathak batatey hain

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